मंगलवार, 26 अगस्त 2014

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

एंटनी राग से कांग्रेस को क्या मिलेगा

अवधेश कुमार
ए. के. एंटनी ने कांग्रेस की करारी पराजय पर अलग-अलग समयों पर कई वक्तव्य दिए, लेकिन उनकी अध्यक्षता में बनी रिपोर्ट टुकड़ों में नहीं है। उसे पूरी तरह सार्वजनिक भी हीं किया गया है, पर उसके महत्वपूर्ण अंश उनके वक्तव्यों या स्रोतों से बाहर आ गया है। वैसे भी कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा प्रस्ताव पारित करके उसका गठन नहीं हुआ था। अध्यक्ष के नाते सोनिया गांधी ने उसे अनौपचारिक स्वरुप दिया था। इसका अर्थ यह हुआ कि वह रिपोर्ट सिर्फ सोनिया गांधी को ही मिलनी थी। वे उसे पढ़ेंगी और आवश्यकता समझेंगी तो उसे विचार के लिए कांग्रेस की कोर कमेटी या कार्यसमिति में रखेंगी नहीं समझेंगी तो नहीं रखेंगी। अगर उन्हें महसूस होगा कि इस पर विचार एवं कार्य होना चाहिए तो वे स्वयं उस दिशा मंे अध्यक्ष के नाते कदम उठा सकती हैं, पार्टी से भी आग्रह कर सकती हैं। यानी एंटनी समिति रिपोर्ट का पूरा दारोमदार सोनिया गांधी पर निर्भर है या फिर राहुल गांधी को उपाध्यक्ष के नाते मिला दें तो दोनों माता-पुत्र ही इस रिपोर्ट की नियति निर्धारित करेंगे। इसके पूर्व जब 2012 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की पराजय हुई थी तब भी एंटनी की अध्यक्षता में एक समिति बनी थी। उसकी रिपोर्ट के अंश भी बाहर आए, पर वह कांग्रेस पार्टी के विचार-विमर्श का हिस्सा नहीं बना। तो क्या इस रिपोर्ट की भी यही दशाा होगी?
यह प्रश्न और आरंभ में उपरोक्त विवरण इसलिए दिया जाना आवश्यक है, क्योंकि बहुत सारे कांग्रेसी एवं कांग्रेस के समर्थकों ने इस रिपोर्ट से काफी उम्मीद लगा रखी है। आखिर अपने जीवन के सबसे बुरी पराजय और राजनीतिक संघात के बाद पार्टी के निष्ठावान लोग कम से कम इतना तो अवश्य सोचेंगे कि एंटनी समिति ने जो कारण बताए होंगे और उनसे निपटने के लिए जो अनुशंसायें की होंगी उनके आधार पर पार्टी फिर से पुनर्गठित होकर जन समर्थन पाने की कुव्वत पा सकती है। उत्तराखंड के उपचुनावों में तीनों सीटों पर विजय से ऐसा सोचने वालों की उम्मीदें जगीं है। हम उस रिपोर्ट के मुख्य अंश पर बाद में आएंगे, लेकिन जरा सोचिए, इस समिति में मंें एंटनी के अलावा, मुकुल वासनिक, आरसी खुंटिया और अविनाश पांडेय शामिल हैं। इनमंे से ऐसा कौन व्यक्ति है जो हिम्मत के साथ सोनिया गांधी या राहुल गांधी के सामने एकदम कटु सच बोल सकता हो? इसलिए जब  समिति ने 21 जून से काम करना शुरू किया था तभी से यह मान लिया गया था कि इसमें कुछ सतही और अस्पष्ट ऐसे कारणों को ज्यादा फोकस किया जाएगा जिससे संदेश यह निकले कि मुख्य कारण अपने अपने वश में नहीं थे। इससे नेतृत्व पर दोष आने से बच जाएगा। यही आपको इस रिपोर्ट में दिखाई देगा। दूसरे, यह भी विचार करने की बात है कि आखिर इतनी बुरी हार और घक्के के बाद भी यदि पार्टी अध्यक्ष औपचारिक और अधिकार प्राप्त समिति तक के गठन से बचीं तो वे या उनके रणनीतिकार आगे पार्टी को पुनर्गठित करने के लिए कुछ क्रांतिकारी कदम उठाएंगे यह कैसे मान लिया जाए?
एंटनी समिति ने कांग्रेस और संप्रग के खिलाफ वातावरण बनाने के लिए मीडिया और कुछ कॉरपोरेट घरानों की ओर उंगली उठाई है। रिपोर्ट में बाजाब्ता चार ऐसी कंपनियों का नाम भी लिया गया है। यह असाधारण स्थिति है। संभवतः भारत के राजनीतिक इतिहास में यह पहली ही घटना होगी जब किसी मुख्यधारा की पार्टी ने अपनी पराजय का ठिकरा मीडिया और कॉरपोरेट घराने पर फोड़ा है। कांग्रेस से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या मीडिया और कॉरपोरेट के पास इतनी शक्ति है कि वह देश भर में कांग्रेस का मत 28.8 प्रतिशत से 19 प्रतिशत पर ला दे और 206 सीटों को घटाकर 44 कर दे? अगर ऐसा हो जाए तो फिर इस देश को कॉरपोरेट अपने अनुसार चलानो लगेंगे और आज मीडिया के अधिकांश हिस्से में उनका धन लगा ही हुआ है। समिति लिखती है कि पार्टी मीडिया को मैनेज करने में सफल नहीं रही। मीडिया को मैनेज कैसे किया जाता है? कांग्रेस के बड़े-बड़े विज्ञापन अखबारों, चैनलों पर आते रहे, सरकार की तथाकथित उपलब्धियों का बखान करने वाले विज्ञापन चलते रहे.......। लेकिन मीडिया किसी सरकार और पार्टी का भोंपू तो नहीं हो सकती। कांग्रेस यह भूल गई कि यही मीडिया 2002 से 2012 तक नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जितनी टिप्पणियां होतंीं थीं करता रहा और वे चुनाव जीतते रहे। हालांकि चुनाव सर्वेक्षणों में उनके समर्थन के आंकड़े आते थे तो मीडिया को उसे प्रकाशित प्रसारित करना था। उनके समाचार उसी रुप में आते थे जैसे आने चाहिए, पर एक सामूहिक स्वर मीडिया का मोदी को खिलाफ होता था जिसके सामने समर्थन वाला स्वर थोड़ा कमजोर हो जाता था। कांग्रेस को यह सोचना चाहिए कि आखिर मीडिया का सामूहिक स्वर कांग्रेस व सरकार के विपरीत कैसे गया?
मीडिया की भूमिका जनता की आवाज को प्रतिबिम्बित करना है। अगर लोग नरेन्द्र मोदी की ओर आकर्षित हैं, लाखों की संख्या में उन्हें सुनने आ रहे हैं, शुल्क देकर भी लाखों की संख्या आ रही है तो फिर मीडिया का स्वर क्या हो सकता था? सच तो यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व और उनके रणनीतिकारों ने इस स्वर को सुनकर अपनी रीति-रणीनीति में बदलाव की कोशिश ही नहीं की। बल्कि मीडिया पर सच बोलने वालों को भाजपा का प्रवक्ता तक कहकर हमला करने लगे। इसके विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया होती थी। एंटनी समिति ने भ्रष्टाचार के आरोपों के संदर्भ में जनता के सामने सही परिप्रेक्ष्य न रख पाने को हार का कारण बताया है और यहां भी मीडिया को कठघरे में खड़ा किया है। उसने 2 जी से लेकर, कोयला घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला आदि की चर्चा की है। मीडिया ने तो वही लिखा, बोला और दिखाया जो खबर आती थी। अगर कैग कह रहा है कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है, सीबीआई की रिपोर्ट इसमें सरकार और संप्रग नेताओं की संलिप्तता बताती है तो हमारे पास चारा क्या है? अगर इतने बड़े-बड़े घोटाले होंगे तो मीडिया उस पर बहस करेगी, उसका सच दिखाएगी। ऐसा नहीं था कि उन बहसों में कांग्रेस के लोग नहीं होते थे लेकिन वे जिस अख्खड़ता से प्रतिहमला करते थे उससे उनका पक्ष कमजोर होता था।  
2004 और 2009 में भाजपा ने अपनी पराजय के लिए मीडिया और कॉरपोरेट को दोषी नहीं माना था। यह बात अलग है कि पार्टी ने अपने में बदलाव नहीं किया, अन्यथा हार के कारणों का सही विश्लेषण किया था और उससे उबरने के उपाय भी बताये गए थे। 2004 में बाजाब्ता एक बड़ी रिपोर्ट भाजपा ने भविष्य के कार्य के रुप में प्रकाशित की थी। डॉ. मनमोहन सिंह एवं पी चिदम्बरम हमेशा कॉरपोरेट के दुलारे रहे हैं। अगर रिपोर्ट को स्वीकार कर लें जिसे वास्तव में स्वीकार करना कठिन है तो भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि उनके खिलाफ अगर नाराजगी हुई तो क्यों? इस पर कांग्रेस को विचार करना चाहिए। राहुल गांधी ने बाजाब्ता अपने भाषण में एक कॉरपोरेट का नाम लेकर मोदी के साथ सांठगांठ का आरोप लगाया था। सच कहें तो रिपोर्ट में उसी को स्थान दिया गया है। उस समय कांग्रेस की सरकार थी वे चाहते तो जांच करा सकते थे। साफ है कि एंटनी समिति असली वजहों को या तो समझने से वंचित रह गई या जानबूझकर उन्हें वर्णित करने की हिम्मत नहीं कर पाई। समिति कह रही है कि चुनाव लड़ने के लिए धन की कमी पड़ गई। हालांकि अगर कांग्रेस एवं भाजपा की अंकेक्षण रिपोर्ट देखी जाए तो उसमें कांग्रेस की आय भाजपा से करीब 100 करोड़ रुपया ज्यादा है। जवाब में कांग्रेस कहती है कि भाजपा ने प्रच्छन्न रुप से काफी धन खर्च किया है। तो इसके खिलाफ उनको चुनाव आयोग के पास जाना चाहिए।  
इन कुछ कारणों का उल्लेख आरंभ में इसलिए किया गया क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस नेतृत्व की सोच वास्तविकता की जगह दोषारोपण की ओर जा रही है। और जब आप दोषारोपण की ओर बढ़ जाते हैं तो फिर ईमानदार और निष्पक्ष आत्मचिंतन नहीं कर पाते। कांग्रेस की यही त्रासदी है।  कांग्रेस नेतृत्व यह समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रही कि पराजय के बाद से कई जगहों से जिस प्रकार की भाषा राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए प्रयोग हो रहे हैं, उनके खिलाफ आवाजें उठ रहीं हैं वे भी कुछ संदेश दे रहे हैं। कहीं से भी मीडिया के खिलाफ, या कॉरपोरेट के खिलाफ आवाज नहीं उठ रही है। एंटनी समिति को अपनी जाचं के दौरान कई राज्यों में व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा। कई जगह राहुल गांधी के खिलाफ नारे लगाए गए, कई जगह राहुल और उनकी टीम को हाईफाई कहकर उसे पराजय के लिए जिम्मेवार बताया गया, सोनिया गांधी को दस जनपथ में घिरा कहा गया, समाचारों में वह सब आया, विरोध की तस्वीरें तक छपीं, पर एंटनी रिपोर्ट में उन सबका जिक्र ही नहीं है। एंटनी ने कहा भी कि पराजय के लिए राहुल गांधी को जिम्मेवार मानना गलत होगा। बेशक, एक व्यक्ति को जिम्मेवार नहीं होना चाहिए।
हालांकि समिति ने कुछ बातंे ठीक कहीं है। मसलन, कई राज्यों में गठबंधन न करना, राज्यों की ईकाइयों में गुटबाजी, बेपरवाह मंत्रियों से निराश पार्टी कार्यकर्ता, उम्म्ीदवारों का गलत चयन, राज्यों की समस्याओं को लेकर समन्वय का अभाव और इसके फलस्वरुप प्रचार का दिशाहीन और प्रभावहीन होना.... आदि। ये सब सच हैं। पर इन सबके लिए आप किसे जिम्मेवार किसे कहेंगे? जो विरोध या विद्रोह हो रहा है वह इन्हीं सब कारणों से था। राहुल गांधी के हाथों पूरे चुनाव की कमान थी और सोनिया गांधी मार्गदर्शक के रुप में थीं। राहुल गांधी ने सारे निर्णय किए या उनके सलाहकारों व टीम के सदस्यों ने......।  कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों सहित अन्य राज्यों आदि के प्रभारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। इनके प्रभारियों की नियुक्तियां किसने कीं थीं? अगर राज्यों में प्रभावी नेताओं की कमियां थीं तो क्यों? प्रभावी नेता क्यों कांग्रेस की मुख्यधारा से बाहर चले गए हैं? ये सारे ऐसे प्रश्न हैं जिन पर समिति को गहराई से विचार करके अपनी बात रखनी चाहिए थी लेकिन वह नहीं रख पाई।
सबसे बढ़कर एंटनी ने स्वयं अपने बयान में कहा था कि  कांग्र्रेस की संप्रदाय विशेष के प्रति उदार होने की छवि ने काफी नुकसान पहुंचाया। यह रिपोर्ट में भी शामिल है। एंटनी ने कहा कि समाज के एक वर्ग को ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस केवल एक खास समुदाय को ही आगे बढ़ाने का काम करती है। यानी वह मुसलमानों को खुश करने मे लगी रहती है। पार्टी नेता इसके लिए खासकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान को उद्धृत करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। इन नेताओ का मानना है कि यूपीए सरकार की ओर से अल्पसंख्यकों के मसले पर जरूरत से ज्यादा जोर दिये जाने से बहुसंख्यक वर्ग व गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों में नाराजगी बढ़ी। यह सच है लेकिन इसके लिए क्या केवल मनमोहन सिंह को जिम्मेवार ठहराया जा सकता है? सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड की सिफारिशें देख लीजिए। जाहिर है, इस पहलू को उभारकर या सरकार के मंत्रियों की कार्यशैली, अच्छे कार्य का ठीक प्रचार न कर पाना आदि का उल्लेख कर अप्रत्यक्ष रुप से मनमोहन सिंह को हार का खलनायक बनाने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस सच को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है। आज भी आप क्या कर रहे हैं? संसद में सांप्रदायिकता पर मोदी सरकार को बहस के लिए विवश करते हैं और उसका संदेश क्या निकल रहा है? कांग्रेस यह समझ ही नहीं रही है कि इस एकपक्षीय भूमिका से दूसरा वर्ग उसके खिलाफ विद्रोह करके भाजपा के पाले में चला जाता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है, पर हमें तत्काल यह मानकर चलना होगा कि एंटनी समिति की रिपोर्ट एक औपचारिक खानापूर्ति भर थी.....कांग्रेस के नेतृत्व, नीति और रणनीति में संभ्रम से बाहर निकलने की संभावना अभी नहीं दिख रही है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

शनिवार, 16 अगस्त 2014

नरेन्द्र मोदी का स्वतंत्रता दिवस संबोधन

अवधेश कुमार
लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पहले भाषण ने देश को लंबे समय बाद झकझोड़ा है। अगर आज यह प्रश्न किया जाए कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से जो कुछ कहा उसमें उन्हांेेने देश की उम्मीदों को पूरा किया तो आपका उत्तर क्या होगा? कांग्रेस या अन्य कई विरोधी दल उसकी मीन मेख निकालने में लगे हैं। जो भाषण में नहीं था उसके बारे में पूछ रहे हैं, पर यह जनता की आवाज नहीं है। आम जनता की सामूहिक आवाज यही है कि लंबे समय बाद किसी प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अनुरुप देश को उत्प्रेरित करने वाला ऐसा भाषण दिया है जिससे सुनने के लिए देश तरस गया था। आखिर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का संबोधन कैसा होना चाहिए? अभी तक हम सरकारों द्वारा नीरस कार्यवृत्त सुनते-सुनते उब चुके थे। नौकरशाहों द्वारा तैयार भाषणों की नीरसता से स्वतंत्रता दिवस की प्रेरणा गायब रही है। अटलबिहारी वाजपेयी जैसा प्रखर वक्ता भी लालकिला पर जाते ही कागज के पूर्जे को पढ़ने लगते थे और इतिहास का सबसे छोटा 22 मिनट का भाषण देने का रिकॉर्ड बना दिया। मनमोहन सिंह तो वैसे ही सरकारी सेवक रहे हैं। उनके भाषण में हम वैसी प्रेरणा और जज्बात की उम्मीद भी नहीं कर सकते थे।
जरा पिछले दो दशक के भाषणों को याद कर लीजिए, या उतना पीछे न जाना चाहें तो पिछले दो भाषण को ही आधार बना लीजिए। क्या देश के अंदर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण सुनने तक की रुचि रह गई थी? अगर पत्रकारों को इस पर टिप्पणी नहीं करनी हो तो वे भी नहीं सुनना चाहते ऐसा भाषण हो गया था। एक परंपरागत औपचारिकता की पूर्ति जैसा क्षरण का ग्रास बन चुका था हमारे स्वतंत्रता दिवस का संबोधन। इस परिप्रेक्ष्य में यदि आप विचार करेंगे तो यह मानने में कोई हिचक नहीं होगी कि मोदी ने इस नीरसता की परंपरा को खत्म किया है। स्वतंत्रता दिवस! यह नाम ही अपने आपमें हमारे अंदर रोमांच पैदा करना चाहिए, देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ बलि चढ़ा देने वाले महापुरुषों के प्रति केवल सम्मान नहीं वैसे ही जीवन जीने की प्रेरणा मिलनी चाहिए और उन महापुरुषों ने स्वतंत्र भारत के लिए जो भी सपने देखेें उनको पूरा करने के लिए अपनी पूरी क्षमता और उर्जा लगाने का देश का सामूहिक स्वभाव बनना चाहिए। वह भी इस संकल्प के साथ कि जब तक उस लक्ष्य को पा नहीं लेते चैन से नहीं बैठंेगे, विश्राम नहीं करेंगे। प्रधानमंत्री के भाषण में इसके लिए कुछ सूत्र तो होना ही चाहिए तथा यह आत्मविश्वास पैदा होना चाहिए कि हां, वाकई हम ऐसा कर सकते हैं। मोदी के या किसी प्रधानमंत्री के भाषण की कोई कसौटी हो सकती है तो यही।
 वैसे मोदी की खासियत रही है कि वे अपने भाषणों से तात्कालिक संवेग और गहरी आशा की रोशनी पैदा कर देते हैं। इसलिए यह प्रश्न उठ रहा था कि क्या वे आज लालकिला से इसी तरह का सामूहिक राष्ट्रीय जज्बा पैदा करने मे ंसफल होंगे? यह कहना होगा वाकई वे इसमें सफल हुए हैं। यानी इन कसौटियों पर खरे उतरे हैं। स्वतंत्रता दिवस का भाषण आपकी सरकार का विज्ञापन बन जाए यह राजनीति के अधःपतन का ही प्रमाण था। जो सच है उसे हमें स्वीकारना ही चाहिए, अन्यथा भारत की पता नहीं और क्या दुर्गति होगी! यह मानना होगा कि इस अधःपतन से मोदी ने उबारने की शुरुआत कर दी है। हालांकि यह उनका पहला भाषण था और सरकार भी केवल ढाई महीने की, इसलिए उनके पास उपलब्धियों के नाम पर ज्यादा नहीं था। सो इसे स्थायी मान लेना जल्दबाजी होगी। वैसे सरकार उपलब्धियों की चर्चा करे उसमंें बुराई नहीं है। आखिर सरकार की उपलब्धियां मतलब देश की उपलब्धियां ही तो है। इससे भी देश में आत्मगौरव का भाव पैदा होता है और दुनिया में भी धाक जमती है। पर किसी तरह यह सरकार का विज्ञापन न बने। जो कुुछ भी बोला जाए वह उन कसौटियों के दायरे मंें हो जो हमने उपर लिखी है और स्वतंत्रता दिवस के लंबे संघर्ष, बलिदान और त्याग की कथाओं को ध्यान में रखते हुए।
यहां उन सारे कार्यक्रमों, योजनाओं, अपीलों, आह्वानों की चर्चा संभव नहीं है, लेकिन मोदी के भाषण को हम मोटामोटी सात पहलुओं में बांट सकते हैं। पहले पहलू में हम उनके आजादी के लक्ष्य और उन दौरान देखे गए सपनों को पूरा करने की प्रेरणा की बातों को रख सकते हैं। इसमें उन्होंने गांधी जी, अरविन्द घोष, विवेकानंद..... आदि का नाम लिया और उनको उद्धृत किया। दूसरे पहलू में उन्होेंने यह बताया कि आज नवजवानों को भगत सिंह की तरह फांसी पर चढने की आवश्यकता नहीं है, पर विकास एव सुशासन को जनांदोलन का रुप देना जरुरी है। यह तभी संभव है जब हम आजादी के महत्व को समझें और स्वतंत्रता सेनानियों के सपने के अनुसार कार्य करें। तीसरे पहलू में हम उनके शासन सुधार के सपने को रख सकते हैं। इसमें दो बातें प्रमुख थीं। एक, सरकार के विभाग ही एक दूसरे से लड़ते है, मुकदमे करते हैं और खजाने का पैसा खर्च करते हैं। इसको तोड़ने की शुरुआत हुई है। दूसरे, उन्होंने निजी नौकरी को जॉब एवं सरकारी को सर्विस यानी सेवा का उदाहरण देते हुए बताया कि सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों मंे इस सेवा की भावना को पैदा करना होगा। वस्तुतः ंअंग्रेजों के जमाने से ये अधिकारी कर्मचारी अंग्रेजी में तो पब्लिक सर्वेंट कहलाते हैं, पर व्यवहार मंें ये पब्लिक मास्टर की तरह काम करते हैं। यानी जनता के सेवक नहीं। मोदी ने जो कहा अगर वह साकार हो जाए तो यकीन मानिए महाक्रांति हो जाएगी। प्रशासकीय बदलाव के लिए इतने ज्यादा नियम कानून बनाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। पर यह आसान नहीं है। चौथे पहलू में हम विकास की उनकी सोच और नई घोषणाओं को रखते हैं। इनका हम पूरा उल्लेख नहीं कर सकते। पर सांसद आदर्श ग्राम योजना जिसमें एक-एक सांसद एक गांव को आदर्श बनाने से शुरुआत, तथा एक वर्ष के अंदर सभी विद्यालयों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय का निर्माण करने के संकल्प के महत्व को समझना कठिन नहीं है।
लेकिन इसके आगे के पहलुओं में हम एक नेता और शासक से ज्यादा मोदी को समाज सुधारक के रुप में देख सकते हैं। मसलन, राजनीतिक व्यवहार में बदलाव। उन्होंने सारे पूर्व सरकारों, पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ वर्तमान संसद के संचालन के लिए विपक्ष के सभी नेताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि हम बहुमति से नहीं सहमति से सरकार चलाना चाहते हैं। वास्तव मंे आज हमारी राजनीति राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की जगह परस्पर घृणा और दुश्मनी में बदल गई है। अगर मोदी की पहल और अपील सफल हुई तो एक नए राजनीतिक व्यवहार की हम उम्मीद कर सकते हैं। इसी तरह छठे पहलू में हम सामाजिक व्यवहार में बदलाव वाली बातों को रख सकते हैं। लड़कियों के संरक्षण, भू्रण हत्या के विरुद्ध, माता-पिता से एवं डॉक्टरों से भी अपील हमने लाल किले से पहली बार सुना है। यही नहीं कोई प्रधानमंत्री पहली बार यह बोल रहा है कि आखिर बलात्कार करने वाला किसी का तो बेटा ही है। माता पिता क्यों नहीं उससे लड़कियों की तरह पूछते कि तुम कहां जा रहे हो। इसी तरह हिंसा और आतंकवाद में लगे नवजवानों को हिंसा छोड़ने की स्वयं अपील के साथ माता पिता से भी आगे आकर बच्चोें से पूछने अपील उनने की। यह बहुत बड़ी बात है। आम तौर पर सरकारें बलात्कार और हिंसा के खिलाफ कानूनों, सरकारी सख्ती की बातंें करतीं हैं, पर बगैर समाजिक जागरण के यह संभव नहीं हो सकता। मोदी की अपील सामाजिक जागरण वाला था। इसमें टूटते परिवार को फिर से मजबूत करने का भाव प्रमुख था। सातवें पहलू में हम निजी व्यवहार में बदलाव को ले सकते हैं। यानी किसी काम में इसमें मेरा क्या की भावना से हटकर आजादी के सपनों के अनुसार देश कल्याण के भाव से काम करें। नवजवानों से यह अपील कि आपलोग यह देखें कि हम कितने चीजें आयात करते हैं और यह तय करें कि उनमें से एक चीज का हम उत्पादन करेंगे। अगर ऐसा कर दिया तो आयात पर हमारा जो खर्च होता है वह घटेगा और हम निर्यात करने वाले देश बन जाएंगे।
इस प्रकार कुल मिलाकर मोदी का भाषण नए सिरे से राष्ट्रीय पुनर्जागरण, सांस्कतिक-सामाजिक पुनर्जागरण के माध्यम से विकास एवं व्यापक बदलाव से भरा हुआ था। इसमें विदेश निवेश आदि के पहलू पर मतभेद की गुंजाइश है, पर वर्तमान राजनीति में तो बाजार अभिमुख अर्थनीति पर एकमत है। इसलिए उनके विरोध का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

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