शनिवार, 7 मार्च 2026

खामेनेई का अंत और इस्लामी क्रांति

अवधेश कुमार 

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्लाह अल खामेनेई का मारा जाना 21वीं सदी की ऐसी बड़ी घटना है जिसका प्रभाव कई रूपों में संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा। इस्लामी शासन होने के कारण वे व्यावहारिक रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भूमिका खामेनेई की नीतियों के क्रियान्वयन की रही है।अयातुल्लाह होने के कारण उन्हें विश्व भर के शिया मुसलमान अपने शीर्ष मजहबी नेता के रूप में देखते थे। पाकिस्तान ,ईरान ,भारत सहित कई देशों में शिया मुसलमानों का विरोध सामने है। किंतु यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के एक भी पड़ोसी देश ने ईरान का पक्ष नहीं लिया है। हालांकि पिछले वर्ष खामेनेई ने संपूर्ण विश्व के मुसलमानों की एकता का आह्वान किया था। ईरान और उसके बाहर उनके समर्थकों की कल्पना में कभी उनके इस तरह की मौत की बात नहीं आई होगी। हालांकि पिछले वर्ष जून में पहले इजरायल और बाद में अमेरिका के हमले के समय अटकलें लगी थी कि शायद वे देश छोड़कर चले गए। ऐसा हुआ नहीं।

इस घटना की संपूर्ण परिणतियों का स्पष्ट पूर्वावलोकन अभी कठिन है। इतना स्पष्ट कहा जा सकता है कि ईरान में 1979 से इस्लामी क्रांति का एक दौर तत्काल समाप्त हो गया है।

ऐसा नहीं है कि इस्लामी क्रांति के बाद हुए परिवर्तनों, स्थापित ढांचें, विचारधारायें समाप्त हो गईं हैं पर कम से कम उस रूप में आने वाले लंबे समय तक मुक्त और स्वतंत्र शिया इस्लामी शासन नहीं हो सकता। यह कथन सामान्य क्रांतियों के संदर्भ में है कि क्रांति के शिशु ही क्रांति को खा जाते हैं। ईरान के इस्लामी क्रांति के बारे में भी तत्काल यह निष्कर्ष सही दिखता है। सामान्यतः आम इस्लामी देशों से थोड़ा उदार और खुले जीवन जीने वाले ईरान में 1979 के इस्लामी क्रांति और अयातुल्लाह के सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापना संपूर्ण विश्व की दृष्टि से एक नई घटना थी। इसमें केवल ईरान नहीं संपूर्ण अरब और कुछ मायनो में इससे बाहर भी गैर इस्लामी या इस्लाम विरोधी शासनों के अंत और इसके विस्तार का विचार प्रबल था। यहूदी देश इजरायल को इस्लाम का दुश्मन घोषित करते हुए ईरान राष्ट्र का लक्ष्य धरती से उसका नामोनिशान मिटाना हो गया। अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों को शैतान कहा गया। यह व्यावहारिक तौर पर विश्व में एक इस्लामी विद्रोह की सत्ता का स्वरूप था। सच कहें तो इसी अतिवादी भाव के व्यवहार ने ईरान को उस अवस्था में पहुंचा दिया जहां उसका शांत, स्थिर, सशक्त और सुरक्षित रहना असंभव था। जब आप किसी एक देश के धरती पर नहीं रहने के अधिकार की घोषणा करेंगे और उसके अनुसार देश का व्यवहार होगा, बाहर अलग-अलग हिंसक समूह पैदा कर उसकी मदद करेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया आपको झेलनी पड़ेगी। आखिर कोई देश ऐसे शासन को कायम रहने देने के पक्ष में क्यों होगा जो उसके अंत को अपना लक्ष्य बनाकर काम कर रहा हो?

इस्लामी क्रांति के साथ 1979 में अमेरिकी दूतावास पर हमले और उसके बाद की तस्वीरें आज भी सिहरन पैदा करती हैं। अमेरिकी कर्मचारियों के हाथ बांध कर बाहर लाया गया, वे बंधक बनाये गये। तब से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की कामना होती थी ईरान से इस्लामी शासन का अंत हो। तत्कालीन ईरानी शासक राजा शाह पहलवी को अपने परिवार और समर्थकों के साथ अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। आज उनके पुत्र रेजा शाह पहलवी और  परिवार अमेरिका में ही है। पिछले लगभग 3 महीने से ईरान के अंदर विरोध प्रदर्शनों में हमने देखा कि लोग उनकी तस्वीरें लिए वापस आओ के नारे लगा रहे थे। ये लोग अमेरिका से भी हस्तक्षेप की भी मांग कर रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विरोधियों का समर्थन किया,  ईरान को चेतावनी दी पर तत्काल सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। कुछ वक्तव्यों और घटनाओं से लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप इस बार परिणामकारी सैन्य हस्तक्षेप करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने खामेनेई शासन को चेतावनी दी, न्यूक्लियर कार्यक्रमों को समाप्त करने की शर्तें रखी, ओमान में बातचीत भी आरंभ की किंतु सब रणनीति के तहत था। उसके साथ-ईरान के आसपास अब्राहम लिंकन जैसा सबसे बड़ा नौसैनिक बेरा और अन्य तैयारी होती रही।

दरअसल, 7 अक्टूबर ,2023 को हमास द्वारा उत्सव मना रहे निर्दोष निरपराध यहूदियों पर हमला कर लगभग 1200 लोगों का सरेआम कत्लेआम और बंधक बना लेने की घटना ने पश्चिम एशिया खासकर ईरान इजरायल ,ईरान अमेरिका संबंधों को ऐसे मोड़ पर ला दिया जिसे अयातुल्लाह सहित उनके परिवार के अनेक सदस्यों ,प्रमुख कमांडरों और रक्षा मंत्री आदि की मृत्यु की पृष्ठभूमि माना जा सकता है। गाजा में हमास , लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हुती अयातुल्लाह के ईरान के ही गैर राज्यीय आतंकवादी समूह हैं। उस घटना ने विश्व के हर विवेकशील व्यक्ति और संतुलित राष्ट्रों को अंदर से हिला दिया। हालांकि यहूदियों के विरुद्ध इस्लामी मजहबी भाव को देखते हुए मुस्लिम देशों में आम भाव ऐसा नहीं था किंतु ईरान की तरह भूमिका दूसरे की नहीं थी।

इजरायल और अमेरिका का ऑपरेशन तभी से आगे बढ़ने लगा। लेबनान में हिजबुल्लाह  तथा गाजा में हमास को पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य से इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कार्रवाई आरंभ की। हिजबुल्लाह प्रमुख नजीबुल्लाह और उसके ज्यादातर शीर्ष साथियों की मृत्यु ,उसके केंद्र काफी हद तक नष्ट होने आदि के साथ उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई कि पहले की तरह संघर्ष नहीं कर सकते थे। गाजा में भी संघर्ष जारी रहा और अपने लोगों को सुरक्षित लाने की विवशता रहते हुए भी इजरायल ने हमास के ढांचे को जितना संभव था अंत करने की कोशिश की। डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आने के बाद कुछ समय के लिए लगा कि शायद इजरायल की उनको लेकर अपेक्षाएं गलत साबित हो सकतीं हैं। लेकिन 22 जून 2025 को अमेरिका के शक्तिशाली जीबी 57ए/ बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमोपी  जिसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है, के हमलों में ईरान के तीन महत्वपूर्ण फोर्डो, नतांज और इस्फाहान न्यूक्लियर ठिकानों को नष्ट किया। वस्तुत: अमेरिका और इजराइल क्रमबद्ध तरीके से यहां तक पहुंचे हैं। ईरान पर पिछले एक दशक से ज्यादा के प्रतिबंधों ने उसके तेल व्यापार को लगभग समाप्त कर दिया और आर्थिक संकट बढ़ता गया। डोनाल्ड ट्रंप ने उन प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के उपाय किए और उनके तेवर ऐसे थे जिसका असर हुआ। इस बीच ईरान रिवॉल्यूशनरी कोर्प्स गार्ड से लेकर प्रमुख रक्षा वैज्ञानिकों आदि की हत्यायें होती रहीं । इजरायल ने भी बीच-बीच में हमले किये। हालांकि पिछले वर्ष ईरान के मिसाइल हमले से इजरायल को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। उसके बाद ज्यादा सशक्त तैयारी का अहसास हुआ और वही किया गया।

आयतुल्लाह के मारे जाने के कुछ घंटे पहले जब डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा किया कि ईरान के बहादुर लोगों से मेरा अनुरोध है कि आप अपने घरों में रहें ,चारों तरफ हमारे बम गिर रहे हैं और इस शासन से मुक्त कर आपको हम ईरान सौंप देंगे तब भी शायद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को विश्वास नहीं हुआ होगा कि वे जो बोल रहे हैं वही करने की तैयारी से इस बार ईरान में हस्ताक्षेप हुआ है। देख लीजिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीश में ज्यादातर मुस्लिम देश ही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका और इजरायल का पूरा साथ दिया है। ईरान जिस तरह सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, कुवैत ,क़तर आदि सभी स्थानों के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के नाम पर हमले कर रहा है उसके लगता है कि हर देश उसके विरुद्ध थे। वैसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का सबसे पहला और लंबा युद्ध इराक के साथ हुआ जो स्वयं शिया बहुल देश है।

अभी भविष्य की स्पष्ट तस्वीर नहीं प्रस्तुत की जा सकती। ईरान के बचे-खुचे कमांडर अपनी शक्ति से संघर्ष करेंगे,  दुनिया भर के शिया अतिवादी समूह अपने स्तर से हिंसा और विरोध करेंगे, लेकिन ईरान के शासन का लंबे समय तक समूचे देश पर नियंत्रण रहना कठिन होगा। ईरान पर कब्जा कर किसी को सत्ता पर बिठाना अमेरिका के लिए कठिन है। बड़ी संख्या में ईरानी भी किसी बाहरी हस्तक्षेप वाले शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। खामेनेई की मृत्यु के बाद तत्काल उनके प्रति सहानुभूति भी पैदा हुई है जो‌ लोगों की प्रतिक्रियाओ में दिख रही है।‌ ईरान में तुर्क, कुर्द, अज़रबैजानी  अलग-अलग स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका हौसला बढ़ा है। वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करने वाला समूह भी बहुत बड़ी संख्या में है। इसलिए ईरान के एक निश्चित दिशा में पहुंचने के पहले वहां घटनाएं अनेक मोड़ लेंगी और हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस्लामी शासन का ऐसा हस्र पूरी दुनिया के इस्लामवादियों के लिए सबक होना चाहिए। जो भी हो 1979 इस्लामी क्रांति के सिद्धांत वाली ऐसी शासन व्यवस्था वहां कायम नहीं रह सकती, जिसका संपूर्ण देश पर प्रभावी नियंत्रण हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

महिला उत्थान और सशक्तिकरण की अग्रदूत थी सावित्रीबाई फुले

डॉ. रमेश कुमार शर्मा 

समूचे विश्व में 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है जिसकी आधिकारिक मान्यता 1977 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा दी गई थी, जिसका उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाना और समाज में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना है। हमारे देश में महिला सशक्तिकरण अभियान की शुरुवात 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक बेहद साधारण दलित किसान खंडोजी नेवसे के घर में जन्मी सावित्रीबाई फुले ने मात्र 15 वर्ष की आयु में ही कर दिया था, हलाकि हमारी सभ्यता और संस्कृति “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” के सिद्धांत को मानती है जिसमें महिलाओं के सम्मान और उनकी भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। परन्तु उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के बीच का कालखंड ऐसा था जिसमें न सिर्फ महिलाओं को शिक्षा और सामाजिक अधिकारों से वंचित रखा जाता था बल्कि उनको अनेकों सामाजिक कुरीतियों का सामना भी करना पड़ता थाl

भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ अनेकों व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने संघर्ष, साहस और  दूरदृष्टि से समाज में परिवर्तन की मजबूत नींव रखी। ऐसी ही एक महान विभूति थीं सावित्रीबाई फुले आज 10 मार्च है यानि उनकी पुण्यतिथि जो केवल उनके स्मरण का दिवस नहीं है बल्कि उनके विचारों और संघर्षों से प्रेरणा लेने का भी दिन है। सावित्रीबाई फुले ने उन्नीसवीं शताब्दी के उस दौर में सामाजिक सुधार की मशाल जलाई, जब समाज जातिगत भेदभाव, स्त्री-अशिक्षा और रूढ़िवादिता से गहराई तक जकड़ा हुआ था। में सावित्रीबाई फुले का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक उपेक्षा, जातीय भेदभाव और संघर्षों से भरा रहा परन्तु उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी और कम उम्र विवाह होने के बाद भी अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर अपने सम्पूर्ण जीवन को नारी उत्थान और समाज कल्याण के लिए एक व्यापक आंदोलन खड़ा किया और इसी आंदोलन में खुद का न्योछवर कर दियाl

बाल विवाह प्रथा के चलते सावित्रीबाई फुले जी विवाह कम आयु में ही हो गई थी जिससे उनकी शिक्षा दीक्षा प्रभावित हुई परन्तु पति ज्योतिराव फुले जो की खुद एक सामाजिक कार्यकर्त्ता थे जो सामाजिक उत्थान और समानता के लिए संघर्ष कर रहे थे उनके सहयोग से सावित्रीबाई जी की शिक्षा पूर्ण हो पायी और वर्ष 1848 में उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल शुरू किया। उनका यह कदम अत्यंत क्रांतिकारी था क्योंकि उस समय समाज में लड़कियों की शिक्षा को उपयोगी नहीं समझा जाता था इसलिए कुछ सामाजिक कट्टरपंथीयों ने न सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जाती थीं तो उन पर पत्थर और गोबर फेंकते तथा उनका अपमान करते थे। लेकिन उन्होंने इन सब अपमानों को सहते हुए अपने मिशन को जारी रखा। यह उनके साहस और शिक्षा के प्रति समर्पण का प्रतीक है। और आज हम उनको प्रथम महिला शिक्षिका के रूप में भी जानते हैं।

भारतीय समाज सुधार आंदोलन के इतिहास में सावित्रीबाई फुले का जीवन दर्शन केवल एक प्रयास नहीं बल्कि एक आंदोलन साबित  हुआ जिसने आधुनिक भारत में महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की नींव रखी। यह समझना आवश्यक है कि उनका दृष्टिकोण केवल लड़कियों की शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज के उस सबसे वंचित तबके को केंद्र में रखा, जिसे सदियों से शिक्षा और सम्मान के मूल अधिकारों से वंचित रखा गया था।उन्नीसवीं सदी का भारतीय समाज जातिगत विषमता और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों की गिरफ्त में था। दलितों और पिछड़े वर्गों को केवल शिक्षा से ही वंचित नहीं रखा जाता था, बल्कि सामाजिक सम्मान की दृष्टि से भी उन्हें अछूत माना जाता था। सावित्रीबाई और उनके पति महात्मा ज्योतिराव फुले ने इस संरचनात्मक अत्याचार के विरुद्ध सबसे पहले वैचारिक और व्यावहारिक मोर्चा खोला। उनके द्वारा स्थापित विद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक समरसता और मानवीय समानता के उन गढ़ों की तरह थे, जहाँ जात-पात की ऊँच-नीच को तोड़कर एक नए, समतामूलक समाज का निर्माण किया जा रहा था। यह एक ऐतिहासिक पहल थी, जिसने बाद के सामाजिक न्याय आंदोलनों की राह प्रशस्त की।

महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में सावित्रीबाई का दृष्टिकोण उस समय के सीमित परिप्रेक्ष्य से कहीं अधिक व्यापक और मानवीय था।

उस दौर में बाल विवाह, सती प्रथा और विधवा उत्पीड़न जैसी कुरीतियाँ महिलाओं के जीवन को नरक बना देती थीं। विधवाओं के साथ होने वाला सामाजिक व्यवहार अत्यंत अमानवीय था; उन्हें केवल तिरस्कार ही नहीं, बल्कि आजीवन आत्मग्लानि और कठिनाइयों में जीने के लिए विवश किया जाता था। सावित्रीबाई ने इस क्रूर सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने केवल सहानुभूति दिखाकर संतोष नहीं किया, बल्कि विधवाओं के लिए आश्रय स्थल स्थापित कर उन्हें आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया। यह केवल परोपकार नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक क्रांति की नींव रखने जैसा था, जो महिलाओं को उनके शरीर और जीवन पर अधिकार दिलाने की दिशा में पहला कदम था।

उनके सुधारवादी दृष्टिकोण की सबसे बड़ी ताकत उनकी मानवीय संवेदना और साहस था। "बाल हत्या प्रतिबंधक गृह" (घर) की स्थापना इस बात का प्रमाण है कि वे सामाजिक विसंगतियों की जड़ तक पहुँच रही थीं। अनचाहे गर्भ से पीड़ित विधवाएँ, जो समाज के कोप और अपमान से बचने के लिए गर्भपात या नवजात शिशु की हत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाती थीं, उनके लिए एक सुरक्षित स्थान की परिकल्पना करना और उसे मूर्त रूप देना उस समय के रूढ़िवादी समाज में अद्भुत साहस का कार्य था। सावित्रीबाई फुले की मानवीय संवेदना का सबसे बड़ा उदाहरण 1897 में प्लेग महामारी के समय देखने को मिला। उस समय जब लोग बीमारी के डर से एक-दूसरे से दूरी बना रहे थे, तब सावित्रीबाई बीमार लोगों की सेवा में लगी रहीं। वे स्वयं मरीजों को अस्पताल तक पहुँचाने का कार्य करती थीं। इसी सेवा कार्य के दौरान उन्हें भी प्लेग हो गया और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। इस प्रकार उन्होंने मानव सेवा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

आज जब हम उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हैं, तो यह आवश्यक है कि हम उनके विचारों और मूल्यों को अपने जीवन में अपनाएँ। आज भी समाज में शिक्षा, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। ऐसे में सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें यह सिखाता है कि दृढ़ संकल्प और साहस के साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। सावित्रीबाई फुले जी ने अपने इन सभी प्रयासों के माध्यम से न केवल महिलाओं को सशक्त बनाया बल्कि भारतीय समाज में सामाजिक न्याय, समानता और मानवता के मूल्यों को मजबूत किया और महिला उत्थान और सशक्तिकरण की अग्रदूत बनी।

(लेखक प्रोफेसर विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ़ प्रोफेसनल स्टडीज, नई दिल्ली हैं।)

गुरुवार, 5 मार्च 2026

न्यायालय, पुलिस और जन प्रतिनिधियों (नेताओं) के प्रति भ्रष्ट होने का पूर्वाग्रह पालना अनुचित

बसंत कुमार

इधर कुछ दिनों से एन सी ई आर टी की कक्षा 8कीसमाज शास्त्र की पुस्तक के न्यायपालिका के भ्रष्टाचार नामक शीर्षक से एक चैप्टर प्रकाश जिसमे न्यायपालिका में व्यापत भ्रष्टाचार और न्यायलयों में दशकों से लंबित मामलों की जानकारी दी गई। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले का संज्ञान लेते हुए इस चैप्टर को बैन करने का आदेश दिया और इस प्रकार के चैप्टर के पुस्तक में शामिल होने पर नाराजगी यद्यपि एनसीईआरटी ने इस विषय में माफी मांग ली है, पर प्रश्न यह उठता है कि एन सी ई आर टी जैसी संस्था जो देश में शिक्षा और अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण विषयो पर निर्णय लेती है और इसके लिए इस संस्थान में बड़े विद्वान लोगों की टीम रहती है वहां इस प्रकार की लापरवाही कैसे हुई और पाठयक्रम में एक ऐसा पथ जोड़ दिया गया जो देश की आने वाले युवा पीढ़ी के मन में देश की न्यायपालिका व न्यायालयों के विषय में किसी तरह का भ्रम पैदा करे।

यह सही है कि विगत कुछ वर्षों में न्यायपालिका अपने उच्च आदर्शो को बनाए रखने में नाकाम रही है, जस्टिस वर्मा जिनके सरकारी आवास पर से अनगिनत नोटों के बंडल पाए गए और कुछ अन्य जजों के कृत्य के कारण न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है, कुछ वर्ष पूर्व तमिलनाडु उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज जस्टिस कर्णनन मैं पत्र लिख कर उच्च न्यायपालिका में कार्यरत कई जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए थे।

एक बार संसद में न्यायमूर्ति जस्टिस मुखर्जी पर भ्रष्टाचार केआरोप पर महाभियोग लाया गया पर संसद के उत्तर भारत व दक्षिण भारत की लाबी में बट जाने के कारण यह महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। कुछ माह पूर्व एक सिरफिरे वकील ने तत्कालीन चीफ जस्टिस बी आर गवई के ऊपर भरी अदालत में जूता फेंकने का साहस किया। यह घटना है उस उच्च न्यायपालिका का अपमान है जहां देश का नागरिक पीड़ित होने पर सामने वाले को बड़े गर्व से कह देता है आई विल सी यू इन द कोर्ट उसका यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि देश की न्यायपालिका जाति धर्म लिंग भेद से परे रहकर ईमानदारी से काम करती है पर पाठ्य पुस्तक में इस तरह के चैप्टर का छपना सचमुच दुर्भाग्य पूर्ण है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए जस्टिस सुरेश कैत खुले आम यह आरोप लगाया कि देश की न्यायालय में वंचित यानी दलित समाज के लोगों के साथ न्याय नहीं हो पाता जबकि जस्टिस सुरेश कैत दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ अन्य न्यायालयों में सम्मानित न्यायाधीश रहे है पर हैरानी की बात यह है कि सेवा में रहते हुए उन्होंने कभी भी न्यायपालिका में दलितों व वंचितों के साथ अन्याय होने की बात नहीं उठाई, लेकिन जस्टिस सुरेश कैत ये बात सेवा में रहते हुए यह बात उठा देते तो सम्भव; इस विषय में कुछ हो सकता था, फिर भी आज भी इन सारे विवादों के प्रकाश में आने के बावजूद देश के नागरिकों में न्यायपालिका के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास है।

एनसीईआरटी की पुस्तक के विवादित पाठ में न्यायालय में दशकों से लंबित मुकदमों का भी वर्णन किया गया है जिनकी संख्या लाखों में हो गई है इन बातों को समय-समय पर समाचार पत्र सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों द्वारा उठाया जाता रहा है पर न्यायालय में इतनी संख्या में लंबित मुकदमों के लिए सिर्फ कोर्ट को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए वकीलों द्वारा मामलों को लंबा लटकाना पुलिस द्वारा दोषपूर्ण तफ्तीश और सरकार द्वारा न्यायालय में खाली पदों को न भरना भी एक कारण है। हमारी पुलिस कानून व्यवस्था और शिकायतों को निपटाने में सफल नहीं रही है जहां कोर्ट केसेस में वकील डेट लेकर मामले को लटकाते है पुलिस और अन्य जांच एजेंसियांभी पीछे नहीं है चार्ज शीट समय पर फाइल न करना या प्रॉसिक्यूशन का समय पर उपस्थित न होना बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के कारण है। इसकाअन्य कारण पुलिस विभाग में स्टाफ की संख्या में भारी कमी है।

जो भी पुलिस बल हमारे पास उपलब्ध है वह कानून व्यवस्था और मुकदमों को निपटने के बजाय, भारी संख्या में वीआईपी सुरक्षा में तैनात रहती है क्योंकि सुरक्षा रखना अब नेताओं और बाहुबलियों के लिए आवश्यकता नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल बन गया है, मैंने स्वयंअनुभव किया है कि कुछ ऐसे नेता हैं जो उम्र 80 या 90 के पड़ाव में पहुंच चुके हैंऔर जिन्हें यमराज के अलावा किसी और से कोई डर नहीं है पर वह भी वाई प्लस और जेड प्लस कैटेगरी की सुरक्षा रखते हैं सरकार को चाहिए कि अब नेताओं और बाहुबलियों को दी जाने वाली सुरक्षा का रिव्यू करें और अनावश्यक सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों को हटा कर पुलिस कर्मियों को कानून व्यवस्था अपराध रोकने और प्रॉसिक्यूशन जैसे कामों में लगाया जाए। जिससे न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या में कमी लाई जा सके।

चाहे चाहे फिल्म उद्योग हो या मीडिया का अन्य साधन हो न्यायपालिका के साथ-साथ पुलिस और जनप्रतिनिधियों को सदैव भ्रष्टाचार में लिप्त ही दिखाई जाता है परंतु कभी भी इस तरह की फिल्मों या साहित्य पर रोक नहीं लगाई जाती, सेंसर बोर्ड इन फ़िल्मों को कैसे पास कर देता है यह समझ से परे है। जहां तक पुलिस का सवाल है कोई भी सभ्य आदमी यह नहीं चाहता की कोई वर्दी धारी पुलिस वाला उनके घर आए, मेरे एक दोस्त जो पुलिस अधिकारी है वे मेरी एक पुस्तक के लोकार्पण के सिलसिले में मेरे पास आना चाहते थे, परंतु वे पहलेऑफिस से अपने घर गए और यूनिफार्म बदल करमेरे पास आएऔर पूछने पर कहने लगे कि आजकल हमारी इमेज इतनी खराब हो गई है की कोई भी शरीफ आदमी यह नहीं चाहता कि कोई पुलिस वाली पुलिस वाला वर्दी पहनकर उनके घर आए। यह ठीक है कि जीवन के हर पक्ष से भ्रष्टाचार से मुक्ति होनी चाहिए परंतु किसी पक्ष विशेष चाहे वह पुलिस हो चाहे न्यायालय हो चाहे हमारे जनप्रतिनिधि हो उनकी इमेज को भ्रष्ट या अनैतिक दिखाना समाज के लिए ठीक नहीं है। जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार में या अनाचार में लिप्त पाया जाए उसे पर तुरंत से तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए परंतु एक व्यक्ति के कारण उसे पूरे समाज को भ्रष्टाचार या अनाचार में लिप्त नहीं माना जाना चाहिए, इस तरह कीबनाई गई इमेज पूरे समाजको बर्बाद कर देती है इस कारण जो एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका को भ्रष्ट कह कर 12-14 साल के उम्र के बच्चों के दिमाग में यह बिठा देना कि देश की न्यायपालिका भ्रष्ट है बिल्कुल ही अनुचित है।

एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायालय के भ्रष्ट होने का जो पाठ छप गया था यदि वह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कीछवि खराब करने के लिए किया गया है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैक्यूंकि भारत की न्यायपालिका विश्व की गिनी चुनी न्यायपालिकाओं में से एक है जिसके विषय में यह माना जाता है कि राजनीति या अन्य शक्तियों से प्रभावित नहीं होती पर यह भी आवश्यक है कि न्यायालय को भ्रष्ट और सुस्त वाली छवि से उबारने के लिए स्टीरियोटाइप वर्किंग से मुक्ति पानी होगी न्यायालय को यह देखना होगा की वही लोग जेल में डाले जाएं जिनको जेल में डालना आवश्यक हो और न्यायालय में न्याय के आशा में आए लोगों को तारीख पर तारीख नहीं मिलनी चाहिए इससे लोगों में न्यायपालिका के प्रति आस्था में वृद्धि होगी और दशकों को सेलंबित मुकदमों संख्या में कमी आएगी।

कुछ वर्षों पूर्व एक फिल्म क्रांतिवीर आई थी जिसमें नेता, पुलिस, जज, भूमाफिया सभी को भ्रष्टाचार में लिप्त व गरीबों का अमानवीय शोषण करने वाला दिखाया गया था निश्चय ही जनमानस के बीच सभी की नकारात्मक छवि अनुचित है और हम सभी का कर्त्तव्य बनता है कि लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों की छवि को धूमिल होने से बचाया जाए।

यह निर्विवाद सत्य है कि भ्रष्टाचार में लिप्त में कुछ लोगों के आ जाने से देश की न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है और 30 -40 साल तक न्याय न्याय के लिए भटकते लोगों। को न्याय न मिलने के कारण न्यायपालिका की क्षमता पर भी सवाल उठने लगे है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी लोग न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायालय का ही दरवाजा खटखटाना में विश्वास करते हैं और ऐसे में न्यायपालिका के बारे में जूनियर कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में भ्रामक बातें लिखना और स्कूल जाने वाले बच्चों के मन में न्यायपालिका व अन्य संस्थाओं के बारे में भ्रम पैदा करना अत्यंत गंभीर है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

सोमवार, 2 मार्च 2026

ईरान पर अमरीकी हमलों पर OIC की चुप्पी तो देखो

विवेक शुक्ला
मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर रमजान की रौनक अपने चरम पर थी। मीनारा मस्जिद के आसपास की गलियों में खरीददारों की भीड़ उमड़ रही थी। इसी हलचल के बीच एक होटल में बैठे कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार और कारोबारी गहरी चिंता के साथ मुस्लिम देशों के संगठन, Organisation of Islamic Cooperation (ओआईसी), की निष्क्रियता पर चर्चा कर रहे थे। उनका सवाल सीधा था—अमरीका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भी ओआईसी की आवाज़ इतनी धीमी क्यों है?
57 मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने वाला यह संगठन अक्सर फिलिस्तीन जैसे मुद्दों पर मुखर रहता है, प्रस्ताव पारित करता है और कड़े बयान जारी करता है। लेकिन जब मामला ईरान जैसा प्रभावशाली और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में अहम देश हो, तब उसकी प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत नरम क्यों दिखाई देती है? यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक जटिलताओं से जुड़ा है।
अमरीका और ईरान के बीच तनाव कोई नया अध्याय नहीं है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से दोनों देशों के संबंधों में अविश्वास और टकराव बना हुआ है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, उस पर लगाए गए प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में उसकी बढ़ती भूमिका ने इस तनाव को और गहरा किया है। जब भी हालात बिगड़ते हैं, पूरी दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र पर टिक जाती हैं। ऐसे समय में उम्मीद की जाती है कि इस्लामिक देश एकजुट होकर शांति, संवाद और न्याय की वकालत करेंगे। पर व्यवहार में तस्वीर अधिक जटिल दिखती है।
ओआईसी का गठन मुस्लिम देशों के बीच सहयोग, एकता और साझा हितों की रक्षा के उद्देश्य से हुआ था। सिद्धांततः यदि किसी सदस्य देश पर संकट आए तो बाकी देश उसका समर्थन करें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी आवाज़ बनें। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में यह संगठन अक्सर औपचारिक बयानों तक सीमित रह जाता है। ईरान के मामले में भी कई देशों ने सावधानी भरे वक्तव्य दिए, कुछ ने चुप्पी साध ली, और कुछ ने अप्रत्यक्ष रूप से अमरीकी रुख के प्रति सहमति जताई।
इस विभाजन के पीछे सबसे बड़ी वजह मुस्लिम दुनिया के भीतर मौजूद वैचारिक और रणनीतिक मतभेद हैं। पश्चिम एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रभाव की प्रतिस्पर्धा रही है। एक ओर शिया नेतृत्व वाला ईरान है, तो दूसरी ओर सुन्नी बहुल खाड़ी देश। यह प्रतिस्पर्धा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभुत्व, सुरक्षा और राजनीतिक प्रभाव से भी जुड़ी है। परिणामस्वरूप, किसी भी सामूहिक मंच पर सर्वसम्मति बनाना कठिन हो जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण कई मुस्लिम देशों के अमरीका के साथ गहरे आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। खाड़ी देशों की सुरक्षा संरचना काफी हद तक अमरीकी सैन्य सहयोग पर आधारित है। ऊर्जा व्यापार, हथियार सौदे और निवेश संबंध भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में वे खुलकर अमरीका की आलोचना करने से बचते हैं। उनकी प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों और आंतरिक स्थिरता की रक्षा करना होती है। इस यथार्थवादी दृष्टिकोण के कारण वे ईरान के समर्थन में आक्रामक रुख अपनाने से हिचकते हैं।
इसके अलावा, कुछ अरब देशों का मानना है कि क्षेत्रीय तनाव के लिए ईरान की नीतियाँ भी जिम्मेदार रही हैं। यमन, सीरिया और इराक में उसकी सक्रियता को लेकर कई देशों में असंतोष है। इसलिए वे इस टकराव को केवल “मुस्लिम देश बनाम अमरीका” के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में आंकते हैं। यही सोच ओआईसी के भीतर साझा बयानबाज़ी को सीमित कर देती है।
ओआईसी की कार्यप्रणाली भी एक बाधा है। संगठन अक्सर सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय प्रक्रिया अपनाता है। जब सदस्य देशों के हित, गठबंधन और प्राथमिकताएँ अलग-अलग हों, तब कठोर और स्पष्ट निर्णय लेना कठिन हो जाता है। कई बार तीखे शब्दों वाले प्रस्ताव पारित तो हो जाते हैं, लेकिन उनके अनुपालन या ठोस कूटनीतिक कदमों का अभाव रहता है। इससे संगठन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
दूसरी ओर, आम मुस्लिम समाज की अपेक्षाएँ अलग हैं। वे चाहते हैं कि इस्लामिक देश अन्याय या बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ एकजुट स्वर में बोलें। सोशल मीडिया पर भी यह भावना दिखाई देती है कि कम से कम कूटनीतिक स्तर पर मजबूत और स्पष्ट रुख अपनाया जाना चाहिए था। लेकिन सरकारें भावनात्मक आवेगों की बजाय रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा गणनाओं के आधार पर निर्णय लेती हैं।
इस स्थिति का व्यापक प्रभाव भी है। यदि 57 देश सचमुच एक मंच पर संगठित होकर बोलें, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव काफी बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर वे एक मजबूत दबाव समूह बन सकते हैं। पर आपसी अविश्वास और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण यह संभावना अक्सर साकार नहीं हो पाती।
यह भी सच है कि केवल धार्मिक या भावनात्मक एकता से जटिल अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान नहीं होता। मुस्लिम देशों के बीच आर्थिक असमानताएँ, शासन प्रणालियों में अंतर, सुरक्षा चुनौतियाँ और बाहरी शक्तियों के साथ अलग-अलग रिश्ते हैं। जब तक इन अंतर्विरोधों को स्वीकार कर संवाद और सहयोग की दिशा में ठोस प्रयास नहीं होंगे, तब तक किसी भी बड़े संकट पर एकजुट प्रतिक्रिया की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।
अमरीका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने एक बार फिर इस्लामिक दुनिया की आंतरिक सीमाओं को उजागर किया है। Organisation of Islamic Cooperation के सामने चुनौती यही है कि वह केवल औपचारिक वक्तव्यों तक सीमित न रहे, बल्कि सदस्य देशों के बीच भरोसा, पारदर्शिता और साझा रणनीति विकसित करे। यदि इस्लामिक देश वैश्विक मंच पर प्रभावशाली भूमिका निभाना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मतभेद कम कर व्यापक सामूहिक हितों को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा हर बड़े संकट में उनकी बंटी हुई प्रतिक्रिया निराशा को ही जन्म देती रहेगी।

जब कश्मीर के मसले पर ईरान भारत के साथ खड़ा था

विवेक शुक्ला
अब जब अमरीका ने ईरान के खिलाफा जंग छेड़ी हुई है और इस मौके पर भारत साफ तौर पर अमरीका के साथ खड़ा नजर आ रहा तब 1994 की एक घटना को याद करना जरूरी है। उस समय भारत के प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने अपने विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजने का फैसला किया — जबकि दिनेश सिंह एम्स में भर्ती थे और स्ट्रोक के बाद बेहद कमजोर हालत में थे। सवाल उठता है, आखिर इतनी क्या मजबूरी थी कि बीमार मंत्री को अस्पताल से सीधा ईरान भेजा गया?
मामला क्या था? - मार्च 1994 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही थी। पाकिस्तान, इस्लामी देशों के संगठन OIC के कई देशों के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाना चाहता था। अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता, तो मामला आगे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक जा सकता था — जो भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक मुश्किल बन सकता था।
ईरान क्यों अहम था? विदेश मामलों के जानकार और हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में कूटनीति पर लिखते रहे अरुण कुमार उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि OIC में आमतौर पर फैसले सहमति (कंसेंसस) से होते हैं। अगर कोई बड़ा देश जैसे ईरान साथ न दे, तो सहमति टूट जाती है और प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाता।
यहीं पर ईरान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई। भारत चाहता था कि ईरान इस प्रस्ताव का समर्थन न करे।

बीमार दिनेश सिंह को ही क्यों भेजा गया? - दिनेश सिंह उस समय स्ट्रोक से उबर रहे थे और दिल्ली के एम्स में इलाज चल रहा था। फिर भी राव ने उन्हें ही भेजने का फैसला किया, क्योंकि वे खुद विदेश मंत्री थे, उनका कद और साख ज्यादा थी। ईरान को यह दिखाना जरूरी था कि भारत इस मुद्दे को कितना गंभीर मान रहा है। अगर कोई जूनियर मंत्री जाता, तो उतना असर शायद नहीं होता। एक बीमार, व्हीलचेयर पर आए वरिष्ठ मंत्री का जाना अपने आप में एक मजबूत संदेश था। 

ईरान में क्या हुआ? - दिनेश सिंह का काम था प्रधानमंत्री राव का निजी संदेश ईरान के राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफ़संजानी तक पहुँचाना। उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अली अकबर वेलायती से भी सीधे बात की। बताया जाता है कि ईरानी नेतृत्व उनके स्वास्थ्य की हालत देखकर हैरान रह गया — और इससे भारत की गंभीरता का अंदाज़ा उन्हें साफ हो गया। मिशन कुछ घंटों का ही था। दिनेश सिंह सीधे वापस भारत लौटे और फिर अस्पताल चले गए।

नतीजा क्या निकला? - आखिरकार ईरान ने उस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। OIC में सहमति नहीं बन पाई और पाकिस्तान की कोशिश कमजोर पड़ गई। जिनेवा में भारत एक बड़ी कूटनीतिक हार से बच गया। इस तरह, राव का यह फैसला — भले ही जोखिम भरा था — लेकिन उस समय की परिस्थितियों में बेहद अहम और सफल साबित हुआ।

सीधी भाषा में कहें तो, राव ने दिनेश सिंह को इसलिए भेजा क्योंकि दांव बहुत बड़ा था। भारत को हर हाल में उस प्रस्ताव को रुकवाना था, और इसके लिए सबसे मजबूत संदेश भेजना जरूरी था — चाहे उसके लिए बीमार विदेश मंत्री को ही क्यों न जाना पड़े। जाने माने आई सर्जन डॉक्टर राजवर्धन आजाद बताते हैं कि वे तब एम्स में ही थे जब दिनेश सिंह अस्पताल से एक खास मिशन के चलते ईरान गए थे। उन्हें इस मामले की जानकारी दिनेश सिंह के फिर अस्पताल में लौटने पर मिली थी।
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