शनिवार, 25 जनवरी 2014

उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

अवधेश कुमार

निस्संदेह, उच्चतम न्यायालय के इस फैसले पर कोई स्पष्ट राय व्यक्त करना कठिन है। दुर्दांत अपराधियों के साथ दया दिखाई जाए इसकी मानसिकता अभी भारत सहित दुनिया में नहीं है। उच्च्तम न्यायालय के फैसले से जिन 15 लोगों की फांसी आजीवन कारावास में बदली है वे सब दुर्दांत अपराध करने वाले हैं। हालांकि उनकी पूरी जिन्दगी जेल में ही कटेगी, किंतु वर्षों तक मौत के भय में जीने से यह बेहतर है। इस फैसले में किन लोगों को राहत मिली यह महत्वपूर्ण है, पर इससे भी महत्वपूर्ण है न्यायालय द्वारा दिए गए आधार और निर्धारित मापदंड। मसलन, न्यायालय ने कहा कि दया याचिका पर फैसले में देरी मत्युदंड को उम्रकैद में तब्दील करने का पर्याप्त आधार है। इसका अर्थ यह है कि एक बार मृत्युदंड की उच्चतम न्यायालय ने अंतिम पुष्टि कर दी यानी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी तो प्रक्रिया इस तरह होनी चाहिए कि दया याचिका पर फैसला जल्दी हो और उसे तुरत अमल में ला दी जाए। न्यायालय के अनुसार दया याचिका खारिज होने के 14 दिनों के भीतर दोषी को फांसी की सजा हो जानी चाहिए। यानी अगर उनकी दया याचिका का निपटारा समय पर हो जाती तो ये अपराधी आज दया के पात्र नहीं बनते। हालांकि 12 अप्रैल 2013 को खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट के आतंकी देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर की उस याचिका को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था, जिसमें उसने दया याचिका के निपटारे में हुई देरी के आधार पर फांसी की सजा को उम्रकैद में बदले जाने की गुहार लगाई थी। न्यायालय ने कहा था कि ऐसा मामला जो आतंकवाद से जुड़ा हो और जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की हत्या हुई हो देरी के आधार पर फांसी की सजा उम्रकैद में तब्दील नहीं की जा सकती। उसके बाद यह निष्कर्ष निकाला गया था कि अन्य याचिकाएं भी इसी तरह खारिज हो जाएंगी। जाहिर है, न्यायालय ने इसके उलट व्यवस्था दी है तो इसके अर्थ यकीनन गंभीर हैं। 

उच्चतम न्यायालय के इस फैसले की कई तरीके से व्याख्या की जा सकती है। सबसे पहले तो यही कि न्याय में विलंब अगर अन्याय का सूचक है तो न्याय होने के बाद उसका अमल न किया जाना भी। अगर सजा मिलने और दया याचिका खारिज किए जाने के जाने के लंबे समय तक फांसी नहीं दी जाती या दया याचिका लंबे समय तक लंबित रहती है तो न्याय का जो सिद्धांत है वही पराजित हो जाता है। इसके पूर्व भी उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदंड पाए अपराधी को फांसी पर न चढ़ाए जाने की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान केन्द्र एवं राज्य सरकारों के खिलाफ 20 सितंबर 2009 को काफी तल्ख टिप्पणी की थी। न्यायालय ने कहा था कि अगर मृत्युदंड पाए व्यक्ति की दया याचिका का शीघ्र निपटारा नहीं किया जाता तो उसके एवं उसके रिश्तेदारों को यह अधिकार मिल जाता है कि वे मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिणत करने की मांग करेे।’.....‘हम इस बात को जोर देकर कहना चाहते हैं कि मनुष्य संपत्ति या दास नहीं है और कुछ विस्तृत राजनीतिक एवं सरकारी नीतियों को पूरा करने के लिए उनका कठपुतली की तरह इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।’ कहा जा सकता है कि करीब साढे तीन वर्ष पूर्व न्यायालय ने जो टिप्पणी की थी अब उसे अपने फैसले द्वारा पूरा कर दिया है।  

इसे पूरी तरह समझने के लिए फैसले की पृष्ठभूमि पर संक्षिप्त नजर डालना आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय के सामने 15 ऐसी याचिकाएं आ गईं थीं जिनमें दया याचिका के निपटारे में देरी का हवाला दिया गया था। दो मामले उच्च न्यायालय में लंबित थे। पिछले वर्ष 18 फरवरी को उच्चतम न्यायालय ने सारे मामले को एक तीन सदस्यीय वृहत्तर पीठ के हवाले किया जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशीवम ने किया है। सबकी अपील यही थी कि उनकी दया याचिका के निपटारे मंे देरी हुई है, इसलिए उनकी फांसी की सजा उम्रकैद में बदल दी जाए। दुर्दान्त अपराधी चंदन तस्कर वीरप्पन के उन साथियों गनन प्रकाश, साइमन,, मिसेकर और बिलावेंदन की फांसी पर रोक लगाई गई थी जिनने न जाने कितनों की निर्दयता से हत्या की होगी। इन चारों को उच्चतम न्यायालय ने 2004 में फांसी की सजा सुनाई थी। न्यायालय ने इसके बाद 6 अप्रैल को 8 अन्य अपराधियों सुरेश, रामजी, गुरुमीत सिंह, प्रवीण कुमार, सुंदर सिंह, जाफर अली, सोनिया और उसके पति संजीव की फांसी पर रोक लगा दी थी। हरियाणा की सोनिया और उसके पति संजीव ने 2001 में अपने परिवार के  संपत्ति के लिए 8 रिश्तेदारों की नृशंस हत्या कर दी थी। उच्चतम न्यायालय ने 15 फरवरी 2007 को दोनों को फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में दोनों ने पुनर्विचार यायिका दाखिल की, जिसे न्यायालय ने 23 अगस्त 2007 को खारिज कर दिया। इसके बाद इन दोनों ने दया याचिका दायर की, जिसे राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया। आज तक इनकी सजा पर अमल नहीं हुआ। धर्मपाल को बलात्कार और हत्या मामले में मई 1997 में फांसी की सजा सुनाई थी। दया याचिका खारिज होने के बाद इन्होंने पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल की। एक अन्य अपराधी  एस. एन. नाटिकर ने दया याचिका खारिज होने के बाद कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपील किया था। इसका कहना था कि उसकी दया याचिका 7 साल से लंबित है। उच्चतम न्यायालयने 2005 में इसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा था, जिसके बाद इसने दया याचिका दायर की थी।

सरसरी तौर पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि सबकी दया याचिका में अत्यंत ही देरी हुई और कई बार सरकार ने जानबूझकर अनाप-सनाप निर्णय किए। एक उदाहरण देखिए। 1 मई 2013 को उच्चतम न्यायालय ने हत्या के अपराधी एम. एन. दास की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। वह ऐसा अपराधी हे जो पैरोल परबाहर आया और एक व्यकित का सिर काटकर थाने चला गया। उसकी दया याचिका पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने खारिज कर दिया था। उसने उच्चतम न्यायालय में अर्जी दी कि उसकी दया याचिका निपटाने में 11 साल लगे, 14 साल से वह जेल में है, इसलिए उसकी फांसी की सजा रोकी जाए। सत्र न्यायालय ने दास को 1997 में फांसी की सजा सुनाई थी। उच्चतम न्यायालय ने भी 1999 में दास की सजा को बरकरार रखा था। सितंबर, 2004 में गृहमंत्रालय ने मत दिया कि दया याचिका खारिज होनी चाहिए। 30 सितंबर, 2005 को राष्ट्रपति कलाम ने कहा कि दया याचिका स्वीकार की जा सकती है। लेकिन 5 वर्ष बाद 18 अक्टूबर, 2010 को गृह मंत्रालय की ओर से जो अनुशंसा भेजी गई, उसमें पूर्व राष्ट्रपति कलाम की नोटिंग का जिक्र नहीं किया। राजीव गांधी के हत्यारे पेरारिवालन, संथान और मुरुगन का मामला लीजिए। निचली अदालत ने 8 नवंबर 1997 में फांसी की सजा सुनाई थी। उच्चतम न्यायालयने 11 मई 1999 को फांसी की सजा बरकार रखी। इसके बाद राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दायर की गई, जिसे राष्ट्रपति ने करीब 12 वर्ष बाद 2011 में खारिज किया। इसका क्या अर्थ है? अंततः इन दोषियों को 9 सितंबर 2012 को फांसी पर लटकाया जाना तय किया गया लेकिन इसी बीच इन्होंने दया याचिका में देरी के आधार पर मद्रास उच्च न्यायालय में फांसी रोकने की गुहार लगाई जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।

इस तरह सारे मामलों पर विचार करें तो फैसला का कारण केवल दया याचिका के निपटारे एवं अमल में हुआ विलंब है। कह सकते हैं कि न्यायालय ने इन प्रमाणित अपराधियों को सरकारी दुर्बलता का लाभ दे दिया है। जाहिर है, इससे फांसी की सजा के बाद दया याचिकाओं के निपटारे और उसके क्रियान्वयन को नए सिरे से पटरी पर लाने की अनिवार्यता भी महसूस होती है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को संविधान में प्राप्त माफी देने का अधिकार संवैधानिक दायित्व है। वे दया यायिका कितने दिनों में निपटाएं इसकी समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, पर अगर कोई दया याचिका डालता है तो प्राधिकरण का दायित्व है कि हर स्तर पर तेजी से काम किया जाए। न्यायालय ने फांसी को उम्रकैद में बदलने के लिए कई आधार दिए है- जैसे देरी, पागलपन, फैसले का आधार गलत साबित हो जाए, प्रक्रियागत खामियां...आदि। लेकिन उसने साफ कर दिया है कि अगर अनुचित और अतार्किक विलंब होता है तो फांसी को उम्रकैद में बदला जा सकता है। इन याचिकाओं को स्वीकार करने के लिए उसने अपने अंतिम तर्क को ही आधार बनाया है। हालांकि पागलपन का प्रमाण पत्र फर्जी भी हो सकता है। किंतु राष्ट्रपति के यहां दया यायिकाएं इतने लंबे समय तक लंबित क्यों रहनी चाहिए? यहीं पर सरकार की भूमिका सामने आती है। राष्ट्रपति और राज्यपाल अंततः सरकार के सुझाव पर ही अमल करते है। याचिका गृहमंत्रालय जाता है जो कानून मंत्रालय को स्थानांतरित करता है वह संबंधित राज्य से जानकारी लेकर अपनी राय देता है और उसके आधार पर गृहमंत्रालय अनुशंसाएं करता है। यायिकाओं पर विचार सरकार की प्राथमिकता कभी नहीं रही। इस फैसले में उसे परोक्ष तौर पर यही कहा गया है कि आप इसे भी प्राथमिकता में लें। उम्मीद करनी चाहिए कि केन्द्र एवं राज्य सरकारें तथा जेल प्रशासन उच्चतम न्यायालय के इस फैसले को उसकी भावनाओं के अनुरुप स्वीकार करते हुए अपनी सोच और कार्यप्रणाली में बदलाव लाएगा जिससे न्यायालय की सजा उसके सिद्धांत के अनुरुप अमल में आएगा।  

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष-1122483408, 09811027208

रविवार, 19 जनवरी 2014

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था की ओर से 356 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई

संवाददाता

नई दिल्ली। राजधानी में पल्स पोलियो दिवस को लेकर बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई व संकल्प लिया गया कि दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश को पोलियो मुक्त बना के रहेंगेे।
नई पीढ़ी-नई सोच की ओर से हर बार की तरह इस बार भी पल्स पोलियो टीकाकरण कैम्प लगाया गया जिसमें 356 बच्चों ने पोलियो की दवा पी। यह कैम्प संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लिनिक बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क में लगाया गया। इस कैम्प का उद्घाटन संस्था के सरपरस्त श्री अब्दुल खालिक ने किया। उनके साथ संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन भी मौजूद थे।
कैम्प में बच्चों को पोलियो की ड्राप्स सुबह 9 बजे से ही पिलाईं जाने लगी थी और शाम 4 बजे तक 356 बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाईं गईं। संस्था के पदाधिकारियों और सदस्यों ने घर-घर जाकर लोगों को पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए प्रोरित किया और पोलियो की ड्राप्स न पिलाने के नुकसान बताए।
अब्दुल खालिक ने कहा कि संस्था हमेशा हर तरह के राष्ट्रीय प्रोग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है और बीच-बीच में जनता को भी इन प्रोग्राम के प्राति जागरूक करती है। संस्था के सदस्यों ने आज पूरी दिन लोगों के घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो केंद्र पर 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाने के लिए कहा।

संस्था के अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम लोगों की मदद करते रहें, क्योंकि दूसरों की मदद करने में जो शुकून मिलता है वह और किसी दूसरे काम में नहीं मिलता।
संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि सरकार द्वारा चलाईं जा रही मुहिम को हम जनता तक पहुंचा रहे हैं। आज पोलियो जड़ से खात्मे की ओर जा चुका है दूसरी बीमारियों पर भी सरकार जल्द कामयाबी हासिल कर लेगी और कुछ बीमारियों पर कामयाबी हासिल कर चुकी है।
इस अवसर पर सरपरस्त अब्दुल खालिक, संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन, मौ. रियाज, डॉ. आर. अंसारी, आजाद, अंजार, मौ. सज्जाद, शान बाबू, नईंम, यामीन, विनोद, अब्दुल रज्जाक आदि मौजूद थे।

शनिवार, 18 जनवरी 2014

कांग्रेस में प्रिय़ंका की सक्रियता

अवधेश कुमार

अगर प्रियंका बाड्रा राहुल गांधी के निवास पर पार्टी के प्रमुख नेताओं के साथ बैठक में शामिल होतीं हैं तो फिर इसकी सुर्खियां बनना बिल्कुल स्वाभाविक है। महासचिव जनार्दन द्विवेदी के यह कहने भर से कि प्रियंका गांधी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार की सदस्य हैं, हो सकता है वह सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेती नहीं दिखती हों लेकिन वह लंबे समय से कांग्रेस की सक्रिय सदस्य है, और समय-समय पर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ वह चर्चा करती रही हैं, अटकलों को विराम नहीं लग सकता। राहुल की अनुपस्थिति में पहले अकेले उनके घर पर प्रमुख शीर्ष नेताओं के साथ बैठक करना सामान्य घटना नहीं हो सकती। बैठक में अहमद पटेल, जयराम रमेश, जनार्दन द्विवेदी, मधुसूदन मिस्त्री, मोहन गोपाल, अजय माकन, बी. के. हरिप्रसाद, शकील अहमद शामिल थे। ध्यान दीजिए उस बैठक में छह महासचिवों एवं सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की उपस्थिति का मतलब कांग्रेस के थिंक टैंक यानी रणनीतिकारों की उपस्थिति है। ऐसेे नेताओं के साथ राहुल के आवास पर  प्रियंका की बैठक का महत्व आसानी से समझा जा सकता है। इसके दूसरे दिन स्वयं सोनिया गांधी भी इस बैठक में शामिल हुईं तो इसे किसी तरह से सामान्य मेल-मुलाकात नहीं माना जा सकता है। इस बैठक के बाद ही अलग-अलग राज्यों में लोकसभा उम्मीदवार चयन की स्क्रीनिंग समितियों की घोषणा हुई एवं उसके लिए राज्यवार प्रभारियों की भी नियुक्ति हो गई है। तो प्रियंका की औपचारिक शिरकत के अर्थ और संकेतों को समझना होगा। 

प्रियंका बाड्रा पर सक्रिय राजनीति में आने की मांग तब से उठती रही है जब सोनिया गांधी ने 1998 लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करना स्वीकार किया था। उत्तर प्रदेश के कई क्षत्रों से बाजाब्ता प्रस्ताव पारित कर उनसे कांग्रेस में सक्रिय होने का अनुरोध किया गया। प्रियंका ने अपने को परिवार तक सीमित रखते हुए सोनिया एवं राहुल के संसदीय क्षेत्रों रायबरेली एवं अमेठी की देखभाल की जिम्मेवारी अपने ऊपर ली। उन दोनों संसदीय क्षेत्रों में प्रियंका का सीधा परिचय अनेक सक्रिय कार्यकर्ताओं नेताओं से हैै। वे अपनी समस्या लेकर जब दिल्ली आते हैं तो अनेक सोनिया एवं राहुल की बजाय प्रियंका के पास जाते हैं। इसके आगे प्रियंका ने न कभी पार्टी कार्य में रुचि दिखाई और न किसी के आग्रह पर चुनाव प्रचार मेें ही गईं। आम कांग्रेसी यह मानते रहे हैं कि यदि वे सीधे मैदान में आ जाएं तो कांग्रेस की स्थिति बेहतर होगी। 1999 में उन्होंने सुल्तानुपर में अरुण नेहरु के खिलाफ भाषण देते हुए जनता से पूछा था कि जिस आदमी ने उनके पिता के साथ विश्वासघात किया आपने उसे कैसे समर्थन दे दिया? उसके बाद सतीश शर्मा चुनाव जीत गए एवं अरुण नेहरु बुरी तरह पराजित हुए। उनके भाषण के तेवर राहुल और सोनिया से अलग आम लोगों को आकर्षित करने वाला माना गया। 

यह बात सच है कि राहुल गांधी ने पार्टी के लिए अपनी समझ, सोच और सलाह के अनुसार काफी परिश्रम किया है, वर्तमान हालात में पार्टी के लिए उत्साहजनक चुनावी भविष्य की संभावनाएं पैदा नहीं हो रहीं हैं। इसमें प्रियंका की ओर नजर जाना स्वाभाविक है। किंतु प्रियंका द्वारा राहुल की जगह लेने की अभी कल्पना बेमानी है। न अभी पार्टी ऐसा चाह सकती है, न राहुल, न प्रियंका और न सोनिया ही। दूसरे, उन्होंने अभी तक यह संकेत दिया नहीं है कि वे पूरी सत्ता की राजनीति में कूदने के लिए तैयार हैं। यह सच है कि बच्चों के बड़े होने के बाद अब उनके पास पहले से ज्यादा समय है। इसलिए वे ज्यादा समय लगा सकतीं हैं। ऐसा लग रहा है कि पार्टी द्वारा आगामी 17 जनवरी को राहुल गांधी के हाथों नेतृत्व थमा देने को लेकर गंभीर विचार-विमर्श से निर्मित माहौल एवं संभावनाओं के बीच प्रियंका ने कुछ मोर्चा संभालने का निश्चय किया है।  राहुल को नेतृत्व थमाने का औपचारिक ऐलान हो या नहीं इन विमर्शों मंे शिरकत करना उनकी सक्रियता को दर्शाता है। इसमें उनके मत का महत्व कितना होगा यह बताने की आवश्यकता नहीं। हो सकता है राहुल ने प्रियंका को ही यह जिम्मेवारी दी हो कि विचार-विमर्श कर जो निष्कर्ष आए उन्हें बताए या जो उचित लगे उसके अनुसार सुझाव दे। यह परिवार का भी निर्णय हो सकता है। जो भी हो यह पार्टी की निर्णय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना ही है। दोनों दिनों की बैठकों में उन्होंने इसके अलावा आगामी चुनाव के लिए उम्मीदवार चयन ही नहीं, नीचे स्तर तक की संरचना पर भी बातचीत की। रायबरेली संसदीय क्षेत्र की सभी पांचों विधानसभा स्थान कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव मंें हार चुकी है। अमेठी में भी कांग्रेस केवल दो स्थानों पर जीत सकी। इसके बाद प्रियंका ने वहां संगठन को अपने अनुसार खड़ा किया। केवल जिला नहीं प्रखंड और न्याय पंचायत स्तर तक। इसके अलावा भी लोगों को सक्रिय करने के लिए उनने वहां कई कदम उठाए हैं। 

बहरहाल, देखना यह होगा कि अंदर की विमर्श प्रक्रिया के बाहर आने वाले समय में प्रियंका किस तरह की भूमिका में आतीं हैं। 14 सितंबर 2012 को प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने की खबरें जब जोर पकड़ने लगीं तो उन्होंने एक समाचार चैनल को एसएमएस भेजकर कहा था कि मैं राजनीति में शामिल नहीं हो रही हूं। मैं सिर्फ अपनी मां और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्रों का काम देखती हूं और आगे भी यह जिम्मेदारी संभाले रहूंगी। हालांकि पार्टी के नेताओं की कोशिश यही रही है कि लोकसभा चुनाव से पहले संगठन में प्रियंका की भूमिका बढ़े और वे देशव्यापी प्रचार करें। प्रियंका इस समय वंश की एक मात्र वयस्क चेहरा हैं जिनके राजनीतिक प्रभावों को परीक्षण नहीं हुआ है।कांग्रेस के नीति निर्माता नेताओं के साथ बैठकों में आने से यह तो साफ हो गया है कि प्रियंका की भूमिका का विस्तार हो रहा है। इनसे यह संकेत मिल रहा है कि उन्हें औपचारिक पद मिले या न मिले, वे राहुल गांधी एवं इन नेताओं के बीच एक कड़ी की भूमिका निभा सकतीं हैं। उपाध्यक्ष बनने के साथ राहुल पहले से ही सोनिया गांधी के बाद पार्टी में दूसरे स्थान पर हैं। लोकसभा चुनाव के लिए बनी समितियों के वे प्रमुख हैं एवं हाल में मंत्रिमंडल के निर्णय की घोषणा करने वे मंत्रियों के साथ आए तथा सरकार के अगले एजेंडे पर पत्रकारों के समक्ष बयान दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा तीसरी बार नेतृत्व से अलग होने की घोषणा के बाद राहुल गांधी स्वतः ही उस स्थान पर आ गए हैं। 

जाहिर है, प्रियंका की सक्रियता को हमें पूरे बदले हुए परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। न केवल राहुल की भूमिका और जिम्मेवारी बढ़ रही है, बल्कि सोनिया गांधी की अस्वस्थता उनकी पहले की तरह सक्रियता के रास्ते बाधा बन रही है। इसमें परिवार से अगर कोई आगे आने की स्थिति में है तो वह प्रियंका हीं हैं। साफ है कि प्रियंका सक्रिय भूमिका में आतीं हैं तो यकीनन नेताओं-कार्यकर्ताओं और समर्थकों का उत्साह बढ़ेगा। कांग्रेस समर्थक व नेता प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि देखने की बात कहते रहे हैं। वे किस रुप में आतीं हैं और कितना आगे तक जातीं हैं यह देखना होगा। अगर वे विचार-विमर्श और प्रबंधन तक सीमित रहतीं हैं तो इनसे राहुल का बोझ हल्का होगा, पर जनता के बीच इसका कोई असर नहीं होगा। अगर वे स्टार प्रचारक के तौर पर उतरतीं हैं तो इसका कुछ असर होगा। हां, कितना होगा इसका आकलन अभी कठिन है। वैसे वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इससे लोकसभा चुनाव के अंकगणित में बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा ऐसा लगता नहीं। कांग्रेस के विरुद्ध व्यापक असंतोष का माहौल साफ दिख रहा है एवं मुकाबले के लिए एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के नरेन्द्र मोदी जैसा आक्रामक एवं सभी वर्गों में लोकप्रिय व्यक्तित्व है तो दूसरी ओर एक कौतूहल दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल को लेकर भी पैदा हुआ है। मोदी भी वंशवाद पर हमला करते हैं और आम आदमी पार्टी के नेता भी। ऐसे बदले हुए माहौल प्रतिकूल पस्थितियों को पार्टी के पक्ष में मोड़ देना संभव नहीं लगता। बावजूद इसके प्रियंका के आने से कांग्रेस भविष्य को लेकर आशान्वित हो सकती है। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

दिल्ली के बाद अब देश पर नजर

अवधेश कुमार
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अपनी पार्टी कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक तब की जब सरकार गठन और मंत्रियों की कार्य शैली के कारण वह लगातार सुर्खियों में है। ऐसे समय उसको सुख्र्रियां प्राप्त होना ही था। आप के नेता वैसे भी प्रचार पाने और उससे जन मानस पर असर डालने की कला में निष्णात साबित हो चुके है। इसलिए लोहा गरम हो तभी चोट की कहावत चरितार्थ करते हुए कार्यकारिणी ने अगले लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा स्थानों पर उम्मीदवार खड़ी करने का ऐलान कर दिया। पार्टी सदस्यता अभियान चलाएगी और वह मुफ्त होगा। उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया चलेगी, घोषणा पत्र तैयार होगा.....और आगामी मार्च या उससे पूर्व ही लोकसभा चुनाव की सारी कवायद पूरी हो चुकी होगी। इन निर्णयों को इस रुप में पेश किया गया और मीडिया ने इसे ऐसे दिखाया जैसे ये भी भारतीय राजनीति के लिए नई और विशिष्ट हों। यानी आम आदमी पार्टी जो कर रही है वह भारतीय राजनीति में ऐसे नए अध्याय का श्रीगणेश है जिससे पूरा परिदृश्य बदल रहा है। पता नहीं हमें यह याद है या नहीं कि भाजपा ने 19 जुलाई 2013 को ही चुनाव के अलग-अलग कार्यों के लिए 20 समितियां गठित कीं और वे कार्य कर रहीं हैं। कांग्रेस ने नवंबर 2012 में ही राहुल गांधी के नेतृत्व में तीन उपसमितियां बनाई जिनमें लोकसभा चुनाव संबंधी सारे कार्य शामिल थे। सपा ने काफी पहले उत्तर प्रदेश के लिए ज्यादातर उम्मीदवार निश्चित कर दिए। बसपा भी ऐसा कर रही है।
इसकी सूची लंबी है। इन सारी पार्टियों की औकात अभी आप से ज्यादा है। किंतु इन्हें इतनी सुर्खियां नहीं मिलतीं जितनी आप को मिल रही है। इनमें हम पत्रकारों को उतना सार तत्व नहीं दिखता जितना आम आदमी पार्टी में दिखता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के संकल्प पत्र में अल्पज्ञता एवं अतिक्रांतिकारी दिखाने के लिए जो है नहीं उसकी तुलना करते हुए हम ऐसा नहीं करंेगे के ऐलानों को जानने के बावजूद यदि उसे विशिष्ट दिखाया जा रहा है तो निश्चय ही इसके पीछे ऐसे कुछ कारण हैं जो सतह पर हमें आपको नजर नहीं आ रहा। जब आप के नेता कहते हैं कि दिल्ली के बाद अब देश, लोकसभा चुनाव केवल राहुल और नरेन्द्र मोदी तक सीमित नहीं होगा तो उसके पीछे अंदाज यह होता है कि तीसरी शक्ति के रुप में उनका उदय हो चुका है और पूरे देश में उनकी विजय पताका फहराने वाली है। यानी राहुल मोदी के समानांतर ही नहीं, उसके आगे अरविन्द केजरीवाल होंगे। हां, अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगे। जब आम आदमी पार्टी का गठन हुआ था तो भी उन्होंने साफ ऐलान किया था,‘ मैं कभी चुनाव नहीं लड़ूंगा, कोई मंत्रिपद नहीं लूंगा।’ यह बयान कई बार रिकाॅर्ड पर है। बाद में उन्होंने ही घोषणा की कि मैं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ूंगा। तर्क यह है कि अगर साथियों ने तय किया तो मैं क्या कर सकता हूं। ऐसा ही आगे साथी तय कर देंगे और वे निस्पृह जीव की तरह लड़ जाएंगे।
कहने का अर्थ यह नहीं कि चुनाव लड़कर उनने अनैतिक काम किया या पार्टी द्वारा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद मुख्यमंत्री बनकर उनने अपनी अनैतिकता का पैमाना और बड़ा कर दिया। अगर आप राजनीति में हैं तो आपको चुनाव लड़ना चाहिए, मंत्री बनना चाहिए। उसके माध्यम से अपनी कल्पना की नीतियां बनाकर साकार करें और जन सेवा का लक्ष्य पूरा करें। किंतु आप जब स्वयं चुनाव न लड़ने की बात करते हैं और लड़ते हैं तो आपके चरित्र पर प्रश्न उठेगा। मान लीजए कोई आपको चरित्र प्रमाण पत्र दे दे तो भी इससे अपरिपक्वता, अतिभावुकता या स्वयं को महात्यागी, महानिःस्वार्थी ...साबित करने में वाणी से नियंत्रण समाप्त हो जाने का प्रमाण तो माना ही जाएगा। आप देख लीजिए, ये जब देश भर मंे किला फतह करने का ऐलान कर रहे हैं उसकी पृष्ठभूमि में ऐसी कितनी घोषणाएं हैं जो इसी अपरिपक्तवा, अतिभावुकता या वाणी पर नियंत्रण न रख पाने की श्रेणी में आतीं है। सरकारी बंगला न लेंगे, फिर लेंगे, बड़ा हो गया तो उसके पक्ष का तर्क और दबाव पड़ने पर फिर उसके बदले छोटा फ्लैट लेने का निर्णय......सरकारी गाड़ियों का उपयोग न करने का संकल्प और फिर यह कहना कि हमने केवल लालबत्ती का उपयोग न करने के बारे में कहा था...। हमारे मंत्री सरकारी गाड़ियों का उपयोग करें, वे सरकारी आवास लेें और वह आम नागरिकों के लिए भी खुला रहे, जैसे पहले और आज भी अनेक नेताओं के घर आम आगंतुकों के लिए रैन बसेरा की तरह होते हैं.. इनसे किसी को क्यों समस्या होगी? आपको अपनी जिम्मेवारी निभाने के लिए जतनी अपरिहार्य सुविधाएं चाहिएं लें.......लेकिन आप स्वयं जब इनके परित्याग कर संन्यस्त भाव का प्रचार करते हैं और फिर वैसा नहीं कर पाते तो फिर आपकी समझ, आपकी निष्ठा पर प्रश्न उठेगा और आलोचक इसे नाटक नौटंकी कहेंगे।
आम आदमी पार्टी का भाग्य देखिए, कुछ क्षण आलोचना के बाद प्रचार-प्रसार में फिर वही क्रांतिकारिता की छवि सामने आने लगती है। क्यों? जरा सोचिए, आम आदमी पार्टी ने अगर दिल्ली की जगह किसी अन्य छोटे राज्य में बहुमत से कम सीटें जीतीं होतीं तो क्या उसे इतना महत्व मिलता? अगर वह कांग्रेस या दूसरी पार्टी के समर्थन से सरकार बनाती तो क्या मीडिया उसे देश के लिए इतनी ही महत्वपूर्ण परिघटना बताता? यही बात यह साबित करती है कि आम आदमी के नेता किस तरह रणनीति और प्रबंधन के माहिर हैं। उनकी रणनीति साफ थी कि अगर हमने दिल्ली मंें केन्द्रित होकर जन समर्थन बढ़ाने का अभियान चलाया, चुनाव में अच्छी उपस्थिति दर्ज करा ली तो संदेश देश भर में जाएगा। यहां मीडिया का हम इस्तेमाल कर देश और उसके बाहर भी संदेश दे सकते हैं। अगर वर्तमान परिणतियों को आधार बनाएं तो वे अपनी रणनीति में सफल हैं। चुनाव के बाद रायशुमारी के नाम से आयोजित मुहल्लों की सभाओं को जितना लाइव कवरेज टीवी चैनलों ने दिया, उतना किसी प्रदेश में संभव नहीं हो सकता था। रामलीला मैदान में शपथग्रहण समारोह हो या फिर विधानसभा में विश्वास मत ...सबका लाइव प्रसारण और उनका अरविन्द केजरीवाल तथा उनके साथियों ने व्यापक उपयोग किया। आज भी वे इसमें सफल हैं। वे लोकसभा चुनाव में परिणाम के पूर्व ही स्वयं को तीसरी शक्ति बता रहे हैं। उनकी कार्यकारिणी का ऐसे प्रसारण हुआ मानो देश की किसी शक्तिशाली पार्टी की बैठक हो। इसका मनोवैज्ञानिक असर देश में होता ही है। चैनलों पर लाइव देखकर न जाने कितनी संख्या में लोगांे को यह विश्वास गहरा हुआ होगा कि यह पार्टी वाकई लोकसभा चुनाव जीतने वाली है। यही तो इन्हंे चाहिए।  निस्स्ंादेह, इस समय भाजपा एवं कांग्रेस इस मायने में उनसे पीछे हैं।
यह मीडिया का इस्तेमाल कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की रणनीति की सफलता है पार्टी के पास देश भर से लोग सदस्यता ग्रहण करने के लिए आ रहे हैं। इनमें कुछ टैक्नोक्रैट, पूर्व अधिकारी....भी हैं। जो आंकड़ें हमारे पास आए हैं उनके अनुसार औसत 17 लाख रुपया से ज्यादा उनको प्रतिदिन चंदे के रुप में आ रहा है। तभी तो इन्हें सदस्यता शुल्क की आवश्यकता न रही। देश भर में उनने करीब 325 कार्यालय खोल दिए हैं। ऐसा माहौल किसी पार्टी, उसके नेता एवं कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं। इसलिए अगर वे कह रहे हैं कि पहले दिल्ली और अब देश तो हम उनको एकबारगी टाल नहीं सकते। लेकिन ...? विविधताओं का भारत केवल दिल्ली नहीं है। अभी तक सारी पार्टियों को गालियां देते हुए वे स्वयं को क्रांतिकारी बदलाव का औजार साबित करते थे.....। कांग्रेस ने समर्थन देकर उन्हें सत्ता सौंप दिया, लेकिन देश ने एक भी क्रांतिकारी कदम देखा नहीं है। हालांकि ये ऐसे ही खामोशी से नहीं रहने वाले। वे भी जानते हैं कि दिल्ली जैसे एक मेट्रोपोलिटन शहर वाले राज्य में पूरे संसाधनों को केन्द्रित कर हल्लाबोल जैसा माहौल बनाकर आम नागरिकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना जितना आसान है उतना देश के अन्य क्षेत्रों और पूरे देश में कतई नहीं। इसलिए यकीन मानिए वे कुछ ऐसे कदम उठाएंगे, हल्लाबोल शैली में ये ऐसा करेंगे जिन पर ये योजनाबद्ध तरीके से शाबासी लेने के साथ अपने समर्थन का माहौल बना पाए। दरअसल, दिल्ली तो अगले चुनाव प्रचार का आधार है उनके लिए। अगले चुनाव के पूर्व ज्यादा से ज्यादा लोग उनके पास किस तरह आएं, चुनाव में उनके पक्ष में वातारण बने, इस उद्देश्य से वे दिल्ली की सरकार का पूरा उपयोग करेंगे। पर प्रचार और हल्लाबोल शैली से कोई भी पार्टी लंबी दूरी तय नहीं कर सकती। कांग्रेस, भाजपा या अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियों से लोग असंतुष्ट हैं, किंतु अब इनकी गहरी समीक्षा अवश्य करेंगे और कम से कम आज वे खरे उतरने की स्थिति में नहीं हैं। तीसरी शक्ति केन्द्र में जब भी सत्ता में आई तो लंगड़ी -लूली और उसका क्या हस्र हुआ देश जानता है। उसे दोहराना कौन चाहेगा?  
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर: 01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

भाजपा की वोट नीति

अवधेश कुमार

जबसे यह साफ हो गया कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनेंगे तभी से अपने चुनावी रंगरुप और ढांचे को वह एक श्रेष्ठतम सुप्रबंधित मशीनरी और जीवंत समूहों- योजनाओं में ढालने का कदम उठा रही है। जून में मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही भाजपा चुनावी मोड में आ गई थी। 13 सितंबर को उनके प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के साथ उसका एक क्रम पुरा हुआ। 24 दिसंबर को पार्टी की संसदीय बोर्ड और मुख्यमंत्रियों की साझा बैठक तथा उसके बाद चुनाव अभियान समिति की बैठक में जो कुछ हुआ वह उसी कड़ी का अंग था। अगर सामने आए कार्यक्रमों पर सरसरी नजर दौड़ाएं तो यह औपचारिक चुनाव प्रचार अभियान आरंभ होने के पूर्व सम्पूर्ण पार्टी का अंतिम मतदान को छोड़कर उससे संबंधित सारे क्रियाकलापों, जरुरतों के मोर्चे पर सक्रिय हो जाना है। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा भी कि आम चुनाव के लिए अब मात्र 120 दिन बचे हैं। इसलिए भाजपा 60 दिन तैयारी और शेष 60 दिन प्रचार में लगाएगी। तो क्या हैं योजनाएं? क्या हैं इनके पीछे की सोच? और क्या हो सकते हैं इनके संभावित परिणाम?

चुनाव की दृष्टि से यह पहली ऐसी बैठक थी जिसमें वे सभी  नेता शामिल थे, जिनकी औपचारिक रुप से महत्वपूर्ण भूमिका होगी। पार्टी की शीर्ष निर्णयकारी ईकाई केन्द्रीय संसदीय बोर्ड, फिर पार्टी शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सभी प्रदेशों के अध्यक्ष व चुनाव अभियान समिति व उप समितियों के प्रमुखों के अलावा उन लोगों को भी बुलाया गया था जिनकी सक्रियता और अनुभव की आवश्यकता पार्टी को होगी। इसके बाद अलग से केंद्रीय चुनाव अभियान समिति ने विचार विमर्श किया और तब जाकर योजनाओं और कार्यक्रमों का ऐलान हुआ। ऐसी बैठकें लगातार नहीं हो सकतीं। इसका अर्थ साफ है कि बैठक के पूर्व एजेंडा आदि पर अनौपचारिक तैयारी चल रही थी और जितने सुझाव व कार्यक्रम आए उन सबको अंतिम रुप देकर सामने लाया गया। निस्संदेह, 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस को ध्यान में रखकर इसका आयोजन किया गया होगा ताकि अगले दिन से ही इसकी शुरुआत हो जाए। तो कहा जा सकता है कि 25 दिसंबर को भाजपा ने सुशासन दिवस के साथ चुनाव अभियान आरंभ कर दिया है। लेकिन स्वाभाविक ही वाजपेयी अब जैविक रुप से जीवित होते हुए भी भाजपा को नेतृत्व या मार्गदर्शन देने की स्थिति में नहीं है। इसलिए  अबकी बारी अटलबिहारी की जगह ‘मोदी फॉर पीएम’ का ही नारा होगा। 

तीन कार्यक्रम चुनाव की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकसभा चुनाव परिणाम पर प्रभाव डालने वाले साबित हो सकते हैं। उनमें सबसे पहला है, घर-घर जाकर मतदाताओं से वोट के साथ नोट मांगने का अभियान। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार भाजपा कार्यकर्ता कम से कम एक नोट, एक वोट की योजना के साथ 10 करोड़ परिवारों से सीधे संपर्क करेंगे। उन्हें भाजपा की नीतियों के बारे में बताने के अलावा 10 से 1000 रुपये तक का चंदा एकत्र करेंगे। इसी दौरान मतदान केन्द्र स्तर के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन भी होगा। ये सम्मेलन फरवरी अंत तक पूरे कर लिए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए लोकसभा की 450 सीटों को लक्ष्य बनाया है। तीसरा कार्यक्रम, जो इसके साथ होते हुए भी अलग से किया जाएगा वह है, जनवरी में नए मतदाताओं से संपर्क करने का। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण कराना भी शामिल है। नए मतदाताओं में मतदान के प्रति रुचि सबसे ज्यादा देखी जा रही है और राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा कुछ हद तक दिल्ली चुनाव में नए मतदाता कैमरे पर बयान देते देखे गए कि वे मोदी के लिए मत दे रहे हैं। मोदी वैसे भी युवाओं को आकर्षित करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। वे युवाओं को न्यू एज वोटर की जगह न्यू एज पावर घोषित करके उनकी तालियां बटोरते हैं।

कोई राजनीतिक अभियान बगैर ठोस आधार और विचार के नहीं हो सकता। निस्संदेह, चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम यदि भाजपा के अनुकूल नहीं आए होते तो पार्टी नेतृत्व का मनोविज्ञान चिंता और निराशा से भरा होता और तब उसका मुख्य लक्ष्य प्रतिकूल परिणामों के प्रभावों से कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बाहर निकालना होता। चुनाव परिणामों से उत्साहित भाजपा के संसदीय बोर्ड ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि राज्यों के चुनाव परिणाम इस बात का जनमत सर्वेक्षण हैं कि सरकार को काम करके दिखाना चाहिए या हट जाना चाहिए। साफ है कि परिणाम के बाद माहौल उसे अपने पक्ष में लग रहा है और मोदी केन्द्रित अभियान उसे और सुदृढ़ करेगा। विचार के तौर पर जनता को संदेश दिया जाएगा कि देश में इस समय 1975 में कांग्रेस के लगाए गए आपातकाल के बाद जैसे हालात हैं। इसके साथ अपना दृष्टिकोण पत्र, घोषणा पत्र तथा भाजपा शासित राज्यों की उपलब्धियों की प्रचार सामग्रियां साथ होंगी। और मोदी की सभाएं ज्यादा से ज्यादा कराकर माहौल को सशक्त करने की कोशिश होगी। किंतु यह भाजपा का अपना आकलन है। भारत जैसे बहुविध आकांक्षाओं और राजनीतिक अपेक्षाओं वाले देश में कम से कम 300 लोकसभा क्षेत्रों तक अपने पक्ष में बहुमत को मोड़ना कितना कठिन है यह बताने की आवश्यकता नहीं।

पर भाजपा के दोनों संपर्क अभियानों को एक साथ मिलाकर देखिए तो इसका महत्व साफ हो जाएगा। ध्यान रखिए 2014 के लोकसभा चुनाव तक देश में पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाताओं की संख्या करीब 12 करोड़ होगी। 10 करोड़ लोगों तक चंदे और मतदान के लिए पहुंचना तथा 12 करोड़ नए मतदाताओं से संपर्क करने का अर्थ चुनावी गणित के आलोक में सामान्य बात नहीं हैं। 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 11 करोड़ 91 लाख 11 हजार 19 मत मिला था। भाजपा को 7 करोड़ 84 लाख 35 हजार 381 मत मिले थे। पिछले लोस चुनाव में करीब 10 करोड़ वोटर ऐसे थे, जिन्हें पहली बार मतदान करना था। इनमें भी 2 करोड़ की वृद्धि है। अभी तक की स्थिति के अनुसार करीब 400 लोकसभा स्थानों पर भाजपा उसके सहयोगियों और कांग्र्रेस के बीच ही टकराव होना है। भाजपा को यदि 272 का आंकड़ा पार करना है तो उसे 13 से 14 करोड़ के बीच मत चाहिए होगा। यानी 2009 से 6 करोड़ ज्यादा। यह कार्य आसान नहीं है। इसलिए भाजपा ने नोट और वोट, नए मतदाताओं एवं मतदान स्तर के सम्मेलनों का निर्धारिण उचित ही किया है। इसी नोट और वोट योजना से जनसंघ एवं बाद में भाजपा आगे बढ़ी थी। 1977 में जनता पार्टी इसी की बदौलत चुनाव लड़ने के लिए संसाधन पा सकी थी एवं जनमत निर्माण संभव हुआ था। इसलिए यह बिल्कुल व्यावहारिक और संसदीय लोकतंत्र के लिए सर्वथा उचित राजनीतिक आचरण होगा।

किंतु प्र्रश्न तो यही है कि क्या जैसी योजनाएं बनाईं गईं हैं जमीन पर भी वैसे ही उतर जाएंगी? क्या भाजपा में इतनी संख्या में चारों ओर निष्ठावान, ईमानदार और अनुशासित कार्यकर्ता बचे हैं जो पार्टी की योजनानुसार इसे जमीन पर अंजाम दे सकेंगे? अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस के प्रति असंतोष, अन्य दलों को लेकर आकर्षण में क्षीजन के दौर में मोदी का नाम चमत्कार कर सकता है और मोदी फॉर पीम का लक्ष्य हासिल हो सकता है। लेकिन भाजपा भी धीरे-धीरे कांग्रेस की तरह कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं रह गई है। पार्टी में स्वाभाविक नेतृत्व की जगह लद गए या लादे गए नेताओं की प्रबंधन शैली के कारण कार्यकर्ताओं की जगह भाजपा में निहित स्वार्थियों का वर्चस्व हो चुका है। आज विवेक से कौन निष्ठावान और कौन निहित स्वार्थी है इसकी पहचान करने वाले अत्यंत कम बचे हैं। इसीलिए उम्मीदवारों के रुप में भी वैसे लोगों का नाम सामने आ रहा है जिन्हें ईमानदार और निष्ठावान कार्यकर्ता आसानी से स्वीकार नहीं कर सकते। हां, मोदी का नाम उनके अंदर एक उम्मीद जरुर पैदा कर रहा है और युवाओं की बड़ी तादाद उनके नाम पर काम करने के लिए आगे आ रही है। पर इनका भी उचित उपयोग करने वाले ईमानदार और विवेकशील लोग चाहिए। इसलिए भाजपा को सबसे पहले ऐसे लोगों को तलाशकर जिम्मेवारी देनी होगी जो इस योजना को ईमानदारी से अमल में लाने के कार्यक्रम को अंजाम दिलवा सकें, अन्यथा योजनाएं और कार्यक्रम अपेक्षानुरुप साकार नहीं होंगी।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः110092, दूर.ः 011 22483408, 09811027208
 

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