गुरुवार, 19 मार्च 2026

संवैधानिक मर्यादा का खुलेआम अतिक्रमण

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रशासन का अपने राज्य में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुआ व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य और डर पैदा करने वाला है। ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति भाजपा के एजेंडा में फंस गईं हैं। भाजपा उनसे अपना एजेंडा पूरा करवा रही है। ममता बनर्जी इसके राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग केंद्रीय एजेंसियां और यहां तक की कई बार न्यायपालिका को भी इसी भाषा में आरोपित कर चुकी हैं। अभी तक राष्ट्रपति का पद उनके अपमान और दुर्व्यवहार से बचा हुआ था। राष्ट्रपति को आरोपित करना वास्तव में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है। आखिर हमारी राजनीति कहां पहुंच गई है जहां नेता यह भी नहीं समझ रहे कि किसी प्रतिस्पर्धी पार्टी या चुनाव के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं इसका कितना भयानक असर हो सकता है। राष्ट्रपति के पद को स्तरहीन दलीय राजनीति से बाहर रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि आप 50 बार आयें तो सभी कार्यक्रमों में उपस्थित होना संभव नहीं होगा। भाजपा की चिंता सत्ता होती है और मेरी चिंता मेरे राज्य की जनता होती है। यानी वह कह रहीं हैं कि आप भाजपा का एजेंडा पूरा करने के लिए बार-बार पश्चिम बंगाल आतीं हैं और उम्मीद करती हैं कि मैं आपके स्वागत के लिए रहूं तो ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बंगाल यात्रा के दौरान ममता बनर्जी एसआईआर को लेकर धरने में शामिल थीं। क्या ममता बनर्जी की इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान की भावनाओं के अनुरूप भी माना जा सकता है?

राष्ट्रपति मुर्मू पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करने गईं थीं। 9वां अंतरराष्ट्रीय संथाल फिल्म महोत्सव व कॉन्फ्रेंस बागडोगरा हवाई अड्डा के पास सिलीगुड़ी महकमा परिषद के गोंसाईपुर में आयोजित किया गया। दरअसल, कार्यक्रम विधाननगर में आयोजित होना था लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था एवं अन्य कारणों का हवाला देते हुए इसे स्थानांतरित कर दिया। कार्यक्रम के लिए प्राप्त स्थान तक पहुंचना कठिन था और इतना छोटा था कि ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे। स्वाभाविक था कि राष्ट्रपति विधान नगर भी गईं, संथाल भाई-बहन वहां भी थे। वहां उन्हें अपना असंतोष प्रकट करने तथा सच्चाई अभिव्यक्त करने को बाध्य होना पड़ा। वस्तुत: बंगाल की धरती पर उतरने के समय से ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अवहेलना और अपमान की शुरुआत हो गई। हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल के अनुसार कोई उपस्थित नहीं था। सामान्य प्रोटोकॉल और परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए राज्यपाल रहते हैं , सामान्य तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री या अगर किसी कारणवश वह नहीं आ सकीं तो उनकी जगह कोई मंत्री रहते हैं। इसके साथ प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव भी उपस्थित रहते हैं। वहां कोई नहीं था । सिलीगुड़ी के मेयर ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय जनजाति मामलों के राज्यमंत्री दुर्गादास उइके इसलिए थे क्योंकि कार्यक्रम जनजाति समुदाय का था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसी पहली घटना है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई राज्य सरकार राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की अनुमति न दे , उनकी पूरी तरह अवहेलना करें और असंतोष व्यक्त करने पर प्रतिक्रिया ऐसी दे जैसे अपने किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी से टकरा रही है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शांत स्वभाव की मानी जाती है और कभी भी अशांत या गुस्सैल प्रतिक्रिया देते देखा नहीं गया। द्रौपदी मुर्मू ने यही कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई समस्या नहीं है कि कोई रिसीव करने आए या ना आए किंतु राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति देश के संवैधानिक अभिभावक होते हैं। सभी का उस पद की गरिमा और स्थापित परंपरा के अनुरूप सम्मान देना है। दूसरी और राष्ट्रपति का भी दायित्व है कि परंपरा गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आगाह करें।  उन्हें सार्वजनिक रूप से ऐसा बोलने को विवश होना पड़ा तो निश्चित रूप से स्थिति अस्वीकार्य थी। क्या राष्ट्रपति  मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करने की भूमिका निभातीं? आज एक राज्य में ऐसा हुआ कल दूसरे में होगा और जो एक राष्ट्रपति के साथ हो रहा है वह दूसरे के साथ भी हो सकता है। इसलिए राष्ट्रपति के नाते इस विषय को पूरी गंभीरता से सामने रखना उनका दायित्व है।

 अगर उन्हें इसकी जानकारी मिली कि यहां कार्यक्रम में  संथाल जनजाति के लोग इसलिए नहीं नहीं आ पाए क्योंकि कार्यक्रम पहले दूसरी जगह निर्धारित था तो प्रशासन के सहयोग की पूरी जानकारी मिलने के बाद उनके वहां जाना भी स्वाभाविक था।  क्या ममता मानती हैं कि उन्हें चुपचाप वापस आ जाना चाहिए था? उन्होंने यही कहा कि यह बड़ा मैदान था और मुझे जब मालूम हुआ कि आप लोग यहां हैं तो मैं सोची कि मुझे जाकर आपसे मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों किया गया क्योंकि यह मैदान दिया जाता तो सब लोग आ जाते।  राष्ट्रपति द्वारा इस तरह अपनी भावना व्यक्त करने को भी मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी को गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्हें शांत और संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपने पद की भी गरिमा प्रदर्शित करनी थी। इसकी जगह वह राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा कर रहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सम्मेलन के बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं थी, उसकी फंडिंग के बारे में , आयोजकों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। राष्ट्रपति के किसी प्रदेश में दौरा की सूचना राज्य सरकार के पास पहले जाती है।  उसमें उनके सारे कार्यक्रम वर्णित होते हैं। राष्ट्रपति भवन के अधिकारी प्रदेश सरकार के साथ संपर्क में रहते हैं और लगातार बातचीत होती रहती है। उसके अनुसार उनका प्रोटोकॉल , कार्यक्रम में सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं होती हैं?  क्या ममता बनर्जी के प्रशासन ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के बारे में उनको जानकारी ही नहीं दी? अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए । किंतु ममता बनर्जी के व्यवहार से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें कुछ पता नहीं था।‌ पश्चिम बंगाल की मीडिया ने राष्ट्रपति की यात्रा और कार्यक्रम के बारे में पूर्व समाचार दिया था। सब कुछ सामने होते हुए इस तरह का व्यवहार और वक्तव्य साबित करता है कि ममता बनर्जी की हनक के समक्ष भारत देश के शीर्ष पद का भी कोई सम्मान नहीं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे शर्मनाक और ममता सरकार द्वारा सारी हदें पार करने घटना बताना बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री या ऐसे शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी मर्यादाएं सामने रहती हैं अन्यथा इसकी निंदा और विरोध के लिए कोई भी शब्द छोटे हैं। जनजाति समाज का कार्यक्रम और राष्ट्रपति की उपस्थिति के साथ जब ऐसा दर्दनाक व्यवहार है तो फिर सामान्य संगठन और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के साथ प्रशासन का कैसा व्यवहार होता होगा इसकी कल्पना करिए। पश्चिम बंगाल में जनजाति समुदाय की बड़ी संख्या है और उनकी परंपराओं ने केवल राज्य नहीं , भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं राष्ट्रपति जनजाति समुदाय से आती हैं। ममता बनर्जी स्वयं को आदिवासी समाज के लिए संघर्ष करने वाली और उनका हितैषी घोषित करतीं हैं। इस घटना के बाद क्या यह बताने की आवश्यकता है कि जनजाति समुदाय के प्रति उनके अंदर वाकई संवेदनशीलता और सम्मान है? वास्तविकता का साक्षात प्रमाण सामने है। विडंबना देखिए, सभी‌ भाजपा विरोधी दल इस पर मौन हैं। इन दलों का व्यवहार हतप्रभ करने वाला है। राष्ट्रपति कह रही हैं कि ऐसी स्थिति पैदा की गई ताकि कार्यक्रम न हो और उन्हें वापस पड़े। देश के सभी विवेकशील लोगों को विचार करना पड़ेगा कि क्या सत्ता की राजनीति इस सीमा तक चली जाएगी जहां प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के कार्यक्रम की व्यवस्था करने की जगह उसे हर स्तर पर विफल कर देने का व्यवहार हो? अगर आपका उत्तर नहीं है तो यह विचार करिए ऐसे व्यवहार का प्रतिकार कैसे हो ताकि आगे कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। ऐसा नहीं हुआ तो देश इस तरह की भयानक अराजकता में फंसेगा जहां किसी पद या विधान की मर्यादा नहीं बचेगी। ममता बनर्जी के कार्यकाल में तृणमूल सरकार ने बंगाल को ऐसे राज्य में बदल दिया है जहां कानून, संविधान, चुनाव, संवैधानिक संस्थायें सब कुछ दांव पर लग चुका है।

 अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 ,मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 17 मार्च 2026

श्री संतोषी माता मंदिर, हरि नगर में 108वां नवरात्रि मेला 19 से 27 मार्च तक

संवाददाता

नई दिल्ली। धर्मनगरी हरि नगर, जेल रोड, नई दिल्ली-110058 स्थित सिद्धपीठ श्री संतोषी माता मंदिर में इस वर्ष भव्य 108वां नवरात्रि मेला श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह के साथ 19 मार्च 2026 से 27 मार्च 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। मंदिर परिसर इन पावन दिनों में भक्ति, साधना और सेवा का अद्‌भुत संगम बन जाता है। माँ संतोषी की असीम कृपा से आयोजित यह नवरात्रि महोत्सव वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर में विराजमान माँ संतोषी की दिव्य प्रतिमा, भव्य सजावट, फूलों और विद्युत रोशनी से जगमगाता मंदिर तथा भजन-कीर्तन की गूंज श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर देती है। नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन लगभग 15000 हजार श्र‌द्धालु माँ के दरबार में दर्शन करने पहुँचते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। नवरात्रि मेले के दौरान मंदिर परिसर में विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। तथा प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक संकीर्तन, तथा रात्रि में श्री दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता है। भक्तों की सेवा के लिए प्रतिदिन दोपहर 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक विशाल भंडारे की व्यवस्था भी है।

मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के सान्निध्य में आयोजित यह महोत्सव भक्तों को भक्ति, संतोष और शांति का संदेश देता है। उनके अनुसार माँ संतोषी कलियुग मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के अनुसार, माँ संतोषी कलियुग की तारिणी स्वरूपा हैं जो अपने भक्तों के समस्त कष्ट हर कर, उन्हें संतोष, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं। इस उथल-पुथल भरे युग में संतोष और शांति ही वे दिव्य सूत्र हैं, जो सम्पूर्ण मानवता को प्रेम और भाईचारे के बंधन में जोड़ते हैं। माँ श्री संतोषी जी की कृपा से माता जी की चौकी प्रति मंगलवार, शुक्रवार तथा रविवार को होती है। आयोजित माता चौकी के दिनों में भक्त माँ की चौकी में हाजरी देकर अपनी समस्त समस्याओं एवं व्यथाओं से छुटकारा प्राप्त करते है। चौकी के दौरान मातारानी स्वयं गुरु श्री अमित सक्सेना जी के स्वरुप में प्रकट होकर भक्तों को उनके संकटों एवं तकलीफों से छुटकारा पाने के उपाय बताती हैं जिससे भक्तगण लाभान्वित होते हैं व साक्षात् माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माँ संतोषी के दरबार में आने वाले भक्तों की झोली कभी खाली नहीं रहती है।

नवरात्रि मेले का मुख्य आकर्षण 26 मार्च 2026 को रात्रि 9 बजे से प्रातः 5 बजे तक होने वाला विशाल भगवती जागरण होगा, जिसमें प्रसिद्ध भजन गायक एवं कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से भक्तों को मंत्रमुग्ध करेंगे। इसके अगले दिन 27 मार्च की प्रातः कन्या पूजन और हवन के साथ नवरात्रि महोत्सव का समापन होगा।

मंदिर परिसर में श्र‌द्धालुओं की सुविधा के लिए भंडारा, चिकित्सा सहायता, व्यवस्था एवं सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं। सैकड़ों सेवादार निस्वार्थ भाव से सेवा में लगे रहते हैं, जो इस आयोजन को सामाजिक सेवा और आध्यात्मिक समर्पण का अ‌द्भुत उदाहरण बनाते हैं।

श्री संतोषी माता मंदिर परिवार की ओर से सभी श्रद्धालुओं को इस पावन नवरात्रि महोत्सव में सपरिवार पधारकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सादर आमंत्रित है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

टीबी मुक्त भारत' जागरूकता क्रिकेट मैच: दिल्ली पुलिस ने सांसद -11 को 12 रन से हराया

  • टीबी मुक्त भारत अभियान के समर्थन में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच मैत्री क्रिकेट मैच
  • कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया द्वारा 15 मार्च 2026 को मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में आयोजन
  • दिल्ली पुलिस-11 ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 225/8 का स्कोर बनाया
  • सांसद-11 की टीम 213 रन पर ऑलआउट, दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मैच जीता
  • जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और दिल्ली पुलिस की सहभागिता से जनस्वास्थ्य जागरूकता का संदेश
संवाददाता
नई दिल्ली। टीबी मुक्त भारत के राष्ट्रीय अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के तत्वावधान में 15 मार्च 2026 को नई दिल्ली के ऐतिहासिक मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच एक मैत्री क्रिकेट मैच का आयोजन किया गया। इस पहल का उद्देश्य खेल के माध्यम से जनस्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ावा देना और टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय संकल्प के प्रति समाज की सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना था।
मैच में पहले बल्लेबाजी करते हुए दिल्ली पुलिस 11 ने 20 ओवर में 8 विकेट पर 225 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया। सिकंदर सिंह ने 38 गेंदों में 77 रन की शानदार पारी खेली, जबकि राजीव अंबास्ता ने 13 गेंदों में नाबाद 45 रन बनाकर टीम को तेज़ फिनिश दिया। सतीश गोलचा (21) और वेद प्रकाश सूर्य (17) ने भी उपयोगी योगदान दिया। सांसद 11 की ओर से गेंदबाजी में मनोज तिवारी (3/23) और केसरिदेव सिंह झाला (3/40) ने प्रभावी प्रदर्शन किया, जबकि सौमित्र खान (1/25) और अनुराग ठाकुर (1/42) ने भी विकेट हासिल किए।
लक्ष्य का पीछा करते हुए सांसद 11 की टीम ने संघर्षपूर्ण प्रदर्शन किया, लेकिन 18.2 ओवर में 213 रन पर ऑलआउट हो गई और दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मुकाबला अपने नाम कर लिया। सांसद 11 की ओर से अनुराग ठाकुर (52), के. सुधाकर (46), गुरमीत सिंह हायर (41) और लघु कृष्णा (23) ने उल्लेखनीय पारियाँ खेली। दिल्ली पुलिस की ओर से रोहित सिंह ने 43 रन देकर 5 विकेट लेकर मैच का रुख पलट दिया। अनिल शुक्ला (2/19) और सिकंदर सिंह (2/47) ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि हरेश्वर स्वामी (1/26) ने एक अहम विकेट लिया।
इस अवसर पर उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने टीबी मुक्त भारत के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि खेल समाज को जोड़ने और जागरूकता फैलाने का सशक्त माध्यम है। सांसद राजीव शुक्ला ने कहा कि क्रिकेट लोगों को एक साथ लाने की अ‌द्भुत क्षमता रखता है और जब जनप्रतिनिधि तथा संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए एकजुट होती हैं तो उसका संदेश दूर-दूर तक पहुँचता है।
सारण सांसद राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि टीबी के खिलाफ लड़ाई में सामूहिक प्रयास अत्यंत आवश्यक है और इस प्रकार के आयोजन लोगों को जोड़कर राष्ट्रीय अभियान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सांसद अनुराग ठाकुर ने भी कहा कि खेल समाज को प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम है और यह आयोजन एक स्वस्थ भारत के निर्माण की दिशा में हमारी साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा ने कहा कि दिल्ली पुलिस उन पहलों का समर्थन करने में गर्व महसूस करती है जो सामुदायिक सहभागिता को राष्ट्रीय अभियानों से जोड़ती हैं। वहीं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि जब नेता और संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए मैदान में उतरते हैं तो यह समाज में एकता और जिम्मेदारी का सशक्त संदेश देता है।

नीतीश की विदाई के मायने

अवधेश कुमार

नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना ऐसी घटना है जिस पर लंबे समय तक चर्चा होगी। राजनीति के छात्र भविष्य में इस पर शोध भी करेंगे । भारतीय राजनीति में लंबे समय तक सत्ता शीर्ष पर बने रहने के बाद जब भी कोई स्वयं निवृत होने का फैसला करेगा या नहीं करेगा तब - तब इसे उदाहरण के रूप में पेश किया जाएगा। हमारी राजनीति, मीडिया और बौद्धिक जगत में संदेह का मनोविज्ञान इतना हावी है कि ऐसे किसी कदम को सहज स्वाभाविक स्वीकार नहीं किया जा सकता। विरोधी इसमें षड्यंत्र देख रहे हैं तो इसका उत्तर राजनीति और समाज के चरित्र में है। अपने व्यक्तित्व या अभी तक की घटनाओं के संदर्भ में देखते हैं तो यही निष्कर्ष आएगा। चूंकि भारतीय राजनीति में इस तरह के उदाहरण नहीं है, इसलिए यह असामान्य घटना लगती है। लगभग दो दशक प्रदेश का प्रत्यक्ष नेतृत्व करने के बाद इस निर्णय को सहज स्वीकार करना आसान नहीं होता। उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक वर्ग में भावनात्मक उबाल भी है। कुछ समय बाद धीरे-धीरे यह समाप्त हो जाएगा। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इतना पाखंड है कि कल तक जो लोग नीतीश कुमार को मानसिक रूप से असंतुलित होने की बात कर वीडियो वायरल करा रहे थे , बयान दे रहे थे वे भी इसमें भाजपा का षड्यंत्र देख रहे हैं। याद करिए जब एक मुस्लिम लड़की को नियुक्ति पत्र सौंपते समय उन्होंने अभिभावकीय भाव में हिजाब पड़कर यह कहते हुए कि क्या लगाई हो हटाओ खींचने की कोशिश की तो कितना बड़ा मुद्दा बनाया गया? वे भी नीतीश के नाम पर छाती पीट रहे। क्या हम राजनीति में ऐसी ही प्रवृत्ति चाहते हैं जहां कोई कभी अपने तरीके से सत्ता शीर्ष से निवृत होने का कदम उठाये ही नहीं? या उन्हें इसके लिए सम्मानपूर्वक तैयार करने की कोशिश नहीं हो? आप चाहते हैं कि ऐसा हो तो इसे सकारात्मक दृष्टि से देखिए।

ऐसी घटना के पीछे निश्चित रूप से कुछ कारण और बड़े प्रयास भी होंगे। अंततः परिणति ही मुख्य अर्थ रखती है। यह कहना कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनना चाहती थी इसलिए उन्हें हटा दिया गया नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को देखते हुए स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी टिप्पणी करने वाले नीतीश कुमार को दुर्बल या खोखला व्यक्तित्व साबित कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा हो सकती है किंतु इसके लिए नीतीश को जबरन हटाकर गठबंधन में विपरीत संकेत देंगे यह मानने का कोई कारण नहीं है। लोकसभा में भाजपा को बहुमत नहीं होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार जदयू और तेलुगू देशम की बदौलत चल रही है।भाजपा नेतृत्व क्या किसी नेता, उनके सहयोगियों या पार्टी से दुर्व्यवहार करने का जोखिम उठायेगी? आम दुष्प्रचार के विपरीत भाजपा अपने गठबंधन के साथियों को सम्मान देती है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना उद्धव ठाकरे को नहीं छोड़ा बल्कि उन्होंने भाजपा को छोड़ा। नीतीश कुमार को कभी भाजपा ने नहीं छोड़ा उन्होंने ही पाला बदल किया लेकिन जब वापस आए तो सरकार चलाने एवं निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता रही। 2020 में भाजपा को जद यू से ज्यादा सीटें थीं फिर भी मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया। नीतीश पर दबाव डालकर ऐसा कराया जा सकता है यह उनके चरित्र के साथ मेल नहीं खाता। नीतीश कुमार ने जब चाहा भाजपा को छोड़ा और फिर अपनी इच्छा से राजद छोड़ भाजपा के साथ आये। तो फिर?

उन्होंने एक्स पर लिखा है कि संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूँ। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूँ। कहां जा रहा है कि कारण कुछ और है, यह स्क्रिप्ट औरों ने लिखकर उनकी विदाई का झूठा आधार प्रस्तुत किया है। ऐसा क्या कारण हो सकता है जिसके लिए नीतीश को झूठ बोलना पड़े? प्रत्यक्ष कोई कारण नजर नहीं आता। क्या यह संभव है कि भाजपा नीतीश को दबाव में लाकर मुख्यमंत्री पद से हटने के लिए मजबूर करे और वे इसे सहन कर जाएं? किसी को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की इच्छा हो और उसे जबरन हटाने की कोशिश होगी तो वह सरकार गिरा देगा। जिस सरकार का मुखिया नहीं हो उसे बनाए रखने में क्या रुचि हो सकती है। तो यह तर्क गले नहीं उतरता। मान लीजिए उन्होंने राज्यसभा को विदाई का बहाना बनाया तो इससे साबित नहीं होता कि किसी दबाव में थे। पिछली बार जब वह राजद के साथ गए थे तो तेजस्वी यादव के सामने घोषणा किया था कि अब अब हम आगे बहुत दिन नहीं रहेंगे और यही लोग आगे बढ़ाएंगे। अपने साथियों से बोलते थे कि अब हम मुख्यमंत्री पद से अलग होना चाहते हैं।

यह बात सही है कि पिछले कुछ समय से नीतीश कुमार के व्यवहार, वचन और भाव में अस्वाभाविकता, असहजता और असंतुलन प्रदर्शित होता था। इन कारणों सेसमस्याएं आतीं थीं और दोनों पार्टी के नेताओं को हैंडल करना पड़ता था। इसलिए संभव है उन्हें मानसिक रूप से तैयार करने की कोशिश हुई होगी। मुख्य बात निर्णय और उसके समय का है

सही समय पर लिए गए या कराए गए निर्णय का भी महत्व होता है और यह कई बार इतिहास के लिए उदाहरण भी बन जाता है। नीतीश कुमार के लिए इससे उपयुक्त अवसर सत्ता शीर्ष से अलग होकर तत्काल सक्रिय रहने का क्या हो सकता है? उनके नेतृत्व में गठबंधन भारी बहुमत के साथ सत्ता मे है, राजनीतिक स्थिरता है, उनके विरुद्ध असंतोष का भाव नहीं है, विकास की गाड़ी पटरी पर है और‌सक्रिय रहने के लिए राज्यसभाकी सदस्यता है। शायद वे सीधे निवृत्ति की घोषणा करते तो विरोध ज्यादा उग्र और हिंसक हो सकता था। तो समर्थकों को समझाने के लिए उनके पास राज्यसभा में जाने की इच्छा का एक आधार है।

सच कह तो यह अवसर नीतीश कुमार के संपूर्ण राजनीतिक जीवन,  उनके योगदान आदि का निष्पक्ष मूल्यांकन का है। बिहार का नेतृत्व भाजपा के समर्थन से उन्होंने तब संभाल जब प्रदेश गहरे निराशा, हताशा और अवसाद से ग्रस्त था। बिहार में कुछ हो सकता है इसकी कल्पना ही नहीं थी। भारत और उसके बाहर बिहार कुशासन, अविकास, सामाजिक जातीय तनाव, नेताओं के भ्रष्टाचार का शर्मनाक उदाहरण बन गया था। बिहार शब्द गाली हो गई थी और स्वयं को बिहारी कहने में लोग शर्म महसूस करते थे। नीतीश के नेतृत्व में जनता दल यू और भाजपा ने बिहार में न केवल आशा,  उम्मीद और उत्साह पैदा किया बल्कि कानून और व्यवस्था पुनर्स्थापित कर प्रदेश को विकास के रास्ते सरपट दौड़ा दिया। पिछले लंबे समय से इसका विकास दर शीर्ष राज्यों के समान या कई बार आगे रहा है। लेकिन ध्वस्त हो चुके प्रदेश को वहां तक ले जाना आसान नहीं है। हालांकि उन्होंने लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय विभाजन और टकराव बनाए रखना एवं सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम परस्त नीति की काट के लिए पिछड़ों में अति पिछड़े, दलित में महा दलित , मुसलमान में पसमांदा आदि समूह खड़े किए और इससे जातिवाद दूसरे रूप में मजबूत हुआ। 

किंतु उनके कल में किसी तरह का जाति संघर्ष नहीं होना भी सच्चाई है। दूसरे, लड़कियों और महिलाओं को मुख्य धारा में लाने के कदम उनके दूरदर्शी विजन और लैंगिक समानता के प्रति सच्ची प्रप्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। जहां लड़कियां डर से स्कूल कॉलेज जाने से बचती थी वहां सीमित संसाधनों में उनके लिए साइकिल, वस्त्र, पुस्तकों और प्रोत्साहित करने के लिए वजीफे आदि की व्यवस्था ने चमत्कार कर दिया। हालांकि इन सबके पीछे भाजपा की भी भूमिका थी किंतु आज जब हम उनका मूल्यांकन करते हैं तो ये सब उनके योगदान में जुड़ेंगे। महिलाओं को स्थानीय निकाय में 33% आरक्षण की सामाजिक वर्णक्रम बदलने में ऐतिहासिक भूमिका थी। अगर कुछ निहित स्वार्थी बुद्धिजीवियोंऔर समर्थकों के प्रभाव में आकर सेकुलरिज्म के नाम पर उन्होंने 2013 में तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्धअतिवादी रवैया अपनाते हुए गठबंधन नहीं तोड़ा होता, राजद के साथ नहीं गए होते तो उनके ऐतिहासिक योगदान निर्दोष होते। 2010 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव का संपूर्ण परिवार पराजित हो गया था, पार्टी न्यूनतम वोट और सीटों पर आ गई थी। इसके अंत के साथ बिहार में विपक्ष की नई राजनीति के उभरने की संभावना थी। उन्होंने 2015 में साथ चुनाव लड़कर राजद को जीवन दान दिया। इस भूल के लिए उन्हें पश्चाताप होगा।‌ पर उन पर किसी तरह के वित्तीय भ्रष्टाचार, परिवारवाद आदि का आरोप नहीं लगा और यही सच्चाई है। उनके पुत्र इतने समय बाद राजनीति में आ रहे हैं तो इसे परिवारवाद को बढ़ावा देना नहीं कह सकते। सत्ता शीर्ष से स्वयं को अलग करने के कदम पर ऐसे व्यक्ति का अभिनंदन होना चाहिए , इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भाजपा नेतृत्व एवं जदयू के वरिष्ठ नेताओं की भी सराहना होनी चाहिए कि उन्हें इसके लिए उचित व सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराया। इसे राजनीति मेंश्रएक प्रवृत्ति स्थापना मान लें तो लोकतंत्र की दृष्टि से इसका संदेश मंगलकारी होगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली - 110092,  मोबाइल- 98110 27208

गुरुवार, 12 मार्च 2026

खाड़ी युद्ध में के कारण देश में गैस की किल्लत आखिर क्यों?

बसंत कुमार

खाड़ी में ईरान व इजरायल के बीच चल रही युद्ध से देश में एलपीजी किल्लत से आमलोगों की मुश्किलें बढ़ गई है कई जगह गैस सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित होने के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई कम होने से होटल और रेस्टोरेंट के बंद होने का खतरा बढ़ गया है रसोई का बजट भी बिगड़ रहा है और उपभोक्ताओं में नाराजगी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यद्यपि भारत सरकार के पेट्रोलियम मिनिस्टर हरदीप पुरी ने यह दावा किया है कि युद्ध की स्थिति के बावजूद घरेलू इस्तेमाल के लिए सीएनजी और पीएनजी की शत प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं पर वास्तविकता यह है कि गैस किल्लत के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है एक तरफ ररेस्तरां के मालिक यह कह रहे हैं कि अगर जल्द ही स्थिति नहीं संभली तो कामकाज बंद हो जाएंगे और वे लोग जिनके घरों में शादियां हैं वह गैस सिलेंडर की कमी के कारण चिंता में बैठे हुए हैं। ऐसा क्या है कि हमने अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह बना दिया की खादी के युद्ध के कारण हमारी अपनी दिनचर्या नष्ट होती जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघ संचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने बहुत पहले ही स्वावलंबन आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर करना चाहिए यानी अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें निर्यात से कमाई हुई विदेशी मुद्रा से उसे आयात करें। इसका तात्पर्य है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। आत्म पूर्ति की अवस्था में अपने देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन में किसी प्रकार की कमी ना हो। आज हम पाते हैं कि खाद्य उत्पादन में भारत आत्मनिर्भरता से हटकर फिर से आयात पर निर्भर हो गया है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से कम उत्पादक एवं बंजर हो गई है। गुरु जी ने उसमें चेतावनी दी थी कि हम अपनी आर्थिक नीति को खाद्य पदार्थों के उत्पादन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए व आत्मनिर्भरता क्यों बढ़ाने के लिए जैविक खेती वन ऊर्जा और सरकार प्रयास के रूप में पर्यावरण के उनको माध्यम से करनी चाहिए। पर आज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी की सरकार है पर हम खाड़ी के युद्ध के कारण बेबस लग रहे हैं आखिर इसके क्या कारण है।

आर्थिक सुधार युग के दौर से पूर्व तक तक हम लोग शादी विवाह या रेस्टोरेंट के संचालन में प्राकृतिक संसाधनोंवीजैसे लकड़ी कोयलेऔर गाय के गोबर से बने उपलेका प्रयोग करते थे, घर में जब भी शादी होती थी तो अपने उत्पादित पेड़ों से कटाई करके लकड़ी से काम कर लिया जाता था इस तरह से रेस्टोरेंट में कोयल के उपयोग से सारे पकवान बनाए जाते थे परंतु आर्थिक सुधार के प्रारंभ होने के बाद हमने इन प्राकृतिक संसाधनों को बंद करके बाहर से आयात गैस के ऊपर पूर्णतया निर्भर करना शुरू कर दिया है यहां तक की खाने का सामान गाड़ियां आज सभी आयातित गैस की पर ही चल रही है और जब खाड़ी में युद्ध हुआ तो हमारी दिनचर्या ही पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गई है लोगों को चिंता सताए जा रही है कि अगर यह युद्ध ज्यादा चला तो हमारे शादी विवाह जैसे आयोजन कैसे होंगे या खाना कैसे बनेगा।

अपने जीवन में खेती बाड़ी से लेकर जीवन की दिनचर्या में अत्यधिक निर्भरता की खतरे को हमारे विचारों ने पहले ही जान लिया था और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राष्ट्र वादी विचारक डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व व राष्ट्रीय पुनरुत्थान में लिखते हैं" आर्थिक सुधार युग के पूर्व तक लोग गाय और बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधिया चला रहे थे क्योंकि आधुनिकता की मजबूरियों के बावजूद ट्रैक्टर हमारे छोटे जोते के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध भूमि 24 एकड़ के आसपास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है। ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ साथ प्रदूषण बढ़ाता है। इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टाइन ने सर सी वी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा"भारत के लोगो को बताये कि अगर वे जीवित रहना चाहते हैं और दुनियां को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो ट्रैक्टर को भूल जाए तथा अपनी प्राचीन परंपरा को अपनाए एवं जुताई बैलों से करे "। परंतु अल्बर्ट आइंस्टीन है इस चेतावनी के बावजूद भी भारतअपनी पारंपरिक जीवन शैली को छोड़कर पश्चिम से आयातित जीवनशैली को अपना रहा है और अपने जीवन की गतिविधियों को 90% खाड़ी देशों से आयातित तेल के लिए के ऊपर निर्भर कर दिया है यहां तक की अब हम 500 मी. की दूरी तय करने के लिए पैदल चलने के बजाय मोटरसाइकिल या कार का इस्तेमाल करते हैं जो डीजल या पेट्रोल से चलती है, ऐसे में खाड़ी युद्ध के कारण ईरान के रास्ते भारत में तेल न पहुंचना भारत के आर्थिक गतिविधियों को ठप कर सकता है।

देश में करीब 19.01 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस की प्रतिदिन खपत है और इसका 50% आयातित होता है और गुंजा का की खाड़ी से जहाज का आवागमन लगभग बंद हो जाने के कारण खाड़ी देशों से करीब 6 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस सप्लाई बाधित हुई है और इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार को विशेष मीटिंग बुलानी पड़ी और प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों को निपटने के लिए अलर्ट रहने के लिए कहा। देश के कई हिस्सों मेंकमर्शियल और घरेलू सामान के लिए एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई में हो रही दिक्कत की शिकायत के बीच सरकार ने तय किया है कि नेचुरल गैस के उपयोग केलिए म एलजी उत्पादन सीएनजी और पीएनजी को सभी अन्य सेक्टरों पर तरह ही दी जाएगी इन क्षेत्रों की 100% डिमांड पूरी करने का प्रयास किया जाएगा तथा सरकार ने गैजेट नोटिफिकेशन के माध्यम से नेचुरल गैस के इस्तेमाल के लिए प्राथमिकता वाले चार क्षेत्र तय किए है -पहली प्राथमिकता के क्षेत्र में घरेलू पीएनजी सप्लाई, ट्रांसपोर्ट के लिए सीएनजी एलजी उत्पादन की और पाइपलाइन कंप्रेस्ड फ्यूल और अन्य जरूरी पाइपलाइन को रखा गया है

इसके बावजूद भी देश के अंदर उपभोक्ताओं में गहरी चिंता व्याप्त है और सभी डरे हुए है कि यदि खाड़ी युद्ध लंबा चला तो हमारे उद्योग धंधे दैनिक जीवन चर्या बुरी तरह से प्रभावित हो जाएगी इसलिए सरकार को आयातित तेल पर अत्यधिक निर्भरता को दूर करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों से निपटा जा सके।

पश्चिम एशिया जंग और इससे तेल की कीमत में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत में 10 % की उछाल से भारत की जीडीपी ग्रोथ में 20 से 25 बीसी एस की गिरावट आ सकती है। भारत अपनी जरूर का 89% कच्चा तेल आयात करता है और हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी है जो विगत 4 साल के उच्चतम स्तर पर है। हॉर्मुज की

खाड़ी से जहाज की आवा जाही बंद होने के कारण ग्लोबल सप्लाई में 20 से 25 बी पी एस की गिरावट आई है। ईरान और अमेरिका की लंबी लड़ाई से भारत की मुश्किलें और बढ़ सकती है क्योंकि भारत में आयात होने वाला कच्चा तेल हॉर्मुज की खाड़ी से आता है, और कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से देसी महंगाई और भी बढ़ सकता है यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 90 डॉलर के आसपास भी रहता है तो महंगाई पांच तक बढ़ सकती है लेकिन वर्तमान स्थिति में तो कच्चा तेल 120 प्रति बैरल के हिसाब से चल रहा है जो चिंता का विषय है और ऐसी स्थिति में भारत का चालू खाते का घाटा और भी बढ़ सकता है जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

विगत कुछ वर्षों से खाड़ी देशों ईरान इराक और अमेरिका इजरायल के संबंधों में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है और जिसका असर तेल की कीमतों में पड़ता है जो हमारी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करता है इस कारण हमें अपने पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों के विकास पर भी जोर देना चाहिए जिससे अधिक तेल पर हमारी निर्भरता और न बढ़े।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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