रविवार, 29 मार्च 2026

“मैं जानता हूँ” खुशी-प्रवृत्ति से “मैं अभी अमल करता हूँ” की कसौटी तक

डॉ.  राजेश के पिलानिया

 20 मार्च को अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस के रूप में मनाया जाता है। अधिकांश लोग खुश रहना चाहते हैं, लेकिन वहाँ तक पहुँचना हमेशा आसान नहीं होता। एक बड़ी चुनौती यह है कि जो हम जानते हैं, उसे वास्तविक कर्म में कैसे बदला जाए। पिछले चालीस वर्षों में अनेक क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने खुशी पर अध्ययन किया है, और इस विषय पर हजारों शोध-पत्र तथा पुस्तकें उपलब्ध हैं। हमारे पास इस बात की स्पष्ट समझ है कि खुशी का अर्थ क्या है और उसे कैसे पाया जा सकता है। फिर भी तनाव और असंतोष आम बने हुए हैं। ऐसा क्यों हैयह लेख इसी प्रश्न की पड़ताल करता है और बताता है कि खुशी पाने के लिए सही ज्ञान का उपयोग क्यों महत्त्वपूर्ण है।

मैं जानता हूँप्रवृत्ति औरमैं अभी अमल करता हूँ” — हमारा समाज अक्सर विचारों और ज्ञान को बहुत अधिक महत्त्व देता है। हम विक्टर ह्यूगो के इस कथन - जिस विचार का समय गया हो, उससे अधिक शक्तिशाली कुछ नहीं होता” के साथ विचारों का उत्सव मनाते हैं, और सर फ्रांसिस बेकन के इस वाक्य - ज्ञान स्वयं शक्ति हैके साथ ज्ञान का महत्त्व स्वीकार करते हैं। दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वे तभी हमारे काम आते हैं जब हम उनका उपयोग करें।

विचार और ज्ञान की अवधारणा को अपने-आप में रहस्यमय और अतिगौरवपूर्ण बना देने की प्रवृत्ति को दूर करने की आवश्यकता है। यह आवश्यक है कि हम विचार या ज्ञान से भी अधिक महत्त्वपूर्ण एक और बात को उचित महत्त्व और स्वीकार्यता दें और वह है कर्म और क्रियान्वयन की अवधारणा। हमें ध्यान फिर से उसी पर केंद्रित करना होगा जो वास्तव में मायने रखता है, और कर्म तथा क्रियान्वयन का उत्सव मनाना होगा।

कर्म के बिना विचार और ज्ञान वास्तविक लाभ तक नहीं पहुँचते। सबसे अधिक महत्त्व इस बात का है कि हम जो जानते हैं, उसका उपयोग कैसे करते हैं। खुशी के मामले में लोग उस स्थिति में फँस जाते हैं जिसे हममैं जानता हूँप्रवृत्ति कह सकते हैं। खुशी के बारे में जानना अच्छी बात है, लेकिन सबसे पहले यह परखना ज़रूरी है कि जो हम जानते हैं, वह सचमुच सही है या नहीं। खुशी के बारे में अनेक मिथक हैं। जब हमें यह भरोसा हो जाए कि हमारा ज्ञान सही है, तब भी यह याद रखना होगा कि केवल जान लेना पर्याप्त नहीं है। जो हम सीखते हैं, उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। प्रयोग करके ही हम यह समझ पाते हैं कि हमारे लिए क्या काम करता है, क्योंकि हर व्यक्ति के लिए खुशी का अर्थ अलग होता है।

भारत और विदेश में खुशी पर पंद्रह वर्षों के अपने शोध और अध्यापन के दौरान लेखक ने अक्सर देखा है कि लोग यह मान लेते हैं कि वे पहले से ही जानते हैं कि खुशी क्या है। बहुत बार उनकी धारणाएँ गलत होती हैं। और जब वे सही भी होते हैं, तब भी वेमैं जानता हूँप्रवृत्ति में फँसे रहते हैं। आशा है कि आप भी वही भूल नहीं कर रहे हैं।

पाठकों के लिए मुख्य संदेश — ज्ञान तभी सहायक होता है जब हम उसका उपयोग करें। खुशी के बारे में जो हम जानते हैं, उसे व्यवहार में लाना महत्त्वपूर्ण है। अगली बार जब आपको यह पूरा भरोसा हो कि आप खुशी के बारे में जानते हैं, तबमैं अभी अमल करता हूँकी कसौटी पर स्वयं को परखिए। सबसे पहले यह जाँचिए कि आपका ज्ञान सही है या नहीं। यदि सही है, तो आज से ही उसे अमल में लाना शुरू कीजिए, ताकि जीवन अधिक खुशहाल और अधिक संतोषपूर्ण बन सके।

(लेखक मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे लोकप्रिय रूप सेभारत के हैप्पीनेस प्रोफेसरके रूप में जाने जाते हैं और उनका नवीनतम कार्य इंडियन प्रैक्टिस ऑफ हैप्पीनेस: सेंटेनेरियन्स से मिले रहस्यहै। उन्होंने दुनिया भर में करोड़ों लोगों के साथ खुशी संबंधी अपने विचार साझा किए हैं।)

 

 

गुरुवार, 26 मार्च 2026

धर्म बदलने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और क्रिप्टो क्रिश्चियन

बसंत कुमार

अनुसूचित जनजाति के स्टेटस पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया और कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाला अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति अगर कोई अन्य धर्म अपनाता है तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाएगा जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अगुवाई वाले बेंच ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, इस आदेश में हाईकोर्ट ने यह कहा था कि अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और उसका प्रचार प्रचार करता है तो उसे अनुसूचित जाति का नहीं माना जा सकता, और उल्लेख किया संविधान अनुसूचित जाति आदेश 1950 इस बात को स्पष्ट करता है की 1950 के अधिनियम की धारा 3 में बताए गया है कि कुछ धर्म हिंदू, बौद्ध सिक्ख के अलावा किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर उसका अनुसूचित अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि देश में लाखों की संख्या में रहने वाले क्रिप्टो क्रिश्चियन का क्या होगा गौरतला है कि भारत क्रिप्टो क्रिश्चियन वे लोग हैं जो ईसाई धर्म तो अपना लेते हैं पर अनुसूचित जाति के मिलने वाले लाभों को प्राप्त करने के लिए इस बात का खुलासा नहीं करते की उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है।

हम आगे देश में जाति से जुड़ा सवाल बहुत ही टेढ़ा है सामाजिक स्तर पर हमेशा से यह बहस का विषय रहा है कि क्या धर्म बदलने से जातिगत भेदभाव खत्म हो जाता है ऐसे मामले सामने आते रहते हैं कि दलित समुदाय के लोगों को अपना धर्म बदलकर दूसरा धर्म अपनाने के बाद भी भेदभाव का सामना करना पड़ा है पिछले साल मार्च में तमिलनाडु के ईसाई परिवारों, जो पहले दलित थे, ने आरोप लगाया था कि उनके साथ समान व्यवहार नहीं हो रहा है यहां तक की कब्रिस्तान में उनके लोगो को शवों को दफनाने के लिए अलग जगह दी जाती है कहने का अभिप्राय यह है कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी उन्हें उसी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है जो हिंदू धर्म में दलित के रूप में उनके साथ होता था राजनीतिक नजरिया की बात करें तो इस फैसले के बाद धन परिवर्तन और आरक्षण से जुड़ी बहस और जोर पकड़ सकती है सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर तौर पर संविधान को ध्यान में रखकर यह फैसला दिया है लेकिन वास्तविकता यह है कि कुछ मामले ऐसे होते हैं जहां कानून और जमीनी हकीकत में बड़ा फर्क होता है भारत में जाति एक वास्तविकता है जिसे नहीं बदला जा सकता लेकिन इसकी जुड़ी हुई बुराइयों को खत्म करने की कोशिश की जानी चाहिए।

सर्वप्रथम ईसाई और मुस्लिम धर्म में धन्मांतरण करने वाले हिंदू अनुसूचित जातियों के लोगों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए यूपीए के अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के चेहरे पर 2004 ने किया गया। वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में राष्ट्रीय एवं भाषा ए अल्पसंख्यक आयोग का गठन हुआ जिसके अध्यक्ष जस्टिस रंगनाथ मिश्र बनाए गए इस आयोग के माध्यम सेधर्मांतरित ईसाइयों एवं मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक और अन्य स्थितियों का अध्ययन कराया गया। उसे समय के अनुसूचित अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष सरदार बूटा सिंह ने उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करने की अनुशंसा कर दलितों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया, जबकि सरदार बूटा सिंह स्वयं अनुसूचित जाति के बहुत बड़े नेता थे और राजीव गांधी की सरकार में गृह मंत्री भी थे। शायद वह राजनीति के मुख्यधारा में लौटने की अपनी प्रबल इच्छा के चलते उन्हें सोनिया गांधी के दबाव में यह निर्णय देना पड़ा। और उन्होंने आयोग के अध्यक्ष के रूप में धर्मांतरण करने वाले ईसाइयों और मुसलमान को अनुसूचित जाति में शामिल करने की अनुशंसा कर दी जिसको सरकार ने मानना ही था। परंतु आयोग की तत्कालीन सचिव श्रुति श्रीमती आता दास आशा ने कमीशन की ओर से डीसेंट नोट भेज कर हर एक बिंदुओं के साथ स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कीमत पर धर्मांतरित ईसाइयों एवं धर्मांतरित मुसलमानों को अनुसूचित जाति की शामिल सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। इस संबंध में यह बताना आवश्यक है कि वर्ष 2004 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा था कि धर्मांतरित ईसाइयों एवंधर्मांतरित मुसलमानो को अनुसूचित जाति में शामिल करने का पक्ष क्या है यूपीए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में जाकर यह कह दिया था कि सरकार को कोई आपत्ति नहीं है सरकार के इसी जवाब पर उच्चतम न्यायालय ने कार्यवाही आगे बढ़ाई और रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन हुआ।

वास्तव में यूपी सरकार द्वारा धर्म मंत्री किसने और मुसलमान को अनुसूचित जाति में शामिल करने के पीछे धन्वंतरण के अलावा की अन्य उद्देश्यनही था। यदि इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया जाता तो करोड़ दलित वर्ग के लोग ईसाई मिशनरियों की प्रलोभन में फंस कर ईसाई बन जाते। वर्तमान समय में धर्मांतरण करने के पश्चात हम झूठित वर्ग के रूप में मिलने वाला लाभ समाप्त हो जाता है कांग्रेस के इस खड्यंत्र को असफल बनाने में स्वर्गीय अशोक सिंघल श्रीमती आशा दास और तत्कालीन भाजपा के अंजूषित मोर्चे के अध्यक्ष व पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ को भी का बहुत बड़ा हाथ रहा। इन सब के पीछे बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का विराज चिंता नहीं मूलाधार था जिसका वह पूना पैक्ट के समय से जीवन पर्यंत मूर्त रूप देने का प्रयास करते रहे वे कभी भी नहीं चाहते थे की अनुसूचित जाति के लोग चाहे सदियों तक मनुवादी विचारधारा के कारण अपेक्षा और शोषण का शिकार होते रहे पर हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति से अलग नहीं होना चाहिए।

सन 1947 में जब देश आजाद हुआ और संविधान निर्माण का उत्तरदायित्व डॉ अंबेडकर को सौपा गया तो उस समय दलितों का अधिकार छीनने की ताक में बैठी अनेक शक्तियों सक्रिय हो गई और ऐसे में बाबा साहब अंबेडकर की असली परीक्षा प्रारंभ हुई, उन्हें संविधान निर्माण के मुश्किल कार्य के साथ-साथ अनुसूचित जातियों का आरक्षण के पक्ष और विपक्ष के प्रश्नों का सामना करना एवं उत्तर देना था। धर्मांतरितमुसलमानो और ईसाइयों की तरफ से सैकड़ो प्रश्नों का सामना करते हुए अनेक अनर्गल तर्कों का उन्होंने मुंह तोड़ जवाब दिया। डॉ अंबेडकर ने धर्मांतरित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग को बड़ी कठोरता के साथ अस्वीकार कर दिया धर्मांतरित ईसाइयों और मुसलमानो को अनुसूचित सूची में डालने के पीछे डॉक्टर अंबेडकर के विचारों को जानकर उनके दलित समाज के उत्थान की प्रतिबद्धता एवं देश के प्रति उत्तरदायित्व के सम्मान की प्रतिबद्धता दिखाई देती है उनका मानना था कि यह लंबे समय से ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रायोजित मांग है के पीछे धर्मांतरण को बढ़ावा देने के अलावा कुछ नहीं था डॉक्टर अंबेडकर का मानना था कि अनुसूचित वर्ग में अपने धार्मिक आस्था को प्रलोभन में न बदले इसी कारण हिंदू का समाज में कुरीतियों की तंग आकर जब उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ने का फैसला किया तो उन्हें ईसाई या मुस्लिम बनने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन मिले पर उन्होंने इसे स्वीकार कर दिया उन्होंने स्पष्ट किया कि ईसाई या इस्लाम का भाईचारा केवल उनके मानने वालों तक ही सीमित है गैर-मुस्लिम या गैर-ईसाई के साथ उनके भाईचारे का प्रश्न बहुत ही सीमित था।

कुछ रूढ़िवादी हिंदू सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश में एक कमी यह निकाल रहे हैं कि जो हिंदू बौद्ध धर्म को अपना चुके हैं उन्हें अनुसूचित जाति के मिलने वाले आरक्षण से वंचित क्यों नहीं किया जा रहा है। इस विषय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉक्टर कृष्ण गोपाल ने अपनी पुस्तक "बाबा साहब व्यक्तित्व और विचार"में कहते हैं कि वास्तव में डॉक्टर अंबेडकर एक सुधारवादी हिंदू थे। इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया जो भारत में पल्लवित और पुष्पित हुआ। हिंदू धर्म छोड़ने से पहले उन्होंने खुले मंच कहा था "हिंदूधर्म के ठेकेदारों सुधर जाओ नहीं तो हम लाखों दलितों के साथ हिंदू धर्म का त्याग कर देंगे'!, अपनी मृत्यु के मंत्र एक माह 23 दिन पूर्व उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाते हुए यह तक दिया कि हमने कमरा बदला है मकान नहीं बदला है अर्थात उन्होंने वही धर्म अपनाया जिसके मूल में हिंदू संस्कृति बसती है डॉक्टर अंबेडकर ने यह स्पष्ट कर दिया कि ईसाइयत या इस्लाम के छलावे में न आए। दलित समाज को यदि हिंदू धर्म छोड़ना ही है तो बौद्ध धर्म को अपने। इसके अतिरिक्त एक और विभाग समस्या क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर है जो ईसाई मिशनरियों के प्रलोभन में आकर ईसाई तो बन गए हैं पर वे अनुसूचित जाति के रूप में मिलने वाले सुविधाओं को न छोड़ने के कारण, ईसाई धर्म अपनाने की बात को सार्वजनिक नहीं करते ऐसे लोगों को ईसाई मिशनरियों के छुपे हुए मनसूबों को समझा कर उन्हें हिंदू धर्म में सम्मान के साथ वापस लाने के प्रयास किए जाने चाहिए।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2004 से प्रारंभ हुई इस विवादित विषय का अपने फैसले द्वारा पटाक्षेप कर दिया है और यह सुनिश्चित कर दिया है की अनुसूचित जाति का कोई भी व्यक्ति धर्मांतरण कर लेता है तो धर्मांतरण करने के बाद अनुसूचित जाति को मिलने वाले लाभ का भागीदार नहीं होगा पर वही हिंदू धर्म के सामाजिक संगठनो और धार्मिक नेताओं को यह सोचना होगा किआखिर क्या कारण है की भारी संख्या में अनुसूचितजाति(दलित) लोग हिंदू धर्म छोड़ने पर विवश क्यों हो रहे हैं जिसके कारण हिंदुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है और जो लोग हिंदू धर्म छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं उनके घर वापसी का प्रयास किया जा रहा है जबकि होना यह चाहिए था की ऐसी परिस्थितिया न बने की लोग अपना धर्म छोड़कर किसी और धर्म की ओर जाए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

सीवर सफाई के दौरान कब तक मरते रहेंगे सफाई कर्मी

बसंत कुमार

देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान सफाई कर्मियों की मौत को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है राज्यसभा में दिए गए एक सरकारी जवाब के अनुसार वर्ष 2021 से वर्ष 2025 के सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई करते समय कुल 315 सफाई कर्मियों की मौत हुई परंतु यह संख्या सिर्फ सरकारी आंकड़ों में दर्ज है और कितनी मौतें ऐसी हुई है जिनके बारे में सरकार को पता ही नहीं है। आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 53 मौतें दर्ज हुई जबकि दिल्ली में यह संख्या 26 से अधिक रही इसके अतिरिक्त हरियाणा में 43 तमिलनाडु में 38 उत्तर प्रदेश में 35, गुजरात में 25 और राजस्थान में 24 सफाई कर्मियों की सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय मौत हो गई।

यह बात भी सामने आई है कि कुल मौतों का सिर्फ 70% ही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो पाता है, इन मामलों में हो रही मौतों की संख्या कही अधिक है, अब प्रश्न उठता है सरकार हर क्षेत्र में तकनीकी विकास की बात करती है रोबोट के माध्यम से बड़े-बड़े मेडिकल ऑपरेशन हो रहे हैं पर सीवर की सफाई और सेफ्टी टैंको की सफाई के दौरान मरने वाले सफाई कर्मियों की मौत पर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है।

देश में हर दो-तीन दिन में कहीं न कहीं से सीवर की सफाई करने गए सफाई कर्मियों की मौत की खबरें आती रहतीहै,

इसको लेकर संसद के अंदर कई बार सवाल उठाते रहे हैं पर सरकार इसके लिए भी कदम नहीं उठा रही है और 21वीं सदी के भारत में आज भी सीवरों और सेप्टिक टैंकों की सफाई का काम मैन्युअली ही हो रहा है जिसके परिणाम स्वरूप इसका में इस काम में लगे मजदूरों की मृत्यु का समाचार आता रहता है। यद्यपि विदेशों में यह काम मशीनों से हो रहा है पर हमारे यहां सफाई कर्मी तौर सफाई करते समय सीवर या सेप्टिक टैंकों के मैंने होल में नीचे उतरते हैं और कई बार उसमें फंस जाने या गैस द्वारा दम घुटने से उनकी मौत हो जाती है इसे लेकर लंबे समय से आवाज उठाई जा रही है, हैरानगी की बात यह है कि हमारे देश में सीवर और सीवर सिस्टम अभी भी पूरी तरह से पुराने तौर तरीकों से चल रहा है न्यायालय के आदेशों के बावजूद इसका मशीनीकरण और ऑटोमेशन नहीं हो पा रहा हैं सुप्रीम कोर्ट औरअन्य अदालतें सीवर की मैन्युअल यानी मानव आधारित सफाई को गैरकानूनी ठहरा चुके हैं।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में सीवर डेथ के मामले में एक बड़ा फैसला लिया उसने कहा कि अब सीवर की सफाई के दौरान किसी सफाई कर्मी की मृत्यु हो जाती है या दिव्यांग हो जाता है तो उनके आश्रितों को 30 लाख रुपए का मुआवजा देना पड़ेगा इससे पूर्व वर्ष 2014 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सी वर डेथ के मामले में मृतकों को के परिवारों को 10 लख रुपए मुआवजा देने का आदेश पारित किया था पर दुर्भाग्य वश इस आदेश का पालन केवल आधे मामलों में ही किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि हाथ से मैला ढोने ने की प्रथा पूरी तरह से समाप्त होनी चाहिए और भारत में इंसान द्वारा नालो और सेप्टिक टैंकों की सफाई एक बहुत बड़ी समस्या है। इससे निजात पाना आवश्यक है।

भारत में 70% सीवेज लाइन की सफाई आमतौर पर होती ही नहीं। वर्ष 2015 में एक सर्वे से पता लगा कि 2015 तक हमारे देश में 810 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट थे लेकिन इनमें से मात्र 522 की चालू हालत में थी बाकी सब बंद पड़े थे देश के सीवेज प्लांट्स की में हर तरह की गंदगी गिरती है इसमें सूखा गीला प्लास्टिक और मलवा सभी कुछ होता है जिससे जानलेवा जहरीली गैस बनने लगती है और जब कोई सफाई कर्मचारी सीवर या सेप्टिक टैंक में सफाई के लिए घुसता है तो दम घुटने की स्थिति बन जाती है अब समय आ गया है कि इसे मशीनों से लैस किया जाए भारत में कुछ वर्ष पहले सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्म विभूषण डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने बाहर से आयात करके दिल्ली में एक सीवेज क्लीनिक मशीन पेश की थी जिसकी कीमत 43 लाख रुपए थी पर सरकार के उदासीन रवैये के कारण ऐसी मशीन है और नहीं आ पाई।

अमेरिका में सीवर की सफाई के लिए मशीन और उपकरणों का समुचित ढांचा है सीवेज टनल्स को हमेशा मशीनों के जरिए धोया और साफ किया जाता है, सीवर की सफाई में मानव का इस्तेमाल नहीं के बराबर होता है, यूरोप में भी यही सिस्टम लागू है वहां सीवर की सफाई पूरी तरह नई तकनीक पर आधारित मशीनों के जरिए होती है और नई तकनीक से इस प्रक्रिया को और भी बेहतर बनाया जा रहा है यूरोप और अमेरिका की बात तो छोड़ दें एशियाई देश मलेशिया जो वर्ष 1957 में आजाद हुआऔर उसके बाद से उन्होंने अपनी सीवर सफाई की व्यवस्था पर ध्यान देना शुरू किया पहले वहां भी सीवर की सफाई का काम आदमी करते थे लेकिन धीरे-धीरे इसे मशीन और फिर चरणबद्ध ऑटोमेटेड सिस्टम में रिप्लेस कर दिया गया अब यहां सीवर से जुड़ी सफाई का पूरा काम मशीनों से ही किया जाता है वहां की सरकार ने सीवर कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को सब्सिडाइज किया है और सरकार द्वारा सेप्टिक टैंक की सफाई रखने के लिए अवेयरनेस कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं पर दुर्भाग्य बस हमारे देश में इस बात पर कोई जोर नहीं दिया जा रहा है।

कैसी विडम्बना है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जीवनी कोजन जन तक पहुंचाने वाले रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के वंशज आज के आधुनिक युग में भी सीवर की सफाई के दौरान हजारों की संख्या में मर रहे हैं इनके लिए बस दो ही चीजों पर विशेष अधिकार प्राप्त है। एक तो यह कि रामायण के रचयिता महर्षि बाल्मीकि जयंती का को मनाने का विकसित अधिकार इस विषय में आर एस एस के सर संघ चालक मोहन भागवत यह बात कह चुके है कि बाल्मीकि जयंती पूरा हिंदू समझ क्यों नहीं मनाता और दूसरा सफाई कर्मियों के रूप में होने वाली रिक्तियों में शत प्रतिशत आरक्षण, क्योंकि भारतीय समाज में आज भी लोगों में यह भावना व्याप्त है कि सरकारी दफ्तरों और प्राइवेट जगहों पर सफाई का काम सिर्फ वाल्मीकि परिवारों में पैदा होने वाले बच्चे ही करेंगे और होता भी यही है कि जो बच्चा इन परिवारों में पैदा होता है उसे अपने बाप की जगह सफाई कर्मी नौकरी पर रख लिया जाता है, इस विषय में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में सफाई कर्मियों की सेवाओं का एक कैडर बनाकरनियमित भर्ती की जिसमें सभी जातियां के लोग शामिल हुए और उन्होंने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया है कि सफाई कर्मी का काम सिर्फ वाल्मीकि समुदाय के लोग ही नहीं करेंगे।

टॉयलेट मैन के नाम से मशहूर पद्म विभूषण डॉ बिंदेश्वर पाठक ने देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के प्रेरणा स्रोत बने, यदि डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक थोड़े दिन और जिंदा रहते तो सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली महतो को रोकने के लिए कोई न कोई कदम अवश्य उठाते, अपनी मृत्यु से चंद मिनटों पहले 15 अगस्त 2023 के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह वादा किया था पर अकाल मृत्यु के कारण यह वादा पूरा न कर पाए डॉ बिंदेश्वर पाठक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि सरकार सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों को रोक लगाने के लिए कदम उठाए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 19 मार्च 2026

संवैधानिक मर्यादा का खुलेआम अतिक्रमण

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रशासन का अपने राज्य में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुआ व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य और डर पैदा करने वाला है। ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति भाजपा के एजेंडा में फंस गईं हैं। भाजपा उनसे अपना एजेंडा पूरा करवा रही है। ममता बनर्जी इसके राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग केंद्रीय एजेंसियां और यहां तक की कई बार न्यायपालिका को भी इसी भाषा में आरोपित कर चुकी हैं। अभी तक राष्ट्रपति का पद उनके अपमान और दुर्व्यवहार से बचा हुआ था। राष्ट्रपति को आरोपित करना वास्तव में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है। आखिर हमारी राजनीति कहां पहुंच गई है जहां नेता यह भी नहीं समझ रहे कि किसी प्रतिस्पर्धी पार्टी या चुनाव के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं इसका कितना भयानक असर हो सकता है। राष्ट्रपति के पद को स्तरहीन दलीय राजनीति से बाहर रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि आप 50 बार आयें तो सभी कार्यक्रमों में उपस्थित होना संभव नहीं होगा। भाजपा की चिंता सत्ता होती है और मेरी चिंता मेरे राज्य की जनता होती है। यानी वह कह रहीं हैं कि आप भाजपा का एजेंडा पूरा करने के लिए बार-बार पश्चिम बंगाल आतीं हैं और उम्मीद करती हैं कि मैं आपके स्वागत के लिए रहूं तो ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बंगाल यात्रा के दौरान ममता बनर्जी एसआईआर को लेकर धरने में शामिल थीं। क्या ममता बनर्जी की इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान की भावनाओं के अनुरूप भी माना जा सकता है?

राष्ट्रपति मुर्मू पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करने गईं थीं। 9वां अंतरराष्ट्रीय संथाल फिल्म महोत्सव व कॉन्फ्रेंस बागडोगरा हवाई अड्डा के पास सिलीगुड़ी महकमा परिषद के गोंसाईपुर में आयोजित किया गया। दरअसल, कार्यक्रम विधाननगर में आयोजित होना था लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था एवं अन्य कारणों का हवाला देते हुए इसे स्थानांतरित कर दिया। कार्यक्रम के लिए प्राप्त स्थान तक पहुंचना कठिन था और इतना छोटा था कि ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे। स्वाभाविक था कि राष्ट्रपति विधान नगर भी गईं, संथाल भाई-बहन वहां भी थे। वहां उन्हें अपना असंतोष प्रकट करने तथा सच्चाई अभिव्यक्त करने को बाध्य होना पड़ा। वस्तुत: बंगाल की धरती पर उतरने के समय से ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अवहेलना और अपमान की शुरुआत हो गई। हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल के अनुसार कोई उपस्थित नहीं था। सामान्य प्रोटोकॉल और परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए राज्यपाल रहते हैं , सामान्य तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री या अगर किसी कारणवश वह नहीं आ सकीं तो उनकी जगह कोई मंत्री रहते हैं। इसके साथ प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव भी उपस्थित रहते हैं। वहां कोई नहीं था । सिलीगुड़ी के मेयर ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय जनजाति मामलों के राज्यमंत्री दुर्गादास उइके इसलिए थे क्योंकि कार्यक्रम जनजाति समुदाय का था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसी पहली घटना है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई राज्य सरकार राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की अनुमति न दे , उनकी पूरी तरह अवहेलना करें और असंतोष व्यक्त करने पर प्रतिक्रिया ऐसी दे जैसे अपने किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी से टकरा रही है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शांत स्वभाव की मानी जाती है और कभी भी अशांत या गुस्सैल प्रतिक्रिया देते देखा नहीं गया। द्रौपदी मुर्मू ने यही कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई समस्या नहीं है कि कोई रिसीव करने आए या ना आए किंतु राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति देश के संवैधानिक अभिभावक होते हैं। सभी का उस पद की गरिमा और स्थापित परंपरा के अनुरूप सम्मान देना है। दूसरी और राष्ट्रपति का भी दायित्व है कि परंपरा गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आगाह करें।  उन्हें सार्वजनिक रूप से ऐसा बोलने को विवश होना पड़ा तो निश्चित रूप से स्थिति अस्वीकार्य थी। क्या राष्ट्रपति  मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करने की भूमिका निभातीं? आज एक राज्य में ऐसा हुआ कल दूसरे में होगा और जो एक राष्ट्रपति के साथ हो रहा है वह दूसरे के साथ भी हो सकता है। इसलिए राष्ट्रपति के नाते इस विषय को पूरी गंभीरता से सामने रखना उनका दायित्व है।

 अगर उन्हें इसकी जानकारी मिली कि यहां कार्यक्रम में  संथाल जनजाति के लोग इसलिए नहीं नहीं आ पाए क्योंकि कार्यक्रम पहले दूसरी जगह निर्धारित था तो प्रशासन के सहयोग की पूरी जानकारी मिलने के बाद उनके वहां जाना भी स्वाभाविक था।  क्या ममता मानती हैं कि उन्हें चुपचाप वापस आ जाना चाहिए था? उन्होंने यही कहा कि यह बड़ा मैदान था और मुझे जब मालूम हुआ कि आप लोग यहां हैं तो मैं सोची कि मुझे जाकर आपसे मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों किया गया क्योंकि यह मैदान दिया जाता तो सब लोग आ जाते।  राष्ट्रपति द्वारा इस तरह अपनी भावना व्यक्त करने को भी मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी को गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्हें शांत और संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपने पद की भी गरिमा प्रदर्शित करनी थी। इसकी जगह वह राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा कर रहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सम्मेलन के बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं थी, उसकी फंडिंग के बारे में , आयोजकों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। राष्ट्रपति के किसी प्रदेश में दौरा की सूचना राज्य सरकार के पास पहले जाती है।  उसमें उनके सारे कार्यक्रम वर्णित होते हैं। राष्ट्रपति भवन के अधिकारी प्रदेश सरकार के साथ संपर्क में रहते हैं और लगातार बातचीत होती रहती है। उसके अनुसार उनका प्रोटोकॉल , कार्यक्रम में सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं होती हैं?  क्या ममता बनर्जी के प्रशासन ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के बारे में उनको जानकारी ही नहीं दी? अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए । किंतु ममता बनर्जी के व्यवहार से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें कुछ पता नहीं था।‌ पश्चिम बंगाल की मीडिया ने राष्ट्रपति की यात्रा और कार्यक्रम के बारे में पूर्व समाचार दिया था। सब कुछ सामने होते हुए इस तरह का व्यवहार और वक्तव्य साबित करता है कि ममता बनर्जी की हनक के समक्ष भारत देश के शीर्ष पद का भी कोई सम्मान नहीं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे शर्मनाक और ममता सरकार द्वारा सारी हदें पार करने घटना बताना बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री या ऐसे शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी मर्यादाएं सामने रहती हैं अन्यथा इसकी निंदा और विरोध के लिए कोई भी शब्द छोटे हैं। जनजाति समाज का कार्यक्रम और राष्ट्रपति की उपस्थिति के साथ जब ऐसा दर्दनाक व्यवहार है तो फिर सामान्य संगठन और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के साथ प्रशासन का कैसा व्यवहार होता होगा इसकी कल्पना करिए। पश्चिम बंगाल में जनजाति समुदाय की बड़ी संख्या है और उनकी परंपराओं ने केवल राज्य नहीं , भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं राष्ट्रपति जनजाति समुदाय से आती हैं। ममता बनर्जी स्वयं को आदिवासी समाज के लिए संघर्ष करने वाली और उनका हितैषी घोषित करतीं हैं। इस घटना के बाद क्या यह बताने की आवश्यकता है कि जनजाति समुदाय के प्रति उनके अंदर वाकई संवेदनशीलता और सम्मान है? वास्तविकता का साक्षात प्रमाण सामने है। विडंबना देखिए, सभी‌ भाजपा विरोधी दल इस पर मौन हैं। इन दलों का व्यवहार हतप्रभ करने वाला है। राष्ट्रपति कह रही हैं कि ऐसी स्थिति पैदा की गई ताकि कार्यक्रम न हो और उन्हें वापस पड़े। देश के सभी विवेकशील लोगों को विचार करना पड़ेगा कि क्या सत्ता की राजनीति इस सीमा तक चली जाएगी जहां प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के कार्यक्रम की व्यवस्था करने की जगह उसे हर स्तर पर विफल कर देने का व्यवहार हो? अगर आपका उत्तर नहीं है तो यह विचार करिए ऐसे व्यवहार का प्रतिकार कैसे हो ताकि आगे कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। ऐसा नहीं हुआ तो देश इस तरह की भयानक अराजकता में फंसेगा जहां किसी पद या विधान की मर्यादा नहीं बचेगी। ममता बनर्जी के कार्यकाल में तृणमूल सरकार ने बंगाल को ऐसे राज्य में बदल दिया है जहां कानून, संविधान, चुनाव, संवैधानिक संस्थायें सब कुछ दांव पर लग चुका है।

 अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 ,मोबाइल -98110 27208

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