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सोमवार, 15 अक्टूबर 2018
सरहद पर गृहमंत्री का शस्त्र पूजन देश को युद्धोन्माद में झोंकना : रिहाई मंच
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018
पुनर्विचार के लिए अपील जरुरी
अवधेश कुमार
हाल में उच्चतम न्यायालय ने ऐसे कई फैसले दिए हैं जिन पर सघन बहस चल रही है। विवाहेतर यौन संबंधों यानी व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का मामला ऐसा ही है। उच्चतम न्यायालय ने व्यभिचार को अपराध मानने वाले भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि यह महिलाओं की स्वायत्तता और व्यक्तित्व को ठेस पहुंचाता है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा (सेवानिवृत) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से 158 साल पुराने इस दंडात्मक प्रावधान को खत्म किया है। यहां तक कह दिया कि इस प्रावधान ने महिलाओं को पतियों की संपत्ति बना दिया था। किंतु ऐसे लोगों की बडी़ संख्या है जो महिलाओं के साथ समानता के अधिकार का न केवल समर्थन करते हैं, बल्कि व्यवहार में उसे जीते भी हैं, उन्होंने भी इस फैसले पर चिंता प्रकट की है। चूंकि मामला उच्चतम न्यायलय का है इसलिए कोई बड़ा व्यक्तित्व सीधे विरोध में नहीं उतरा है, लेकिन वातावरण वैसा ही जैसे समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर रखने के फैसले के समय था।
इस विषय में आगे बढ़ने से पहले यह देखें कि इन न्यायामूर्तियों ने अपने-अपने फैसले में क्या-क्या कहा है? प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है। महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता। संविधान की खूबसूरती यही है कि उसमें ‘मैं, मेरा और तुम’ सभी शामिल हैं। पति कभी भी पत्नी का मालिक नहीं हो सकता है। न्यायमूर्ति एएम खानविलकर ने कहा कि ये पूरी तरह से निजता का मामला है। व्यभिचार अनहैपी मैरिज यानी अप्रसन्न विवाह का केस भी नहीं हो सकता, क्योंकि अगर इसे अपराध मानकर केस करेंगे, तो इसका मतलब दुखी लोगों को सजा देना होगा। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह कानून मनमाना है, महिला की सेक्सुअल च्वॉइस को यानी उसे यौन विकल्प अपनाने से रोकता है। न्यायमूर्ति रोहिंटन नरीमन ने कहा कि यह संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। पीठ की महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने कहा कि कोई ऐसा कानून जो पत्नी को कमतर आंके, ऐसा भेदभाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। एक महिला को समाज की मर्जी के मुताबिक सोचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
इन न्यायाधीशों ने यूं ही यह निष्कर्ष भी नहीं दिया है। इसमें दुनिया के अलग-अलग देशों के कानूनों, प्राचीन से लेकर आधुनिक धर्मग्रंथों, संहिताओं आदि को उद्धृत किया गया है। इसमें यहूदी, ईसाई, इस्लाम, हिन्दू...आदि सभी धर्मों का हवाला है। यह भी बताया गया है कि अंग्रेजों के समय भी लॉड मैकाले ने भारतीय दंड संहिता के पहले दस्तावेज में व्यभिचार को एक दंडनीय अपराध बनाने से इनकार कर दिया था। न्यायपीठ ने जिस पृष्ठभूमि में इस कानून को लागू किया गया उसे भी साफ किया है। इसके अनुसार 1860 में जब भारतीय दंड संहिता लागू हुई तो एक बड़ी आबादी खासकर हिंदुओं में तलाक को लेकर कोई कानून नहीं था क्योंकि शादी को एक संस्कार माना जाता था। इसके अलावा 1955 तक एक हिंदू पुरुष को कई महिलाओं से शादी करने की आजादी थी। उस समय व्यभिचार तलाक का आधार नहीं हो सकता था, क्योंकि तलाक के कानून ही नहीं थे एवं एक हिंदू पुरुष को कई पत्नियां रखने का अधिकार था। ऐसे में किसी विवाहित पुरुष को अविवाहित महिला के साथ शारीरिक संबंध के लिए अपराधी नहीं ठहराया जा सकता था क्योंकि वह पुरुष जब चाहे उस महिला के साथ शादी कर सकता था। हालांकि सच यही है कि हिन्दू समाज में पुरुषों का बहुविवाह कभी भी आम प्रचलन नहीं रहा। इतिहास में बहुपत्नियों के उदाहरण हैं, लेकिन अत्यंत कम। वैसे इस पुराने कानून के दो मूलभूत आधार अब खत्म हो चुके हैं। 1955-56 के बाद हिंदू कोड लागू हो गया, जिसके तहत एक हिंदू पुरुष केवल एक ही औरत से शादी कर सकता है। हिन्दुओं के लिए भी तलाक का कानून बन गया और व्यभिचार को हिंदू कानूनों में तलाक का आधार भी बना दिया गया।
अब यहां इस कानून को समझना जरुरी है। धारा-497 के तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी अन्य शादीशुदा महिला के साथ आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाता तो केवल उक्त महिला का पति एडल्टरी (व्यभिचार) के नाम पर उस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज करा सकता था। वह व्यक्ति अपनी पत्नी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता था और न ही विवाहेतर संबंध में लिप्त पुरुष की पत्नी इस दूसरी महिला के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती थी। धारा 497 केवल उस पुरुष को अपराधी मानती थी, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हों । पुरुष के लिए पांच साल की सजा का प्रावधान भी था। कोई पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, लेकिन उसके पति की सहमति नहीं लेता है, तो वह अपराधी हो लेकिन जब पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाता है, तो उसे अपनी पत्नी की सहमति की कोई जरूरत नहीं है। निष्कर्ष यह निकाला गया कि महिला के पति को ही शिकायत का हक होना कहीं न कहीं महिला को पति की संपत्ति जैसा दर्शाता है। किंतु इसमें अगर पत्नी को मामला दर्ज करने का अधिकार नहीं था तो उसे विवाहेतर यौन संबंधों पर आपराधिक मामला का सामना करने से ही वंचित रखा गया। इस नाते इसे केवल महिलाओं के खिलाफ मानना शत-प्रतिशत सही नहीं लगता। दूसरे, अगर व्यभिचार अपराध नहीं माना जाएगा तो पति अपनी महिला दोस्त के साथ पत्नी की जानकारी में भी संबंध बनाए तो वह उस महिला के पति के माध्यम से भी मामला दर्ज नहीं करा सकती। और तलाक? तो जो पुरुष ऐसा करेगा वह तो शायद पत्नी से पिंड छुड़ाने की तैयारी कर चुका होगा। तो समस्या महिला के साथ भी खड़ी होगी।
ध्यान रखिए, इस मामले के याचिकाकर्ता केरल के अनिवासी भारतीय जोसेफ साइन ने धारा-497 को चुनौती देते हुए कहा था कि कानून लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन इसके प्रावधान पुरुषों के साथ भेदभाव करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 (समता के अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल के आधार पर विभेद नहीं) और अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन होता है। इसे लैंगिक तटस्थ (जेंडर न्यूट्रल) करने का संविधान पीठ से अनुरोध किया गया था ताकि विवाहेतर संबंध रखने वाले महिला और पुरुष दोनों को अपराध की परिधि में लाया जा सके। यही होना चाहिए। ठीक है कि इस कानून का अत्यंत ही कम उपयोग हुआ है। किंतु कानून का रहना भी कई बार आपराधिक मनोवृत्तियों के निरोध का कारण बनता है। कानून को रद्द करने का संदेश यह जा रहा है कि अब विवाहेतर यौन संबधों को पूरी आजादी मिल गई है। कोई व्यभिचारी पति या पत्नी किसी के साथ कभी भी यौन संबंध बना सकता-सकती है और इनके खिलाफ पुलिस कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकती। ऐसी यौन स्वच्छंदता भारतीय समाज के लिए कितना विघटनकारी हो सकता है इसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा हो जाती है। भारत में विवाह आज भी एक संस्कार है। पति-पत्नी का संबंध प्रेम, विश्वास और सहकार का अनुपम उदाहरण है। समाज को सशक्त करने वाली ईकाई परिवार का यही सबसे मजबूत स्तंभ है। यदि यह स्तंभ टूट गया तो केवल यौन स्वैच्छाचार को ही प्रोत्साहन नहीं मिलेगा, परिवार विघटन की शुरूआत होगी। तो भारत बचेगा कहां। समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करना तथा धारा 497 को निरस्त करने से यही भय पैदा हो रहा है।
हालांकि फैसले में ही कुछ बातें कही गईं हैं। जैसे यह तलाक का आधार तो बन सकता है लेकिन अपराध नहीं। अगर इस वजह से पार्टनर खुदकुशी कर ले खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है। कोई व्यवहार शादी टूटने का आधार बन सकता है, आत्महत्या का कारण बन सकता है लेकिन उस कृत्य को अपराध नहीं माना जाएगा...इस व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। इसलिए जरुरी है कि विवोहतर संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखने के वर्तमान तथा समलैंगिकता को भी मान्य कर देने के फैसले के विरुद्ध अलग-अलग पुनर्विचार याचिकाएं डाली जाएं। फैसले में स्वयं दीपक मिश्रा ने कहा है कि व्यभिचार को अभी भी नैतिक रूप से गलत माना जाएगा। घरों को तोड़ने के लिए कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं मिल सकता। हम मानते हैं कि हमारा समाज कानून से ज्यादा सांस्कृतिक धाराओं से घनीभूत हुई नैतिकता, पवित्रता, धार्मिकता आदि से संचालित होता है। यहां आपसी रिश्ते कानून से नहीं भावनाओं और सदियों से चली आ रही सामाजिक दायित्व बोध से कायम रहते हैं। किंतु कानून से इन सबको मुक्त करने का भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव होगा और वह नकारात्मक ही होगा।
अवधेश कुमार, ईः30,गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208
शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018
वर्तमान फैसले से अयोध्या विवाद के शीघ्र निपटारे का रास्ता बना
अवधेश कुमार
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि मस्जिद नमाज अदा करने के लिए जरूरी नहीं है। न्यायलय के लिए इसे स्पष्ट करना इसलिए आवश्यक था क्योंकि इसके बाद ही मुख्य मामला आगे बढ़ता। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति अशोक भूषण तथा न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पीठ ने 2-1 के बहुमत के फैसले में कहा है कि मस्जिद ही इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। जम इस्लाम का ही अभिन्न अंग नहीं है को नमाज अदा करने के लिए भी जरुरी नहीं है। न्यायमूर्ति नजीर ने अलग राय व्यक्त की लेकिन बहुमत का फैसला ही मान्य होता है। यह बहुत बड़ा फैसला है। हालांकि 1994 में उच्चतम न्यायालय का पांच सदस्यीय संविधान पीठ इस पर फैसला दे चुका था लेकिन चूंकि इसे फिर से उठा दिया गया इसलिए इसका दोबारा निर्णय करना आवश्यक हो गया था। अगर उच्चतम न्यायालय का निर्णय इसके विपरीत आता यानी वह कहता कि इस्लाम का मस्जिद से रिश्ता अटूट है और नमाज पढ़ने के लिए यह जरुरी है तो एक बड़ा बवंडर खड़ा हो जाता। अयोध्या विवाद के बाबरी पक्ष ने 24 वर्ष पहले यह मामला उठाया ही इसलिए था ताकि हिन्दू जिस तरह विवादित स्थल पर पूजा करते हैं उसी तरह उन्हें भी नमाज अदा करने की इजाजत मिल जाए। न्यायालय ने तब भी इसकी गहन सुनवाई की और इस्लाम की मजहबी पुस्तकों एवं विद्वानों को उद्धृत करते हुए साफ कर दिया कि नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद आवश्यक नहीं है। प्रश्न है कि फिर इसे क्यों उठाया गया?
दरअसल, एक पक्ष मामले को लंबा खींचना चाहता है। उसके लिए इसे कानूनी दांव-पेच में उलझाना जरुरी है। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाया था। अपने आदेश में बेंच ने 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटा था। राम मूर्ति वाले पहले हिस्से में राम लला को विराजमान कर दिया। राम चबूतरा और सीता रसोई वाले दूसरे हिस्से को निर्मोही अखाड़े को दिया और बाकी बचे हुए हिस्से को सुन्नी वक्फ बोर्ड को। इस फैसले को सभी पक्षकारों ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। इनको स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने 9 मई 2011 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाकर यथास्थिति बहाल कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने साफ कहा कि मामले का फैसला आस्था के अनुसार नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर होगा। बाबरी पक्ष के लोग यह तर्क तो देते हैं कि उच्चतम न्यायालय ने इसे दीवानी मामला माना है और यह सही है लेकिन वे इस आस्था का प्रश्न भी बना देते हैं। नमाज और मस्जिद का रिश्ता वाला पेच ऐसा ही था।
5 दिसंबर 2017 को अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी। बाबरी पक्षकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि नमाज अदा करना धार्मिक कर्मकांड है और मुसलमानों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह इस्लाम का अभिन्न अंग है। उन्होंने ही प्रश्न उठाया कि क्या मुस्लिम के लिए मस्जिद में नमाज पढ़ना जरूरी नहीं है? इसका जवाब यह कहते हुए दिया कि उच्चतम न्ययालय ने 1994 में दिए फैसले में कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। उनके अनुसार नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग है और यह जरुरी धार्मिक गतिविधि है तो 1994 के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। उनका कहना था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला भी 1994 के फैसले के आलोक में था। मामले को फिर से संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की गई। इससे मुख्य मामले की सुनवाई रुक गई। इसके साथ उस फैसले के खिलाफ 13 याचिकाएं न्यायालय के समक्ष डालीं गईं। कोई भी समझ सकता है कि इसके पीछे मामले में शीघ्र न्याय के रास्ते डालने की ही रणनीति मुख्य थी। पीठ द्वारा यह कहने के बाद कि इसे संविधान पीठ को सौंपने की आवश्यकता नहीं है यह अध्याय समाप्त हो गया है।
वास्तव में 6 दिसंबर 1992 को विवादास्पद ढांच ध्वस्त किए जाने के बाद केन्द्र सरकार ने कानून बनाकर उस जगह का अधिग्रहण कर लिया था। हालांकि अधिग्रहण के बावजूद हिन्दुओं के पूजा पाठ पर कोई रोक नहीं लगाई गई। इसी के खिलाफ याचिका डाली गई कि मस्जिद का अधिग्रहण किया ही नहीं जा सकता। यह मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों पर कुठाराघात है, क्योंकि इससे हमारा नमाज पढ़ने का हक खत्म हो जाता है। यह अलग बात है कि वहां नमाज कब पढ़ा गया इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जबकि लगातार पूजा पाठ के साक्षात प्रमाण हैं। उस समय उच्चतम न्यायालय ने न केवल अयोध्या विवाद, रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद के महत्व, मस्जिदों के निर्माण के इतिहास, इस्लाम के इतिहास, नमाज के नियम, उन पर कुरान शरीफ सहित अलग-अलग पुस्तकों की राय आदि का अध्ययन कर निष्कर्ष दिया कि नमाज के लिए कहीं भी मस्जिद अनिवार्य नहीं किया गया है। यही सच भी है मस्जिद निर्माण बहुत बाद में आरंभ हुआ। पांच वक्त नमाज अदा करने वाले हर समय मस्जिद जाते नहीं। हां, जमात के साथ नमाज अदा करने के लिए कोई एक जगह चाहिए, उसमें वजु करने यानी अपने को पवित्र करने आदि की व्यवस्था चाहिए इसलिए मस्जिदों का निर्माण हुआ। किंतु मस्जिद केवल एक भवन ही है। हिन्दू मन्दिरों की तरह किसी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा नहीं होती कि उनकी पूजा वहीं की जाए। वैसे हिन्दू धर्म में भी सामान्य पूजा के लिए मंदिर आवश्यक नहीं है। किंतु जैसे द्वादश ज्योर्तिलिंग हैं, 52 शक्तिपीठ हैं, वैसे ही कुछ दूसरे धार्मिक महत्व के स्थापित मंदिर हैं। उनकी पूजा वहीं हो सकती है। नमाज के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने उसी फैसले को फिर से स्पष्ट किया है। इसमें कहा है कि सरकार के पास किसी भी धार्मिक स्थल के अधिग्रहण करने का अधिकार है, वह मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा कुछ भी हो सकता है। हां, यदि वह स्थान किसी विशिष्ट महत्व का हो, जिसके अधिग्रहण से उस विशेष धर्म की धार्मिक गतिविधियों का लोपन होता हो तो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। पीठ ने कहा कि तब संविधान पीठ के सामने ऐसा कोई पहलू नहीं आया जिससे साबित हो कि रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद का मस्जिद किसी विशेष महत्व का है, जिसके अधिग्रहण से धार्मिक गतिविधि खत्म हो जाएगी, इसलिए न्यायालय का निष्कर्ष यह है कि इसके अधिग्रहण से संविधान की धारा 25 और 26 में मिले अधिकार का कहीं से उल्लंघन नहीं होता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि संविधान की टिप्पणी अयोध्या कानून 1993 के तहत कुछ निश्चित क्षेत्र के अधिग्रहण के संदर्भ में थी। इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि मस्जिद को इस्लाम के धार्मिक व्यवहार का अंग कभी भी माना ही नहीं जाएगा।
न्यायालय की इन टिप्पणियों का पहला निष्कर्ष तो यही है कि अब अयोध्या विवाद को किसी कानूनी पेच में फंसाने की संभावना लगभग खत्म हो गई है। इसका महत्व यह है कि अब न्यायालय 29 अक्टूबर से प्रतिदिन मामले की सुनवाई करके यह निर्णय कर सकेगा कि विवादास्पद स्थान पर किसका कानूनी हक बनता है। बाबरी पक्ष भले उपर से जो कहे लेकिन वे इस फैसले से नाखुश हैं। अधिवक्ता राजीव धवन ने तो फैसले को ही गलत बता दिया। असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि इसे संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए था। ये विचित्र और दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियां हैं। वैसे यह तर्क गलत था कि 30 सितंबर 2010 का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला 1994 के उच्चतम न्यायालय के फैसले के आलोक में था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला काफी विस्तृत फैसला था। इसमें ऐतिहासिक, खुदाई से प्राप्त पुरातात्विक, धार्मिक आदि सारे सबूतों का विवरण है। हां, उसमें 1994 के फैसले का उद्धरण भी है, पर यह आधार कतई नहीं है। उच्चतम न्यायालय चाहता तो इस दलील को एकबारगी खारिज भी कर सकता था। किंतु ऐसा करने से फिर इनको बाहर प्रश्न उठाने का बहाना मिल जाता। प्रश्न तो आगे भी उठाएंगे किंतु यह किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति के गले नहीं उतरेगा। बाबरी पक्ष को भय यही है कि अगर उस स्थान को मुसलमानों के लिए विशेष महत्व का माना ही नहीं गया तो फिर मुख्य फैसला में भी यह पहलू आ सकता है। यह भय उनके अंदर 1994 से ही बना हुआ है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उनका यह भय और बढ़ा है। वैसे सच तो यही है कि रामजन्मभूमि हिन्दुओं के लिए जितने गहरे धार्मिक महत्व का विषय है, उतना बाबरी इस्लाम की दृष्टि से किसी महत्व का स्थान नहीं हो सकता। बहरहाल, इस बड़े पेच से निकलने के बाद अयोध्या विवाद के फैसले की ऐतिहासिक घड़ी आ रही है।
अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208
शुक्रवार, 28 सितंबर 2018
तेल मूल्य पर राजनीति करना देशहित में नहीं
अवधेश कुमार
अर्थशास्त्र पर जब राजनीति हाबी हो जाए तो परिणाम हमेशा विघातक होता है। पेट्रोल, डीजल और बिना सब्सिडी वाले रसोई गैस की कीमतों पर यही हो रहा है। इसके पूर्व किसी पार्टी ने तेल मूल्यों में बढ़ोत्तरी भारत बंद आयोजित नहीं किया था। राजनीति के कारण यह बड़ा मुद्दा बन चुका है। सरकार दबाव में है। मीडिया में गाड़ियों का उपयोग करने वालों की बड़ी संख्या है इसलिए मुद्दा ज्यादा तूल पकड़ रहा है। तेल महंगा होने का असर चतुर्दिक होता है। महंगाई पर इसका असर होता है। हममें से हर कोई चाहता है कि कीमतें कम हों। किंतु क्या यह संभव है? जिन्हें तेल का अर्थशास्त्र एवं देश की आर्थिक और वित्तीय स्थिति से उसके जुड़ाव का पता है वे जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय मूल्य तय करना भारत के हाथ में नहीं है और अगर केन्द्र ने उत्पाद शुल्क तथा राज्यों ने वैट में थोड़ी कमी की भी तो मूल्यों पर इसका हल्का असर होगा लेकिन केन्द्र एवं राज्य दोनों की वित्तीय स्थिति पर प्रतिकूल असर होगा। यहां यह बताना आवश्यक है कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए शासन के अंतर्गत पेट्रो पदार्थों के मूल्यों में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुई। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जाने के दिन दिल्ली मेें पेट्रोल 31 रुपए तथा डीजल 21 रुपए प्रति लीटर था। मई 2014 तक यह 71 रुपए और 55 रुपए हो गया। 20 मई 2004 से 16 मई 2014 के काल में पेट्रोल की कीमत 75.8 प्रतिशत तथा डीजल की 83.7 प्रतिशत बढ़ी था। भाजपा नीत राजग सरकार में पेट्रौल के मूल्य में 13 प्रतिशत था एवं डीजल में 28 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।
इन आंकड़ों को देने का अर्थ केवल यह बताना है कि विपक्ष का तूफान केवल राजनीति है। उस समय भी अर्थशास्त्रियों का मत था कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते मूल्य के सामने हम लाचार हैं। बीच-बीच में केन्द्र एवं कुछ राज्यों ने कर घटाए लेकिन इससे ज्यादा अंतर नहीं आ सकता था। वही स्थिति अभी भी है। निस्संदेह, मूल्यों में केन्द्र के उत्पाद कर एवं राज्यों के वैट की बड़ी भूमिका है। एक सच यह भी है कि अनेक राज्यों में वैट केन्द्र के उत्पाद शुल्क से ज्यादा है और वो पार्टियां भी सरकार आग उगल रहीं हैं। 10 सितंबर 2018 को इंडियन बास्केट के कच्चे तेल की कीमत 4,883 रुपये प्रति बैरल थी। एक बैरल में 159 लीटर होता है, इसलिए प्रति लीटर कच्चे तेल का मूल्य हुआ, 30 रुपए 71 पैसे। आयातित तेल को शोधक कारखानों में भेजने और पेट्रोल पंपों तक पहुंचाने के खर्च को भी समझना होगा। एंट्री कर से लेकर शोधन प्रक्रिया, उतारने में खर्च एवं तेल कंपनियों का मार्जिन, डीलर का अंश सहित अन्य कई खर्च आते हैं। एंट्री, शोधन और उतारने में पेट्रोल पर 3.68 रुपये तथा डीजल पर 6.37 रुपये प्रति लीटर खर्च आता है। इस तरह पेट्रोल 34.39 रुपये, जबकि डीजल की कीमत 37.08 रुपये हो गई। पेट्रोल पर 3.31 रुपये और डीजल पर 2.55 रुपये प्रति लीटर तेल कंपनियों की मार्जिन, ढुलाई और फ्र्रंट का खर्च आता है। इसके बाद मूल्य हुआ पेट्रोल 37.70 रुपये तथा डीजल 39.63 रुपये हुआ। इस पर केंद्र का उत्पाद कर प्रति लीटर पेट्रोल 19.48 रुपये और डीजल पर 15.33 रुपये लगता है। इनको जोड़कर कीमत हो गई, पेट्रोल 57.18 रुपये तथा डीजल 54.96 रुपये प्रति लीटर। पेट्रोल पंप डीलरों का कमीशन पेट्रोल पर 3.59 रुपये प्रति लीटर तथा डीजल पर 2.53 रुपये है। इस तरह पेट्रोल का मूल्य हुआ 60.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल का 57.49 रुपया। इस पर राज्य सरकारें अलग-अलग वैट और प्रदूषण अधिभार लेती है। यानी इसके बाद का जो मूल्य है वो राज्यों के कर का है।
16 जून, 2017 से पेट्रोल-डीजल के मूल्य अंतर्राष्ट्रीय बाजार के अनुसार प्रतिदिन निर्धारित करने (डेली डाइनैमिक प्राइसिंग) का नियम हो गया है। हालांकि इसके पहले भी तेल कंपनियां हर 15 दिन पर मूल्य की समीक्षा करतीं थीं। तो अंतर इतना ही आया है। इसे यह कहते हुए लागू किया गया था कि अंतर्राष्ट्रीय मूल्योें के अनुसार मूल्य निर्धारित होगा। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मूल्य घटने के अनुरुप ग्राहकों को उसका पूरा लाभ नहीं मिला। यह सच है कि केंद्र सरकार ने नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच नौ बार में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 11.77 रुपये तथा डीजल पर 13.47 रुपये प्रति लीटर बढ़ाया। यह तेल के अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों में गिरावट का दौर था। जब मूल्य बढ़ने लगे तो सिर्फ एक बार अक्टूबर 2017 में उत्पाद शुल्क 2 रुपये प्रति लीटर की दर से घटाई थी।
किंतु यहां यह बताना आवश्यक है कि अंतर्राष्ट्ीय मूल्य जितना बढ़ रहा है राज्य उसके अनुसार ज्यादा कमा रहे हैैं। उनका प्रतिशत के हिंसाब से वैट और पर्यावरण अधिभार बढ़ता है तथा केन्द्रीय कर से भी उनको 42 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलती है। वर्ष 2014-15 से वर्ष 2017-18 तक वैट, पर्यावरण अधिभार एवं केंद्रीय कर के हिस्से से राज्यों ने 9 लाख 45 हजार 258 करोड़ रुपये कमाए हैं। इसके अनुपात में केंद्र की आय 7 लाख 49 हजार 485 करोड़ रुपये हुई जिसमें से 42 प्रतिशत यानी 3 लाख 14 हजार 784 करोड़ रुपये राज्यों को मिले। दिल्ली के उदाहरण से इसे समझ सकते हैं। दिल्ली में इस समय पेट्रोल की कीमत 80 रुपए के आसापास है। दिल्ली को 40.45 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल दिया गया है। इस पर केन्द्र का उत्पाद कर करीब 19.48 रुपया लगा जिसमें से 42 प्रतिशत यानी 8.18 रुपया केंद्र से दिल्ली को मिला। दिल्ली सरकार प्रति लीटर करीब 17.20 रुपये वैट ले रही है। अगर इनको मिला दे ंतो कर के रुप में प्राप्त 36.64 रुपये में 25.40 रुपये दिल्ली को मिलता है जबकि केन्द्र के हिस्से केवल 11.24 रुपया। दिल्ली सरकार पेट्रोल पर 27 प्रतिशत तथा डीजल पर 17.24 प्रतिशत वैट वसूलती है। यह केन्द्र के उत्पाद शुल्क से ज्यादा है।
इसके बाद आसानी से समझा जा सकता है कि देश में तेल मूल्यों पर जो हंगामा मचा है उसमें पाखंड कितना है। अगर कर ही कम करना है तो राज्यों की भूमिका ज्यादा होनी चाहिए। अभी राजस्थान एवं आंध्रप्रदेश में ने थोड़ी कमी की है लेकिन अन्य राज्य इसके लिए तैयार नहीं हैं। वे केवल केन्द्र को दोषी ठहराने में लगे हैं। ज्यादातर आम लोगों को तेल के इस वित्तशास्त्र की जानकारी नहीं होती, इसलिए वे भी केन्द्र को ही दोषी मान रहे हैं। हालांकि जैसा हमने देखा पिछले समय में केन्द्र ने भी कमाई की है, लेकिन राज्यों ने उससे ज्यादा किया है। उदाहरण के लिए वर्ष 2015-16 में अंतरराष्ट्रीय बाजार से भारत ने औसतन 46 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल खरीदा था। राज्यों ने वैट से 1 लाख 42 हजार 848 करोड़ रुपये प्राप्त किए। केंद्र को उत्पाद शुल्क मिला,1,78,591 करोड़ रुपये जिसमंे से 42 प्रतिशत तो राज्यों को चला गया। इस तरह राज्यों को कुल 2,17,856 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। वर्ष 2017-18 में अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल औसतन 56 डॉलर प्रति बैरल की दर से खरीदा गया। राज्यों की राशि बढ़ कर 2 लाख 80 हजार 278 करोड़ रुपये हो गई।
प्रश्न है कि क्या तेल मूल्य घटाने का कोई रास्ता है? हम अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत आयात करते हैं। वित्त वर्ष के आरंभ में 108 अरब डॉलर (7.02 लाख करोड़ रुपये) का कच्चा तेल आयात किए जाने का अनुमान था। तब कच्चे तेल की औसत कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल तथा एक डॉलर की 65 रुपये कीमत आंकी गई थी। आज कच्चे तेल के दाम बढ़ गए तथा रुपया और नीचे आ गया। रास्ता एक ही बचता है, कर कम करने का। यानी केन्द्र और राज्यों को प्राप्त करों की स्थिति देखने के बाद केन्द्र से ज्यादा जिम्मेवारी राज्यों की दिखती है। किंतु राज्यों के खर्च का ढांचा भी इस पर इतना टिक गया है कि इसे ज्यादा कम करते ही उनकी कठिनाइयां बढ़ जाएंगी। केन्द्र का राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा। जिन कल्याण कार्यक्रमों पर राशि खर्च होती हैउनके लिए अलग से धन जुटाना होगा। जीएसटी में लाने का तर्क सुनने में अच्छा है लेकिन राज्य ही इसके लिए तैयार नहीं हैं। निष्कर्ष यह कि विपक्षी दल इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर देश को संकट में न डालें। जब तक ओपेक देश तेल उत्पादन नहीं बढ़ाते, ईरान पर प्रतिबंध जारी रहेगा तथा वेनेजुएला का राजनीतिक संकट खत्म नहीं होगा अंतर्राष्ट्रीय मूल्य बढ़ते रहेंगे। ऐसे में हमारे पास बढ़े मूल्य को झेलना ही एकमात्र विकल्प है। जो राजनीतिक दल इसमें विरोध का नायक बनने की कोशिश कर रहे हैं वे गलत ही नहीं पाखंडी भी हैं।
अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208
शनिवार, 22 सितंबर 2018
यही संघ का हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्र है
अवधेश कुमार
संघ ने जितनी व्यापक तैयारी से तीन दिन का राष्ट्रीय समागम आयोजित कर अपने से जुड़े जितने विषय है, जिन-जिन मुद्दों पर आलोचना होती है सब पर विस्तार से बातें रखीं, उपस्थित मुद्दों पर भी मत रखा और अगर कुछ कमी रह गई तो उसे प्रश्नों के द्वारा पूरा किया उसके बाद दुराग्रहरहित व्यक्तियों का मन साफ हो जाना चाहिए। यह भारत में किसी संगठन द्वारा अपनी विचारधारा और मत को इतने व्यापक पैमाने पर और विस्तार से रखने वाला पहला कार्यक्रम था। संघ ने अपने विरोधी राजनीतिक दलों और कुछ बुद्धिजीवियों को भी निमंत्रण दिया था। संघ द्वारा विरोधियों के साथ संवाद करने की एक लोकतांत्रिक पहल थी जिसे ठुकराना किसी दृष्टि से उचित नहीं था। संवाद लोकतंत्र का प्राणतत्व है। यह अत्यंत ही गैर लोकतांत्रिक आचरण था। आप देश के सबसे बड़े संगठन परिवार के मातृसंगठन को अछूत बनाकर कब तक रख सकते हैं?
प्रश्न उठता है कि संघ को आज इसकी आवश्यकता महसूस क्यों हुई? जिस ढंग से संघ पर अनेक आरोप लगाए जाते है, उसके विचारों की मनमानी व्याख्या होती है, हर बात में राजनीतिक दल तथा बुद्धिजीवियों का एक वर्ग संघ को घसीटता है, उसके सारे कार्यो को केवल सत्ता पाकर विचार लादने के लक्ष्य के रुप में वर्णित किया जाता है, बहुत सारे लोग संघ या उसके दूसरे संगठनों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं उनके मन में भी भ्रांतियां पैदा हो जातीं हैं....तो इन सब पर एक बार समागम करके विस्तार से अपना पक्ष रख दिया जाए। पिछले कुछ वर्षों में हिन्दुत्व के नाम पर जगह-जगह उच्छृंखल तत्व जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर हिन्दुत्व के नाम पर जैसी अनर्गल बातें की जा रहीं हैं....उनको भी संदेश देना जरुरी था कि संघ का हिन्दुत्व दर्शन क्या है। संघ परिवार के भीतर भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपनी विचारधारा के बारे में भ्रमित रहते हैं। इसीलिए संघ ने उसे सोशल मीडिया पर भी लाइव प्रसारित किया था ताकि देश विदेश में जहां भी लोग चाहें वे सुन सकते हैं।
इसके बाद यह प्रश्न उठता है कि मोहन भागवत द्वारा इतनी विस्तृत व्याख्या और स्पष्टीकरण के बाद क्या वाकई संघ का नया चेहरा आएगा? भागवत की बातों के पहला निष्कर्ष यह है कि डॉ. हेडगेवार ने जो कुछ सूत्र रुप में दिया संघ उसी को आगे विस्तृत कर रहा है। यह मान लेना कि संघ ने बदलाव नहीं किया है गलत होगा। पहले कु. सी. सुदर्शन तथा अब भागवत ने अपने नेतृत्व में विचार और व्यवहार के स्तर पर संघ को बदला है। संघ ने सीधे किसी आंदोलन में भाग न लेकर सिर्फ देशभक्त, निर्भीक और संमर्पित स्वयंसेवकों के निर्माण का दायित्व अपने उपर लिया था। स्वयंसेवक किसी आंदोलन में भाग ले सकता था, किसी संगठन का सदस्य भी बन सकता है। भागवत ने यहां तक कह दिया कि स्वयंसेवक चाहे तो किसी राजनीतिक दल का भी सदस्य बन सकता है। विरोधी आज भी 1966 की बंच ऑफ थॉट या विचार नवनीत को गलत उद्धृत करके संघ को कठघरे में खड़ा करते है। भागवत ने साफ किया कि वो बातें उस समय की परिस्थितियों में कही गई। हम बंद संगठन नहीं है। उनकी बातों से स्पष्ट है कि हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की मूल अवधारणा पर तो कायम है, किंतु इसकी व्याख्या धीरे-धीरे ज्यादा उदार, स्पष्ट और मान्य हुई है। किसी भी संगठन का क्रमिक विकास होता है। स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, स्वामी विवेकानंद का रामकृष्ण मिशन सिमटते हुए संप्रदाय जैसे रह गए हैं, जबकि संघ न संप्रदाय बना न सिमटा, इसका सतत विस्तार हुआ है। यह बताता है कि देश, काल, परिस्थिति के अनुसार मूल हिन्दुत्व पर टिके हुए ही उसकी व्याख्या को धीरे-धीरे ज्यादा स्वीकार्य बनाया है।
संघ की सबसे ज्यादा आलोचना हिन्दुत्व को लेकर ही होती है। हिन्दुत्व कोई मजहब, कोई पूजा की पद्धति नहीं है। यह जीवन दर्शन है जो विविधाताओं से परिपूर्ण है। भागवत ने कहा कि हिन्दुत्व ऐसा नहीं है जिसमें दूसरे मजहब न समा सकें। यदि मुसलमान इसमें नहीं आ सकते तो यह हिन्दुत्व होगा ही नहीं। यह उन लोगों के लिए संदेश है जो हिन्दुत्व के नाम विकृत तरीके की सोच और व्यवहार के शिकार हैं। भागवत ने कहा कि विविधता हिन्दू संस्कृति की शक्ति है। इसे विश्व में हिंदुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पर भारत में पिछले ढेड़ से दो हजार सालों में धर्म के नाम पर अधर्म बढ़ा, रूढ़ियां बढ़ीं इसलिए भारत में हिंदुत्व के नाम पर रोष होता है। धर्म के नाम बहुत अधर्म का काम हुआ है। इसलिए अपने व्यवहार को ठीक करके हिंदुत्व के सच्चे विचार पर चलना चाहिए। उनसे पूछा गया कि हिंदुत्व, हिंदुनेस और हिंदुइज्म क्या तीनों एक ही है?उन्होंने उत्तर दिया--नहीं, इज्म यानी वाद एक बंद चीज मानी जाती है, उसमें विकास के लिए खुली राह नहीं होती है। हिंदुत्व एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। हिंदुत्व अन्य मतावलंबियों के साथ तालमेल कर चल सकने वाली एकमात्र विचारधारा है। भारत में रहने वाले सभी अपने हैं।
हिन्दुत्व की इससे बढ़िया व्याख्या नहीं हो सकती। कहा गया है- यस्तु सर्वाणि भूतानि, सर्वभूतेषु च आत्मनः। यानी सभी में एक ही तत्व है। सब मुझमे हैं और मैं सबमे हूं। इसमें किसी के प्रति भेदभाव की गुंजाइश कहां है। एक उदाहरण अथर्ववेद के ‘पृथिवी सुक्त’ का दिया जा सकता है। इसमें ऋषि से श्ष्यि प्रश्न करते हैं। ‘‘ऋषिवर! हमारी इस धरती के निवासियों का सृजनात्मक स्वरूप क्या हैं?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘नाना जातिः नाना धर्माः नाना वर्णाः,नाना वर्चस यथोकसम्’’। अर्थात् हमारी इस धरती पर विविध जातियों, विविध धर्मों, विविध वर्णों और विविध भाषा-भाषियों का निवास है। शिष्य फिर प्रश्न करते हैं-‘‘यदि हमारी इस भूमि के निवासियों में इतनी विविधता है,तब यहां एकता कैसे संभव होगी?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘ यदि इस एक सिद्धान्त पर लोग आचरण करें कि ‘ माताः भूमिः पुत्रोअहम् पृथ्व्यिा’ अर्थात् यह भूमि माता-पिता की, इस पृथिवी की हम संतान हैं, तो सहजभाव से सब परस्पर भाई-भाई बन जाते हैं और तब सरलता से ‘विविधता में एकता’ हो सकती है।’’शिष्य फिर पूछते हैं-‘‘ क्या एकता के लिए इतना यथेष्ट है?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘ नहीं, उन्हें एक बात और करनी होगी, और वह यह कि -‘वाचः मधु’- अर्थात् जब परस्पर बात करें, वाणी में मिठास हो, कटुता या हिंसा न हो।’’
मोहन भागवत ने हिन्दुत्व के इसी व्यापक स्वरुप को संघ का सिद्धांत बताया है। हिन्दू राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि हम संविधान नहीं मानते और जबरन परिवर्तन कर अन्य मजहबों के अधिकार छीन लेंगे। दूसरे, इसे हम हिन्दू राष्ट्र मानते हैं,बनाने की आवश्यकता ही नही। उन्होंने गोरक्षा से लेकर जनसंख्या नीति, भाषा, शिक्षा नीति, जातिभेद और छुआछूत, अंतर्जातीय एवं अंतधर्मीय विवाह, महिलाओं के सशक्तीकरण, यहां तक की समलैंगिकता पर भी विचार प्रकट किए और सबमें बनाई गई छवि के विपरीत प्रगतिशील और उदार विचार। गोरक्षा के नाम पर हिंसा के संदर्भ में कहा कि कानून हाथ में लेने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए। गोरक्षा करने वाले गाय को घर पर रखें, उसे खुला छोड़ेंगे तो आस्था पर सवाल उठेगा। इसलिए गो संवर्धन पर विचार होना चाहिए। अच्छी गौशाला चलाने वाले कई मुसलमान भी हैं। भाषा के बारे में उन्होंने कहा भारत की सभी भाषाएं हमारी अपनी है। किसी भाषा से शत्रुता करने की जरूरत नहीं है। अंग्रेजी का हौवा जो हमारे मन में है उसको निकालना चाहिए। देश का काम अपनी भाषा में हो इसकी आवश्यकता है। हिंदी की बात पुराने समय से चली है अधिक लोग इसे बोलते हैं इसीलिए चली है। लेकिन इसका मन बनाना पड़ेगा, कानून बनाने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने जाति व्यवस्था को जाति अव्यवस्था कहा, अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने की बात की। आरक्षण को अभी आवश्यक बताया लेकिन कहा कि समस्या आरक्षण की राजनीति है।
इस प्रकार देखें तो संघ ने अपने को पूरी तरह खोलकर देश के सामने रख दिया है। थोड़े शब्दों में कहें तो उन्होंने. चारित्र्य संपन्न देश़ जिसके नागरिक सुशील हों, ज्ञान संपन्न देश, संगठित समरस,. समतायुक्त, शोषणमुक्त समाज को भविष्य का भारत बताया है। उन्होंने एक ऐसे आदर्श देश का लक्ष्य पेश किया है जो दुनिया के गरीब, वंचित और पिछडे देशों की प्रगति के लिए सक्रिय रहने के साथ विश्व कल्याण के लिए काम करे। हमारे महापुरूषों ने ऐसे ही भारत की कल्पना की थी। विरोधी कुछ भी कहें संघ ने व्यापक पैमाने पर संदेश दिया है और चूंकि यह सबके समझने लायक है, सकारात्मक है इसलिए इसका असर होगा। नए समर्थक पैदा होंगे। हां, इससे हिन्दुत्व के नाम पर दूसरे मजहब से नफरत करने वाले, उन पर वैचारिक हमला करने वाले निराश और क्षुब्ध होंगे। किंतु काम करने वालों को बिल्कुल स्पष्ट दिशा मिल गई है कि संघ क्या है, क्या चाहता है और कैसे काम करना चाहता है। भागवत ने नए दौर की शुरुआत की है।
अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 09811027208
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