शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

अन्ना बनाम अरविन्द परिदृश्य अनुचित

अवधेश कुमार
आम आदमी पार्टी के खिलाफ हुए स्टिंग ऑपरेशन पर अभी कोई टिप्पणी जल्दबाजी होगी, लेकिन जिस तरह चंदे का मामला अन्ना हजारे द्वारा उठाया गया वह काफी महत्वपूर्ण है। यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पूरा परिदृश्य अरविंद केजरीवाल बनाम अन्ना हजारे का बना हुआ है और विरोधी इसे हवा दे रहे हैं। यह पहली बार नहीं है कि जब आप पार्टी के संयोजक के नाते अरविन्द और उनके साथियों के खिलाफ नारेबाजी या अन्ना को आधार बनाकर उन्हें लांछित करने की कोशिश हुई है। एक युवक ने पत्रकार वार्ता में अरविन्द पर काली स्याही भी फेंकी। पता नहीं उस युवक का उद्देश्य क्या था, लेकिन ऐसी अशोाभनीय घटनाएं केवल और केवल निंदा किए जाने के ही लायक हैं। अन्ना कह रहे हैं कि वे उस युवक को नहीं जानते और युवक अन्ना का नाम ले रहा है। इसे भी स्वीकार करने में समस्या नहीं है कि अन्ना ऐसा नहीं करवा सकते। हालांकि अरविन्द के इस आरोप से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता कि स्वयं को भाजपा का कार्यकर्ता बताने वाले उस युवक को भाजपा के नेताओं ने ऐसा करने के लिए भेजा होगा, पर इसके पीछे कुछ न कुछ तो था। आखिर कुछ ही दिनों पहले अन्ना हजारे ने अरविन्द केजरीवाल को कुछ प्रश्न उठाते हुए पत्र लिखा, जिसका जवाब देने के लिए पत्रकार वार्ता आयोजित की गई थी। महाराष्ट्र के अहमदनगर के उस युवक को सब कुछ पता था तो जाहिर है, वह निकट से सारी गतिविधियों पर नजर रख रहा था।
साफ है कि अगर अन्ना हजारे का पत्र न आया होता तो यह घटना न घटती और न ऐन चुनाव के बीच इस तरह अन्ना बनाम केजरीवाल का परिदृश्य बनता। किसी को भले यह सामान्य घटना लग रही हो, पर यह अत्यंत ही गंभीर प्रसंग है। हम आप पार्टी के विचारों से सहमत हों या असहमत, लेकिन कुछ महीने पहले गठित एक पार्टी, जो एक अभियान के क्रम से उत्पन्न हुई, जोे राजनीति में नए मापदंड स्थापित करने का वायदा करते हुए पहली बार चुनाव में उतरी है, उसके सामने इस तरह का पत्र आने का क्या अर्थ हो सकता है? अन्ना हजारे के निजी चरित्र पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है, पर इसी समय आंदोलन के चंदे की बात उठाना, हिंसाब मांगना, अपने नाम के इस्तेमाल करने का आरोप लगाना... आदि बातें उनके दिमाग में कैसे आई होगी?  रालेगण सिद्धि में अन्ना ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए जो कुछ कहा उस पर ध्यान दीजिए- ‘ मुझे दो बातों पर ऐतराज है। सिम कार्ड से मेरा कोई ताल्लुक नहीं फिर भी मुझे आरोपी बनाया गया। दूसरी बात, अरविंद 29 दिसंबर को लोकपाल लाने की बात करते हैं वे लोकपाल को दिल्ली में कैसे लागू कर सकते हैं। ...मुझे संदेह है कि मेरे नाम का दुरुपयोग हो रहा है। मेरे नाम का इस्तेमाल करना ठीक नहीं। ....मैंने अरविंद पर भरोसा किया। अरविंद ने अपना दफ्तर चलाने के लिए 20 लोगों को रखा था। इन्हें 30-35 हजार रुपये महीना दिया जाता था। यह जनता के पैसे का दुरुपयोग है। हालांकि मैंने उनसे इस बारे में कुछ नहीं कहा। लेकिन जनता के पैसे से ज्यादा खर्च करना ठीक नहीं है।’
अरविन्द केजरीवाल और उनके साथी कह रहे हैं कि जो सिम बनवाया गया था, वह अन्ना के अलग होते ही रोक दिया गया। उनका यह भी कहना है कि आंदोलन के लिए जो चंदा आया था वह पहले ही खर्च हो गया। उसमें से कुछ बचा ही नहीं है और अन्ना कभी भी हिंसाब ले सकते हैं। तो फिर समस्या क्या है कि इस तरह पत्र लिखे जा रहे हैं और उनको सार्वजनिक भी किया जा रहा है? अन्ना कह रहे हैं कि अरविंद अगर मुझसे बात करना चाहते हैं तो मैं तैयार हूं। अरविंद से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। मुझे अरविंद के चरित्र पर भी कोई संदेह नहीं है। केजरीवाल कह रहे हैं कि अन्ना के करीबी उन्हें उनसे नहीं मिलते देते। इससे इतना तो पता चलता है कि दोनों एक दूसरे पर संदेह नहीं कर रहे, लेकिन इनके बीच संवाद नहीं है और ऐसे में दूरियां बढ़ना स्वाभाविक है। अन्ना कह रहे हैं कि उनके नाम का इस्तेमाल न हो। उस अभियान को अन्ना आंदोलन का नाम मिला और ये सारे उसके स्तंभ थे। व्यक्ति के रुप में अन्ना हजारे का नाम लेना एक बात है और अन्ना आंदोलन कहना अलग। अन्ना को भी यह समझना चाहिए। हालांकि अन्ना का नाम लेने से आप को बहुत ज्यादा जन समर्थन मिल जाएगा ऐसा है नहीं, पर उनके निकट पहुंचे लोग उनके मन में यह गलतफहमी पैदा करते रहते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में इससे कांग्रेस और भाजपा को मुंहमांगा मुद्दा मिल गया है। इसका असर चुनाव पर पड़ना निश्चित है। आम आदमी पार्टी की चुनाव में जमीनी हकीकत उतनी अच्छी नहीं है जितनी कुछ सर्वेक्षणों में दिखाईं गईं, पर जो भी है उस पर ऐसे विवादों का असर तो पड़ना ही है। विरोधियों के लिए यह सवाल उठाना लाजिमी है कि अन्ना को लेकर आगे बढ़ने वाले लोगों ने अगर उन्हें ही धोखा दिया तो वे हमको आपको कैसे धोखा नहीं देंगे।
वास्तव में यह सामान्य त्रासदी का विषय नहीं है कि जिस अन्ना अनशन अभियान को हाल के दिनों में सबसे ज्यादा प्रचार मिला, जिससे  जनता के एक वर्ग में ही सही यह उम्मीद पैदा हुई कि अब कुछ बेहतर बदलाव हो सकता है, भ्रष्टाचार से निजात का रास्ता इससे निकलने की अपेक्षाएं भी उत्पन्न हुंई, आज उसे टीम के दोनों हीरो ही एक दूसरे के आमने-सामने दिख रहे हैं। हम यदि तटस्थ होकर विचार करेंगे तो यह भले दुखद हो, पर अस्वाभाविक स्थिति नहीं है। वस्तुतः अन्ना के अनशन अभियान को लेकर स्वयं अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया... आदि हमेशा गलतफहमी में रहे। मीडिया के अभूतपूर्व समर्थन से जो माहौल बना उन सबने इसे अपना स्थायी और व्यापक जन समर्थन मान लिया। यह सच नहीं था। उसमें गैर कांग्रेसी दलांे व संगठनों की व्यापक भागीदारी थी। सच यह भी है कि अन्ना हजारे तब तक एक क्षेत्र विशेष के सामाजिक कार्यकर्ता और संघर्षशील व्यक्तित्व के रुप मंे सीमित थे। अरविन्द एवं उनके साथियों के प्रबंध कौशल ने ही उन्हें राष्ट्रीय व्यक्तित्व में परिणत किया। यह भारत देश है। यहां ऐसे साथ को तोड़ने की कोशिशें होतीं रहतीं हैं। पहले स्वामी रामदेव से अरविन्द, उनके साथी एवं अन्ना हजारे को अलग करने की कोशिशें सफल हुईं और उसके बाद फिर इनको....।
हालांकि जिन लोगों ने अन्ना अभियान से लेकर आप के गठन तक के घटनाक्रम पर ध्यान रखा है वे बता सकते हैं कि जब 29 जुलाई,2012 को अरविन्द एवं मनीष को अनशन तोड़ने के लिए मनाया गया और उसमें राजनीतिक दल बनाने पर सहमति बनी तो अन्ना ने जंतर मंतर पर भाषण देते हुए कहा कि वे भी इससे सहमत हैं। यह बात अलग है कि बाद में उन्होंने राजनीतिक दल बनाने से असहमति प्रकट कर दी। क्यों? इसका कारण अन्ना ने आज तक स्पष्ट नहीं किया है। दोनों ओर गलतफहमियां तो थी हीं। अन्ना हजारे मानने लगे थे कि उनका व्यक्तित्व जयप्रकाश नारायण और गांधी जी की तरह विराट हो चुका है तो अरविन्द और उनके साथी यह सोचते थे कि सब कुछ तो किया हमने और उनका चेहरा आगे रखा। यानी यदि हम न करते तो अन्ना को कौन राष्ट्रीय क्षितीज पर लाता। यह भी सच है कि अरविन्द एवं मनीष दोनों ने स्वयं दो बार लंबा अनशन करके दिखाया कि ऐसा केवल अन्ना नहीं कर सकते, उनमंे भी इसकी क्षमता और अंतर्संकल्प है। सच कहें तो ऐसा करके उनने अन्ना से अलग अपना वजूद स्थापित करने की कोशिश की। दोनों प्रकार की सोच गलत थी। लेकिन तब तक ऐसे लोग इनके बीच में आ चुके थे जो पहले नहीं थे। आज दोनों को समझना चाहिए कि उनके इरादे में दोष नहीं था, वे देश की भलाई चाहते थे और हैं, पर जितना समर्थन उनको था वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध था, न उसमें जन लोकपाल का समर्थन था और न इनके व्यक्तित्व को। अन्ना भी जहां जा रहे हैंं वहां पहले की तरह भीड़ नहीं जुटती और आम आदमी पार्टी को भी एक-एक व्यक्ति को जोड़ने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। साफ है कि अगर अरविन्द एवं उनके साथी तुरत पार्टी गठन के सुझाव को स्वीकार करने की जगह पहले अभियान को देशव्यापी करते हुए संगठन बनाते और दलीय राजनीति में बाद में आते तो उनकी स्थिति बेहतर होती।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने लगाया बचत खाता कैंप

संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच (पं.) संस्था हमेशा से जनता की भलाई के लिए समर्पित रहती है। इसी कड़ी में आज एक कार्य और किया गया। इस बार संस्था की ओर से बचत खाता कैंप लगाया गया। यह कैंप संस्था के केंद्रीय कार्यालय के निकट आयोजित किया गया। इस कैंप में लगभग 100 लोगों के खाते खोले गए। यह कैंप सीलमपुर पोस्ट आफिस के साथ मिलकर लगाया गया था। इस कैंप में सीलमपुर पोस्ट आॅफिस के पोस्टमास्टर श्री राजपाल जी अपने साथ अपनी टीम लाए थे।
कैंप 11 बजे के करीब शुरू हुआ जिस कारण ज्यादा लोगों के खाते नहीं खुल पाए। इस पर पोस्टमास्टर श्री राजपाल जी व आए अन्य अधिकारियों ने रविवार को दोबारा कैंप लगाने की बात कही। उन्होंने कहा कि हमें नहीं मालूम था कि यहां इतने खाते खुल जाएंगे।
संस्था के सरपरस्त अब्दुल खालिक ने कहा कि जब से यह संस्था बनी है तब से लोगों की सेवा में लगी हुई है। इसके सभी सदस्य युवा हैं और अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण रूप से निभाते हैं और इनकी कोशिश रहती है कि इनके पास आया हुआ व्यक्ति निराश होकर न जाए।
संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने कहा कि संस्था लगातार अपनी तरफ से कोशिश करती रहती है कि लोगों की जितनी मदद की जा सकती है करें क्योंकि एक समय था जब हम दूसरों लोगों के पास जाते थे तो वह लोग कहते थे कि अभी समय नहीं कल आना आदि परन्तु संस्था के सदस्य अपने कीमती समय में से लोगों की सेवा के लिए समय निकालकर लोगों की परेशानी दूर करने की पूर्ण कोशिश करते हैं।
संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज ने कहा कि लोगों को खाता खुलवाने में कभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि दिल्ली में लोग बचत करते तो हैं परंतु उनके पास बचत खाता नहीं होता जिससे वह अपनी बचत को लंबे समय तक घर में बचाकर नहीं रख पाते हैं। इसलिए सीलमपुर पोस्ट आॅफिस के पोस्टमास्टर श्री राजपाल जी से यहां पर बचत खाता कैंप लगाने के लिए बात की गई तो उन्होने हां कर दी। भरी। हम श्री राजपाल जी के आभारी हैं।
यहां खाता 50 रुपये में खुला जिससे लोगों को यह खाता खुलवाने में कोई परेशानी नहीं आई। बैंक बगैरा के कई नियम होते हैं परन्तु पोस्ट आॅफिस के में सिर्फ दो प्रूफ पर ही खाता खुल गया।
इस मौके पर अब्दुल खालिक, जुबैर आज़म, साबिर हुसैन, डॉ. आर. अंसारी, मो. रियाज, शमीम हैदर, अब्दुल रज्जाक, यामीन, सदरे आलम, आजाद, सज्जाद, मो. सेहराज, मो. नाजिम, इरशाद अहमद, रईस अहमद, मो. मुन्ना अंसारी, आमीर अहमद, कुरबान, अनीस, इलमत, फुरकान, गुलजार अख्तर आदि शामिल थे जिन्होंने फार्म आदि भरे व लोगों की परेशानी कम करने की कोशिश की।

सोमवार, 18 नवंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था द्वारा बचत खाता कैंप का आयोजन 21 को

 संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नईं सोच (पं.) संस्था हमेशा से जनता की भलाई के लिए समर्पित रहती है। इसी कड़ी में एक कार्य और किया जाएगा। इस बार संस्था की ओर से डाक घर द्वारा बचत खाता कैंप का आयोजन 21 नवंबर 2013 को सुबह 10 बजे से किया जाएगा। यह कैंप संस्था के केंद्रीय कार्यालय के निकट आयोजित किया जाएगा।
संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने कहा कि संस्था लगातार अपनी तरफ से कोशिश करती रहती है कि लोगों की जितनी मदद की जा सकती है करें क्योंकि एक समय था जब हम दूसरों लोगों के पास जाते थे तो वह लोग कहते थे कि अभी समय नहीं कल आना आदि परन्तु संस्था के सदस्य अपने कीमती समय में से लोगों की सेवा के लिए समय निकालकर लोगों की परेशानी दूर करने की पूर्ण कोशिश करते हैं।
संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज ने कहा कि लोगों को खाता खुलवाने में कभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि दिल्ली में लोग बचत करते तो हैं परंतु उनके पास बचत खाता नहीं होता जिससे वह अपनी बचत को लंबे समय तक रख सकें। इसलिए संस्था की एक बैठक हुई जिसमें सभी ने यह निर्णय लिया कि हम डाक घर में जाकर बात करें कि वह हमारे यहां बचत खाता कैंप आयोजित करें क्योंकि डाकघर में सिर्फ 50 रुपये में खाता खुल जाता है। 50 रुपये में कोई भी खाता खुलवा सकते हैं।

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

न्यू जाफराबाद में बीएसपी का भाईचारा सम्मेलन का आयोजन

संवाददाता शाहरूख खान
उत्तरी पूर्वी दिल्ली। विधनसभा बाबरपुर के अन्तर्गत न्यू जाफराबाद के समुदाय भवन में बसपा के तत्वाधन में भाईचारा सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अघ्यक्षता ऑल इण्डिया जमीयतुल उलेमा-ए-हिन्द  के महासचिव दिल्ली प्रदेश व जमीयतुल कुरैशी दिल्ली प्रदेश महासचिव, हाजी मौ. यामीन ने कहा कि क्षेत्र में हिन्दू, मुस्लिम, भाईचारा सही बना हुआ है। 

उन्होंने जनता से अपील कि की भाईचारा और ज्यादा बनाए इसमें हमारे देश की मजबूती है। हर इन्सान को चाहिए कि वह जिस सरजमीन पर पैदा हुआ उसकी हिफाजत करें एकता ही अंख्डता है। मुजफ्फर नगर हुए दगों में उत्तर प्रदेश, एवं केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठेहीराते हुए कहा की यूपी सरकार के शासन में जो दंगा हुआ उसमें सरकार की लापरवाही हुई। केन्द्र सरकार चाहती तो 7 सितम्बर को आर्मी लगा कर दगें पर काबू किया जा सकता था। मगर आर्मी 9 सितम्बर को लगाई इससे जाहिर होता है। कि सरकार ने जानबूझकर दंगा नहीं रोकना चाहा।

उन्होने कहा कि बसपा ही ऐसी पार्टी है जो मुस्लिमों, दलितो, गरीबों पर जुल्म नहीं होने देती है। उन्होंने जनता से अपील की कि बसपा पार्टी को भारी मतों से विजयी बना कर विधनसभा में भेजे। मौ. हाजी यामीन एवं आबिद पहलवान अपने सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ बसपा में शामिल हुए। कार्यक्रम में हजारों लोगों की संख्या में लोगों कि उपस्थिति देखकर बसपा के लोग गदगद हुए।
हाजी मौ. यामीन समाजसेवा से जुड़े हुए समाजसेवक हैं और जिस लगन और मेहनत से समाजसेवा करते हैं। उसी लगन और मेहनत से बसपा पार्टी के लिए भी काम करेंगे, ऐसी हमें उम्मीद है। भाईचारा सम्मेलन में बसपा के ऑल इण्डिया तेली समाज के अघ्यक्ष शेर खान मलिक ने कहा कि भाजपा, काग्रेस एक सिक्के के दो पहलू है जैसे कहावत है चोर-चोर मौसरे भाई उन्होने दिल्ली को बर्बाद कर रख है।

उन्होने जनता से अपील की कि बसपा को विजयी बनाकर दिल्ली की हालत सुधरने का मौका दें। अत्याचार गुण्डागर्दी से मुक्ति बसपा ही दिला सकती है। इस मौके पर बसपा के उत्तरी पूर्वी लोकसभा प्रभारी चौ. सतीश (इंजीनियर), लोकसभा कोडिनेटर बसपा, हाजी समी सलमानी लोकसभा संयोजक, अब्दुल रहमान, आमिर राजा, रूप चन्द गौतम जिला अघ्यक्ष, मामा नूर हसन, मौ. जाकिर, सुलेमान प्रधान, हाजी आफताब , उपाध्यक्ष हाजी महरदिन, हाजी जुल्फेकार , चौ. बेद, हारून पहलवान, अनवर भाई, बब्बू भाई, रपफीक, मुल्लाजी अली, मकसूद, अमजद, गब्बर पहलवान, पप्ले पूर्व प्रत्याशी नगर निगम, सिकन्दर बख्श इलाही, सफी इलाही, हाजी मुन्ना अंसारी, हाजी याकूब, डा. उमर, सलीम पहलवान, हाजी नवाब, हाजी इफ्तेखार मलिक के अलावा हजारों लोग मौजूद थे।

 

बुधवार, 13 नवंबर 2013

बड़े अफसर जेल भेजे जाएं

श्याम कुमार  

जिस प्रकार कोई भी रेल-दुर्घटना होने पर रेल मन्त्री व रेल अधिकारियों के यह पिटेपिटाए बयान आया करते हैं कि ‘दोषियों को नहीं बख्शा जाएगा’, उसी प्रकार नगरों में अतिक्रमणों के बारे में प्रशासनिक अधिकारियों के ये वाक्य प्रायः सुनने को मिलते हैं- ‘अतिक्रमणों व अतिक्रमणों के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कठोर कदम उठाया जाएगा’। लेकिन अधिकारी इस प्रश्न का उत्तर कभी नहीं देते कि उन्होंने अतिक्रमणकारियों एवं अतिक्रमण के लिए जिम्मेदार अपने विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के विरुद्ध अब तक कब-कब और क्या-क्या दण्डात्मक कार्रवाइयां की हैं? आजादी के बाद अब तक ऐसा ही हो रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय अनेक वर्षों से अतिक्रमणों को पूरी तरह हटाने का बार-बार आदेश व निर्देश जारी कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सड़कें, पटरियां (फुटपाथ) एवं गलियां राहगीरों के लिए हैं, न कि दुकानदारी के लिए। लेकिन सम्बन्धित विभाग केवल दिखावे की खानापूरी कर न्यायालय को अतिक्रमण हटाने की भ्रामक एवं मिथ्या सूचना दे देते हैं। अब तो जैसे विभागों व अफसरों को न्यायालय की अवमानना का डर ही नहीं रह गया है। स्थिति यह हो गई है कि जब न्यायालय द्वारा अवमानना में कुछ बड़े अफसरों को जेल नहीं भेजा जाएगा, तब तक अतिक्रमण नहीं हटाए जाएंगे।

अतिक्रमण हटाने के बारे में कभी-कभी अधिकारी बड़े रोचक बयान दे देते हैं। एक अधिकारी ने कहा- ‘अतिक्रमणों को सबकी सहमति से हटाया जाएगा। इस कथन पर यह शेर फिट बैठता है- ‘इस सादगी पे कौन न हो जाएगा फिदा, लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं।’ कल यह बयान भी आ सकता है कि चोरों, लुटेरों, अपहर्ताओं, हत्यारों आदि के विरुद्ध उनकी सहमति से कार्रवाई की जाएगी। कुछ समय पूर्व लखनऊ में एक अधिकारी ने बयान दिया था- ‘जमीन के नीचे बनी दुकानों का नागरिकों को बहिष्कार करना चाहिए, क्योंकि वहां उनके जानमाल का खतरा बना रहता है।’ बहुत खूब ! आप अवैध निर्माण हटाने की जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं और अपनी जिम्मेदारी जनता के गले मढ़ रहे हैं।

अतिक्रमणों ने न केवल लखनऊ को, बल्कि प्रदेश के समस्त नगरों को बुरी तरह अपने शिकंजे में जकड़ लिया है। पटरियों पर तो उनका पूरी तरह कब्जा हो ही चुका है, सड़कंें भी बुरी तरह उनकी गिरफ्त में हैं। सड़कों पर रंेग-रेंगकर यातायात चलता है तथा सर्वत्र जब-तब जाम लगा रहता है। अतिक्रमणों के कारण मार्ग-दुर्घटनाओं की भरमार हो रही है। अतिक्रमणकारियों ने शहरों को नरक बना डाला है और नागरिकों का जीना दूभर हो गया है। अतः अतिक्रमणों के विरुद्ध जब तक कठोरतम कार्रवाई नहीं की जाएगी, उनकी समाप्ति नहीं होगी। अतिक्रमणांे के सबसे बड़े कारण पुलिस विभाग, नगर निगम तथा अन्य स्थानीय निकाय हैं। सर्वविदित है कि अतिक्रमणकारी इन्हें नियमित ‘सुविधा शुल्क’ बांधकर चैन की बंशी बजाते हैं और ये लोग ‘मूंदउ आंख कतउ कोउ नाहीं’ की कहावत चरितार्थ करते हैं।

यदि वास्तव मंे अतिक्रमणों का सफाया करना है तो ये उपाय करने होंगे:- 1. प्रत्येक थानेदार एवं स्थानीय निकाय के अभियन्ताओं को इस बात के लिए प्रत्यक्ष रूप से पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाय कि वे अपने क्षेत्र में कहीं भी लेशमात्र अतिक्रमण न होने दें। इसके लिए वे अपने क्षेत्र में नित्य भ्रमण किया करें। यदि उनके क्षेत्र में कोई भी अतिक्रमण होता है और वह अतिक्रमण तत्काल नहीं हटाया जाता तो थानेदार व अभियन्ताओं के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। 2. जैसे ही कहीं पर अतिक्रमण हो, उसे उसी समय हटाकर अतिक्रमणकारी के विरुद्ध कारगर दण्डात्मक कार्रवाई की जाय। 3. प्रायः नेतागण भी अपनी नेतागिरी व कमाई के चक्कर में अतिक्रमणों को बढ़ावा देते हैं। अतः अतिक्रमणों के विरुद्ध कार्रवाई में ऐसे नेताओं की बिलकुल न सुनी जाय।

(श्याम कुमार)

सम्पादक, समाचारवार्ता

ईडी-33 वीरसावरकर नगर

(डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ।

मोबाइल-9415002458

ई-मेल : kshyam.journalist@gmail.com
http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/