गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

भारी संख्या में मतदान मशीन का बटन दबने का अर्थ

अवधेश कुमार

राज्य विधानसभा के चुनावों में जिस तरह मतदाताओं ने भारी संख्या में घरों से निकलकर इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों का बटन दबाने का रिकाॅर्ड कायम किया है उससे संसदीय लोकतंत्र में आस्था रखने वालों का उत्साह यकीनन बढ़ा होगा। छत्तीसगढ़ के दूसरे दौर में कुल 74.7 प्रतिशत मतदान हुआ। जिस बस्तर क्षेत्र के 19 विधानसभाओं में माओवादियों ने उंगली काटने से लेकर अन्य सजाओं की धमकी दी थी वहां भी आश्चर्यनक रुप से 75.53 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2008 में कुल 71.09 प्रतिशत मतदान हुआ था। मध्यप्रदेश में 71.24 प्रतिशत मतदान 2008 के 69.78 प्रतिशत से 1.46 प्रतिशत ज्यादा है। यहां भी नक्सल प्रभावित बालाघाट में तो 80 प्रतिशत मतदान की खबरें आईं। मिजोरम में भी 83 प्रतिशत से ज्यादा होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि वहां 2008 में भी 82.35 प्रतिशत मतदान हुआ था। राजस्थान में 75.2 प्रतिशत मतदान हुआ। 2008 में 66.39 प्रतिशत मतदान हुआ था। यनी 8.63 प्रतिशत अधिक। यह असामान्य वृद्धि है। जैसलमेर में रिकाॅर्ड 85.26 प्रतिशत तो हनुमानगढ़ में 84.93 प्रतिशत मतदान हुआ। 2008 की तुलना में राजस्थान के 33 जिलों में से 31 में मतदान वृद्धि हुई। दिल्ली में पिछली बार 57.8 प्रतिशत मदान हुआ था। जाहिर है अगर 69 प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ है तो यह 11 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोत्तरी है। दिल्ली के राज्य बनने के बाद 1993 के पहले मतदान में 61.8 प्रतिशत मतदान हुआ था। तो इस बढ़ते मतदान प्रतिशत का क्या अर्थ लगाया जाए?

पिछले तीन सालों में रिकाॅर्ड मतदान भारत की प्रवृत्ति बन चुकी है। आप याद करिए पिछले वर्ष उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड एवं पंजाब में कड़ाके की ठंढ के बीच भारी संख्या में मतदाता मतदान करने बाहर आए थे। उत्तराखंड में 67 प्रतिशत मतदान 2007 के 59.45 प्रतिशत से करीब 8 प्रतिशत अधिक था। पंजाब में भी रिकाॅर्ड 76.63 प्रतिशत मतदान हुआ है। यह 2007 के रिकाॅर्ड 75.47 प्रतिशत से 1.16 प्रतिशत अधिक था। उत्तरप्रदेश के मतदाताओं ने भी आजादी के बाद सभी रिकाॅर्ड घ्वस्त करते हुए 59.50 प्रतिशत मतदान किया। यह अन्य राज्यों की तुलना में कम लगता है, लेकिन 2007 से करीब 14 प्रतिशत ज्यादा था। 14 प्रतिशत का अर्थ उत्तरपदेश के लिए औसत से करीब 2 करोड़ 40 लाख ज्यादा मतदाताओं द्वारा मत प्रयोग करना था। इसके पूर्व भी विधानसभा एवं स्थानीय चुनावों में मतदान बढ़ने की ही प्रवृत्ति थी। प. बंगाल में 84 प्रतिशत तमिलनाडु में 80 प्रतिशत तथा पुड्डुचेरी में 86 प्रतिशत मतदान का रिकाॅर्ड कायम हुआ। असम में भी 76 प्रतिशत एवं केरल में 75 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का रिकाॅर्ड कायम किया। तमिलनाडु के मतदान ने 1967 के 75.67 प्रतिशत के रिकाॅर्ड को ध्वस्त कर दिया तो केरल में 2006 के ही 72.38 प्रतिशत के। तमिलनाडु के करुर जिला में 86 प्रतिशत से ज्यादा तो केरल के कोझिकोड में 81.30 प्रतिशत तथा असम के धुबरी में 85.65 प्रतिशत मतदान हुआ। यही नहीं पिछले वर्ष जम्मू कश्मीर के स्थानीय चुनावों में भी अगल-अलग क्षेत्रों में 76 प्रतिशत से 82 प्रतिशत के बीच मतदान हुआ। इस पृष्ठभूमि में यह कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ से लेकर राजस्थान तक मतदाताओं ने मत डालने का जो रिकाॅर्ड बनाया है वह अब भारतीय चुनाव का स्थापित संस्कार बन रहा है। किंतु इसके कुछ तो अर्थ हैं।

हमने देखा है कि पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग से लेकर मीडिया, नागरिक संगठन आदि मतदाता जागरुकता अभियान चला रहे हैं। राजनीतिक दलों के नेता भी अपने भाषणों के अंत में घरों से निकलकर मतदान करने की अपील करने लगे हैं। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी तो पहले मतदान फिर जलपान का नारा लगवाते रहे। चुनाव आयोग का सुरक्षा संबंधी सख्त कदम भी लोगों के अंदर से भय का अंत करने में योगदान कर रहा है। मत डालने के संकल्प के बावजूद नक्सली क्षेत्रों में सुरक्षा का माहौल नहीं होता तो मतदान करने के लिए इतनी संख्या में आगे आने की संभावना कायम नहीं होती। यह भी ध्यान रखें की 2006 के बाद मतदाता बने युवाओं की संख्या 21 प्रतिशत से ज्यादा है। संपूर्ण भारत में 40 प्रतिशत से ज्यादा मतदाता 35 वर्ष की आयु सीमा के नीचे हैं। हमने मतदान केन्द्रोें पर युवाओं की संख्या देखी है। यही बात महिलाओं के साथ भी है। अब महिलाएं भी ज्यादा संख्या में निकलने लगीं हैं।  मतदान करने वालों में युवा वर्ग एवं महिलाओं की संख्या काफी देखी जाती है। इन सबके साथ कुछ नेताओं के प्रति विशेष आकर्षण भी लोगांे को बाहर आने को प्रेरित करता है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की उपस्थिति ने यकीनन मदतान को रोचक बनाया है और अन्ना अनशन अभियान की ओर आकर्षित लोगों के एक समूह ने भी कुछ क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बढ़ाने में भूमिका दी गी है। अगर संक्षेप में कहना हो तो यही कहा जाएगा कि लोगों  के अंदर मतदान से सत्ता निर्माण का भाव तीव्र हो रहा है। पर क्या इतने मात्र से मतदान की बढ़ती प्रवृत्ति की व्याख्या पूरी हो जाती है?

अगर कोई शासन मतदान पर ही निर्मित या विघटित होता है तो फिर उसमें अधिकाधिक लोगों की भागीदारी अपरिहार्य है। हमारी संसदीय व्यवस्था की एक प्रमुख कमजोरी यही रही है कि चाहे केन्द्र हो या राज्य कुल मतों के बहुमत से बहुत कम पर सरकारें सत्तासीन हो जातीं हैं। लोकसभा चुनाव में औसत मतदान 58 प्रतिशत रहा है। इसमें 27-28 प्रतिशत मत पाने वाला दल यदि सरकार गठित कर सकता है तो वह करीब 15 प्रतिशत मत की सरकार हुई। राज्यों में उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लीजिए।  2008 के विधानसभा चुनाव में 3 करोड़ 62 लाख 66 हजार 969 मतदाता थे। इनमें से 2 करोड़ 51 लाख 27 हजार 120 ने वोटिंग की। यानी कुल 69.28 प्रतिशत मतदताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। भाजपा ने इसमें से केवल 94 लाख 93 हजार 641 मत पाया। यानी केवल 37.64 प्रतिशत मत। अगर कुल मतदान के अनुसार देखें तो यह 26-27 प्रतिशत के आसपास है। तो सरकार बहुमत की कहां हुई। अगर अधिकाधिक संख्या में मतदाता बाहर आते हैं तो फिर वास्तविक बहुमत की सरकार कायम हो सकती है। मतदान है तो आंकड़ों का गणित, लेकिन इसके सामाजिक, राजनीतिक,सांस्कृतिक, आर्थिक सारे निहितार्थ होते हैं। कम मतदान से आम जनता चाहती क्या है यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकता। इसलिए भी ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं का मत प्रयोग जरुरी है। अगर आपकों राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों से कोई उम्मीद नहीं हैं तो आप कोई नहीं का भी बटन दबा सकते हैं। यह हमारे पास असंतोष प्रकट करने का एक नया विकल्प है। इसका असर चुनाव पर हो या न हो, पर इससे विश्लेषकों को यह अनुमान लगाने में सुविधा होगी कि हमारे राजनीतिक तंत्र से असंतुष्ट लोगों की संख्या कितनी है। यह बढ़ रही है या घट रही है।

इस प्रकार मतदान करने के विस्तारित होते संस्कार के कारक और उसके निहितार्थों के बारे में और भी बातें कहीं जा सकतीं हैं। पर इससे अभी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि लोगों की अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास पहले से ज्यादा सुदृढ़ हुआ है, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के प्रति उनकी वितृष्णा कम हुई है। सामान्यतः मतदान बढ़ने के साथ ही सरकार की विदाई तय हो जाती थी। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड , प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल एवं पुड्डुचेरी इसके उदाहरण हैं। लेकिन पंजाब, बिहार और असम जैसे अपवाद भी हैं। वस्तुतः कई जगह मतदान बढ़े, लेकिन शासन नहीं बदली। हां, किसी के काम से खुश होकर भारी संख्या में मतदान करने की प्रवृत्ति अभी सामने नहीं आई है। इस बार का परिणाम इसे थोड़ा और स्पष्ट कर सकता है। कई बार कुछ नेता लोगों को प्रेरित करने में सफल हो जाते हैं और उम्मीद से लोग मतदान करने निकलते हैं। आप देख लीजिए, दिल्ली को छोड़कर किसी राज्य में नेतृत्व, नीति के स्तर पर कोई नया विकल्प जनता को नहीं मिला है। लेकिन उन्हें वोट देना है तो वे किसी को तो देंगे ही। यह संभव है कि आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी में से किसी के प्रति उम्मीद की किरण भी इन्हें खींच ला रही हो। किंतु यह किसी दृष्टि से राजनीतिक तंत्र के प्रति असंतोष के कम होने का प्रमाण नहीं हो सकता। अगर आप विभिन्न सर्वेक्षणों पर नजर दौड़ाएं तो लोगों ने अपने विधायकों से वैसी उम्मीदें बताईं या उन कामों के न किए जाने पर निराशा जताई जो कि पंचायतों और नगर निकायों या प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों के जिम्मे है। यह सामूहिक अपरिपक्ता का परिचायक है। इसलिए भारत में अभी सही समझ वाले जनमत निर्माण का कार्य ही अधूरा है। ऐसा जनमत निर्माण हो, फिर चुनाव इतने व्यापक सुरक्षा तामझाम और खर्चों से परे आयोजित हों, उनमें मतदाता भारी संख्या में निकलें तो उसे परिपक्व जनमत से उभरे स्वस्थ लोकतांत्रिक या राजनीतिक व्यवस्था का प्रमाण माना जा सकता है। अगर चुनाव आयोग के नेतृत्व में कठोर सुरक्षा व्यवस्था के तहत हम मतदान के लिए बाहर आते हैं तो यह किसी दृष्टि से स्वस्थ स्थिति नहीं हो सकती। वैसे भी हमें लोकसभा चुनाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए।  

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः22483408, 09811027208

 


सोमवार, 2 दिसंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के पदाधिकारी व सदस्य घर-घर जाकर कर रहे हैं मतदाताओं को जागरुक

संवाददाता
नई दिल्ली। चुनावी मैदान में कूदे उम्मीदवार मतदाताओं को अपने हक में मतदान करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। कोई उन्हें विकास कराने की बात कह रहा तो कोईं मूलभूत समस्याओं से निजात दिलाने की बात कह रहा है।
वहीं मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने पूरी तरह से मेहनत की है। उसने भी अपनी तरफ से वह सारी तैयारी कर रखी हैं जो मतदान के दिन मतदाताओं को मतदान केंद्र पर जाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। मतदाताओं को किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो उसके लिए भी चुनाव आयोग ने अपनी ओर से मतदाताओं को मतदाता पर्ची घर-घर भेज दी है।
इसी अभियान में नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के पदाधिकारी व सदस्य लोगों को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं वह घर-घर जाकर लोगों को बता रहे हैं कि मतदान नहीं करने से क्या नुकसान है और मतदान करने से उनका व उनके क्षेत्र आदि को क्या फायदा होगा। संस्था के अध्यक्ष साबिर हुसैन ने बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क (गांधीनगर विधानसभा-61) में अपने पदाधिकारी व सदस्यों के साथ लोगों को जागरुक किया। साबिर हुसैन लोगों को मतदान के दिन ज्यादा से ज्यादा मतदान करने के लिए कहा व लोगों को मतदान के फायदे नुकसान से अवगत कराया।
श्री साबिर ने बताया कि जो लोग मतदान नहीं करते वह लोग अपने आपको होशियार समझते हैं वह होशियार नहीं बेववूफ हैं क्योंकि उनकी भागीदारी नहीं होने से ही सही लोग चुनकर नहीं आ पाते। श्री हुसैन ने लोगों से अपील की कि वह मतदान करने जरूर जाएं। सही लोगों का चुनाव करें व अपने क्षेत्र के विकास में भागीदार बनें।
इस अवसर पर डॉ. आर अंसारी, अंजार, मो. रियाज़, मो. यामीन, मो. सज्जाद, मो. मुन्ना अंसारी, गुलजार अख्तर, मो. सेहराज, नईम, विनोद, संजय, अब्दुल रज्जाक, आजाद, शकीला, शान बाबू, रजी अहमद आदि पदाधिकारी, सदस्य व आम जनता शामिल थी।

 

 

रविवार, 1 दिसंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने एड्स व मतदाता जागरुकता कैम्प का आयोजन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। पूर्वी दिल्ली के गांधी नगर विधानसभा में स्थित शास्त्री पार्क में नई पीढ़ी-नई सोच(पंजी) संस्था ने एड्स व मतदाता जागरुकता अभियान कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कैम्प कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लीनिक में लगाया गया। कैम्प में एड्स से बचाव, मतदान करने व सही उम्मीदवार चुनने के लिए प्रेरित किया गया जिसमें सभी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन द्वारा की गई उन्होंने कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी संस्था का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को जागरुक कर मतदान प्रतिशत बढ़ाना है जिससे मतदान के दिन मतदाता घर पर छुट्टी का आनंद लेने के बजाय अपने अधिकारों का प्रयोग कर सही उम्मीदवार चुन सके नहीं तो 5 वर्ष तक हमें अपनी भूल का एहसास होता रहेगा कि हमने मतदान क्यों नहीं किया, क्योंकि सही उम्मीदवार चुनने में भाग नहीं लिया और यही मतदान प्रतिशत कम होने का कारण भी है जबकि दिल्ली में यह 100 प्रतिशत होना चाहिए।

डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि यदि हम जागरुक हैं तो एड्स की संभावना कम होती है व सही मतदान से हम सही उम्मीदवार को चुन सकते हैं नहीं तो हम 5 साल तक अपनी भूल का एहसास करते रहते है कि सही समय पर अगर हमने सुरक्षा अपनाई होती तो यह दिन देखने को नहीं मिलता। यह बात दोनों पर लागू होती है
1. एड्स-मौजूदा समय में एड्स तेजी से फैल रहा है। इसके सबसे ज्यादा युवा शिकार हो रहे हैं। युवा अपने दोस्तों की गलत संगत को ग्रहण करते हैं और जब वह ज्यादा बीमार हो जाते हैं तो फिर डाक्टरों व अस्पताल के चक्कर लगाते हैं। जब उनकी जांच आदि होती है तो पता चलता है कि वह एड्स (एचआईवी पॉजिटिव) से ग्रस्त हैं। लोग अभी भी एड्स की जांच कराने से घबराते हैं। वह सोचते हैं कि यदि मुझे एड्स हुआ तो मुझे समाज किस नजर से देखेगा।
2. मतदान-यदि हम वोट डालने नहीं जाते हैं तो गलत व्यक्ति चुनकर आ जाता है। जब गलत व्यक्ति चुनकर आ जाता है तो हम कहते हैं कि यह व्यक्ति गलत है। हमें उसे गलत कहना का अधिकार नहीं क्योंकि अगर हमने अपने मत का प्रयोग किया होता तो सही गलत व्यक्ति चुनकर आ सकता था।
डॉ. अंसारी ने कहा कि युवा आगे आकर एड्स व सही मतदान की जानकारी हासिल करें व इससे होने वाले नुकसान से अपने आपको बचाएं व दूसरों को भी बचाने की कोशिश करें।
संस्था के उपाध्यक्ष श्री मो. रियाज ने कविता के माध्यम से कहा कि एक रास्ता खराब है तो दूसरा रास्ता अपना लेंगे, बाहर सुरक्षा का डर लगे तो छुट्टी घर पर बिता लेंगे, घर पर पानी नहीं आया तो पड़ोसी का दरवाजा खटखटा लेंगे, रात में बिजली चली गई तो कैंडिल लाइट डिनर का बहाना बना लेंगे, महंगाईं की मार पड़ी तो एक सब्जी से गुजारा कर लेंगे, सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाने पड़े तो रिश्वत देकर काम निकाल लेंगे, बड़े अजीब है ना हम हर मुसीबत उठाएंगे फिर भी वोट करने नहीं जाएंगे। लेकिन एक दिन की मुसीबत से बचने के लिए 5 साल की मुसीबत मत पालो, अपनी बात मनवानी है तो वोट जरूर डालो। सुनाकर सभी से मतदान करने की शपथ दिलवाई कि मैं, 04 दिसम्बर 2013 दिन बुधवार को मतदान करने जरुर जाउंगा व अपने साथ औरों को भी मतदान केंद्र लेकर जाउंगा तथा सभी को कार्यक्रम में भाग लेने व समय देने के लिए धन्यवाद दिया तथा कार्यक्रम में सहयोग देने वाले श्री अब्दुल खालिक, श्री जुबैर आजम, हनीफ प्रधान, मो. इलियास, मौलाना हुसैन साहब, हाजी जाबिर हुसैन, मो. शुएब, मो. उमर व संस्था के पदाधिकारी-सदस्यों व अन्य जनों का रहा है।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

किसी भी पार्टी का प्रचार नहीं करेंगे: साबिर

संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के केंद्रीय कार्यालय में एक बैठक का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने की। इस बैठक में सभी पदाधिकारी व सदस्य शामिल हुए। चुनाव के मद्देनजर इस बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में सभी ने अपनी-अपनी बात रखते हुए चुनाव में लोगों से ज्यादा से ज्यादा वोट डालने के लिए प्रोरित करने को कहा क्योंकि पिछले चुनाव में लोगों की भागीदारी तो बढ़ी थी परंतु यह बहुत कम थी।

पिछले चुनावों को देखते हुए इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि हम लोग उनको उनके वोट की कीमत से  अवगत कराएंगे व ज्यादा से ज्यादा वोट डलवाने के लिए घर-घर जाकर प्रचार करेंगे।
इस बैठक में अब्दुल खालिक (सरपरस्त) ने कहा कि लोग कहते हैं कि हम वोट क्यों करें क्योंकि हमें सभी काम तो  रिश्वत देकर हीे कराना हैं। इसलिए हम सभी मिलकर उन्हें उनके वोट की कीमत क्या है और वोट न देने के क्या नुकसान हैं उससे अवगत करवाएंगे।
संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज़ ने कहा कि जब हम मतदाताओं के घर जाएंगे तो चुनाव आयोग द्वारा पहली बार मतदाताओं को दिए के अधिकार कोई पसंद नहीं अर्थात नोटा के बारे में भी बताएंगे। हो सकता है कि इस कारण लोग मतदान करने जाएंगे।
संस्था के अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने बैठक के आखिर में अपनी बात रखते हुए कहा कि हम किसी पार्टी विशेष का प्रचार नहीं करेंगे बल्कि लोगों को उनके वोटों की कीमत से उन्हें अवगत कराएंगे। जो लोग अभी तक मतदान करने नहीं जाते थे उन्हें उनके मतदान न करने के नुकसान से अवगत कराएंगे व उन्हें सही प्रात्याशी को चुनने के लिए कहेंगे। चुनाव आयोग द्वारा पहली बार मतदाताओं को दिए के अधिकार कोई पसंद नहीं अर्थात नोटा के प्रयोग के बारे में भी बताएंगे।
साबिर हुसैन ने आगे बताया कि हमारा प्रचार पूरी दिल्ली में होगा (जहां पर भी संस्था के सदस्य मौजूद हैं)। सदस्य अपने क्षेत्र में मतदाताओं को मतदान करने के लिए प्रोरित करेंगे। हर सदस्य रोजाना अपने कीमती समय में से एक घंटा मतदाताओं को मतदान के फायदे- नुकसान से अवगत कराएंगे। उन्होंने कहा कि यदि कोई सदस्य या पदाधिकारी किसी पार्टी विशेष का प्रचार करता है तो संस्था के नाम का प्रयोग नहीं करेगा। यदि कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्यंवाही की जाएगी। इस बैठक में अब्दुल खालिक (सरपरस्त), मो. रियाज, अब्दुल रज्जाक, डॉ. आर. अंसारी, इलमातुल्ला, अब्दुल कादीर, अंजार, नईम, विनोद, आजाद, अब्दुल रज्जाक, इरफान आलम, मो. सुल्तान, यामीन, मो. मुन्ना अंसारी, मो. सेहराज आदि पदाधिकारी व अन्य सदस्य मौजूद थे।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

आम आदमी पार्टी कैसी राजनीतिक संस्कृति बना रही है

अवधेश कुमार

राजनीति में कौन भ्रष्ट है कौन सदाचारी इसका प्रमाण पत्र देना इतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं। किंतु आम आदमी पार्टी के नेता अपनी स्थापना के पहले से आरोपों का पुलिंदा लेकर जिस तरह से दहाड़ें मारते थे उनसे उनकी छवि आम जन मानस में अन्यों से अलग ईमानदार, नैतिक, जन सरोकारों को समर्पित ...व्यक्तित्वों की स्थापित हो रही थी। जो लोग किसी दल से जुड़े नहीं या उसके कट्टर समर्थक नहीं, उनको यह उम्मीद बंधी कि इनका राजनीति में आना अलग राजनीतिक संस्कृतिक की संभावना पैदा करेगा। जन लोकपाल के नाम पर अन्ना हजारे के सारे प्रचारित अनशन अभियानों के पीछे और आगे के चेहरे ये ही थे और बाद में तो खुद इनने ही अनशन किया। अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया ने स्वयं दिल्ली के बढ़े हुए बिजली बिल तथा अन्य अनियमितताओं के खिलाफ दो सप्ताह का अनशन किया। यह राजनीति में लंबे समय बाद दिखा। जनता की मांगों को लेकर इस ढंग से संघर्ष में अपने को झोंकने की खत्म होती दलीय राजनीतिक संस्कृति में यह किसी के लिए भी नई सुबह की उम्मीदांे वालीं थीं। गांधी जी के नमक सत्याग्रह के दिन से अपने संघर्ष की घोषणा करके इनने यह संदेश भी दिया कि वे केवल चुनावी युद्ध के लिए नहीं, राजनीति को बदलने के लिए आए हैं। क्या आज हम यह कह सकते हैं कि आम आदमी पार्टी या आप वाकई राजनीति में बेहतर बदलाव या नई राजनीतिक संस्कृति की वाहक बनी हुई है?

अभी आप के 9 नेताओं के खिलाफ एक स्टिंग ऑपरेशन सामने आया। उसमें कुछ बातें बिल्कुल साफ दिख रहीं थीं। हालांकि आज समाज और राजनीति में जो जीवन शैली है, उसमें अनेक ऐसे विचलन जो पहले अस्वीकार्य थे, स्वीकार्य हो गए हैं। यह समाज का ऐसा दौर है जिसमें किसी की गलत कमाई या राजनीति में गलत तरीके से धन पाने या चुनाव में अघोषित तरीके से खर्च करने की बात उठाने पर कह दिया जाता कि इसके बगैर कोई उपाय नहीं है और सब ऐसा करते हैं। यह स्थिति का सरलीकरण है, जो पूरा सच नहीं है। पर मान लीजिए सच हो भी तो आप के लोग तो बाकी सारे दलों को भ्रष्ट, चोर साबित करते हुए नई नैतिक, ईमानदार, शतप्रतिशत पारदर्शी आचरण का डंका पीटते आए थे। अगर उनके नेताओं को चुनाव खर्च के लिए या पेशे में अपारदर्शी धन लेने के लिए तैयार होते दिखाया गया या वैसा संदेह भी हुआ तो उसका आचरण क्या होना चाहिए था? इन्होंने उनको केवल पाक साफ करार नहीं दिया, स्टिंग करने वाली कंपनी तथा उसे चलाने वाले चैनलों पर मुकदमा करने की धमकी दे दी। अब सबको उनके खिलाफ षडयंत्र में शामिल होने तथा मानहानि करने के मुकदमे का सामना करना पड़ेगा। प्रशांत भूषण वकील हैं और वे मामलों को हमेशा कानूनी नजरिए से देखते हुए न्यायालय को अपनी लड़ाई का साधन बनाए हुए हैं। उनके लिए ऐसा मुकदमा सामान्य बात है। वैसे स्टिंग का टेप चुनाव आयोग के पास भी चला गया है और उसका फैसला भी आएगा।  

लेकिन जरा याद करिए- यही आप के नेता जब भाजपा अध्यक्ष नितीन गडकरी के खिलाफ आरोपों का पुलिंदा लेकर आए थे और इनकी पत्रकार वार्ता को चैनलों ने लाइव किया। गडकरी को इस कारण दोबारा अध्यक्ष पद प्राप्त नहीं हुआ जो कि निर्धारित था। किंतु भाजपा ने किसी पर मानहानि की धमकी न दी। भाजपा के पास भी एक से एक नामी वकील हैं। उनने किसी चैनल को धमकाया नहीं। कांग्रेस ने भी राॅबर्ट बाड्रा के खिलाफ लगाए गए आरोपों का खंडन किया, इनकी आलोचना की, लेकिन कभी चैनलों एवं समाचार पत्रों को मुकदमे की धमकी न दी, ऐसा ही सलमान खुर्शीद के मामले में हुआ। रिलायंस के मुकेश अंबानी के खिलाफ इनने मामला लाया, उनके तो चैनलों में शेयर भी हैं, फिर भी सबने इसे चलाया, लेकिन धमकी किसी को नहीं आई। ये कहते हैं कि वे तो मोटी चमड़ी वाले हैं, भ्रष्ट हैं इसलिए ऐसा नहीं करते, हम उनसे अलग संवेदनशील हैं, इसलिए हमें ऐसा करना पड़ रहा है। किंतु यह बात गले नहीं उतरती। गडकरी के खिलाफ जांच में कुछ नहीं आया। वे चाहें तो मुकदमा कर सकते थे,उनने नहीं किया। 

जंतर-मंतर पर अयोजित कार्यक्रम में जिस तरह आम आदमी पार्टी के नेताओं ने विरोधियों के लिए कुत्ते कमीने से लेकर पुरस्कारों को जूते की नोंक पर रखने जैसी भाषा का प्रयोग किया उसके बाद कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। वस्तुतः आज हम चाहें या न चाहें यह स्वीकार करना होगा कि आप ने अपने विरोध या आलोचना के प्रति अस्वीकार्य असहिष्णुता प्रदर्शित किया है। यह दुःखद है। अगर आप राजनीति ही नहीं सार्वजनिक जीवन में हैं तो आपको आलोचना, निंदा, आरोप या स्टिंग झेलने की आदत डालनी होगी। आप के एक नेता इसे पत्रकारिता के न्यूनतम मापदंडों के विपरीत बताने लगे। उनने किसी मीडिया हाउस से नहीं पूछा कि मूल 18 घंटे की टेप देखी गई या नहीं। ऐसे भी चैनल हैं जिनने मूल टेप देखा है और उनका दावा है कि गलत कुछ भी नहीं दिखाया गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दूसरों पर आरोप लगाते हुए राजनीति में उतरने वाले अरविन्द केजरीवाल और उनके साथी इस तरह व्यवहार कर रहे हैं। आप यदि यह कहें कि हमें अपने साथियों पर विश्वास है तो यह आपका अधिकार है और उसकी आलोचना केवल नैतिकता और सदाचार की स्वयं इनकी कसौटी पर आलोचना होगी और हो भी रही है। लेकिन यह व्यवहार ऐसा है मानो हमें यह धमकी दी जा रही है कि आगे आपने ऐसे स्टिंग या आरोप दिखाएं तो आप मुकदमा झेलने के लिए तैयार रहिए। आज कम से कम इस मायने में कांग्रेस और भाजपा को तो इससे बेहतर आचरण वाला कहा जा सकता है। आपको यदि आम आदमी पार्टी के सदस्यों की परीक्षा लेनी है तो जरा उनकी आलोचना कर दीजिए। आप पर तीखे हमले आरंभ हो जाएंगे, आप पर बिना सिर पैर के आरोप लगेंगे, आपके खानदान तक ये पहुंच जाएंगे, आपको किसी पार्टी का दलाल या खरीदा गया व्यक्ति, अखबार, चैनल या संस्था का आदमी घोषित कर दिया जाएगा। उनके विरोध में यदि आप कोई पत्रकार वार्ता करते हैं और आप बड़े दलों के नेता नहीं हैं, तो उनके समर्थक वहां पहुंचकर हंगामा करेंगे। यह उनका आम व्यवहार हो गया है।
अब जरा दूसरे कुछ आचरणों पर नजर दौड़ा लीजिए। आप की ओर से एक पर्चा जारी किया गया है जिसमें मुसलमानों से विशेष तौर पर आप को वोट देने की अपील है। यह वैसे ही है जैसे अन्य गैर भाजपाई दल करते हैं। इसमें बाटला हाउस मुठभेड़ पर संदेह प्रकट किया गया है। गुजरात के इशरत जहां मुठभेड़ का भी जिक्र करते हुए मोदी एवं भाजपा पर हमला है। इस पर उन्हें चुनाव आयोग का नोटिस मिल चुका है। अगर आम आदमी पार्टी भी मजहब और समुदाय के नाम पर वोट मांगती है तो फिर आपमें और अन्य दलों की संस्कृति में अंतर क्या है? इसके पूर्व अरविंद केजरीवाल ने बरेली में दंगा भड़काने के आरोपी मौलाना तौकीर रजा से मुलाकात कर दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार में मदद और समर्थन मांगा था। तौकीर रजा की अपनी एक राजनीतिक पार्टी इत्तेहाद मिल्लत कौंसिल (आईएमसी) है, जिसने 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक स्थान पर विजय पाई थी। मार्च 2010 में बरेली में हुए दंगों को भड़काने के आरोप में तौकीर रजा खान की गिरफ्तारी हुई थी। तौकीर के रिहा होने के तुरत बाद दंगे फिर भड़के थे। तस्लीमा और जॉर्ज बुश के खिलाफ फतवा जारी करने वालों में भी तौकीर रजा का नाम शामिल था। इसकी तीखी आलोचना हुई।
मुसलमान हों या हिन्दू किसी से मत मांगने या उनके धार्मिक नेताओं से मिलने और मदद लेने में समस्या नहीं है। किंतु यदि आधार उस मजहब या समुदाय का मत पाना तो यह आपत्तिजनक है और यह कांग्रेस, सपा, राजद, जद यू आदि के समान चरित्र है। इसमें एक और बात है। आम आदमी पार्टी को आम आदमी के माध्यम से राजनीति को बदलना था और खास को भी आम बनाना था। यह तो खास के माध्यम से आम तक पहुंचने की अन्य राजनीतिक दलों की विकृत व्यवहार के समतुल्य है। इससे साफ हो जाता है कि आप के नेताओं ने भले नई राजनीतिक संस्कृति एवं आम जनता वाले दल व सत्ता का लक्ष्य घोषित किया, उनकी सोच और व्यवहार उन्हें भी आम दलों की कतार में शामिल कर रहा है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्ली-110092, दूरभाष-1122483408, 09811027208  


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