शुक्रवार, 13 मार्च 2026

टीबी मुक्त भारत' जागरूकता क्रिकेट मैच: दिल्ली पुलिस ने सांसद -11 को 12 रन से हराया

  • टीबी मुक्त भारत अभियान के समर्थन में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच मैत्री क्रिकेट मैच
  • कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया द्वारा 15 मार्च 2026 को मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में आयोजन
  • दिल्ली पुलिस-11 ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 225/8 का स्कोर बनाया
  • सांसद-11 की टीम 213 रन पर ऑलआउट, दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मैच जीता
  • जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और दिल्ली पुलिस की सहभागिता से जनस्वास्थ्य जागरूकता का संदेश
संवाददाता
नई दिल्ली। टीबी मुक्त भारत के राष्ट्रीय अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के तत्वावधान में 15 मार्च 2026 को नई दिल्ली के ऐतिहासिक मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच एक मैत्री क्रिकेट मैच का आयोजन किया गया। इस पहल का उद्देश्य खेल के माध्यम से जनस्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ावा देना और टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय संकल्प के प्रति समाज की सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना था।
मैच में पहले बल्लेबाजी करते हुए दिल्ली पुलिस 11 ने 20 ओवर में 8 विकेट पर 225 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया। सिकंदर सिंह ने 38 गेंदों में 77 रन की शानदार पारी खेली, जबकि राजीव अंबास्ता ने 13 गेंदों में नाबाद 45 रन बनाकर टीम को तेज़ फिनिश दिया। सतीश गोलचा (21) और वेद प्रकाश सूर्य (17) ने भी उपयोगी योगदान दिया। सांसद 11 की ओर से गेंदबाजी में मनोज तिवारी (3/23) और केसरिदेव सिंह झाला (3/40) ने प्रभावी प्रदर्शन किया, जबकि सौमित्र खान (1/25) और अनुराग ठाकुर (1/42) ने भी विकेट हासिल किए।
लक्ष्य का पीछा करते हुए सांसद 11 की टीम ने संघर्षपूर्ण प्रदर्शन किया, लेकिन 18.2 ओवर में 213 रन पर ऑलआउट हो गई और दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मुकाबला अपने नाम कर लिया। सांसद 11 की ओर से अनुराग ठाकुर (52), के. सुधाकर (46), गुरमीत सिंह हायर (41) और लघु कृष्णा (23) ने उल्लेखनीय पारियाँ खेली। दिल्ली पुलिस की ओर से रोहित सिंह ने 43 रन देकर 5 विकेट लेकर मैच का रुख पलट दिया। अनिल शुक्ला (2/19) और सिकंदर सिंह (2/47) ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि हरेश्वर स्वामी (1/26) ने एक अहम विकेट लिया।
इस अवसर पर उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने टीबी मुक्त भारत के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि खेल समाज को जोड़ने और जागरूकता फैलाने का सशक्त माध्यम है। सांसद राजीव शुक्ला ने कहा कि क्रिकेट लोगों को एक साथ लाने की अ‌द्भुत क्षमता रखता है और जब जनप्रतिनिधि तथा संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए एकजुट होती हैं तो उसका संदेश दूर-दूर तक पहुँचता है।
सारण सांसद राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि टीबी के खिलाफ लड़ाई में सामूहिक प्रयास अत्यंत आवश्यक है और इस प्रकार के आयोजन लोगों को जोड़कर राष्ट्रीय अभियान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सांसद अनुराग ठाकुर ने भी कहा कि खेल समाज को प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम है और यह आयोजन एक स्वस्थ भारत के निर्माण की दिशा में हमारी साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा ने कहा कि दिल्ली पुलिस उन पहलों का समर्थन करने में गर्व महसूस करती है जो सामुदायिक सहभागिता को राष्ट्रीय अभियानों से जोड़ती हैं। वहीं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि जब नेता और संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए मैदान में उतरते हैं तो यह समाज में एकता और जिम्मेदारी का सशक्त संदेश देता है।

नीतीश की विदाई के मायने

अवधेश कुमार

नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना ऐसी घटना है जिस पर लंबे समय तक चर्चा होगी। राजनीति के छात्र भविष्य में इस पर शोध भी करेंगे । भारतीय राजनीति में लंबे समय तक सत्ता शीर्ष पर बने रहने के बाद जब भी कोई स्वयं निवृत होने का फैसला करेगा या नहीं करेगा तब - तब इसे उदाहरण के रूप में पेश किया जाएगा। हमारी राजनीति, मीडिया और बौद्धिक जगत में संदेह का मनोविज्ञान इतना हावी है कि ऐसे किसी कदम को सहज स्वाभाविक स्वीकार नहीं किया जा सकता। विरोधी इसमें षड्यंत्र देख रहे हैं तो इसका उत्तर राजनीति और समाज के चरित्र में है। अपने व्यक्तित्व या अभी तक की घटनाओं के संदर्भ में देखते हैं तो यही निष्कर्ष आएगा। चूंकि भारतीय राजनीति में इस तरह के उदाहरण नहीं है, इसलिए यह असामान्य घटना लगती है। लगभग दो दशक प्रदेश का प्रत्यक्ष नेतृत्व करने के बाद इस निर्णय को सहज स्वीकार करना आसान नहीं होता। उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक वर्ग में भावनात्मक उबाल भी है। कुछ समय बाद धीरे-धीरे यह समाप्त हो जाएगा। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इतना पाखंड है कि कल तक जो लोग नीतीश कुमार को मानसिक रूप से असंतुलित होने की बात कर वीडियो वायरल करा रहे थे , बयान दे रहे थे वे भी इसमें भाजपा का षड्यंत्र देख रहे हैं। याद करिए जब एक मुस्लिम लड़की को नियुक्ति पत्र सौंपते समय उन्होंने अभिभावकीय भाव में हिजाब पड़कर यह कहते हुए कि क्या लगाई हो हटाओ खींचने की कोशिश की तो कितना बड़ा मुद्दा बनाया गया? वे भी नीतीश के नाम पर छाती पीट रहे। क्या हम राजनीति में ऐसी ही प्रवृत्ति चाहते हैं जहां कोई कभी अपने तरीके से सत्ता शीर्ष से निवृत होने का कदम उठाये ही नहीं? या उन्हें इसके लिए सम्मानपूर्वक तैयार करने की कोशिश नहीं हो? आप चाहते हैं कि ऐसा हो तो इसे सकारात्मक दृष्टि से देखिए।

ऐसी घटना के पीछे निश्चित रूप से कुछ कारण और बड़े प्रयास भी होंगे। अंततः परिणति ही मुख्य अर्थ रखती है। यह कहना कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनना चाहती थी इसलिए उन्हें हटा दिया गया नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को देखते हुए स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी टिप्पणी करने वाले नीतीश कुमार को दुर्बल या खोखला व्यक्तित्व साबित कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा हो सकती है किंतु इसके लिए नीतीश को जबरन हटाकर गठबंधन में विपरीत संकेत देंगे यह मानने का कोई कारण नहीं है। लोकसभा में भाजपा को बहुमत नहीं होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार जदयू और तेलुगू देशम की बदौलत चल रही है।भाजपा नेतृत्व क्या किसी नेता, उनके सहयोगियों या पार्टी से दुर्व्यवहार करने का जोखिम उठायेगी? आम दुष्प्रचार के विपरीत भाजपा अपने गठबंधन के साथियों को सम्मान देती है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना उद्धव ठाकरे को नहीं छोड़ा बल्कि उन्होंने भाजपा को छोड़ा। नीतीश कुमार को कभी भाजपा ने नहीं छोड़ा उन्होंने ही पाला बदल किया लेकिन जब वापस आए तो सरकार चलाने एवं निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता रही। 2020 में भाजपा को जद यू से ज्यादा सीटें थीं फिर भी मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया। नीतीश पर दबाव डालकर ऐसा कराया जा सकता है यह उनके चरित्र के साथ मेल नहीं खाता। नीतीश कुमार ने जब चाहा भाजपा को छोड़ा और फिर अपनी इच्छा से राजद छोड़ भाजपा के साथ आये। तो फिर?

उन्होंने एक्स पर लिखा है कि संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूँ। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूँ। कहां जा रहा है कि कारण कुछ और है, यह स्क्रिप्ट औरों ने लिखकर उनकी विदाई का झूठा आधार प्रस्तुत किया है। ऐसा क्या कारण हो सकता है जिसके लिए नीतीश को झूठ बोलना पड़े? प्रत्यक्ष कोई कारण नजर नहीं आता। क्या यह संभव है कि भाजपा नीतीश को दबाव में लाकर मुख्यमंत्री पद से हटने के लिए मजबूर करे और वे इसे सहन कर जाएं? किसी को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की इच्छा हो और उसे जबरन हटाने की कोशिश होगी तो वह सरकार गिरा देगा। जिस सरकार का मुखिया नहीं हो उसे बनाए रखने में क्या रुचि हो सकती है। तो यह तर्क गले नहीं उतरता। मान लीजिए उन्होंने राज्यसभा को विदाई का बहाना बनाया तो इससे साबित नहीं होता कि किसी दबाव में थे। पिछली बार जब वह राजद के साथ गए थे तो तेजस्वी यादव के सामने घोषणा किया था कि अब अब हम आगे बहुत दिन नहीं रहेंगे और यही लोग आगे बढ़ाएंगे। अपने साथियों से बोलते थे कि अब हम मुख्यमंत्री पद से अलग होना चाहते हैं।

यह बात सही है कि पिछले कुछ समय से नीतीश कुमार के व्यवहार, वचन और भाव में अस्वाभाविकता, असहजता और असंतुलन प्रदर्शित होता था। इन कारणों सेसमस्याएं आतीं थीं और दोनों पार्टी के नेताओं को हैंडल करना पड़ता था। इसलिए संभव है उन्हें मानसिक रूप से तैयार करने की कोशिश हुई होगी। मुख्य बात निर्णय और उसके समय का है

सही समय पर लिए गए या कराए गए निर्णय का भी महत्व होता है और यह कई बार इतिहास के लिए उदाहरण भी बन जाता है। नीतीश कुमार के लिए इससे उपयुक्त अवसर सत्ता शीर्ष से अलग होकर तत्काल सक्रिय रहने का क्या हो सकता है? उनके नेतृत्व में गठबंधन भारी बहुमत के साथ सत्ता मे है, राजनीतिक स्थिरता है, उनके विरुद्ध असंतोष का भाव नहीं है, विकास की गाड़ी पटरी पर है और‌सक्रिय रहने के लिए राज्यसभाकी सदस्यता है। शायद वे सीधे निवृत्ति की घोषणा करते तो विरोध ज्यादा उग्र और हिंसक हो सकता था। तो समर्थकों को समझाने के लिए उनके पास राज्यसभा में जाने की इच्छा का एक आधार है।

सच कह तो यह अवसर नीतीश कुमार के संपूर्ण राजनीतिक जीवन,  उनके योगदान आदि का निष्पक्ष मूल्यांकन का है। बिहार का नेतृत्व भाजपा के समर्थन से उन्होंने तब संभाल जब प्रदेश गहरे निराशा, हताशा और अवसाद से ग्रस्त था। बिहार में कुछ हो सकता है इसकी कल्पना ही नहीं थी। भारत और उसके बाहर बिहार कुशासन, अविकास, सामाजिक जातीय तनाव, नेताओं के भ्रष्टाचार का शर्मनाक उदाहरण बन गया था। बिहार शब्द गाली हो गई थी और स्वयं को बिहारी कहने में लोग शर्म महसूस करते थे। नीतीश के नेतृत्व में जनता दल यू और भाजपा ने बिहार में न केवल आशा,  उम्मीद और उत्साह पैदा किया बल्कि कानून और व्यवस्था पुनर्स्थापित कर प्रदेश को विकास के रास्ते सरपट दौड़ा दिया। पिछले लंबे समय से इसका विकास दर शीर्ष राज्यों के समान या कई बार आगे रहा है। लेकिन ध्वस्त हो चुके प्रदेश को वहां तक ले जाना आसान नहीं है। हालांकि उन्होंने लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय विभाजन और टकराव बनाए रखना एवं सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम परस्त नीति की काट के लिए पिछड़ों में अति पिछड़े, दलित में महा दलित , मुसलमान में पसमांदा आदि समूह खड़े किए और इससे जातिवाद दूसरे रूप में मजबूत हुआ। 

किंतु उनके कल में किसी तरह का जाति संघर्ष नहीं होना भी सच्चाई है। दूसरे, लड़कियों और महिलाओं को मुख्य धारा में लाने के कदम उनके दूरदर्शी विजन और लैंगिक समानता के प्रति सच्ची प्रप्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। जहां लड़कियां डर से स्कूल कॉलेज जाने से बचती थी वहां सीमित संसाधनों में उनके लिए साइकिल, वस्त्र, पुस्तकों और प्रोत्साहित करने के लिए वजीफे आदि की व्यवस्था ने चमत्कार कर दिया। हालांकि इन सबके पीछे भाजपा की भी भूमिका थी किंतु आज जब हम उनका मूल्यांकन करते हैं तो ये सब उनके योगदान में जुड़ेंगे। महिलाओं को स्थानीय निकाय में 33% आरक्षण की सामाजिक वर्णक्रम बदलने में ऐतिहासिक भूमिका थी। अगर कुछ निहित स्वार्थी बुद्धिजीवियोंऔर समर्थकों के प्रभाव में आकर सेकुलरिज्म के नाम पर उन्होंने 2013 में तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्धअतिवादी रवैया अपनाते हुए गठबंधन नहीं तोड़ा होता, राजद के साथ नहीं गए होते तो उनके ऐतिहासिक योगदान निर्दोष होते। 2010 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव का संपूर्ण परिवार पराजित हो गया था, पार्टी न्यूनतम वोट और सीटों पर आ गई थी। इसके अंत के साथ बिहार में विपक्ष की नई राजनीति के उभरने की संभावना थी। उन्होंने 2015 में साथ चुनाव लड़कर राजद को जीवन दान दिया। इस भूल के लिए उन्हें पश्चाताप होगा।‌ पर उन पर किसी तरह के वित्तीय भ्रष्टाचार, परिवारवाद आदि का आरोप नहीं लगा और यही सच्चाई है। उनके पुत्र इतने समय बाद राजनीति में आ रहे हैं तो इसे परिवारवाद को बढ़ावा देना नहीं कह सकते। सत्ता शीर्ष से स्वयं को अलग करने के कदम पर ऐसे व्यक्ति का अभिनंदन होना चाहिए , इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भाजपा नेतृत्व एवं जदयू के वरिष्ठ नेताओं की भी सराहना होनी चाहिए कि उन्हें इसके लिए उचित व सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराया। इसे राजनीति मेंश्रएक प्रवृत्ति स्थापना मान लें तो लोकतंत्र की दृष्टि से इसका संदेश मंगलकारी होगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली - 110092,  मोबाइल- 98110 27208

गुरुवार, 12 मार्च 2026

खाड़ी युद्ध में के कारण देश में गैस की किल्लत आखिर क्यों?

बसंत कुमार

खाड़ी में ईरान व इजरायल के बीच चल रही युद्ध से देश में एलपीजी किल्लत से आमलोगों की मुश्किलें बढ़ गई है कई जगह गैस सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित होने के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई कम होने से होटल और रेस्टोरेंट के बंद होने का खतरा बढ़ गया है रसोई का बजट भी बिगड़ रहा है और उपभोक्ताओं में नाराजगी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यद्यपि भारत सरकार के पेट्रोलियम मिनिस्टर हरदीप पुरी ने यह दावा किया है कि युद्ध की स्थिति के बावजूद घरेलू इस्तेमाल के लिए सीएनजी और पीएनजी की शत प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं पर वास्तविकता यह है कि गैस किल्लत के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है एक तरफ ररेस्तरां के मालिक यह कह रहे हैं कि अगर जल्द ही स्थिति नहीं संभली तो कामकाज बंद हो जाएंगे और वे लोग जिनके घरों में शादियां हैं वह गैस सिलेंडर की कमी के कारण चिंता में बैठे हुए हैं। ऐसा क्या है कि हमने अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह बना दिया की खादी के युद्ध के कारण हमारी अपनी दिनचर्या नष्ट होती जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघ संचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने बहुत पहले ही स्वावलंबन आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर करना चाहिए यानी अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें निर्यात से कमाई हुई विदेशी मुद्रा से उसे आयात करें। इसका तात्पर्य है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। आत्म पूर्ति की अवस्था में अपने देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन में किसी प्रकार की कमी ना हो। आज हम पाते हैं कि खाद्य उत्पादन में भारत आत्मनिर्भरता से हटकर फिर से आयात पर निर्भर हो गया है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से कम उत्पादक एवं बंजर हो गई है। गुरु जी ने उसमें चेतावनी दी थी कि हम अपनी आर्थिक नीति को खाद्य पदार्थों के उत्पादन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए व आत्मनिर्भरता क्यों बढ़ाने के लिए जैविक खेती वन ऊर्जा और सरकार प्रयास के रूप में पर्यावरण के उनको माध्यम से करनी चाहिए। पर आज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी की सरकार है पर हम खाड़ी के युद्ध के कारण बेबस लग रहे हैं आखिर इसके क्या कारण है।

आर्थिक सुधार युग के दौर से पूर्व तक तक हम लोग शादी विवाह या रेस्टोरेंट के संचालन में प्राकृतिक संसाधनोंवीजैसे लकड़ी कोयलेऔर गाय के गोबर से बने उपलेका प्रयोग करते थे, घर में जब भी शादी होती थी तो अपने उत्पादित पेड़ों से कटाई करके लकड़ी से काम कर लिया जाता था इस तरह से रेस्टोरेंट में कोयल के उपयोग से सारे पकवान बनाए जाते थे परंतु आर्थिक सुधार के प्रारंभ होने के बाद हमने इन प्राकृतिक संसाधनों को बंद करके बाहर से आयात गैस के ऊपर पूर्णतया निर्भर करना शुरू कर दिया है यहां तक की खाने का सामान गाड़ियां आज सभी आयातित गैस की पर ही चल रही है और जब खाड़ी में युद्ध हुआ तो हमारी दिनचर्या ही पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गई है लोगों को चिंता सताए जा रही है कि अगर यह युद्ध ज्यादा चला तो हमारे शादी विवाह जैसे आयोजन कैसे होंगे या खाना कैसे बनेगा।

अपने जीवन में खेती बाड़ी से लेकर जीवन की दिनचर्या में अत्यधिक निर्भरता की खतरे को हमारे विचारों ने पहले ही जान लिया था और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राष्ट्र वादी विचारक डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व व राष्ट्रीय पुनरुत्थान में लिखते हैं" आर्थिक सुधार युग के पूर्व तक लोग गाय और बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधिया चला रहे थे क्योंकि आधुनिकता की मजबूरियों के बावजूद ट्रैक्टर हमारे छोटे जोते के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध भूमि 24 एकड़ के आसपास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है। ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ साथ प्रदूषण बढ़ाता है। इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टाइन ने सर सी वी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा"भारत के लोगो को बताये कि अगर वे जीवित रहना चाहते हैं और दुनियां को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो ट्रैक्टर को भूल जाए तथा अपनी प्राचीन परंपरा को अपनाए एवं जुताई बैलों से करे "। परंतु अल्बर्ट आइंस्टीन है इस चेतावनी के बावजूद भी भारतअपनी पारंपरिक जीवन शैली को छोड़कर पश्चिम से आयातित जीवनशैली को अपना रहा है और अपने जीवन की गतिविधियों को 90% खाड़ी देशों से आयातित तेल के लिए के ऊपर निर्भर कर दिया है यहां तक की अब हम 500 मी. की दूरी तय करने के लिए पैदल चलने के बजाय मोटरसाइकिल या कार का इस्तेमाल करते हैं जो डीजल या पेट्रोल से चलती है, ऐसे में खाड़ी युद्ध के कारण ईरान के रास्ते भारत में तेल न पहुंचना भारत के आर्थिक गतिविधियों को ठप कर सकता है।

देश में करीब 19.01 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस की प्रतिदिन खपत है और इसका 50% आयातित होता है और गुंजा का की खाड़ी से जहाज का आवागमन लगभग बंद हो जाने के कारण खाड़ी देशों से करीब 6 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस सप्लाई बाधित हुई है और इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार को विशेष मीटिंग बुलानी पड़ी और प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों को निपटने के लिए अलर्ट रहने के लिए कहा। देश के कई हिस्सों मेंकमर्शियल और घरेलू सामान के लिए एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई में हो रही दिक्कत की शिकायत के बीच सरकार ने तय किया है कि नेचुरल गैस के उपयोग केलिए म एलजी उत्पादन सीएनजी और पीएनजी को सभी अन्य सेक्टरों पर तरह ही दी जाएगी इन क्षेत्रों की 100% डिमांड पूरी करने का प्रयास किया जाएगा तथा सरकार ने गैजेट नोटिफिकेशन के माध्यम से नेचुरल गैस के इस्तेमाल के लिए प्राथमिकता वाले चार क्षेत्र तय किए है -पहली प्राथमिकता के क्षेत्र में घरेलू पीएनजी सप्लाई, ट्रांसपोर्ट के लिए सीएनजी एलजी उत्पादन की और पाइपलाइन कंप्रेस्ड फ्यूल और अन्य जरूरी पाइपलाइन को रखा गया है

इसके बावजूद भी देश के अंदर उपभोक्ताओं में गहरी चिंता व्याप्त है और सभी डरे हुए है कि यदि खाड़ी युद्ध लंबा चला तो हमारे उद्योग धंधे दैनिक जीवन चर्या बुरी तरह से प्रभावित हो जाएगी इसलिए सरकार को आयातित तेल पर अत्यधिक निर्भरता को दूर करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों से निपटा जा सके।

पश्चिम एशिया जंग और इससे तेल की कीमत में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत में 10 % की उछाल से भारत की जीडीपी ग्रोथ में 20 से 25 बीसी एस की गिरावट आ सकती है। भारत अपनी जरूर का 89% कच्चा तेल आयात करता है और हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी है जो विगत 4 साल के उच्चतम स्तर पर है। हॉर्मुज की

खाड़ी से जहाज की आवा जाही बंद होने के कारण ग्लोबल सप्लाई में 20 से 25 बी पी एस की गिरावट आई है। ईरान और अमेरिका की लंबी लड़ाई से भारत की मुश्किलें और बढ़ सकती है क्योंकि भारत में आयात होने वाला कच्चा तेल हॉर्मुज की खाड़ी से आता है, और कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से देसी महंगाई और भी बढ़ सकता है यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 90 डॉलर के आसपास भी रहता है तो महंगाई पांच तक बढ़ सकती है लेकिन वर्तमान स्थिति में तो कच्चा तेल 120 प्रति बैरल के हिसाब से चल रहा है जो चिंता का विषय है और ऐसी स्थिति में भारत का चालू खाते का घाटा और भी बढ़ सकता है जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

विगत कुछ वर्षों से खाड़ी देशों ईरान इराक और अमेरिका इजरायल के संबंधों में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है और जिसका असर तेल की कीमतों में पड़ता है जो हमारी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करता है इस कारण हमें अपने पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों के विकास पर भी जोर देना चाहिए जिससे अधिक तेल पर हमारी निर्भरता और न बढ़े।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 10 मार्च 2026

खुश रहना है तो हर बात को दिल पर न लें

डॉ. राजेश के पिलानिया

आज विश्व-भर में तनाव, अकेलापन और असंतोष हमें चारों ओर से घेर रहे हैं। तनाव, अकेलापन और असंतोष इक्कीसवीं सदी के जीवन की प्रमुख चुनौतियाँ हैं। डिजिटल तकनीकों, त्वरित मीडिया और सोशल मीडिया की उपस्थिति ने इन चुनौतियों को और अधिक जटिल बना दिया है।

तनाव, चिंता, अवसाद, अकेलेपन और असंतोष के अनेक कारणों में से एक बड़ा कारण है बातों को व्यक्तिगत रूप से लेना। हर बात को अपने ऊपर लेना बहुत अधिक तनाव, चिंता और क्रोध पैदा करता है। इसके अनेक दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जैसे नींद में बाधा, अवसाद, अकेलापन और लंबे समय तक रहने वाली उदासी।

खुशी पर पिछले पंद्रह वर्षों के शोध के दौरान लेखक ने ऐसे अनेक लोगों से मुलाकात की है जो हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से कई लोग इस बात से भी अवगत नहीं होते कि उनमें यह समस्या है और यही आदत उनके जीवन में तनाव, क्रोध, चिंता, अवसाद, अकेलापन और असंतोष को बढ़ा रही है।

यह जीवन जीने का सही तरीका नहीं है। जीवन जीने का एक बेहतर तरीका यह है कि हर बात को व्यक्तिगत रूप से लिया जाए। यह कहना आसान है, लेकिन करना आसान नहीं। तो इसे कैसे अपनाया जाए? इसे सरल और व्यवहारिक बनाए रखने के लिए नीचे दिए गए तरीकों का पालन किया जा सकता है। इसके दो व्यापक परिदृश्य हो सकते हैं।

परिदृश्य एक: यह आपके बारे में नहीं है। - अक्सर ऐसा ही होता है। कई बार लोग कोई टिप्पणी करते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं या किसी विशेष ढंग से व्यवहार करते हैं, और इसका कारण आप नहीं होते, बल्कि वे स्वयं होते हैं या वह पद और भूमिका होती है जो आप निभा रहे होते हैं। व्यक्ति जिस पद पर होता है और जिस भूमिका में होता है, उसके आधार पर वह कुछ निर्णय लेता है और उसी के अनुसार दूसरे लोग प्रतिक्रिया देते हैं। यह व्यक्ति के बारे में नहीं होता, बल्कि उसके पद और भूमिका के बारे में होता है।

व्यक्ति की भूमिका और पद के अनुसार लोग प्रतिक्रिया देते हैं। उनकी प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति पर व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि उस पद या भूमिका पर होती हैं। उसी पद या भूमिका के आधार पर व्यक्ति कुछ व्यवहार करता है, कुछ निर्णय लेता है या टिप्पणियाँ करता है। यह आपके बारे में नहीं होता, बल्कि आपके पद या भूमिका के कारण होता है।

इस स्पष्टता के साथ व्यक्ति स्थिति को बेहतर ढंग से समझ सकता है और स्वयं को उससे थोड़ी दूरी पर रख सकता है। वह यह समझ पाता है कि यह मामला व्यक्तिगत नहीं है और इसलिए वह इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेता। वह स्थिति को अधिक वस्तुनिष्ठ रूप से, दूरी बनाकर देख पाता है।

परिदृश्य दो: यह आपके बारे में है। - कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि आप पर व्यक्तिगत रूप से निशाना साधा जाए, कि आपके पद या भूमिका के कारण। तब भी हर बात को अपने ऊपर लेना आवश्यक नहीं है। ऐसे समय में व्यक्ति को अपने उद्देश्य और अपने काम पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। यदि आपने अपना काम ईमानदारी और निष्ठा से किया है, तो अपनी बात को यथासंभव स्पष्ट रूप से समझा देना चाहिए। इसके बाद जो कुछ आपके नियंत्रण में नहीं है, उसके बारे में चिंता करना छोड़ देना चाहिए। कोई आपके बारे में क्या सोचता है या क्या कहता है, उसे वैसा ही रहने दें।

इस प्रकार सोचने, ध्यान और श्वास-प्रश्वास की अभ्यासों में जुड़ने से व्यक्ति हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेने की आदत विकसित कर सकता है। ऐसा करके, बातों को व्यक्तिगत रूप से लेने से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है या उनसे बचा जा सकता है। इक्कीसवीं सदी की जीवन-चुनौतियों के बीच भी, हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेना संभव है और खुशहाल जीवन के लिए बेहतर आदतें विकसित की जा सकती हैं।

(लेखक  मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे लोकप्रिय रूप से “भारत के हैप्पीनेस प्रोफेसर” के रूप में जाने जाते हैं और उनका नवीनतम कार्य “द इंडियन प्रैक्टिस ऑफ हैप्पीनेस: सेंटेनेरियन्स से मिले रहस्य” है।)

ग्रंथ केवल मार्गदर्शन करते हैं

विजय लक्ष्मी शर्मा

किसी भी ग्रंथ को पढ़ लेने मात्र से आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और आत्मज्ञान के बिना मुक्ति भी संभव नहीं है। ग्रंथ केवल मार्गदर्शन करते हैं; चलना तो साधक को स्वयं ही पड़ता है। इसके लिए साधना आवश्यक है।

चित्त की वृत्तियों का पूर्णतः निरोध ही योग है। अपनी इन्द्रियों को वश में कर चेतना का आत्मा से संयुक्त होना ही योग का विज्ञान है।

मनुष्य का चित्त वासनाओं का घर है। अनेक जन्मों के संस्कार उसमें विद्यमान रहते हैं और उनकी तरंगें निरंतर उठती रहती हैं। आत्मा इन सबसे परे है। जिस प्रकार जब तक तालाब के जल में हलचल बनी रहती है, तब तक चन्द्रमा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई नहीं देता; उसी प्रकार मन में वासनाओं की हलचल रहने पर आत्मबोध नहीं हो सकता।

समस्त सृष्टि का विस्तार तीन गुणों— सत्त्व, रज और तम —के आधार पर है। यह प्रकृति इन्हीं तीन गुणों से युक्त है। आत्मा इन सबका केवल साक्षी है, इसलिए उसे दृष्टा कहा जाता है। तीनों गुणों की मात्रा में भिन्नता होने से प्राकृतिक तत्त्वों में विविधता दिखाई देती है।

चित्त को स्थिर करने के लिए जो बार-बार प्रयत्न किया जाता है, वही अभ्यास कहलाता है। मन अत्यंत चंचल है; वह एक क्षण भी शांत नहीं रहता, क्योंकि उसमें निरंतर विचारों का प्रवाह चलता रहता है। यह प्रवाह निद्रा में भी बना रहता है, तभी मनुष्य स्वप्न देखता है।

मन अनेक दिशाओं में भागता है। उसे स्थिर करने के लिए अनेक शास्त्रों में विभिन्न साधन बताए गए हैं, जैसे— ध्यान, भजन, कीर्तन, मंत्र-जाप, अपने इष्टदेव या परमात्मा का स्मरण तथा गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र का जप आदि। इन उपायों के माध्यम से मन धीरे-धीरे किसी एक केंद्र पर स्थिर होने लगता है।

इससे मन की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। किंतु वह कुछ समय शांत रहने के बाद पुनः दुगुने वेग से भोगों की ओर भागने लगता है। जिस प्रकार उपवास के समय मन में बार-बार भोजन की इच्छा उत्पन्न होती है और ध्यान बार-बार भोजन की ओर जाता है, उसी प्रकार ध्यान में बैठने पर विचार और भी तीव्रता से आने लगते हैं। उन्हें रोकने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है— यही अभ्यास है। इसमें दीर्घ समय लग सकता है, इसलिए धैर्य आवश्यक है।

प्राणायाम से भी चित्त की स्थिरता प्राप्त होती है। संसार के कार्यों के लिए गति आवश्यक है, परंतु परमात्मा स्वयं स्थिर है। वह सर्वत्र विद्यमान है और अचल है। जिस क्षण मन और शरीर की समस्त क्रियाएँ शांत हो जाती हैं, उसी क्षण आत्मज्ञान की अनुभूति होती है।

अतः परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाह्य रूप से कुछ करने की अपेक्षा न करने का अभ्यास करना आवश्यक है। हमारा मन निरंतर कुछ-न-कुछ करता रहता है; अभ्यास के द्वारा उसे निष्क्रियता की ओर ले जाना होता है। उसे स्थिर और शांत करना आवश्यक है, ताकि उसकी समस्त हलचल समाप्त हो जाए। आत्मज्ञान का यही एक मार्ग है।

यह शरीर एक ऐसे घर के समान है जिसके भीतर परमात्मा का निवास है और बाहर संसार स्थित है। मनुष्य का मन इस घर के द्वार पर खड़ा होकर संसार को देखता रहता है। यदि उसमें संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो उसे अपने ही भीतर परमात्मा की झांकी प्राप्त होती है और वह आत्मानंद का अनुभव करता है। यही योग है।

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