शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक टकराव

अवधेश कुमार

कोई भी महसूस कर सकता है कि पश्चिम बंगाल ममता बनर्जी एवं भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव का एक नया और सबसे बड़ा मोर्चा बन गया है। संसद में हमने देखा कि किस तरह तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने सहारा की कथित लाल डायरी का मामला उछालकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति अपनाई। यह एक दिन पहले कोलकाता रैली में अमित शाह द्वारा ममता बनर्जी पर किए गए हमले और पश्चिम बंगाल को तृणमूल कांग्रेस मुक्त करने की घोषणा के बाद आया है। मामला कहां तक पहुंच गया है इसका प्रमाण है ममता द्वारा प्रधानमंत्री की आदर्श ग्राम योजना से अपने सांसदों को हटने का निर्देश। अब तृणमूल के सांसद एक भी गांव गोद नहीं लेंगे। दोनों पार्टियों का जैसा तेवर है और हमने ममता बनर्जी का जो राजनीतिक आचरण आज तक देखा है उसमें इस संघर्ष का आगे और उग्र और आक्रामक होना निश्चित है। हमने दोनों पार्टियों के बीच हिसंक टकराव देख रहे हैं, लोगों को मरते और घायल होते भी देख रहे हैं। जाहिर है, यदि टकराव इस दिशा में बढ़ता है तो राजनीति और स्वयं पश्चिम बंगाल के लिए काफी चिंताजनक स्थिति होगी।

हालांकि ममता बनर्जी को इस संघर्ष में ज्यादातर भाजपा विरोधी पार्टियों का समर्थन नहीं मिला है। इसका कारण साफ है। इस समय उन्होंने सारधा चीट फंड घोटाले में पार्टी नेताओं की गिरफ्तारी एवं उनके घर छापेमारी को लेकर अपना तेवर कड़ा किया है। इस मामले में वो जिस सीमा तक चलीं गईं वह राजनीति के किसी मापदंड के तहत नहीं आता। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, पर बगैर ठोस कारण के किसी नेता की रैली पर आप कैसे रोक लगा सकते हैं? ममता बनर्जी ने अमित शाह की प्रस्तावित रैली को प्रतिबंधित कर दिया। जिस ढंग से ममता रैली न होेने देने पर अड़ गईं थीं वह लोकतंत्र के किसी दायरे में नहीं आता था। जिस वामपंथी शासन को ममता लोकतंत्र विरोधी, फासीवादी, विरोधियों का दमन करने वाला करार देतीं थीं खुद उनका व्यवहार उसी तरह का हो गया। हालांकि वामपंथी सरकार ने अनावश्यक कभी किसी की रैली प्रतिबंधित करने का कदम नहीं उठाया। आप रैली के समानांतर रैली से उसका उत्तर दीजिए, लेकिन बिना किसी कारण के आप किसी नेता की सभा को कैसे रोक सकते हैं?

कोलकाता के विक्टोरिया हाउस के सामने अमित शाह की रैली आयोजित हो या न हो यह राज्य में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक संघर्ष का विषय हो गया था। भाजपा स्प्लैनेड स्क्वेयर में शाह की रैली करना चाहती थी, उसी अनुसार तैयारी कर रही थी, किंतु कोलकाता पुलिस और फिर सिटी कॉर्पाेरेशन ने इजाजत नहीं दी। कोलकाता पुलिस का कहना था कि विक्टोरिया हाउस हैवी ट्रैफिक वाली जगह है, ऐसे में रैली की इजाजत देने से लोगों को परेशानी होगी। मजे की बात देखिए कि तृणमूल कांग्रेस 21 जुलाई को ठीक इसी जगह पर पार्टी कार्यकर्ताओं की सालाना सभा का आयोजन कर चुकी थी। साफ है कि यह एक अहंकारी और अलोकतांत्रिक ज़िद थी। अंततः न्यायालय ने ममता को पीछे हटने को मजबूर कर दिया। कोलकाता उच्च न्यायालय ने ममता सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए भाजपा को विस्टोरिया हाउस के सामने स्प्लैनेड स्क्वेयर में अमित शाह की रैली की सशर्त अनुमति दे दी। सरकार द्वारा सांप्रदायिक तनाव भड़काने सहित कई प्रकार की साजिश की आशंका के जवाब में उच्च न्यायायलय ने कहा कि ठीक है हम  रैली पर नजर रखने के लिए 3 सदस्यीय टीम बना देते हैं और बना दिया।

यहां प्रश्न भाजपा का नहीं था। आप किसी पार्टी को पसंद न करें, या आपका उससे विरोध है, इसलिए उसे प्रचार प्रसार की अनुमति नहीं देंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा? अगर ममता बनर्जी को लगता है कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार सीबीआई को हथियार बनाकर उनके नेताओं को निशाना बन रही है तो इसके लिए राजनीतिक एवं कानूनी दोनों स्तरों पर संघर्ष के रास्ते हैं। वास्तव में सारधा चीट फंड घोटाले में उनके सांसदों के खिलाफ जैसे-जैसे सीबीआई का ंिशकंजा कसा है ममता का तेवर उग्र हुआ है। उन्होंने सड़कों पर उतरकर स्वयं मार्च किया और धर्मतल्ला में सभा को संबोधित किया। हालांकि शारधा चीटफंड घोटाले की जांच की आग उड़ीसा से लेकर असम तक पहुंच चुकी है। उड़ीसा में नवीन पटनायक के करीबी नेता भी इसकी जद में आ गए हैं, पर पटनायक ने ऐसा रवैया नहीं आया। कांग्रेस में नरसिंह राव सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे असम निवासी मतंग सिंह एवं उनकी पूर्व पत्नी मनोरंजना सिंह से भी पूछताछ हुई है। कांग्रेस ने ऐसा तेवर नहीं अपनाया जैसा ममता ने अपनाया है। ममता कह रहीं हैं कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल कर रही है। हमारे नेताओं और सांसदों पर फर्जी आरोप लगाए जा रहे हैं। ताकत की यह लड़ाई नहीं थमी तो तृणमूल दिल्ली तक जाएगी और वहां प्रदर्शन करेगी। सीबीआई की जांच उच्चतम न्यायायल की मौनिटरिंग मंें चल रही है। ममता को अगर समस्या है तो न्यायालय में जाना चाहिए। वे भाजपा के खिलाफ राजनीतिक अभियान भी चलायें, लेकिन वे उसी तरह भाजपा पर टूट पड़ीं हैं जैसे कभी वामदलों विशेषकर माकपा पर टूटतीं थी। हालांकि इस मामले में उनको प्रदेश की किसी पार्टी का साथ नहीं मिलने वाला। माकपा का तो अधिकृत बयान है कि ममता सीबीआई जांच मंे बाधा डालने की कोशिश कर रहीं हैं।

उनके ही राज्यसभा सांसद कुणाल घोष, जो इस समय सारधा घोटाले में जेल में बंद हैं, ने जेल में आत्महत्या करने की कोशिश की एवं आत्महत्या नोट में ममता बनर्जी का नाम लिखा है। इसमें केन्द्र सरकार क्या कर सकती है? कुणाल ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर इसके असली दोषी को जेल में नहीं डाला गया तो वे आत्महत्या कर लेंगे और उनने ऐसा करने की कोशिश की। यह न केन्द्र सरकार ने करवाया न सीबीआई ने। इस भ्रष्टाचार के दाग ने ममता के सफेद चादर पर कालिमा जड़ दिया है। ममता की मूल शक्ति उनकी ईमानदारी और सादगी है। इस पर यदि प्रश्न खड़ा होता है तो उन्हंे गुस्सा आना स्वाभाविक है। पर वे क्यों भूल रहीं है कि यह घोटाला वर्तमान सरकार के आने के पूर्व सामने आया एवं जांच पहले से चल रही है। यह साफ हो गया कि लोगों का पैसा लेकर कंपनी ने गलत तरीके से खर्च किया, ऐसे चैनल चलाए गए एवं अखबार निकाले गए जिनसे वामपंथ के विरुद्ध एवं ममता बनर्जी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश हुई। कुणाल घोष को ममता ने इसी का इनाम सांसद बनाकर दिया। हां, इसमें ममता शामिल हैं, इस पर दो राय हो सकती है, लेकिन यदि आपके नेतृत्व में काम करने वाले ऐसा कर रहे थे, जिन्हें आप पुरस्कार दे रहीं है तो आप पर प्रश्न उठेगा। पर सीबीआई ने न तो उनसे पूछताछ की कोई बात की है न उनके खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई का संकेत ही दिया है। बावजूद ममता बनर्जी कह रहीं है कि हिम्मत हो तो मोदी सरकार व सीबीआइ मुझे गिरफ्तार करके दिखाए। क्यों? साफ है कि वो अपनी एवं पार्टी की गिरती छवि से परेशान हैं।

एक बड़ी वजह भाजपा का प्रदेश में उभार है। जिले जिले में पूर्व माकपा या दूसरी वामपंथी पार्टियों के सदस्य भाजपा में शामिल हो रहे हैं, कुुछ कांग्रेस के लोग भी आ रहे हैं और उनका टकराव तृणमूल से उसी तरह हो रहा है जैसे कभी वामदलों विशेषकर माकपा के साथ तृणमूल का होता था। हालांकि यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नये दौर की शुरुआत है जिसे हम अपने नजरिये से विश्लेषित कर सकते हैं। किंतु यह सच है कि भाजपा तृणमूल के समानांतर एक बड़ी ताकत के रुप में उभर रही है। अमित शाह की रैली में उमड़ी भीड़ इसका प्रमाण था। भाजपा आज माकपा का स्थानापन्न कर रही है तथा दोनों पार्टियों में हिसंक टकराव बढ़ रहा है। इस स्थिति का जितनी जल्दी अतं हो उतना ही अच्छा। ममता मुख्यमंत्री के नाते यह समझें कि राजनीतिक विरोध एवं निरंकुश निर्णय में अंतर होता है। वो भाजपा से वैचारिक स्तर पर लड़ें यह उनका अधिकार है। उसी तरह भाजपा को भी उनके खिलाफ अहिंसक संघर्ष का अधिकार है। सारधा घोटाला हुआ है तो उसकी जांच होगी और जो चपेटे में आयेंगे उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। इसका निदान उच्चतम न्यायालय कर सकता है, न कि हम किसी की सभा को रोकें ......उसको अनावश्यक चुनौतीं दें।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

उच्चतम न्यायालय द्वारा 2 जी मामले से रंजीत सिन्हा को हटाना

अवधेश कुमार

आजाद भारत में इसके पूर्व ऐसा कभी नहीं हुआ जब उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई के निदेशक को कहा हो कि आपको किसी भ्रष्टाचार के जांच से अपने को अलग करना होगा। इसलिए यह असाधारण आदेश है। जरा सोचिए, 2 जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच सीबीआई ने की और उच्चतम न्यायालय में वही आरोपियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रही है। अगर उच्चतम न्यायालय ने कह दिया है कि सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा 2जी केस की जांच से खुद को अलग कर लें, इस मामले में दखल न दें तो यह केवल रंजीत सिन्हा नहीं समूचे संगठन की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने संगठन के ही किसी वरिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति इस मामले में करने का आदेश दिया है जो सीबीआई निदेशक की भूमिका का निर्वहन कर सके। इसका अर्थ यह है कि उसने सीबीआई संस्था में अभी उस तरह अविश्वास व्यक्त नहीं किया है जिस तरह संप्रग सरकार के कार्यकाल में यह कहते हुए व्यक्त किया था कि यह सरकार का तोता बन गया है। यह गुलाम है और इसे मुक्त कराना होगा। बावजूद इसके यह हमें कई पहलुओं पर विचार करने को मजबूर करता है।
वैसे यह मानना उचित नहीं होगा कि केवल वकील प्रशांत भूषण द्वारा उच्चतम न्यायालय में उनकी विजिटिंग डायरी की प्रतिलिपि प्रस्तुत करने के कारण ऐसा हुआ है। निस्संदेह, आधार वही बना जिसमें रंजीत सिन्हा से मिलने वालों की सूची में 2 जी के आरोपियों के नाम और हस्ताक्षर मौजूद हैं। पूरा मामला वहीं से आरंभ हुआ और उच्चतम न्यायालय के सामने प्रश्न यह आया कि 2 जी मामले की जांच मेें रंजीत सिन्हा को रखा जाए या इससे उन्हें अलग कर दिया जाए। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि उच्चतम न्यायालय ने सिन्हा को जांच से अलग करने के आदेश के पीछे की वजह नहीं बताई है। उसनेे कहा है कि इस बारे में विस्तृत फैसला नहीं दिया जा रहा क्योंकि उससे एजेंसी की छवि प्रभावित होगी। ध्यान रखने की बात यह भी है कि सरकारी वकील आनंद ग्रोवर ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा 2जी मामले में जिस तरह हस्तक्षेप कर रहे हैं उसेे मान लिया जाता है तो 2जी मामला खत्म हो सकता है। यानी सरकार भी निदेशक के रवैये के विरुद्ध गई है।  
सरकार ने ऐसा क्यों कहा इसके कई उत्तर हो सकते हैं। मसलन, 2 जी के आरोपी यदि सीबीआई निदेशक के घर पर मिलने जाते रहे तो इससे संदेह की जो स्थिति बनती है सरकार ने उससे स्वयं को अलग रखने की नीति अपनाई है। सरकार यदि उनके बचाव में आ जाती तो उस पर विपक्षी टूट पड़ता कि देखों ये भी 2 जी के आरोपियों को बचाना चाहते हैं। आखिर भाजपा ने 2 जी को संसद से लेकर बाहर तक जितना बड़ा मुद्दा बनाया था यह आचरण उसके विपरीत होता। उसके दबाव में ही संयुक्त संसदीय समिति बनी और इसके लिए संसद का दां सत्र गतिरोध की भेंट चढ़ गया था।  इसलिए नरेन्द्र मोदी सरकार पर यह दायित्व भी है कि उससे संबंधित जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी दिखे। भले उसके परिणाम जो आएं, पर उसकी ओर से ढिलाई का संकेत नहीं जाना चाहिए। सरकार ने केवल उनके साथ खड़े होने से ही अपने को अलग नहीं किया, उसने उनकी निष्पक्षता पर भी संदेह व्यक्त किया है। यह भी पहली बार है जब सरकार ने अपने सीबीआई निदेशक पर औपचारिक रुप से न्यायालय में संदेह व्यक्त किया है। तो क्या सरकार वाकई मानती है कि सीबीआई निदेशक 2 जी मामले को खत्म करने की दिशा में काम कर रहे थे? जब रणजीत सिन्हा की सीबीआई निदेशक के तौर पर नियुक्ति हुई थी तब भी भाजपा ने काफी विरोध किया था। संप्रग सरकार ने कलेजियम प्रणाली के अमल में आने के पूर्व ही केन्द्रीय सतर्कता आयोग की अनुशंसा को दरकिनार कर रंजीत सिन्हा को नियुक्त कर दिया था। उसका कहना था कि सीबीआई को इतने दिनों तक बिना निदेशक के नहीं रखा जा सकता है।
हालांकि निदेशक रंजीत सिन्हा के पक्ष में यह बात जाती है कि अगर उन्हें कुछ छिपाना होता तो मिलने वालों का नाम रजिस्टर में अंकित किए बगैर घर बुला सकते थे। वे गोपनीय तरीके से कहीं मिल सकते थे। वास्तव में किसी से मिलने मात्र से उसे दोषी या संदिग्ध नहीं माना जा सकता। पर न्यायालय में उन्होंने अपना पक्ष रखा था। जाहिर है, न्यायालय ने उसे स्वीकार नहीं किया है। यह उच्चतम न्यायालय के मख्य न्यायाधीश की पीठ का फैसला और मंतव्य है। बिना गहराई में गए ऐसा फैसला उच्चतम न्यायालय की पीठ वैसे भी नहीं दे सकती। उसे पता है कि इससे एक व्यक्ति के पूरे जीवन भर का कार्य कालिमा से भर जाएगा।
वैसे रंजीत सिन्हा का कार्यकाल 2 दिसंबर तक ही शेष है। इसलिए वे छुट्टी पर जायें या त्यागपत्र दें इससे बड़ा मुद्दा स्वयं सीबीआई संस्था का है। इतना साफ है कि सीबीआई के अंदर भयंकर गुटबंदी चल रही है। यह व्यक्तियों को लेकर भी है और मामलों को लेकर भी। रंजीत सिन्हा के वकील विकास सिंह ने न्यायालय में कहा था कि जांच एजेंसी के डीआईजी स्तर के अधिकारी संतोष रस्तोगी ने प्रशांत भूषण को दस्तावेज मुहैया कराए थे और  सीबीआई में वही भेदिया हैं। इस पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कोई सबूत हो तभी सिन्हा आरोप लगाएं, अन्यथा नहीं। जरा उच्चतम न्यायलय की इस टिप्पणी पर गौर कीजिए, ‘आपको सीबीआई अधिकारी का नाम घर के भेदी के तौर पर नहीं लेना चाहिए था। उस अधिकारी की सेवा पर कोई दाग लगाने की अनुमति नहीं होगी और हम इस मामले पर विचार करेंगे।’ न्यायालय ने आगे टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि सब ठीक नहीं है और इसे अलग से देखना होगा।
इससे साफ है कि सीबीआई के अंदर गुटबंदी अब उच्चतम न्यायालय के सज्ञान मेें है। इस पर वह आगे क्या कार्रवाई करती है देखना होगा। हालांकि सीबीआई के अंदर रंजीत सिन्हा के समर्थकों की संख्या भी बहुत बड़ी है। तभी तो सुनवाई के दिन काफी संख्या में सीबीआई के अधिकारी न्यायालय मेें मौजूद थे। उच्चतम न्यायालय ने उनको फटकार लगाते हुए कहा कि आप यहां से जाएं व कार्यालय में अपना काम करें। यह उच्चतम न्यायालय ही है जिसकी तीखी टिप्पणियों और निर्देशों के बाद पिछली सरकार ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति से लेकर उसके वित्तीय अधिकार यानी स्वायत्तता की दिशा में बड़े कदम उठाए थे। शायद इसके बाद सीबीआई के अंदर की गुटबाजी पर भी वह कोई निर्देश दे। यह सोचने वाली बात है कि अगर देश की शीर्ष जांच एजेंसी में ही इस तरह की स्थिति है तो इसका असर निश्चय ही मामलों की जांच पर पड़ता होगा। यह तो साफ है कि वर्तमान निदेशक के रवैये से नाखुश लोगों ने उनके खिलाफ काम किया है। बिना अंदर के किसी व्यक्ति के विजिटिंग रजिस्टर की कॉपी मिल ही नहीं सकती। पर अगर निदेशक महोदय उन आरोपियों से घर पर मिलते ही नही तो फिर यह तथ्य किसी के हाथ आता तो कैसे?
तो कुल मिलाकर निष्कर्ष चिंताजनक है। भले रंजीत सिन्हा अब काम पर वापस न आएं लेकिन इस संस्था की जो स्थिति है उसे दुरुस्त किये जाने की आवश्यकता है। पिछले तीन वर्षों में सीबीआई के अधिकारियों के भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के प्रमाण देखे हैं। आईबी और सीबीआई के बीच आतंकवादी की सूचना पर द्वंद्व देखा है। अब इसके अंदर भयानक गुटबंदी की बात भी साबित हो चुकी है। इस स्थिति का हर हाल में अंत करना होगा। यह केवल न्यायालय की नहीं, सरकार की भी जिम्मेवारी है कि एक बार इसका विरेचन कर सम्पूर्ण रुप से स्वच्छ बनाए। इसमें प्रतिनियुक्ति वैसे ही अधिकारियों की हो, जिनका चरित्र और कार्य शत-प्रतिशत संदेहों से परे रहा है। ऐसा करने के पहले यह जानना भी आवश्यक हो गया है कि आखिर प्रशांत भूषण को विजिटिंग रजिस्टर मुहैया किसने कराया? न्यायालय चाहे तो इसे गुप्त रख सकती है, पर उस व्यक्ति से और भी कई जानकारियां सामने आ सकतीं है। उसका इरादा पता चल सकता है। यह भी संभव है कि 2 जी मामले के ही किसी दूसरे गुट ने उस पर नजर रखी और यह काम करा दिया हो। इसकी सम्पूर्ण सफाई करनी है तो फिर यह जानकारी भी चाहिए।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शनिवार, 22 नवंबर 2014

भारत के नजवागरण की हुंकार

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से घृणा और आत्यंतिक विरोध रखने वालों की हमारे देश में अब भी कमी नहीं है। वे उनके काम को निष्पक्ष नजरिये से देख नहीं सकते, अन्यथा विदेश की धरती से भारत गर्जना का जो कूटनीति में उन्होंने प्रखर अभियान चलाया है उससे भारतवंशी चाहे वह देश में हो या विदेश में उत्साहित और रोमांचित अनुभव कर रहा है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिडनी के ऑलफोंस अरीना में लोगों से यह पूछा कि क्या आपको विश्वास है कि भारत फिर से उठकर खड़ा होगा? मैं आपसे पूछ रहा हूं कि क्या यह देश फिर से उठेगा? क्या यह विश्व की सेवा कर पायेगा? क्या यह  विश्व को संकटों से मुक्त कर पाएगा? और अंदर उपस्थित 16 हजार तथा स्टेडियम के बाहर कम से कम 10 हजार भारतवंशियों ने जब हां में आवाज लगाई तो ऐसा लगा मानो भारत का नये सिरे से पुनर्जागरण हो रहा है। इसके बाद उन्होंने कहा कि सामान्य मानवी की बात ईश्वर की बात होती है तो होगा। उन्होंने यह कहा कि कोई कारण नहीं लगता कि हमारा देश पीछे रह जाएगा, नियति ने उसका आगे जाना तय कर लिया है तो उसमें जो आत्मविश्वास था वही सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाला है। इसके पहले किस प्रधानमंत्री ने विदेश की भूमि से इस प्रकार भारत को विश्व का रास्ता दिखाने वाले देश के रुप में खड़ा करने का संकल्प व्यक्त किया था?
28 सितंबर को मोदी ने अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर से ऐसे ही कहा कि आप सबके परिश्रम और योगदान की बदौलत भारत को विश्व गुरु बनना निश्चित है। 125 करोड़ भारतवासियों के कर्मों से अब भारत विश्व को रास्ता दिखाने वाला देश बनने की ओर बढ़ गया है और कोई ताकत इसे रोक नहीं सकती। कुछ लोग इसे भावुकता के प्रकटीकरण तक सीमित कर सकते हैं। कारण, उनकी नजर में भारत की वह कल्पना नहीं जो हमारे मनीषियों ने आजादी के पूर्व की थी या जैसा गुलामी के पूर्व इस राष्ट्र की सोच और शैली थी। आखिर प्रधानमंत्री ने विवेकानंद की ही बातों का तो उल्लेख किया। पहलेे उन्होेेंने स्वामी विवेकानंद को आजादी के 50 वर्ष पूर्व की आजाद होने की भविष्यवाणी का उल्लेख किया फिर उनके दूसरे सपने की चर्चा की। उनने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने दूसरा सपना देखा था। वह था कि मैं मेरे आंख के सामने भारत मां का वह रुप देख रहा हूं। फिर मेरी भारत माता विश्व गुरु के स्थान पर विराजमान होगी, वह विश्व की आशा आकांक्षा को पूरा करने वाला समक्ष देश बनेगा। मोदी ने अगर कहा कि जिस तरह उनकी 50 वर्ष पहले की भविष्यवाणी सही साबित हुई उसी तरह उनका यह सपना भी पूरा होगा तो यह विश्वास पैदा करने के लिए। उनके अनुसार मेरा स्वामी विवेकानंद के विश्वास पर महान आस्था है। असीम उर्जा से भरा हुआ मेर देश है। इसे कोई रोक नहीं सकता।’ यानी अगर विवेकानंद जी की एक भविष्यवाणी सही हुई तो दूसरी भी होगी। यह थीम उनका था। आप गांधी जी सहित जितने मनीषिेयों कीे आजादी के पूर्व या आजादी के तुरत बाद के वक्तव्यों को देख लीजिए, चाहे महर्षि अरविन्द हों, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद हो, यहां तक कि सुभाषचन्द्र बोस भी .....भारत की कल्पना एक ऐसे ही राष्ट्र के रुप में किया था जो अंततः पूरे विश्व के लिए आदर्श और प्रेरक देश बनेगा। आज मोदी वही बात दुनिया के प्रमुख देशों में जाकर कह रहे हैं, तो समूची दुनिया में भारतवासी उससे रोमांचित क्यों नहीं होंगे? और विश्व शक्तियों के अंदर भी इस कूटनीति की प्रतिध्वनि अपने तरीके से गंूजित हो रही है।
यह सच है कि अपने देश में भी राष्ट्रीय नेताओं से देशभक्ति से ओतप्रोत आलोड़ित करने वाले विचारों के लिए हमारे कान तरस गए थे। उसमें भी इतना आत्मविश्वास कि हम विश्व को रास्ता दिखाने वाले, विश्व की सेवा करने वाले बनेंगे ऐसा आज के हमारे नेता सोचते भी नही ंतो बोलेंगे कहां से। मोदी के इस बात का भी समर्थन करना होगा कि ये जो नजारा सिडनी में दिख रहा है ये पूरे हिन्दुस्तान को आंदोलित कर रहा है। छः महीने में अभी बहुत ठोस काम धरातल पर भले न दिखे पर माहौल, सोच, बदल रहा है। कह सकते हैं कि उनके भाषण के सारतत्व वही थे जो हमने न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर मंें सुना। तो इसमें समस्या क्या है? भारत के पुनर्जागरण के लिए, उसका आत्मविश्वास जगाने के लिए, इस अभियान को विदेश नीति का अभिन्न अंग बनाकर दुनिया भर में फैले भारतवंशियों को देश के साथ भावनात्मक व व्यवहारिक रुप से योगदान करने की तैयारी के रुप में जोड़ने का ही तो लक्ष्य है। वह जिस भाषण, जिस तथ्य और जिस तरीके से हासिल होगा वह अपनाया जाना चाहिए।
मोदी से कई बिन्दुओं पर, या उनकी राजनीतिक शैली से हमारा मतभेद हो सकता है, पर यह दायित्व वे बखूबी निभा रहे हैं। सिडनी और मेडिसन स्क्वायर दोनों जगह उन्होंने वहां रहने वाले भारतवंशियों के कर्म की, वहां भारत का और अपना सम्म्मान बढ़ाने की प्रशंसा की, अभिनंदन किया ...... इसके बाद उनसे अपनी जन्मभूमि भारत माता के लिए भी कुछ करने की अपील की। जब माहौल चुम्बकीय हो, संवेग को उफान पर पहुंचा दिया गया हो तो उसका असर भी होता है। सिडनी में जब उन्होंने स्वच्छता और शौचालय योजना की बात की तो वहां उपस्थित सबसे अपील किया कि आप जिस स्थिति में हैं, जहां से जिस गांव से आये हैं वहां आकर इस काम में हमारी मदद करिए मैं आपको निमंत्रण देता हूं तो उसका असर हुआ। लोग चैनलों पर कह रहे थे कि हम अपने गांव में करेंगे।
मोदी इन सबके लिए बड़े ही व्यवस्थित और सुचिंतित शब्दों और विचारों को क्रमबद्ध तरीके से पेश कर रहे हैं। मसलन, वे कहते हैं कि हम आजादी के लिए संघर्ष न कर सके, क्योंकि बाद में पैदा हुए तो हमको अपने जिम्मेवारी का अहसास तो होता है।  जरा उनके कथन देखिए,‘ हमें आजादी के संघर्ष में, हमें मां भारती के सम्मान और गौरव के लिए जेल की सलाखों के पीछे अपनी जवानी को खपाने का सौभाग्य नहीं मिला है। इसके लिए हमें कसक होनी चाहिए कि हम आजादी के जंग में नहीं थे। लेकिन हम आजादी के लिए बलिदान न दे सके तो आजादी देश के लिए जी तो सकते हैं। यानी जो करेंगेे करेंगे देश के लिए। यदि यह भाव सवा सौ करोड़ भारतवासियों के दिल में पैदा हो गया तो फिर देश में क्या होगा!’ फिर वे भारत मंें विश्वास पैदा करते हैं। मसलन, विश्व लोकतांत्रिक शक्तियों को आज गौरव के भाव से देख्ता हैं और भारत के दिव्यद्रष्टाओं ने लोकतंत्र की मजबूत नींव डाली.......लोकतंत्र की ताकत देखिए..... अगर लोकतंत्र की उंचाई न होती तो क्या मैं यहां होता? भारत के लोकतंत्र की इस ताकत को हम पहचाने जहां सामान्य से सामान्य इन्सान भी अगर सच्ची निष्ठा के साथ देश के लिए जीना तय करता है तो देश भी उसके लिए जीना तय करता है। .....
क्या इससे देश की अंतःशक्ति में विश्वास पैदा नहीं होता? यकीनन हमारी व्यवस्था में दोष हैं, हम उसकी आलोचना करते हैं, करेंगे, उसे बदलने के लिए भी काम करेंगे, पर जहां तक मोदी का प्रश्न है इस व्यवस्था के तहत वे भारत को महिमामंडित करने की कल्पना करते हैं और इसे एक आंदोलन की तरह भारत और बाहर के भारतवंशियों के बीच ले जा रहे हैं तो इससे देश को लाभ ही होगा। हमारे देश की समस्या यह रही है कि हम अपने राष्ट्र लक्ष्य को भूल चुके हैं, और इस कारण हम सामूहिक तौर पर एक भटके हुए भ्रमित राष्ट्र हैं। इसलिए जो इस देश को करना चाहिए वह नहीं कर पा रहा है। जब इसे अपना लक्ष्य ही नहीं मालूम, दुनिया भर के भारतवंशियों को यही नहीं बताया गया कि आप क्या हैं और आपको भारतीय होने के नाते कैसी भूमिका निभानी है तो फिर सब दिशाहीन होकर अपने तरीके से जी रहे हैं। इसलिए जब वे कहते हैं कि भारत मां के पास 250 करोड़ भुजायें हैं और उसमें भी 200 करोड़ भुजाये ंतो 35 साल से कम आयु की है... हिन्दुस्तान नवजवान है... दुनिया में तेजी से दौड़ने वाले देश बुढ़े हैं और हमारी युवा आबादी एक मजबूत शक्ति है तो युवाओं को भी लगता है कि वाकई हम तो दुनिया से ज्यादा शक्तिशाली हैं। फिर क्यों न कुछ करा जाए। इसका वे यह कहकर विश्वास भी दिला देते हैं कि छः महीने में जो अनुभव मेरा आया है उसके आधार पर कह सकता हूं कि देश के सामान्य मानवी ने जो सपने देखे हैं उसका आशीर्वाद भारत मां दे रही है। वे जन धन योजना की सफलता का उदाहरण देकर समझाते देते हैं कि इन्हीं लोगों ने, इसी व्यवस्था के अंतर्गत यह करके दिखा दिया। यानी जो हम सोचते हैं वह संभव है। हम इसके गुण दोष में यहां नहीं जायें। आखिर यही तो एक नेता को करना है। नेता स्वयं सारा काम नहीं कर सकता, वह दिशा दे सकता है, प्रेरणा दे सकता है, विश्वास जगा सकता है, अपने तंत्र से काम कराकर उसे पुष्ट कर सकता है.....मोदी अपने तरीके से तमाम कमियों के बावजूद यही कर रहे हैं।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः11009, दूर.ः01122483408, 09811027208

शनिवार, 8 नवंबर 2014

दिल्ली की इस हालत के लिए कौन जिम्मेवार

अवधेश कुमार

उच्च्तम न्यायालय द्वारा 30 अक्टूबर को यह कहने के बाद कि अल्पमत सरकारें पहले भी बनी है, कुछ मिनट के लिए ऐसा लगा था मानों उप राज्यपाल नजीब जंग दिल्ली को चुनाव में पुनः ले जाने की बजाय संभवतः सरकार गठन की सोच से पार्टियों से बातें करें। हालांकि यहां पर राज्यपाल की भूमिका को लेकर संविधान मौन है। पर लोकतांत्रिक मूल्यों का एक तकाजा यह भी है कि अगर चुनाव हो चुका है, कोई एक सरकार मात्र 49 दिनों में त्यागपत्र देकर चली गई है तो पहले जितना संभव हो दूसरी सरकार गठन की पारदर्शी कोशिशें हों। चुनाव इस स्थिति में अंतिम विकल्प होना चाहिए। आम आदमी पार्टी त्यागपत्र देकर गई थी, कांग्रेस के पास केवल 8 विधायक थे। तो बचती थी भाजपा जिसके पास 29 विधायक बचे थे। जाहिर है, वह 70 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत से 7 की संख्या दूर थी। दो विधायकों का उसे समर्थन था। अगर वह तीनों उपचुनाव में विजीत हो जाती तो भी वह बहुमत की संख्या तक नहीं पहुंच सकती थी। ऐसे में उसने अपने हाथ खड़े कर दिए। लेकिन यहां कुछ प्रश्न अवश्य उठते हैं। मसलन, जब चुनाव में ही जाना था फिर इतनी देरी क्यों? क्या दिल्ली के उप राज्यपाल इसके लिए दोषी माने जाएंगे जैसा आप आरोप लगाती रही है? क्या केन्द्र सरकार ने जानबूझकर इतना समय खींचा? या फिर इसके परे कुछ बातें हैं? और सबसे बड़ा प्रश्न कि आखिर इस स्थिति का मुख्य दोष किसके सिर आएगा?
इनका उत्तर देने के पहले यह समझना ज्यादा जरुरी है कि अगर भाजपा ने सरकार बना लिया होता तो उसे बहुमत भी मिल जाता। कारण, ज्यादातर विधायक चुनाव नहीं चाहते थे। दिल्ली की राजनीति पर नजर रखने वाले जानते थे कि ऐसी कोशिशें हुईं और उसमें भाजपा को सफलता भी मिल गई थी। चार विधायक कांग्रेस के एवं 10 से ज्यादा विधायक आप के सरकार का समर्थन करने को तैयार थे। मंत्री पद पर बात नहीे बनी।  आप विधायकों के सामने सरेआम दल बदल कानून की तलवार लटक रही थी। इसका रास्ता यह निकाला गया कि वे त्यागपत्र दे देंगे एवं भाजपा उन्हें दोबारा लड़ाकर वापस ले आए। पर कुल मिलाकर भाजपा के नेताओं को यही लगा कि इससे उसकी छवि पर असर पड़ सकता है, इसलिए अंततः नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह ने सरकार बनाने के विकल्प को खारिज कर दिया। मान लेते हैं कि भाजपा ने सरकार बनाएं या न बनाएं के उहापोह में समय खंीचा, पर यह इसका एक पहलू है।
वस्तुतः इस पूरी स्थिति को आप गहराई से विश्लेषित करेंगे तो आपको चुनाव के लिए आप की उत्कंठा का कारण समझ में आ जाएगा। आप की सबसे बड़ी चिंता अपने विधायकों को एक रखना था। अरविन्द केजरीवाल द्वारा निरर्थक त्यागपत्र को हीरोनमा इवेंट में बदलने की कोशिशों के आरंभिक कुछ दिनों तक तो सब कुछ ठीक रहा। आप ने अपनी इवेंट प्रबंधन कला से ऐसा माहौल बना दिया था मानो देश स्तर पर नरेन्द्र मोदी के मुकाबले वहीं खड़े हैं। पर समय के साथ पार्टी के अंदर नेतृत्व के ऐसे व्यवहार को लेकर विरोध, असंतोष एवं निराशा बढ़ने लगी। इसका परिणाम लोकसभा चुनाव के दौरान हुए कई उम्मीदवारों एवं नेताओं के विद्रोहों के रुप में सामने आया। लोकसभा चुनाव में पंजाब छोड़कर पूरे देश में मिली असफलताओं ने तो पार्टी की अंदर से चूलें हिला दीं।
इनमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं, पर अनावश्यक रुप से सरकार छोड़कर जाने वाली पार्टी की सोच और रणनीति के अनुसार तो सब कुछ नहीं हो सकता। उप राज्यपाल का पद संवैधानिक गरिमा का पद है। अगर राज्यपाल जानबूझकर किसी प्रकार का राजनैतिक पक्षपात कर रहे हों तो उनकी आलोचना हो सकती है, पर आप जिस तरह पहले उनको कांग्रेस का एजेंट, फिर भाजपा का एजेंट करार देती रही वह दुर्भाग्यपूर्ण था। उप राज्यपाल ने वही किया जो संविधान कहता है। अगर सरकार गिरी तो तत्काल 17 फरबरी को राष्ट्रपति शासन लगाना स्वाभाविक कदम था। यह न भूलें कि तब केन्द्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार थी। कम से कम 16 मई के चुनाव परिणाम तक तो वह फैसला कर ही सकती थी। पर उसने नहीं किया। सारी पार्टियां लोकसभा चुनाव में लग गई। स्वयं आम आदमी पार्टी तर्क देती थी कि वह संसद में जाना चाहती है ताकि जनलोकपाल के लिए वातावरण बनाए, विधायी प्रक्रिया में इस तरह परिवर्तन लायंे ताकि यह कानून बन सके और जो लोकपाल कानून बना है वह खत्म हो। उस समय केजरीवाल एवं उनके साथियों की दिल्ली चिंता कहां थी? केजरीवाल गुजरात में मोदी का मुकाबला करने चले गए, बिना समय लिए मुख्यमंत्री निवास तक अपने समूह के साथ पहुंचे और मीडिया की सुर्खियां बटोरते रहे। जब लोकसभा परिणाम ने उनकी अतिवादी उम्मीदों को ध्वस्त कर दिया तो फिर वे दिल्ली पर आ गए। यहां तक कि हरियाणा एवं महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने शिरकत नहीं कि यह कहते हुए कि पूरा फोकस दिल्ली पर करना है। तब से वे चुनाव राग अलापते रहे।
यह भी न भूलिए कि एक ओर उच्चतम न्यायालय मंें उनकी पार्टी की ओर से प्रशांत भूषण चुनाव कराने के लिए आदेश देने की याचिका पर बहस करते रहे और केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया ने अपना रुख पलटकर उप राज्यपाल को यह पत्र दे आए कि अगर आप विधानसभा भंग करने पर विचार कर रहे हैं तो कृपया एक सप्ताह के लिए इसे रोक दें, क्योंकि हम जनता से इस पर राय ले रहे हैं कि क्या हमें फिर सरकार बनानी चाहिए। यह पत्र उप राज्यपाल के यहां से सार्वजनिक हो गया, अन्यथा दोनों ने बयान दिया था कि उनकी तो बस शिष्टाचार मुलाकात थी। आप सोचिए यह जुलाई महीने की बात थी। उसके बाद वे जनता के बीच गए भी। आज वे कह रहे हैं कि हम तो त्यागपत्र देने के दिन से ही विधानसभा भंग करने की मांग कर रहे हैं।
यहां यह ध्यान रखना जरुरी है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) कानून की धारा 9 (2) के तहत गोपनीय मतदान से मुख्यमंत्री चुना जा सकता है। इसमें पार्टियां व्हिप जारी नहीं कर सकतीं। यदि एलजी ने इस धारा के तहत काम किया होता तो गोपनीय मतदान में भाजपा की सरकार को बहुमत मिलना तय था। इसलिए आरोप लगाने वाले पहले इस तथ्य का अवश्य ध्यान रखें। भाजपा द्वारा पर्दे के पीछे सरकार बनाने का प्रयास एक बात है लेकिन उसमें उप राज्यपाल को लपेटे में लेना उचित नहीं। एक दिन उच्चतम न्यायालय ने उप राज्यपाल एवं केन्द्र सरकार के विरुद्ध टिप्पणी की और उसके बाद जब यह तथ्य रखा गया कि दिल्ली में एक वर्ष तक राष्ट्रपति शासन लागू रह सकता है, सरकार बनाने की संभावना तलाशने की प्रक्रिया चल रही है तो उसी उच्चतम न्यायायल ने उप राज्यपाल की प्रशंसा कर दी और प्रयास करने को समर्थन किया। उप राज्यपाल ने 4 सितंबर को राष्ट्रपति से सरकार गठन की संभावना तलाशने की अनुमति मांगी। राष्ट्रपति की ओर से उन्हें जैसे ही अनुमति मिली उनने प्रक्रिया आरंभ कर दी। सभी पार्टियों को पत्र लिखा और जवाब आने के बाद साफ कर दिया।
लेकिन जरा सोचिए, अगर आप के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अपनी झनक में त्यागपत्र नहीं दिया होता तो क्या दिल्ली के सामने ऐसी नौबत आती? न तो कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया था, न ही भाजपा न ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी जिससे सरकार चलाना मुश्किल हो गया था। एक प्रक्रिया के तहत कोई भी विधेयक दिल्ली में उप राज्यपाल की अनुमति से पेश हो सकती है। इसका पालन करने को वे तैयार नहीं थे। सीधे जनलोकपाल विधेयक प्रस्तुत करना चाहते थे जो कि असंवैधानिक होता, इसका विरोध कांग्रेस भाजपा दोनों ने किया। इसका यह अर्थ नहीं था कि दोनांे पाटियां मिल गईं थीं। आज भी वह प्रश्न कायम है। केजरीवाल कह रहे हैं कि अब हम कभी त्यागपत्र देकर नहीं भागेंगे। त्यागपत्र के लिए उनने क्षमा भी मांगी है। पर प्रश्न तो वही है। क्या वे जनलोकपाल की जिद छोड़ देंगे? अगर नही ंतो फिर उसी घटना की पुनरावत्ति होगी। जन लोकपाल केन्द्र द्वारा बनाए गए लोकपाल कानून के साथ सुसंगत नहीं है, उसे प्रस्तुत करने की अनुमति मिल नहीं सकती, वे अगर सीधे पेश करना चाहेंगे तो फिर वही हालात पैदा होंगे। इसलिए आम आदमी पार्टी एवं अरविन्द केजरीवाल जब तक इस पर अपनी स्थिति साफ नहीं करते तब तक यही माना जाएगा कि अगर वे सरकार मेें आए तो फिर उसी स्थिति की पुनरावृत्ति होगी। हां, यह स्थिति तब आयेगी जब उन्हें बहुमत मिलेगा। लोकसभा चुनाव परिणाम इसके संकेत नहीं दे रहे। फिर भी वे बहुमत के लिए मैदान में उतर रहे हैं तो उन्हें स्पष्टीकरण देना चाहिए।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

विदेशी बैंकों में खातों पर सरकार एवं उच्चतम न्यायालय, सरकार ने यह क्या किया

अवधेश कुमार

यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि भारत सरकार ऐसी संधियों से बंधी हैं, जिसमें अभियोजन के बिना विदेशी बैंकों के किसी खातेदार के नाम का खुलासा उसकी शर्तों का उल्लंघन होगा। इसके साथ यह भी सच है कि कि आगे कुछ संधियां होने वाली हैं उन पर असर होगा, एवं हम और जो नाम चाह रहे हैं, या जिन नामों के लिए जांच में सहयोग चाहते हैं वह भी प्रभावित होगा। यहां तक सरकार का तर्क गले उतर रहा था। लेकिन किसी की समझ में ये नहीं आ रहा कि आखिर बंद लिफाफे में उच्चतम न्यायालय में इन नामों की सूची और कार्रवाई रपट तथा संधियों के दस्तावेज पहले देने में क्या समस्या थी? जो कुछ सरकार ने 29 अक्टूबर को किया वह पहले भी कर सकती थी। इतने हील हुज्जत की जरुरत क्या थी? उच्चतम न्यायालय के पास इतना विवेक इतनी समझ है कि वह उस सूची का क्या करे। उसने अंततः उस लिफाफे को बिना पढ़े विशेष जांच दल या सिट को सौंप ही दिया।

सरकार की एक ही दलील थी कि हम संधियों के कारण अभी नामों का खुलासा नहीं कर सकते। उच्चतम न्यायालय नामों के खुलासे की तो बात कर नहीं रहा था वह तो कह रहा था कि जो भी जानकारी आपके पास है वह पूरी दीजिए। सरकार और न्यायालय दोनांें का इस मामले में एक ही लक्ष्य होना चाहिए-  छानबीन कर चोरी से विदेशों में धन जमा करने वालों को सामने लाना, उनसे करों की वसूली करना तथा उनको सजा देना। तो फिर आमने-सामने की स्थिति इसमें पैदा होनी ही नहीं चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के नेताओं ने जिस तरह विदेशी बैंकों में काला धन को चुनाव का बड़ा मु्द्दा बनाया था उसके बाद उनका दायित्व है कि देश के सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो। सरकार ने सिट के गठन और उसे व्यापक अधिकार देकर आरंभ में अपने इरादे का प्रमाण भी दिया। सरकार को यकीनन अभी समय कम मिला है, इसके द्वारा गठित सिट जांच कर रही है, लेकिन एप्रोच में मौलिक अंतर नहीं दिख रहा है। एकदम सामान्य सी बात थी कि जब आपने फ्रांस से प्राप्त जिनीवा स्थित एचएसबीसी बैंक 627 खातेदोरों की सूची सिट को पहले से सौंपी हुई है तो फिर उच्चतम न्यायालय को सौंपने में कोई हर्ज नहीं होनी चाहिए थी।

यह ठीक है कि उच्चतम नयायालय में आने के बाद कोई अंतर नहीं आया। सरकार ने उस सूची के साथ अब तक की कार्रवाई कार्रवाई रपट और संधियों के दस्तावेज न्यायालय को सौंपे है। निस्संदेह, इसका उद्देश्य यह साबित करना है कि हम जो बता रहे है। वे सच हैं, संधियो में हमारी प्रतिबद्धतायें हैं और हम बैठे नहीं हैं कार्रवाई कर रहे हैं। चूंकि वह भी सिट के पास आ गया इसलिए उसका दायित्व है कि उससे संबंधित रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को दे। इसके लिए उसके पास मार्च 2015 की समयसीमा भी है। हालांकि कुल मिलाकर उन नामों के आने के बावजूद हमारे पास वही 25 नाम हैं जिसे दो दिनों पहले सरकार ने न्यायालय को सौंपा था। लेकिन साफ है कि वित्त मंत्र अरुण जेटली के व्यवहार से 10 दिनों में सरकार की आम जनता की नजर में जैसी छवि बनी है, उससे बचा जा सकता था। उच्चतम न्यायालय ने इतनी कड़ी टिप्पणी सरकार के विरुद्ध कर दी। एक प्रकार से उस पर अविश्वास व्यक्त किया कि ऐसे अगर काम हुआ तो मेरी जिन्दगी में सच सामने नहीं आएगा। मोदी सरकार के विरुद्ध यह सामान्य टिप्पणी नहीं है। वित्त मंत्री पहले ही उच्चतम न्यायालय के निर्देश का पालन करते हुए सूची सौंप देते तो यह नौबत नहीं आती और सरकार का सिर उंचा रहता। आज सरकार कुछ भी कहे उसके इस रवैये से आम जनता के बीच भाव यह बना है कि सरकार उच्चतम न्यायालय में अगर सूची नहीं दे रही थी तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। यानी आपकी भूमिका प्रश्नों के घेरे में आ गई। विपक्ष को हमला करने का अवसर मिल गया।  
हालांकि कांग्रेस जिस तरह सिना तानकर बातें कर रहीे हैं, वह केवल अपने पाप को छिपाना है। उच्चतम न्यायालय ने आदेश 2011 में ही दिया था। फ्रांस से सूची उन्हें ही मिली थी। न्यायालय बार-बार सरकार को कहती रही, डांटती रही, लेकिन सरकार ने अपने तरीके से ही काम किया। वैसे उस सरकार ने भी विदेशों में काला धन पर काम किया, पर वैसा नहीं जैसा हो सकता था। लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार ने तो ऐसी उम्मीद पैदा की थी जिसमे उसका व्यवहार पूर्व सरकार से अलग दिखना चाहिए था। सरकार की ओर से यह घोषणा हो चुकी थी कि 136 नामों की सूची वह सौंपने वाली है। उसी आधार पर यह मान लिया गया कि 136 की सूची दी गई है जिसमेे से 8 का खुलासा हुआ है, लेकिन बाद में शपथ पत्र से पता चला कि 136 की सूची दी ही नहीं गई। इसका सहमतिजनक कारण तलाशना कठिन है।  
वैसे इस मामले में कई प्रकार के दुष्प्रचार हो रहे हैं एवं गलतफहमियां पैदा की जा रहीं हैं। मसलन, भाजपा ने विदेशों से काला धन लाने की कोई समय सीमा दी थी। नरेन्द्र मोदी ने कभी नहीं कहा या भाजपा के घोषणापत्र में भी 100 दिन में कालाधन वापस लाने का वायदा नहीं किया गया। यह सफेद झूठ है।  इसी तरह हर व्यक्ति को 15 लाख देने की बात मैंने मोदी के या भाजपा के किसा शीर्ष नेता के मुंह से नहीं सुनी। कल्पित आंकडे देकर यह जरूर बता रहे थे कि विदेशों में काला धन आने पर हर व्यक्ति के हिस्से कितना आयेगा। लेकिन बांटने की बात आज उपहास के रूप में कह जा  रही है। समानांतर कुछ लोग दुष्प्रचार कर रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय की पीठ में 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी से जुड़े न्यायाधीश हैं, जो मोदी सकरार की छवि खराब कर रहे हैं। यह घटिया दर्जे का आरोप है। इसमें 10 जनपथ की किसी भूमिका को खोचने से ओछी बात कुछ नहीं हो सकती। अगर आज भी 10 जनपथ का इतना प्रभाव है तो इस सरकार को शासन में रहने का अधिकार ही नहीं है। सोशल मीडिया पर उच्चतम न्यायालय के खिलाफ दुष्प्रचार में कहा जा रहा है कि अगर उसे नामों का खुलासा करना ही नहीं था तो फिर उसने नाम लिया क्यों? अगर सिट के पास नाम था ही तो दुबारा ऐसा करने का मतलब क्या है? यह सब बाल की खाल निकालना है। उच्चतम न्यायालय यदि नामो ंका खुलासा नहीं कर रहा है तो यही उसकी परिपक्वता का परिचायक है। कुछ लोग दोहरे कराधान संधि को इस मामले में अप्रासंगिक बता रहे हैं। वे यह भूल रहे हैं विदेशों में कालाधन की पूरी जांच कर चोरी पर टिकी है। यानी आपने कर न देने के इरादे से अपना धन विदेश में छिपा दिया। दूसरे देशों की आपत्ति यही है कि अगर किसी का हमारे देश में खाता है और वह वैध है तो उसकी निजता का हनन नहीं होना चाहिए।

वास्तव में विदेशांे में कालाधन के मामले में आरंभ से ही अतिवादी विचार प्रस्तुत किये जाते रहे हैं। पहले न जाने कितने लोग आंकड़े लेकर आते थे और यह साबित करने की कोशिश करते थे कि विदेशों में इतना काला धन भारत का जमा है कि वह आया नहीं कि हम अमीर देश हुए। इसमें कुछ विदेशी संस्थान भी शामिल हैं। उनमें ज्यादातर आंकड़े काल्पनिक गणनाओं पर आधारित रहे हैं। भाजपा ने ही अपना एक टास्क फोर्स बनाया था जिसने भी ऐसे ही बड़े आंकड़े दिए थे। स्वामी रामदेव का आंकड़ा भी ऐसा ही था। एक स्विस बैंक एसोसिएशन की 2006 की रिपोर्ट के हवाले आंकड़े सामने लाए गए, जिसका कहीं कोई आधार आज तक नहीं मिला। दुनिया के किसी देश में किसी का खाता है तो वह अवैध नहीं हो सकता, यदि उसने बाजाब्ता इसकी सूचना यहां अपने आयकर विवरण में दिया हुआ है। जिन्हें टैक्स हेवेन देश कहा जाता है वहां खाते खुलवाने आसान रहे हैं, लेकिन वहां भी इतनी अधिक राशि की बिल्कुल संभावना नहीं है।

इसकी जटिलताओं को भी समझना होगा। आज के एप्रोच में आपको कोई देश केवल उन्हीं खातों से संबंधित जानकारी देगा जिसमें आपके कर विभाग ने कर चोरी की जांच की हो और कुछ ठोस प्रमाण हासिल किए हों। ऐसे में अगर सरकार इसी रास्ते विदेशों के कालाधन की जांच करती रहीं तो बहुत कुछ हासिल नहीं होगा। हालांकि जो नाम हैं उनमें दोषियों की जानकारी हमारे पास आएगी यह निश्चित है, पर शेष नाम कैसे आयेंगे? यह तो हमें बिना परिश्रम के मिले हुए नाम हैं। इसलिए सरकार को गंभीरता से विचार कर अपना एप्रोच बदलना होगा। सिट अभी तक इसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका है कि हम किस तरीके से इसका पता लगाएं, देशों से किन आधारों पर भारतीय खातेदारों की सूची मांगे और किस तरह उसे काला धन साबित करें...आदि आदि। यहां सरकार के इरादे पर प्रश्न नहीं है लेकिन इस तरीके से तो बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। वित्त मंत्रालय और महाधिवक्ता ने न्यायालय में जो रुख अपनाया वह एप्रोच अस्वीकार्य है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208
    

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