अवधेश कुमार
केंद्रीय गृहमंत्री
राजनाथ सिंह द्वारा यह कहने के बाद कि वर्ष 2018 तक भारत-पाकिस्तान
की सीमा को पूरी तरह से सील कर दिया जाएगा इस पर बहस छिड़ गई है। एक पक्ष का मानना है
कि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही कठिन। उनके अनुसार पाकिस्तान से लगे सीमा क्षेत्रों
की भौगोलिक स्थितियां ऐसी हैं कि यह पूरी तरह सील हो ही नहीं सकतीं। दूसरी ओर ऐसे लोग
भी हैं जो मानते हैं कि ऐसा हो सकता है। ये इजरायल का उदाहरण देते हैं जिसने यह करके
दिखा दिया है। राजनाथ सिंह ने यह बात राजस्थान के जैसलमेर में आयोजित पाकिस्तान सीमा
से लगने वाले राज्यों की ताजा सुरक्षा प्रबंधों की समीक्षा बैठक के बाद कही। ध्यान
रखिए उन्होंने यह भी कहा कि सीमा को सील करने का कार्य तय वक्त में काम पूरा कर लिया
जाएगा। उनके पूरे कथन का भाव यह था कि सीमा सील करने की बात केवल कल्पना नहीं है,
उसकी योजना बन चुकी
है और काम आरंभ हो चुका है। उनके अनुसार सीमा को सील करने के लिए आधुनिक उपकरणों का
इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सीमा की निगरानी के लिए बॉर्डर सिक्योरिटी
ग्रिड स्थापित किया जाएगा, जिसमें पाकिस्तान की सीमा से लगे चारों राज्यों का सहयोग लिया
जाएगा। ये राज्य इस ग्रिड को अपने इनपुट देंगे, जिसके हिसाब से जरूरी
कदम उठाए जाएंगे।
राजनाथ सिंह के कथन
को केन्द्र सरकार की सीमा संबंधी एप्रोच के साथ मिलाकर देखा जाए तो वे एक समग्र सीमा
प्रबंधन की बात कर रहे हैं, जो न केवल अभेद्य दीवारों से घिरा होगा बल्कि उसमें ऐसे तकनीक
होंगे, मानव प्रंबंधन इतना कुशल होगा कि सामन्य उल्लंघन की क्रिया पर भी पूरी प्रणाली
सक्रिय हो जाएगी। यानी हर हाल में सीमा पार से घुसपैठ रोक दिया जाएगा। भारत पाकिस्तान
की सीमा नियंत्रण रेखा को मिलाकर कुल 3323 किलोमीटर है जिसमें चार राज्य पंजाब,
राजस्थान, जम्मू कश्मीर और गुजरात
आते हैं। सरकार की योजना में सीमा पर कंक्रीट, लेजर बीम, रडार और उपग्रह सेंसर
की दीवार खड़ी करने की बात है। इसकी जिम्मेदारी बॉर्डर मैनेजमेंट डिविजन को दे दी गई
है। चारों राज्यों की अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक सुरक्षा दीवार बनाए
जाने पर काम चल रहा है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में कई जगहों पर पक्की दीवार तो गुजरात
के रण और सर क्रीक में लेजर वॉल और लेजर बीम से सीमा सील होगी। कैमरे, रडार और उपग्रह से
नियंत्रित होने वाले सेंसर लगाए जाएंगे। इससे छोटी से छोटी हरकत की जानकारी भी कुछ
सेकंड में मिल जाएगी। सबसे पहले जम्मू-कश्मीर में पक्की दीवार बनेगी। यह 10 फीट ऊंची होगी। सैटेलाइट
सेंसर कोहरे में भी सीमा पर पैनी नजर रखेंगे। जम्मू-कश्मीर में सेंसर और लेजर से युक्त
6.9 किमी लंबी दीवार बनाने का प्रयोग सफल रहा है। सीमा सुरक्षा बल इस समय पंजाब में
45 स्थानों पर प्रायोगिक तौर पर लेजर वॉल से सुरक्षा कर रहा है।
आइए एक-एक राज्य की
चुनौतियां, वर्तमान सीमा सुरक्षा व्यवस्था पर नजर दौड़ाएं। सबसे पहले जम्मू कश्मीर,
क्योंकि आतंकवाद सहित
ज्यादा सुरक्षा चुनौतियां यहीं हैं। नियंत्रण रेखा सहित जम्मू कश्मीर की सीमा लंबाई
1225 किमी है। इनमें 210 कि. मी. सीमा ऐसी है जिसमें पहाड़ों की 18,000 फीट तक ऊंची दुर्गम
चोटियां हैं। यहां पारा शून्य से 50 डिग्री नीचे तक जाता है। यहां दोहरी तारबंदी, गश्ती के वाहन,
सामान ढोने के लिए
खच्चर आदि का प्रयोग किया जाता है। गुजरात से 508 कि. मी. सीमा लगती
है। यहां दलदल और नमक के सफेद रण हैं। 262 किमी के दलदल में
तारबंदी भी नहीं है। यहां जीरो लाइन पिलर भी नहीं दिखते। सफेद रण में तो दिशा तक का
पता नहीं चलता। सर क्रीक में पानी के कारण बॉर्डर का पता ही नहीं चलता। जो उपाया सीमा
सुरक्षा के किए गए हैं वो हैं, पानी, जमीन और दलदल में लड़ने में दक्ष क्रोकोडाइल कमांडो की तैनाती।
इसके अलावा तैरती बोओपी, होवरक्राफ्ट, कोबरा वायर (करंट वाली तारबंदी) आदि का उपयोग
भी होता है। राजस्थान में 1037 किमी है सीमा है। यहां 50 डिग्री सेल्सियस तक
तापमान चला जाता है। रेत के 80-90 फीट ऊंचे शिफ्टिंग वाले टीले है। इसमें कोई भी भटक सकता है।
तारबंदी रेत में दब जाती है और सीमा का पता नहीं चलता। अभी यहां पैदल, ऊंटों से गश्त,
तारबंदी पर घंटियां
बांधने जैसे प्रयोग हुए हैं। साथ ही फ्लड लाइट, सैंड स्कूटर,
हाइटेक कम्पास,
90 फीट ऊंचे टावर लगे
हैं। पंजाब में कुल सीमा 553 किमी है। यहां नदी-नालों की रचना ऐसी जटिल है कि सीमा प्रबंधन
बड़ी चुनौती बन जाती है। उदाहरण के लिए रावी नदी 11 बार तथा सतुलज 9 बार सीमा के अंदर
और बाहर होती है। घुसपैठ का खतरा यहीं से होता है। सर्दियों में इतना घना कोहरा होता
है कि अपना हाथ तक न दिखाई दे। यहां आतंकी घुसपैठ के साथ हथियारों और ड्रग्स की तस्करी
रोकना सबसे बड़ी चुनौती। यहां पैदल, घोड़ों, बाइक, जिप्सी व बोट से गश्त की जाती हैं,
नावों पर नाके बने
हैं.. कहीं-कहीं कैमरे, फ्लड लाइट आदि भी लगे हैं।
जाहिर है, इसे देखने के बाद सरकार
की सीमा को अभेद बनाने की चुनौतियां का आभास हो जाता है। किंतु हमारे पास चारा क्या
है। मरता क्या न करता। जब इजरायल ऐसा कर सकता है तो हम क्यों नहीं कर सकते। आतंकवादी
घुसपैठ की समस्या से निपटने का सबसे कारगर रास्ता यही है कि सीमा ही अभेद हो जाए कि
कोई प्रवेश न करे। इजरायल में 1994 में सीमा घेरने का काम शुरू हुआ था। इसने कर दिखाया और उसके
बाद आतंकवादी हमलों में 90 प्रतिशत तक कमी आ गई। वैसे इजरायल की सीमा केवल 1068 किमी लंबी है। यानी
हमारी पाकिस्तान से लगने वाली सीमा ही इससे तीन गुणा ज्यादा है। किंतु न भूलिए कि इजरायल
की सीमा चार देशों मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और फलस्तीन से लगा हुआ है। मिस्र और सीरिया सीमा पर 16 फीट ऊंची फेंसिंग, लेबनान सीमा पर रेजर
फेंसिंग, गाजा पट्टी पर कंक्रीट की दीवार और फेंसिंग है। दीवारों को जमीन से 8 फीट नीचे से बनाया
गया है। राजनाथ सिंह के इजरायल दौरे का एक प्रमुख उद्देश्य उनकी सीमा प्रबंधन को समझना
था। उनके साथ गए अधिकारियों ने इसे समझा एवं इस पर काफी समय पहले से काम आरंभ हो चुका
है।
कह सकते हैं कि भारत
की सीमा केवल पाकिस्तान से ही नहीं लगती। यह चीन, म्यान्मार,
बंगलादेश, भूटान और नेपाल से
तथा समुद्री सीमा श्रीलंका और मालदीव से भी लगती है। हर क्षेत्र की अलग समस्याएं हैं,
पर मुख्य समस्या पाकिस्तान ही है। वैसे चीन के साथ बाड़ नहीं लग सकता, क्योंकि पूरी सीमा
चिन्हित नहीं है। सीमा सुरक्षा को सशक्त किया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी
तथा वायुसेना एवं थल सेना के डिविजन बढ़ाए गए हैं जिन पर चीन से चिंता भी प्रकट की जा
रही है। सीमा को लेकर मोदी सरकार आरंभ से ही नए दृष्टिकोण से विचार करती रही है। गृह
मंत्रालय ने देश की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा को और अधिक पुख्ता बनाने के लिए एक समिति
का गठन किया। उसके बाद भारत और बांग्लादेश सीमा भी एक समिति का गठन किया गया। एक अन्य
समिति पश्चिम सीमा के लिए बनाई गई थी। इन सारी समितियों की रिपोर्ट सरकार को मिल चुकी है। केंद्र ने
सभी सीमाओं के मूल्यांकन के लिए एक वर्ष का समय निर्धारित किया था। इस दौरान भारत नेपाल
से लेकर देश की समुद्री सीमाओं तक सभी का मूल्यांकन किया गया। जून 2015 में ही भारत-बांग्लादेश
की सीमा सुरक्षा योजना के तहत फ्लोटिंग एल्यूमीनियम बाड़ लगाने का निर्णय हुआ। हल्के और कम वजन वाले इस बाड़ को लगाने का जिम्मा
केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) को सौंपा गया है। इस परियोजना की शुरुआत
नदी वाले भारत-बांग्लादेश की सीमा पर गोजाडांगा क्षेत्र से हुई है। इन बाड़ों को नदी
वाले सीमा क्षेत्र में कंक्रीट और सीमेंट पर धातु के डंडों के सहारे लगाया जा रहा है।
गृह मंत्री ने स्वयं कहा था कि लगभग 1751 किलोमीटर भारत नेपाल
की सीमा और 699 किलोमीटर भारत-भूटान सीमा पर चौकसी रखना चुनौती भरा कार्य है।
कारण, यहां खुली सीमा है और दोनों देशों के लोगों का आना जाना लगा रहता है। तो यहां जवानों
की मुश्तैदी पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है। भारत म्यान्मार सीमा को लेकर भी पूर्वोत्तर
वाली समिति ने अपने सुझाव दिए थे जिस पर काम हो रहा है। भारत-म्यांमार सीमा के 10 किलोमीटर के दायरे
में 240 गांवों में दो लाख से अधिक आबादी रहती है। यहां की समस्या उग्रवाद तथा हथियार
और मादक पदार्थो की तस्करी की है। इसमें सीमा
पर अधिक से अधिक पुलिस थाने खोलने की योजना है।
अवधेश कुमार,
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