गुरुवार, 6 मार्च 2014

यह राजनीतिक आचरण भयभीत करता है

अवधेश कुमार

जरा स्थिति देखिए। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल गुजरात के अहमदाबाद हवाई अड्डे पर उतरते हैं, वहां से मेहसाणा होते पाटन और भुज जाते हैं, फिर आगे की यात्रा करते हैं, लगातार पत्रकारों से बातचीत करते हैं, लेकिन उनकी पार्टी दिल्ली से लेकर कई स्थानों पर इस तरह उत्तेजना में प्रदर्शन करने लगती है मानो उनके साथ कुछ अनहोनी हो गई। यह क्या है? जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने भाजपा कार्यालयों के सामने हिंसक और उग्र प्रदर्शन किया वह हर दृष्टि से अस्वीकार्य है। हां, भाजपा के लोगों को भी जितना संयम और धैर्य दिखाना चाहिए नहीं दिखा पाए। उनकी ओर से भी आप के लोगांे पर हमला किया जाना असभ्य आचरण ही है। किंतु आप के नेताओं कार्यकर्ताओं ने जो कुछ किया और जिस तरह किया वह वाकई भयभीत करने वाला अचारण है। यह अराजनीतिक रवैया है जिसके लिए लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं। विरोध में नारा लगाना और प्रदर्शन करना, धरना देना.....सामान्य बात है। हालांकि उसमें भी मान्य राजनीतिक आचरण यही है कि यदि आपको पुलिस रोकती है तो रुक जाएं। इसके विपरीत आम आदमी पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं के उग्र काफिले ने जिस तरह वहां बैनर फाड़े, गेट तोड़कर घुसने की कोशिश की उसे हम मान्य विरोध प्रदर्शनों की श्रेणी में नहीं रख सकते। 

दिल्ली पुलिस मामले की छानबीन कर रही है, लखनऊ में भी प्राथमिकी दर्ज हुई। पुलिस अपने तरीके से कार्रवाई करती है, करेगी। दिल्ली पुलिस का कहना है कि आप के लोगों ने पुलिस की पूर्व सूचना दिए बिना जिस तरह से भाजपा कार्यालय के बाहर बैनर फाड़े, दरवाजे के नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, 

पत्थरबाजी की वह सब आपराधिक कृत्य है और उसके अनुसार कार्रवाई होगी। लेकिन इस पूरे प्रकरण मंे मुख्य बात कानूनी प्रक्रिया या कानून का उल्लंघन नहीं, राजनीतिक आचरण है। जिनने भी वो दृश्य देखा होगा उनके अंदर अवश्य ही सिहरन पैदा हो जाएगी कि आखिर हमारे देश में कैसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हो रही है। आप के नेता कह रहे हैंं कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने गए थे। वह किसी भी दृष्टि से शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं था। दूसरे, आप क्यों गए थे? किसी पार्टी के कार्यालय पर उस तरह का विरोध होने का ठोस कारण भी तो चाहिए। केवल यह कहने से कि विरोध हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है, इसका औचित्य साबित नहीं हो जाता। वहां स्थिति नियंत्रण से बाहर इन्हीं के कारण हुई और पुलिस को पानी की बौछार करनी पड़ी। आप के कार्यकर्ता को उस गाड़ी पर चढ़कर पानी की दिशा को भाजपा कार्यालय के अंदर मोड़ते देखा जा सकता है। अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि वे क्षमा मांगते हैं क्योंकि उनके कुछ कार्यकर्ता ने एक दो पत्थर चाल दिया। जहां पूरी भीड़ंत की स्थिति है वहां आप एक दो पत्थर की बात कर रहे हैं! वहा!  

जाहिर है, क्षमा मांगना आप की राजनीतिक रणनीति का ही हिस्सा है। आम आदमी पार्टी का आरोप था कि उनके संयोजक अरविन्द केजरीवाल को गुजरात के पाटन के राधनपुर में गिरफ्तार किया गया। अरविन्द केजरीवाल चार दिनों के दौरे पर गुजरात पहुंचे। संयोग से उनके पहुंचने के साथ चुनाव आयोग ने चुनाव की तिथि घोषित कर दी और आचार संहिता लागू हो गया है। आचार संहिता लागू होने के बाद प्रशासन चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार काम करता है। आयोग ने आचार संहिता के तहत राजनीतिक दलों के रोड शो, जुलूस, सभाओं आदि के बारे में कुछ नियम बनाएं हैं और सभी दलों की उसमें सहमति रही है। एक साथ गाड़ियों का उतने लंबे काफिले के बाद पुलिस प्रशासन पूछताछ करेगी। अरविन्द को यह कहते सुना जा सकता है कि आप हमें कोड ऑफ कन्डक्ट मत समझाइए। वे राधनपुर थाने से आधे घंटे में बाहर आ गए थे। पुलिस ने केजरीवाल को हिरासत में लेने तक से इनकार किया है, गिरफ्तारी तो दूर की बात है। स्वयं अरविन्द थाना से निकलते समय यह कहते सुने जा रहे हैं कि मैंने पुलिस को समझा दिया है कि आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। उसके बाद इतने बावेला का क्या औचित्य था? किंतु उन्होंने अपनी ओर से यह जोड़ दिया कि नरेन्द्र मोदी जी के इशारे पर ऐसा किया गया वंे घबरा गए हैं। 

पुलिस के आम व्यवहार में परिवर्तन होना चाहिए इसकी आवाज लंबे समय से उठ रही है। पुलिस वहां दूसरा रास्ता भी अपना सकती थी। यह पहली बार नहीं है जब किसी नेता को रोका गया है। पिछले लोकसभा चुनाव में ही पटना गांधी मैदान में लालकृष्ण आडवाणी के भाषण को वहां के जिलाधिकारी, जो कि चुनाव अधिकारी भी था, दो मिनट से ज्यादा नहीं चलने दिया, क्योंकि आचार संहिता के अनुसार किसी सभा के लिए रात की समय सीमा खत्म हो चुकी थी। आडवाणी ने उसका पालन किया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। वस्तुतः राजनीतिक जीवन में यह आम घटना है। आचार संहिता लागू हो जाने के बाद तो बड़े-बड़े नेताओं के जुलूसों, सभाओं को रोक दिया जाता है। कई बार नेताओं के जुलूस को रोककर उन्हें थाने ले जाया जाता है। आम आदमी पार्टी का व्यवहार सबसे अलग है। उसे लगता है कि केवल उसके नेता के साथ ही ऐसा हुआ है तो इसका कोई जवाब नहीं दिया जा सकता है। दूसरी पार्टियों के नेताओं को रोके जाने पर कार्यकर्ता उसका विरोध भी करते हैं, पर इस तरह नहीं कि आप किसी पार्टी के कार्यालय पर हमले की स्थिति पैदा कर दें। गुजरात पुलिस का कहना है कि वे बिना इजाजत रोड शो कर रहे थे। टीवी चैनलों में यह दिख रहा था कि उनके जुलूस से यातायात पूरी तरह जाम हो गया था। यह बहस का विषय हो सकता है कि आचार संहिता का उल्लंघन है कि नहीं? केजरीवाल का तर्क है कि उनकी गाड़ियों पर कहीं झंडा और पोस्टर नहीं था, अंदर भी एक स्टिकर तक नहीं था। उनके अनुसार वे चुनाव प्रचार में नहीं, बल्कि मोदी का विकास ढूंढने आए हैं। 

इस तर्क से कौन सहमत हो सकता है। संभव है चुनाव तिथियों की घोषणा होने के बाद अचार संहिता के उल्लंघन से बचने के लिए ऐसा किया गया हो। केजरीवाल की पूरी गतिविधि अपनी पार्टी के प्रचार और मोदी को कठघरे में खड़ा करने वाली है। यह चुनाव प्रचार नही ंतो और क्या है? भले आप नाम जो भी दे दीजिए। कहने का तात्पर्य यह है कि केजरीवाल या उनकी पार्टी नैतिकता, पारदर्शिता की भले जितनी बातें करें, उनके ये सारे आचरण पाखंडपूर्ण हैं। यह तो संभव नहीं कि गुजरात सरकार जानबूझकर केजरीवाल को रोकने की कोशिश करेगी। वह क्यों चाहेगी कि आम आदमी पार्टी को अनावश्यक प्रचार मिले। यही आप की कार्यशैली है। किसी न किसी बहाने कुछ ऐसा घटित कराने की कोशिश करो जिससे स्वयं को उत्पीड़ित एवं उसके विरुद्ध क्रांतिकारी होने की छवि प्राप्त हो। उस घटना पर ऐसी प्रतिक्रिया दो कि फिर कई दिनों तक सुर्खियां मिलतीं रहे। यही उनने किया है। 

किंतु इस रणनीति में आप जिस तरह की उग्र और आक्रामक राजनीतिक संस्कृति पैदा कर रही है वह डरावनी है। शेष पार्टियों का क्षरण एक बात है, लेकिन सबको दुश्मन मानकर व्यवहार करने से घृणा और हिंसा बढ़ती है। आम आदमी पार्टी अब सत्ता की दलीय राजनीति में आ गई है तो उसे आम राजनीतिक व्यवहार भी सीखनी होगी। वो गांधी और जेपी का नाम लेती है। न गांधी ने कभी किसी के कार्यालय पर हमला करवाया, न जेपी ने। उनके अंादोलन में सात्विक अहिंसा का भाव था। आप में सात्विकता का रंच मात्र भी नहीं है। वह बिना लाठी गोली चलाए ही हिसंक दिखती है। इससे पूरा राजनीतिक वातावरण दूषित और विकृत होगा। निस्संदेह, भाजपा का रवैया भी अनुचित था, उसे पुलिस पर निर्भर रहना चाहिए था। अगर इस तरह हमले का जवाब प्रतिहमला से दिया जाएगा तो फिर राजनीति का दृश्य कैसा होगा! इसलिए यह घटना सभी पार्टियों के लिए सबक बनना चाहिए और कभी ऐसे प्रदर्शन या हमलें हों तो उसका जवाब हिंसा से नहीं दिया जाए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


सोमवार, 3 मार्च 2014

बुलंद मस्जिद शास्त्री पार्क में महफिले मुशायरा


संवाददाता

नई दिल्ली। बुलंद मस्जिद शास्त्री पार्क में शेख मो. आसिम के नेतृत्व में एक मुशायरे का एहतमाम किया गया जिसमें बहुत से जाने-माने शायर हजरात सईद नहटौरी, डॉ. जाहिद अहसास, सईंद मुन्तजिर, इरफान अम्बरी, हाजी शमशाद अलापुरी, शेख मो. आसिम और रागिब ककरालवी तशरीफ लाए। मुशायरे की सदारत अल्लामा मकसूद अली और निजामत डॉ. जाहिद अहसास ने की। मुशायरे की इस महफिल में बहुत से जिम्मेदार हजरात एमए खान, इशरत मामू, हाजी कल्लन वारशी, हसीन खान, महबूब अलवी, अनीस मुरादाबादी, हिदायत खान, चै. शाहे आलम, नजमी, शमशेर सलमानी, इशरत अली, अब्दुल सलाम, शहजाद, शुएब वारशी, सरवर खान, रियाज अहमद, इकरार मामा, इसरार अहमद, मो. रियाज़, अफजाल, नईंम अलवी, आसिफ अली और बहुत से लोग शामिल हुए। शायरों ने अपने-अपने अंदाज से कलाम पढ़कर सामईंन के दिलो-दिमाग पर अपनी-अपनी चाहतों का असर छोड़ा

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

इस टूट को कैसे देखें

अवधेश कुमार

बिहार की रजनीति अचानक उन खबरों के लिए सुर्खियों में आ गई है, जिनको सामान्यतः कोई पसंद नहीं करेगा। पहले राजद के 13 विधायकों को अपनी पार्टी से नाता तोड़ने की खबरें आई और ऐसा लगा जैसा भूचाल आ गया। हालांकि उसके कुछ ही दिनों बाद विधानसभा में दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी के साथ छः विधायक पत्रकार वार्ता में आ गए और आरोप लगाया कि उनके साथ धोखाधड़ी हुआ है। किसी ने कहा कि उन्होंने हस्ताक्षर किया ही नहीं है तो कुछ ने कहा कि उनसे कागज पर हस्ताक्षर कराए गए थे, पर वह दल बदल का नहीं था। लालू यादव प्रसाद के पटना पहुंचने तक स्थिति काफी बदल गई थी और विधायक दल की बैठक में उन 13 में से 9 विधायक शामिल हो गए। यानी टूटे समूह में केवल चार विधायक रह गए है। लालू यादव तत्काल कुछ हद तक राहत महसूस कर सकते हैं,पर उनके लिए निश्चिंतता का कोई कारण नहीं है। उनके लिए स्थितियां अनुकूल नहीं हो पा रहीं हैं। पहले चारा घोटाला में जेल, और सजा के कारण चुनाव लड़ने से वंचित, फिर राम विलास पासवान के भाजपा के साथ जाने की खबर और अब विद्रोह, जिसका पूरी तरह अंत नहीं हुआ। निश्चय ही लालू यादव अपने जीवन के सबसे बुरे राजनीतिक दौर से गुजर रहे हैं। हालांकि बिहार की वर्तमान राजनीति में लालू यादव को खत्म मान लेना भूल होगी, पर यह घटना उनके लिए आघात है, क्योंकि ऐन लोकसभा चुनाव के पूर्व इससे जनता के बीच गलत संदेश जा सकता है। 

इस बात पर कौन विश्वास कर सकता है कि विधायकों की आंखों में धूल झांेककर हस्ताक्षर करा लिया गया। ध्यान रखने की बात है कि पिछले 14 फरबरी को ही इन विधायकों के हस्ताक्षर से विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा गया था जिसमें इन्हें अलग दल के रुप में मान्यता देने का अनुरोध किया गया था। खबर तो तब बाहर आई जब सचिव ने उन्हें अलग बैठने की व्यवस्था करने वाला पत्र जारी कर दिया। जनता दल-यू के नेताओं ने जिस तरह इस खबर पर प्रसन्नता व्यक्त की उससे यह समझने में किसी को कठिनाई नहीं हो सकती थी कि इसके पीछे लंबे समय से खेल हो रहा था। जब नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होने का निर्णय किया उसी समय से बिहार में यह खबर फैल गई थी कि राजद के ज्यादातर विधायक किसी दिन उनके पाले में आ सकते हैं। लालू यादव नीतीश कुमार को जमकर कोस रहे हैं। उनका आरोप है कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गई और इसे बचाने के लिए वो तोड़ फोड़ कर रहे हैं। इसके जवाब में नीतीश कुमार कहते हैं कि पार्टियों को तोड़ने में तो लालू जी को महारत हासिल है। यह ठीक है कि अपने कार्यकाल में लालू यादव ने बिहार के सभी पार्टियों में सेंध लगाई थी। कांग्रेस को तो उन्होंने लगभग साफ ही कर दिया है। बहरहाल, इससे तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि नीतीश कुमार और उनके साथियों के गोपनीय तरीके से शह देने के कारण ही ऐसी नौबत आई है। नीतीश के लिए अपनी सरकार को निर्धारित समय तक बनाए रखने के लिए अतिरिक्त विधायकांे का समर्थन चाहिए। 

हालांकि दल बदल कानून के अनुसार राजद के 22 विधायकों में से अगर दो तिहाई यानी कम से कम 16 विधायक हों तो वे अलग होकर किसी पार्टी में सामूहिक रुप से शामिल हो सकते हैं। अगर नहीं हों तो उनकी सदस्यता जा सकती है। किंतु यहां पहले अध्यक्ष ने 13 विधायकों को अलग मान्यता दे दी तभी सचिव ने पत्र जारी किया। यह अध्यक्ष की जिम्मेवारी है कि वह यह निश्चित कर ले कि जिन विधायकों का नाम उसमें शामिल हैं उनके हस्ताक्षर सही हैं या नहीं। वे उन सारे सदस्यों से बात करके संतुष्ट हो सकते हैं। अध्यक्ष ने ऐसा किया या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। टूटे गुट के नेता सम्राट चौघरी का दावा है कि विधानसभा अध्यक्ष के पास सब गए थे और सभी ने हस्ताक्षर किया था। अगर लालू यादव के राजभवन मार्च को देखा जाए तो उसमें भी वे नौ विधायक शामिल थे। इससे स्थिति जटिल हो गई है। संविधान का प्रावधान जो भी हो, पर सदन के अंदर अध्यक्ष के अधिकार विस्तृत हैं। यदि एक बार अध्यक्ष ने उनको मान्यता दे दी तो फिर उसे बदलने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना होगा। न्यायालय का सम्मन, जवाब, बहस इसमें काफी समय लगेगा। उनकी सदस्यता रहने या जाने का निर्णय इस समय अध्यक्ष को ही करना है। न्यायालय में यह मामला बाद में जाएगा। 

निस्संदेह, इस प्रकार अपने दल को छोड़कर दूसरे दल में जाने की घटना को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता है। 80 के दशक में इसे आयाराम गयाराम नाम दिया गया था। उससे बचने के लिए राजीव गांधी मंत्रिमंडल ने 1985 में संविधान की 10वीं अनुसूची के रुप में दल बदल का प्रावधान बनाया। उसमें पाला बदलने के लिए कम से कम एक तिहाई दल के सदस्यों का साथ होना आवश्यक बना दिया गया। अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में इसमें संशोधन किया गया। इसके अनुसार दलबदल की मान्यता खत्म की गई, लेकिन बाद में इसमें यह प्रावधान जोड़ा गया कि अगर दे तिहाई सदस्य एक साथ किसी दल में शामिल हो जाते हैं तो इसे स्वीकार किया जा सकता है। इसमें अध्यक्ष ने पहले 13 सदस्यों को कैसे मान्यता दे दी यह समझना कठिन है। लेकिन संवैधानिकता से परे यहां सबसे पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि आखिर शुचिता की राजनीति का दावा करने वाले नीतीश कुमार को आने वाले समय में किसी प्रकार के मुख्यमंत्री के रुप में याद किया जाएगा? उनकी ओर से भले इसके पीछे किसी भूमिका से इनकार किया जाए, पर सच तो सच है। उनके सारे प्रवक्ता एक स्वर में इस टूट का समर्थन करते रहे। 

हालांकि इसका दूसरा पहलू कहीे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सजा के बाद लालू प्रसाद यादव की महिमा पहले से ज्यादा कमजोर हुई है अन्यथा एक भीं विधायक उनका साथ छोड़ने का साहस नहीं करते। इस समय भले उने साथ 18 विधायक दिख रहे हैं, पर इनमें से कितने दिल से उनके साथ है कहना कठिन है। सभी नौ लोगों की असहमति के बावजूद सम्राट चौधरी ने उनका नाम लिख लिया होगा यह मानने का कोई कारण नहीं है। वास्तव में सच यही है कि राजद में कुछ विश्वसनीय लोगों को छोड़ दें, विधायकों एवं नेताओं में असंतोष और अपने भविष्य की चिंता गहरे समाई हुई है। सम्राट चौधरी ने लालू पर कांग्रेस के पाले में बैठने को अपने कदम का आधार बताया है। चौधरी ने यह भी कहा है कि लालू सामाजिक न्याय के रास्ते से भटक गए हैं। इस बात में दम तो है। गैर कांग्रेसवाद पर राजनीति में एक समय हीरो बने लालू यादव जिस तरह कांग्रेस के पाले में गए उसके पीछे कोई नैतिक सोच नहीं हो सकती है। सामाजिक न्याय के सिद्धंात का लालू यादव ने केवल अपने जन समर्थन और चुनाव जीतने के हथियार के रुप में उपयोग किया। हालांकि तब इन नेताओं ने उनके खिलाफ विद्रोह नहीं किया। इसलिए इनकी बातें सही होते हुए भी इसे ईमानदार वक्तव्य नहीं माना जा सकता। वैसे लालू यादव के विधायकों के अंदर असंतोष के कई दूसरे कारण भी हैं। लगातार दो विधानसभा चुनाव में पराजय, फिर लोकसभा में पराजय से निराशा तो थी ही। ज्यादातर नेता यह सोचते थे कि इस पार्टी में उनका कोई भविष्य नहीं है। लालू यादव द्वारा पत्नी राबड़ी देवी के बाद अपने पुत्र के हाथों नेतृत्व थमाने के निर्णय ने भी नेताओं व विधायकों के असंतोष को बढ़ाया है। 

बावजूद इन सबके यदि नीतीश कुमार की सरकार न होती तो इस तरह का विद्रोह नहीं होता। नीतीश इनके संपर्क में तब से थे, जब भाजपा का साथ उन्होंने छोड़ा भी नहीं था। यदि उन्हें उड़ीसा के नवीन पटनायक की तरह भाजपा को अलग करना था तो फिर लालू की पार्टी के विधायकों को गटकना जरुरी है। इसमें यदि समय लगा तो उसका कारण सिर्फ इतना है कि विधायकों को पुरस्कार का निश्चित वायदा नहीं मिल पा रहा था। संभवतः कुछ विधायकों के वापस आने का कारण भी यही है कि उन्हंे पुरस्कार की गारंटी नहीं मिली है। चलिए लालू यादव की पार्टी में असंतोष है, पर यहां यह भी निष्कर्ष निकलता है कि नीतीश कुमार ने केवल अपने अहं और नासमझी में राजग को तोड़ दिया। भाजपा के मंत्री उनके नेतृत्व में पूरे अनुशासन से काम कर रहे थे। अगर वे अपने अहं और गलत सोच का शिकार होकर भाजपा से अलग नहीं होते तो फिर इस तरह टूट और दलबदल को प्रोत्साहित करने के कलंक का आरोप उन पर नहीं लगता। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


रविवार, 23 फ़रवरी 2014

नई पीढ़ी-नई सोच की ओर से 296 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई

संवाददाता

नई दिल्ली। पूरे देश में पोलियो खत्म हो चुका है इसी की कड़ी में राजधानी में पल्स पोलियो दिवस को लेकर बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई व संकल्प लिया गया कि अब दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश को पोलियो को दूबारा पनपने नहीं दिया जाएगा।
नईं पीढ़ी-नईं सोच की ओर से हर बार की तरह इस बार भी पल्स पोलियो टीकाकरण कैम्प लगाया गया जिसमें 296 बच्चों ने पोलियो की दवा पी। यह कैम्प संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लिनिक बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क में लगाया गया। इस कैम्प का उद्घाटन संस्था के सरपरस्त श्री अब्दुल खालिक ने किया। उनके साथ संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन भी मौजूद थे।
कैम्प में बच्चों को पोलियो की ड्राप्स सुबह 9 बजे से ही पिलाईं जाने लगी थी और शाम 4 बजे तक 296 बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाईं गईं। संस्था के पदाधिकारियों और सदस्यों ने घर-घर जाकर लोगों को पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए प्रोरित किया और पोलियो की ड्राप्स न पिलाने के नुकसान बताए।
अब्दुल खालिक ने कहा कि संस्था हमेशा हर तरह के राष्ट्रीय प्रोग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है और बीच-बीच में जनता को भी इन प्रोग्राम के प्रति जागरूक करती है। संस्था के सदस्यों ने आज पूरी दिन लोगों के घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो केंद्र पर 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाने के लिए कहा।
संस्था के अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम लोगों की मदद करते रहें, क्योंकि दूसरों की मदद करने में जो शुकून मिलता है वह और किसी दूसरे काम में नहीं मिलता।
संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि सरकार द्वारा चलाईं जा रही मुहिम को हम जनता तक पहुंचा रहे हैं। आज पोलियो जड़ से खात्मे की ओर जा चुका है दूसरी बीमारियों पर भी सरकार जल्द कामयाबी हासिल कर लेगी और कुछ बीमारियों पर कामयाबी हासिल कर चुकी है।
इस अवसर पर सरपरस्त अब्दुल खालिक, संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन, मौ. रियाज, डॉ. आर. अंसारी, आजाद, अंजार, मौ. सज्जाद, शान बाबू, इरफान आलम, मो. सहराज यामीन, विनोद, अब्दुल रज्जाक आदि मौजूद थे।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

तेलांगना पर ऐसी अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता था

अवधेश कुमार

तेलांगना भारत के 29 वें राज्य के रुप में स्वीकृत हो गया। हालांकि अभी इसके व्यावहारिक और राजनीतिक रुप से अस्तित्व में आने में समय लगेगा, लेकिन संसद के दोनों सदनों द्वारा इसे पारित किए जाने के बाद हमने दो दृश्य एक साथ देखे। तेलांगना क्षेत्र में जहां खुशियां मनाईं गईं वहीं सीमांध्र में बंद और मातम जैसा दृश्य था। वस्तुतः संसद से लेकर सड़क तक इस राज्य के गठन के पूर्व ही जैसा तनावपूर्ण दृश्य दिखा और जिस तरह की घटनाएं हुईं वे कई दृष्टियों से भयभीत करने वाले हैं। लोकसभा में तो राज्य विधेयक जिस तरह पारित किया गया वह निस्संदेह, आपत्तिजनक था। सारे दरवाजे बंद, बाहर से भीतर तक काले गणवेश में डरावने सुरक्षाकर्मियों की फौज...बहस की कोई संभावना नहीं, लाइव प्रसारण स्थगित......। पूरा वातावरण संसदीय लोकतंत्र की दृष्टि से असहज था। सरकार यह तर्क दे सकती है कि आखिर उसके पास चारा क्या था। जबसे सरकार ने पृथक तेलांगना राज्य निर्माण के पक्ष में हामी भरी संयुक्त आंध्र समर्थक सांसदों ने जैसा तीखा विरोध किया उसमें संसद की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी है। 17 फरबरी को जब शिंदे विधेयक पेश करने वाले थे....मारपीट से लेकर मीर्च स्प्रे तक की घटना हो गई। संसद के बाहर विजय चौक से लेकर जंतर-मंतर पर इसके विरोध में धरना प्रदर्शन चल रहा था। अंदर और बाहर तनाव की स्थिति में अगर संसद के इस अंतिम सत्र में विधेयक पारित करना था तो फिर सरकार को कुछ अभूतपूर्व कड़े इंताजम करने ही थे। अगर पिछली बार की तरह सुरक्षा इंतजाम के अभाव में हिंसा हो जाती तो सरकार को हम कठघरे में खड़ा करते। राज्य सभा में भी सीमांध्र के सांसदों ने उसी तरह का दृश्य प्रस्तुत करने की कोशिश की। राज्य सभा महासचिव के साथ वैसे ही धक्कामुक्की की जैसी 17 फरबरी को लोकसभा के महासचिव की गई थी। वहां भी वैसे ही विरोध और हंगामा। पहले गृहमंत्री को विधयेक प्रस्तुत करने से रोकने की पूरी कोशिश और फिर प्रधानमंत्री तक के भाषण में कठिनाई पैदा की गई। किंतु प्रश्न है कि नौबत यहां तक आई क्यों? 

राज्य के विभाजन की मांग को मूर्त रुप देने के पहले दोनों पक्षों के बीच सहमति के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए था। तेलांगना जिस तरह लंबे समय से समूचे आंध्र में भावनाओं के उफान का मुद्दा बना हुआ है उसमें तो इसकी अपरिहार्यता थी। इस मामले में सरकार की भूमिका भी कमजोर रही और विपक्ष ने तो कुछ किया ही नहीं। इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि कांग्रेस अपने प्रदेश सरकार तक को इसके लिए राजी नहीं कर पाई, उसके मुख्यमंत्री तक ने पद और पार्टी से इस्तीफा दे दिया। तेलांगना पहला राज्य होगा जिसका गठन प्रदेश की विधानसभा द्वारा विभाजन प्रस्ताव खारिज किए जाने के बावजूद हो रहा है। इसके पूर्व 2000 में जो तीन राज्य बने उनमें उत्तरप्रदेश विधानसभा ने उत्तराखंड का, मध्यप्रदेश ने छत्तीसगढ़ का एवं बिहार ने झारखंड का प्रस्ताव पारित किया। तेलांगना एवं सीमांध्र क्षेत्र के मंत्रियों, विधायकों एवं सांसदों के बीच उग्रता की इतनी बड़ी खाई पैदा हो गई कि आज ये एक दूसरे के जानी दुश्मन जैसे दिख रहे हैं। ऐसे तनाव की स्थिति में विभाजन के बाद वहां का दृश्य कैसा होगा? ऐसे तनाव की स्थिति में विभाजन के बाद वहां का दृश्य कैसा होगा? वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी इसे संसदीय इतिहास में काला दिन करार देते हुए कह रहे हैं कि पार्टी इस फैसले को कभी स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने प्रदेश में आंदोलन आरंभ कर दिया है। सीमांध्र के दूसरे नेताओं का तेवर भी यही है। तो होगा क्या? वास्तव में सीमांध्र के नेताओं ने विभाजन रोकने की हर संभव कोशिश की। आंदोलन से लेकर सभी पार्टियों के नेताओं से मुलाकात कर इसमें मदद मांगी और यहां तक कि इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय तक गए, पर उनके सारे प्रयास व्यर्थ रहे। वे सब इसे आसानी से स्वीकार तो कर नहीं सकते।

सीमांध्र की चिंता और उत्तेजना अकारण नहीं है। तेलांगना के अलग होते ही आंध्र के चार महत्वपूर्ण बड़े शहर वर्तमान राजधानी हैदराबाद, वारंगल, निजामाबाद और नलगोंडा उसमें चला जाता है। हैदराबाद आंध्र का सबसे विकसित शहर है। यह अलग प्रदेश में चला जाए तटीय आंध्र एवं रायलसीमा के लोगों के लिए इसे गले नहीं उतार पाना कठिन है। वास्तव में तेलांगना के साथ केवल 41.6 प्रतिशत आबादी ही नहीं जाएगी, भारी कृत्रिम एवं प्राकृतिक संसाधन भी तेलांगना में चला जाएगा। पश्चिम से पूरब की ओर बहने वाली चार नदियां मुसी, मंजीरा, कृष्णा और गोदावरी के ज्यादा हिस्से पर इसका अधिकार होगा। कृष्णा नदी का तो 68 प्रतिशत पानी आंध्र प्रदेश से छिन जाएगा। 45 फीसदी जंगल तेलंगाना क्षेत्र में है। देश के पास मौजूद कोयले के कुल भंडार का 20 प्रतिशत हिस्सा तेलंगाना में है, यह लाइमस्टोन (चूने का पत्थर) से भी भरपूर इलाका है, जिसकी सीमेंट उद्योग में जरुरत पड़ती है, बॉक्साइट और माइका जैसे खनिज भी भरपूर मात्रा में यहां है। इनका छीन जाना यकीनन बहुत बड़ी क्षति है। हालांकि केन्द्र ने इनके लिए क्षतिपूर्ति राशि देने का ऐलान किया है, लेकिन इससे किसी को संतोष नहीं हो सकता। 

तेलांगना के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो कांग्रेस के लिए इसमें गहरे सबक निहित थे। अगर वह इस बात का विचार करती कि आजादी के पूर्व और बाद में उतने उग्र आंदोलन के बावजूद उसे अलग क्यों नहीं किया गया तो उसका निष्कर्ष कुछ और आता। प. नेहरु तो आरंभ में तेलूगुभाषियों के लिए मद्रास स्टेट से अलग राज्य के ही पक्ष में नहीं थे, लेकिन पोट्टी श्रीरामुलु की आमरण अनशन के दौरान 15-16 दिसंबर, 1952 की रात में हुई मौत के बाद जो हिंसा फैली उससे वे दबाव में आए और 1 नवंबर, 1953 को मद्रास स्टेट से अलग आंध्रप्रदेश राज्य का गठन कर दिया गया। किंतु राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा अलग तेलंगाना की सिफारिश के बावजूद इसे स्वीकार नहीं किया गया। आज जो कुछ हो रहा है उसका अंदेशा हमारे दूरदर्शी नेताओं का तब भी था। आंध्र का सामाजिक वातावरण अन्य राज्यों से काफी अलग है। इसके पूर्व बंटने वाले राज्यों में इतना उग्र दृश्य कभी नहीं देखा गया। महाराष्ट्र और गुजरात कभी एक थे, दो हुए , विरोध भी हुआ पर ऐसा नहीं। इसके कारणों की अगर आज ईमानदारी से पड़ताल की जाती तो सरकार का मत दूसरा होता। ऐसा लगता है कि तात्कालिक राजनीतिक कारणों ने भी इसमें प्रबल भूमिका निभाई है। संप्रग एक में तेलांगना राष्ट्रसमिति के सरकार में शामिल होने से इसकी शुरुआत हुई और कांग्रेस इतना आगे बढ़ गई कि वापस होने के रास्ते बंद हो चुके थे। तेलंगाना के अंदर कुल 17 लोकसभा स्थान आते हैं। भाजपा एवं कांग्रेस दोनों की नजरें उन स्थानों पर हैं। कांग्रेस के लिए सीमांध्रा की 25 लोकसभा स्थानों पर चुनौतियां काफी बढ़ गईं हैं। तेलंगाना का विरोध कर रही वाईएसआर कांग्रेस और तेलुगू देशम सीमांध्र के दोनों इलाकों-तटीय आंध्र और रायलसीमा में़ मजबूत हो रही है। भाजपा मानती है कि वाईएसआर कांग्रेस और तेदेपा के कांग्रेस विरोध के कारण लोकसभा चुनाव के बाद सत्ता के समीकरण में उसे इन दलों का समर्थन मिल सकता है। इसलिए वह सरकार का विरोध करते हुए भी विभाजन के पक्ष में दिखती रही। 

तेलांगना क्षेत्र के लोगों की कई शिकायतें वाजिब हैं। उदाहरण के लिए तेलंगाना में कुल कृषि योग्य जमीन के केवल 15 प्रतिशत हिस्से में नहरों के पानी से सिंचाई होती है जबकि तटीय आंध्र में खेतों के 57.1 प्रतिशत हिस्से में। तेलंगाना के किसानों की शिकायत है कि उनके इलाके में नहरों का विकास उस तरह से नहीं किया गया जैसा होना चाहिए। तेलांगनावासी मानते हैं कि अलग राज्य बनने से इस तरह की समस्याओं का समाधान होगा और प्राकृतिक संसाधनों पर उनका हक होगा। लेकिन तेलांगना की शिकायतों का निदान विभाजन ही था इस पर एक राय कभी नहीं रही। विभाजन की मांग के पीछे वाजिब कारणों के साथ कई प्रकार के निहित स्वार्थी तत्वों की भूमिका भी रही है। देश भर में सक्रिय माओवादियों के ज्यादातर प्रमुख नेता तेलांगना क्षेत्र के ही हैं। असंतोष का लाभ उठाते हुए माओवादियों ने वहां काफी विस्तार किया है। आंध्र में सबसे ज्यादा माओवादी हिंसा तेलंगाना क्षेत्र में ही हुआ है। तेलंगाना आंदोलन में माओवादी विचारधारा से प्रभावित लोग शामिल हैं। इसलिए यह आशंका निराधार नहीं है कि विभाजन के बाद तेलांगना में वे काफी शक्तिशाली होंगे। यह वैसे ही हो सकता है जैसे छत्तीसगढ़ और झारखंड में। इसके अलावा हैदराबाद, करीमनगर आदि में जिस तरह जेहादी आतंकवादियों ने अपना पैर फैलाया हुआ है वह भी जगजाहिर है। एक छोटे राज्य के लिए इनका सामना करना कितना कठिन होगा इसकी कल्पना से भय पैदा होता है। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408

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