शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

सिमी आतंकवादी मारे गए, पर इनका जेल से भागना चिंताजनक

 

अवधेश कुमार

भोपाल केन्द्रीय कारागार से भागे स्टुडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के 8 आतंकवादियों के मारे जाने पर जो बवण्डर खड़ा करने की कोशिश हुई है उससे किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भारत में याकूब मेनन से लेकर अफजल गुरु तक पर बवण्डर खड़ा किया गया, इशरत जहां के तीन साथियों के साथ मुठभेड़ को प्रश्नों के घेरे में लाने की कोशिशें अभी तक जारी है। यह घटना भी कुछ ऐसी है। आठों पहले जेल से भागते हैं और 9 घंटे के भीतर ही पुलिस द्वारा इनको ढेर कर दिया जाता है। सामान्यतः पुलिस को ऐसी सफलता नहीं मिलती है। इसलिए भी बहुत लोगों को शंका हो रही है। कुछ ऐसे लोग हैं जो ऐसे मामलों पर स्थायी शंका पैदा करते हैं। कुछ समय के लिए यह मान लेते हैं कि सभी लोगांें के प्रश्नों का जवाब पुलिस संतोषजनक ढंग से नहीं दे पा रही है। ऐसे मामले में यह स्वाभाविक है। किंतु जिस गांव में वे मारे गए वहां के लोग तो बताएंगे कि सच क्या है। इन होहल्ला और छाती पीट माहौल से अलग प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या इस मामले का यही महत्वपूर्ण पहलू है? क्या इनका जेल में एक आरक्षक की हत्या कर तथा दूसरे को घायल कर भाग जाना महत्वपूर्ण नहीं है? कोई निर्दोष एवं कभी अपराध न करने वाला व्यक्ति इस तरह न हत्या कर सकता है न जेल से भागने का ऐसा षडयंत्र रच सकता है। दूसरे, इस मामले पर विचार करते समय उन पर आतंकवाद सहित जो अन्य आरोप हैं उनको भी ध्यान में रखना चाहिए। तीसरे, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इन आठोें मंें से तीन ऐसे हैं जो पहले भी खंडवा जेल से भाग चुके हैं। इसलिए उनके मारे जाने को संदेह के घेरे में लाकर और उसकी पर फोकस करके हम इनसे जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर देंगे।

इसमें सबसे पहला है, भोपाल जैसे अति सुरक्षित माने जाने वाले कारागार से इनका निकल भागना। यह जेल की पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करता है। ऐसा षडयंत्र जेल के अंदर के लोगों की मिलीभगत के बगैर सफल हो ही नहीं सकता। आखिर रात के दो से चार बजे के बीच ये किस तरह एक साथ प्रधान आरक्षक हमला करने में सफल रहे? ध्यान रखिए, प्रधान आरक्षक की चम्मच या प्लेट से बनाए गए धारदार हथियार से गला रेतकर हत्या कर दी और दूसरे आरक्षक को हल्का घायल कर हाथ-पैर बांध दिए। इसके बाद चादर में लकड़ी बांधकर उसकी सीढ़ी बनाई और करीब 25 फीट ऊंची दीवार को फांदकर निकल गए। इस पूरी वारदात में समय लगा होगा। यह 5-10 मिनट में संभव नहीं होगा। क्या भोपाल जेल में सुरक्षा इतनी लचर है कि इतने समय तक इन पर किसी प्रहरी की नजर गई ही नहीं? आठ लोग यदि चादर और लकड़ी की सीढ़ियों से दीवाल फांदेंगे तो उसमें भी समय लगा होगा। प्रश्न तो यह भी है कि आखिर  आतंकवाद के इन आरोपियों को एकत्रित होने का अवसर कैसे मिला? वह भी इस पृष्ठभूमि के बाद कि उनमंें से कई पिछली बार 12 अक्टूबर 2013 में ही खंडवा जेल से भाग चुके थे। खंडवा में ये जेल के बाथरूम की दीवार तोड़कर फरार हुए थे। खंडवा फरारी घटना के बाद सरकार ने मध्यप्रदेश के अलग-अलग जेलांे में बंद सिमी के आरोपियों को भोपाल जेल स्थानांतरित कर दिया ताकि वे फिर भाग न सके। जाहिर है उनको विशेष प्रत्यक्ष और परोक्ष निगरानी में रखा जाना चाहिए था जिसमें साफ कमी दिखाई देती है। अब एनआईए इनकी जांच कर रही है तो मान लेना चाहिए सच सामने आ जाएगा तथा उसकी अनुशंसाओं के आधार पर अन्य जेलों की सुरक्षा में भी सुधार किया जा सकेगा।

ध्यान रखिए, 12 अक्टूबर 2013 को खंडवा जेल से सात कैदी भागे थे। ये थे, अबू फैजल खान, एजाजुद्दीन अजीजुद्दीन, असलम अय्यूब, अमजद, जाकिर, शेख महबूब और आबिद मिर्जा। भागने के बाद उनने 1 फरवरी 2014 को तेलंगाना के करीमनगर में डकैती की थी। इसके बाद चेन्नई, पुणे, बिजनौर शहरों में तीन बम धमाके करने में इनकी संलिप्तता सामने आई। इन पर अहमदाबाद में बम धमाके का भी आरोप है। 12 सितम्बर 2014 को बिजनौर के मोहल्ला जाटान स्थित एक मकान में विस्फोट हो गया था। विस्फोट के बाद असलम, एजाजुद्दीन उर्फ एजाज, मोहम्मद सालिक उर्फ सल्लू उर्फ अबु फैजल, महबूब उर्फ गुड्डू उर्फ मलिक, अमजद, जाकिर हुसैन उर्फ सादिक फरार हो थे। बम बनाते समय विस्फोट में महबूब झुलस गया था। जाटान विस्फोट मामले में छह मुकदमे दर्ज हुए थे। आतंकवादियों की मदद करने के आरोप में हुस्ना, नदीम, रईस टेलर, उसका पुत्र अब्दुल्ला, झालू निवासी फुरकान को जेल भेजा गया था। पांचों को पिछले साल लखनऊ जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। 3 अप्रैल 2015 को तेलंगाना के जिला नलगोडा में पुलिस ने इनमें से दो असलम व एजाजुद्दीन को मुठभेड़ में मार गिराया था। बाकी फरार हो गए थे। 24 दिसंबर 13 को सरगना अबू फैजल को बड़वानी जिले के सेंधवा से गिरफ्तार करने में सफलता मिली थी। 17 फरवरी 2016 को महबूब, अमजद, जाकिर हुसैन उर्फ सादिक को उड़ीसा पुलिस ने राउरकेला से गिरफ्तार किया था। आबिद को कुछ ही देर बाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। देश के विभिन्न प्रांतों में दहशत फैलाने और लूट की वारदातों को अंजाम देने के मामले में एनआईए को इनकी तलाश थी। राउरकेला में उड़ीसा की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप, मध्यप्रदेश की एंटी टेरिस्ट स्क्वाड (एटीएस) और तेलंगाना पुलिस की टीम ने संयुक्त कार्रवाई की थी। राउरकेला के कुरैशी मोहल्ले में चारों  एक कमरा किराए पर लेकर रह रहे थे। इनको गिरफ्तार करने के दौरान पुलिस को छह रिवाल्वर सहित अन्य हथियार, मोबाइल, छह बाइक, पैन ड्राइव, बैंक पासबुक, दो पैन कार्ड भी मिले। पैन कार्ड दीपक साहू और कुलदीप सिंग के नाम बने हुए हैं। ये इनका उपयोग पहचान पत्र के रूप में करते थे। एक कार टाटा इंडिका यूपी-16-एडी-3896 भी जब्त की गई। जब्त की गई छह बाइक छत्तीसगढ़ परिवहन विभाग में दर्ज थी।

पुलिस के अनुसार पिछली बार जब अबू फैजल ने पकड़े जाने के बाद पूछताछ में बताया था कि वे तालिबान से संपर्क में थे। खंडवा में एटीएस जवान सीतारात यादव, अधिवक्ता संजय पाल और बैंककर्मी रविशकंर पारे की हत्या का आरोप भी इन पर था। कहने का तात्पर्य यह कि इनके अपराधी होने को लेकर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। इन सबका सरगना अबू फैजल था जिसे सुरक्षा एजेंसियां बड़ा आतंकवादी मानती रहीं हैं। इनके कारनामे ही इनके खूंखार होने का प्रमाण देतीं हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि इनकी सुरक्षा में जेल में ऐसी चूक कैसे हो गई। जाहिर है यह चूक अक्षम्य है। अगर ये बच गए होेते तो क्या करते कहना कठिन है। कारण, हाल के वर्षों में आतंकवादियों के लिए वारदात करना कठिन हो गया है। यहां तक कि माओवादी भी अब पहले की तरह हमले नहीं कर पाते हैं। बवजूद इसके ये हमारे आपके अंदर तो भय पैदा कर ही सकते थे। हो सकता है फिर ये आतंकवादी वारदात का षडयंत्र रचते।

जहां तक पुलिस की कार्रवाई पर संदेह की बात है तो यह हमारे यहां होगा। असदुद्दीन ओवैसी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि जेल से भागते हुए इन विचाराधीन कैदियों ने पूरे कपड़े, जूते, घड़ियां और कलाई पर बैंड पहने हुए थे। उनकी पैंट में बेल्ट भी लगी थी। उनकी यह बात ठीक है कि विचाराधीन कैदियों को ये सब वस्तुएं नहीं दी जाती हैं, लेकिन जेल में तो किसी तरह का हथियार भी नहीं मिलता। उनने गला रेतने का काम किया। जब ये साजिश के तहत भागे हैं तो उनने अपने लिए सारी व्यवस्थाएं करवाई हों। इसीलिए तो जांच की आवश्यकता है कि इनके भागने में अंदर किनका सहयोग मिला, बाहर से कौन सहयोग कर रहा था....ये कब से योजनाएं बना रहे थे..आदि आदि। प्रश्न उठाने वाले उठाएं, लेकिन देश में पुलिस की कार्रवाई का व्यापक समर्थन है। हालांकि इससे जेल की सुरक्षा चूक का मामला हाशिए में नहीं चला जाता।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

विस्तारित दक्षेस या एक अलग ईकाई की पाकिस्तानी रणनीति

 

अवधेश कुमार

हमारा या आपका समाज में गलतियों के कारण बहिष्कार हो तो हमें आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि हमसे कहां गलतियां या भूलें हुईं हैं। इसकी बजाय यदि हम अपने समाज को दोष देकर उसके विरुद्ध कोई दूर का नया समाज बनाने के लिए निकल पड़े ंतो फिर हमारी दुर्दशा ही होती है। अपना समाज तो छूटता ही है, नया समाज भी नहीं बनता, क्योंकि सबको आपका असलियत पता होता है और वह व्यावहारिक भी नहीं होता। दक्षेस सम्मेलन के पांच देशों द्वारा बहिष्कार के बाद पाकिस्तान इन दिनों ऐसा ही नासमझ प्रयास करने की ओर चल पड़ा है। अब उसने एक नया शगूफा साइआ यानी साउथ एशियन इकोनॉमिक अलायंस का शगूफा छोड़ा है। इसे हम हिन्दी में दक्षिण एशिया आर्थिक गठजोड़ कह सकते हैं। आप इसके पीछे पाकिस्तान का तर्क सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे। वह कहता है कि  चीन, ईरान और आसपास के पड़ोसी देशों यानी मध्य एशिया के देशों को मिलाकर इस नए समूह को खड़ा किया जा सकता है। अजीब बात है। नाम दक्षिण एशिया और उसमें चीन, ईरान तथा मध्यएशिया के देश! यह कौन सा विचार हुआ? अगर पाकिस्तान इसे कोई दूसरा नाम देता और उसके लिए प्रयास करता तो कुछ क्षण के लिए उस पर विचार करने की नौबत भी आ सकती थी। यहां तो सोच ही तथ्यों से परे है। नाम हिमालय क्षेत्र और देशों के नाम आल्प्स पर्वत के आसपास का। इस पर कोई हंसेगा नही ंतो और क्या करेगा।

पाकिस्तान की समस्या भारत है। उसे लगता है कि भारत ने हमें दक्षेस से अलग-थलग कराया है तो एक ऐसा समूह खड़ा कर दो जिसमें भारत या तो हो नहीं या फिर हो तो वह कमजोर रहे। चीन और ईरान उसे इस मामले में ऐसे देश नजर आते हैं जो भारत को काउंटर कर सकते हैं। हालांकि अभी पाकिस्तान ने इसका पूरा खाका भी नहीं दिया है जिससे लगे कि यह दक्षेस को ही विस्तारित करना चाहता है या उससे अलग कोई समूह विकसित करना चाहता है। विडम्बना देखिए कि इसका समाचार पाकिस्तान से नहीं न्यूयॉर्क से आता है। अमेरिका गए पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की ओर से इसका बयान दिया गया। वहां पाकिस्तानी सांसद मुशाहिद हुसैन सैयद ने कहा कि दुनिया में दक्षिण एशिया उभर रहा है। इसमें चीन, ईरान और आसपास के पडोसी देश शामिल हैं। ऐसे में, सभी देशों को साथ लाया जा सकता है। हुसैन के अनुसार - हुसैन ने बताया- चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा दक्षिण एशिया को मध्य एशिया के साथ जोड़ने का महत्वपूर्णा रास्ता है। ग्वादर बंदरगाह इसमें महत्वपूर्ण निभा सकता है। हम चाहते हैं कि भारत भी इसमें शामिल हो। सबसे पहला प्रश्न तो यही उठेगा कि क्या पाकिस्तान दुनिया में इतना महत्वपूर्ण देश है कि वह कोई योजना दे और उसे देश तुरत स्वीकार कर लें? एक ओर प्रतिनिधिमंडल का यह बयान आया और उनके वहां रहते हुए ही अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने भारत के सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन कर दिया। प्रवक्ता ने उड़ी हमले को पाकिस्तानी सीमा से आए आतंकवादियों की कार्रवाई मानते हुए सर्जिकल स्ट्राइक को भारत का स्वाभाविक जवाब माना है।

तो पहले पाकिस्तान अपने इस कलंक को धोये या उसे नष्ट करने की पहल करे तभी न उसकी विश्वसनीयता दुनिया में होगी। इस समय तो उसकी साख दुनिया मंें पूरी तरह खत्म है। इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी के जो देश उसके साथ दिखते हैं उनके कारण अलग हैं। मूल बात यही है कि जिन कारणों से भारत, बांग्लादेश और अफगानिस्तान ने पहले इस्लामाबाद दक्षेस शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया तथा बाद मंें भूटान एवं श्रीलंका ने उसे सही माना उनकी गंभीरता को पाक समझे। उसे वह समझने को तैयार नहीं। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पाकिस्तान की हैसियत क्या है? वह बगैर विदेशी सहायता के अपना खर्च तक नहीं चला सकता। देश में आतंकवादियों के वर्चस्व के कारण चीन को छोड़कर कोई महत्वपूर्ण देश वहां पूंजीनिवेश करने की सोचता भी नहीं। चीन की भी अपनी रणनीति है। वह पाकिस्तान को एक उपग्रह देश यानी परोक्ष उपनिवेश के रुप में उपयोग करना चाहता है। उसकी रणनीति यह भी है कि भारत कभी निश्चिंत होकर नहीं रह सके।  ऐसा देश अगर अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक नए क्षेत्रीय आर्थिक ईकाई का गठन करने की पहल करे तो उसका साथ कौन देगा।

यहां प्रश्न यह भी है कि चीन, ईरान या आसपास के देश भौगोलिक रुप से दक्षिण एशिया के अंग कैसे हो जाएंगे? चीन पूर्वी एशिया का देश है तो ईरान पश्चिम एशिया या मध्यपूर्व का, अन्य देश मध्य एशिया के भाग हैं। उन्हें पाकिस्तान दक्षिण एशिया का भाग बनाना चाहता है। उसके चाहने से दुनिया इनको दक्षिण एशिया का भाग नहीं मान सकता है। अगर दक्षेस में अपने अपराध के कारण वह अलग-थलग पड़ा है और उसके अंदर भारत के खिलाफ प्रतिशोध का भाव है तो उसके लिए अन्य देश क्यों उसका साथ देंगे। कूटनीति भी हवा में नहीं की जाती। कूटनीति हमारी अपनी स्थिति, हमारे बारे में अन्य देशों की धारणा और संभावनाओं पर ही आगे बढ़ती है। आपकी कूटनीति की सफलता के लिए उसका ठोस आधार तथा तर्कों पर आधारित  होना चाहिए। पाकिस्तान के मौजूदा शगूफे में इनमें से कुछ भी नहीं है। वैसे भी अगर दक्षेस में किसी एक देश या देशों को शामिल करना है या उनको पर्यवेक्षक का ही दर्जा देना है या इसके साथ जुड़ी हुई विस्तारित आर्थिक ईकाई का निर्माण करना है तो सभी सदस्य देशों की सहमति से ही हो सकता है। इसके लिए बाजाब्ता प्रस्ताव आना चाहिए और उस पर सर्वसम्मति कायम होनी चाहिए। अफगानिस्तान सभी देशों की सहमति से शामिल हुआ।  हम मानते हैं कि चीन पाकिस्तान का साथ दे सकता है क्योंकि इसमें उसकी रणनीति भी शामिल है। किंतु अन्य देश ऐसा करेंगे इसमें संदेह है। ईरान के भारत के साथ अच्छे संबंध हैं। दोनों ने ऐतिहासिक चाबाहार बंदरगाह विकास समझौता पर हस्ताक्षर किया है। ईरान भारत के विरुद्व पाकिस्तान की किसी पहल का भाग हो जाए ऐसा मानना कठिन है। मध्यएशिया के देशों से भी भारत के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं। उनको पता है कि पाकिस्तान ने जानबूझकर भारत को नीचा दिखाने के लिए यह राग छेड़ा है। इसलिए वे भी उसमें हिस्सा बनेंगे इसमें संदेह है।

इस तरह कुल मिलाकर पाकिस्तान ने भारत से प्रतिशोध लेने या हम आपसे कम नहीं है यह दिखाने के लिए चाहे जितना सोच-समझकर साइआ या दक्षिण एशिया आर्थिक गठजोड़ का शगूफा छोड़ा हो, इसके मूर्त रुप लेने की संभावना न के बराबर है। कोई भी ऐसा संगठन खड़ा करने की अगुवाई करने वाले देश की अपनी विश्वसनीयता या क्षमता होनी चाहिए। पाकिस्तान एक विश्वसनीय और क्षमतावान राष्ट्र बन सकता है बशर्तें वह अपना चरित्र और चाल बदले। भारत सहित दूसरे देशों में आतंकवाद का निर्यात बंद करने के लिए प्राणपण से लगे, गद्दी बचाने के लिए नेता कश्मीर राग अलापने की जगह पाकिस्तान को एक आधुनिक, शिक्षित और विकसित समाज बनाने के लिए काम करें, राजनीतिक नेतृत्व पर से सेना का दबाव खत्म हो और सेना राजनीतिक नेतृत्व के मार्गदर्शन मंें काम करे....। यह सब तभी होगा जब पाकिस्तान यह माने कि आतंकवाद को पाल पोसकर उसने भयंकर भूल की है। जब तक वह इसे स्वीकार ही करेगा उसमें सुधार की गुंजाइश पैदा ही नहीं होगी। ऐसे में विश्व समुदाय के बीच उसकी इज्जत नहीं हो सकती। इसलिए अच्छा है कि पाकिस्तान भारत को नीचा दिखाने के लिए ऐसी कोशिश करने की जगह अपना घर संभालने पर ध्यान केन्द्रित करे। पाकिस्तान की मीडिया, वहां के बुद्धिजीवी और विवेकशील नागरिक समूह और समझदार नेताओं की जिम्मेवारी हैं कि वे देश को रास्ते पर लाने के लिए आगे आएं। वहां जन जागरण करें। सच्चाई से लोगों को अवगत कराएं। अगर उसने सुधार किया तो फिर भारत और दक्षिण एशिया के सारे देश उसके सहयोग हो जाएंगे। ऐसे में उसके अलग-थलग पड़ने की संभावना ही पैदा नहीं होगी। पाकिस्तान से ऐसा होने का  संकेत तक नहीं मिल रहा। इसके बगैर अगर वह किसी प्रकार की ईकाई बना भी लेता है जिसकी संभावना बिल्कुल नहीं है और उसके यहां के आतंकवादी वहां जाकर हिंसा फैला देते हैं तो फिर वह देश उसके साथ क्या करेगा इसकी कल्पना करिए।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208 

 

 

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

आम नागरिक सेवा समीति ने सर सैय्यद अहमद खां की जयंती पर चित्रकला प्रतियोगिता कार्यक्रम का आयोजन किया

मो. रियाज़

आज "आम नागरिक सेवा समीति" ने बुलंद मस्जिद शास्त्री पार्क क्षेत्र में सर सैय्यद अहमद खाँ के जन्मदिन के शुभ अवसर पर एक चित्रकला प्रतियोगिता कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें कई स्कूलों के बच्चों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया। इस प्रतियोगिता में मुख्यातिथि श्री राकेश सेहरावात ने तीन बच्चों को ट्रॉफी देकर पुस्कृत किया गया। इसके अलावा 100 बच्चों को कॉपी, जोमेक्ट्री बॉक्स आदि गिफ्ट देकर उनकी हौसला अफजाई की गई।

इस मौके पर राशिद अली ने सर सैय्यद अहमद खां के जीवन के संघर्ष के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि 1875 में पहला मुस्लिम स्कूल मुरादाबाद में फ़िर गाजीपुर और अलीगढ़ में एंग्लो इंटर कॉलेज बनाया और आज उसको पूरी दुनियां में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने इंग्लिश एवं उर्दू को प्रोत्साहित किया।

इस मौके पर गंजफर अली खां, काजी आतिफ अली, तश्किल खां, राशिद अली, मोहम्मद अनीस, मामा जी, कान्ता जैन, लियाकत खां, साजिद अंसारी, हाजी जमालुद्दीन, साजिद भाई जीन्स वाले, अमजद, विकास आदि लोगों ने प्रोग्राम में शिरकत की और इसे कामयाब बनाया।








शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

बहुजन अधिकार आन्दोलन ने शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किए जाने की मांग की

आज राष्ट्रीय जन क्रांति मंच के तत्वाधान में एक मीटिंग का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता सरदार बलविंदर सिंह अध्यक्ष राष्ट्रीय जन क्रांति मंच ने की। इस मीटिंग में बहुजन अधिकार आन्दोलन की प्रमुख माँग पर चर्चा हुई। भारत में सामान शिक्षा का अधिकार दिया जाये। देश में बदहाल शिक्षा निति पर चिंता जताते हुए संगठन के सभी पदाधिकारियों चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जिस प्रकार हमारे सरकारी स्कूलों में शिक्षा आज का शिक्षा का जो स्तर है उससे आज देश के मध्यम परिवार ही नहीं बल्कि देश का भविष्य भी खतरे में है क्योंकि इतिहास गवाह है की जिस देश की शिक्षा प्रणाली कमजोर होती है वह देश कभी भी तरक्की नहीं कर सकता और आज भारत में प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा देने की जगह बच्चों को मिडडेमील में ही बाँध दिया गया है सरकारी व गैरसरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर में जमीन आसमान का अंतर है पूंजीपति तो अपने बच्चो को महंगी फीस देकर गैरसरकारी स्कूलों में में अच्छी शिक्षा दिलवा देते है लेकिन मध्यम वर्ग इतना सक्षम नहीं है की अपने बच्चो की महंगी फीस देकर उच्च स्तर की शिक्षा दिलवा सके और जब तक तक देश में सामान शिक्षा नही होगी तब तक देश का सही मायनो में भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता इसिलिय देश में शिक्षा का राष्ट्रीयाकरण किया जाये। भारत सरकार यदि सही मायनो में गरीबों की सरकार है तो उन्हें सभी को सामान शिक्षा का अधिकार देना होगा। इस मीटिंग में मुख्य भूमिका प्रवीन राव, इन्दर सिंह, फिलिप क्रिस्टी, शीला बेंजमिन, उपेन्द्र भारती, जेम्स एडवर्ड, अंकुर, वीरेंदर कुमार, अभय कुमार, एस.पी सिंह, आशा जी ने निभा।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

सीमा सील करने का विचार कितना व्यावहारिक

 

अवधेश कुमार

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा यह कहने के बाद कि वर्ष 2018 तक भारत-पाकिस्तान की सीमा को पूरी तरह से सील कर दिया जाएगा इस पर बहस छिड़ गई है। एक पक्ष का मानना है कि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही कठिन। उनके अनुसार पाकिस्तान से लगे सीमा क्षेत्रों की भौगोलिक स्थितियां ऐसी हैं कि यह पूरी तरह सील हो ही नहीं सकतीं। दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि ऐसा हो सकता है। ये इजरायल का उदाहरण देते हैं जिसने यह करके दिखा दिया है। राजनाथ सिंह ने यह बात राजस्थान के जैसलमेर में आयोजित पाकिस्तान सीमा से लगने वाले राज्यों की ताजा सुरक्षा प्रबंधों की समीक्षा बैठक के बाद कही। ध्यान रखिए उन्होंने यह भी कहा कि सीमा को सील करने का कार्य तय वक्त में काम पूरा कर लिया जाएगा। उनके पूरे कथन का भाव यह था कि सीमा सील करने की बात केवल कल्पना नहीं है, उसकी योजना बन चुकी है और काम आरंभ हो चुका है। उनके अनुसार सीमा को सील करने के लिए आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सीमा की निगरानी के लिए बॉर्डर सिक्योरिटी ग्रिड स्थापित किया जाएगा, जिसमें पाकिस्तान की सीमा से लगे चारों राज्यों का सहयोग लिया जाएगा। ये राज्य इस ग्रिड को अपने इनपुट देंगे, जिसके हिसाब से जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

राजनाथ सिंह के कथन को केन्द्र सरकार की सीमा संबंधी एप्रोच के साथ मिलाकर देखा जाए तो वे एक समग्र सीमा प्रबंधन की बात कर रहे हैं, जो न केवल अभेद्य दीवारों से घिरा होगा बल्कि उसमें ऐसे तकनीक होंगे, मानव प्रंबंधन इतना कुशल होगा कि सामन्य उल्लंघन की क्रिया पर भी पूरी प्रणाली सक्रिय हो जाएगी। यानी हर हाल में सीमा पार से घुसपैठ रोक दिया जाएगा। भारत पाकिस्तान की सीमा नियंत्रण रेखा को मिलाकर कुल 3323 किलोमीटर है जिसमें चार राज्य पंजाब, राजस्थान, जम्मू कश्मीर और गुजरात आते हैं। सरकार की योजना में सीमा पर कंक्रीट, लेजर बीम, रडार और उपग्रह सेंसर की दीवार खड़ी करने की बात है। इसकी जिम्मेदारी बॉर्डर मैनेजमेंट डिविजन को दे दी गई है। चारों राज्यों की अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक सुरक्षा दीवार बनाए जाने पर काम चल रहा है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में कई जगहों पर पक्की दीवार तो गुजरात के रण और सर क्रीक में लेजर वॉल और लेजर बीम से सीमा सील होगी। कैमरे, रडार और उपग्रह से नियंत्रित होने वाले सेंसर लगाए जाएंगे। इससे छोटी से छोटी हरकत की जानकारी भी कुछ सेकंड में मिल जाएगी। सबसे पहले जम्मू-कश्मीर में पक्की दीवार बनेगी। यह 10 फीट ऊंची होगी। सैटेलाइट सेंसर कोहरे में भी सीमा पर पैनी नजर रखेंगे। जम्मू-कश्मीर में सेंसर और लेजर से युक्त 6.9 किमी लंबी दीवार बनाने का प्रयोग सफल रहा है। सीमा सुरक्षा बल इस समय पंजाब में 45 स्थानों पर प्रायोगिक तौर पर लेजर वॉल से सुरक्षा कर रहा है।

आइए एक-एक राज्य की चुनौतियां, वर्तमान सीमा सुरक्षा व्यवस्था पर नजर दौड़ाएं। सबसे पहले जम्मू कश्मीर, क्योंकि आतंकवाद सहित ज्यादा सुरक्षा चुनौतियां यहीं हैं। नियंत्रण रेखा सहित जम्मू कश्मीर की सीमा लंबाई 1225 किमी है। इनमें 210 कि. मी. सीमा ऐसी है जिसमें पहाड़ों की 18,000 फीट तक ऊंची दुर्गम चोटियां हैं। यहां पारा शून्य से 50 डिग्री नीचे तक जाता है। यहां दोहरी तारबंदी, गश्ती के वाहन, सामान ढोने के लिए खच्चर आदि का प्रयोग किया जाता है। गुजरात से 508 कि. मी. सीमा लगती है। यहां दलदल और नमक के सफेद रण हैं।  262 किमी के दलदल में तारबंदी भी नहीं है। यहां जीरो लाइन पिलर भी नहीं दिखते। सफेद रण में तो दिशा तक का पता नहीं चलता। सर क्रीक में पानी के कारण बॉर्डर का पता ही नहीं चलता। जो उपाया सीमा सुरक्षा के किए गए हैं वो हैं, पानी, जमीन और दलदल में लड़ने में दक्ष क्रोकोडाइल कमांडो की तैनाती। इसके अलावा तैरती बोओपी, होवरक्राफ्ट, कोबरा वायर (करंट वाली तारबंदी) आदि का उपयोग भी होता है। राजस्थान में 1037 किमी है सीमा है। यहां 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान चला जाता है। रेत के 80-90 फीट ऊंचे शिफ्टिंग वाले टीले है। इसमें कोई भी भटक सकता है। तारबंदी रेत में दब जाती है और सीमा का पता नहीं चलता। अभी यहां पैदल, ऊंटों से गश्त, तारबंदी पर घंटियां बांधने जैसे प्रयोग हुए हैं। साथ ही फ्लड लाइट, सैंड स्कूटर, हाइटेक कम्पास, 90 फीट ऊंचे टावर लगे हैं। पंजाब में कुल सीमा 553 किमी है। यहां नदी-नालों की रचना ऐसी जटिल है कि सीमा प्रबंधन बड़ी चुनौती बन जाती है। उदाहरण के लिए रावी नदी 11 बार तथा सतुलज 9 बार सीमा के अंदर और बाहर होती है। घुसपैठ का खतरा यहीं से होता है। सर्दियों में इतना घना कोहरा होता है कि अपना हाथ तक न दिखाई दे। यहां आतंकी घुसपैठ के साथ हथियारों और ड्रग्स की तस्करी रोकना सबसे बड़ी चुनौती। यहां पैदल, घोड़ों, बाइक, जिप्सी व बोट से गश्त की जाती हैं, नावों पर नाके बने हैं.. कहीं-कहीं कैमरे, फ्लड लाइट आदि भी लगे हैं।

जाहिर है, इसे देखने के बाद सरकार की सीमा को अभेद बनाने की चुनौतियां का आभास हो जाता है। किंतु हमारे पास चारा क्या है। मरता क्या न करता। जब इजरायल ऐसा कर सकता है तो हम क्यों नहीं कर सकते। आतंकवादी घुसपैठ की समस्या से निपटने का सबसे कारगर रास्ता यही है कि सीमा ही अभेद हो जाए कि कोई प्रवेश न करे। इजरायल में 1994 में सीमा घेरने का काम शुरू हुआ था। इसने कर दिखाया और उसके बाद आतंकवादी हमलों में 90 प्रतिशत तक कमी आ गई। वैसे इजरायल की सीमा केवल 1068 किमी लंबी है। यानी हमारी पाकिस्तान से लगने वाली सीमा ही इससे तीन गुणा ज्यादा है। किंतु न भूलिए कि इजरायल की सीमा चार देशों मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और फलस्तीन से लगा हुआ है। मिस्र और सीरिया सीमा पर 16 फीट ऊंची फेंसिंग, लेबनान सीमा पर रेजर फेंसिंग, गाजा पट्टी पर कंक्रीट की दीवार और फेंसिंग है। दीवारों को जमीन से 8 फीट नीचे से बनाया गया है। राजनाथ सिंह के इजरायल दौरे का एक प्रमुख उद्देश्य उनकी सीमा प्रबंधन को समझना था। उनके साथ गए अधिकारियों ने इसे समझा एवं इस पर काफी समय पहले से काम आरंभ हो चुका है।

कह सकते हैं कि भारत की सीमा केवल पाकिस्तान से ही नहीं लगती। यह चीन, म्यान्मार, बंगलादेश, भूटान और नेपाल से तथा समुद्री सीमा श्रीलंका और मालदीव से भी लगती है। हर क्षेत्र की अलग समस्याएं हैं, पर मुख्य समस्या पाकिस्तान ही है। वैसे चीन के साथ बाड़ नहीं लग सकता, क्योंकि पूरी सीमा चिन्हित नहीं है। सीमा सुरक्षा को सशक्त किया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी तथा वायुसेना एवं थल सेना के डिविजन बढ़ाए गए हैं जिन पर चीन से चिंता भी प्रकट की जा रही है। सीमा को लेकर मोदी सरकार आरंभ से ही नए दृष्टिकोण से विचार करती रही है। गृह मंत्रालय ने देश की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा को और अधिक पुख्ता बनाने के लिए एक समिति का गठन किया। उसके बाद भारत और बांग्लादेश सीमा भी एक समिति का गठन किया गया। एक अन्य समिति पश्चिम सीमा के लिए बनाई गई थी इन सारी समितियों की रिपोर्ट सरकार को मिल चुकी है। केंद्र ने सभी सीमाओं के मूल्यांकन के लिए एक वर्ष का समय निर्धारित किया था। इस दौरान भारत नेपाल से लेकर देश की समुद्री सीमाओं तक सभी का मूल्यांकन किया गया। जून 2015 में ही भारत-बांग्लादेश की सीमा सुरक्षा योजना के तहत फ्लोटिंग एल्यूमीनियम बाड़ लगाने का निर्णय हुआ।  हल्के और कम वजन वाले इस बाड़ को लगाने का जिम्मा केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) को सौंपा गया है। इस परियोजना की शुरुआत नदी वाले भारत-बांग्लादेश की सीमा पर गोजाडांगा क्षेत्र से हुई है। इन बाड़ों को नदी वाले सीमा क्षेत्र में कंक्रीट और सीमेंट पर धातु के डंडों के सहारे लगाया जा रहा है। गृह मंत्री ने स्वयं कहा था कि  लगभग 1751 किलोमीटर भारत नेपाल की सीमा और 699 किलोमीटर भारत-भूटान सीमा पर चौकसी रखना चुनौती भरा कार्य है। कारण, यहां खुली सीमा है और दोनों देशों के लोगों का आना जाना लगा रहता है। तो यहां जवानों की मुश्तैदी पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है। भारत म्यान्मार सीमा को लेकर भी पूर्वोत्तर वाली समिति ने अपने सुझाव दिए थे जिस पर काम हो रहा है। भारत-म्यांमार सीमा के 10 किलोमीटर के दायरे में 240 गांवों में दो लाख से अधिक आबादी रहती है। यहां की समस्या उग्रवाद तथा हथियार और मादक पदार्थो की तस्करी की है।  इसमें सीमा पर अधिक से अधिक पुलिस थाने खोलने की योजना है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

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