मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

राजवंशी देवी : भारत के प्रथम राष्ट्रपति की शक्ति और सादगी

विवेक शुक्ला

डॉ राजेंद्र प्रसाद 1946-50 तक संविधान सभा के अध्यक्ष और फिर 1950 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, तब भी उनकी पत्नी राजवंशी देवी ने कभी राष्ट्रपति भवन की चकाचौंध में रुचि नहीं दिखाई। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में कई परंपराओं को शुरू किया जिन पर अब भी अमल हो रहा है। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में महत्वपूर्ण त्योहारों को मनाने की परंपरा शुरू की। इनमें राष्ट्रपति भवन में रहने वाले स्टाफ की भी भागेदारी रहती। राजवंशी देवी दिवाली, होली, रक्षाबंधन और ईद पर आगंतुकों और स्टाफ के साथ वक्त बिताती। उनके साथ भोजन करतीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद तो कुछ देर के बाद वहां से निकल जाया करते थे, पर राजवंशी देवी वहीं रहती। राष्ट्रपति भवन में सभी उन्हें 'मां जी' कहते थे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद को देश के राष्ट्रपति के कार्यकाल (1950-1962) के दौरान रक्षाबंधन राष्ट्रपति भवन के मुलाजिमों की बेटियां राखी बांधती। बदले में, राजवंशी देवी सबको उपहार देती। राजवंशी देवी बेटियों और उनके अभिभावकों के साथ काफी देर तक बातचीत करती। उनका मार्गदर्शन करतीं। दरअसल डॉ राजेंद्र प्रसाद के दौर में रक्षाबंधन राष्ट्रपति भवन में एक सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन के रूप में स्थापित किया गया। राखी का आयोजन सादगीपूर्ण होता था, जिसमें गोल मार्केट  या बंगाली मार्केट की पारंपरिक मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था। राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन का आयोजन अब एक स्थायी उत्सव बन चुका है। इसका यहा पर रहने वाली बेटियों को इंतजार रहता है।

राजधानी दिल्ली में आयोजित छठ महापर्व के पहले आयोजन को राजवंशी देवी का आशीर्वाद मिला। पहला छठ का आयोजन 1956 केन्द्र सरकार के कर्मियों की कॉलोनी सरोजनी नगर के निवासी श्रीकांत दुबे की पहल पर आयोजित हो रहा था। वे तब राजधानी के कुछ भोजपुरी समाज के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति भवन में साइकिल पर सवार होकर पहुंचे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को छठ उत्सव में शामिल होने का निमंत्रण दिया। उस जमाने में आज की तरह की सुरक्षा व्यवस्था कहीं भी नहीं होती थी। हालांकि, विभिन्न कारणों से वे शामिल नहीं हो सके, लेकिन उनकी पत्नी राजवंशी देवी ने सरोजिनी नगर में आयोजित छठ महापर्व में शिरकत की। अगले कुछ वर्षों तक वे इस आयोजन में शामिल होती रहीं और सभी के साथ आत्मीयता से मिलती-जुलती। राजवंशी देवी  कुछ समय अपने सरोजिनी नगर में रहने वाले रिश्तेदार विश्वेश्वर नारायण के फ्लैट पर भी आया करती थीं।  राजवंशी देवी सरलता और सादगी की मिसाल थीं।

राजवंशी देवी राष्ट्रपति भवन के अंदर चलने वाले स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों में भाग लेते हुए मेधावी बच्चों को पुरस्कृत भी करती थीं। अब इसका स्कूल का नाम राजेन्द्र प्रासद केन्द्रीय विद्लाय है। हर वर्ष 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है। राजवंशी देवी इस दिन पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राष्ट्पति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के साथ रहा करती थीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद 1 फरवरी, 1950 को राष्ट्रपति भवन में सपरिवार रहना शुरू कर दिया था। 26 जनवरी, 1950 से इसे राष्ट्रपति भवन कहा ही जाने लगा। इसी उपलक्ष्य में यहां हर वर्ष 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम और राष्ट्पति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के बीच खेल कूद प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। इनके विजेताओं को राष्ट्रपति पुरस्कृत करते हैं।राजवंशी देवी ने कभी राष्ट्रपति भवन के स्टाफ को यह महसूस नहीं होने दिया था कि वे देश के राष्ट्रपति की पत्नी हैं।

राष्ट्रपति भवन में भारत के पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटब़ॉल खिलाड़ी अनादि बरूआ का परिवार करीब चालीस साल रहा। उनके पिता राष्ट्रपति भवन में काम करते थे। वे बताते हैं कि राजवंशी देवी कभी-कभी खुद अपनी पौत्रियों को राजा बाजार (कनॉट प्लेस) के ऱघुमल कन्या विद्लाय में सुबह छोड़ने जाती थीं। ईद पर राष्ट्रपति भवन मस्जिद में उत्सव का माहौल होता है। राष्ट्रपति की ओर से सभी कर्मचारियों को मिठाई बांटी जाती है। राष्ट्रपति भवन मस्जिद के इमाम के लिए अपने परिवार के साथ यहाँ रहने का भी प्रावधान है। हालाँकि, सुरक्षा कारणों से उनके विवाहित बच्चों को यहाँ रहने की अनुमति नहीं है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पहल पर ही राष्ट्रपति भवन परिसर के भीतर एक मंदिर और एक मस्जिद दोनों का निर्माण किया गया था। कुछ जानकार कहते हैं कि उन्होंने  अपनी पत्नी राजवंशी देवी की सलाह पर इस तरह का कदम उठाया था। चूंकि राष्ट्रपति भवन के ठीक बाहर चर्च और गुरुद्वारा पहले से ही मौजूद हैं, इसलिए शायद उन्हें बनाने की कोई आवश्यकता नहीं महसूस की गई हो।  सहज, सरल, धैर्यवान और अत्यंत त्यागमयी – यही राजवंशी देवी का व्यक्तित्व था।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा आत्मकथा (प्रथम प्रकाशन 1946, बाद में राजपाल एंड सन्ज़ से पूर्ण संस्करण 2013-14 में) में अपनी पत्नी श्रीमती राजवंशी देवी के बारे में  अत्यंत भावपूर्ण और सम्मानपूर्ण ढंग से उल्लेख किया है। उनकी आत्मकथा में निजी जीवन का वर्णन बहुत कम है, क्योंकि उन्होंने इसे जानबूझकर सार्वजनिक जीवन और स्वाधीनता संग्राम पर केंद्रित रखा था। फिर भी जो थोड़ा-बहुत लिखा है, वह उनकी पत्नी के प्रति गहन कृतज्ञता और आदर को दर्शाता है।

डॉ. राजेन्द्रप्रसाद लिखते हैं कि उनका विवाह बहुत कम उम्र में (लगभग 13 वर्ष की आयु में, सन् 1897 में) हो गया था।मेरा विवाह बहुत छोटी अवस्था में हो गया था। मेरी पत्नी का नाम राजवंशी देवी था। वे मेरी माँ के समान थीं।

स्वाधीनता आंदोलन में जेल जाने पर उन्होंने अपनी पत्नी के धैर्य और त्याग की प्रशंसा की है।जब मैं जेल जाता था, घर की सारी जिम्मेदारी मेरी पत्नी पर होती थी। वे कभी शिकायत नहीं करती थीं। बच्चों को पढ़ाना-लिखाना, घर चलाना, गाँव की देखभाल – सब कुछ वे अकेले संभालती थीं। मैं जब बाहर निकलता तो देखता कि सब कुछ व्यवस्थित है। उनके त्याग और सहनशीलता का मैं सदैव ऋणी रहूँगा।

राजवंशी देवी का देहांत 9 सितंबर 1962 को हुआ।  डॉ.  राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा:मेरी जीवन-संगिनी मेरे से पहले चली गई। सारा जीवन उन्होंने मेरे लिए समर्पित कर दिया। मैं अकेला रह गया।

राजवंशी देवी की मृत्यु के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद पूरी तरह टूट गए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन छोड़कर पटना में सादा जीवन बिताया और 28 फरवरी 1963 को उनका भी देहांत हो गया। दोनों का अंतिम संस्कार पटना के गांधी घाट पर हुआ।

राजवंशी देवी उस दौर की उन अनगिनत भारतीय महिलाओं की प्रतीक हैं जिन्होंने बिना कोई नाम या पुरस्कार लिए अपने पति के बड़े सपनों को साकार करने में अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। वे कभी अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बनीं, न कोई भाषण दिया, पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान व्यक्ति के पीछे उनकी त्यागमयी छवि ही भारत के प्रथम राष्ट्रपति-दंपति की गरिमा को और ऊँचा करती है। आज जब हम भारत के प्रथम राष्ट्रपति को याद करते हैं, तो उनके साथ राजवंशी देवी का मौन लेकिन अटूट सहयोग भी स्वतः ही याद आता है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

सिमटते गांव चिंता का विषय

बसंत कुमार

पहले यह कहा जाता था कि भारत देश गांवों में बसता है और यदि हम भारत देश की संस्कृति और परम्परा को जानना चहते हैं तो गांवों में जाकर देखें पर आर्थिक सुधार युग के आगमन के साथ ही लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और गांव सिकुड़ते जा रहे हैं। आज के चार दशक पहले तक गांवों में गन्ना की बुवाई से लेकर छप्पर उठाने तक के कार्य बिना मजदूरी दिए सहकारिता के आधार पर हो जाते थे पर जब से लोगों का शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है तब से गांव में आदमी न मिलने के कारण गन्ना बोना और छप्पर बनाना ही छोड़ दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि 81% आबादी अब शहरों में रहने लगी है और केवल 19% आबादी विशुद्ध रूप से गांवों में बची है।

यह आंकड़ा इस कारण भी चौंकाने वाला इसलिए है कि वर्ष 2018 यानि सात वर्ष पूर्व यह आंकड़ा मात्र 55% था, यूएस की वर्ल्ड आर्गोनाइजेशन प्रॉस्पेक्टस रिपोर्ट 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल शहरी आबादी में से 45% लोग बड़े शहरों में रहते हैं और 36% आबादी कस्बों में रहती है। इस पलायन और विकास के कारण गांवों में मात्र 19% लोग रह गए हैं। अनुमान है कि 2050 तक 83% लोग शहरों में पहुंच जाएंगे। शहरीकरण की यह रफ्तार दर्शाती है कि लोग गांवों की मेहनतकश जिन्दगी को छोड़कर शहरों की आरामतलब जिंदगी जीना चाहते हैं जहां शारीरिक श्रम कम से कम हो और बहुराष्ट्रीय कंपनियां की वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने इस बीमारी को और बढ़ा दिया है। जहां युवा प्रातः उठकर तैयार होकर 5-10 किलोमीटर की दूरी तय करके अपने कार्य स्थल पर जाते थे पर अब तो वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने सुबह उठना तैयार होना सब कुछ बंद कर दिया है। युवाओं की सारी दिनचर्या एक कमरे में कम्प्यूटर के सामने कैद होकर बन्द हो गई है। आर्थिक सुधार युग के पहले यानि 1970 और 1980 के दशक की गांवों की जिंदगी पर निगाह डाले तो पता लगता है कि इस शहरीकरण से जहां हमने सुख-सुविधा के नाम पर बहुत कुछ पाया है वहीं स्वास्थ पर्यावरण और सामाजिकता के मामले में हमने खोया बहुत है, जहां गाय-बैल और अन्य पालतू जानवर हमारे लिए पूंजी होते थे आज मशीन पर आधारित खेती शुरू हो जाने के कारण ये हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए हैं। इनके खुला लावारिश घूमने के कारण अब किसान खरीफ और जायद कि फसलें बोना छोड़ चुके हैं और खेती के नाम पर गेहूं और धान की फसल बो रहे हैं और राज्य सरकारों को गौशाला के रखरखाव पर बहुत मोटा फंड देना पड़ रहा है। जो पैसा देश के विकास के लिए लगना चाहिए़ था वो इन चीजों पर लग रहा है।

यदि हम आज के चालीस पचास के गांवों की जिन्दगी देखें तो वहां कृषि स्वाबलंबन पर होती थी। कृषि का मुख्य आधार पशु और श्रम होते थे यदि घर में कोई चीज घट जाए तो बाज़ार भागने के बजाय पड़ोस से मांगकर काम चला लिए जाता था। यद्यपि उस समय माचिस प्रयोग में आ गई थी उसका प्रयोग मन्दिर में दिया जलाने में होने लगा था पर घर का चूल्हे जलाने के लिए बोरसी में 24 घंटे सुलगती आग को ही शुभ माना जाता था और शाम के समय महिलाओं का पड़ोस के घर आग मांगने जाना आम दिन का कार्य होता था। उस बहाने वे 10-15 मिनट बैठकर सारा हाल चाल जान लेती थी और पड़ोस में क्या हो रहा है यह सब पता कर लेती थी। शाम को सारे बड़े लोग एक घर पर अलाव के पास बैठकर रामायण महाभारत के कथानकों के संबंधित कहानियां सुनाया करते और बच्चों का काम बुजुर्गों के लिए तम्बाकू की चिलम भरना होता था उसके बदले में उन्हें किस्से और कहानियां सुनने को मिल जाती थी। आज की तरह मैरिज ब्यूरो नहीं होते थे। लोगों को लड़की-लड़कों की शादी के लिए खोज उनके अलावा या गांव की चौपाल पर पूरी हो जाती थी। अगर गांव में किसी की लड़की की शादी होती थी तो बर्तन और चरपाई के लिए टेंट हाउस के चक्कर लगाने के बजाय गांव में ही आपसी सहयोग से हो जाता था। बारात की स्वागत से लेकर बिदाई तक गांव के युवा एक पैर पर खड़े रहते थे पर आज ये चीजें नदारत हो गई है। आज गांव में भी शहरों की ओर भागने की लालसा ने ये सब छीन लिया है, सामाजिकता का स्थान घर-घर फैले मोबाइल ने छीन लिया है। आज सभी युवा और बड़े शाम होते ही या तो शराब के ठेकों पर मिलते हैं या फिर घरों में कैद होकर मोबाइल पर आंखे गड़ाए रहते हैं। आस-पड़ोस में क्या हो रहा है इससे उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है।

जब बोर्ड के दसवीं कक्षा के परिणाम आते थे तो गांवों में एक उत्सव का माहौल होता था जब रिजल्ट अखबार में आ जाता था तो कस्बे में रहने वाले अखबार वाले के पास रिजल्ट देखने की लाइन लगाती थी और जो पास हुए वे अड़ोस पड़ोस में लड्डू या बताशे जरूर बांटता था। गांव की अशिक्षित महिलाओं को भी पता लग जाते था कि फलां का बेटा 10वीं पास हो गया है पर आज-कल की चकाचौंध की दुनिया में लोग अपने घर के बच्चों के बारे में भूल जाते हैं कि किस कक्षा में है। बस बच्चों को जुगाड़ लगाकर अच्छे स्कूल में पढ़ा दिया और ट्यूशन लगा दिया जिम्मेदारी खत्म। गांव में किसी के यहां कोई मेहमान आ जाता था तो अड़ोस-पड़ोस इस बात का ध्यान रखते थे कि मेहमान अकेले ही बैठा है पर आज कल यह सामाजिकता गायब है।

आखिर क्या कारण है कि लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं इसका आत्मावलोकन आवश्यक है। आर्थिक सुधार युग और मशीनीकरण के कारण गांवों में परम्परागत रोजगार समाप्त हो गए हैं। आधुनिक मशीनों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले दोना पत्तल, मिट्टी के बर्तन, कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाले हल, फावड़ा, कुदाल सभी का उपयोग समाप्त हो गया है। इसके कारण गांव में बसने वाले लोहार, कोहार, बढ़ई, सुनार, मुसहर, डोम धीमर सभी बेरोजगार हो गए तो उनके लिए शहरों में भागकर लेबर के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्पों नहीं बचा था। यद्यपि महानगरों में उनकी जिंदगी नर्क से बेहतर नहीं है। एक-एक कमरे में 10-10 लोगों का रहना। पानी के लिए और नित्य कर्म के लिए घंटों लाइन में खड़े रहना और 10-12 घंटे की ड्यूटी करना पड़ता है फिर भी वे अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते। इसके अतिरिक्त गांवों में व्याप्त जाति वादी मानसिकता और ऊंच-नीच का भाव भी गांवों से पलायन का कारण है। दलित व उपेक्षित समाज के पढ़े-लिखे युवा गांव की सड़ी गली जाति वादी मानसिकता से पीछा छुड़ाने के लिए शहरों में जाकर अपनी जाति छुपाकर काम करते हैं और इज्जत के साथ गुजर-बसर करते हैं। महानगरों में उनका दलित या पिछड़ा होना उन्हें तंग नहीं करता पर ज्यों वे साल दो साल बाद गांव जाते हैं तो स्टेशन से उतरते ही उनकी जाति उनके पीछे चिपक जाती है और वे गांव वापस जाने के बजाय शहर की नरकीय जिंदगी में वापस चले जाते हैं। यह ऐसी समस्या है जिसके विषय में सरकार और समाज को सोचना होगा।

यदि सरकार शहरों में इस तरह की बढ़ती हुई भीड़ को रोकने का प्रयास नहीं करेगी तो निकट भविष्य में महानगरों सहित अन्य शहर रहने लायक नहीं रह पाएंगे और ये गैस चैंबर के रूप में बदल जाएंगे। इसलिए आवश्यक है कि गावों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार जैसी चीजें उपलब्ध कराई जाएं। गांवों में महिलाओं की स्वास्थ्य-चिकित्सा एक बड़ी समस्या है, इसके अलावा गांवों में रोजगार की समस्या भी है, सरकार ने गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया पर उसमें भी अभी वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है क्योंकि एक ओर जहां पूरा विश्व वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहा है पर भारत में मंडल और कमंडल की राजनीति के चक्कर में युवाओं के रोजगार का मामला गौड़ हो गया है और हर राजनीतिक दल को पार्टी लाइन से हटकर इस समस्या के विषय में सोचना चाहिए।

यदि इस प्रकार से शहरों की ओर पलायन को नहीं रोका गया तो स्थिति और भयावह हो जाएगी। दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। वहां वायु गुणवत्ता (AQI) 300 से 450 तक पहुंच गया है, जहां लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष करते हैं वहीं प्रशासन को एक्यूआई स्तर को नीचे लाने के लिए सुबह शाम गाड़ियों से पानी का छिड़काव करना पड़ रहा है और लोग सांस संबंधित बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। अब सरकार और सामाजिक संस्थाओं को प्रयास करना होगा कि लोग गांवों की ओर वापस जाएं विशेषकर काम धंधे से रिटायर होने के बाद शहरों में बोझ बनकर जीने के बजाय अपनी मांटी में वापस जाएं और सम्मानपूर्वक अपना बचा खुचा जीवन बिताएं।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

बुधवार, 26 नवंबर 2025

दिल्ली धमाके के आरोपी का वीडियो: आत्मघाती हमले के बचाव की मुस्लिम समुदाय द्वारा कड़ी निंदा

अफ़ीफ़ अहसन

दिल्ली धमाके के आरोपी डॉक्टर उमर नबी का एक वीडियो ऑनलाइन सामने आया है जिसमें वह आत्मघाती हमले का बचाव करते हुए उसे "शहादत की कार्रवाई" (Martyrdom Operation) करार दे रहा है। यह वीडियो बड़े पैमाने पर वायरल हो रहा है, जिस पर मुस्लिम समुदाय और विभिन्न राजनीतिक हस्तियों द्वारा कड़ी निंदा की गई है।

10 नवंबर को लाल किला इलाके में होने वाले धमाके के बाद सामने आने वाले इस खुद के बनाए (Self-made) और बिना तारीख वाले वीडियो में, आतंकवादी मॉड्यूल का मुख्य सदस्य डॉक्टर उमर नबी अपनी विचारधारा के बारे में बात करता नजर आ रहा है। डॉक्टर उमर नबी ने आत्मघाती हमले का बचाव किया और इसे "शहादत का कार्य" बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वीडियो एक कट्टरपंथी (Radicalized) दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसका उद्देश्य दूसरों को प्रभावित करना है।

प्रमुख मुस्लिम हस्तियों और समूहों ने इस वीडियो की व्यापक रूप से आलोचना की है और जोर दिया है कि इस्लाम आत्महत्या और मासूम लोगों की हत्या से मना करता है। असदुद्दीन ओवैसी और इमरान मसूद जैसे नेताओं ने इस कृत्य को "हराम", "गंभीर पाप" और "आतंकवाद" करार देते हुए इसकी निंदा की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि इस तरह के कदम इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं।

सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया में इसी नापसंदगी का इजहार किया गया, जहां आत्महत्या को इस्लाम में एक बड़ा पाप बताया गया और वीडियो के विचारों को चरमपंथी विचारधारा से जोड़ा गया। मुस्लिम समुदाय का सर्वसम्मत फैसला वीडियो में दिखाए गए चरमपंथी विचारों को स्पष्ट रूप से खारिज करना और उनसे खुद को अलग करना है, क्योंकि यह बुनियादी इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ हैं।

आत्मघाती हमलावर डॉक्टर उमर नबी अपने घिनौने कृत्यों और हिंसा पर आधारित अपने चरमपंथी विचारों को सही ठहराने के लिए इस्लाम की अपनी व्याख्या और जिसे वह "शरई" सिद्धांत कहता है, का सहारा लेता है। उमर नबी का तर्क मुख्य इस्लामी दृष्टिकोण के विपरीत है। लगातार उलेमा ने बयान दिया है कि इस्लाम में किसी भी बेगुनाह व्यक्ति की हत्या या हिंसा फैलाना सख्ती से मना (हराम) है। आतंकवादी गतिविधियों की धर्म में कोई जगह नहीं है। इस संबंध में कुरान का हवाला दिया जाता है जिसमें कहा गया है कि "एक बेगुनाह इंसान की हत्या पूरी मानवता की हत्या के बराबर है।"

कुरान करीम स्पष्ट रूप से खुद को हलाक (नष्ट) करने से मना करता है। सूरह अन-निसा (4) की आयत 29 में इरशाद है कि:  "ऐ ईमान वालों! आपस में एक-दूसरे का माल नाहक मत खाओ, सिवाय इसके कि वह आपसी रजामंदी से व्यापार के जरिए हो। और अपने आप को [या एक-दूसरे को] कत्ल मत करो। बेशक अल्लाह तुम पर बहुत मेहरबान है।"

सूरह अल-अन'आम (6) की आयत 151 में इरशाद (फरमान) है कि: "...और उस जान को मत मारो जिसे अल्लाह ने हराम ठहराया है सिवाय हक के साथ [यानी न्याय के तकाजों के अनुसार]। ये तुम्हारे लिए उसके आदेश हैं ताकि तुम समझ सको।"

सूरह बनी इसराइल (17) की आयत 33 में आदेश है कि: "और किसी भी जान को नाहक (अन्यायपूर्वक) मत मारो जिसे अल्लाह ने हराम ठहराया है, सिवाय हक के साथ [यानी न्याय के तकाजों के अनुसार]।"

सूरह अल-बकरा (2) की आयत 195 में अल्लाह फरमाता है कि: "और अल्लाह की राह में खर्च करो और अपने ही हाथों अपने आप को हलाकत (विनाश) में मत डालो [यानी कंजूसी करके]। और नेकी करो; बेशक अल्लाह नेकी करने वालों को पसंद करता है।"

ये आयतें मुस्लिम विद्वानों और संगठनों की ओर से आतंकवाद और आत्मघाती बमबारी की निंदा करने के लिए पेश की जाती हैं, जिन्हें एक बड़े गुनाह (पाप) और इस्लामी शिक्षाओं से भटकाव (विचलन) माना जाता है।

आत्मघाती हमलावर यह दलील देते हैं कि वे शहीद का दर्जा हासिल करते हैं, जबकि यह आत्महत्या है। वे अपनी जान खुद लेते हैं, जिसे अल्लाह ने मना किया है और जो एक बहुत बड़ा पाप है। जीवन अल्लाह की नेमत है और उसी के अनुसार हमें अपना जीवन गुजारना है।

अपने पाप को अंजाम देने के लिए वे कहते हैं कि वे 'कुफ्फार' (काफिरों) से लड़ रहे हैं। इसे जायज ठहराने के लिए वे किसी को भी काफिर करार दे देते हैं, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, यहां तक कि वे अपने मकसद के लिए मुसलमानों को भी काफिर कह देते हैं।  परंतु उनका सारा जुल्म मासूम और निहत्थों पर उतरता है। वे गैर-लड़ाकों (Non-combatants) जैसे औरतों, बच्चों और बुजुर्गों को मार रहे होते हैं, जिससे पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) ने सख्त मना फरमाया है। वे सोचते हैं कि आम नागरिक 'Collateral Damage' हैं, जबकि वे उन्हें जानबूझ कर निशाना बनाते हैं। 'ततर्रुस' (युद्ध के दौरान नागरिकों का अनैच्छिक नुकसान) का नियम हालिया लाल किला हमले जैसे घिनौने कृत्य पर लागू नहीं हो सकता, जिसमें बिना किसी भेदभाव के सभी मासूम लोग मारे गए। ये लोग मानते हैं कि उनका तथाकथित मकसद ही उनके साधनों को सही ठहराता है (The end justifies the means)। जबकि इस्लाम में साधनों का भी उतना ही पवित्र होना जरूरी है जितना कि मकसद का। ये लोग अल्लाह की नाफरमानी करके (बेगुनाहों को मारकर) उसकी इताअत (आज्ञापालन) नहीं कर सकते।

उमर नबी और उसके जैसे आतंकवादी साफ तौर पर "जैश" जैसे आतंकवादी संगठनों की सोच के प्रतीक हैं। इस वीडियो से साफ पता चलता है कि इस आत्मघाती हमले में पाकिस्तान में बैठे हुए "जैश" के आतंकवादियों का हाथ है और वही इस आतंकवादी मॉड्यूल के ब्रेनवॉशिंग (Indoctrination), और आर्थिक व नैतिक समर्थन के साथ-साथ सशस्त्र समर्थन भी कर रहे हैं। इस आतंकवादी संगठन का मकसद केवल और केवल भारत जैसे बहुआयामी और शांतिपूर्ण देश में कानून-व्यवस्था को बिगाड़ना और धार्मिक नफरत फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं है।

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रविवार, 23 नवंबर 2025

विवाह पंचमी: मर्यादा, समर्पण और संस्कारों की अमर प्रेरणा

 आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी

भारतीय संस्कृति सिखाती है कि नित्य कर्म यदि चेतना, श्रद्धा और कर्तव्य भावना के साथ किये जाए, तो वह संस्कार बन जाते हैं। सोलह संस्कारों के साथ ही हम जीवन के प्रत्येक कर्म यथा स्नान, भोजन, शयन, जागरण, कृषि कार्य का आरंभ एवं समापन आदि को भी संस्कार ही मानते हैं। इन कार्यों को पूजा-अर्चना एवं श्रद्धा के साथ करते हैं। यही जीवन दृष्टि हमारी संस्कृति को अतिविशिष्ट बनाती है। संस्कार का अर्थ है- शुद्धिकरण, परिष्कार, सुधार, सभ्य या पवित्र बनाने की क्रिया, अर्थात् अच्छे कर्मों द्वारा मन, वचन एवं शरीर का परिष्कार करना। इसी वजह से संस्कार शब्द का प्रयोग चरित्र, आचरण और जीवन की पवित्रता के संदर्भ में भी किया जाता है।

इसी श्रृंखला में हमारी संस्कृति में विवाह पंचमी का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। यह पावन पर्व भगवान श्रीराम और माता सीता के दिव्य विवाह की स्मृति में प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह तिथि 25 नवम्बर को है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण ही नहीं, अपितु धर्म, प्रेम और मर्यादा के शाश्वत मूल्यों के समन्वय का उत्सव है।

अयोध्या और जनकपुर की संयुक्त आस्था - इस दिन भक्तगण व्रत-उपवास रखते हैं, घरों और मंदिरों में मंडप सजाए जाते हैं। कलश स्थापना, दीप प्रज्वलन, भजन-संध्या और रामायण पाठ  का आयोजन होता है। विवाहित दंपती इस दिन अपने मंगलमय दांपत्य जीवन के लिए विशेष रूप से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

यह पर्व भारत और नेपाल के मध्य सांस्कृतिक एकता और सांझी आस्था का भी प्रतीक है। जनकपुर (अब नेपाल में), जिसे माता सीता की जन्मभूमि माना जाता है, में इस पावन अवसर पर विशालविवाह पंचमी मेला’ का आयोजन होता है। वहाँ राम जानकी मंदिर  में श्रीराम और सीता का प्रतीकात्मक विवाह संस्कार सम्पन्न कराया जाता है। वहीं अयोध्या में कनक भवन  और अन्य मंदिरों में भक्तगण विशेष पूजन-अर्चना करते हैं और सीयावर रामचंद्र जी की जय”  के उद्घोष से सम्पूर्ण नगरी गुंजायमान हो उठती है। दीपों की ज्योति से नगर प्रकाशित हो जाता है। तब विवाह पंचमी हमें यह स्मरण कराती है कि प्रेम, आध्यात्म और मर्यादा ही जीवन का सच्चा आधार हैं।

आदर्श दांपत्य जीवन की प्रेरणा - विवाह पंचमी हमें दाम्पत्य जीवन के उस स्वरूप की याद दिलाती है, जिसमें प्रेम के साथ मर्यादा, त्याग, और परस्पर सम्मान निहित है। वर्तमान समय में, जब वैवाहिक जीवन में अस्थिरता और स्वार्थ की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं साथ ही वैवाहिक जीवन की पवित्रता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं, इस परिस्थिति में श्रीराम और सीता का आदर्श यह सिखाता है कि सच्चा दाम्पत्य जीवन परस्पर सहयोग, विश्वास, कर्तव्य एवं त्याग पर आधारित होता है, न कि भौतिक आकर्षण पर। कुल-परिवार एवं समाज का हित व्यक्तिगत हित से ऊपर होता है। ‘मैं’ आधारित सोच एवं स्वयं की सुख-सुविधा नहीं अपितु ‘हम’ की भावना एवं सामाजिक धारणाओं का सम्मान ही वैवाहिक जीवन की धुरी होती है। यह सन्देश देती है कि वैवाहिक जीवन मात्र भौतिक संबंध नहीं, अपितु दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन है, जो धर्म और कर्तव्य से जुड़ा होता है। माता सीता का भगवान राम के साथ वनवास जाने, दर-दर विचरण करने एवं उनके इशारे पर अयोध्या छोड़ने का निर्णय इन्हीं भावनाओं के ज्वलंत उदाहरण हैं।

वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ पुराणों में विशेषकर पद्म पुराण तथा विभिन्न कथा-साहित्य में श्रीराम-सीता विवाह का उल्लेख मिलता है। पद्म पुराण के "पातालखण्ड" में सीता-राम विवाह प्रसंग को धार्मिक, सांस्कृतिक और लोकमर्यादा का आदर्श बताया गया है। इसमें सीता स्वयंवर, शिव धनुष को भंग करना और विवाह की पद्धति को अत्यंत दिव्य और प्रेरक कहकर, संपूर्ण समाज के लिए मर्यादा एवं संस्कारों की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।​ यह प्रसंग इस बात की पुष्टि करता है कि विवाह पंचमी अकेले प्रेम या युगल-मिलन का पर्व नहीं, अपितु मर्यादा, समर्पण और सत्कार्यों की परंपरा का अमर प्रतीक है, जिसमें कर्तव्य, अनुशासन एवं संस्कारों का सर्वोच्चतम स्थान है। यह पर्व हमें पुराणकालीन धार्मिक आदर्शों से जोड़ते हुए समाज को संस्कारशील बनाता है।

संस्कृति का संरक्षण एवं नारी सामान का वैश्विक सन्देश - आधुनिक युग में जब पश्चिमी प्रभावों के कारण सनातनी परंपराएँ क्षीण होती जा रही हैं, यह पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देता है। विवाह पंचमी भारतीय समाज में संस्कार, धर्म और कर्तव्य की भावना को सुदृढ़ करने का माध्यम बनती है। माता सीता के जीवन से समाज यह सीखता है कि नारी शक्ति, धैर्य, और गरिमा की प्रतीक है। आज जब विश्वभर में महिला सशक्तीकरण की चर्चा होती है, तब माता सीता के वैवाहिक जीवन के आदर्श हमें यह बताते हैं कि ढाढस, सौम्यता एवं साहस का अद्भुत संगम नारी के व्यक्तित्व में ही फूलता-फलता है।

सामाजिक एकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्त्रोत - विवाह पंचमी का पर्व सामूहिक उत्सव का प्रतीक है। मंदिरों में भजन-कीर्तन, रामायण पाठ और शोभायात्राएँ लोगों के बीच सामाजिक सौहार्द और धार्मिक आस्था का वातावरण निर्मित करती हैं। यह पर्व परिवार और समाज में सम्मान, समर्पण और संतुलन के मूल्यों को सुदृढ़ करता है। आज के बदलते सामाजिक परिवेश में यह पर्व हमें संस्कारों, निष्ठा और मर्यादा में निहित अनंत आध्यात्मिक ऊर्जा का स्मरण कराता है।

आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण के बालकाण्ड में सीता द्वारा श्रीराम का दाहिना हाथ अपने बाएं हाथ में लेने की क्रिया का पाणिग्रहण संस्कार के रूप में वर्णन है, जो विवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संस्कार केवल एक सामाजिक रीति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और मानसिक समर्पण का प्रतीक है। इस संस्कार के माध्यम से वर और वधू एक-दूसरे के जीवन में पूर्ण समर्थन और साथ चलने का संकल्प लेते हैं। पाणिग्रहण का अर्थ है हाथ का ग्रहण, जो मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है। यह क्रिया वर वधू के बीच विश्वास, प्रेम, और जिम्मेदारी की नींव रखती है, जो उनके वैवाहिक जीवन को सुदृढ़ और स्थायी बनाती है। पाणिग्रहण संस्कार से दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, जीवन की खुशियों और कठिनाइयों में संयुक्त रूप से आगे बढ़ने का एक-दूसरे को वचन देते हैं।

निष्कर्ष - विवाह पंचमी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी त्रेता युग में थी। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चा सुख, मर्यादा, प्रेम, निष्ठा और कर्तव्यपालन में निहित है। श्रीराम और सीता के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेकर हम अपने परिवार और समाज को संस्कारवान बना सकते हैं। वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो टूटते हुए परिवारों को बचा सकते हैं। भगवान श्रीराम और माता सीता के आदर्श विवाह का यह पर्व आज के बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का संदेश देता है। यही इसकी वास्तविक सीख एवं  शाश्वत महत्त्व है। महाकवि तुलसीदस ने ठीक ही कहा है, सिय राम मय सब जग जानी।

(लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं। लेखक पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं।)

दिव्याग सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान

संवाददाता

नई दिल्ली। आज दिनाक 23-11-2005 को विकलांग कल्याण सह शोध समिति (रजि.) मदनगीर, नई दिल्ली-110042 द्वारा आयोजित दिव्याम सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान नाटी गाईना बारात घर नई दिल्ली-110074 में हुई जिसमें क्षेत्र के कई दिव्यांगजन ने अभियान में भाग लिए। जिसमें दिव्या जनी के रोजगार शिक्षा स्वास्थ शिक्षा पर बल दिया गया। सरकारी प्रयास एवं योजनाएं सन्तोष का विषय है कि सरकार एवं विभिन्न स्वयंसेवी संगतन दिव्यांग जनों के सशक्तिकरण के लिए लगातार प्रयासरत है। दिव्यांग अधिकार अधिनियम-2016 में 21 प्रकार के दिव्यांगताओं की मान्यता दी है और उनके अधिकारों को कानूनी रूप दिया है। सरकारी नौकरी और शिक्षण सस्थानों में आरक्षण सुगम मारत अभियान के अंतर्गत भवनों एवं परिवहन प्रणालियों को सुगम बनाना एवं सहायक अम एव उपक्रम प्रदान करना वे सभी कदम मील के पत्थर है। दिव्याग जनों के UDID Card के बारे में भी जानकारी दी।

सस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बौनु साहु जी जो 75% दिव्याग है. ने ऐसे जागरूकता एब सशक्तिकरण योजनाओं और अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। यहाँ मिलने वाली जानकारी एवं मार्गदर्शन से कई  विकलांग नातियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तनसाहुजी ने कहा कि यह एक सकिने सरकार और गैरसरकारीसम निर्माण करे दिव्याजदरता के पात्र हज अपनी क्षमताओं को पूरा धारा में गरिमापूर्ण जीवन जी सके और दिव्यांगों के लिए दिव्याक समूहका निर्माण एवं कौशल प्रशिक्षण पर विस्तृत जानकारीका सशक्तिकरण केवल उनकी नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश और समाज को सशक्तिकर है। वे एक बार फिर उपस्थित सभी दिव्यामजनों एवं सहयोगियों को धन्यवाद देता है। सस्था के कानूनी सलाहकार श्री रमेश कुमार (कोली) ने भी दिव्यान अधिकार अधिनियम पर विस्तृत जानकारी दिये और श्री रमेश कुमार (कोली) जी ने महात्मा गांधी का रूप धारण करके उपस्थित सभी व्यक्तियों को सम्बोधन किया तथा ऐसे आयोजनों का अनवृत रूप से करने का निश्चय किया। शिविर में सरथा सदस्य श्री विजय कुमार दिव्यांग 90%, श्री सुखविन्दर सिंह तथा माटी गाईन्स क्षेत्र के दिव्याज जन में मुख्य रूप से सुश्री सीताजी श्री नन्दलाल जी. श्री किशोरीलाल जी. श्री बलवीर सिंह, श्री बीडो जी. राजेंवाई जी, शीला जी ने अपने अपने विचार व्यक्त किए।

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