बुधवार, 31 दिसंबर 2025

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण विधायकों के एक साथ जुटने पर आपत्ति क्यों?

बसंत कुमार

विगत कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में जाति के नाम पर सम्मेलनों की बाढ़ सी आ गई है जो भी राजनीतिक दल किसी जाति के अंदर अपनी पैठ बनाना चाहता है वह उसे जाति के महापुरुषों के नाम पर जाति का सम्मेलन आयोजित कर देता है जबकि उनका मुख्य मकसद उस जाति का वोट लेना होता है न की उस महापुरुष का सम्मान करना। परंतु एक अनोखी घटना हुई जब उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण विधायकों के इकट्ठे मिलने पर उनकी पार्टी द्वारा आपत्ति जताई गई, हुआ यह की उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पंकज चौधरी की ताजपोशी के कुछ ही दिन बाद ही प्रदेश के भाजपा के 50 ब्राह्मण विधायकों का भोजन के बहाने एक जगह इकट्ठा होना, यद्यपि कहा गया कि यह मीटिंग SIR पर पर विचार विमर्श के लिए बुलाई गई थी पर राजनीतिक हलके में इस बैठक को कुछ ऐसा माना गया की यह बैठक कोई जातिवादी व्यूह रचना के लिए बुलाई गई है। इसी कारण पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने लोगों को नकारात्मक राजनीति से बचने की सलाह दी। यद्यपि यह पहली बार नहीं है कि राज्य के विधायक और सांसद जाति के आधार पर एकत्रित न हुए हो, सबसे पहले राजपूत विधायक के कितने हुए उनकी बैठक हुई और उसके बाद सारे पूर्वी विधायक मिले अर्थात जाति के नाम पर नेताओं का इकट्ठा होना कोई नई बात नहीं है।

जाति के आधार पर राजनीति होना देश में नई बात नहीं है और विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार में हर राजनीतिक फैसला लोगों की जाति देखकर किए जाते हैं टिकटार्थियो को टिकट उनकी जाति के आधार पर दिया जाता है किसी को टिकट देते समय उसे योग्यता के बजाय उसकी जाति देखा जाता है मंत्रिमंडल बनाते समय जाति का ध्यान दिया जाता है तो फिर अगर एक जाति के विधायक इकट्ठे मिलकर कहीं पर चर्चा करते हैं तो इतना बड़ा बवाल क्यों? वैसे पूरे में कभी राजपूत के नाम पर, कभी पासी समाज के नाम पर, कभी यादव समाज के नाम पर कभी वाल्मीकि समाज के नाम पर आए रोज मीटिंग होती रहती हैं और लोग अपने समाजके हित की बातें करते रहते हैं जगह-जगह अपनी जाति के सम्मेलन किए जाते हैं और अपने जाति के लोगों के कारनामों का बखान किया जाता है, फिर यह समझ नहीं आ रहा कि ब्राह्मण विधायकों का एक जगह इकठ्ठा होना इतना आपत्तिजनक क्यों माना जा रहा है।

इस देश में जाति पर आधारित राजनीति इतनी प्रबल हो गई है इसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता वर्ष 2017 में मैं तत्कालीन एमएसएमई मंत्री श्री कलराज मिश्रा का सलाहकार था, एक मेरे ब्राह्मण मित्र जो अत्यन्त अनुभवी व बहुत शिक्षित थे, ने किसी मंत्री के व्यक्तिगत स्टाफ में समायोजित करवाने की बात की। मैं उनको लेकर एनडीए सरकार की सहयोगी पार्टी के एक पिछड़ी जाति के मंत्री के यहां गया और अपने मित्र के समायोजन की बात की तो मंत्री जी ने कुछ दिन के बाद मेरे पास यह जवाब भिजवा दिया कि आपके मित्र काबिल तो है पर मैं उन्हें अपने यहां इसलिए नहीं रख सकती क्योंकि वह ब्राह्मण है। इसी तरह मुझे एक और अनुभव हुआ जब वर्ष 2023 में मोदी मंत्रिमंडल में एक ब्राह्मण जो मेरे अच्छी परिचित है राज्य मंत्री के रूप में नियुक्त किए गए वहां भी मैंने किसी एक व्यक्ति का नाम रिकमेंड किया पर वहां से जवाब आया कि आप यदि किसी ब्राह्मण का नाम रिकमेंड कर दें तो उस पर विचार किया जा सकता है, अब जहां ऐसी स्थिति हो की मंत्री अपने स्टाफ में लोगों की जांच देखकर रखते हो, वहां पर किसी जाति विशेष के विधायकों का इकट्ठा होना आपत्तिजनक हो तो बड़ा हास्यास्पद लगता है। जबकि 21वीं सदी के इस आधुनिक युग में कोई भी नियुक्ति कुछ अपवादों को छोड़कर जाति की बजाय है मेरिट और योग्यता को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए पर भारत में ऐसा हो नहीं पा रहा है जो की बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार जातियों के आधार पर इस प्रकार की बैठके पार्टी के हित में नहीं है, एक तरह से जाति की राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों की बिछाई पिच पर खेलने जैसा है, लेकिन प्रश्न यह उठ ता है कि इससे पहले पार्टी नेतृत्व द्वारा जातियों के आधार पर विधायकों की गोलबंदी कोशिका सज्ञान क्यों नहीं लिया गया। क्या ब्राह्मण विधायकों की बैठक इससे पहले विभिन्न जातियों के विधायकों की बैठक के जवाब में हुई थी और प्रश्न यह भी है कि जब चुनाव से पहले पार्टी विभिन्न जातियों के सम्मेलन कर सकती है तो जाति के आधार पर विधायक इकट्ठे क्यों नहीं हो सकते। वैसे भी उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में जाति एक वास्तविकता है। चुनावी समीकरण में भी जातियों का मुख्य महत्व है फिर भी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राज्य में सामाजिक न्याय, सर्व स्पर्शी और सर्व समावेशी राजनीति को स्थापित किया गया है और उनकी विकासवादी राजनीति के आगे जाति पर आधारित राजनीति का अंत हो रहा है।

भाजपा और कांग्रेस जैसी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में विभिन्न जाति और वर्गों के आधार पर मोर्चे बनाए जाते हैं जैसे दलितों के लिए अनुसूचित मोर्चा, आदिवासियों के लिए अनुसूचित जाति मोर्चा, मुसलमान व अन्य अल्पसंख्यकों के लिए अल्पसंख्यक मोर्चा, पिछड़ी जातियों के लिए ओबीसी मोर्चा, जहां पर इन जातियों के सांसद विधायक और अन्य नेता एक साथ बैठकर अपने समाज के उत्थान के लिए नीतियां तय कर सकते हैं और उनका कार्यान्वयन हो सकता है। तो यदि ब्राह्मण विधायक एक साथ बैठकर अपने समाज के लिए आपस में विचार विमर्श करते हैं तो इसमें क्या बुराई है। वैसे भी भारतीय समाज में प्राचीन काल से जाति पर आधारित खाप पंचायतो की परंपरा रही है जहां बिरादरी से संबंधित विवादों का निपटारा आपसी समझ से किया जा सकता था ऐसे में सिर्फ जाति विशेष के विधायकों के इकट्ठा होने पर सवाल उठाना उचित नहीं लगता। जब देश में ब्राह्मण महासभा, क्षत्रिय महासभा, यादव महासभा, वैष्णो महासभा, दलित महासभा जैसे संगठन बनाए और चलाए जा सकते हैं तो फिर एक जाति के आधार पर जन प्रतिनिधियों को इकट्ठे होने पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

देश में लोकतंत्र की स्थापना हुई लगभग 8 दशक का समय पूरा होने वाला है और कांग्रेस, भाजपा व तीसरे मोर्चे की सरकारे समय-समय पर बनती रही है लेकिन एक चीज बड़ी कॉमन है कि मंत्रिमंडल के गठन में अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए गठित समाज कल्याण व अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री किसी दलित को ही बनाया जाता है और आदिवासियों के कल्याण के लिए गठित मंत्रालय का मंत्री किसी आदिवासी को बनाया जा सकता है इस तरह से अल्प संख्यक मामलों के मंत्रालय का प्रभार किसी मुस्लिम या अल्प संख्यक समाज के व्यक्ति को ही दिया जा सकता है तो जब मंत्रिमंडल के गठन में जाति को आधार मानकर ही मंत्रियों को चार्ज दिया जाता है तो फिर जाति विशेष के विधायकों/सांसदों की एक जगह बैठने पर आपत्ति क्यों?आजादी की इतने वर्ष बाद भी अभी तक किसी सवर्ण को समाज कल्याण मंत्रालय या जनजाति कल्याण मंत्रालय का प्रभार नहीं दिया गया है जब तक विभिन्न जातियों में एक दूसरे के प्रति विश्वास नहीं जागेगा तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है इसलिए सभी पार्टियों को मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई बनानी होगी जहां विभिन्न जातियों का वर्गों में अपनी विश्वास हो और भाईचारा हो जहां एक सवर्ण दलित अल्पसंख्यकों के कल्याण के बारे में सोच सके और दलित और आदिवासी सवर्ण समाज के कल्याण के बारे में सोच सके तभी भारत एक आदर्श विकसित देश बन सकेगा।

कैसी विडंबना है कि 1990 के दशक में विश्व राजनीति में दो महान शक्तियों के बीच शीत युद्ध खत्म हो गया और सोवियत यूनियन ब्लाक बिखर गया। आज दुनिया ने लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन की आर्थिक नीति के ऊपर चल रहा और वैश्विक स्पर्धा सारी दुनिया को एक साथ ले आ रही है लेकिन भारत जो अपने आप को सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक व्यवस्था के रूप में साबित कर चुका है वहां आज भी राजनीति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, पिछड़े दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर चल रही है जो दुर्भाग्य पूर्ण है।

सरकार और भाजपा नेतृत्व वास्तव में समाज से जाति वाद की राजनीति को समाप्त ही करना चाहती है सोशल मीडिया पर जातिवाद का जहर उगल रहे अति भीम वादियों और मनु वादियों पर रोक लगाए और ऐसे स्वयंभू धर्म गुरुओं पर रोक लगाए जो हिंदू राष्ट्र की मांग के पीछे समाज में जातिवाद का जहर घोल रहे हैं तभी एक समरस स्वस्थ और सुदृढ़ हिंदुस्तान की स्थापना हो सकेगी।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/