अवधेश कुमार
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रशासन का अपने राज्य में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुआ व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य और डर पैदा करने वाला है। ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति भाजपा के एजेंडा में फंस गईं हैं। भाजपा उनसे अपना एजेंडा पूरा करवा रही है। ममता बनर्जी इसके राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग केंद्रीय एजेंसियां और यहां तक की कई बार न्यायपालिका को भी इसी भाषा में आरोपित कर चुकी हैं। अभी तक राष्ट्रपति का पद उनके अपमान और दुर्व्यवहार से बचा हुआ था। राष्ट्रपति को आरोपित करना वास्तव में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है। आखिर हमारी राजनीति कहां पहुंच गई है जहां नेता यह भी नहीं समझ रहे कि किसी प्रतिस्पर्धी पार्टी या चुनाव के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं इसका कितना भयानक असर हो सकता है। राष्ट्रपति के पद को स्तरहीन दलीय राजनीति से बाहर रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि आप 50 बार आयें तो सभी कार्यक्रमों में उपस्थित होना संभव नहीं होगा। भाजपा की चिंता सत्ता होती है और मेरी चिंता मेरे राज्य की जनता होती है। यानी वह कह रहीं हैं कि आप भाजपा का एजेंडा पूरा करने के लिए बार-बार पश्चिम बंगाल आतीं हैं और उम्मीद करती हैं कि मैं आपके स्वागत के लिए रहूं तो ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बंगाल यात्रा के दौरान ममता बनर्जी एसआईआर को लेकर धरने में शामिल थीं। क्या ममता बनर्जी की इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान की भावनाओं के अनुरूप भी माना जा सकता है?
राष्ट्रपति मुर्मू पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करने गईं थीं। 9वां अंतरराष्ट्रीय संथाल फिल्म महोत्सव व कॉन्फ्रेंस बागडोगरा हवाई अड्डा के पास सिलीगुड़ी महकमा परिषद के गोंसाईपुर में आयोजित किया गया। दरअसल, कार्यक्रम विधाननगर में आयोजित होना था लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था एवं अन्य कारणों का हवाला देते हुए इसे स्थानांतरित कर दिया। कार्यक्रम के लिए प्राप्त स्थान तक पहुंचना कठिन था और इतना छोटा था कि ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे। स्वाभाविक था कि राष्ट्रपति विधान नगर भी गईं, संथाल भाई-बहन वहां भी थे। वहां उन्हें अपना असंतोष प्रकट करने तथा सच्चाई अभिव्यक्त करने को बाध्य होना पड़ा। वस्तुत: बंगाल की धरती पर उतरने के समय से ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अवहेलना और अपमान की शुरुआत हो गई। हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल के अनुसार कोई उपस्थित नहीं था। सामान्य प्रोटोकॉल और परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए राज्यपाल रहते हैं , सामान्य तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री या अगर किसी कारणवश वह नहीं आ सकीं तो उनकी जगह कोई मंत्री रहते हैं। इसके साथ प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव भी उपस्थित रहते हैं। वहां कोई नहीं था । सिलीगुड़ी के मेयर ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय जनजाति मामलों के राज्यमंत्री दुर्गादास उइके इसलिए थे क्योंकि कार्यक्रम जनजाति समुदाय का था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसी पहली घटना है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई राज्य सरकार राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की अनुमति न दे , उनकी पूरी तरह अवहेलना करें और असंतोष व्यक्त करने पर प्रतिक्रिया ऐसी दे जैसे अपने किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी से टकरा रही है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शांत स्वभाव की मानी जाती है और कभी भी अशांत या गुस्सैल प्रतिक्रिया देते देखा नहीं गया। द्रौपदी मुर्मू ने यही कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई समस्या नहीं है कि कोई रिसीव करने आए या ना आए किंतु राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति देश के संवैधानिक अभिभावक होते हैं। सभी का उस पद की गरिमा और स्थापित परंपरा के अनुरूप सम्मान देना है। दूसरी और राष्ट्रपति का भी दायित्व है कि परंपरा गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आगाह करें। उन्हें सार्वजनिक रूप से ऐसा बोलने को विवश होना पड़ा तो निश्चित रूप से स्थिति अस्वीकार्य थी। क्या राष्ट्रपति मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करने की भूमिका निभातीं? आज एक राज्य में ऐसा हुआ कल दूसरे में होगा और जो एक राष्ट्रपति के साथ हो रहा है वह दूसरे के साथ भी हो सकता है। इसलिए राष्ट्रपति के नाते इस विषय को पूरी गंभीरता से सामने रखना उनका दायित्व है।
अगर उन्हें इसकी जानकारी मिली कि यहां कार्यक्रम में संथाल जनजाति के लोग इसलिए नहीं नहीं आ पाए क्योंकि कार्यक्रम पहले दूसरी जगह निर्धारित था तो प्रशासन के सहयोग की पूरी जानकारी मिलने के बाद उनके वहां जाना भी स्वाभाविक था। क्या ममता मानती हैं कि उन्हें चुपचाप वापस आ जाना चाहिए था? उन्होंने यही कहा कि यह बड़ा मैदान था और मुझे जब मालूम हुआ कि आप लोग यहां हैं तो मैं सोची कि मुझे जाकर आपसे मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों किया गया क्योंकि यह मैदान दिया जाता तो सब लोग आ जाते। राष्ट्रपति द्वारा इस तरह अपनी भावना व्यक्त करने को भी मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी को गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्हें शांत और संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपने पद की भी गरिमा प्रदर्शित करनी थी। इसकी जगह वह राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा कर रहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सम्मेलन के बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं थी, उसकी फंडिंग के बारे में , आयोजकों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। राष्ट्रपति के किसी प्रदेश में दौरा की सूचना राज्य सरकार के पास पहले जाती है। उसमें उनके सारे कार्यक्रम वर्णित होते हैं। राष्ट्रपति भवन के अधिकारी प्रदेश सरकार के साथ संपर्क में रहते हैं और लगातार बातचीत होती रहती है। उसके अनुसार उनका प्रोटोकॉल , कार्यक्रम में सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं होती हैं? क्या ममता बनर्जी के प्रशासन ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के बारे में उनको जानकारी ही नहीं दी? अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए । किंतु ममता बनर्जी के व्यवहार से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें कुछ पता नहीं था। पश्चिम बंगाल की मीडिया ने राष्ट्रपति की यात्रा और कार्यक्रम के बारे में पूर्व समाचार दिया था। सब कुछ सामने होते हुए इस तरह का व्यवहार और वक्तव्य साबित करता है कि ममता बनर्जी की हनक के समक्ष भारत देश के शीर्ष पद का भी कोई सम्मान नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे शर्मनाक और ममता सरकार द्वारा सारी हदें पार करने घटना बताना बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री या ऐसे शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी मर्यादाएं सामने रहती हैं अन्यथा इसकी निंदा और विरोध के लिए कोई भी शब्द छोटे हैं। जनजाति समाज का कार्यक्रम और राष्ट्रपति की उपस्थिति के साथ जब ऐसा दर्दनाक व्यवहार है तो फिर सामान्य संगठन और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के साथ प्रशासन का कैसा व्यवहार होता होगा इसकी कल्पना करिए। पश्चिम बंगाल में जनजाति समुदाय की बड़ी संख्या है और उनकी परंपराओं ने केवल राज्य नहीं , भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं राष्ट्रपति जनजाति समुदाय से आती हैं। ममता बनर्जी स्वयं को आदिवासी समाज के लिए संघर्ष करने वाली और उनका हितैषी घोषित करतीं हैं। इस घटना के बाद क्या यह बताने की आवश्यकता है कि जनजाति समुदाय के प्रति उनके अंदर वाकई संवेदनशीलता और सम्मान है? वास्तविकता का साक्षात प्रमाण सामने है। विडंबना देखिए, सभी भाजपा विरोधी दल इस पर मौन हैं। इन दलों का व्यवहार हतप्रभ करने वाला है। राष्ट्रपति कह रही हैं कि ऐसी स्थिति पैदा की गई ताकि कार्यक्रम न हो और उन्हें वापस पड़े। देश के सभी विवेकशील लोगों को विचार करना पड़ेगा कि क्या सत्ता की राजनीति इस सीमा तक चली जाएगी जहां प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के कार्यक्रम की व्यवस्था करने की जगह उसे हर स्तर पर विफल कर देने का व्यवहार हो? अगर आपका उत्तर नहीं है तो यह विचार करिए ऐसे व्यवहार का प्रतिकार कैसे हो ताकि आगे कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। ऐसा नहीं हुआ तो देश इस तरह की भयानक अराजकता में फंसेगा जहां किसी पद या विधान की मर्यादा नहीं बचेगी। ममता बनर्जी के कार्यकाल में तृणमूल सरकार ने बंगाल को ऐसे राज्य में बदल दिया है जहां कानून, संविधान, चुनाव, संवैधानिक संस्थायें सब कुछ दांव पर लग चुका है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092 ,मोबाइल -98110 27208

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