रविवार, 5 जुलाई 2015

भारत तिब्बत सहयोग मंच, दिल्ली प्रान्त द्वारा "परम पावन दलाई लामा" का जन्मोत्सव मनाया

 भारत तिब्बत सहयोग मंच ,दिल्ली प्रान्त द्वारा "परम पावन दलाई लामा" जी का 80 वां जन्मोत्सव आज चिन्मय मिशन, लोधी रोड मनाया गया ।कार्यक्रम में मंच के संरक्षक एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारी मंडल के सदस्य माननीय इन्द्रेश जी, एवं मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डा.कुलदीप अग्निहोत्री जी ,तिब्बत की निर्वासित सरकार के सांसद आचार्य यशी पुन्छोक,भारत सरकार के केन्द्रीय गृह राज्य मन्त्री किरन रिजिजू ,समाज कल्याण राज्य मन्त्री विजय सांपला ,सांसद श्री भगत सिंह कोशियारी,कुलवंत सिंह बाठ ,हरजीत सिंह ग्रेवाल,सहित कई अन्य गणमान्य व्यक्तियों का मार्ग दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ ।सभी लोगों ने परम पावन दलाई लामा जी को दीर्घायु होने की प्रार्थना की ।इन्द्रेश जी ने कहा कि हम सभी भारतीय तिब्बत की आजादी के लिए हर सम्भव प्रयास करेंगे। उन्होंने बताया कि भारत का तिब्बत के साथ आध्यात्मक,भावनात्मक एवं ऐतिहासिक संबन्ध रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रान्त अध्यक्ष श्री पंकज गोयल जी ने की ।कार्यक्रम मे देश के अलग-अलग कई प्रान्तो से संगठन कार्यकर्ता उपस्थित हुए।दिल्ली के कार्यकर्ताओं के अलावा कई बुद्धजीवी लोग भी उपस्थित रहे।
रामानन्द शर्मा -संयुक्त महामन्त्री ,भारत तिब्बत सहयोग मंच,दिल्ली प्रान्त ।

 



 

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

तीन अलग देश, पर हमलावरों की सोच एक

 

अवधेश कुमार

कुवैत, ट्यूनीशिया और फ्रांस- तीन देश, तीनों की भौगोलिक दूरियां, लेकिन हमला करने वालों की सोच एक। दो घंटे के अंदर तीन दूरस्थ देशों में हमला। यह है जेहादी आतंकवाद का कू्रर सच। सबसे पहले फ्रांस, फिर कुवैत और अंत में ट्युनीसिया। पता नहीं यह टिप्पणी पढ़ते-पढ़ते और कहीं हमला हो जाए। यह जेहादी आतंकवाद के वैश्विक विस्तार का भयावह प्रमाण है। जो करीब 70 लोग मारे गए या इससे कई गुणा ज्यादा घायल हुए वे न इनके निजी दुश्मन थे, न हमलावर इनको निजी तौर जानते थे। ज्यादातर आतंकवादी हमले में मारने वाले यह जानते ही नहीं कि जिन निरपराध लोगों का वे खून बहा रहे हैं वे कौन हैं। बस, हिंसा का एक जुनून, आतंक पैदा करने का उन्माद और इसके पीछे मजहब की वर्चस्व स्थापना की नासमझ किंतु सुदृढ हो गया विचार। कभी-कभी तो इनका निशाना ऐसा स्थान और ऐसे लोग होते हैं जिनके पीछे कोई निश्चित सोच भी नहीं होती, लेकिन ज्यादातर बार वे हमले के लिए ऐसी जगहों, ऐसे प्रतीकों और ऐसे लोगों का चयन करते हैं जिनसे ये एकदम सुस्पष्ट संदेश दे सकें। तीनों देशों में हुए हमले के स्थानों और निशाना बनाए गए व्यक्तियों का विश्लेषण करें तो फिर इसका अर्थ समझ में आ जाएगा।

उत्तरी अफ्रीकी अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया के समुद्र तट पर स्थित सूजे शहर के दो होटलों पर हुए आतंकी हमले की जो आपबीती सामने आई है उसके अनुसार एक में बिच पर पर्यटक की तरह दिखने वाला एक नवजवान लोगों को जोक सुना रहा था और अचानक उसने छाते से ए के 47 निकाली और केवल विदेशियों पर गोलियां बरसती रही। जो स्थानीय थे उनको वह बाहर जाने को कह रहा था। कुवैत में क्या हुआ? कुवैत सिटी स्थित सबसे बड़ी शिया मस्जिद में शुक्रवार की नजाम अदा करते समय ही हमला हो गया, जिसमें 27 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल जिनमें पता नहीं कितने और काल कवलित हो जाएंगे। अल-सवाबेर में स्थित अल-इमाम-अल-सादिक नाम की यह शिया मस्जिद कुवैत सिटी के पूर्वी हिस्से में है और रमजान के महीने में शुक्रवार होने के कारण 2000 से ज्यादा लोग उपस्थित थे।  उसमें कोई आत्मघाती स्वयं को उड़ा दे तो फिर कैसा कोहराम मच सकता है इसकी कल्पना से ही रोंगटेे खड़े हो जाते हैं।

 ध्यान रखिए, जब शिया मुस्लिम नमाज के घुटनों पर झुके हुए थी कि तभी अचानक उसने स्वयं को उड़ा दिया। निस्संदेह, उसके शरीर में काफी शक्तिशाली विस्फोट बंधे थे, इसलिए विस्फोट काफी जोरदार था। इस जोरदार धमाके का ही परिणाम था कि मस्जिद की छत और दीवारें फट गई थीं। तो व्यापक नरसंहार की योजना थी। दक्षिण-पूर्वी फ्रांस के सेंट क्वेंटिन फैलेवर स्थित जिस एयर प्रोडक्ट्स फैक्ट्री में आतंकी हमले की बात की जा रही है उसे लोकर थोड़ा संशय है। हालांकि वहां कई धमाकों की बात की जा रही है। कहा गया कि एक कार में सवार हमलावरों ने फैक्ट्री के गेट पर क्रैश करवा दिया। इसके बाद धमाका हुआ। फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि कार में विस्फोटक भरा हुआ था। यह सच है तो वहां भारी विनाश न मचना संयोग ही हो सकता है। लेकिन एक ही व्यक्ति का सिर और धड़ अलग-अलग क्यों किया गया? इसक उत्तर नहीं मिला। अगर सिर पर अरबी में लिखा हुआ है और हमलावर के हाथ में इस्लामिक स्टेट का झंडा होने की खबर सच है तो फिर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

अब जरा इनका विश्लेषण करिए। ट्युनीसिया, आंतरिक संघर्ष, जिसे अरब क्रांति कहा गया के गर्भ से अभी निकला नहीं और वहां मजहबी कट्टरपंथ ने वर्चस्व जमा लिया है। यहां इसमें विस्तार से जाना संभव नहीं, लेकिन यह सच सबको पता है कि बाहरी दुनिया की मीडिया ने जिसे गुलाबी क्रांति कहा, वह दरअसल, मजहबी कट्टरपंथ की का्रंति बन गई और ट्युनीसिया उसका भयावह शिकार है। हमलावरों ने केवल विदेशियों को क्यों मारा? उनकी जेहाद की सोच में विदेशी सभ्यता के साथ सम्मिलन का कोई स्थान नहीं। दूसरे, जब तक वहां दहशत पैदा नहीं होगा, विदेशी पर्यटक आते रहेंगे, उसकी आय भी होती रहेगी, इसलिए उस पर अपना आतंकी वर्चस्व कायम नहीं हो सकता। ट्युनीसिया में वर्ष 2014 में 60 लाख 10 हजार पर्यटक आए थे। देश के सकल घरेलू उत्पाद का 15.2 प्रतिशत हिस्सा पर्यटन से आता है। 4 लाख 73 हजार लोगों को पर्यटन में रोजगार मिलता है। तो पर्यटन वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, वहां विश्व के पढ़े लिखे लोगों से संपर्क का मुख्य आधार भी। तो इसी को ध्वस्त करो। चुनकर विदेशियों को मारो। समुद्री किनारों वाला सूजे शहर विदेश पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हैं। वहां जाने वालों में ब्रिटेन के नागरिकों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। ध्यान रखिए यहां पिछले मार्च में इस्लामी आतंकवादियों ने राजधानी ट्यूनिस के बार्डा म्यूज़ियम पर हमला किया था जिसमें 22 लोग तत्काल मारे गए थे। वह भी वहां का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। उस समय से पूरे देश में रेड अलर्ट था और सारे पर्यटक स्थलों की सुरक्षा बढ़ाई गई थी। इसके बावजूद आईएस के आंतकवादी हमला करने में सफल रहे।  ठीक है कि सुरक्षा गार्डों ने मुकाबला किया और हमलावरों के मारे जाने की सूचना है। लेकिन वो आईएसआईएस का प्रतीक बन चुके काला कपड़ा पहनकर आए ही थे मरने के लिए। इसलिए इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।

कुवैत में शिया मस्जिद पर नमाज के वक्त हमला करके आईएस आतंकवादियों ने क्या संकेत दिया? यही न कि वे सुन्नी एकाधिकार के अलावा इस्लाम के किसी पंथ को इस्लाम नहीं मानेंगे और उसके खिलाफ हिंसा करते रहेंगे। आईएस के आतंकवादी चारों ओर शियाओं की ऐसे ही हत्या कर रहे हैं, यजीदियों की तो उनने पूरी तरह अंत करने की ठान ली है। 30 वर्षीय कुवैत आत्मघाती हमलावर की पहचान अबु सुलेमान अल-मुवाहेद के रुप में हुई है। सउदी अरब में आईएस से संबद्ध समूह नजद प्राविन्स ने बयान जारी करके कहा है कि अबु सुलेमान ने मस्जिद पर हमला इसलिए किया क्योंकि मस्जिद की ओर से सुन्नी मुस्लिमों के बीच शिया की शिक्षाओं का प्रसार किया जा रहा था। जेहादी आतंकवादी के उभार के समय से कुवैत काफी हद तक इससे बचा रहा है। आईएस के आतंकी ऐसे किसी देश को नहीं छोड़ना चाहते जहां गैर सुन्नी इस्लाम का अस्तित्व हो।

तो जो सोच है उसमें ऐसे हमले आगे भी होंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद ने कहा है कि ऐसे और हमले का भय है। यहां भी एक हमलावर के मुठभेड़ में मारे जाने की सूचना है। जो दूसरा संदिग्ध गिरफ्तार हुआ उसका नाम यासिम सलीम है, किंतु उसे लेकर स्पष्ट नहीं है कि वह वाकई आतंकवादी है ही। बावजूद इसके स्थिति की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाइए कि जब यह वारदात हुई ओलांद ब्रुसेल्स में यूरोपीय संघ की बैठक में थे जिसे छोड़कर देश वापस आए। फ्रांस पर आईएस आतंकवादियों ने इसी वर्ष जनवरी में पेरिस की मशहूर कार्टून पत्रिका चार्ली हेब्दो पर हमला करके 17 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। आईएस ने तो घोषणा ही किया हुआ है कि वह फ्रांस पर आगे भी हमला करेगा।

तो एक स्थान पर निशाने पर पर्यटक, दूसरे में शिया और तीसरे में एक आम फ्रांसीसी नागरिक। देखने में तीनों अलग-अलग लगते हैं, पर जैसा हम समझ चुके हैं ये एक ही खतरनाक सोच और लक्ष्य की अलग-अलग हिंसक अभिव्यक्तियां हैं और इनके संदेश भी पूरे विश्व के लिए एक ही है। आईएस दुनिया में जिस सुन्नी इस्लाम का साम्राज्य स्थापित करना चाहता है, पिछली सदी की खिलाफत व्यवस्था को कायम करने के लिए आतंकवाद की पिछली सारी क्रूरताओं को पार गया है उसके उद्देश्य के आईने में इनकी तस्वीर एक ही दिखाई देगी। आईएसआईएस के प्रमुख अबु अल बगदादी ने जबसे स्वयं को खलीफा घोषित किया है उसने अपने सुन्नी इस्लामी साम्राज्य का एक नक्शा भी प्रसारित किया है जिसमें हमारे भारत का पश्चिमी हिस्सा भी शामिल है। उसी अनुसार वह अभियान चला रहा है। हालांकि हम एक दिन में तीन ही हमले की चर्चा कर रहे हैं जबकि उसी दिन तुर्की की सीमा के नजदीक सीरिया के शहर कोबानी पर इसने कब्जा कर लिया तथा 24 घंटे के भीतर 146 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। वे सारे शिया थे। प्रश्न है कि क्या आईएस इसी तरह आतंकवादी हमला करके अपना हिंसक विस्तार करता रहेगा और दुनिया हर हमले पर शोक और क्षोभ व्यक्त करती रहेगी? अमेरिका इतने लंबे समय से ड्रोन हमले कर रहा है, सीरिया और इराक सीधी लड़ाई लड़ रहा है, कुर्द सेनाएं अपने क्षेत्रों में लोहा ले रहीं, पर इसकी शक्ति में कमी आने के संकेत नहीं। वह अफगानिस्तान तक पहुंच गया और वहां तालिबान आतंकवादियो को वर्चस्व बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। क्या पूरी दुनिया एकजुट होकर इसके समूल नाश का संकल्प लेकर कार्रवाई नहीं कर सकती? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर विश्व समुदाय को तलाशना होगा। शांति और सद्भावपूर्ण जीवन के पक्षधर विश्व भर के मुस्लिम समुदाय को भी इनके खिलाफ खुलकर प्राणपण से आगे आना चाहिए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

शुक्रवार, 26 जून 2015

उपराष्ट्रपति योग दिवस विवाद को कैसे देखें

 

अवधेश कुमार

योग दिवस के संदर्भ में उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी बनाम राम माधव को लेकर जिस तरह का बवण्डर खड़ा करने की कोशिशें हुईं, उन पर आप अपने दृष्टिकोण से कुछ भी मत व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं। ट्विटर पर स्टैण्ड विद हामिद अंसारी से अभियान चलाने वाले झंडाबरदारों या फिर समाचार चैनलों पर तर्क कुतर्क से राम माधव, भाजपा, नरेन्द्र मोदी सरकार आरएसएस को कठघरे में खड़ा करने वालों ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की। इसमें कुछ तो निरपेक्ष और निर्दोष लोग थे जिन्हें लगा कि उप राष्ट्रपति जैसे बड़े पद की गरिमा को बनाए रखना आवश्यक है। यानी उनकी नजर में राम माधव के ट्विट से उस पद की गरिमा को ठेस पहुंचा था। हालांकि राम माधव के ट्विट में सच्चाई नहीं थी। न तो राज्य सभा टीवी ने राजपथ योग दिवस कार्यक्रम को ब्लैक आउट किया था और न ही उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को उसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया गया था। किंतु राम माधव ने अपना ट्विट वापस लिया, उसके लिए क्षमा याचना भी कर दी। बावजूद इसके इरादे, संस्कार, विचार, मंशा आदि पर बहस होती रही और कुछ दिनों तक यह विषय चलेगा।

वैसे हामिद अंसारी के कार्यालय से यह बयान जारी कर दिया गया है कि सरकार के पक्ष आने के बाद उनकी ओर से यह अध्याय खत्म हो गया है। दरअसल, इस कार्यक्रम के आयोजक आयुष मंत्री श्रीपद नाईक ने अपने बयान में साफ किया कि इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। चूंकि प्रोटोकॉल में राष्ट्रपति एवं उप राष्ट्रपति दोनों उनसे उपर हैं, इसलिए उन्हें निमंत्रण नहीं दिया गया। इससे उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का यह वक्तव्य सच साबित हुआ कि उन्हें निमंत्रण नहीं दिया गया था। श्रीपद नाईक ने कहा कि राम माधव को सही जानकारी नहीं रही होगी, अगर उप राष्ट्रपति जी को कोई कष्ट हुआ है तो उसके लिए मैं क्षमा मांग लूंगा। यह एक विनम्र और शालीन व्यवहार है। इस तरह के व्यवहार से ही राजनीति में आचरण की मर्यादा कायम रहती है, लोकतंत्र कायम रह सकता है, जीवन और सत्ता में लोकतंत्र के जीवित रहने की संभावना बनी रहती है।

यहां तक तो ठीक है। किंतु क्या इतने से यह मान लिया जाए कि उप राष्ट्रपति जी का पक्ष सबल था, ठीक था? सतही तौर पर इसका उत्तर हां ही आएगा। आखिर जब उन्हें निमंत्रण ही नहीं मिला तो फिर वे क्या कर सकते थे? वे बिना निमंत्रण योग दिवस समारोह में कैसे भाग ले सकते थे। इसलिए भाग न लेने के पीछे उनका कोई दोष नहीं था। लेकिन इसे जरा दूसरे पहलू से देखिए। कई बार सतह पर जो सुनाई देता है, दिखाई पड़ता है, सच उसके परे भी होता है। क्या राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को निमंत्रण गया था? नहीं। तो उनने कुछ किया या पूरे आयोजन से स्वयं को दूर रखा? राष्ट्रपति ने बाजाब्ता राष्ट्रपति भवन में योग दिवस का आयोजन किया, हाथ में माइक लेकर उन्होंने अपना संक्षिप्त उद्बोधन दिया। इसे सभी चैनलों ने प्रसारित भी किया। प्रश्न है कि जब राष्ट्रपति बिना निमंत्रण के ऐसा कर सकते थे तो फिर उप राष्ट्रपति क्यों नहीं?

यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी या अनावश्यक रुप मेें उनके पक्ष में झंडा उठाकर इसे बहुत बड़ा मुद्दा बनाने में लगे लोगांें के पास भी नहीं होगा। जब राष्ट्रपति को ऐसा करने में कोई प्रोटोकॉल बाधा नहीं आया, संविधान का कोई प्रावधान आड़े नहीं आया, जब कोई कन्वेंशन रास्ते खड़ा नहीं हुआ तो उप राष्ट्रपति के लिए कैसे हो सकता था? भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रस्ताव पर यानी भारत के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों ने योग दिवस मनाना निश्चय किया तो भारत के हर व्यक्ति का दायित्व था कि इसमें जितना संभव हो योगदान करे। भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर था। 192 देशों में योग हो रहा था। करोड़ों लोग इसमें मजहब, संप्रदाय, देश, संस्कृति, पद, भाषा सबके परे उत्साहपूर्वक शामिल हो रहे थे। इसमें भारत की सत्ता से जुड़े ऐसे शीर्ष व्यक्तित्व की मौन निष्क्रियता का आखिर क्या अर्थ हो सकता है? सत्ता के शीर्ष पर बैठै लोगों को तो स्वयं अपना दायित्व समझना चाहिए था। उन्हें स्वयं यह तय करना चाहिए था कि इस ऐतिहासिक दिवस पर जब पूरा विश्व भारत की पहल पर उत्साहजनक सक्रियता दिखा रहा है, हमें क्या करना है।

उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी यही तय करने से चूक गए। उनके पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं। मसलन, कोई आवश्यक है क्या कि राष्ट्रपति जो करें वे उसका अनुसरण करें ही या उसी अनुसार आचरण करें? संविधान में तो कहीं नहीं लिखा है। कोई ऐसा कन्वेंशन भी नहीं है। निस्संदेह, संविधान में ऐसा नहीं लिखा है और न कोई कन्वेंशन ही है। लेकिन संविधान में हम ऐसा न करें, यह भी नहीं लिखा है। और कन्वेंशन कौन बनाता है? हम आप ही तो। फिर संविधान लिखने वाले या प्रोटोकॉल बनाने वाले ने उस समय कल्पना तो नहीं की थी कि 65 वर्ष बाद कोई प्रधानमंत्री होगा जो योग का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्रसंघ मंें रखेगा और उसे दुनिया स्वीकार कर एक दिवस तय कर देगी। अगर इसकी कल्पना की गई होती तो निश्चय ही इसमें किस पद के लोगों का क्या दायित्व है यह भी निश्चित कर दिया गया होता। परिस्थिति और समय के अनुसार अपने विवेक से भूमिका तय करनी पड़ती है। यह भी कहा जा रहा है कि योग तो स्वेच्छा का विषय है। जिसकी इच्छा हुई किया जिसकी नहीं हुई नहीं किया। राष्ट्पति की हुई उनने किया, उप राष्ट्रपति की नहीं हई उनने नहीं किया। आप उनको मजबूर तो नहीं कर सकते।

बेशक, किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता। किंतु उप राष्ट्रपति कोई आम नागरिक नहीं है। उसकी संवैधानिक के साथ राष्ट्रीय जिम्मेवारी भी है। वे भारतीय तो हैं। भारतीय हैं तभी तो उप राष्ट्पति बने है। तो एक भारतीय के नाते ऐसे महत्वपूर्ण दिवस पर अपना दायित्व वो कैसे भूल गए। क्या वे नहीं जानते थे कि प्रोटोकॉल के मुताबिक  वहां नहीं जा सकते? अगर नहीं जा सकते तो फिर उन्हें इस दिवस पर क्या करना है यह उनने क्यों नहंीं तय किया? भारत का उप राष्ट्रपति किसी राष्ट्रीय आयोजन से पूरी तरह अपने को अलग कैसे रख सकता है? यह तो सामान्य कल्पना से परे है। उपराष्ट्रपति पद की गरिमा का पूरा ख्याल रखते हुए भी कहना होगा कि हामिद अंसारी से भूल हुई है, चूक हुई है। वह अनजाने में हुई हो या जानबूझकर लेकिन हुई है। वे अपने तरीके से अपने अनुसार आयोजन कर सकते थे। ऐसा न करके उनने हमें निराश किया है। यह तो अच्छा हुआ कि दूसरे देशों का ध्यान इस ओर नहीं गया, अन्यथा यह संदेश भी निकल सकता था कि भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष तीन व्यक्तित्वों में ही योग दिवस को लेकर एकमत नहीं है।

इसलिए उपराष्ट्रपति महोदय के पक्ष में खड़ा होने वाले जरा इसे दूसरे दृष्टिकोणों से देखें, उनके पद के अनुरुप राष्ट्रीय दायित्वांे को कसौटी बनाकर देखें तो उनके सामने सही निष्कर्ष अपने आप आ जाएगा। और निष्कर्ष यह होगा कि उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को इस पूरे आयोजन से स्वयं को कतई दूर नहीं रखना चाहिए था। यह राम माधव के गलत ट्विट से परे का विषय है। उसे अपनी जगह छोड़ दीजिए। वो ट्विट नहीं आता तब भी उप राष्ट्रपति जी की भूमिका पर प्रश्न खडा होता ही। वास्तव में उन्हें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की तरह कुछ करना चाहिए था। इससे उनकी वाहवाही होती तथा एक अच्छा संदेश भी जाता। तो उप राष्ट्रपति इस अवसर से चूक गए है जिसका समर्थन कभी नहीं किया जा सकता।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 19 जून 2015

ललित मोदी मामले की पूरी जांच क्यों नहीं कराई जाती

सुषमा स्वराज ललित मोदी प्रकरण
अवधेश कुमार

तो सुषमा स्वराज ने अपने ट्विट में यह प्रश्न उठा दिया कि मुझे नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली कौन है? नविका कुमार। नविका टाइम्स नाउ की पत्रकार है। आखिर सुषमा स्वराज ने नविका कुमार का नाम क्यों लिया? इसके कई अर्थ बताये जा रहे हैं। इसका एक अर्थ तो वही लगाया जा रहा है जो भाजपा के सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि सुषमा स्वराज आस्तिन के सांप का शिकार हुईं हैं। उसी बात को ताकत देने के लिए सुषमा स्वराज ने भी संकेत दे दिया। वह संकेत क्या हो सकता है? यही कि नविका कुमार की उनकी पार्टी में किससे साथ संबंध हैं? यानी उनकी पार्टी के लोग या जो सरकार में प्रमुख पद पर हैं उनने ही यह सारा खेल कराया है। यह संभव है कि कीर्ति आजाद को भी ऐसा ट्विट करने के लिए तैयार किया गया हो। कीर्ति क्रिकेट को लेकर अपनी पार्टी के एक नेता से दुखी रहते हैं। वो हमेशा यह पीड़ा व्यक्त करते हैं कि क्रिकेट में उनकी विशेषज्ञता है, पर उनकी पार्टी के नेता जो क्रिकेट की राजनीति में पूरी तरह संलिप्त हैं, उनसे न कुछ पूछते हैं, न कभी मुझे मेरी भूमिका निभाने देते हैं, न मैं कुछ कहता हूं उसके अनुसार आचरण करते हैं।
लेकिन हम इसमें फंसने की जगह पूरे मामले के केन्द्र ललित मोदी पर आएं। आईपीएल के जनक ललित मोदी ने क्रिकेट को एक अजीब किस्म का तमाशा बनाया। पहली बार खिलाड़ियों की नीलामी हुई जो तब शर्मनाक लगता था। मेरे जैसे लोगों ने इसका विरोध किया कि इस तरह मनुष्य को बाजार का उत्पाद बनाकर नीलामी नहीं होनी चाहिए। करोड़ों में खिलाड़ी खरीदे गए। जिसने खरीदा वो चाहे तो दूसरे को खिलाड़ी बेच भी सकता था। ये अजीब स्थिति थी। चीयर लीडर्स का प्रयोग आईपीएल में आरंभ हुआ। खेल के पहले डांस और गाने का लुत्फ दर्शकों को मिले इसकी व्यवस्था की गई। सबसे आपत्तिजनक खेल के बाद रात्रि की पार्टी जिसमें शराब और शबाब दोनों। तो इसका विरोध मेरे जैसे अनेक लोगों ने किया। यह मांग भी कि खेल को खेल ही रहने दे। इस तरह भोग की आकांक्षा पैदा करने वाला इवेंट न बनाएं।
यह ललित मोदी के न रहने पर चल रहा है। जो स्थिति है उसमें आगे भी आईपीएल तब तक चलता रहेगा जब तक लोगों की रुचि खत्म न हो जाए और इसमें आय कम न हो जाए। इसमें इतना धन था और है कि नेताओं, पूंजीपतियों, कारोबारियों, अभिनेताओं, जिनका कभी खेल से रिश्ता नहीं रहा, सब आ गए, खिलाड़ी खरीदे और तमाशा के भागीदार बने। बहुत सारे लोगों के लिए काला धन को सफेद धन बनाने का यह अवसर बन गया। कई लोगों के पास मोटी रकम केवल इसलिए आ गई कि उनने उनको आईपीएल में टीम बनाने और खिलाड़ी खरीदने में मदद कर दी। तो यह भ्रष्टाचार और अय्याशी का ऐसा आयोजन हो गया जिसमें न जाने कितने लोग डुबकी लगाने लगे और ललित मोदी इसके रिंग मास्टर थे। जहां इस तरह धन की अवैध और अति वर्षा हो रही हो वहां अनेक प्रकार के पाप और अपराध होते हैं। फिर दुश्मनी और विरोध भी पैदा होता है। यही हुआ। लड़ाई आरंभ हो गई।  इसी लड़ाई में कुछ लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, कुछ खिलाड़ी फिक्सिंग मंे फंसे, जेल गए, उनका खेल छुटा, लेकिन नेताओं और अभिनेताओं के साथ कुछ नहीं हुआ। एक पूरी ताकत ललित मोदी के खिलाफ थी और उसे देश छोड़कर भागना पड़ा।
उसके वकील महमूद आब्दी ने दावा किया है कि उनके खिलाफ कोई ब्लू कॉर्नर नोटिस नहीं है। कोई मामला उनके खिलाफ पेंडिंग नहीं है। वे प्रवर्तन निदेशालय और आयकर अधिकरियों के साथ बातचीत कर रहे हैं। यह दावा पहली बार आया है। अभी तक हमयही जानते हैं कि उनके खिलाफ ब्लू कॉर्नर नोटिस था। इंटरपोल का सदस्य भारत की सीबीआई है उसे ही इस बारे मे स्पष्टीकरण नहीं देना चाहिए। अगर मामला ही नहीं है तो फिर उनका पासपोर्ट क्यों जब्त हुआ था? हालांकि यह अगस्त 2014 में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश से उनको वापस किया गया। इस वापसी का एक अर्थ यह था कि उनके मामले को वैसा न्यायालय ने नहीं माना जिससे उनका पासपोर्ट जब्त रखी जाए। पासपोर्ट वापस मिलने का अर्थ यही है कि ललित मोदी भारतीय नागरिक के रुप में किसी देश में जाने और उस देश की अनुमति तक वहां रहने को स्वतंत्र है।
ललित मोदी के वकील ने आज वो कागजात भी दिखाए जिससे ललित की पत्नी के पूर्तगाल में ऑपरेशन होने के प्रमाण हैं। ललित वहां गए थे यह भी सच है। ललित ने उस वीजा का और क्या उपयोग किया यह बात अलग है। पूर्व गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने अगर उनके खिलाफ ब्रिेटेन को लिखा कि बाहर का वीजा दिए जाने से दोनों देशों के संबंध प्रभावित होंगे तो उसके पीछे कांग्रेस के अंदर ललित मोदी का विरोध माना जाता है। किंतु इसके लिए चिदम्बरम को बतौर गृहमंत्री कारण देने पड़े होंगे। सरकार बदलने के बाद भी वह पत्र तब तक प्रभावी था जब तक कि नई सरकार अपनी नीति नहीं बदलती। सरकार ने घोषित तौर पर नीति नहीं बदली है। सुषमा का उच्चायुक्त को फोन तथा भारतीय मूल के सांसद कीथ वाज से बातचीत उनको वीजा मिलने का कारण बना। भारत सरकार मानती है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं था तभी सभी सुषमा स्वराज के साथ सभी खड़े हैं।
ललित मोदी के वकील महमूद आब्दी ने कहा कि जबसे ललित मोदी ने शशि थरुर की तत्कालीन गर्ल फ्रेंड और बाद में उनकी पत्नी बनीं स्व. सुनंदा पुष्कर के टीम में शेयर होने की बात कही तबसे उनके पीछे यूपीए सरकार के लोग पड़ गए। आब्दी ने तीन नेता सलमान खुर्शीद, पी. चिदम्बरम एवं शशि थरुर का नाम लिया। सच है कि इसके खुलासे के बाद ही कि शशि थरुर ने टीम खरीदने मंे अपने पद के प्रभाव का उपयोग किया उन्हें मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा। ललित मोदी को मिली सुरक्षा हटा ली गई, जबकि उनके अनुसार दाउद इब्राहिम ने उनको जान से मारने की धमकी दी थी। किंतु यही आश्चर्यजनक था कि ललित को कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सुरक्षा कवच दिया। किसी को सुरक्षा देने का आधार क्या होता है? उस आधार पर ललित मोदी नहीं ठहरते थे। इसलिए सुरक्षा देना ही गलत था। दूसरे, अगर दाउद ने ललित को जान से मारने की धमकी दी तो सरकार ने उनकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था की या नहीं? इसका जवाब तो कांग्रेस के उस समय के मंत्री ही दे सकते हैं। अगर कांग्रेस के अनुसर ललित मोदी भागे तो उसमें किसका दोष था? अगर वो इतना बड़ा आर्थिक अपराधी था या है तो उनको पकड़कर भारत लाने की कोशिश क्यों नहीं हुई? वह आराम से लंदन में रह रहा है, हवाना वेनिस जा रहा है, शादियों में भाग ले रहा है और आप केवल कहते रहे कि उसके खिलाफ ब्लू कौर्नर नोटिस है। क्या भय यह था कि ललित अन्य लोगों के बारे में ऐसा खुलासा कर देगा जिससे कई लोगों का सार्वजनिक जीवन बरबाद हो जाएगा?
ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आज ढूंढा जाना चाहिए। लेकिन ललित के वकील ने जो कुछ कहा उससे उभर रहे सारे प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता। खासकर प्रसारण अधिकार बेचने में मिले 125 करोड़ रुपए के आरोप का कोई जवाब इसमें नहीं था।  उनके खिलाफ फेमा के 16 मामले हैं जिनमें 1700 करोड़ रुपया हवाला से लेन देन करने का आरोप है उसका क्या हुआ? अब चूंकि मामला सामने आ गया है, इसलिए नरेन्द्र मोदी सरकार को चाहिए कि इसकी जांच नये सिरे से कराकर दूध का दूध और पानी का पानी करे। सुषमा स्वराज के बारे मेें कहा जा सकता है कि ऐसा करने के पहले उन्हें सरकार के अंदर बातचीत करनी चाहिए थी। इसे पारदर्शी तरीके से किया जा सकता था। देश को भी बताया जा सकता था कि उनके पास अनुरोध आया था जिसमें मानवीय आधाार पर उनने मदद का निर्णय लिया है। अगर वो ऐसा कर चुकीं होतीं तो आज स्थिति विस्फोटक नहीं होती।
अवधेश कुमार, ई.: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर: 01122483408, 09811027208


शुक्रवार, 12 जून 2015

तोमर की गिरफ्तारी को कैसे देखें

 

अवधेश कुमार

फर्जी डिग्री मामले में दिल्ली सरकार के कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी ने दिल्ली की राजनीति के पहले से बढ़े तापमान को और बढ़ा दिया है। तोमर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471, 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। ये जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र से जुड़ीं धाराएं हैं। दिल्ली सरकार ने केन्द्र सरकार तथा उप राज्यपाल के खिलाफ एक साथ कई मोर्चा पहले से खोल रखा है उसमें एक मोर्चा और जुड़ गया है। आम आदमी पार्टी ने सड़क पर उतरकर इसका विरोध किया है। उनके सारे नेताओं का स्वर एक ही है कि अगर मामला न्यायालय में है तो फिर गिरफ्तारी की आवश्यकता क्या थी? वैसे उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने तो इसे सरकार द्वारा सीएनजी घोटाले को लेकर मुकदमा दर्ज करने के फैसले से भी जोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि उपराज्यपाल की भूमिका फिटनेस घोटाले में जाहिर हो रही है। सिसौदिया ने कहा कि यह बदले की कार्रवाई है। तोमर को झूठ बोलकर पुलिस ने घर से उठाया।

यह उस पार्टी के स्वभाव के अनरुप है। वह किसी मामले को सीधे तौर पर देखने की बजाय ऐसे हर फैसले और कदम को जो उसकी चाहत के विरुद्ध होतीं हैं, अपने किसी तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी कदम की प्रतिक्रिया में उठाया गया साबित करती है। इससे पूरा मामला गलत दिशा में जुड़ जाता है। ऐसा ही इस मामले में हुआ है। तोमर की गिरफ्तारी का विरोध आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार के मंत्रियों का अधिकार है और उन्हें करना चाहिए। किंतु उसे दूसरे मामले के साथ जोड़ने का अर्थ स्वयं को सरकार में होते हुए भी उत्पीड़ित साबित करना है। वास्तव में दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी पूरे मामले को इस तरह पेश कर रही है मानो केन्द्र सरकार दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग एवं अपने अधीन काम करने वाली दिल्ली पुलिस के द्वारा उसे परेशान कर रही है। कुमार विश्वास ने कहा भी कि 32 से 3 होने को प्रधानमंत्री पचा नहीं पा रहे हैं। दिल्ली के पुलिस आयुक्त बी. एस. बस्सी का कहना है जो भी हो रहा है वह कानून के अनुसार हो रहा है।

इस मामले के तीन पहलू हैं। पहला, तोमर की डिग्री फर्जी होने का आरोप, दूसरा, उनके खिलाफ मामले का कानूनी पहलू तथा तीसरा,  इसका राजनीतिक फलक। राजनीतिक फलक की चर्चा हम पहले कर चुके हैं। इसलिए पहले एवं दूसरे पहलू पर ही विचार किया जाए। जितेंद्र तोमर पर आरोप है कि उनकी ग्रैजुएशन और एलएलबी की डिग्री फर्जी है। बिहार की भागलपुर स्थित तिलका मांझी विश्वविद्यालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि जितेंद्र सिंह तोमर का अंतरिम प्रमाणपत्र जाली है और इसका संस्थान के रिकॉर्ड में अस्तित्व नहीं है। आज जो दिल्ली पुलिस ने बताया उसके अनुसार बार काउंसिल ने शिकायत थी कि जीतेन्द्र सिंह तोमर ने अधिवक्ता के रुप में निबंधन के लिए जो डिग्रियां और दस्तावेज पेश किया था वो फर्जी लगती हैं। इसके अनुसार ऐसी जो भी शिकायत आती है उसकी पहले प्रारंभिक जांच करते हैं और फिर उसके आधार पर कार्रवाई करते हैं। सबसे पहले अवध विश्वविद्यालय से बीएससी करने का इनका दावा गलत निकला। इसमे जों रॉल नंबर दिया गया है वह इनके नाम पर नहीं थी। वहां से इनके बीएससी करने का कोई प्रमाण नहीं है। दूसरे, एलएलएबी की डिग्री के बारे में तिलका मांझी विश्वविद्यालय से पता किया गया। वहां जो रोल नंबर अंकित है वह किसी दूसरे छात्र संजय कुमार चौधरी के नाम था। तीसरे, जो अस्थायी पमाण पत्र इनने दिया है उसे भी फर्जी पाया गया। कोई अस्थायी प्रमाण पत्र इनके नाम पर उस विश्वविद्यालय से निर्गत ही नहीं हुआ। तीसरे, इनके कागजात में एक माइग्रेशन प्रमाण पत्र लगा था बुंदेलखंड विश्वविद्यालय का। वहां पता चला कि इनके नाम से कोई माइग्रेशन प्रमाण पत्र नहीं निर्गत किया था। जो रॉल नंबर दिया गया था वह 2001 का था इनने 1999 में कानून की डिग्री ले ली थी। तो इस तरह पुलिस की मानें तो बीए से लेकर कानून की सारी डिग्री ही नकली है। इसके बाद पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर उनको गिरफ्तार किया है।

तो यह पुलिस का पक्ष है। जहां तक कानूनी प्रक्रिया का प्रश्न है तो पुलिस का कहना है कि उसके पास 11 मई को बार काउंसिल ने शिकायत की। हमने पूरा समय लेकर इसकी जांच की और 8 जून को मुकदमा दर्ज कर 9 जून को गिरफ्तार किया है।  यानी गिरफ्तार करने से पहले शिकायत की पूरी छानबीन की गई है। किसी भी विधायक की गिरफतारी के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष को पूरे मामले की जानकारी दी जाती है। पुलिस का कहना है इस मामले में सारी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है। मामले की पूरी जानकारी विधानसभा अध्यक्ष और गृह मंत्रालय दे दी गई है। विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय द्वारा जारी बयान में गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए कहा गया है कि दिल्ली पुलिस को बिना सदन की अनुमति के किसी सदस्य को हिरासत में लेने का भी अधिकार नहीं है। इसमंे यह नहीं कहा गया है कि उन्हें सूचना नहीं दी गई। पुलिस कह रही है कि विधानसभा अध्यक्ष को इसकी बाजाब्ता जानकारी दी गई है।  इस मत पर सहमति नहीं है कि किसी सदस्य की गिरफ्तारी के लिए सदन की अनुमति चाहिए। विधानसभा सदस्यों के विशेषाधिकार हैं, पर वे इस सीमा तक जाते हैं कि पुलिस जांच में मामला साबित हो जाने पर भी उनकी गिरफ्तारी का आदेश सदन से लेनी हो ऐसा नहीं है। ऐसे मामलों में उच्चतम न्यायालय के कई फैसले आ गए हैं।

दिल्ली सरकार कानूनी प्रक्रिया को लेकर न्यायालय मेें जा सकती है। लेकिन कानूनी प्रक्रिया से ज्यादा महत्व यहां मामले का है। सवाल है कि अगर कोई ईमानदार है तो कानूनी प्रक्रिया का पालन करके भी उसे गिरफ्तार करना गलत होगा। इसके विपरीत यदि वह दोषी है, अपराध किया है तो कानूनी प्रक्रिया का पालन न होने के आधार पर उसे दोषमुक्त नहीं किया जा सकता। इसलिए हमारे लिए मामला महत्वपूर्ण है। सामान्यतः यह विश्वास करना कठिन है कि कोई पूरी तरह फर्जी डिग्रियांे के आधार पर जीवन की इतनी लंबी यात्रा कर सकता है। कहां फैजाबाद का महाविद्यालय, फिर बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, फिर बिहार का तिलका मांझी विश्वविद्यालय.......। इतनी लंबी यात्रा केवल ग्रेज्युएशन एवं कानून की डिग्री के लिए असामान्य सा लगता है। हम न्यायालय के फैसले के पहले कोई निष्कर्ष नहीं दे सकते। वैसे अगर तीनों विश्वविद्यालय से रिकॉर्ड न होने की रिपोर्ट है तो फिर पहली नजर में आप उसे गलत कैसै करार दे सकते है। किंतु यह भी तो संभव है कि कुछ लोगों ने तोमर के खिलाफ साजिश की हो। हालांकि ऐसा साजिश जिसमें तीनों विश्वविद्यालयों से रिकॉर्ड बदलवा दिए जाएं अविश्सनीय है। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा था कि मामला सामने आते ही उनने तोमर से पूछा। उनके अनुसार भाजपा के जिस व्यक्ति ने आरटीआई दाखिल की उसकी कॉपी और जवाब तोमर ने मुझे दिखाए। आरटीआई में सवाल किया गया कि क्या इस रोल नंबर पर तोमर को डिग्री मिली है? जब जवाब ना में मिला, तो मीडिया ने तोमर की डिग्री को फर्जी करार दिया। उन्होंने कहा कि तोमर का कहना है कि उनका रोल नंबर दूसरा था। कुछ ही दिन में सच्चाई सबके सामने आ जाएगी।

आज की स्थिति यह है कि दिल्ली बार काउंसिल ने तोमर का लाइसेंस सस्पेंड कर रखा है। तो हमें आम आदमी पार्टी एवं तोमर के दावों तथा पुलिस की छानबीन के बावजूद न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। वैसे एक मामला तोमर के खिलाफ न्यायालय में चल रहा है। वहां तोमर ने अपना शपथ पत्र दिया था। वह मामला अलग है और पुलिस का वर्तमन मामला अलग। यह मामला बार काउंसिल द्वारा की गई शिकायत के आधार पर दायर हुआ है। समस्या दोनों मामलोें को मिलाने से हो रही है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

 

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