गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

त्रिपुरा निकाय चुनाव के संदेश समझें भाजपा विरोधी

अवधेश कुमार

त्रिपुरा के स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा की जबरदस्त विजय ने विपक्ष के साथ पूरे देश को चौंकाया है। पश्चिम बंगाल में भारी विजय के पश्चात ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने त्रिपुरा को जिस दिन से अपनी दूसरी प्रमुख राजनीति का केंद्र बिंदु बनाया था और पूरी आक्रामकता से वहां सदस्यता अभियान व चुनाव प्रचार अभियान चल रहा था उससे लगता था कि वहां भाजपा को अच्छी चुनौती मिलेगी। चुनाव परिणामों ने इसे गलत साबित किया है। राजधानी अगरतला नगर निगम सहित कुल 24 नगर निकायों के चुनाव हुए। इनके 334 वार्डों में से भाजपा ने 329 पर विजय प्राप्त की। किसी भी पार्टी की इससे अच्छी सफलता कुछ हो ही नहीं सकती। तृणमूल कांग्रेस को पूरे चुनाव में केवल एक सीट प्राप्त हुआ । पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद से पूरे देश में माहौल बनाया गया था कि भाजपा के पराभव के दौर की शुरुआत हो चुकी है और कम से कम पूर्वोत्तर में तृणमूल उसे पटखनी देने की स्थिति में आ गई है । ऐसा नहीं हुआ तो निश्चित रूप से विचार करना पड़ेगा कि राजनीति में भाजपा के विरुद्ध जिस तरह के विरोधी वातावरण या माहौल की बात की जाती है वैसा हो क्यों नहीं पाता ? 

तृणमूल कांग्रेस कह रही है कि वह अपने प्रदर्शन से संतुष्ट है क्योंकि बहुत ज्यादा दिन उसकी पार्टी के त्रिपुरा में आए नहीं हुए और वह मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरी है। यह बात सही है कि उसने वहां माकपा को स्थानापन्न कर भाजपा के बाद दूसरा स्थान प्राप्त किया है। बावजूद दोनों के बीच मतों में इतनी दूरी है जिसमें यह कल्पना करना व्यवहारिक नहीं लगता कि 2023 के चुनाव आते-आते उसे पाट दिया जाएगा। यह बात सही है कि अनेक बार विधानसभा या लोकसभा के चुनाव परिणाम स्थानीय निकाय के चुनाव परिणामों से बिल्कुल अलग होते हैं। तो अभी 2023 के बारे में किसी प्रकार की भविष्यवाणी उचित नहीं होगी। लेकिन यह स्वीकार करना पड़ेगा कि त्रिपुरा के स्थानीय निकाय चुनाव को न केवल तृणमूल कांग्रेस बल्कि संपूर्ण देश के भाजपा विरोधियों ने बड़े चुनाव के रूप में परिणत कर दिया था। बांग्लादेश में हिंदुओं और हिंदू स्थलों पर हिंसात्मक हमले के विरुद्ध प्रदर्शन के दौरान हुई छोटी सी घटना को जिस तरह बड़ा बना कर प्रचारित किया गया उसका उद्देश्य बिल्कुल साफ था। मामला सोशल मीडिया से मीडिया और न्यायालय तक भी आ गया। पूरा वातावरण ऐसा बनाया गया मानो त्रिपुरा की भाजपा सरकार के संरक्षण में हिंदुत्ववादी शक्तियां वहां अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा कर रही है और पुलिस या स्थानीय प्रशासन उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। त्रिपुरा सरकार की फासिस्टवादी छवि बनाने की कोशिश हुई। इसमें भाजपा के विरुद्ध माहौल बनाने की रणनीति साफ थी। दूसरी और तृणमूल कांग्रेस लगातार भाजपा शासन में उनके कार्यकर्ताओं पर हमले व अत्याचार का आरोप लगा रही थी। इससे त्रिपुरा के बारे में कैसी तस्वीर हमारे आपके मन में आ रही थी यह बताने की आवश्यकता नहीं। कल्पना यही थी कि त्रिपुरा में भी पश्चिम बंगाल दोहराया जा सकता है।

वास्तव में पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद अबी तक विपक्ष की कल्पना वैसे ही लगती है जैसे कांग्रेस ने 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव में विजय के बाद मान लिया कि भाजपा पराभव की ओर है तथा राहुल गांधी के नेतृत्व में उसका पूनरोदय निश्चित है। 2019 लोकसभा चुनाव परिणामों ने इस कल्पना को ध्वस्त कर दिया। पश्चिम बंगाल संपूर्ण हिंदुस्तान नहीं है। जरा सोचिए, अगर त्रिपुरा जैसा पड़ोसी छोटा राज्य पश्चिम बंगाल की राजनीतिक 

 का अंग नहीं बना तो पूरा देश कैसे बन जाएगा? वैसे तृणमूल कांग्रेस का यह कहना गलत है कि कुछ ही महीने पहले वह त्रिपुरा में आई थी। सच यह है कि पार्टी की स्थापना के साथ ही ममता बनर्जी ने बंगाल के बाद अपनी राजनीतिक गतिविधियों का दूसरा मुख्य केंद्र बिंदु त्रिपुरा को ही बनाया था। 

सच कहें तो त्रिपुरा निकाय चुनाव भाजपा विरोधी राजनीतिक गैर राजनीतिक सभी समूहों व व्यक्तियों के लिए फिर से एक सीख बनकर आया है। वे इसे नहीं समझेंगे तो ऐसे ही समय-समय पर भाजपा के खत्म होने की कल्पना में डूबते और परिणामों में निराश होते रहेंगे। पश्चिम बंगाल का राजनीतिक वातावरण ,सामाजिक- सांप्रदायिक समीकरण अलग है। करीब 30% मुस्लिम मतदाता और विचारों से वामपंथी सोच वाले जनता के एक बड़े समूह के रहते हुए भाजपा के लिए बंगाल में संपूर्ण विजय आसान नहीं है। वहां भाजपा को मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक फासिस्टवादी  बताने का असर मतदाताओं पर होगा । इनमें से एक वर्ग भाजपा के विरुद्ध आक्रामक होकर मतदान में काम करेगा । ऐसा सब जगह नहीं हो सकता । उसमें भी तृणमूल कांग्रेस के शासन में पुलिस प्रशासन की भूमिका वहां चुनाव परिणाम निर्धारण का एक प्रमुख कारक थी। निष्पक्ष विश्लेषक मानते हैं कि बंगाल में तृणमूल सत्ता में नहीं होती तो परिणाम इसी रूप में नहीं आता।

भारत में ऐसे अनेक राज्य हैं जहां भाजपा के विरुद्ध यही प्रचार उसके पक्ष में जाता है। आप एक समूह को भाजपा के विरुद्ध बताते हैं तो दूसरा बड़ा समूह एकमुश्त होकर उसके पक्ष में खड़ा हो जाता है। विरोधी जैसा माहौल बनाते हैं जमीनी हालत वैसी नहीं होती और आम जनता की प्रतिक्रिया विरोधियों के विरुद्ध ही होती है । ऐसा संपूर्ण भारत में जगह-जगह देखा गया है। लेकिन भाजपा विरोध की अतिवादी मानसिकता वाली पार्टिया, नेता, समूह ,एक्टिविस्ट, व्यक्ति पता नहीं क्यों इसे समझ नहीं पाते । जो सच है नहीं उसे आप सच बता कर अतिवादी तस्वीर के साथ प्रचारित करेंगे तो वही लोग इससे प्रभावित होंगे जिनको हकीकत नहीं पता या जो मानसिकता से भाजपा विरोधी हैं। आम जनता खासकर स्थानीय लोग ऐसे दुष्प्रचारों से प्रभावित नहीं होंगे । निश्चित रूप से त्रिपुरा में ऐसा हुआ है। आप प्रचारित कर रहे हैं कि हिंदुओं के जुलूस ने मस्जिदों और  मुसलमानों पर हमला किया ,तोड़फोड़ की और वहां की मीडिया ने बताया बता दिया कि यह सच नहीं है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो गलत साबित हुआ । इसके विरुद्ध स्थानीय जनता की प्रतिक्रिया होगी और जनता ने अपनी प्रतिक्रिया मतदान के जरिए सामने रख दिया। आप उससे सीख लेते हैं या नहीं लेते हैं यह आप पर निर्भर है।

जाहिर है , विरोधियों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। हालांकि वे करेंगे नहीं । दूसरे ,इससे यह भी धारणा गलत साबित हुई है कि जमीनी वास्तविकता के परे केवल हवा बनाने या माहौल बनाने से चुनाव जीता जा सकता है। आप सोचिए न, 334 सीटों में से 25 नवंबर को 222 पर मतदान हुआ जिनमें से 217 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की। निकाय चुनाव परिणाम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि 112 स्थानों पर भाजपा प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हुए। इसका मतलब यही है कि बाहर भले आप माहौल बना दीजिए कि भाजपा खत्म हो रही है और तृणमूल कांग्रेस  उसकी जगह ले रही है , जमीन पर ऐसा नहीं था। अगर जमीन पर तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस या माकपा का ठोस आधार होता तो कम से कम उम्मीदवार अवश्य खड़े होते। स्थानीय चुनाव में आम लोगों का दबाव भी काम करता है। कोई पार्टी कमजोर हो तो फिर उसके लोग भी दबाव में आ जाते हैं। उन्हें लोग कहते हैं कि आपका वोट है नहीं तो फलां को जीतने दीजिए और उन्हें मानना पड़ता है। वे चुनाव में खड़े नहीं होते या खड़े हैं तो बैठ जाते हैं । तो त्रिपुरा निकाय चुनाव का निष्कर्ष यह है कि भाजपा विरोधी उसके विरुद्ध वास्तविक मुद्दे सामने लाएं और परिश्रम से अपना जनाधार बढ़ाएं तभी उसे हर जगह चुनौती दी जा सकती है। सांप्रदायिकता, फासीवाद आदि आरोप अनेक बार बचकाने वा हास्यास्पद ही नहीं विपक्ष के लिए आत्मघाती भी साबित हो चुके हैं। भाजपा ने इन सारे प्रचारों और विरोधों का जिस तारहसभधे हुए तरीके से सामना किया तथा जमीन पर सुनियोजित अभियान चलाया उसमें भी विरोधियों के लिए स्पष्ट संकेत निहित हैं।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली - 110092, मोबाइल - 98110 27208



शनिवार, 4 दिसंबर 2021

मनीष तिवारी की पुस्तक: मुंबई आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए थी

अवधेश कुमार

 एक वर्ष पूर्व अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की अ प्रोमिस्ड लैंड पुस्तक आई थी। इसमें उन्होंने लिखा कि मुंबई पर 26 नवंबर, 2008 के आतंकवादी हमलों के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान के विरुद्ध कार्रवाई करने से बच रहे थे। ठीक एक वर्ष बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी की पुस्तक 10 फ्लैश पॉइंट 20 वर्ष  में दूसरी भाषा में यही बात कही गई है। मनीष तिवारी ने मुंबई हमले की तुलना 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले से की है। उनका मानना है कि मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध कार्रवाई न करना आत्मसंयम का नहीं कमजोरी का प्रमाण था । मनीष तिवारी ने पुस्तक में यह बात क्यों लिखी है इसके बारे में हमारा आकलन हमारी अपनी सोच  पर निर्भर करेगा। वे इस समय कांग्रेस के अंदर बिक्षुब्ध गुट, जिसे जी23 कहा जाता है, के सदस्य हैं। इसलिए सामान्य निष्कर्ष यही हो सकता है कि उन्होंने पुस्तक के माध्यम से अपना क्षोभ प्रकट कर कांग्रेस नेतृत्व यानी सोनिया गांधी पर वार किया है क्योंकि मनमोहन सिंह उन्हीं की कृपा से प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि पुस्तक के जितने अंश बाहर आए हैं उसके अनुसार उनकी पंक्तियों में गुस्से का भाव ज्यादा नहीं झलकता। मूल प्रश्न तो यह है कि क्या मनीष ने जो लिखा है वह गलत है? इसका उत्तर आसानी से दिया जा सकता है और वह होगा नहीं। आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक तथा 2018  में बालाकोट हवाई बमबारी के द्वारा यह साबित कर दिया कि अगर आतंकवादी हमलों के बाद भारत इस तरह की कार्रवाई करता है तो पाकिस्तान  इसके प्रतिकार में किसी तरह युद्ध की सीमा तक नहीं जा सकता । 

भारतीय नीति निर्माताओं में एक समूह हमेशा ऐसा रहा है जो आतंकवादी हमले की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान के विरुद्ध किसी प्रकार की प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से बचने की सलाह देता है। इसके पीछे कई तर्क होते हैं। इनमें सबसे सबल तर्क यही होता है कि उसके पास नाभिकीय हथियार हैं और एक गैर जिम्मेदार राष्ट्र उसका कभी भी प्रयोग कर दे सकता है। नरेंद्र मोदी ने अपनी दो कार्रवाइयों से इस मिथक को ध्वस्त कर दिया। पाकिस्तान के मंत्री अवश्य बयान देते रहे कि हमने न्यूक्लियर वेपन फुलझड़ीयों के लिए नहीं रखा है, हमारे पास छोटे-छोटे ढाई सौ किलोग्राम से लेकर बड़े बम है लेकिन वह प्रयोग को छोड़िए भारत की कार्रवाई के बाद धमकी तक देने का साहस नहीं कर सका। हमारा एक जवान, जो उनके कब्जे में आया था गया, उसे भी सम्मानपूर्वक उन्हें रिहा करना पड़ा। उदाहरण बताता है कि  नेतृत्व साहस करें और उसके पीछे संकल्पबद्धता का संदेश हो तो पाकिस्तान को आतंकवादी हमलों के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई चुपचाप सहन करनी पड़ेगी। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके नौकरशाहों में से कुछ ने सैन्य कार्रवाई से बचने की सलाह नहीं दी होगी। लेकिन निर्णय तो अंततः राजनीतिक नेतृत्व को ही करना पड़ता है। उसकी सूझबूझ, सुरक्षा परिदृश्य की संपूर्ण समझ, अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का सही आकलन, साहस और संकल्प पर निर्भर करता है।

 यह तो संभव नहीं कि मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध कार्रवाई पर चर्चा नहीं हुई हो। तत्कालीन वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने कहा है कि हमने सरकार को हवाई हमले का प्रस्ताव दिया था लेकिन अनुमति नहीं मिली। उनके अनुसार हमारे पास पाकिस्तान में आतंकवादी शिविरों के बारे में जानकारी थी और हमला करने के लिए हम तैयार थे। केवल सरकार की अनुमति चाहिए थी। उपवायु सेना प्रमुख बी के बार्बोरा भी इसके लिए तैयार होने की बात स्वीकार करते हैं। तत्कालीन विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने कहा था कि हमने तत्काल ऐसा बदला लेने के लिए थोड़ा दबाव दिया था जो दिखाई दे। हमने तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह से इसके लिए बात की। लेकिन उन लोगों ने इसे उचित नहीं माना।उनके अनुसार निर्णयकर्ताओं का निष्कर्ष  था कि पाकिस्तान पर हमला नहीं करने का लाभ ज्यादा मिलेगा। इसके बाद अलग से कोई निष्कर्ष निकालने की आवश्यकता नहीं कि उस दौरान सरकार के शीर्ष स्तर पर कैसी सोच थी। ऐसा भी नहीं है कि उस हमले को लेकर खुफिया इनपुट नहीं था। तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने कहा था कि आईबी और रॉ मुंबई हमले के पहले ऐसे हमले का पूर्वानुमान लगा रही थी। हमारे पास इस तरह की सूचनाएं भी आ रही थी कि ताज होटल या ऐसे दूसरे जगहों पर हमला हो सकता है, उसे बंधक बनाया जा सकता है। उनके अनुसार हमारी असली विफलता यह थी कि हमने यह किस तरह का हमला होगा इसका आकलन नहीं किया या ऐसे नहीं समझा।इसका मतलब यह भी हुआ कि पाकिस्तान की ओर से आतंकवादी हमलों की मोटा-मोटी जानकारी थी। एम के नारायणन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बिल्कुल सटीक जानकारी नहीं थी। 

सुरक्षा पहलुओं पर काम करने वाले जानते हैं कि खुफिया इनपुट में बिल्कुल सटीक जानकारियां शायद ही होती हैं। अंदेशा होता है समभाव अंदेशा संभावनाएं कुछ सूचनाएं होती हैं और उनके आधार पर उसका आकलन करना पड़ता है कि क्या हो सकता है। इस तरह यह उच्च स्तर पर सुरक्षा विफलता भी थी। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके रणनीतिकार दूरदर्शी होते तो अवश्य आगे कुछ ऐसे कदम उठाते जिनसे देश का वातावरण बदलता एवं विफलता से ध्यान भी हटता।स्वाभाविक ही बाद में चर्चा केवल प्रतिकार आत्मक सैन्य कार्रवाई की होती। मुंबई हमला  भारत में सबसे बड़ा आतंकवादी हमला था । यह सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता को चुनौती देना था। 10 आतंकवादी बाजाब्ता समुद्री मार्ग से मुंबई में घुसे और सरेआम उन्होंने गोलियां चलानी शुरू की। करीब 60 घंटे तक सुरक्षाबलों को उनसे युद्ध करना पड़ा और इस दौरान हम जानते हैं कि क्या हुआ। यह ठीक है कि भारत ने लगातार विश्व समुदायके बीच पाकिस्तान के विरुद्ध वातावरण बनाया, उस पर हमले के साजिशकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई के लिए दबाव भी बना। उसमें अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, इजरायल आदि के नागरिक भी मारे गए थे इसलिए उन देशों का भी दबाव था। बावजूद सच यही है कि आज तक पाकिस्तान में दोषियों के विरुद्ध जैसी कार्रवाई होनी चाहिए नहीं हुई। भारत डोजियर पर डोजियर सौंपता रहा और पाकिस्तान की ओर से कई बार इसका कह कर उपहास उड़ाया गया कि यह तो उपन्यास की कथाओं की तरह है। अगर भारत कार्रवाई करता  तो ऐसी नौबत नहीं आती। एक स्वाभिमानी राष्ट्र इस तरह के हमलों का जवाब केवल कूटनीतिक राजनयिक लक्ष्मी तरह कर नहीं दे सकता। 

भारत को अमेरिका की तरह पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध नहीं छेड़ना था लेकिन सीमित स्तर पर कार्रवाई न करने से भारत के आम लोगों को निराशा हुई। सैटलाइट फोन की बातचीत पकड़ में आने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि हमलावरों को निर्देश तक सीमा पार से आ रहे थे तो फिर लक्षित सीमित सर्जिकल स्ट्राइक होनी ही चाहिए थी। उस हमले ने पूरे देश को सन्न कर दिया था। सात घंटे तक पूरे देश की धड़कनें मानों रुक गई थी। लेकिन हमारी ओर से किसी तरह का बदला नहीं लिया जाना देशवासियों के लिए आज भी  बना हुआ है। उड़ी हमले के बाद भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की और पाकिस्तान सेहमले के षड्यंत्रकारियों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए अनुनय विनय नहीं करना पड़ा। इसी तरह पुलवामा हमले के बाद बालाकोट हवाई बमबारी कर भारत ने अपने सामने केवल राजनयिक स्तर तक विकल्प रहने का की आवश्यकता छोड़ी ही नहीं। हालांकि भारत ने मुंबई हमले के बाद अपनी सुरक्षा व्यवस्था को काफी दुरुस्त किया, खुफिया तंत्र में भी व्यापक परिवर्तन हुआ और इस कारण अनेक संभावित हमले रोके ही गए होंगे।  उस समय कार्रवाई हो गई होती तो शायद परिदृश्य दूसरा होता और विश्व में भारत की एक स्वाभिमानी सशक्त राष्ट्र की छवि निर्मित होती और देश में उत्साह का वातावरण बनता। मुंबई हमले का सैनिक प्रतिकार न किया जाना हमेशा लोगों को चुभता रहेगा। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 98110 27208

गुरुवार, 25 नवंबर 2021

कृषि कानून वापसी के राजनीति के साथ दूसरे पहलू भी महत्वपूर्ण

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब राष्ट्र के नाम संबोधन की शुरुआत की तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वे तीनों कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा कर देंगे। आखिर जिस कानून को लेकर सरकार पिछले एक वर्ष से अड़ी हुई थी, साफ घोषणा कर रही थी कि वापस नहीं होंगे, कृषि कानून विरोधी आंदोलन के संगठनों के साथ बातचीत के बाद कृषि मंत्री ने स्पष्ट बयान दिया था, स्वयं प्रधानमंत्री ने संसद के संबोधन में आक्रामक रुख अख्तियार किया था उसकी वापसी की उम्मीद आसानी से नहीं की जा सकती थी। तो यह प्रश्न निश्चित रूप से उठेगा कि किन कारणों से प्रधानमंत्री ने यह निर्णय किया? इसके राजनीतिक मायने स्पष्ट हैं और सबसे ज्यादा चर्चा इसी की हो रही है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह स्वाभाविक भी है। ऐसा नहीं है कि पूरा देश इस कानून के विरुद्ध था। सच्चाई यही है कि देश का बहुसंख्य  किसान इन कानूनों के पक्ष में था। दिल्ली की सीमाओं पर कभी इतनी भीड़ जमा नहीं हुई या देश के अलग-अलग भागों से उतनी संख्या में लोग आंदोलन का समर्थन करने नहीं आए जिनके आधार पर कोई निष्कर्ष निकाले कि यह देशव्यापी मुद्दा है। इसका सरकार को भी पता था। उच्चतम न्यायालय ने इन कानूनों पर रोक लगा ही रखी थी। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी एवं उनके रणनीतिकारों को भी आभास था कि अगर वापसी की घोषणा हुई तो विपक्ष उपहास उड़ायेगा। बावजूद उन्होंने इसकी घोषणा की है तो राजनीति के साथ इसके दूसरे पक्षों को भी समझना होगा।

 यह बात सही नहीं लगती कि प्रधानमंत्री के फैसले के पीछे उत्तर प्रदेश चुनाव मुख्य कारण है। भाजपा के आंतरिक सर्वेक्षणों में कृषि कानूनों को लेकर उत्तर प्रदेश में व्यापक विरोध नहीं मिला। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में जरूर थोड़ा बहुत विरोध मिला लेकिन उससे चुनाव परिणाम बहुत ज्यादा प्रभावित होता इसकी रिपोर्ट नहीं थी। उत्तराखंड के तराई इलाके में असर था। हरियाणा में भी समस्या पैदा हो रही थी क्योंकि आंदोलन और संगठनों के लोग वहां कई जगहों पर हाबी थे। गठबंधन के साथी जेजेपी को भी समस्या थी किंतु यह भी साफ था कि  उन्होंने गठबंधन तोड़ा, सरकार गिरी तो आगामी चुनाव में उनको फिर से सफलता मिलने की निश्चिंतता नहीं है। कैप्टन अमरिंदर सिंह जब गृह मंत्री अमित शाह से मिले तो आंतरिक सुरक्षा के साथ पंजाब की राजनीति पर चर्चा हुई। कैप्टन अमरिंदर ने कहा भी अगर भाजपा कृषि कानूनों को वापस कर लेती है तो उनके साथ गठबंधन हो सकता है। कैप्टन के अनुसार कृषि कानूनों के पहले भाजपा को लेकर पंजाब में कोई समस्या नहीं थी। भाजपा अकाली गठबंधन इन्हीं कानूनों पर टूट चुका था और प्रधानमंत्री ने स्वयं अकाली दल की जिस ढंग से तीखी आलोचना की, उस पर वार किया उसके बाद पंजाब के अंदर भाजपा के लोगों को लगा कि अब पार्टी स्वतंत्र रूप से खड़ी हो सकती है। पंजाब के अंदर से भाजपा के नेताओं - कार्यकर्ताओं की यह शिकायत लंबे समय से थी कि अकाली उनको काम करने नहीं देते और यह गठबंधन पार्टी के लिए हमेशा नुकसानदायक रहा है। यहां तक कि नवजोत सिंह सिद्धू के भाजपा छोड़ने के पीछे एक बड़ा कारण अकाली से नाराजगी थी । पार्टी ने राज्य से फीडबैक लिया और यह निर्णय का एक कारण है। 

 अमरिंदर की नई पार्टी लोक कांग्रेस और भाजपा के बीच गठबंधन हो सकता है और अकाली दल के साथ आने को भी खारिज नहीं किया जा सकता। इससे कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों के लिए चुनौती खड़ी होगी। यद्यपि कैप्टन की पार्टी नयी है लेकिन उनका जनाधार कई क्षेत्रों में व्यापक है। आने वाले समय में इसके बाद उनके समर्थन में कांग्रेस के काफी नेता आ सकते हैं। कांग्रेस में इतनी अंदरूनी कलह है कि उसकी सत्ता में वापसी को लेकर कोई नेता आश्वस्त नहीं है। यहां से पंजाब में  नई राजनीति की शुरुआत हो सकती है। कांग्रेस के नेता चाहे इस पर जो भी बयान दें उनके लिए खतरा पैदा हो गया है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की क्षति को तो भाजपा ने रोका ही है हरियाणा का भी राजनीतिक वायुमंडल बदल लिया है। भाजपा की नजर 2024 के चुनाव पर भी है। कई बार माहौल विरोधियों को सरकार के विरुद्ध आक्रामक होने और व्यापक रूप से घेरेबंदी का आधार दे देता है । कृषि कानून पिछले चुनाव में बड़ा मुद्दा नहीं था। बावजूद इस आधार पर भाजपा विरोधियों ने पश्चिम बंगाल में उसके तथा विरुद्ध तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रचार किया ।ऐसे कई समूह जुट जाएं तो कई स्थानों पर भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते थे। यह राज्यों के चुनाव पर भी लागू होता है और लोकसभा पर भी। 

देखा जाए तो संपूर्ण विपक्ष, जिसमें राजनीतिक और गैरराजनीतिक दोनों शामिल है , सरकार को घेरने की बड़ी आधार भूमि कृषि कानूनों को बना चुका था।  अचानक यह छीन जाने से आगामी चुनाव के लिए सरकार विरोधी आक्रामक रणनीति बनाने के लिए सभी को नए सिरे से विचार करना पड़ेगा। जो नेता इस आंदोलन के कारण स्वयं को हीरो मान रहे थे उनके सामने भी कोई चारा नहीं होगा । राकेश टिकैत ने अवश्य कहा और संयुक्त किसान मोर्चा ने निर्णय किया कि संसद  में कानून निरस्तीकरण की प्रतीक्षा करेंगे  किंतु है समर्थन में ऐसा वर्ग भी  जो इस सीमा तक आंदोलन को खींचने के पक्ष में नहीं है।  अगर संयुक्त किसान मोर्चा आगे न्यूनतम गारंटी कानून एवं अन्य मांगों को लेकर आंदोलन को खींचने की कोशिश करते हैं तो उनका समर्थन कम होगा। प्रधानमंत्री ने समर्थन मूल्य के लिए समिति की भी घोषणा कर दी। इसके साथ अपील भी की है कि अब धरना दे रहे किसान घरों और खेतों को वापस चले जाएं । जाहिर है, इसको भी समर्थन मिलेगा और जो जिद परआएंगे उनका आधार कमजोर होगा।इस तरह राजनीति के स्तर पर यह कदम तत्काल भाजपा के लिए लाभदायक एवं  राजनीतिक - गैर राजनीतिक विपक्ष के लिए धक्का साबित होता दिख रहा है। विपक्ष की प्रतिक्रियाओं  में दम नहीं दिखता। सरकार ने कदम क्यों वापस लिया, पहले क्यो नहीं किया जैसै प्रश्न चुनाव में ज्यादा मायने नहीं रखते।

 किंतु इस मामले को राजनीति से बाहर निकल कर देखने की आवश्यकता है। केंद्र के पास पुख्ता रिपोर्ट है और कैप्टन अमरिंदर ने गृहमंत्री  से मुलाकात में इसको विस्तार से समझाया कि कैसे खालिस्तानी तत्व इस आंदोलन के माध्यम से सक्रिय होकर काम कर रहे हैं। पाकिस्तान उनको समर्थन दे रहा है ।  इस बीच इन तत्वों की सक्रियता विदेश के साथ देश में भी दिखी है। निर्णय के पीछे यह एक बड़ा कारण है।लोकतंत्र का आदर्श सिद्धांत कहता है कि कदम चाहे जितना उचित हो अगर उसका विरोध सीमित ही सही हो रहा है ,देश का वातावरण उससे प्रभावित होता है तो उसे वापस लेना चाहिए और भविष्य में वातावरण बनाकर फिर सामने आयें। इसे  आप रणनीति भी कह सकते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिपालन। हालांकि इससे उन लोगों को धक्का लगा है जो कानूनों को आवश्यक मानकर समर्थन में मुखर थे। सरकार को उन्हें भी समझाने में समय लगेगा।  निर्णयों में  हमेशा दूसरा पक्ष होता है।सरकार दूसरे पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर सकती। मोदी ने अपने संबोधन में कहा भी कि वे देश से माफी मांगते हैं क्योंकि वे कुछ किसानों को कानून की अच्छाइयां समझा नहीं सके। वैसे सच यही है कि आंदोलन में ऐसे तत्व हावी हो गए थे जो जानते हुए भी समझने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि उनका एजेंडा बिल्कुल अलग था। उन्हें कृषि कानूनों से ज्यादा मोदी सरकार के विरुध्द वातावरण बनाने में रुचि थी थी और है ।  ये चाहते हैं कि सरकार को बल प्रयोग करना पड़े, कुछ हिंसा, अशांति हो और उन्हें सरकार विरोधी देशव्यापी माहौल बनाने में सहायता मिले। मोदी ने इस संभावना और इससे उत्पन्न होने वाले संभावित खतरे को  खत्म करने की कोशिश की है। सरकार की जिम्मेवारी  ऐसे तत्वों से देश को बचाना भी है। हालांकि सरकार ने कोशिश की होती तो आंदोलन खत्म हो चुका होता, तंबू उखड़ चुके होते। पता नहीं किस सोच के तहत एक छोटे से फोड़े को नासूर बनने दिया गया और  जिन कृषि कानूनों  की मांग वर्तमान विपक्ष के अनेक दल स्वयं करते रहे हैं ,उन्होंने स्वयं इसकी पहल की उसे वापस लेने का दुखद कदम उठाना पड़ा है। यह उन लोगों के लिए भी सबक है जो समस्याओं के निपटारे के लिए साहसी कदमों के समर्थक हैं। ऐसे लोग  इस लंबे धरने के विरुद्ध सड़कों पर उतरते तो सरकार के सामने कृषि कानूनों को बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता।  ऐसे लोगों को भविष्य की तैयारी करनी चाहिए ताकि उनकी दृष्टि में अच्छा कोई कदम वापस लेने की नौबत नहीं आए।

 अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव कंपलेक्स, दिल्ली 110092 मोबाइल 98110 27 208



गुरुवार, 18 नवंबर 2021

इस हिंसा को गंभीरता से लेना जरूरी

अवधेश कुमार

महाराष्ट्र के कई शहरों की डरावनी हिंसा ने फिर देश का ध्यान भारत में बढ़ रहे कट्टरपंथी तंजीमों की ओर खींचा है। 12 नवंबर को मुस्लिम समुदाय के अलग-अलग संगठनों द्वारा आयोजित जुलूस, धरने व रैलियों से कुछ समय के लिए हिंसा का जैसा कोहराम मचा सामान्यतः उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। देशभर में अलग-अलग संगठन समय-समय पर अपनी मांगों के समर्थन में या किसी घटना पर धरना, प्रदर्शन, रैली, जुलूस आदि के रूप में विरोध जताते हैं। अपने मुद्दों पर प्रशासन की अनुमति तथा उनके द्वारा निर्धारित मार्ग एवं समय सीमा में किसी को भी धरना प्रदर्शन करने का अधिकार है।  अगर प्रदर्शन लक्षित हिंसा करने लगे और उसके पीछे कोई तात्कालिक उकसाने वाली घटना नहीं हो तो मानना चाहिए कि निश्चय ही सुनियोजित साजिश के तहत सब कुछ हो रहा है। महाराष्ट्र में वैसे तो अनेक जगह मुस्लिम संस्थाओं व संगठनों के आह्वान पर विरोध प्रदर्शन आयोजित हुए लेकिन अमरावती, नांदेड़, मालेगांव, भिवंडी जैसे शहर हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार हुए। अमरावती में कर्फ्यू तक लगाना पड़ा।

 हिंसा की थोड़ी भी गहराई से विश्लेषण करेंगे तो साफ दिख जाएगा की वह अचानक या अनियोजित नहीं था । उदाहरण के लिए अमरावती में पुराने कॉटन मार्केट चौक में पूर्व मंत्री जगदीश गुप्ता के किराना प्रतिष्ठान पर पत्थरों से हमला हुआ। हमलावरों को मालूम था कि यह किसका प्रतिष्ठान है। पुराने वसंत टॉकीज इलाके मे जिन प्रतिष्ठानों व दुकानों पर हमले हुए वे सब हिंदुओं के थे। पूर्व मंत्री व विधायक प्रवीण पोटे के कैंप कार्यालय पर पथराव किया गया। मालेगांव में जुलूस के रौद्र रूप ने गैर मुस्लिमों को अपने घर में बंद हो जाने या फिर दुकानें बंद करने के लिए मजबूर कर दिया । जहां भी हिंदुओं से जुड़े संस्थान, दुकानें खुली मिली वही भीड़ का पथराव हुआ। पूरा माहौल भयभीत करने वाला बना दिया गया था। रैपिड एक्शन फोर्स पर हमला किया गया। हालांकि महाराष्ट्र के गृह मंत्री और पुलिस महानिदेशक स्थिति को इतना गंभीर नहीं मान रहे हैं तो यह सब पुलिस के रिकॉर्ड में आएगा नहीं। किंतु जो लोगों ने  आंखों से देखा, भुगता उन सबको भुलाना कठिन होगा। 

यह सवाल भी उठेगा कि किस आधार पर इस तरह के बंद एवं विरोध प्रदर्शनों की अनुमति मिली? कहा गया कि त्रिपुरा हिंसा का विरोध करना था। पिछले कुछ समय से देश में तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं पत्रकारों के एक समूह ने सोशल मीडिया पर त्रिपुरा में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा की जो खबरें और वीडियो वायरल कराए वो पूरी तरह झूठी थी। बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा पंडालों, हिंदू स्थलों तथा हिंदुओं पर हमले के विरोध में त्रिपुरा में शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया था।  हल्के फुल्के तनाव हुए लेकिन कुल मिलाकर आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो गया। अफवाह फैलाई गई कि जुलूस ने मुसलमानों पर और मस्जिदों पर हमले कर दिए। न कोई घायल हुआ न कहीं किसी मस्जिद को कोई क्षति पहुंची। उच्च न्यायालय ने खबर का संज्ञान लिया। वहां  त्रिपुरा के एडवोकेट जनरल सिद्धार्थ शंकर डे ने दायर शपथ-पत्र में कहा कि बांग्लादेश में दुर्गा पूजा पंडालों और मंदिरों में हुई तोड़फोड़ के खिलाफ विश्व हिंदू परिषद ने 26 अक्तूबर को रैली निकाली थी। इसमें दोनों समुदायों के बीच कुछ झड़पें हुई थीं। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए। तीन दुकानों को जलाने, तीन घरों और एक मस्जिद को क्षतिग्रस्त करने का आरोप लगा। शपथ पत्र में भी केवल आरोप की बात है। पुलिस की जांच में इसका कोई प्रमाण नहीं मिला। आयोजकों ने भी अपने जुलूस पर हमले करने का आरोप लगाया।

जरा सोचिए जहां कुछ बड़ी घटना  हुई ही नहीं वहां के बारे में इतना बड़ा दुष्प्रचार करने वाले कौन हो सकते हैं और उनका उद्देश्य क्या होगा? त्रिपुरा में जांच के लिए एक दल पहुंच गया जिसमें पत्रकार तथा कथित मानवाधिकारवादी व वकील शामिल थे। इनका तंत्र देशव्यापी नहीं विश्वव्यापी है। पुराने वीडियो डालकर सोशल मीडिया तथा मुख्यधारा की मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार होता रहा। असामाजिक तत्वों ने इसका लाभ उठाकर पूरे देश में मुस्लिम समुदाय को भड़काया है। त्रिपुरा पुलिस ने जांच करने के बाद ट्विटर से ऐसे 100 लोगों का अकाउंट बंद करने तथा इनकी पूरी जानकारी की मांग की। कुछ लोगों पर जब कठोर धाराओं में मुकदमा दायर हुआ तो बचाव के लिए उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गए। कहने का तात्पर्य कि महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसको केवल वही की घटना मत मानिए । पता नहीं देश में कहां-कहां ऐसे ही उपद्रव की प्रकट परोक्ष तैयारियां चल रही होंगी। महाराष्ट्र में विरोध प्रदर्शन व बंद का आह्वान वैसे तो रेजा अकादमी ने किया था किंतु अलग-अलग जगहों पर कुछ दूसरे संगठन भी शामिल थे । मालेगांव में बंद का आह्वान सुन्नी जमातुल उलमा, रेजा अकादमी और अन्य संगठनों ने किया था।  भिवंडी में भी रजा अकादमी ने बंद का आह्वान किया था लेकिन बंद को एमआईएम, कांग्रेस, एनसीपी और सपा का समर्थन था। तो जो कुछ भी हुआ उसके लिए इन सारे संगठनों को जिम्मेदार माना जाना चाहिए। हालांकि इसके विरोध में सड़कों पर उतरने वाला चाहे भाजपा के हो या अन्य संगठनों के लोग,उन्हें भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहिए था। अमरावती में उन्होंने हिंसा की और पुलिस को इनके विरुद्ध कार्रवाई का अवसर मिल गया। आप देख सकते हैं कि इनकी हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी के वीडियो प्रचुर मात्रा में चारों और प्रसारित हो रहा है वैसे ही महाराष्ट्र में मुस्लिम समूहों के द्वारा की गई हिंसा के वीडियो इतनी मात्रा में नहीं मिलेंगे। इसलिए विरोध करने वालों को भी अपने ऊपर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है। महाराष्ट्र पुलिस ने जिस तत्परता से इनको नियंत्रित किया वैसा ही वह 12 नवंबर को करती तो स्थिति बिगड़ती नहीं।

यहां यह प्रश्न भी उठता है कि किसी देश में हिंदुओं, सिखों आदि के विरुद्ध हिंसा हो तो  भारत के लोगों को उसके विरोध में प्रदर्शन करने का अधिकार है या नहीं? यह मानवाधिकार की परिधि में आता है या नहीं? त्रिपुरा की सीमा बांग्लादेश से लगती है और वहां आक्रोश स्वाभाविक था जिसे लोगों ने प्रकट किया। अगर किसी ने कानून हाथ में लिया तो पुलिस का दायित्व है उनको संभालना। जिन लोगों के लिए त्रिपुरा फासीवादी घटना बन गई उनके लिए बांग्लादेश में हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा मामला बना ही नहीं। बांग्लादेश की हिंसा का भी एक सच जानना आवश्यक है। बांग्लादेश की मीडिया में यह समाचार आ चुका है कि दुर्गा पूजा पंडाल तक पवित्र कुरान शरीफ इकबाल हुसैन ले गया। इकराम हुसैन ने 999 फोन नंबर पर पुलिस को सूचित किया तथा फयाज अहमद ने उसे फेसबुक पर डाला। इन तीनों का संबंध किसी न किसी रूप में जमात-ए-इस्लामी या अन्य कट्टरपंथी संगठनों सामने आया है। वहां आरंभ में पुलिस ने पारितोष राय नामक एक किशोर को गिरफ्तार किया था। इससे क्या यह साबित नहीं होता कि कट्टरपंथी मुस्लिम समूह किस मानसिकता से काम कर रहे हैं? इसलिए महाराष्ट्र की घटना को उसके व्यापक परिपेक्ष्य में पूरी गंभीरता से लेना चाहिए। जिन्होंने हिंसा की केवल वे ही नहीं जिन लोगों ने देशव्यापी झूठ प्रचार कर लोगों को भड़काया उन सबको कानून के कटघरे में खड़ा किया जाना जरूरी है।

 अवधेश कुमार, ई 30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स,  दिल्ली 110092, मोबाइल 98110 27208

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

मोदी और पोप मुलाकात को कम न आंकें

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेटिकन में पोप फ्रांसिस के साथ मुलाकात और बातचीत कई मायनों में जितनी महत्वपूर्ण थी उतनी उस पर चर्चा नहीं हुई। वस्तुतः भारत में इसका जितना और जिस तरीके से विश्लेषण होना चाहिए वह नहीं हो पाया है।  पोप की दो प्रकार की भूमिका रही है। एक,  विश्व के सबसे ज्यादा धर्म को मानने वाले कैथोलिकों के शीर्ष धार्मिक नेता हैं ।और दूसरे, वेटिकन को एक संप्रभु राष्ट्र राज्य का दर्जा प्राप्त है इसलिए वे एक देश के प्रमुख भी  हैं। भारत ने 1948 में ही वेटिकन को देश के रूप में मान्यता दी थी। इसलिए भारत और वेटिकन एवं पोप के साथ संबंध नया नहीं है। जिन लोगों ने मोदी और पोप की मुलाकात की लाइव तस्वीरें देखी होंगी वे  मुस्कुराते हाथ मिलाने के लिए बढ़ते और गला लगाते भंगिमा को भूल नहीं पाएंगे। नरेंद्र मोदी विदेशी नेताओं से गले मिलते हैं और उनकी या तस्वीरें मीडिया की सुर्खियां बनती है। पोप से इतने सहज ढंग से हंसते हुए गले मिलना इस मायने में महत्वपूर्ण है क्योंकि नरेंद्र मोदी की छवि भारत और विश्व में एक बड़े समूह ने कट्टर हिंदू नेता की बनाई है। उनके बारे में प्रचार यह किया जाता है कि दूसरे धर्मावलंबियों को महत्व नहीं देते या उनके विरुद्ध सरकार कार्रवाई करती है। इसलिए भारत एवं विश्व के छोटे हलकों में पोप के साथ उनकी मुलाकात पर आश्चर्य व्यक्त किया गया। कइयों के लिए तो यह भी आश्चर्य का विषय था कि दोनों की मुलाकात का समय केवल 20 मिनट था लेकिन वह एक घंटे तक चली। जो प्रेस वक्तव्य आया उसके अनुसार इसमें कोई विवादास्पद मुद्दा नहीं उठा । विश्व के कल्याण सैसंबंधित जलवायु परिवर्तन महामारी, आर्थिक विकास आदि विषय में बातचीत के बीच रहे । मोदी ने पोप को भारत आने का निमंत्रण दिया और उन्होंने स्वीकार भी कर लिया । इस तरह 1999 के बाद भारत आने वाले पहले होंगे।

 उनके  आगमन से भारत वेटिकन- पोप  के संबंध ज्यादा बेहतर होने की कल्पना की जा सकती है।  पोप फ्रांसिस के पहले  पोक पाॅल-4  1964 में एक बार तथा पोप जाॅन पाॅल द्वितीय 1986 एवं 1999 में यानी दो बार भारत आए थे। इस तरह पोप फ्रांसिस के रूप में पोप की चौथी भारत यात्रा होगीभारत में लगभग दो करोड़ कैथोलिक ईसाई हैं और यह संख्या छोटी नहीं है। एशिया में कैथोलिक ईसाइयों की आबादी के मामले में फिलीपींस का नंबर पहला है तो भारत दूसरे स्थान पर है। इसाई समुदाय के लोग को किस दृष्टि से देखते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं। मोदी वेटिकन में पोप से मिलने वाले पहले नेता नहीं है। इसके पहले 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वेटिकन में पोप पायस12 से मिले थे। उस समय पुर्तगालियों के विरुद्ध गोवा मुक्ति का आंदोलन चरम पर था। नेहरू पर पुर्तगाल की ओर से ईसाइयों के विरुद्ध कार्रवाई का आरोप लगाया गया। नेहरू जी ने जो वक्तव्य दिया उसके पोप संतुष्ट हुए और दुनिया के कैथोलिक ईसाई भी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पुर्तगाल की लड़ाई से ईसाइयों का कोई लेना देना नहीं है, देश के दूसरे क्षेत्र में भी ईसाई रहते हैं और सबको पूरी धार्मिक स्वतंत्रता है। यही बात भारत के संदर्भ में पहले भी सच थी आज भी है ।उसके बाद इंदिरा गांधी 1981 तथा इंद्र कुमार गुजराल 1997 में एवं अटल बिहारी वाजपेई सन 2000 में पोप से मिले थे। 2005 में पोप जॉन पॉल द्वितीय का निधन होने के बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत अंत्येष्टि में भाग लेने गए थे ।  हालांकि तब  यूपीए सरकार थी एवं शेखावास भारत सरकार के प्रतिनिधि थे, पर थे तो भाजपा के ही नेता।

निस्संदेह ,इतिहास के लंबे कालखंड में पोप और चर्चों के कार्यों का अध्याय अच्छा नहीं रहा। आम नागरिक तो छोड़िए राजाओं तक को सजा देने का अधिकार इन्होंने अपने हाथों रख लिया था। यूरोप के कई क्रांतियों के पीछे कैथोलिक चर्च की निरंकुश ,अतिवादी ,अंधविश्वास फैलाने वाली, जनता के अधिकारों को अस्वीकार करने वाली नीतियों के विरुद्ध रहा। फ्रांस की क्रांति केवल लुई 14 वें के खिलाफ नहीं थी, कैथोलिक चर्चों के विरुद्ध भी जनता के अंदर उतना ही गुस्सा था। यूरोप में जिसे पुनर्जागरण काल कहते हैं वह भी एक प्रकार से कैथोलिक नियंत्रित राज्य ,समाज व धर्म के बंदिशों से बाहर आना था। वैज्ञानिक दृष्टि से खोज और अध्ययन करने वाले चर्च मान्यताओं और नीतियों को ही तो चुनौती दे रहे थे। इसलिए इतिहासकारों के एक बड़े समूह ने लंबे कालखंड को डार्क एज यानी अंधकार युग की संज्ञा दी है। आप सोच सकते हैं कि पृथ्वी गोल है या अपनी गति से घूमती है इतना भी चर्च स्वीकार करने को तैयार नहीं था तो कैसे स्थिति रही होगी। यूरोप में दार्शनिकों के लंबी श्रृंखला है जिन्होंने पोप और चर्च के विरुद्ध सोच और विचारों से अभियान चला दिया। वॉल्तेयर, रूसो, विक्टर ह्युगो, जैसे दार्शनिक इसी श्रेणी के थे । रूसो, माॅटेस्क्यू और वॉल्तेयर जैसे दार्शनिकों के विचारों की फ्रांस की क्रांति में बहुत बड़ी भूमिका थी। धीरे - धीरे पोप ने पुरानी मान्यताओं और नीतियों में संशोधन परिवर्तन करते हुए वैज्ञानिक अध्ययनों खोज विचारों तथा मानवीय अधिकारों की मांगों को स्वीकार करना आरंभ किया। इससे पोप की प्रतिष्ठा विश्व भर में बड़ी। पोप फ्रांसिस तथा इनके पूर्व पोप जॉन पॉल द्वितीय ने मानवाधिकारों के नाम पर ऐसी कई बातों को स्वीकार किया जिसकी पहले कल्पना तक नहीं थी। आज पोप विश्व में सर्वाधिक प्रतिष्ठित धर्म एवं राज्य प्रमुख माने जाते हैं । विश्व के सभी प्रमुख ईसाई देश उनका सम्मान करते हैं तथा वेटिकन से निकली आवाज को पूरा महत्व देते हैं। इस नाते भी विचार करें तो मोदी और पोप की यह मुलाकात काफी महत्वपूर्ण जाएगी। 

यह कहना आसान है कि मोदी ने इसके माध्यम से अपने राजनीतिक लक्ष्य को भी सादने की कोशिश की है। मसलन, गोवा ,केरल तथा पूर्वोत्तर में राजनीति करने के लिए कैथोलिक ईसाइयों का साथ आना जरूरी है। भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में गोवा में पुनर्वापसी चाहती है तो केरल में राजनीति की मुख्यधारा में आना। संभव है मुलाकात के पीछे राजनीतिक सोच भी हो । केरल के कई बड़े नेता पोप से मुलाकात कर चुके हैं। इसमें वर्तमान मुख्यमंत्री पी विजयन भी शामिल हैं। कुछ केरल के एक बड़े कार्डिनल ने मुलाकात का स्वागत भी किया है।  जिन हलकों में मोदी की पोप से मुलाकात को लेकर थोड़ा नाक भौं सिकोड़ा गया उनके कारण राजनीतिक ज्यादा हैं। हो सकता है भाजपा को इसका कुछ चुनावी लाभ मिले। ऐसा नहीं भी हो सकता है। किंतु इस दृष्टि से मोदी मुलाकात तथा पोप की भावी यात्रा को देखना इसके व्यापक आयामों को संकुचित कर देता है। भारत बहुपंथी देश है। हार पंथ और मजहब को उनकी मान्यताओं के अनुसार धार्मिक क्रियाकलापों के लिए शत प्रतिशत स्वतंत्रता देने वाला भारत विश्व के सभ्य देशों में गिना जाता है। इस सफल मुलाकात के बाद पोप की भावी यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हो गई तो आर्थिक और सामरिक दृष्टि से विश्व में महाशक्ति की ओर अग्रसर भारत का कद बढ़ेगा ही ,इसके प्रति विश्व भर के ईसाई समुदाय का भावनात्मक लगाव भी थोड़ा मजबूत होगा। बताने की आवश्यकता नहीं कि इनमें विश्व के प्रमुख देश भी शामिल हैं। मोदी के सत्ता में आने के बाद छोटी-छोटी घटनाओं को बड़ा बनाकर ऐसे पेश किया गया मानो यहां ईसाइयों के लिए दुर्दिन आ गए हो। इस दुष्प्रचार में भारत के साथ विश्व के अनेक संगठन तथा व्यक्ति शामिल हैं। अमेरिका जैसे देश से जारी होने वाले धार्मिक स्वतंत्रता की वार्षिक रिपोर्ट में भी इसकी आलोचना है। कई देशों की मीडिया से संसद तक में आवाज उठी। भाजपा की राज्य सरकारों द्वारा धर्म परिवर्तन विरुद्ध बने और  बनाये जा रहे कानूनों की भी विश्व भर के ईसाई संगठन आलोचना करते हैं। भले मोदी और पोप के बीच बातचीत का यह मुद्दा नहीं रहा हो लेकिन भारत ने राजनीयिक स्तर पर निश्चित रूप से वेटिकन को सच्चाई से अवगत कराया होगा। तो यह मानने में हर्ज नहीं है कि मोदी पोप मुलाकात से विरोधी दुष्प्रचार और आलोचना के स्वर धीमै और कमजोर होंगे। यह भारत के हित में है। 1999 में पोप की यात्रा के दौरान भी भाजपा नेतृत्व वाली सरकार थी पर उस समय संघ परिवार के संगठनों सहित कई हिंदू संगठनों और व्यक्तियों ने विरोध किया था। भारत में धर्म परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है। वेटिकन धर्म परिवर्तन को मान्यता देता है। अलग-अलग क्षेत्रों में और कई बार देश स्तर पर भी धर्म परिवर्तन की घटनाओं पर विरोध हम देखते रहे हैं। अभी तक इन संगठनों की ओर से किसी तरह की विरोधी प्रतिक्रिया नहीं आई है। इसका मतलब यह है कि पोप फ्रांसिस की यात्रा बिना बड़े विरोध और बाधा के संपन्न हो जाएगी। धर्म परिवर्तन का विरोध करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन राजकीय यात्रा में मेहमान के साथ जिस तरह का सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए वही व्यवहार होगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है। हां इसमें सरकार की ओर से बुद्धिमत्ता पूर्वक यह संदेश अवश्य निकलना चाहिए की पॉप का सम्मान करते हुए भी भारत लोभ, लालच या बल से धर्म परिवर्तन के विरुद्ध है।

अवधेश कुमार,ई 30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 98110 27208

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