शुक्रवार, 13 मई 2016

उत्तराखंड प्रकरण ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए हैं

 

अवधेश कुमार

तो उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन हो गया। उसके अनुसार उत्तराखंड के सदन पटल पर बहुमत का परीक्षण हुआ और हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार फिर गठित हो गई। जो हुआ वह अपेक्षित था। नौ विधायकों को मतदान से वंचित करने के बाद का अकंगणित थोड़ा ही धुंधला था। दोनों पक्ष तू डाल डाल हम पात पात की नीति पर चल रहे थे। इसमें उक्रांद के एक, बसपा के दो एवं तीन निर्दलीय विधायकों का महत्व बढ़ना ही था। उनने यदि कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया तो फिर हरीश रावत को बहुमत मिलना निश्चित था। हां, हरीश रावत के खिलाफ कांग्रेस से विद्रोह करने वाले नौ विधायकों को मतधिकार से वंचित नहीं किया जाता तो तस्वीर अलग होती। आखिर उनका विद्रोह तो कांग्रेस नेतृत्व यानी हरीश रावत से ही था। पहले अध्यक्ष ने उनकी सदस्यता रद्द की, फिर उच्च न्यायालय ने और उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई को आगे बढ़ा दिया। दरअसल, उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में पहले ही कह दिया था कि सदन के अंदर बहुमत के परीक्षण में ये नौ विधायक भाग नहीं ले सकेंगे। इसके बाद वह अपना मत इतनी जल्दी बदलेगा इसका कोई कारण नहीं था। तो फैसला हमारे सामने है।

उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस में से कौन बाजी मार ले गया है यह केवल तात्कालिक दृष्टि से ही महत्व का विषय हो सकता है। लेकिन इसके जो दूरगामी संकेत हैं वो चिंतित करने वाले हैं। कई मायनों में तो डराने वाले भी हैं। अगर किसी नेतृत्व के खिलाफ 31 में से नौ सदस्य विद्रोह कर जाएं या उनके प्रति अविश्वास प्रकट करें तो उनके साथ क्या व्यवहार होना चाहिए? यह प्रश्न पूरी गहराई से इस प्रकरण में उठा है। दल बदल कानून की तलवार उनकी सदस्यता रुपी गर्दन को उड़ा देती है। कानून अपनी जगह और राजनीति अपनी जगह। क्या पार्टी में किसी को नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार नहीं होना चाहिए? विद्रोहियांे ने यह नहीं कहा कि वे कांग्रेस के विरुद्ध हैं, उन्होंने केवल हरीश रावत का विरोध किया था। उन पर भ्रष्टाचार और कुशासन का आरोप लगाया था। नैतिकता का तकाजा था कि रावत इनके विद्रोह के बाद अपने इस्तीफा की पेशकश कम से कम केन्द्रीय नेतृत्व के सामने करते। इससे उनका नैतिक पक्ष मजबूत होता। आज हम उनके नैतिक पक्ष को मजबूत नहीं कह सकते। अगर उन्होने नहीं किया तो कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व को इसका समय पर संज्ञान लेकर विद्रोहियों की बातें सुननी चाहिएं थी। यदि उनकी बातों में तथ्य हों तो फिर नेतृत्व परिवर्तन पर विचार करना चाहिए। लेकिन सबके मन में यही था कि ये पार्टी के खिलाफ सदन में नहीं जा सकते, क्योंकि दलबदल कानून के अनुसार इनकी सदस्यता चली जाएगी और सदस्यता कौन गंवाना चाहेगा। इस रुप में दलबदल कानून यहां अधिनायकवादी व्यवहार का कारण बना।

इसके साथ यह भी सच है कि अगर भाजपा ने कांग्रेस के अंदर के असंतोष को हवा नहीं दी होती तो वे विधायक शायद इतनी दूर तक आने की नहीं सोचते। इसलिए भाजपा जो भी तर्क दे उसका नैतिक पक्ष भी यहां कमजोर दिखता है। उसने उन विधायकों को जिस तरह चार्टर्ड जहाज से यात्राएं कराई, होटल में रखा, उससे साफ था कि इन विधायकों के पीछे उनका हाथ है। हालांकि वर्तमान राजनीति में इसे बहुत सारे लोग गलत नहीं कहेंगे। लोग कह भी रहे थे कि अगर कांग्रेस के घर में छिद्र होगा तो दूसरे उसका लाभ क्यों नहीं उठाएंगे। वैसे भाजपा की जगह कांग्रेस होती तो वह भी यही करती। लेकिन नैतिक दृष्टि से तो इसे सबल पक्ष नहीं कहा जा सकता। भाजपा को कांग्रेस के अंदरुनी कलह में हाथ डालने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अगर वह हरीश रावत के शासन को भ्रष्टाचार और कुशासन का पर्याय मानती है तो उसके विरुद्व आंदोलन करना चाहिए था....जनता के बीच जाना चाहिए था....जनता को सरकार के खिलाफ खड़ा करना चाहिए था....आंदोलन से उसे इस्तीफा देने को मजबूर करने की कोशिश करनी चाहिए थी। यह स्वस्थ और नैतिक राजनीति का रास्ता होता। यह भाजपा ने नहीं किया। कांग्रेस की जगह अपनी सरकार बनाने की मानसिकता में उसने बागी विधायकों को साथ ले लिया। पता नहीं यह रणनीति किस स्तर पर और क्या सोचकर बनाई गई। तो भाजपा ने यहां काफी कुछ खोया है और सत्ता भी नहीं आ रही।

इसमें भी दो राय नहीं कि विधायकों को साथ रखने के लिए धन का प्रयोग हुआ। हरीश रावत के स्टिंग से ही यह बात साफ है कि वो विधायकों को मैनेज करने के लिए धन लेने और उसे लौटाने की बात कर रहे हैं। वे हालांकि स्टिंग करने वाले को पत्रकार की जगह ब्लैकमेलर और न जाने क्या-क्या कहते हैं। हालांकि अब उन्होंने यह मान लिया है कि उस स्टिंग में वे स्वयं हैं और उनकी आवाज भी है। हां, उनका कहना है कि मैंने तो मजाक में वैसा कह दिया। मजाक में कोई मुख्यमंत्री इस तरह की बात करेगा यह गले नहीं उतरता है। जाहिर है, वे अपना बचाव कर रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो हरीश रावत और उनके समर्थक जो भी दावा करें इस पूरे प्रकरण में उनका नैतिक पक्ष बिल्कुल भू लुंठित हो गया है। एक दूसरा स्टिंग उनकी पार्टी के ही नेता का आया जिसने यह बताया कि विधायकों को मैनेज करने यानी खर्चा पानी के लिए एकमुश्त राशियां दी गईं हैं। पहले स्टिंग की जांच सीबीआई कर रही है और यह मामला न्यायालय में भी आएगाा। वहां इसका फैसला जो भी हो, लेकिन स्टिंग देखने वालों ने माना कि यह सही है। स्टिंग में जो कुछ साफ दिख रहा है, जो स्पष्ट आवाज सुनाई दे रहा है उसे कैसे नकारा जा सकता है। तो सरकार के खिलाफ विद्रोह के बाद एक अत्यंत ही जुगुप्सा पैदा करने वाला आचरण राजनीति का हमारे सामने आया है।  

इस प्रकरण में जो एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभरी वह है, न्यायालय द्वारा विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों में कटौती। बहुमत का फैसला सदन के पटल पर हो यह सिद्वांत तो सर्वमान्य है। लेकिन वह सदन के अध्यक्ष के नेतृत्व में ही होना चाहिए एवं हार जीत की घोषणा उसी के द्वारा होनी चाहिए। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने विधानसभा के प्रमुख सचिव को जिम्मेवारी दी की वह मतों की गिनती कर न्यायालय में प्रस्तुत करें और वहां इसकी धोषणा होगी। यह विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों में कटौती ही तो है। लेकिन जब राजनीति में घात-प्रतिघात इस स्तर पर पहुंच जाए जहां अध्यक्ष तक पर पक्षपात का आरोप लगने लगे वहां न्यायालय के हस्तक्षेप का रास्ता अपने आप बन जाता हैं। अध्यक्ष के आचरण को यदि हरीश रावत समर्थकों ने सही करार दिया तो बागी विधायकों एवं भाजपा ने पक्षपात की संज्ञा दी। वास्तव में संसद की सामान्य और मान्य परंपरा है कि यदि विनियोग विधेयक में एक भी सदस्य मत विभाजन की मांग करता है तो उसे मानना अनिवार्य है। यदि विधायकों ने मत विभाजन की मांग की और उसे स्वीकार नहीं किया गया तो फिर 18 मार्च को विनियोग विधेयक पारित ही नहीं हुआ। दूसरे, यहां इस जटिल प्रश्न का भी उत्तर देना होगा कि अगर मत विभाजन हुआ ही नहीं यानी सदन में मतदान हुआ नही ंतो फिर उन विधायकों की सदस्यता खत्म कैसे हो गई? दलबदल कानून सदन के अंदर के व्यवहार पर लागू होता है बाहर के व्यवहार पर नहीं। अगर मत विभाजन होता तो साफ था कि हरीश रावत सरकार गिर जाती और उसके बाद उनकी सदस्यता का फैसला होता। मत विभाजन हुआ नहीं और उनकी सदस्यता चली गई। इसका फैसला उच्चतम न्यायालय को करना होगा।

जो भी हो भले रावत मुख्यमंत्री हो जाएं इस पूरे प्रकरण में देश के एक छोटे राज्य ने हमारी राजनीति के समस्त क्षरण को एकमुश्त प्रदर्शित किया है। वास्तव में एक छोटे राज्य की राजनीति ने जिस तरह देश का ध्यान खींचा और राष्ट्रीय प्रकरण के रुप में परिणत हुआ वह बिल्कुल अस्वाभाविक नहीं हैं। भारतीय राजनीति की विद्रूपताएं एक साथ समग्र रुप में वहां उभरतीं रहीं और सुर्खियां पातीं रहीं। यहां उसमें पूर्णविराम लग जाएगा इसकी कोई संभावना नहीं है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408,9811027208

 

शुक्रवार, 6 मई 2016

कांग्रेस को लोकतंत्र बचाओ रैली से क्या हासिल हुआ

 

अवधेश कुमार

तो देश ने एक साथ सत्तारुढ़ तथा मुख्य विपक्षी पार्टी को आमने-सामने देखा। एक ओर कांग्रेस यदि लोकतंत्र बचाओ मोर्चा नाम से रैली और संसद की ओर मार्च कर रही थी तो भाजपा के सांसदों ने उनके विरुद्ध संसद परिसर में समानांतर धरना दिया। ऐसा कम होता है जब एक ही दिन इस तरह विपक्ष और सरकार दोनों सड़कों पर दिखाई दें। इससे पता चलता है कि आने वाले समय में दोनों पक्षों में किस तरह का टकराव होने वाला है। कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं ने जंतर मंतर से मार्च निकाला और संसद मार्ग थाना में कुछ मिनटों की गिरफ्तारी भी दी। यह गिरफ्तारी हालांकि औपचारिक ही होती है। आप संसद भवन तक जाना चाहते हैं और पुलिस आपको रोकती है। आप जाने की जिद करते हैं तो गिरफ्तारी होती है। यह वहां के लिए रुटिन जैसा कार्यक्रम होता है। किंतु यह भी लंबे समय बाद है जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने कुछ मिनट क लिए ही सही गिरफ्तारी दी। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह जैसे नेताओं की ऐसी प्रतीकात्मक गिरफ्तारी भी सुर्खिंयां तो पाएंगी ही। इसके द्वारा कांग्रेस ने यह संकेत दिया है कि वह सरकार से लंबे समय के लिए टकराव का मन बना चुकी है।

अगर रैली में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह के भाषण को सुनें तो उससे बहुत कुछ साफ हो जाता है। सोनिया गांधी ने कहा कि जिस ढंग से हमको धमकाया जा रहा है, डराया जा रहा है, बदनाम किया जा रहा है उससे हम डरने वाले नहीं हैं। हमें तो जीवन ने संघर्ष करना सिखाया है हम संधर्ष करेंगे। राहुल गांधी ने अरुणाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड में सरकार गिराने की चर्चा की। मनमोहन सिंह ने कहा कि कुछ बात है कि हस्ती मिटनी नहीं हमारी सदियों रहा दुश्मन दौरे जहां हमारा। वास्तव में नेतागण संदेश यह दे रहे थे कि मोदी सरकार जानबूझकर कांग्रेस के नेताआंे की छवि को बदनाम करने, उनके खिलाफ कानून का दुरुपयोग करने तथा सरकारों को संवैधानिक शक्ति का दुरुपयोग कर खत्म करने पर उतारु है। यानी कुल मिलाकर वे यह कह रहे थे कि मोदी सरकार कांग्रेस को समाप्त करने का षडयंत्र रच रही है लेकिन वह कर नही ंपाएगी, हमने उनसे दो दो हाथ करने के लिए कमर कस लिया है। सोनिया गांधी ने देश भर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संघर्ष करने का संदेश दिया। इसका अर्थ हुआ कि हम आने वाले समय में कांग्रेस की ओर से धरना, प्रदर्शन, प्रेस वार्ता, संसद में हंगामा आदि के माध्यम से सरकार विरोधी तेवर लगातार देखेंगे।

प्रश्न उठाया जा सकता है कि इसके समानांतर संसद भवन परिसर के अंदर गांधी जी की प्रतिमा के सामने भाजपा सांसदों के धरने का क्या तुक था? उनका कहना था कि कांग्रेस रक्षा सौदों में दलाली खाकर चाहती है कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। भाजपा सांसद गांधी जी के प्रसिद्ध भजन रघुपति राघव राजा राम पर कई प्रकार की तुकबंदी करके कांग्रेस को दलाली खाने वाली पार्टी साबित कर रहे थे। संसद सत्र चल रहा है तो ऐसे कार्यक्रम आसानी से आयोजित हो जाते हैं। इससे भाजपा एवं मोदी सरकार को इतना लाभ हुआ कि पूरा फोकस केवल कांग्रेस पर नहीं रहा। राजनीति में जब तू डाल डाल हम पात पात की प्रतिस्पर्धा हो तो उसमें यह सफलता भी पार्टियांे के लिए मायने रखतीं हैं। हालांकि आम प्रतिक्रिया यह है कि विपक्ष धरना प्रदर्शन करे उससे अप्रभावित रहते हुए सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए। सरकार के प्रतिनिधियों की ओर से समानांतर धरना प्रदर्शन में कोई समस्या नही है, पर यह पर्याप्त नहीं है।  देश सरकार से इस दलाली पर कार्रवाई चाहता है। दलालों और घूसखोरों को जेल में देखना चाहता है।  

कांग्रेस की समस्या समझ में आने वाली है। अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घूसकांड पर इटली के मिलान कोर्ट ने फैसला में कांग्रेस नेताओं का नाम लिया गया है और जज ने साक्षात्कारों में कहा है कि उनने किसी नेता को क्लिन चिट नहीं दिया है। उससे उसके अंदर मची हलचल का आभास तो होता ही है। अभी तक सरकार ने किसी नेता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है, न ही जांच एजेंसियों ने पूछताछ। लेकिन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने जिस तरह राज्य सभा एवं लोकसभा में विन्दूवार तथ्य रखें उनसे साफ हो गया कि पूर्व सरकार में कुछ लोग अगस्ता वेस्टलैंड को सौदा दिलाने और पहले से तय कीमत से गई गुणा देने के लिए अति सक्रिय थे। उनमें नियमों एवं प्रावधानों का कई स्तरों पर उल्लंघन हुआ तथा कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति हुई। पर्रीकर की यह पंक्ति कांग्रेस को अवश्य चिंता में डाला होगा कि जिन लोगों के नाम इटली के न्यायालय में आए हैं उनके खिलाफ जांच केन्द्रित होगी। सरकार सच सामने लाने तथा दोषियों को सजा देने को संकल्पित है। नाम किनके आए हैं यह सबको पता है। तो उन नेताओं के खिलाफ वाकई रक्षा मंत्री के कथन के अनुरुप कार्रवाई होने का मतलब होगा प्रमुख नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी, जांच एजेंसियों द्वारा पूछताछ, न्यायालय में पेशी आदि। यह कांग्रेस के लिए असामान्य संकट का समय होगा। इसका अभ्यास कांग्रेस को क्या किसी पार्टी को नहीं है। 

इस संदर्भ में यह प्रश्न देश मंें उठ रहा है कि आखिर कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने इसी समय लोकतंत्र बचाओ मोर्चा के नाम से रैली क्यों किया या संसद भवन तक मार्च का कार्यक्रम क्यों आयोजित किया? संदेश यह जा रहा है कि जब अगस्ता वेस्टलैंड मामले में इटली की कोर्ट ने पूर्व सरकार और कांग्रेस के नेताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया, सरकार ने जांच में तेजी ला दी तो फिर कांग्रेस ने अपने को बचाने के लिए यह कार्यक्रम किया। संदेश यह जा रहा है कि परेशान कांग्रेस ऐसे मोर्चा और रैलियों से सरकार को दबाव में लाने की रणनीति अपना रही है। संदेश यह भी निकल रहा है कि कांग्रेस वाकई डर गई है और उसके पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। आप रैली में भी नेताओं का भाषण सुन लीजिए उसमें ऐसा कोई तर्क और तथ्य नहीं आया जिससे लगे कि वाकई सरकार अगस्ता वेस्टलैंड में उनको जानबूझकर फंसा रही है। उसमें ऐसे तथ्य नहीं थे जिनसे लगे कि अरे कांग्रेस तो वाकई निर्दोष है उसे फंसाने की कोशिश हो रही है। जाहिर है, कांग्रेस ने रैली और मार्च की घोषणा तो की, लेकिन उसके द्वारा स्पष्ट संदेश देने की तैयारी ठीक से नही की गई। असल में लोकतंत्र बचाओ मोर्चा नाम देने से अगस्ता वेस्टलैंड पर ज्यादा चर्चा कांग्रेस के नेता कर रही सकते थे। उनके सामने ज्यादा जोर इस आरोप पर देने की मजबूरी थी कि मोदी सरकार किस तरह लोकतंत्र का गला घोंट रही है। कांग्रेस शायद इस बात को समझ रही है कि अगस्ता वेस्टलैंड पर उसके लिए ज्यादा बोलना समस्या बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।

इस तरह विचार करें तो कांग्रेस के लिए लोकतंत्र बचाओ मोर्चा उस रुप में अगस्ता वेस्टलैंड मामले में उसके बचाव का आधार नहीं बन पाया या राजनीतिक लाभ देनेवाला साबित नहीं हो सका जैसा इन्होंने सोचा होगा। इस मोर्चा से सरकार को भी कठघरे में खड़ा करने का उसका लक्ष्य पूरा हुआ हो ऐसा नहीं लगता। हां, वह सरकार पर दबाव डालने में सफल हुई या नहीं या आगे ऐसे संघर्ष करके वह दबाव डाल पाएगी या नहीं यह इस बात से प्रमाणित होगा कि सरकार अगस्ता वेस्टलैंड मामले में उन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करती है या नहीं जिनका नाम आया है और जिनकी भूमिका दलाली में संदिग्ध है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

सूखा संकट देशव्यापी, समाधान देश व विश्वस्तरीय

 

अवधेश कुमार

राष्ट्रीय मीडिया में सूखे की भयावहता और पानी के संकट की खबरें कुछ राज्यों के कुछ क्षेत्रों तक सीमित है। इससे ऐसी तस्वीर उभरती है मानो देश के शेष भागों में बेहतर या कुछ अच्छी स्थिति होगी। सच है कि भयानक सूखा और जल संकट की गिरफ्त पूरे देश में है। कम से कम 300 लोगों के मरने की खबरें अभी तक आ चुकी हैं और आपको आश्चर्य होगा इनमें मरने वालों में सबसे ज्यादा वहां के लोग नहीं हैं जहां के सूखे पर हम छातियां पीट रहे हैं। आंध्रप्रदेश और तेलांगना में सबसे ज्यादा मौत हुई है और उसके बाद स्थान उड़ीसा का है। मौत के सारे आंकड़े एक साथ नहीं आते। पिछले वर्ष गर्मी और सूखे के कारण 2035 लोगों की मौत का आंकड़ा हमारे सामने आया था। इसमें महाराष्ट्र और बुंदेलखंड का स्थान उपर नहीं था। गरमी से झुलसते जिन शहरों के तापमान 44 डिग्री से उपर गए उनमें देश के अनेक राज्यों के शहर शामिल है। पिछले सप्ताह शुक्रवार को ओडिशा के टिटलागढ़ में तापमान 47 डिग्री और तेलंगाना के रामागुंडम में 46 डिग्री तक पहुंच गया। यह इस मौसम का सबसे ज्यादा तापमान था।

देश में 91 बड़ी झीलंें और तालाब हैं जो पेयजल, बिजली और सिंचाई के प्रमुख स्रोत हैं। इनमें औसत से 23 प्रतिशत पानी की कमी आई है। 21 अप्रैल तक इन तालाबों में 34.082 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) पानी बचा था। ये जलाशय किसी एक दो राज्य में तो हैं नहीं। जिसे पूर्व मानसून बारिस कहते हैं वो अगर आकाश से धरती पर नहीं उतरा तो फिर इससे पूरा देश प्रभावित है तो देश से बाहर निकलें तो पूरा एशिया, अफ्रिका, दक्षिण अमेरिका और इससे लगे इलाके बुरी तरह प्रभावित हैं। मौसम विभाग का रिकॉर्ड बताता है कि 1901 के बाद पिछला साल भारत का तीसरा सबसे गर्म साल रहा था। 1880 में शुरू हुए रिकॉर्ड के मुताबिक, 2015 में औसत तापमान 0.90 डिग्री ज्यादा था।  2016 भी उसी श्रेणी का वर्ष साबित हो रहा है। वास्तव में सूखे की समस्या और उससे जुड़ा पानी का संकट पूरे देश में है। हां, कुछ राज्य इससे ज्यादा ग्रस्त हैं। हिमाचल, तेलंगाना, पंजाब, ओडिशा, राजस्थान, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में पिछले साल के मुकाबले भी इस साल जल स्तर में काफी कमी देखी जा रही है।

आपने बिहार में सूखा संकट के राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा नहीं सुनी होगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल की भी नहीं। बिहार के किसान बताते हैं कि पिछले आठ साल से ठीक से बारिश हुई ही नहीं। बारिश या तो देर से आई या कम आई। प्रदेश के दो तिहाई क्षेत्रों में जल स्तर इतना नीचे चला गया है कि पुराने हैंडपंप एवं बोरिंग बेकार हो रहे हैं। जिलों-जिलों के आंकड़े आ रहे हैं कि किस जिले में कितना हैंडपंप सूखा है, कितने कुंए सूख गए और आंकड़ें भयावह हैं। नदियों वाले जिलांे में भी कई सौ की संख्या में हैंड पंप सूखने की खबरें हैं। गया के मानपुर प्रखंड से खबर है कि पानी की कमी के कारण कई गांवों में शादियां टालनी पड़ रही हैं। जमुई के बरहट प्रखंड के कई गांवों के लोग 10-12 किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते हैं या फिर नदी की बालू को खोद कर पानी निकाल रहे हैं। लखीसराय जिले में ऊल नदी मरुभूमि बन चुकी है। चानन में बरसाती पानी रोकने के लिए बनाए गए फाटक नवीनगर से कुंदर तक 5-7 किलोमीटर में जो थोड़ा पानी बचा है, वहां लोग बालू खोद कर पानी निकाल रहे हैं। पश्चिम बंगाल के फरक्का में एक दिन पानी इतना कम हो गया कि वहां के पावर प्लांट को बंद करना पड़ा। यह घटना मार्च की है। इस समय क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना करिए। ये कुछ उदाहरण मात्र हैं। अगर सभी खबरों को एकत्रित किया जाए तो एक मोटी पुस्तक बन जाएगी।

अगर मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार अल नीनो और ग्लोबल वॉर्मिंग इसका मुख्य वजह है तो यह एक दो राज्यों के लिए तो नहीं हो सकता। इसी तरह यदि पिछले दो सालों से कम बारिश होने के कारण गर्मी ज्यादा पड़ रही है, सूखे की समस्या सामने है तो यह भी देशव्यापी ही है। वास्तव में केन्द्र सरकार ने भी सूखे को लगभग देशव्यापी मान लिया है। 19 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय में पेश रिपोर्ट में सरकार ने माना कि कम से कम 10 राज्यों के 256 जिलों में करीब 33 करोड़ लोग सूखे की मार झेल रहे हैं। गुजरात सहित कुछ राज्यों के विस्तृत आंकड़ें केन्द्र के पास नहीं आ सके थे। केंद्र ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि सूखाग्रस्त राज्यों की स्थिति के मद्देनजर उसने मनरेगा के तहत निर्धारित 38,500 करोड़ रुपये में से करीब 19,545 करोड़ रुपये जारी कर दिए हैं। ये इन 10 राज्यों को जारी किए गए हैं। दरअसल, सूखे से निपटने का बना बनाया नियम हो गया है कि मनरेगा के तहत 100 दिनों के रोजगार की जगह 150 दिनों के रोजगार के अनुसार राशियां जल्दी जारी की जातीं हैं ताकि वहां गरीबों को काम मिले और जलाशयों या कुंओं आदि की सफाई, खुदाई हो सके। यहां यह विचार का विषय नहीं है।

इस संकट को देशव्यापी और एक हद तक वैश्विक मानकर और इसके तात्कालिक एवं दूरगामी समाधान पर विचार करना होगा। भारत में दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी है जबकि उपयोग लायक पानी का केवल 4 प्रतिशत हमारे देश में है। इस बात के प्रति जितनी जागरुकता पैदा की जानी थी नहीं की गई और जल के प्रति हमारे यहां सामाजिक नागरिक दायित्व तो मानो कुछ है ही नहीं। जरा सोचिए, जिन क्षेत्रों में 200 सें. मी. से 1000 सें. मी. तक बारिश होती है वहां तो कभी सूखा या जल संकट नहीं होना चाहिए। वहां क्यों है? साफ है कि जल प्रबंधन के पारंपरिक तरीके जिनमें अपने उपयोग के साथ प्रकृति के संरक्षण के पहलू स्वयमेव निहित थे हमने नष्ट कर दिए। पीढ़ी दर पीढ़ी आने वाले वे ज्ञान तक लुप्त हो गए। आज पहले की तरह पक्का कुंआ खोदने वाले मजदूर आपको नहीं मिलेंगे। पुराने नष्ट और नए तरीके हमने जो विकसित किए वे अंधाधुंघ पानी के निष्काषण और असीमित खर्च का है। खेतों मंें सिंचाई ऐसी की आज भारत के जल खर्च का 80 प्रतिशत केवल सिंचाई में जाता है, जबकि हमारी आधी भूमि भी सिंचित नहीं है। पहाड़ी इलाकों में पानी जमा करने के अनेक तरीके थे, सीढ़ीदार खेतियां थीं। कहां गए वे? जिन गांवों ने उन तरीकों पर काम किया उनके पास आज भी संकट नहीं है। गांधी जी ने शहरों को विनाशक कहा था। वे मानते थे और यही संच है कि औद्योगीकरण और उसके साथ पैदा होते शहर गांवों और प्रकृति का खून चूसकर ही बढ़ते हैं। शहरों में प्रति व्यक्ति पानी की मांग जहां 135 लीटर वहीं गांवों में करीब 40 लीटर।

तो जो कारण हैं उन्हें दूर करने की आवश्यकता है। यह आसान नहीं है। देश के स्तर पर राज्यों और राज्यों में भी कुछ क्षेत्रों के अनुसार समन्वित राष्ट्रीय नीतियों के द्वारा रास्ता निकलेगा। साथ ही जो हमारी सीमा से बाहर निकलकार जातीं हैं उनका उनके अनुसार समाधान करना होगा। हमारे यहां नदियो और झीलों का जुड़ाव चीन, बंगलादेश, नेपाल और भूटान तक से हैं। अगर वे गड़बड़ियां करेंगे तो हम प्रभावित होंगे और होते हैं। तो यहां इस स्तर पर भी निदान करना होगा। इसी तरह ग्लोबल वार्मिंग का इलाज अकेले भारत नहीं कर सकता। हां, भारत की जो जिम्मेवारी है वह पूरी करेगा तभी वह दुनिया को करने की नसीहतें दे सकता है। लेकिन जल के प्रति नागरिक-सामाजिक दायित्व का भान और उसका निर्वहन सर्वोपरि है। प्रकृति के साथ व्यवहार का सरल सिद्वांत है कि उससे हम उतना ही लें जिससे वह सदा देने की स्थिति में रहे। यह हम सीखें, अपने बच्चों को सिखाएं और दुनिया को भी बताएं।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पाण्डव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208 

 

 

 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

उत्तराखंड पर उच्चतम न्यायालय ही अंतिम फैसला दे सकता है

 

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय ने मामला स्वीकार कर लिया है। उसके द्वारा उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक के बाद प्रदेश फिर से राष्ट्रपति शासन के तहत है। इस मामले को उच्चतम न्यायालय में आना ही था। उच्च न्यायालय ने जैसी टिप्पणियां कीं तथा जिस तरह के प्रश्न खड़ा कर दिए उनके निपटारे के लिए उच्च्तम न्यायालय ही एकमात्र संस्था है। नैनीताल उच्च न्यायालय द्वारा उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन निरस्त करने के दो पहलू थे, संवैधानिक एवं राजनीतिक। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो तत्काल यह निर्णय नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए पहला ऐसा झटका था जिसका जवाब देने की स्थिति में भाजपा के प्रवक्ता नहीं थे। न्यायपालिका के मामले पर कोई पार्टी, भले वह फैसले से जितनी क्षुब्ध हो, खिलाफ टिप्पणी नहीं कर सकती। उनकी नजर में फैसला चाहे गलत ही क्यों न हो आपके पास तत्काल उसे स्वीकारने और उसके विरुद्ध अपील करने का ही विकल्प बचता है। अगर उच्चतम न्यायालय इस फैसले को कायम रखता है तो फिर कांग्रेस और सारी विरोधी पार्टियों के पास केन्द्र सरकार के विरुद्ध यह ऐसा अस्त्र होगा जिससे वे लगातार हमला करते रहेंगे। कांग्रेस के बयानों को देख लीजिए। उसके प्रवक्ता कह रहे थें कि भाजपा की उनकी सरकारों पर लालची नजर है और इस फैसले से साबित हो गया कि अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर वह सरकारों का गला घोंटना चाहती है। अन्य विरोधी दलों ने भी सरकार के खिलाफ तीखे तेवर अपनाए। लेकिन यदि उच्च्तम न्यायालय ने केन्द्र के निर्णय को सही करार दे दिया तो फिर यही स्थिति पलट जाएगी।

उच्च न्यायालय के फैसल से राजनीति में कांग्रेस बाजी मार ले गई दिखती थी। राष्ट्रपति शासन लगाने और विधानसभा निलंबित रखने के बाद हरीश रावत ने राज्य भर में सभाएं की और अपने पक्ष में सहानुभूति पाने की रणनीति अपनाई था। भाजपा इसमें भी पीछे रह गई थी। भाजपा के पास अपने कदम की रक्षा करने का विकल्प था। उसने रावत के खिलाफ इस तरह आक्रामक अभियान नहीं चलाया जैसा रावत भाजपा एवं मोदी सरकार के खिलाफ चला रहे थे। उच्च न्यायालय के फैसले न रावत की इस कोशिश को और ताकत दे दिया था। हालांकि इस बात से इन्कार करना कठिन है कि सदस्यों द्वारा विद्रोह करने के बावजूद रावत का पद पर बने रहना नैतिक नहीं था। कम से कम उस समय रावत को बहुमत नहीं प्राप्त था। इसी तरह स्टिंग में उन्हें भी सदस्यों के समर्थन के लिए मोलभाव करते देखा गया। यानी उनके पक्ष को नैतिक नहीं कहा जा सकता। जो स्थिति उत्तराखंड मंें पैदा हो गई थी उसमें हरीश रावत की सरकार बगैर लोभ लालच में बच नहीं सकती थी।

उच्च न्यायालय ने ऐसी कुछ सख्त टिप्पणियां कर दीं जो केन्द्र सरकार पर धब्बे की तरह है। मसलन, न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए जिन तथ्यों पर विचार किया गया उसका कोई आधार नहीं है....केन्द के पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे साबित हो कि राज्य में आपातकाल जैसे हालात हैं...निलंबन या भंग किया जाना निर्वाचित सरकार को गिराया जाना ही है...यहां कुल मिलाकर जिसे दांव पर लगाया गया वह लोकतंत्र था...। जब न्यायालय में केंद्र की ओर से कहा गया कि यह गारंटी नहीं दी जा सकती कि इस राज्य में राष्ट्रपति शासन हटाया जाएगा तो न्यायालय ने कहा कि आपके इस रवैये पर हमें अफसोस है। केन्द्र की ओर से यह कहने पर कि हम चाहते हैं कि इस मामले में कोई फैसला होने तक राष्ट्रपति शासन लागू रहे पीठ ने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता है तो उन्हें इस बात की चिंता है कि भाजपा को यह मौका मिल जाएगा कि वह यह साबित कर सके कि उसके पास नई सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में विधायकों का समर्थन है। न्यायालय ने यह भी कहा कि अगर कल आप राष्ट्रपति शासन हटा लेते हैं और किसी को भी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर देते हैं, तो यह इंसाफ का मजाक उड़ाना होगा। उच्च न्यायालय की सरकार के खिलाफ सबसे सख्त टिप्पणी इस प्रश्न के साथ आई कि क्या केंद्र सरकार कोई प्राइवेट पार्टी है?

हमारे देश में न्यायालय की टिप्पणियां एक लक्ष्मण रेखा की तरह बन जातीं हैं जिनको भविष्य में बार-बार उद्धृत किया जाता है। केन्द्र सरकार इन टिप्पणियां को स्वीकार कर चुपचाप नहीं रह सकती थी। इसलिए उच्चतम न्यायालय का मत अपरिहार्य है। फैसला देने के एक दिन पहले उच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति पर जो टिप्पणी कर दी उसे कायम रखा जाएगा या नहीं इसे लेकर संविधान विशेषज्ञों ने भी असहजता प्रकट की।  आम सोच यह थी कि राष्ट्रपति राजा नहीं हैं.....उनसे भी गलतियां हो सकतीं है....जैसी टिप्पणियों से न्यायालय को भी बचना चाहिए था। दरअसल, किसी मामले में राष्ट्रपति पर ऐसी सख्त टिप्पणी पहली बार आई है। अभी तक उच्चतम न्यायालय ने भी कभी राष्ट्रपति पद या किसी राष्ट्रपति के विरुद्व नकारात्मक टिप्पणी नहीं की थी। वैसे भी हमारे संविधान में राष्ट्रपति केवल नाममात्र के ही कार्यकारी प्रधान हैं। वे मंत्रिमंडल के फैसले को मानने के लिए बाध्य हैं। हां, वे पुनर्विचार के लिए अवश्य इसे वापस कर सकते हैं, लेकिन अगर दोबारा वही वापस आ गया तो उन्हें हस्ताक्षर करना होगा। देखते हैं इस पर उच्चतम न्यायालय क्या रुख अपनाता है। कम से कम अभी तक के उच्चतम न्यायालय के रुख से ऐसा नहीं लगता कि राष्ट्रपति के विरुद्ध टिप्पणी को वह जारी रखेगा।

वास्तव में राजनीति से परे उच्च न्यायालय के फैसले में बहस के मुख्य पहलू संवैधानिक एवं संसदीय परंपराओं के संदर्भ में हैं। इनमें ऐसे पहलू हैं जिनका अंतिम फैसला उच्चतम न्यायालय ही कर सकता है। उच्च न्यायालय ने 18 मार्च को विनियोग विधेयक को पारित मान लिया है। संविधान विशेषज्ञों ने कहा था कि अगर एक भी सदस्य मत विभाजन मांगता है तो फिर अध्यक्ष को ऐसा करना होगा। संसद की यह परंपरा रही है। सदस्य का अर्थ सदस्य है...वह सत्ता एवं विपक्ष किसी का भी हो सकता है। तो संसद की इस परंपरा का क्या होगा? इसका उत्तर तो उच्चतम न्यायालय ही देगा? दूसरे, विनियोग विधयेक यदि पारित हो गया है तो फिर सदन के अंदर दलबदल कैसे मान लिया जाए? सारी समस्या तो वहीं से पैदा हुई। कांग्रेस के नौ विधायकों का पाला बदलना उसी कारण माना गया। उनकी सदस्यता अध्यक्ष ने इसी आधार पर भंग की कि उनने अपने पार्टी के खिलाफ काम किया। कोई सदन के बाहर पार्टी के खिलाफ काम करे इसके लिए उसकी सदस्यता भंग नहीं हो सकती। तो यह बड़ा प्रश्न सामने है। तीसरे, अभी तक किसी उच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन को निरस्त करने का आदेश नहीं दिया था। केवल उच्चतम न्यायालय ही यह फैसला कर रहा था। क्या उच्च न्यायालय आगे ऐसा करेगा या यह विशेषाधिकार उच्चतम न्यायालय के पास रहेगा इसका निर्णय होना भी आवश्यक है। यह बहुत बड़ा प्रश्न है। यही नहीं अनुच्छेद 356 पर शायद एक और बड़े फैसले की आवश्यकता है ताकि 1994 के बोम्मई मामले के फैसले में छुटे पहलुओं पर न्यायिक मत सामने आ सके। आखिर उत्तराखंड जैसी स्थिति में कोई केन्द्र सरकार क्या कर सकती है इसका मार्गदर्शन भी उच्चतम न्यायालय को करना चाहिए। और सबसे बढ़कर जैस उपर कहा गया राष्ट्रपति पद पर टिप्पणी का मामला है।

तो हमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस समय बाबा साहब अम्बेदकर की यह टिप्पणी कई जगह उद्धृत की जा रही है कि अनुच्छेद 356 संविधान में तो है, पर इसका उपयोग होने की नौबत कभी नहीं आएगी। दुर्भाग्य से हमारी राजनीति ने संविधान की उस भावना का पालन नहीं किया। इस समय हम भाजपा को कितने भी कठघरे में खड़ा कर दें, पर सबसे ज्यादा इस अनुच्छेद का दुरुपयोग कांग्रेस के शासनकाल में हुआ। वैसे कोई भी सरकार ऐसी नहीं रही जिसने इसका उपयोग नहीं किया। अनेक बार उससे बचा जा सकता था। इसका कारण राजनीति में गिरावट रहा। तो 356 हमारी राजनीति में गिरावट का हथियार बन गई। अगर उत्तराखंड में ही कांग्रेस के अंदर विद्रोह नहीं हुआ होता...या उसके बाद रावत नैतिकता के आधार पर कम से कम त्यागपत्र की पेशकश कर देते...भले कांग्रेस आलाकमान इसे नहीं मानती तो तस्वीर दूसरी होती।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

क्या कहती है हंदवाड़ा गोलीकांड के बाद कश्मीर की अशांति

 

अवधेश कुमार

कश्मीर घाटी फिर अशांत एवं हिंसक हो रही है। श्रीनगर के अलावा कुपवाड़ा, गांदरबल, हंदवाड़ा, पुलवामा समेत कई जिलों में लोक आक्रामक एवं हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन क्यों? पहली नजर में देखने से ऐसा लगता है कि यदि सेना की गोलीबाड़ी में चार नवजवान मारे गए हैं तो लोगों का गुस्सा बिल्कुल स्वाभाविक है। यकीनन उन चारों नवजवानों की जीवन लीला बेवजह समाप्त हुई। किंतु इसके लिए क्या सेना को दोषी ठहराया जा सकता है? कतई नहीं। कुछ लोगों ने साजिश करके जानबूझकर ऐसी विकट स्थिति पैदा की जिसमें सेना के पास गोली चलाने के अलावा आत्मरक्षा का कोई उपाय ही नहीं था। भारी संख्या में आक्रोशित लोग सेना पर हमला कर रहे थे, उन पर पत्थर फेंक रहे थे और स्थिति की कल्पना आप खुद कर सकते हैं। सेना को लोगों को तितर-बितर करने के लिए गोली चलानी पड़ी और दुर्भाग्य से चार नवजवान मारे गए। दो वहीं मारे गए और दो बाद में अस्पताल में। सवाल है कि लोगों ने सेना पर उतना उग्र हमला क्यों किया?

इसी प्रश्न के उत्तर से यह पता चल जाता है कि कश्मीर घाटी में ऐसी शक्तियां सक्रिय हैं जो वहां हिंसा, अशांति एवं अस्थिरता पैदा करने के लिए किसी घटना को गलत मोड़ दे देतीं हैं। अफवाह फैलाया गया कि सेना ने एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ किया है। उस छात्रा ने साफ कर दिया है कि उसके साथ एक स्थानीय व्यक्ति ने छेड़छाड़ किया और उसे पीटा। यहां तक कि पुलिस के सामने भी उसने पीटा। तो फिर यह झूठ किसने फैलाया और किसने लोगों को सेना पर हमले के लिए उत्तेजित किया? मेहबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार दिल्ली आईं थी प्रधानमंत्री सहित कुछ मंत्रियों से मुलाकात करने। उन्होंने रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर से भी मुलाकात की। मुलाकात के बाद दिल्ली में उन्होंने एक ही बयान दिया कि जो घटना हुई है मैंने रक्षा मंत्री से उसकी जांच की मांग की है और मंत्री ने उन्हें निष्पक्ष जांच तथा दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। यही नहीं मेहबूबा ने वहां के सेना के कमांडर से भी बातचीत कर ली। उन्होंने मारे गए लोगों को उचित मुआवजे तथा दोबारा ऐसी घटना न हो इसकी व्यवस्था करने की भी बात की।

बहुत अच्छा मेहबूबा जी। आपने अपनी राजनीति कर ली। एक राजनीति आपने एनआईटी मामले में पूर्ण चुप्पी के साथ भी की। घाटी में आपकी यही राजनीति हो सकती है। आपकी पार्टी ने सेना की निंदा करके उसका विरोध करके चुनाव जीता है। सेना को खलनायक बनाया है। आपकी मांग सेना के लिए विशेष कानून अफस्फा हटाने की है। लेकिन वहां मुख्यमंत्री के नाते आपको ही जांच करानी चाहिए और जांच का विषय यह होना चाहिए कि भीड़ उग्र क्यों हुई? जब सेना ने लड़की के साथ छेड़छाड़ किया ही नही तो फिर इस तरह की अफवाह फैलाने वाले कौन थे और उनका इरादा क्या था? जांच इस बात की होनी चाहिए कि जब सेना पर हमला हुआ तो स्थानीय पुलिस क्या कर रही थी? पुलिस को तब तक पता चल चुका था कि सेना ने लड़की को नहीं छेड़ा है। सरकार ने बस एक सहायक उप निरीक्षक को निलंबित कर कर्तव्यों की इतिश्री समझ लिया है। यह बिल्कुल अस्वीकार्य है। पूरे घटनाक्रम को देखा जाए तो इसमें सेना की भूमिका की जांच की आवश्यकता ही नहीं है।

राज्य सरकार ने मोबाइल इंटरनेट सेवा पर तत्काल बंदिशें लगा दी हैं। इसका मकसद असामाजिक तत्वों द्वारा अफवाह फैलाने पर रोक लगाना है। लेकिन उनका क्या करें जो घाटी में बंद का आह्वान कर आग में पेट्रोल डाल रहे हैं। सैयद अली शाह गिलानी से लेकर यासिन मलिक, मीरवायज उमर फारुख... आदि सबको मानो अशांति पैदा करने के लिए मुंहमांगा अवसर मिल गया है। सवाल है कि ये लोग किसके खिलाफ बंद का आह्वान कर रहे हैं? सेना का, जिसके पास अपनी रक्षा के लिए एक ही रास्ता बचा था, गोली चलाना। यह काम पुलिस का था जिसने नहीं किया। पुलिस चाहती तो लाउडस्पीकार से घोषणा कर सकती थी कि सेना ने लड़की के साथ छेड़छाड़ नहीं किया है। इस घोषणा के साथ वह सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था कर देती तो लोग संभवतः इतने हिंसक नहीं होते तथा सेना पर हमले की स्थिति पैदा नहीं होती। अलगाववादी नेताओं को तो प्रायश्चित करना चाहिए कि जो जहर इनने कश्मीर में बोया है उसमें कोई भी अफवाह सुरक्षा बलों पर हमले, पत्थरबाजी में बदलती है और कभी-कभी गोली चालन में उनके बीच के निर्दोषों की जाने जातीं हैं। घाटी को इस समय इनके ही अपराध की सजा मिली है। किंतु ये अभी भी सेना को ही खलनायक बना रहे हैं। इनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या सेना स्वयं अपने को समर्पित कर देती कि हमने भले नहीं कुछ किया लेकिन आपको गुस्सा है तो हमीं पर उतार दो?

गृहमंत्रालय मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती के पास है। कानून व्यवस्था बनाए रखना उनकी जिम्मेवारी है। इसमें कानून व्यवस्था की विफलता साफ दिखती है। तो वो किसे दोषी मानतीं हैं जिसके बारे में कह रहीं हैं कि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो इसका उपाय होना चाहिए? लोग सेना पर हमला करेंगे तो सेना मूकदर्शक बनी नहीं रहेगी। अनावश्यक लोग सेना से न उलझें, कोई अफवाह न फैला सके और ऐसी नौबत पैदा न हो ...यह जिम्मेवारी कानून व्यवस्था की एजेंसियों का ही है। जांच तो मुख्यमंत्री मेहबूबा को उनके खिलाफ करानी चाहिए। पुलिस ने अपनी भूमिका अदा क्यों नहीं की इस प्रश्न का उत्तर तलाशा जाना चाहिए? अफवाह फैलाने वाला कौन था या कौन थे इसका पता लगाकर उन्हें कानून की गिरफ्त में लाना चाहिए। मेहबूबा ऐसा करेंगी नहीं। इससे उनका वोट बैंक कमजोर होगा। किंतु कम से कम केन्द्र सरकार को तो उनके सामने स्पष्ट बात करनी चाहिए थी। रक्षा मंत्री तो बता सकते थे कि अफवाह फैलाने से लेकर सेना पर हमला करने तक पुलिस वहां बिल्कुल मूकदर्शक की तरह रही और जिम्मेवारी उसके सिर पर जाती है आप उसकी जांच कराएं। केन्द्र सरकार को इस तरह साफ बात करने में क्या समस्या थी? क्या इससे उनकी मिलीजुली सरकार चली जाती? सरकार की जरुरत केवल भाजपा को नहीं पीडीपी को भी है यह भाजपा को समझना चाहिए। मेहबूबा से तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि यही सक्रियता आपकी एनआईटी कांड के समय कहां थी। वहां भी आपकी पुलिस ने उन छात्रों पर कहर बरसाया जो पाकिस्तान जिन्दाबाद, हिन्दुस्तान मुर्दाबाद को विरोध कर रहे थे एवं भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। ध्यान रखिए मेहबूबा का उस घटना पर सार्वजनिक बयान एक बार भी नहीं आया। उनके बारे में जो कहा गया वह केन्द्रीय गृहमंत्री एवं मानव संसाधन विकास मंत्री के हवाले से। हंदवाड़ा मामले पर तो उनको बयान देने में मिनट भी नहीं लगा। इसका अर्थ आप स्वयं लगाइए और निष्कर्ष निकालिए की कश्मीर किस दिशा में जा रहा है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

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