शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

खेल में ऐसा उन्माद और जुनून

अवधेश कुमार
खेल खेल हैं। इसे खेल की तरह ही लिया जाए तो यह न केवल खिलाड़ी बल्कि उस देखने वालों के अंदर भी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करेगा, परिश्रम और पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करेगा। लेकिन खेल हमारे दौर में न जाने क्या हो गया है। भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद के कुछ दृश्य जो हमारे सामने आये हैं डरावने हैं। इस प्रकार का उन्माद कि ऑस्ट्रेलिया तक के एक क्लब में दोनों देशों के लोग एकदम दो गैग की तरह एक दूसरे से मारपीट करते नजर आए। ऐसा लग रहा था जैसे ये खून के प्यासे हों। ये सब पढ़े लिखे और संपन्न परिवारों के लोग हैं। उनमें कुछ घायल भी हो गए। पता नहीं आगे क्या होगा? भारत के कई शहरों में लोग इस तरह पटाखे फोड़ते और नारे लागाते सड़कों पर उधम मचाते निकले कि कुछ जगह हिंसा हो गई। न जाने कितनी खबरें हमारे पास नहीं आई हांेगी, छोटी मोटीं घटनायें हुई भी होंगी और कुछ टाली भी गई होंगी। तो इसे क्या कहेंगे? इसे किसी तरह संतुलित समाज का व्यवहार तो नहीं कहा जा सकता है।
 आम तौर पर शांत दिखने वाले, अपने आप तक सीमित रहने वाले, कार्यालय से घर तक को ही दुनिया बना लेने वालों के व्यवहार में भी मैच के दौरान और उसके बाद अचानक अजीब बदलाव आते आपने देखा होगा। ऐसे व्यवहार कर रहे थे मानो एक मैच के विजय से सनातन दुश्मन को पददलित करने का सुख मिलने वाला है और उसमें हमारी भी हिस्सेदारी है। इस प्रकार का सामूहिक असंतुलन समाज में पैदा होना दरअसल उन्माद और जुनून ही है। इसे हम राष्ट्वाद नहीं कह सकते। प्रश्न है कि इस तरह का जुनून आखिर क्यों पैदा होता है और इसे उत्तेजित करने वाले कौन होते हैं? पाकिस्तान के कराची से एक लाइव तस्वीर टीवी पर दिखाई जा रही है जिसमें लोग गुस्से में अपना टीवी फोड़ते नजर आ रहे है। खबर में कहा जा रहा है कि ऐसा करने वालों के अनुसार न रहेगा टीवी न देखेंगे मैच। पता नहीं इस खबर में कितनी सच्चाई है। आखिर तात्कालिक गुस्से में टीवी फोड़ने वाले चैनलों को पहले से क्यों बुलाकर रखेंगे? या उसकी फिल्म क्यों बनाएंगे? इसलिए वह दृश्य स्वाभविक से ज्यादा कृत्रिम लगता है। ज्यादा संभावना तो इसी बात की है कि वहां इस दृश्य का निर्माण किया गया होगाा। लेकिन यह सच है कि पाकिस्तान में भी इस हार से गुस्से का गुब्बार फूटा और कई जगह लोग खिालड़ियों के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करते देखे गए। हालांकि उनकी यही खिलाफत तब नहीं होती जब पाकिस्तान किसी दूसरे देश से हारता है।
यही बात हम पर भी लागू होती है। हमारी टीम जब दुनिया की किसी दूसरी टीम से जीतती है तो हमारे अंदर अपने दुश्मन को रौंदने जैसा उन्मादपूर्ण सुख का बोध नही होता। यह अजीब व्यवहार है। कितने लोग अपना भारी खर्च करके पटाखे खरीदते हैं जुलूस निकालते, निकलवाते हैं......पार्टियां करते हैं, पबों में क्लबों में डांस....फिर सड़कों पर हंगामा....... न जाने क्या क्या होता है? कभी हमने शांति से बैठकर यह सोचा है कि  इन सबसे हम माहौल कितने जुनून और उन्माद का बना रहे हैं और इसके परिणाम क्या आयेंगे? पाकिस्तान और भारत के बीच रिश्ते वैसे ही आतंकवाद, कश्मीर में हिंसा और सीमा पार से गोलीबारी की भेंट चढ़ता रहा है। पाकिस्तान अपनी जड़विहीन राष्ट्रीयता की कंुठा तथा स्वयं को भारत के बराबरी दिखलाने की विकृत नीतियों के कारण हमेशा तनाव पैदा करता रहा है। हर मानवतावादी युद्ध का विरोधी होगा,  लेकिन इन मामलों में भी यदि आतंकवादी मारे जाएं, या सीमा पर हमारे सुरक्षा बल पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की साजिशों को अपनी वीरता से ध्वस्त कर दें, पाकिस्तान को झुका दे ंतो जश्न और जुनून समझ में आता है। उसमें यदि आपका राष्ट्रवाद तुष्ट होता है तो फिर भी एक हद तक उसे स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन क्रिकेट या हौकी या ऐसे किसी खेल में विजय से व्यावहारिक धरातल पर कोई अंतर नहीं आने वाला।
साफ है कि हमारे देश का बड़ा वर्ग सच और झूठ के युद्ध में अंतर नहीं कर पाता, सच्चे और झूठे विजय के बीच अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पता। एक सामान्य से 100 ओवर के मैच पर, जिससे वास्तविक जीवन या धरातल पर किसी मामले में कोई अंतर नहीं आ सकता, राष्ट्रभक्ति के नाम पर ऐसा उन्माद डरावना है। यह शत प्रतिशत विवेकहीनता है। राष्ट्रवाद या राष्ट्रभक्ति इतनी संकुचित अवधारणा नहीं हो सकती। गांधी जी ने तो कहा कि हमारा राष्ट्रवाद यदि दूसरे के राष्ट्वाद से टकराव का कारण बन जाये, या हमारा राष्ट्रवाद किसी तरह दूसरे का विरोधी हो जाए उसे डराने लगे तो यह राष्ट्रवाद नहीं हो सकता। गांधी जी अकेले ऐसे कहने वाले नहीं थे। आप स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, सुभाषचन्द्र बोस.....जिनका अंग्रेजों के समय राष्ट्रीयता का भाव पैदा करने मे महान योगदान था, सबने यही बात कही है। उनके शब्द और वाक्य अलग हैं, पर भाव यही है।  पाकिस्तान एक असंतुलित देश है। उसका व्यवहार असंतुलित हो सकता है। भारत के लोगों का आचरण तो परिपक्व होना चाहिए। हमंें तो अपने मनीषियों की सोच के अनुसार व्यवहार करना चाहिए।
टीम की जीत पर खुश होने में कोई समस्या नहीं। आप खुशी मना लीजिए, लेकिन उसकी सीमा होगी। खुशियां अंधराष्ट्रवादी जुनून में बदल जाएं तो इसका चरित्र दूसरा हो जाता है और फिर ऐसी खुशियां न जाने कितनों के लिए मातम में बादल जातीं हैं। अगर ऐसा नहीं हो रहा और इसकी जगह उन्माद और जुनून पैदा होता है तो इसके पीछे अगर कुछ शक्तियां, कुछ माध्यम हैं तो उनकी भी पहचान करने की आवश्यकता है। प्रश्न यह भी है कि क्या हम राष्ट्रीयता के असली मायनों से विमुख हो चुके है या हो रहे है? या हमारे अपने अंदर का सामूहिक अवसाद, कुंठायें, विफलताओं से पैदा हुआ क्षोभ... आदि ऐेसे समय दूसरे रुप मंें प्रस्फुटित हो जातीं हैं? हम माने या न मानें यह सकारात्मक राष्ट्रीय चेतना के धूमिल पड़ने का प्रमाण है। आखिर हम यह क्यों नहीं सोचते कि खेल भावना जैसा शब्द और विचार काफी विचार करने के बाद प्रयोग मंे लाया गया। इसका अर्थ क्या है? चाहे हम जीतें या हारें, एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के रुप में इसे लें ताकि सबके अंदर सकारात्मक चेतना का विकास हो। खेल प्रतिस्पर्धाओं की कल्पना ही देशांे को निकट लाने, उनके बीच भाईचारा, सहकार विकसित करने के लिए की गई थी। अगर ये प्रतिस्पर्धायें इसके विपरीत भाव पैदा कर रहीं हैं तो फिर ऐसे आयोजन पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाएगा। ऐसा होता है तो हमें रुककर ऐसे आयोजनों पर ही पुनर्विचार करना पड़ेगा।
 अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

इसके गहरे आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिणाम होंगे

अवधेश कुमार
तो अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार न काम करना आरंभ कर दिया। इतने बड़े जानदेश के बाद यह केवल औपचारिकता थी। कोई भी राजनीतिक परिवर्तन या चुनाव परिणाम केवल सदन के अंकगणित तक सीमित नहीं रहता। उसका अवश्यंभावी राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिणाम होता है। खासकर जब ऐसी पार्टी सत्ता में आई हो जो कि सम्पूर्ण नागरिक सेवाओं, प्रशानिक दुर्बलताओं, व्यापारिक गतिविधियों, कर प्रणाली के साथ शिक्षा एवं स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे में आमूल परिवर्तन की घोषणा कर रही हो। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि हमें अहंकार नहीं करना है और दिल्ली को बेहतर दिल्ली बनाना है। उनके शब्द थे कि आज कांग्रेस की दुर्दशा इसलिए हुई, क्याेंकि वह अहंकार का शिकार हो गई थी और भाजपा भी अहंकार का शिकार थी, इसलिए उसकी ऐसी हालत हुई। तो इसमें भविष्य के लिए राजनीतिक और आर्थिक संदेश दोनों छिपे है। हालांकि उनके दूसरे नेताओं ने भारत की सम्पूर्ण राजनीति में क्रांति लाने की बात तक की, पर केजरीवाल पिछली बार की तुलना में ज्यादा संतुलित हैं। पिछली बार जीतने के बाद उनकी भाषा में जितना क्रोध और अहं था, विरोधी पार्टियों के लिए जो हिकारत भाव था, वह इस बार नहीं दिखा है। इस नाते इसको एक परिपक्व व्यवहार कहा जा सकता है। देखना होगा यह परिपक्व व्यवहार कब तक कायम रहता है।
भाजपा की ऐसी बुरी पराजय क्यांें हुई, आआपा की ऐसी ऐतिहासिक जीत किन कारणों से हुई और कांग्रेस का पूर्णतया सफाया हो जाने के पीछे कौन से कारक हाबी थे.....आदि पर हम कई प्रकार के मत व्यक्त कर सकते हैं। कुछ कारण हमारे सामने साफ हैं और उन पर चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं है। लेकिन हम यहां यहीं तक अपनी बात सीमित रखेंगे कि दिल्ली के लोगों ने किरण बेदी और अजय माकन के चेहरे से केजरीवाल का चेहरा ज्यादा विश्वसनीय माना एवं उनके वायदों से ज्यादा आकर्षित हुए, अन्यथा ऐसा एकपक्षीय बहुमत नहीं आता। भाजपा एवं कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दोनों उम्मीदवार की पराजय सामान्य परिणाम नहीं है। तो इस असामान्य परिणाम के आगे क्या परिणाम होंगे जरा उन पर विचार करें। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कई वक्तव्य हमारे सामने आ गए है। एक है, कोलकाता की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जिन्होंने कहा कि यह अहंकार की पराजय है और उन्होंने आगे आआपा और अन्य पार्टियों के साथ मिलकर भाजपा विरोधी मोर्चा की बात कही। दूसरा वक्तव्य बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है। उन्होंने भी कहा कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा एवं हवाबाजी की पराजय आरंभ हो गई है।
हम नीतीश के इस वक्तव्य से सहमत नहीं हो सकते कि यहां से भाजपा की पराजय की शुरुआत हो गई है और नरेन्द्र मोदी की सरकार केवल हवाबाजी कर रही है। न ही हम ममता के विश्लेषण से सहमत हो सकते हैं। लेकिन अब विरोधी पार्टियां, जो किसी तरह मोदी की एक पराजय देखना चाहती थी ताकि भाजपा का नैतिक बल कमजोर हो एवं उनको यह कहने का मौका मिले कि देखो मोदी की हवा निकल गई, झूठ का खेल सामने आ गया और अब हम उनको पराजित कर सकते हैं। यानी अपने समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं में यह विश्वास पैदा करना कि मोदी अपराजेय नहीं हैं, हम एकजुट होकर लड़े तो उनको हरा सकते हैं। इसका प्रचार जोर-शोर से होगा। दिल्ली में सारी भाजपा विरोधी पार्टियों ने, भले उनका जितना मत रहा हो, आआपा को विजय दिलाने के लिए काम करने का आह्वान किया था। इससे सामान्य निष्कर्ष यह निकलता है कि दिल्ली की तरह दूसरे राज्यों में भी शायद ऐसा प्रयोग हो सकता है। पर बिहार में नीतीश एवं लालू गठजोड़ के अलावा ऐसा कोई गठजोड़ बनता नहीं दिखता। आआपा को समर्थन देने वाली वामपंथी पार्टियों एवं ममता के बीच गठजोड़ कैसे संभव है? इसी तरह मायावती एवं मुलायम सिंह के बीच हाथ मिलाने की अभी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। बावजूद इसके विरोधी दलों का पक्ष थोड़ा मजबूत होगा और भाजपा बचाव की मुद्रा में रहेगी। उसका आक्रामक तेवर नीचे आयेगा। आआपा अन्य दलों के साथ उनके राज्यों में गठजोड़ करेगी और उसका असर होगा यह कहना अभी कठिन है। इसलिए इसके लिए हमें प्रतीक्षा करनी होगी। साथ ही भाजपा विरोधी पार्टियों में कांग्रेस भी शामिल है, उसका स्थान इसमें कहीं होगा या नहीं यह भी साफ नहीं है। आआपा तो उसके साथ नहीं जा सकती है। तो दिल्ली चुनाव परिणाम से निकले संदेशों की चाहे अलग-अलग पार्टियां अपने तरीके से व्याख्या करें, वे तत्काल जितने उत्साहित हो जाएं, इसकी कोई ठोस निश्चित रुपाकार की कल्पना अभी नहीं की जा सकती।
लेकिन इसके व्यापक आर्थिक परिणामों से इन्कार नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए आआपा ने पिछली सरकार के दौरान ही खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश न करने का निर्णय लिया था। हालांकि संप्रग सरकार में भाजपा भी इसकी विरोधी थी, किंतु नरेन्द्र मोदी जिस अर्थनीति पर चल रहे हैं उसमें विदेशी निवेश का व्यापक महत्व है। पता नहीं वे क्या चाहते हैं, पर अगर इस तरह केजरीवाल ने अन्य कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेश को रोकने का कदम उठाया तो इसकी आर्थिक प्रतिध्वनि काफी गहरी होगी। दूसरा उदाहरण व्यापार पर लगने वाले वैट का है। अपने 70 सूत्री घोषणा पत्र में आआपा ने कहा है कि वह दिल्ली में वैट घटायेगी ताकि यहां के सामान ज्यादा बिकंे और आर्थिक गतिविधियां तेज हो। साफ है कि वे ऐसा करेंगे तो इसका प्रभाव दिल्ली के खजाने पर पड़ेगा एवं इससे दूसरे राज्य भी प्रभावित होंगे। अगर बिक्री अपेक्षानुरुप नहीं बढ़ी और खजाने में धन नहीं आया तो फिर कठिनाई पैदा हो सकती है। हालांकि जीएसटी पर सभी राज्य समझौते के करीब हैं.....पर केजरीवाल क्या करेंगे कहना कठिन है। ये दो उदाहरण तो नीतियों के हैं जो संभवतः केन्द्र सरकार एवं कई राज्य सरकारों की नीतियों से अलग जाते हैं।
नीतियों से परे आआपा ने 70 सूत्री घोषणा पत्र में जो वायदे किए हैं जिसमें लोगों के सिर से खर्च का बोझ घटाने एवं कोई कर या शुल्क न लगाना शमिल हैं और जो इसकी विजय का सर्वप्रमुख कारण है, उसके खर्च के आकलन से सिर चकरा सकता है। कुछ पर नजर दौड़ाइए-  बिजली बिल आधे किए जाएंगे, दिल्ली का अपना पॉवर स्टेशन बनेगा, प्रति माह हर घर के लिए 20 किलोलीटर (20,000 लीटर) तक मुफ्त पानी, पानी की दरों में सालाना 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी के प्रावधान का अंत, सभी घरों तक पानी का पाईप भी बिछाना, 2 लाख सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण, 500 नए स्कूलों का निर्माण, हर स्कूल में लड़कियों के लिए शौचालय, कंप्यूटर और उच्च गति के इंटरनेट कनेक्टिविटी की सुविधा हर स्कूल में, 17 हजार नए शिक्षकों की भर्ती, 20 नए डिग्री कॉलेज, 900 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और अस्पतालों में 30,000 अतिरिक्त बेड की सुविधा देना, हर 1000 लोगों के लिए पांच बेड के अंतरराष्ट्रीय मानदंड को भी सुनिश्चित करना, सभी के लिए सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च में वृद्धि, दिल्ली की हर सड़क हर गली में सौ फीसदी रोशनी की व्यवस्था करेगी, डीटीसी बसों, बस स्टैंडों पर और भीड़-भाड़ वाले जगहों में सीसीटीवी कैमरे लगाना, 47 नई फास्ट ट्रैक कोर्ट, सारी झुग्गी बस्तियों का पांच वर्ष में पक्कीकरण, 15,000 होमगार्ड जवानों की मदद से महिला सुरक्षा दल या महिलाओं सुरक्षा बल का गठन,  महिला की सुरक्षा के लिए सार्वजनिक परिवहनों में 5000 मार्शलों की नियुक्ति, मुफ्त वाई फाई सुविधा, दिल्ली में व्यापार और खुदरा हब, पांच साल में आठ लाख नई नौकरियां,  ठेके के सभी पद नियमित किए जाने, स्वायत्त निकायों में 55,000 रिक्तियों को तत्काल आधार पर भरना, 4000 डॉक्टरों और 15,000 नर्सों और सहयोगी स्टाफ को स्थायी किया जाना........।
सूची और बड़ी है। कल्पना करिए कि केजरीवाल की सरकार अगर इनको साकार करने के लिए आगे बढ़ेगी तो इसका आर्थिक व वित्तीय प्रभाव क्या होगा? भारत सरकार का बजट 17 लाख करोड़ रुपया से थोड़ा ज्यादा है। इन घोषणाओं पर खर्च इससे कई गुणा ज्यादा हो जाता है। दिल्ली सरकार का बजट अभी तक 40 हजार करोड़ के आसपास रहा है। वायदा किया है तो वे इसे साकार करने की हर हाल में कोशिश करेंगे। देखना होगा केजरीवाल कैसे इनको साकार करते हैं। पर ऐसा होता है इसके व्यापक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिणामों से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शनिवार, 31 जनवरी 2015

किरण बनाम अरविन्द में फिर टूटती राजनीति की मर्यादायें

अवधेश कुमार
दिल्ली चुनाव की गर्मी में किरण बेदी बनाम केजरीवाल वाकयुद्ध ने राजनीति की जुगुप्सा को फिर से उभारा है। अरविन्द एवं किरण दोनों एनजीओ चलाने के कारण कई मामलांें पर लंबे समय से साथ रहे हैं। अन्ना अनशन अभियान के मुख्य प्रबंधकार भले केजरीवाल थे, पर किरण भी उसकी एक प्रमुख स्तंभ थीं। इनके बीच मतभेद हुए यह भी हमारे सामने साफ था। किंतु अन्ना हजारे भी अरविन्द केजरीवाल से अलग हुए और उनके खिलाफ खुलकर बोले। अरविन्द के अनेक पुराने साथी अन्ना के साथ रहे। उनमें किरण बेदी भी थीं। जब लोकसभा में पिछले वर्ष लोकपाल कानून पारित हुआ तो अन्ना के साथ किरण बेदी ने भी उसका स्वागत किया। किरण अन्ना के गांव में उनके अनशन के साथ थीं। अन्य कई लोग भी वहां थे। तो उनका मतभेद स्पष्ट था। बावजूद इसके उनके बीच एक दूसरे के प्रति सार्वजनिक शब्द प्रयोग में शिष्टता बनी हुई थी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में किरण बेदी के भाजपा मेें शामिल होने तथा मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनते ही वो शिष्टता तो उड़न छू हुई ही, इस प्रकार के आरोपों-प्रत्यारोंपों का दौर चल पड़ा है जिसमें ऐसा लगता है दोनों पक्ष कोई सीमा मानने को तैयार नहीं है।
 यही हमारी राजनीति का दुर्भाग्य है। आम आदमी पार्टी राजानीति में एक मानक स्थापित करने के दावे से आई थी। पर चुनाव की राजनीति ने उसके सारे दावों की कलई खोल दी है। अरविन्द सहित पूरी पार्टी किरण पर यह आरोप लगाते हुए टूट पड़ी है कि वो तो पहले से ही भाजपा के प्रति नरम रुख रखतीं थीं। वो अन्ना अभियान के समय से ही भाजपा पर हमला करने से बचतीं थीं। इसके पहले कुमार विश्वास और आशीष खेतान जैसे आप के नेता किरण को अन्ना अभियान में भाजपा का मोल यानी भेदिया करार दे चुके हैं। हालांकि अरविन्द की ही पूर्व साथी शाजिया इल्मी ने, जो कि आप में भी उनके साथ थीं, यह कह दिया है कि किरण नहीं अरविन्द ही भाजपा के प्रति नरम रुख रखते थे। ध्यान रखिए शाजिया विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव दोनों आप की टिकट पर लड़ीं। चुनाव के काफी समय बाद उन्होंने पार्टी में एक चौकड़ी के हाबी होने का आरोप लगाकर सभी पदों से त्यागपत्र दे दिया था। अब वो कह रहीं हैं कि अन्ना अभियान में तो कजरीवाल ही केवल कांग्रेस पर हमला करते थे। पार्टी बनाने के बाद उनने भाजपा को निशाना बनाया।
जो स्थिति बन रही है उसमंे पता नहीं और क्या-क्या सामने आ जाएगा। अरविन्द के जो पुराने साथी भाजपा में आ गए हैं उनके पास ऐसे कई तथ्य हैं जो अरविन्द एवं उनके साथियों को नागवार गुजरता है। वे अब केजरीवाल को ही साजिश के तौर पर पेश कर रहे हैं। ये भी उनको अवसरवादी कह रहे हैं। तो आप की नजर में किरण अवसरवादी, वो सब अवसरवादी जो भाजपा में चले गए, और भाजपा की नजर में अरविन्द और उनके साथी अवसरवादी। अगर हम आप जनता के तौर पर इसे देखें तो हमें दो अवसरवादी चेहरों में से किसी एक को चुनना है। एक तीसरा विकल्प कांग्रेस के अजय माकन हैं, पर लगता ही नहीं कि वो कहीं दौर में हैं। हम किसे अवसरवादी मानें। किरण बेदी कह रहीं है कि अगर मैं भाजपा के प्रति पक्षपाती थी तो मुझे मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने की पेशकश क्यों की? यह सवाल भी वाजिब है। आखिर जब इनको लगता था कि किरण आंदोलन में भाजपा की भेदिया थीं, जासूस थीं, उसकी समर्थक थीं तो फिर उस समय उनके खिलाफ आरोप लगाकर बाहर करने की मांग क्यों नहीं की? यह बात अन्ना हजारे के संज्ञान में था कि नहीं? अगर उनके संज्ञान ंमें था तो वो अरविन्द एवं उनके आज के साथियों को छोड़ गए, पर किरण बेदी उनके साथ बनी रहीं।
केजरीवाल कह रहे हैं कि  किरन बेदी के साथ मेरे मतभेद की शुरुआत नितिन गडकरी के कारण हुई। वह तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष के खिलाफ बोलने के लिए तैयार नहीं थीं। अरविन्द के कथन को मान लें तो किरण के साथ उनकी टेलफोन पर बातचीत भी बंद हो चुकीं थीं। उनका कहना है कि दो साल पहले कोयला ब्लॉक आवंटन के खिलाफ आंदोलन के बाद बेदी ने मेरा फोन उठाना बंद कर दिया था। वह मेरे मेसेज का जवाब भी नहीं देती थीं। उन्होंने कहा था कि हमें नितिन गडकरी के घर का घेराव नहीं करना चाहिए था। लेकिन हमने ऐसा किया और इसके बाद वह खुलकर हमारे खिलाफ हो गईं। इतने भर से फोन पर बातचीत बंद हो जाए यह स्वीकार करने का कोई कारण नहीं है। आखिर अरविन्द एवं मनीष का फोन तो अन्ना हजारे ने भी उठाना बंद कर दिया था।
बहरहाल, इसका अर्थ निकालना लोगों पर छोड़ देना चाहिए। किरण बेदी इस देश में आंदोलनकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या हैं जिनके लिए कभी आदर्श नहीं रहीं। एक नौकरशाह से एनजीओ चलाने, बड़े संस्थानों में लैक्चरर देने और झुग्गी झोपड़ी में विद्यालय चलाने के अलावा कुछ एलिट वर्ग के बीच उनका जलवा रहा है। यह तो कोई साधारण समझ वाला भी देख सकता था कि अन्ना अभियान कोई एक राजनीति विचारधारा वालों का अभियान नहीं था। उसमें अलग-अलग विचारधाराओं और संगठनों की भागीदारी थी। भाजपा और संघ परिवार उसमें सर्वप्रमुख थी। रामलीला मैदान के अनशन के पीछे का पूरा प्रबंधन संघ परिवार के हाथों ही दिख रहा था। यह बात अरविन्द जानते थे। उनके साथी भी जानते थे। उनके सामने सब कुछ था। आखिर बारिस से भींगे हुए रामलीला मैदान को किनकी ताकत से 24 घंटे के अंदर मंच से लेकर आयोजन लायक बना दिया गया? भाजपा ने जितना संभव था उस अभियान को ताकत दी। सच कहा जाए तो भाजपा को उम्मीद थी कि यह आंदोलन कांग्रेस सरकार के खिलाफ है और इसमें साथ देने से उसकी ताकत बढ़ेगी, ये सब उसका साथ देंगे। हुआ इसके विपरीत। अरविन्द ने जब पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया तब भाजपा उनके खिलाफ खुलकर आई। पार्टी बनाने से अनेक लोग असहमत थे और वो उनके साथ नहीं आए। उसमें किरण बेदी भी थीं।
जब इस तरह आरोप-प्रत्यारोप लगाये जायेंगे तो ऐसी-ऐसी बातें सामने आएंगी जो इनकी राजनीति से वितृष्णा पैदा करेंगी। इसमें यह भी उम्मीद थी कि एक आरोप यह लगायेंगे आपने अपने एनजीओ में कितना फंड विदेशों से लाया, कितने गलत खर्च किए, कहां का पैसा कहां लगाया तो दूसरा इसके प्रत्युत्तर में उनको आईना दिखायेंगे। लेकिन अपने एनजीओ, उसके फंड और कार्यों पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहा है। इस मामले पर दोनों पक्ष एक दूसरे की असलियत जानते हैं, इसलिए उस पर खामोश हैं। पर जो हो रहा है वही कम नहीं है। अब देखिए,  एक खुलासा यह हुआ है कि  5 अप्रैल 2011 से जंतर मंतर पर अन्ना अनशन अभियान की शुरुआत हुई और 4 अप्रैल को अरविन्द सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक में शामिल थीं। उसके बाद अन्ना अभियान के बीच भी वो उन बैठकों में तीन बार गए थे। आपको कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार चोर लगती थी, कांग्रेस भ्रष्टाचार की जननी लगती थी तो फिर उन बैठकों का बहिष्कार क्यों नहीं किया? वैसे भी सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली सलाहकार परिषद इन एनजीओवालों से ही भरा हुआ था जिसने ऐसी-ऐसी योजनायें बनवाईं जिनसे देश का भी अहित हुआ और कांग्रेस का क्या हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं।
लेकिन इस तरह कई भेद खुलेंगे। अन्ना अभियान के लोगों का संघ नेताओं से बातचीत, भाजपा नेताओं से बातचीत, उनके पीछे के प्रबंधन मंे संघ कार्यकर्ताओं का लगना.......आदि सच पहले से उपलब्ध हैं। ऐसी बातें हैं जिनसे दोनांे पक्षों के लिए समस्यायें पैदा हो जाएंगी। आप नेताओं को समझना चाहिए कि आज भी उनकी पार्टी में ऐसे नेता हैं जो भाजपा और संघ की पृष्ठभूमि से हैं। पिछली बार जिसे विधानसभा का अध्यक्ष बनाया गया वो कौन थे और आज कहां हैं। नितीन गडकरी के घर पर प्रदर्शन का विरोध करने से कोई भाजपा समर्थक नहीं हो जाता है। स्वयं अरविन्द ने गडकरी पर जो आरोप लगाए उनका क्या हुआ? वे तो स्वयं गडकरी के घर गए थे अपने साथियों के साथ और मामले पर समझौता कर लिया। सच यह है कि दोनों पक्षों के अनेक ऐसे अधखुले पहलू हैं जिनसे सबके चेहरे नंगे हो सकते हैं। इसलिए सलाह यही होगी कि जिनके घर स्वयं शीशे को हों वो दूसरों पर पत्थर नहीं मारा करते।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


गुरुवार, 22 जनवरी 2015

भारत पर श्रीलंका चुनाव में राजपक्षे को हराने के लिए काम करने का आरोप

अवधेश कुमार

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दक्षिण एशिया को आपसी विश्वास और साझेदारी के व्यावहारिक क्षेत्र में बदलने की पहल कर रहे हैं, पर कुछ शक्तियां पहले के अनुसार ही अपने राजनीतिक हितों के लिए इस पर आघात पहुंचाने की कोशिश कर रहीं हैं। इस बार ऐसी कोशिशों की गंध हमारे पड़ोसी श्रीलंका से आई है। वहां यह अफवाह फैलाई जा रही है कि पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की हार के लिए भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने कोशिश की थी। यानी यदि रॉ हराने में नहीं लगता तो राजपक्षे तीसरी बार सत्ता में आ जाते। 8 जनवरी को श्रीलंका में हुए मतदान में तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे चुनाव हार गए थे और उनके ही पूर्व सहयोगी तथा विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार मैत्रीपाल श्रीसेना ने विजय पाई। हालांकि यह आरोप राजपक्षे या उनके भाइयों ने नहीं लगाया है, लेकिन वहां यह बात तेजी से फैल रही है और मीडिया इसे उठा रहा है। वहां के अखबार इसे उठा रहे हैं। एक अखबार लिख रहा है कि रॉ का वह अधिकारी विपक्षी नेताओं से संपर्क में था। सामचार पत्रों में रॉ के प्रमुख तक के रानिल विक्रमसिंघे एवं पूर्व राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमारतुंगे से संपर्क में होने की बात लिख दी है।

इस मामले में आगे बढ़ें उसके पहले यह जान लेना आवश्यक है कि श्रीलंका में भारतीय उच्चायोग के साथ पक्ष एवं विपक्ष के नेता लगातार संपर्क में रहे हैं, आते जाते हैं। तमिलों की संख्या वहां काफी है, उनका भारत के तमिलनाडु में सीधा रिश्ता है। श्रीलंका के विकास में भारत का धन लगता है। इस समय तो राजपक्षे द्वारा लिट्टे को नेस्तनाबूद करने के बाद तमिल क्षेत्रों में हुए विनाश में भारत पुनर्वास अभियान में मुख्य भूमिका निभा रहा है। तमिल नेता वहां आते हैं और अपनी शिकायते करते हैं। यानी वहां उच्चायोग की सक्रियता एक आम स्थिति है। भारत की नीति किसी भी पड़ोसी देश की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने की नहीं है, पर नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देशों में स्थिति अपने आप थोड़ी भिन्न होती है। यह एक स्वाभाविक स्थिति है। स्वयं राजपक्षे के काल में भी यही स्थिति थी। उनके मंत्री, अधिकारी भारतीय उच्चायोग से लगातार संपर्क में रहते थे। तमिल समस्या को लेकर हमारे नेता व अधिकारी उनसे बातचीत करते रहते थे। इससे भारत के लिए अलग करना संभव न था, न है। यह होगा। इसका असर अगर वहां के चुनाव पर पड़ता है तो इसे किसी प्रकार की साजिश नहीं कहा जा सकता। सिंहलियों से किसी प्रकार का मतभेद रखे बिना तमिल हितों के लिए खड़ा होना भारत का दायित्व है। इसका यह अर्थ नहीं कि भारत के अधिकारी वहां किसी को जीताने और हराने के खेल में पड़ जाएं।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अकबरुद्दीन ने इस आरोप का खंडन कर दिया है। स्वयं महेन्द्रा राजपक्षे ने कहा है कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं। अगर जानकारी होगी तभी वे कुछ बोलेंगे। वहां अफवाह इतना गहरा है कि हाल में श्रीलंका के कोलंबों स्थित दूतावास में तैनात एक अधिकारी के तबादले के बारे में कहा जा रहा है कि वह दरअसल, रॉ का अधिकारी था तथा चुनाव में उसकी भूमिका का खुलासा होने के बाद उसे निर्वासित कर दिया गया है।  हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कह दिया है कि तबादले होते रहते हैं। चूंकि उस अधिकारी का तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा हो गया था, इसलिए उनका तबादला किया गया है। हमारे लिए यही कथन सच है। जो यह आरोप लगा रहे हैं उनने अपना जो स्रोत बताया है उसका कोई अर्थ नहीं है। अगर रॉ की भूमिका थी तो यह बात राजपक्षे की पार्टी कह सकती थी।
यह बात ठीक है कि लिट्टे के खिलाफ नृशंस सैन्य कार्रवाई के कारण भारत में राजपक्षे के खिलाफ वातावरण था। खासकर तमिलों के बीच। वे भारत के साथ अच्छे संबंधों की बात करते रहे और भारत के सुझावों की अनदेखी भी। वे बार-बार कहते थे कि वी. प्रभाकरन को पकड़कर भारत को सौंप देंगे। ध्यान रखिए प्रभाकरन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या का मुख्य अभियुक्त था। हालांकि उनके सेनाओं ने निर्दयता से प्रभाकरन एवं उसके पुत्र आदि की हत्या कर दी। बाद में उन्हांेने भारत का विश्वास जीतने की कोशिश की, पर कुल मिलाकर यह साफ था कि भारत को दक्षिण एशिया का स्वाभाविक नेता कहते हुए भी वे विकल्प के लिए चीन के करीब जाते रहे। 2010 में चीन श्रीलंका का सबसे बड़ा वित्तीय साझेदार हो गया। इस समय वह हर साल 61 अरब रुपये से ज्यादा की सैन्य सामग्रियां श्रीलंका को आपूर्ति करता है। श्रीलंका की वायु सैनिक क्षमता के उत्थान में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वह श्रीलंका मेरीटाइम परियोजना में काम करने लगा है जिससे चीनी कंपनियां आसानी से श्रीलंका पहुंच सकेंगी। यह सब राजपक्षे के शासनकाल में ही हुआ। यह हमारे लिए चिंता का कारण है। श्रीलंका के अंदर भारत विरोधियों का इसे समर्थन था। उनके हारने के बाद ऐसा लग रहा है कि भारत की भूमिका वहां अब पहले के अनुसार ज्यादा होगी।   
हालांकि स्वयं श्रीलंका के एक बड़े वर्ग में भी चीन से ज्यादा निकटता को अच्छा नहीं माना। उनकी इस नीति का खुलेआम विरोध भी हुआ। जब पिछले वर्ष राजपक्षे ने दो चीनी पनडुब्बियों को अपने तट पर रुकने दिया तो केवल भारत ही नहीं दुनिया की महत्वपूर्ण शक्तियों के भी कान खड़े हुए। अमेरिका े भी इससे सशंकित हुआ और भारत के लिए तो यह आघात जैसा था। चीन हिन्द महासागर में अपनी सैन्य ताकत बढ़ाना चाहता है, इसलिए वह लगतार सक्रिय है। भारत के लिए चिंता का कारण वहां केवल चीनी पनडुब्बियों का रुकना नहीं था। राजपक्षे ने इस घटना के बारे में भारत को पहले से सूचित तक करने की औपचारिकता पूरी नहीं की, जबकि श्रीलंका की भारत के साथ इस संबंध में स्पष्ट संधि है। तो भारत उनको कैसे अनुकूल मान लेता। परंतु इन सबके आधार पर यह आरोप लगाना कि भारत ने अपनी विदेश खुफिया एजेंसी के माध्यम से राजपक्षे को हराने की साजिश की नासमझी से अधिक कुछ नहीं है। राजपक्षे मोदी के साथ बेहतर संबंध की कोशिश कर रहे थे और मोदी ने भी उनको अनुकूल प्रत्युत्तर दिया था।
इस प्रकार के दुष्प्रचार के कुछ स्पष्ट संकेत हैं। यह संभावना बलवती हो रही है कि नए राष्ट्रपति श्रीसेना का भारत के प्रति विशेष लगाव हो सकता है। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत का ही चयन किया है। यह एक महत्वपूर्ण संकेत है और इससे लगता है कि भारत श्रीलंका संबंधों पर एक साथ कई प्रकार की जो काई जम गई थी, वो सब धीरे-धीरे हटेगी। हालांकि जो भारत विरोधी इस प्रकार की खबरें उड़ा सकते हैं, वे आगे भी कुछ दुष्प्रचार करेंगे। यह इसका एक महत्वपूर्ण संकेत है। इस अफवाह का अर्थ ही है कि भारत को बदनाम करो ताकि जनता का एक वर्ग उसके खिलाफ हो। हो सकता है इसके पीछे चीनी लौबी का भी हाथ हो। आखिर भारत ने भी तो श्रीलंका, मालदीव, नेपाल, भूटान में चीन की पैठ के बाद उसके क्षेत्रों में अपने संबंध प्रगाढ़ करने आरंभ किए। दक्षिण चीन सागर में तेल गैस खोज का ठेका लेकर चीन को भारत ने संकेत भी दिया। किंतु भारत के लिए यह विचराणीय है कि इन चारों देशों में ऐसे तत्व हैं जो भारत की भूमिका को हमेशा संदेहों के घेरे में लाते हैं, इसके विरुद्ध वातावरण बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं, पर वे चीन के विरुद्ध ऐसा नहीं करते। वर्तमान आरोप प्रसंग का निष्कर्ष यही है कि श्रीलंका में इसी प्रकार भारत विरोधी वातावरण बनाने की कोशिश तेज होगी। वे ये भी नहीं चाहेंगे कि भारत तमिलों के मामले में वहां किसी प्रकार का हस्तक्षेप करे।  
इसका सामना हम कैसे करेंगे इसकी रणनीति विदेश मंत्रालय को अभी से बनानी होगी। कारण, भारत श्रीलंका के आंतरिक मामले से अपने को अलग नहीं रख सकता। अगर तमिलों की समस्या नहीं सुलझीं, उनको अपने क्षेत्रों में जितनी वाजिब स्वायत्तता चाहिए नहीं मिली, उनका उचित पुनर्वसन नहीं हुआ, उनको सिंहलियों के समान सभी अधिकार व्यवहार में नहीं मिले तो वहां अशांति कायम होगी और इससे भारत प्रभावित होगा। यह मानने में कोई समस्या नहीं है कि भारत के खिलाफ प्रचार करने वालों में तमिलों से विद्वेष रखने वाले सिंहली समुदाय के कुंठित समूह शामिल होंगे।
अवधेश कुमार, ई: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर: 01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

साक्षी महाराज के वक्तव्य के दूसरे पहलू भी देखे

अवधेश कुमार

जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने साक्षी महाराज को नोटिस थमा दिया तो उन्हें दोषी मान लेने में दूसरों को क्या समस्या हो सकती है। नोटिस थमाने का अर्थ ही है कि आप उन्हें दोषी मानते हैं। बेचारे साक्षी महाराज पता नहीं चार बच्चे पैदा करने की सलाह वाले भाषण पर पश्चाताप कर रहे होंगे या अंदर से गुस्से में होंगे। निस्संदेह, कुछ लोगों को यह कदम अच्छा लग सकता है तो कुछ कह सकते हैं कि भाजपा केवल दिखावे के लिए ऐसा कर रही है। पता नहीं भाजपा अध्यक्ष ने यह कदम दिल से उठाया है या फिर मीडिया एवं विपक्ष के हल्लबोल दबाव के कारण। पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांसदों और नेताओं से संभल कर बोलने, अपनी वाणी पर संयम रखने की अपील की है और अगर कोईइसका अनुसरण नहीं करेंगे तो पार्टी उनके खिलाफ कदम उठाएगी।

चलिए, यहां तक मान लेते हैं कि मोदी एवं अमित शाह नेताओं को वाणी संयम बरतने के निर्देश के प्रति सख्ती का संदेश देना चाहते है। किंतु जरा इसे दूसरे नजरिये से समझने की भी कोंिशश करिए। इसके कई पहलू हैं। कई बार मीडिया में कोई बयान जितना सनसनीखेज दिखाई या सुनाई देता और वह हमारे आपके मस्तिष्क पर तत्काल जैसा असर डालता है केवल वही सच नहीं होता। यहां विषय साक्षी महाराज नहीं है। जिस तरह उन्होंने नाथूराम गोडसे का महिमामंडन किया उसे कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता। पर क्या लोकतंत्र में एक व्यक्ति को इतना भी कहने का अधिकार नहीं है कि उसकी चाहत है प्रत्येक दंपत्ति चार बच्चे पैदा करें? यह कौन सा अपराध हो गया? यह इसका पहला पहलू है। आखिर इसंमें ऐसा क्या है जिससे भाजपा की छवि खराब हो जाएगी? इसे वाणी संयम के विपरीत वक्तव्य किस आधार पर कहा जा सकता है? कोई भी व्यक्ति साक्षी महाराज या साध्वी प्राची के कहने से तो चार बच्चे पैदा करने नहीं लगेगा।

तत्काल साक्षी महाराज को कुछ समय के लिए अलग कर दीजिए और  फिर इसके एक और महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान दीजिए। एक समय था जब जनसंख्या नियंत्रण पूरी दुनिया की प्राथमिकता थी। पर धीरे-धीरे समाजशास्त्रियों एवं अर्थशास्त्रियों के वर्ग ने ही इसे नकारना आरंभ कर दिया। माल्थस की आबादी विस्फोट के सिद्धांत नकार दिए गए हैं। जनसंख्या नियंत्रण की बाध्यकारी नीति दुनिया में गलत साबित हो रही है। इसी कारण विकसित माने जाने वाले देश बुढ़ों के देश हो गए, उन्हें आर्थिक विकास के काम भारत चीन जैसे देशों के युवाओं से करवाना पड़ रहा है। अब कई देशों में दंपत्तियों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। आज भारत और चीन जैसे देशों को भविष्य की महाशक्ति कहा जा रहा है तो उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हमारे पास युवा आबादी विश्व में सबसे ज्यादा है। युवा आबादी का अर्थ उत्साह से काम करने वाला समुदाय। कहा जा रहा है कि आने वाले समय में चीन की युवा आबादी हमसे कम हो जाएगी और 2035 के बाद भारत सर्वोपरि होगा। यदि परिवार नियंत्रण की बाध्यकारी नीति हमारे पूर्वजों ने स्वीकार की होती तो यह स्थिति होती? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार कहते हैं कि हम 125 करोड़ के देश हैं, यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है, इतनी आबादी वाले देश को दुनिया में सिर उठाकर जीना चाहिए, आंख में आंख मिलाकर बातें करनी चाहिए। अगर आबादी इतनी नहीं होती तो वे क्या बोलते? यह प्रश्न भाजपा नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए।

जिस बढ़ती आबादी को एक समय भार माना जाता था वह संसाधन है जिसे अब विश्व स्वीकार कर रहा है। समस्या हमारी है कि हमने प्रकृति का अनावश्यक दोहन करके उसे बरबाद किया है, जीवन शैली ऐसी अपना ली है जिसमें प्राथमिकतायें बदल र्गइं हैं, इसलिए भय लगता है कि पता नहीं एक दो से ज्यादा बच्चे होंगे तो उनका लालन पालन कैसे करेंगे। इससे पश्चिम देशों के लिए सामाजिक सांस्कृतिक समस्यायं बढ़ीं। उनके यहां परिवार प्रथा का, समाज की सामूहिकता का लगभग अंत हो गया। यह ऐसा संकट है जिससे उबरने के लिए सारे विकसित देश छटपटा रहे हैं। यही स्थिति हमारे यहां भी हो रही है। आज एक बच्चे को भी क्रेच में डालना पड़ रहा है, क्योंकि माता-पिता के पास उसे देने के लिए समय ही नहीं है। तो यह वर्तमान जीवन प्रणाली का दोष है। हमारा देश भी उन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन का शिकार हो रहा है जिसने पश्चिम को गिरफ्त में काफी पहले ले लिया। इससे बचने का रास्ता एक ही है कि परिवार नियंत्रण की बाध्यकारी सोच से बाहर आएं।

आप कहीं भी देख लीजिए,  एक बच्चा या एक बेटा बेटी पैदा करने वाले परिवार कई प्रकार के संकट का सामना करते हैं। बेटी शादी के बाद ससुराल चली गई, बेटा परिवार लेकर बाहर चला गया, मां बाप अकेले जीवन काटने को विवश। अगर बेटा संवेदनशील है तो उन्हें साथ रखा पर इससे उनका अपना समाज छूट गया। परिवार और समाज दोनों का विघटन सामान्य सांस्कृतिक-सामाजिक संकट नहीं है। मेरे सामने ऐसे लोग आते हैं जो बताते हैं कि ऐसा करके मैने गलती की, क्योंकि मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं रह गया है। किसी का बेटा विदेश चला गया और वे अकेले। शहरों में अपराधी तत्व ऐसे परिवारों को निशाना बनाते हैं। बुजूर्गों की हत्यायें हो रहीं हैं। गांवों में ऐसे लोग स्वार्थी तत्वों के निशाने पर होते हैं। उन्हें किसी का सहयोग चाहिए होता है और सहयोग के नाम पर उनका दोहन आम बात है। यदि कोई अकेले भाई है और उसे कुछ हो गया तो उसका परिवार निराश्रित। यदि उसकी पत्नी मर गई तो अकेले उसका जीवन अवसादग्रस्त। अगर दो तीन भाई बहन हैं तो पत्नी चल बसी तो भी बच्चों को बहुत समस्या नहीं। स्वयं उनको भी अनेक मायनों मेें अकेलापन नहीं। अगर वह स्वयं गुजर गया, या उसे कुछ हो गया और परिवार संयुक्त है तो भी उसके बच्चों के लिए ज्यादा समस्या नहीं। वह परिवार का सदस्य है और उसी अनुसार उसका पालन पोषण होता है।
ऐसे और भी पहलू हैं जिनके आधार पर यह साबित होता है कि एक या दो बच्चों की परिवार सीमित रखने की सोच ज्यादातर मायनों में घातक हैं। हम यह नहंीं कहना चाहते कि आप बच्चा पैदा करने की होड़ में पड़ जाइए। लेकिन नियंत्रण की अतिवादी सोच आत्मघाती है। साक्षी महाराज, साध्वी प्राची या संघ परिवार के दूसरे नेताओं के ऐसे वक्तव्यों में सांप्रदायिकता का एक दृष्टिकोण हो सकता है। वे मानते हैं कि मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है और हमारी घट रही है तो एक दिन हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे। हालांकि यह सच है कि 1991 से 2011 तक हिन्दुओं की आबादी लगभग 20 प्रतिशत बढ़ी है जबकि मुसलमानों की आबादी 36 प्रतिशत। यह एक सच है। लेकिन इसके आधार पर आबादी बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा भी घातक साबित होगी। दुनिया जिस तरह जाने-अनजाने सांस्कृतिक या धर्मयुद्ध की ओर बढ़ा रही है और हम उसे सारी जुग्गत लगाकर रोकने में सफल नहीं हो रहे हैं उसमें अनेक विचारकों का मानना है कि आबादी की भूमिका महत्वपूर्ण होने वाली है।  
बहरहाल, ये सारे पहलू हैं और यह मानने का भी कोई कारण नहीं है कि साक्षी महाराज या साध्वी प्राची ने स्वयं ऐसा बोलते समय इतनी गहराई तक सोचा होगा। पर उस वक्तव्य को गलत नहीं कहा जा सकता। साक्षी ने यही कहा कि एक बच्चा हम संतों को दे दो ताकि वह धर्म की, समाज की, देश की सेवा करे, एक बच्चा सीमा की रक्षा में लगे और दो तुम्हारे पास रहे। सेना में जाना अपने वश में नहीं, लेकिन विचार प्रकट करने में क्या समस्या है? यह भी न भूलिए कि यदि आपका एक बच्चा है तो कतई आप उसे समाजसेवी, संस्ंकृतिकर्मी, संन्यासी नहीं बनने देना चाहेंगे। तो देश चलेगा कैसे? गृहस्थ या परिवार जीवन के साथ समाजसेवी, संन्यासी ....सभी समाज के संतुलन और नैतिक मार्गदर्शन के लिए चाहिएं।

भाजपा की दृष्टि से विचार करिए तो वह यह समझ नहीं पा रही कि जो लोग विरोध कर रहे हैं वे केवल विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं, उनके पीछे भी कोई गंभीरता नहीं है। भाजपा ने चाहे जिस मानसिकता से नोटिस जारी किया है, संकेत उसके खिलाफ जाएगा। उसके भारी समर्थकों में साधु संत आदि शामिल है और जिनकी भूमिका उनकी विजय में रही है। वे जिस विश्वास से उसकी ओर लौटे हैं वे उससे फिर से विमुख होना आरंभ करेंगे। यानी यह राजनीतिक दृष्टि से भी उसके लिए आत्मक्षति का कारण बन सकता है।

अवधेश कुमार, ई: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर. : 01122483408, 09811027208

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