-पानी में दस मीटर नीचे रहकर, सेटेलाइट कनेक्टिविटी से दुश्मन की घुसपैठ पर साध सकेंगे निशाना
-पानी के नीचे रहकर दुश्मनों पर निगरानी वाला ड्रोन बनाया
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संवाददाता
नई दिल्ली। आजकल देश मेें हिन्दुओंं के देवी देवताओं का अपमान करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसको अब सहन नहीं किया जाएगा। आज देश में हिन्दुओं को कमजोर समझ कर हर कोई हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ करने का प्रयास कर है। इसे अब सहन नहीं किया जाएगा। ये घोषणा अखिल भारत हिन्दू महासभा के तदर्थ अध्यक्ष आचार्य रमेश मिश्र ने जंतर मंतर पर हिन्दू महासभा द्वारा आयोजित प्रदर्शन को संबोधित करते हुए की ।
उन्होंने पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को बर्खास्त करने की मांग करते हुए कहा कि यह सरकार मालदा और पूर्णिया में दंगों को रोकने में असफल रही है। इस कारण बंगाल में हिन्दू अपने आप को असुरक्षित अनुभव कर रहा है। इसलिए ममता सरकार को तुरंत बखास्त किया जाना चाहिए। इससे पूर्व भी ममता एक बार गौ मांस खाने की वकालत कर चुकी है। ऐसी हिन्दू विरोधी सरकार को सहन नहीं किया जाएगा।
अखिल भारत हिन्दू महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष बाबा नन्द किशोर मिश्र ने कहा कि मोदी सरकार को तुरंत प्रभावी कदम उठाते हुए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाना चाहिए। जिससे की भव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो। महामंत्री आचार्य मदन सिंह ने कहा कि हिन्दू अपने हित की रक्षा के लिए हर तरह का संघर्ष करने के लिए तैयार है। धरना संयोजक स्वामी कृपा विश्वास ने कहा कि कोई भगवान विष्णु का रूप धारण कर रहा है, सलमान खान और शाहरूख खान काली माता के मंदिर में जूते पहन कर नाटकों में आ रहे है। राम रहिम द्वारा भगवान विष्णु का रूप धारण करने की मुद्रा में फोटो खिचवाना हिन्दू धर्म का अपमान है।
हिन्दू महासभा इसका कड़ा विरोध करती हे। अब इस तरह की गतिविधियाँ सहन नहीं होगी। उन्होने कहा कि इस कदम से हिन्दुओं की भावनाओं को ठैस पहुची है। भगवान विष्णु हिन्दुओं के परम आराध्य देव है। उनकी नकल करते हुए हाथ में शंख लेकर फोंटो खिचवाना सरासर गलत है। जिस व्यक्ति पर हत्या, साधुओं को नपुंसक बनाने जैसे गंभीर आरोपो के मुकदमे चल रहे हो, उसे भगवान विष्णु का रूप धारण करने का कोई अधिकार नही है। हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता रामनाथ लूथरा ने कहा कि पश्श्चिम बंगाल में ममता सरकार को तुरंत बर्खास्त किया जाए, ममता सरकार ने मालदा और पूर्णिया में मुसलमानों द्वारा किए गए दंगों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। बंगाल में हिन्दू डर के साए में जी रहे है।
देश में हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ अब सहन नहीं होगा। हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता स्वामी ओम महाराज ने कहा कि कोई भी हिन्दुओं को कमजोर समझने की भूल न करे। हिन्दू अपने हितों की रक्षा के लिए हर तरह का बलिदान देने के लिए तैयार है। इस अवसर पर रविन्द्र द्विवेदी,संतोष राय,रविन्द्र भाटी,मंडन मिश्र, सुशील शर्मा, मदन गुर्जर, रामौतार शर्मा,जसबीर, रामचन्द्र तिवारी, रत्न भारद्वाज, पवन कुमार, विकास वशिष्ठ, मुकेश गुप्ता, प्रेम रापडिय़ाँ आदि उपस्थित थे।
संवाददाता
नई दिल्ली। अखिल भारत हिन्दू महासभा द्वारा 7 फरवरी को दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया जाएगा। जिसमें जिले से भी काफी संख्या में हिन्दूमहासभा कार्यकर्ता भाग लेगे। यह जानकारी देते हुए अखिल भारत हिन्दू महासभा प्रवक्ता राकेश आर्य ने बताया कि इस प्रदर्शन का नेतृत्व अखिल भारत हिन्दू महासभा के तदर्थ अध्यक्ष आचार्य रमेश मिश्र करेगे। इसमें कार्यकारी अध्यक्ष बाबा नन्द किशोर ,महामंत्री आचार्य मदन सिंह,राकेश आर्य,रामनाथ लूथरा ,स्वामी कृपाविश्वास आदि नेता नेता भाग लेगे। प्रदर्शन के पश्चात गृहमंत्री राजनाथा सिंह को ज्ञापन भी दिया जाएगा। उन्होने कहा कि आज देश में हिन्दुओं को कमजोर समझ कर हर कोई हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ करने का प्रयास कर है। कोई भगवान विष्णु का रूप धारण कर रहा है, सलमान खान और शाहरूख खान काली माता के मंदिर में जूते पहन कर नाटकों में आ रहे है। राम रहीम द्वारा भगवान विष्णु का रूप धारण करने की मुद्रा में फोटो खिचवाना हिन्दू धर्म का अपमान है। हिन्दू महासभा इसका कड़ा विरोध करती हे। अब इस तरह की गतिविधियाँ सहन नहीं होगी ।
उन्होंने कहा कि इस कदम से हिन्दुओं की भावनाओं को ठैस पहुची है। भगवान विष्णु हिन्दुओं के परम आराध्य देव है। उनकी नकल करते हुए हाथ में शंख लेकर फोंटो खिचवाना सरासर गलत है। जिस व्यक्ति पर हत्या, साधुओं को नपुंसक बनाने जैसे गंभीर आरोपो के मुकदमे चल रहे हो ,उसे भगवान विष्णु का रूप धारण करने का कोई अधिकार नही है। उन्होने कहा कि पश्श्चिम बंगाल में ममता सरकार को तुरंत बर्खास्त किया जाए ,ममता सरकार ने मालदा और पूर्णिया में मुसलमानों द्वारा किए गए दंगों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। बंगाल में हिन्दू डर के साए में जी रहे है। देश में हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ अब सहन नहीं होगा।
अवधेश कुमार
इस समय दिल्ली पुलिस द्वारा छात्रों की पिटाई का एक ऐसा वीडिये चल रहा है जिसे देखकर पहली नजर में किसी को भी गुस्सा आ जागएा। इसके विरोध में आइसा नामक छात्र संगठन ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया है। इसके साथ गैर भाजपा राजनीतिक दलों में से ज्यादातर ने दोषी पुलिस के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। कुछ ने तो इससे आगे बढ़कर यह कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पुलिस से छात्रों को पिटवा रहे हैं। यह भारतीय राजनीति है जिसमें हम किसी तरह के गैर जिम्मेवार बयान की उम्मीद कर सकते हैं। मैं चूंकि स्वयं अनेक प्रदर्शनों, धरनों, संघर्षों, आंदोलनों से जुड़ा हूं इसलिए यह कतई सहन नहीं कर सकता कि पुलिस प्रदर्शन करने वालों को पीटे। पुलिस की ऐसी भूमिका का मैं हमेशा विरोधी रहा हूं। दिल्ली में इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे वामपंथी छात्र संगठन के कुछ छात्रों को पुलिस द्वारा पीटते हुए जो वीडियो दिखाया गया है उसे देखकर ऐसा लगता है कि वाकई पुलिस बर्बरता पर उतर आई है। लेकिन क्या यही सम्पूर्ण या एकमात्र सच है?
वास्तव में इसका दूसरा पहलू ऐसा है जिसे समझे बगैर आप किसी निष्कर्ष पर नहीं पहंुच सकते। यह सामान्य नियम है कि आ यदि कोई धरना या प्रदर्शन करते हैं तो पहले पुलिस से अनुमति लेते हैं। इसके पक्ष विपक्ष में तर्क दिया जा सकता है कि अगर हमें किसी घटना, संगठन का विरोध करना है तो हम विरोध के लिए अनुमति क्यों लें। पर यह एक सामान्य नियम है। इसके नकारात्मक पक्ष हैं किंतु इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि इसके बाद हमारी सुरक्षा के लिए और हमारा प्रदर्शन ठीक से संपन्न हो जाए यह जिम्मेवारी पुलिस की हो जाती है। यही नही ंहम यदि अपनी बात लिखित में कहीं देना चाहते हैं तो यह भी उसकी जिम्मेवारी है कि हमारे प्रतिनिधिमंडल को ले जाकर उसे सही जगह पहुंचवाए। वह हमारा विरोध हो सकता, मांग हो सकती या अपील भी हो सकती है। प्रश्न है कि क्या छात्र संगठन ने दिल्ली पुलिस से अनुमति ली थी? नहीं ली थी। वे अनुमति के लिए गए थे। दिल्ली पुलिस ने उनसे कहा था कि आप जंतर मंतर पर प्रदर्शन करें। वहां हम आपकी पूरी सुरक्षा की व्यवस्था करेंगे। वहां से आपकी शिकायत सरकार तक पहुंचाई जाएगी। इनने दिल्ली पुलिस की बात नहीं मानी और पहुंच गए संघ कार्यालय पर। क्यों गए वहां? सबसे पहले तो वहां जाना ही गलत था।
लेकिन इसे कुछ समय के लिए यहीं छोड़ दे ंतो जो वीडियो चलाया जा रहा है उसके समानांतर भी एक वीडियो है जिसमें कुछ लड़कियां पुलिस को कई तरीके से उकसा रही हैं। वो प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर रहीं है। एक ताली बजाकर कह रहीं हैं बनाओ वीडियो और मोदी को भेजो। इनने ऐसी स्थिति पैदा की जिनमें पुलिस वाले भी गुस्से में आ गए। लेकिन पुलिस ने अगर ऐसी ही बर्बरता की जैसी 30 सेकेंड के वीडिया में दिख रहा है तो जिनकी पिटाई हुई वो कहां हैं? बर्बरता का अर्थ है कि कुछ छात्र-छात्राएं घायल होकर अस्पताल में भर्ती होते या किसी की प्राथमिक चिकित्सा भी हुई होती। इसके कोई प्रमाण नहीं है। इसका अर्थ है कि दो चार की पिटाई तो हो गई, किंतु इतनी बर्बरता नहंी थी कि कुछ लोगों को गहरी चोटें आ जाए और उनको उपचार की आवश्यकता पड़े। इसलिए पहला झूठ तो यही है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों की बेरहमी से पिटाई की। पिटाई होते भी यह देखा गया है कि कुछ छात्र-छात्राएं आराम से खड़े अपने साथी को पिटते देख रहे हैं। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि प्रदर्शन के तौर-तरीकों को लेकर संभवतः उनके बीच मतभेद था। ऐसे प्रदर्शनों में ऐसा स्वाभाविक होता है। कुछ कहते हैं कि हम एक सीमा तक अपना प्रदर्शन करके निश्चित समय में वापस आ जाएंगे तो कुछ उसे आगे जाने की बात करने लगते हैं। ऐसा लगता है इनके समूह में भी था।
वीडिया में एक लड़की की पिटाई देखी जाती है। लेकिन उसका चेहरा नहीं दिखता है। पुलिस कह रही है कि वह लड़की नहीं बड़े बालांें वाला लड़का था। इसे आसानी से वीडिया को स्लो मोशन में देखकर पहचाना जा सकता है। वैसे भी दिल्ली पुलिस के जवाब लड़कियों या महिलाओं को उस प्रकार हाथ से नहीं मारते हैं। अगर यह सच है तो फिर ये छात्र संगठन और उनका समर्थन करने वाली मीडिया एकदम झूठ फैला रही है। वैसे भी यह प्रश्न अनुत्तरित है वे वहां गए क्यों? वहां उनके प्रदर्शन करने का उद्देश्य क्या था? किसने उस प्रदर्शन की योजना बनाई? पुलिस की अस्वीकृति के बावजूद वे वहां जाने पर क्यों अड़े रहे? इन प्रश्नों का उत्तर तलाशना इसलिए जरुरी है क्योंकि देश में कभी असहिष्णुता का मुद्दा चलता है, पुरस्कार वापसी होती है तो इस समय रोहित बेमुला की आत्महत्या के मामले को उसी रास्ते पर ले जाने की कोशिश हो रही है। आखिर हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित बेमुला की दुखद आत्महत्या को लेकर आरएसएस कार्यालय पर प्रदर्शन करने का क्या मतलब है? क्या उसमें कहीं से भी आरएसस की भूमिका है? बेमुला ने अपने पत्र में तो इसे किसी तरह जातीय उत्पीड़न तक का मामला नहीं माना है। फिर ये संगठन इतने आक्रामक क्यों हैं संघ एवं भाजपा के खिलाफ? ये क्यों नहीं उसकी निष्पक्ष जाचं के निष्कर्षों की प्रतीक्षा कर रहे हैं? न्यायिक जांच आयोग का आदेश हो गया है, तेलांगना सरकार ने सीबीसीआईडी को मामला सौंप दिया है। इसके बाद जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा की जानी चाहिए। कुछ संगठन और लोग अगर जानबूझकर देश में इसके आधार पर झूठ फैलाना चाहते हैं और उस झूठ को क्रांतिकारिता साबित करने के लिए इस तरह धरना प्रदर्शन करेंगे तो फिर संघ के कार्यकर्ता और संमर्थक भी इनका विरोध करने आएंगे और उसके बाद क्या होगा उसका एक ट्रेलर हमने संघ कार्यालय के सामने देखा है।
अभी तक का अनुभव यही है कि जब भी किसी राजनीतिक दल या संगठन के कार्यालय पर आक्रामक विरोध प्रदर्शन किया जाता है उसमें हिंसा हो जाती है। दोनों पक्षों में टकराव भी हुआ है। भाजपा कार्यालय पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन को याद कीजिए। कितनी हिंसा हो गई थी। उसी तरह भाजपा कार्यालय पर कांग्रेस के प्रदर्शन के समय भी भीड़ंत हुई थी। कांग्रेस कार्यालय पर भाजपा के प्रदर्शन के साथ भी यही हुआ था। इसलिए किसी के कार्यालय पर इस तरह के विरोध प्रदर्शन पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। किंतु कुछ संगठनों का फैशन है कि किसी तरह आरएसएस और भाजपा का विरोध करो और आप पूर्ण विरोधी हो इसे प्रदर्शित करने के लिए जितना आक्रामक हो सकते हो करो, इसके लिए झूठ और पाखंड का जितना सहारा लेना हो लो, आपको इसमें देश के बड़े वर्ग का, भाजपा विरोधी दलों का, मीडिया के एक भाग का पूरा समर्थन भी मिलेगा। यही रोहित बेमुला के मामले में हो रहा है। बिना अनुमति के आप प्रदर्शन करने गए वहां आपने अश्लील शब्दों का प्रयोग किया, पुलिस को मजबूर किया कि वह आपके खिलाफ कार्रवाई करे और अब आप पीड़ित बताकर यह साबित करने की गंदी राजनीति कर रहे हैं कि दिल्ली पुलिस ने जो केन्द्र सरकार के अंदर है वह आरएसएस और भाजपा के इशारे पर आपके साथ बर्बरता बरती है। इसे देश का बहुसंख्य स्वीकार नहीं करेगा।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208
अवधेश कुमार
अमित शाह को भाजपा अध्यक्ष के रुप में अगला कार्यकाल मिलेगा इसे लेकर किसी को संदेह नहीं था। वे डेढ़ वर्ष पूर्व भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एकमात्र पसंद थे और आज भी हैं। तो उनकी चाहत के विपरीत किसी और के अध्यक्ष पद पर चयन का प्रश्न ही कहां उठता था। संघ भी मोदी को मुक्त होकर काम करने देने के पक्ष में है और इसलिए पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए उनकी सोच को प्राथमिकता दिया जाना लाजिमी था। लेकिन अगस्त 2014 में जब अमित शाह ने राजनाथ सिंह का औपचारिक रुप से स्थानापन्न किया तब और आज की परिस्थितियों में गुणात्मक अंतर आ गया है। तब भाजपा नरेन्द्र मोदी की तूफानी लोकप्रियता के वाहन में सत्ता तक पहुंची थी। उनके कार्यकाल का हनीमून था। चारों ओर उम्मीद और आशावाद की लहर थी। मोदी के समर्थन मंें अभूतपूर्व जन आलोड़न का दौर था। स्वयं अमित शाह ने उत्तर प्रदेश प्रभारी के रुप में आशातीत सफलताएं दिलवाईं थीं। वैसी लोकप्रियता और सफलता के काल में अंतर्निहित या सामने खड़ी चुनौतियों का सहसा अहसास नहीं होता। संयोग से उसके बाद महराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड चुनाव में पार्टी को सफलताएं भी मिली। इन सफलताओं में अध्यक्ष के रुप में उनकी महिमा बढ़नी ही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी की सभा में उन्हें अब तक का सबसे सफल अध्यक्ष तक कह दिया। ं
जरा आज की परिस्थितियों पर नजर दौड़ाइए। 2016 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी का सफाया हो गया तो बिहार में वह अपनी पुरानी स्थिति भी बरकरार रखने में सफल नहीं रही। यही नहीं हाल के कुछ राज्यों के स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन काफी बुरा रहा है। इसमें मोदी और अमित शाह का गृह प्रदेश गुजरात भी शामिल है। जाहिर है, दोनों समय की तुलना करें तो एकदम दो ध्रुवों जैसी स्थिति नहीं तो लगातार बढ़तीं गुणात्मक प्रतिकूलताएं साफ दिखाई देंगी। कम से कम इतना तो अमित शाह भी स्वीकार करेंगे कि अगस्त 2014 की अनुकूलता की स्थिति आज नहीं है। लोकप्रियता का तूफान धीमा पड़ा है। सरकार के हनीमून का काल अब खत्म हो चुका है। वास्तव में अध्यक्ष की नेतृत्व क्षमता, प्रबंधन व रणनीतिक कौशल .....सबकी असली परख का दौर तो इस नए कार्यकाल में ही होगी। चुनावी दृष्टि से देखें तो इस वर्ष पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी विधानसभा का चुनाव है। इसमें असम को छोड़कर भाजपा कहीं से भी उम्मीद नहीं कर सकती है। किंतु यह कहकर तो आप अपने को बरी नहीं कर सकते कि इन राज्यों में हमारा कुछ दांव पर था ही नहीं। अगर इन चुनावों में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन नहंी किया तो फिर विपक्ष का सरकार पर दबाव बढ़ेगा। इससे बचाने की जिम्मेवारी अमित शाह एवं मोदी की जोड़ी की है। वैसे भी केरल में अमित शाह और मोदी दोनों पूरा जोर लगा रहे हैं। इन राज्यों में प्रदर्शन अच्छा नहीं हुआ तो अर्थ यही लगाया जाएगा कि पार्टी की महिमा क्षीण हो रही है और हार का दौर जारी है। इसका जवाब पार्टी अध्यक्ष के रुप में अमित शाह को ही देना होगा। इसके बाद 2017 में उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर फिर हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात का भी चुनाव है। इनमें मणिपुर को छोड़कर सारे राज्यों में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होगी। यहां अमित शाह के लिए करो या मरो की स्थिति होगी। यही स्थिति 2018 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान एवं कर्नाटक विधानसभा चुनाव में होगी। तो कुल मिलाकर 2018 तक 15 राज्यों के विधानसभा चुनावों का सामना भाजपा को अमित शाह के पार्टी नेतृत्व में करनी है।
इसके बाद बताने की आवश्यकता नहीं है कि इस दूसरे कार्यकाल में अमित शाह के सामने चुनौतियां कितनी बड़ीं हैं। अगर अमित शाह एवं मोदी यह स्वीकार कर लेते हैं कि वर्तमान पार्टी एवं सरकार में जो चेहरे हैं उनकी बदौलत इन चुनौतियों को पार पाना संभव नहीं तो वे पार्टी के सांगठनिक एवं वैचारिक पुनर्गठन तथा उसके बाद सरकार के पुनगर्ठन के लिए बड़े कदम उठाएंगे। बड़े कदम का अर्थ है व्यापक बदलाव। इसकी आवश्यकता साफ दिखाई दे रही है। पार्टी में प्रमुख पदों पर दो तीन लोगों को छोड़ दे ंतो वही चेहरे विद्यमान रहे हैं जो पहले से रहे हैं। अगर ये सब इतने ही योग्य होते तो 2004 में और फिर 2009 में पार्टी की वैसी पराजय नहीं होती। अमित शाह ने अध्यक्ष बनने के बाद जो टीम बनाई उसमें तीन चार लोगों को छोड़कर शेष चेहरे लगभग वही रहे। जो नए आए उनका प्रदर्शन भी ऐसा नहीं रहा जिनसे उम्मीद की जाए। यही स्थिति सरकार की थी। मोदी ने भी जो लोग उपलब्ध थे उनमें ही मंत्रालयों के बंटवारे कर दिए। मोदी सामान्य कार्यों के साथ जिस तेज गति से कुछ मौलिक, कुछ सामान्य बदलाव के कदम उठाने की कोशिश कर रहे हैं उन सबको आधार देने की स्थिति न पार्टी की है और न सरकार में दिखने वाले चेहरे ही उसके अनुरुप दौड़ लगाने की क्षमता प्रमाणित कर पाए हैं। उनमें एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो समय की आवाज और मोदी के आगाज को ठीक से समझ भी नहीं पाया है। इनका पूरा सरोकार यहीं तक सीमित है कि किसी तरह अपना पद और कद बना रहे। ऐसी टीम से आप बड़ा लक्ष्य तो छोड़िए सामान्य चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते। इसके विपरीत इनके कारण आपकी चुनौतियां बढ़तीं हैं। नेता का अर्थ है जनता के बीच काम करते हुए निकला हुआ लोकप्रिय चेहरा। ऐसे कितने चेहरे इस समय पार्टी एवं सरकार में हैं? अगर नहीं हैं तो आपको लाना होगा। नहीं लाएंगे तो फिर चारों खाने चित्त गिरेंगे।
अमित शाह ने 9 अगस्त 2014 को पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि मोदी जी के कांग्रेस मुक्त भारत के साथ हमें भाजपा युक्त भारत बनाना है, विपक्ष की मानसिकता से बाहर निकलनी है तथा सत्तारुढ़ दल की तरह व्यवहार करना है। भाजपा युक्त भारत के लिए पार्टी मशीनरी को पूर्ण गतिशील बनाने और उसके द्वारा जन आलोड़न पैदा करने की आवश्यकता है। क्या अमित शाह पार्टी में नए चेहरे के साथ वैसा कलेवर देने पर विचार कर रहे हैं? इसका परीक्षण टीम के गठन से ही हो जाएगा। क्या पार्टी अपने साथ सरकार के पुनर्गठन के लिए भी वैसे लोग उपलब्ध करा पाने की स्थिति में पहुंच पाएगी? आखिर सरकार मंे भी तो पार्टी से ही लोगो को लिया जाएगा। ये ऐसे प्रश्न है जिन पर भाजपा का आगामी राजनीतिक और चुनावी प्रदर्शन निर्भर है। सत्तारुढ़ पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती होती है, सरकार और संगठन में तालमेल। इस मामले मंे अमित शाह का पहला कार्यकाल बुरा नही ंतो आदर्श भी नहीं रहा है। सरकार और पार्टी तथा सरकार और कार्यकर्ता के बीच दूरी बढ़ी है। सरकार की छवि केवल सरकारी जन संचार माध्यमों के यांत्रिक प्रचार से बेहतर नहीं होती। जनता की नजर में बेहतर बनाए रखने में पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह तभी हो सकता है जब पार्टी में संतुलित, विषयों के जानकार, जनता की नब्ज पहचानने वाले, देश की अंतर्धारा को समझने वाले तथा पार्टी के प्रति समर्पित निष्ठावान और व्यवहार कुशल लोगों की टीम हो। अगर मोदी और अमित शाह की सोच इस दिशा में जाती है तो उनको परिश्रम करके ऐसे लोगों की तलाश करनी होगी और वे मिल भी जाएंगे। अगर सोच नहीं जाती है तो फिर कुछ भी उम्मीद करना बेमानी होगा।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208