बुधवार, 6 नवंबर 2013

आप और हम समाज सेवा समिति ने कांग्रेस पार्टी के लिए वोट देने की अपील की

 

संवाददाता

उत्तर-पूर्वी दिल्ली। चुनाव का मौहाल चल रहा है और कोई अपने पक्ष में मतदान करने के लिए कहता है। वहीं सीलमपुर विधानसभा में आप और हम समाज सेवा समिति ने कांग्रेस पार्टी के लिए वोट के लिए अपील की। यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार मौजूदा विधायक चौधरी मतीन अहमद हैं जो एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। आप और हम समाज सेवा समिति ने सभी से अपील की कि विधायक चौधरी मतीन साहब को एक बार फिर भारी बहुमत से जिताना है ताकि विकास की राह टूटे नहीं। 

समिति की ओर से मो. रिजवान ने बताया कि आप सभी अपने वोट का सही इस्तेमाल करें और वोट डालने जरूर जाएं। आपका सिर्फ एक वोट आपके इलाके की तस्वीर बदल सकता है आपका एक वोट आपकी दौलत से ज्यादा कीमती है इसलिए पूरी दिल्ली में कांग्रेस को वोट करें और सीलमपुर विधानसभा में चौधरी मतीन अहमद को वोट करें। 

इस मौके पर फस्सू भाई, सलीम भाई, गुलाम रसूल, शमशाद, चीना भाई, शाहिद, नासिर भाई, अरशद भाई जमीर अहमद मुन्ना पूर्व सलाहकार, अनवर भाई हाजी मुजम्मिल आदि लोगों ने शिरकत की।







 

सुभाष-जैसी लोकप्रियता किसी को नहीं मिली

श्याम कुमार

भाजपा के एक पुराने नेता ने एक टीवी चैनल पर कहा कि देश में जवाहर लाल नेहरू अब तक सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं तथा उनके बाद अब नरेन्द्र मोदी को वैसी लोकप्रियता प्राप्त हो रही है। उनके इस कथन पर बवाल मच गया और तीखी प्रतिक्रिया हुई। लोगों का कहना है कि नेताजी सुभाश चन्द्र बोस से अधिक लोकप्रियता देश में आज तक किसी को नहीं मिली। जवाहर लाल नेहरू की लोकप्रियता तो पूरी तरह सरकार द्वारा प्रायोजित थी। उन्होंने अपने नाम का स्वयं तरह-तरह के उपायों से भरपूर प्रचार किया था। अपने जीते जी जम्मू-कश्मीर में बनिहाल सुरंग का नाम ‘जवाहर सुरंग’ रखवाया। अपने जन्मदिन को ‘बाल दिवस’ नाम देकर आयोजित कराने लगे। ‘बाल दिवस’ मनाने के लिए पूरी सरकारी ताकत झोंक दी जाती थी तथा जबरदस्ती बच्चों की भीड़ जमा की जाती थी। अभी भी कांग्रेसी सरकारों में ऐसा हो रहा है।

जवाहर लाल नेहरू ने देश की वास्तविक विभूतियों का नाम दबाने के लिए तरह-तरह के उपाय किए। सबको अपने से छोटा जताने का प्रयास किया, जबकि वे सब जवाहर लाल नेहरू से कहीं अधिक महान व त्यागी थे। देश में कुटुम्बवाद की नींव नेहरू ने डाली, जिसे उनके बाद इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी आदि सदैव पुख्ता करते रहे। कांग्रेसजनों में नेहरू खानदान की अन्धभक्ति एवं चमचागिरी की प्रवृत्ति को बढ़ावा व संरक्षण दिया गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आजादी के बाद देशभर में चुन-चुनकर अधिकांश भवनों, सड़कों, योजनाओं आदि के नाम केवल नेहरू कुटुम्ब के लोगों के नाम पर रखे गए। यहां तक कि आजादी के बाद अब तक पांच रुपए वाले जितने भी डाक टिकट जारी हुए, प्रायः सभी मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी आदि के नाम पर निकले। अभी भी केन्द्र सरकार ये डाक टिकट केवल इन्हीं लोगों के नाम पर उपलब्ध कराती है।

इसके विपरीत लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाश चन्द्र बोस, सरदार पटेल आदि महाविभूतियों तथा देश की आजादी के लिए कुरबान होने वाले शहीदों को सरकारी स्तर पर कभी कोई महत्व नहीं दिया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की उपेक्षा करने के तो जवाहर लाल नेहरू ने अनेक प्रकार के शड्यन्त्र किए। जनता के बेहद दबाव पर नेताजी की मृत्यु की जांच करने के लिए जो आयोग बनाए गए, उन्होंने फर्जी लीपापोती की। नेहरू ने वे सभी गुप्त कागजात आयोगों को नहीं उपलब्ध कराए, जिनसे नेताजी के विरुद्ध शड्यन्त्र का भेद खुल सकता था। अंत में अटल-सरकार ने जो ‘मुखर्जी आयोग’ गठित किया, वह काफी अंश में सच्चाई तक पहंुच गया, किन्तु केन्द्र में पुनः कांग्रेसी शासन आ जाने के कारण उस सरकार ने इतना अधिक असहयोग किया कि उससे उस आयोग को लाचार होकर रह जाना पड़ा। केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने उस रिपोर्ट को नामंजूर कर दिया। देश में दीर्घकालीन कांग्रेसी शासन में नेताजी को एक प्रकार से जीते जी ही मार डाला गया।

देश भर में अब तक जितनी विशाल सभाएं नेताजी की हुई हैं, वैसी विशाल सभाएं बहुत कम लोगों की हुई हैं। नेहरू की सभाएं तो नेताजी सुभाश की सभाओं के आगे कहीं नहीं ठहरती थीं। यह नेताजी का त्यागी, जनजन में पूजित व बेहद लोकप्रिय करिष्माई व्यक्तित्व था, जिसके बल पर गांधी जी के विरोध के बावजूद नेताजी सुभाश चन्द्र बोस दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष बनने में सफल रहे। नेताजी की सभाओं में उपस्थित जनसमूह उनकी अपील पर आजाद हिन्द फौज के लिए सब कुछ दान कर देता था। आज भी कोई सरकारी संरक्षण न होने के बावजूद नेताजी सुभाश चन्द्र बोस की तसवीरें सभी ग्रामीण मेलों में अवष्य बिका करती हैं। लोकमान्य तिलक और सरदार पटेल के बारे में भी यही बात लागू होती है। नरेन्द्र मोदी की देशभर में जो भारी लहर चल रही है, उसे देखकर स्पश्ट प्रतीत हो रहा है कि वह तेजी से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बाद देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित हो रहे हैं।

(श्याम कुमार)

सम्पादक, समाचारवार्ता

ईडी-33 वीरसावरकर नगर

(डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ।

मोबाइल-9415002458

ई-मेल : kshyam.journalist@gmail.com

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

लखनऊ नगर निगम पर राहु की छाया

श्याम कुमार

विगत अनेक वर्षों से लखनऊ नगर निगम पर मानो राहु की छाया पड़ी हुई है। वहां जो मुखिया तैनात हो रहे हैं, उनकी ताकत के आगे पूरा नगर बौना प्रतीत होता है। पिछली बार मायावती पूर्ण बहुमत लेकर जब मुख्यमन्त्री बनीं तो उनके दाहिने हाथ सतीश चन्द्र मिश्र की तूती बोलने लगी थी। सतीश चन्द्र मिश्र के सहपाठी रह चुके शैलेश कुमार सिंह लखनऊ नगर निगम के नगर आयुक्त बनाए गए। चूंकि वह सतीश चन्द्र मिश्र के सहपाठी रह चुके थे, इसलिए सतीश चन्द्र मिश्र की ताकत का शैलेश कुमार सिंह में भी समावेश हो गया। उस समय उनके जलवों का कोई जवाब नहीं था। आम नागरिकों की तो उन तक पहुंच थी ही नहीं, बड़े-बडे़ दिग्गज भी उनके आगे पानी भरते थे। वह कभी नगर निगम के मुख्य कार्यालय में नहीं बैठते थे। उनकी ताकत देखकर महापौर डॉ. दिनेश शर्मा भी अपनी इज्जत अपने हाथ में बचाकर रखते थे। शैलेश कुमार सिंह के बारे में जगजाहिर था कि वह केवल मुख्यमन्त्री, शशांक शेखर सिंह, सतीश चन्द्र मिश्र व नगर विकास मन्त्री नकुल दुबे के फोन उठाते थे। एक बार पंचम तल के एक शक्तिशाली अधिकारी ने शैलेश कुमार सिंह को फोन मिलवाया तो आदत के अनुसार उन्होंने नहीं उठाया। पंचम तल के अधिकारी के निजी सचिव ने कई बार फोन मिलाया, किन्तु फोन नहीं उठा। जब निजी सचिव ने अपने अधिकारी को यह बात बताई तो उन्होंने निर्देश दिया कि एक व्यक्ति को फोन मिलाने के लिए बिठा दो और वह तब तक फोन मिलाता रहे, जब तक कि शैलेश कुमार सिंह फोन न उठा लें। जब उन अधिकारी को शैलेश कुमार सिंह की ताकत का पता लगा तो उन्होंने चुप्पी साधने में गनीमत समझी।

मायावती के मुख्यमन्त्रित्व काल में प्रायः हर विभाग से धन-दोहन की क्रिया होती थी। लखनऊ नगर निगम भी उस क्रिया का शिकार हुआ और उसका सारा धन जैसे चलनी में छनता गया। यहां तक कि हजरतगंज के सुन्दरीकरण की जो योजना बनी, उसमें भी जमकर भ्रष्टाचार हुआ। लखनऊ नगर निगम के अनेक विभागों के लोग खूब ‘धन्य’ हुए। एक वरिष्ठ अभियन्ता के बारे में तो आम चर्चा थी कि उन्होंने करोड़ों कमाए। नतीजा यह था कि लखनऊ के केवल अतिविशिष्ट इलाकों में काम होते थे, शेश पूरे लखनऊ में ऊबड़-खाबड़ सड़कें, जर्जर विद्युत-व्यवस्था, बजबजाते नाले आदि नागरिकों को खून के आंसू रुलाते रहे।

अखिलेश-सरकार के आने पर प्रदेश में जो खुशी की लहर दौड़ी, उसमें लखनऊ नगर निगम का उद्धार होने की भी यहां के नागरिकों में आशा जगी थी। किन्तु कमाल फिर हुआ और बाद में नगर आयुक्त पद पर ऐसे व्यक्ति आसीन हो गए, जिनकी ताकत शैलेश कुमार सिंह-जैसी मानी जा रही है। न उनसे कभी बात हो पाती है और न भेजे गए पत्रों पर वह कोई कार्रवाई करते हैं। शहर पहले ही-जैसा दुर्दशाग्रस्त है। सड़कें, नाले, विद्युत-व्यवस्था आदि की जर्जर स्थिति नागरिकों को पूर्व की भांति खून के आंसू रुला रही है। बेचारी जनता की न कहीं कोई सुनवाई है, न कहीं कोई सुनने वाला है।

(श्याम कुमार)

सम्पादक, समाचारवार्ता

ईडी-33 वीरसावरकर नगर

(डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ।

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सोमवार, 4 नवंबर 2013

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी

श्याम कुमार              

मायावती के शासनकाल में जो तमाम गलत बातें हुईं, उनमें मुख्य सचिव पद का अवमूल्यन भी था। इस अवमूल्यन की चर्चा पूरे देश के प्रशासनिक संवर्ग में होती थी तथा सबको बहुत अफसोस था। अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद पर आसीन होते ही मुख्य सचिव पद की गरिमा को पुनः बहाल किया। किन्तु इसमें पूर्व मुख्य सचिव नवीन चंद्र वाजपेई का भी योगदान माना जाना चाहिए। उस समय यह चर्चा थी कि उन्हें शशांक शेखर सिंह की भांति पूर्ण अधिकार-सम्पन्न ‘कैबिनेट सचिव’ बनाया जाएगा। पर नवीन चंद्र वाजपेई ने मना कर दिया था और मुख्य सचिव के पद को ही पूर्व-प्रतिष्ठा प्रदान किए जाने का पक्ष लिया था।

अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में बाद में एक अन्य अच्छा काम यह किया कि उन्होंने जावेद उस्मानी को मुख्य सचिव बनाया। जावेद उस्मानी अत्यन्त योग्य तो हैं ही, धैर्यशील, विवेकशील, चरित्रवान एवं व्यक्ति को परखने की क्षमता रखने वाले भी हैं। पूर्व मुख्य सचिव देवेन्द्र सिंह बग्गा की कई खूबियां उनमें हैं। जिस समय मुख्य सचिव के काम में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं हुआ करते थे, यदि जावेद उस्मानी उस काल में मुख्य सचिव हुए होते तो उनके व्यक्तित्व का चमत्कार और भी अधिक देखने को मिलता। प्रयाग में विश्व का जो सबसे विशाल धार्मिक समागम ‘महाकुम्भ’ के रूप में सम्पन्न हुआ, उसकी सफलता में सबसे बड़ा योगदान मुख्य सचिव जावेद उस्मानी का था। उन्होंने पूरे समय कड़ी मेहनत के साथ अपनी निगरानी रखी। महाकुम्भ में उन्होंने साधु-सन्तों का दिल पूरी तरह जीत लिया था। बड़े-बड़े महात्माओं के शिविर में उनकी भारी प्रशंसा हुई। प्रयाग के महाकुम्भ या अर्धकुम्भ में किसी भी मुख्य सचिव को यह सौभाग्य अब तक नहीं मिला था। इसी प्रकार, पिछली होली के अवसर पर जब मैं जावेद उस्मानी से मिलने उनके आवास पर गया तो देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां स्वादिष्ट व्यंजनों से युक्त होली-मिलन का भव्य पण्डाल सजा हुआ था। कभी मुख्य सचिव के रूप में योगेन्द्र नारायण भी होली पर वैसा आयोजन किया करते थे।

जावेद उस्मानी की सबसे बड़ी विशेशता कार्य के प्रति उनकी भारी लगन है। वक्त के वह पाबन्द हैं तथा पूरे दिन काम में जुटे रहते हैं। यह सही भी है कि इतने बड़े प्रदेश का मुख्य सचिव यदि सुबह से देर रात तक काम में पूरी तरह नहीं जुटा रहेगा तो प्रदेश का कदापि भला नहीं हो सकेगा।

जावेद उस्मानी अपनी बढ़िया हिन्दी के लिए मशहूर हैं। वह बहुत अच्छी एवं प्रभावपूर्ण हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी लिखने में भी वह बहुत प्रवीण हैं तथा उनकी हस्तलिपि बहुत सुन्दर है। एक अधिकारी ने इस पर टिप्पणी की थी कि लगता है, चीफ साहब अपनी आरम्भिक शिक्षा में सरकन्डे की कलम का इस्तेमाल करते थे, तभी उनकी हस्तलिपि इतनी प्यारी है। किन्तु एक रोचक बात यह कि वह हिन्दीप्रेमी होने के बावजूद अपना हस्ताक्षर हिन्दी के बजाय अंग्रेजी में करते हैं। जबकि इसके विपरीत प्रदेश के कृषि उत्पादन आयुक्त आलोक रंजन बोलने में अंग्रेजी का अधिक इस्तेमाल करते हैं, किन्तु हस्ताक्षर हिन्दी में किया करते हैं।

(श्याम कुमार)

सम्पादक, समाचारवार्ता

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रविवार, 3 नवंबर 2013

भाजपा मुख्यालय बनाम सपा मुख्यालय

श्याम कुमार

दिल्ली के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने मुझसे कहा-आप बहुत वरिष्ठ पत्रकार हैं और जनता की नब्ज पहचानते हैं, इसलिए कुछ राय दीजिए कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को कैसे प्राणवान किया जाय। मैंने उनसे कहा कि आप लखनऊ में विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित समाजवादी पार्टी के कार्यालय में चुपचाप किसी भी दिन जाकर अवलोकन कर लें, वहां आप हर समय सौ-दो सौ कार्यकर्ता मौजूद पाएंगे। सपा मुख्यालय में कार्यकर्ताओं की समस्याओं की नित्य सुनवाई की व्यवस्था तो रहती ही है, सप्ताह में एक दिन षिवपाल सिंह यादव स्वयं पर्याप्त समय वहां रुककर कार्यकर्ताओं की समस्याओं का समाधान करते हैं। मन्त्री व प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी नित्य सुनवाई करते हैं। मुलायम सिंह यादव भी प्रायः पार्टी कार्यालय में उपस्थित रहते हैं। जब समाजवादी पार्टी सत्ता में नहीं थी और उसकी कट्टर विरोधी मायावती का शासन था, उस समय भी समाजवादी पार्टी के कार्यालय में कार्यकर्ताओं का हर समय पर्याप्त जमावड़ा रहा करता था। सपा कार्यकर्ता पार्टी के आवाहन पर जब-तब धरना- प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर लाठियां खाया करते थे। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी के लखनऊ-मुख्यालय में पूरे दिन शायद ही कोई आम कार्यकर्ता दिखाई देता हो। पूरा परिसर सन्नाटे में डूबा रहता है तथा कभी-कभी गिनेचुने पदाधिकारी कक्षों में दिखाई देते हैं। वहां कार्यकर्ताओं की समस्याओं की सुनवाई की कोई व्यवस्था नहीं रहती है।

मैं नहीं जनता कि भाजपा के उन वरिष्ठ नेता को मेरी बात कैसी लगी, किन्तु यथार्थ यही है। जब सुन्दर सिंह भण्डारी प्रदेश के भाजपा-प्रभारी थे और कल्याण सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे, उस समय भाजपा-परिसर में आम कार्यकर्ताओं का जो जमघट और रौनक रहती थी, वह अतीत की वस्तु हो चुकी है। जब भाजपा सत्ता में आई और उसमें कांग्रेसी संस्कृति वाले भ्रश्ट एवं ठेकेदार तत्व घुसकर हावी हो गए तो उन्होंने भाजपा के लोगों को भी अपने रंग में रंग लिया। भाजपा का अपना व्यक्तित्व एवं कलेवर धीरे-धीरे गायब होता गया। जब भाजपा सत्ता में थी, मुझे याद है कि सफेद-बुर्राक कपड़े पहने हुए अनेक नेता कमरों में बैठे रहते थे और यदि उनके पास कोई कार्यकर्ता अपनी समस्याएं लेकर आता था तो उसे बुरी तरह दुत्कारकर भगा देते थे। भाजपा में जो गुटबन्दी पनप रही थी, उसकी खबरें ये नेता चटखारे लेकर पत्रकारों के कानों में फूंकते रहते थे। उस समय प्रदेशभर में अहंकार में चूर भाजपा नेता पार्टी-कार्यकर्ताओं की ऐसी ही घोर उपेक्षा करने लगे थे। परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे भाजपा में नेताओं की तो बहुतायत हो गई, किन्तु कार्यकर्ताओं का अभाव होता गया।

विगत वर्शों में लोकसभा या प्रदेश विधानसभा के जितने भी चुनाव हुए हैं, हर चुनाव से पूर्व भाजपा नेता बड़े जोरषोर से ‘एक बूथ, दस यूथ’ की अपनी रणनीति प्रचारित करते हैं। लेकिन वह दावा ‘थोथा चना बाजे घना’ सिद्ध होकर रह जाता है। इस बार भी ‘एक बूथ, बीस यूथ’ का दावा किया जा रहा है, किन्तु इस दिशा में अधिकांशतः कागजी कार्य ही हो रहे हैं। सुमित शाह तक उत्तर प्रदेश में भाजपा के जमीनी खोखलेपन की बात कदाचित नहीं पहुंच पा रही है। पहले जब भाजपा नेता सत्ता के नषे में चूर नहीं हुए थे और पार्टी में कार्यकर्ताओं का भरपूर सम्मान हुआ करता था, उस समय चुनाव के समय किसी को रणनीति बनाने की आवष्यकता ही नहीं होती थी। हर बूथ पर भाजपा कार्यकर्ता सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहकर डटे रहते थे और घर-घर जाकर लोगों को वोट डालने के लिए मतदान-केन्द्र पर लाते थे।

जब से अमित शाह उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रभारी बने हैं, उन्होंने गुजरात के अनुभवों के आधार पर उत्तर प्रदेश में मुर्दा पड़ी भाजपा को प्राणवान बनाने की चेश्टा की है। उनके प्रयासों का बहुत असर होता प्रतीत हो रहा है। लेकिन वह प्रदेश में भाजपा की निश्क्रियता, कार्यकर्ताआंे की उपेक्षा, नेताओं के भाई-भतीजावाद व अहंकार एवं आपसी कलह का कितना उन्मूलन कर पाएंगे, यह तो आने वाला समय बताएगा!

(श्याम कुमार)

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