शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

साक्षी महाराज के वक्तव्य के दूसरे पहलू भी देखे

अवधेश कुमार

जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने साक्षी महाराज को नोटिस थमा दिया तो उन्हें दोषी मान लेने में दूसरों को क्या समस्या हो सकती है। नोटिस थमाने का अर्थ ही है कि आप उन्हें दोषी मानते हैं। बेचारे साक्षी महाराज पता नहीं चार बच्चे पैदा करने की सलाह वाले भाषण पर पश्चाताप कर रहे होंगे या अंदर से गुस्से में होंगे। निस्संदेह, कुछ लोगों को यह कदम अच्छा लग सकता है तो कुछ कह सकते हैं कि भाजपा केवल दिखावे के लिए ऐसा कर रही है। पता नहीं भाजपा अध्यक्ष ने यह कदम दिल से उठाया है या फिर मीडिया एवं विपक्ष के हल्लबोल दबाव के कारण। पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांसदों और नेताओं से संभल कर बोलने, अपनी वाणी पर संयम रखने की अपील की है और अगर कोईइसका अनुसरण नहीं करेंगे तो पार्टी उनके खिलाफ कदम उठाएगी।

चलिए, यहां तक मान लेते हैं कि मोदी एवं अमित शाह नेताओं को वाणी संयम बरतने के निर्देश के प्रति सख्ती का संदेश देना चाहते है। किंतु जरा इसे दूसरे नजरिये से समझने की भी कोंिशश करिए। इसके कई पहलू हैं। कई बार मीडिया में कोई बयान जितना सनसनीखेज दिखाई या सुनाई देता और वह हमारे आपके मस्तिष्क पर तत्काल जैसा असर डालता है केवल वही सच नहीं होता। यहां विषय साक्षी महाराज नहीं है। जिस तरह उन्होंने नाथूराम गोडसे का महिमामंडन किया उसे कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता। पर क्या लोकतंत्र में एक व्यक्ति को इतना भी कहने का अधिकार नहीं है कि उसकी चाहत है प्रत्येक दंपत्ति चार बच्चे पैदा करें? यह कौन सा अपराध हो गया? यह इसका पहला पहलू है। आखिर इसंमें ऐसा क्या है जिससे भाजपा की छवि खराब हो जाएगी? इसे वाणी संयम के विपरीत वक्तव्य किस आधार पर कहा जा सकता है? कोई भी व्यक्ति साक्षी महाराज या साध्वी प्राची के कहने से तो चार बच्चे पैदा करने नहीं लगेगा।

तत्काल साक्षी महाराज को कुछ समय के लिए अलग कर दीजिए और  फिर इसके एक और महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान दीजिए। एक समय था जब जनसंख्या नियंत्रण पूरी दुनिया की प्राथमिकता थी। पर धीरे-धीरे समाजशास्त्रियों एवं अर्थशास्त्रियों के वर्ग ने ही इसे नकारना आरंभ कर दिया। माल्थस की आबादी विस्फोट के सिद्धांत नकार दिए गए हैं। जनसंख्या नियंत्रण की बाध्यकारी नीति दुनिया में गलत साबित हो रही है। इसी कारण विकसित माने जाने वाले देश बुढ़ों के देश हो गए, उन्हें आर्थिक विकास के काम भारत चीन जैसे देशों के युवाओं से करवाना पड़ रहा है। अब कई देशों में दंपत्तियों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। आज भारत और चीन जैसे देशों को भविष्य की महाशक्ति कहा जा रहा है तो उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हमारे पास युवा आबादी विश्व में सबसे ज्यादा है। युवा आबादी का अर्थ उत्साह से काम करने वाला समुदाय। कहा जा रहा है कि आने वाले समय में चीन की युवा आबादी हमसे कम हो जाएगी और 2035 के बाद भारत सर्वोपरि होगा। यदि परिवार नियंत्रण की बाध्यकारी नीति हमारे पूर्वजों ने स्वीकार की होती तो यह स्थिति होती? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार कहते हैं कि हम 125 करोड़ के देश हैं, यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है, इतनी आबादी वाले देश को दुनिया में सिर उठाकर जीना चाहिए, आंख में आंख मिलाकर बातें करनी चाहिए। अगर आबादी इतनी नहीं होती तो वे क्या बोलते? यह प्रश्न भाजपा नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए।

जिस बढ़ती आबादी को एक समय भार माना जाता था वह संसाधन है जिसे अब विश्व स्वीकार कर रहा है। समस्या हमारी है कि हमने प्रकृति का अनावश्यक दोहन करके उसे बरबाद किया है, जीवन शैली ऐसी अपना ली है जिसमें प्राथमिकतायें बदल र्गइं हैं, इसलिए भय लगता है कि पता नहीं एक दो से ज्यादा बच्चे होंगे तो उनका लालन पालन कैसे करेंगे। इससे पश्चिम देशों के लिए सामाजिक सांस्कृतिक समस्यायं बढ़ीं। उनके यहां परिवार प्रथा का, समाज की सामूहिकता का लगभग अंत हो गया। यह ऐसा संकट है जिससे उबरने के लिए सारे विकसित देश छटपटा रहे हैं। यही स्थिति हमारे यहां भी हो रही है। आज एक बच्चे को भी क्रेच में डालना पड़ रहा है, क्योंकि माता-पिता के पास उसे देने के लिए समय ही नहीं है। तो यह वर्तमान जीवन प्रणाली का दोष है। हमारा देश भी उन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन का शिकार हो रहा है जिसने पश्चिम को गिरफ्त में काफी पहले ले लिया। इससे बचने का रास्ता एक ही है कि परिवार नियंत्रण की बाध्यकारी सोच से बाहर आएं।

आप कहीं भी देख लीजिए,  एक बच्चा या एक बेटा बेटी पैदा करने वाले परिवार कई प्रकार के संकट का सामना करते हैं। बेटी शादी के बाद ससुराल चली गई, बेटा परिवार लेकर बाहर चला गया, मां बाप अकेले जीवन काटने को विवश। अगर बेटा संवेदनशील है तो उन्हें साथ रखा पर इससे उनका अपना समाज छूट गया। परिवार और समाज दोनों का विघटन सामान्य सांस्कृतिक-सामाजिक संकट नहीं है। मेरे सामने ऐसे लोग आते हैं जो बताते हैं कि ऐसा करके मैने गलती की, क्योंकि मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं रह गया है। किसी का बेटा विदेश चला गया और वे अकेले। शहरों में अपराधी तत्व ऐसे परिवारों को निशाना बनाते हैं। बुजूर्गों की हत्यायें हो रहीं हैं। गांवों में ऐसे लोग स्वार्थी तत्वों के निशाने पर होते हैं। उन्हें किसी का सहयोग चाहिए होता है और सहयोग के नाम पर उनका दोहन आम बात है। यदि कोई अकेले भाई है और उसे कुछ हो गया तो उसका परिवार निराश्रित। यदि उसकी पत्नी मर गई तो अकेले उसका जीवन अवसादग्रस्त। अगर दो तीन भाई बहन हैं तो पत्नी चल बसी तो भी बच्चों को बहुत समस्या नहीं। स्वयं उनको भी अनेक मायनों मेें अकेलापन नहीं। अगर वह स्वयं गुजर गया, या उसे कुछ हो गया और परिवार संयुक्त है तो भी उसके बच्चों के लिए ज्यादा समस्या नहीं। वह परिवार का सदस्य है और उसी अनुसार उसका पालन पोषण होता है।
ऐसे और भी पहलू हैं जिनके आधार पर यह साबित होता है कि एक या दो बच्चों की परिवार सीमित रखने की सोच ज्यादातर मायनों में घातक हैं। हम यह नहंीं कहना चाहते कि आप बच्चा पैदा करने की होड़ में पड़ जाइए। लेकिन नियंत्रण की अतिवादी सोच आत्मघाती है। साक्षी महाराज, साध्वी प्राची या संघ परिवार के दूसरे नेताओं के ऐसे वक्तव्यों में सांप्रदायिकता का एक दृष्टिकोण हो सकता है। वे मानते हैं कि मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है और हमारी घट रही है तो एक दिन हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे। हालांकि यह सच है कि 1991 से 2011 तक हिन्दुओं की आबादी लगभग 20 प्रतिशत बढ़ी है जबकि मुसलमानों की आबादी 36 प्रतिशत। यह एक सच है। लेकिन इसके आधार पर आबादी बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा भी घातक साबित होगी। दुनिया जिस तरह जाने-अनजाने सांस्कृतिक या धर्मयुद्ध की ओर बढ़ा रही है और हम उसे सारी जुग्गत लगाकर रोकने में सफल नहीं हो रहे हैं उसमें अनेक विचारकों का मानना है कि आबादी की भूमिका महत्वपूर्ण होने वाली है।  
बहरहाल, ये सारे पहलू हैं और यह मानने का भी कोई कारण नहीं है कि साक्षी महाराज या साध्वी प्राची ने स्वयं ऐसा बोलते समय इतनी गहराई तक सोचा होगा। पर उस वक्तव्य को गलत नहीं कहा जा सकता। साक्षी ने यही कहा कि एक बच्चा हम संतों को दे दो ताकि वह धर्म की, समाज की, देश की सेवा करे, एक बच्चा सीमा की रक्षा में लगे और दो तुम्हारे पास रहे। सेना में जाना अपने वश में नहीं, लेकिन विचार प्रकट करने में क्या समस्या है? यह भी न भूलिए कि यदि आपका एक बच्चा है तो कतई आप उसे समाजसेवी, संस्ंकृतिकर्मी, संन्यासी नहीं बनने देना चाहेंगे। तो देश चलेगा कैसे? गृहस्थ या परिवार जीवन के साथ समाजसेवी, संन्यासी ....सभी समाज के संतुलन और नैतिक मार्गदर्शन के लिए चाहिएं।

भाजपा की दृष्टि से विचार करिए तो वह यह समझ नहीं पा रही कि जो लोग विरोध कर रहे हैं वे केवल विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं, उनके पीछे भी कोई गंभीरता नहीं है। भाजपा ने चाहे जिस मानसिकता से नोटिस जारी किया है, संकेत उसके खिलाफ जाएगा। उसके भारी समर्थकों में साधु संत आदि शामिल है और जिनकी भूमिका उनकी विजय में रही है। वे जिस विश्वास से उसकी ओर लौटे हैं वे उससे फिर से विमुख होना आरंभ करेंगे। यानी यह राजनीतिक दृष्टि से भी उसके लिए आत्मक्षति का कारण बन सकता है।

अवधेश कुमार, ई: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर. : 01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

क्या कहते हैं आतंकवाद के ये डरावने चित्र

अवधेश कुमार

यह भारत देश है जहां सुरक्षा और रक्षा संबंधी सैन्य कार्रवाई पर भी विवाद हो सकता है। पर हम राजनीतिक विवादों से परे जो कुछ तथ्य हैं उन तक अपने को सीमित रखें तो वास्तविक खतरे का अहसास हो जाएगा और यही सच भी है। जो कुुछ विजुअल के माध्यम से, रक्षा मंत्रालय के प्रेस वक्तव्य से, कोस्ट गार्ड के प्रवक्ता के बयानों से तथा स्वयं रक्षा  मंत्री के वक्तव्य से हमारे सामने आया है हमें उसे ही सच मानना होगा। समुद्र के अंदर विस्फोट और अग्नि से धू-धू कर जलता हुआ नाव शांति का स्रोत तो हो नहीं सकता था। कोस्ट गार्ड एवं नौसेना के द्वारा घिर जाने पर पूरे नाव को विस्फोट से उड़ा देने का पहला निष्कर्ष यही निकलता है कि यह किसी न किसी साजिश से भरा यान था। हम यह न भूलें कि 26 नवंबर, 2008 को पोरबंदर (गुजरात) में रजिस्टर्ड मछली पकड़ने वाली बोट कुबेर में बैठ कर ही 10 आतंकवादी मुंबई आए थे और उन्होंने जो कहर बरपाया था वह पूरी दुनिया का दिल दहलाने वाला था। जाहिर है, जब भी किसी मछली पकड़ने वाले नाव में हथियार और गोला बारुद का ऐसा हस्र होगा जैसा अभी हुआ है तो हमारे सामने मुंबई हमले का डरावना दृश्य जीवंत होगा ही।

इस आधार पर विचार करें तो पोरबंदर नाव दहन की घटना का पहला निष्कर्ष हमारे लिए राहत देने वाला है। हमारे पास जो जानकारी है उसके अनुसार एनटीआरओ को ठोस इनपुट्स मिले थे कि पाकिस्तान स्थित कराची के केटी बंदर की एक मछली पकड़ने वाली नाव अरब सागर में संदिग्ध कार्य को अंजाम देने की तैयारी में है। इसके बाद पुलिस, सीमा सुरक्षा बल, कोस्ट गार्ड एवं नौसेना का सक्रिय होना ही था। यह ऑपरेशन कितना बड़ा था इसका अनुमान इससे लगाइए कि इंडियन कोस्ट गार्ड नौसेना के कई शिप और एयरक्राफ्ट इसमें शामिल हुए थे। यानी जल में उसे पहचानने, फिर रोकने, घेरने तथा आकाश से उस पर नजर रखने एवं भागने से रोकने की पूरी मोर्चाबंदी। हजारों नावों के बीच से ऐसे संदिग्ध नाव को ढूंढ निकालना आसाना नहीं होता। यह दुर्भाग्य है कि इतने बड़े सैन्य औपरेशन को जिसमें वायुयान को रात भर आकाश में उड़ान भरनी पड़ी, विवाद का विषय बना दिया गया है।

बहरहाल, हम इस खतरे को पूरी तरह समझें इसके लिए हाल की कुछ और घटनाओं पर भी नजर डालना आवश्यक है। इस समय हमारे पास यह सूचना है कि आतंकवादी 1999 की कंधार विमान अपहरण जैसी घटना को अंजाम देने की सजिशें रच रहे हैं। इसके पूर्व नये वर्ष में जैसे ही हमने आंखें खोलीं पता चला कि दो आतंकवादियों को नोएडा में गिरफ्तार किया गया है। ये ऐसे गिरफ्तार नहीं किए गए। एक साथ उत्तर प्रदेश एटीएस, पश्चिम बंगाल एटीएस,  खुफिया ब्यूरो (आईबी)  और रॉ, जिसकी भूमिका अलग है, के साझा ऑपरेशन में इन्हें गिरफ्तार किया गया। हमें याद होगा कि आईबी ने देश के प्रमुख शहरों में आतंकवादी हमले की चेतावनी पहले ही दे दी है। इन शहरों में दिल्ली भी शामिल है। कहा जा रहा है कि ये आतंकवादी देश की राजधानी दिल्ली में बड़ी आतंकवादी घटना को अंजाम देने वाले थे। जो जानकारी है इनमें से एक रकतुल्ला बांग्लादेश के फरीदकोट का रहने वाला है और दिसंबर के पहले हफ्ते में भारत में दाखिल हुआ था। पता नहीं इसमें कितना सच है पर उनके पास से जो लैपटॉप बरामद हुआ है उससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रिय स्लीपर सेल व रैकी किए गए कुछ स्थानों की जानकारी मिली है। साफ है कि इसके आधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं एनसीआर में ऐसे स्लीपर सेलों को पकड़ने का अभियान चल रहा है। 

जरा सोचिए, यह घटना 19 दिसंबर 2015 की ही है, पर एजेंसियों ने इसे सार्वजनिक नहीं किया। आईबी और रॉ की पूछताछ के बाद इन दोनों को पश्चिम बंगाल की आतंकवाद विरोधी ईकाई ट्रांजिट रिमांड पर ले गई। उसके बाद अन्य राज्यों की पुलिस भी उनसे पूछताछ करेगी। अगर गृह मंत्रालय एवं खुफिया ब्यूरो से आ रही अपुष्ट सूचनाओं पर यकीन करें तो कई आतंकवादी बांग्लादेश और नेपाल के रास्ते भारत में दाखिल हुए हैं जिनकी दिल्ली-एनसीआर के आसापस होने की संभावना है।

ठीक इन घटनाओं के बीच ही महाराष्ट्र आतंक विरोधी दस्ता (एटीएस) ने मुंबई के न्यायालय में एक ट्रांसक्रिप्ट दाखिल की है। इसमें गिरफ्तार किए गए सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनीस अंसारी की उमर एलहाजी नाम के एक व्यक्ति से हुई ऑनलाइन चैट का विवरण है जिसमें मुंबई के अमेरिकन स्कूल पर हमले की बात कही गई है। इसके अनुसार स्कूल पर हमले की योजना पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए हमले से काफी मिलती-जुलती है। अभी बेंगलुरु में हुए दो विस्फोटों की धमक हमारे सामने मौजूद हैं, जिनका कोई सुराग पुलिस को नहीं मिल पा रहा है। कहा जा रहा है कि इसके पीछे मध्यप्रदेश की खंडवा जेल से भागे उन पांच पूर्व सिमी सदस्यों का हाथ है जो उत्तर प्रदेश के बिजनौर में सामने आए थे। बहुत ही कम तीव्रता वाले ऐसे विस्फोट करना सिमी के भगोड़े आतंकियों की पहचान रही है। मई में चेन्नई में रेल धमाका तथा जुलाई में पुणे विस्फोट का चरित्र ऐसा ही था। पिछले वर्ष सितंबर में ये पांचों बिजनौर में इसी तरह का विस्फोटक बना रहे थे, लेकिन बनाते समय ही धमाका हो गया जिसमें उनका एक साथी घायल हो गया। अगर वह घायल नहीं होता और ये उसे इलाज कराने न ले जा रहे होते तो शायद उनका पता भी नहीं चलता। पर विडम्बना देखिए, बीच शहर से वे भागने में कामयाब हो गए और उत्तर प्रदेश पुलिस हाथ मलती रही। उसके बाद ही उनके दक्षिण भारत में होने और कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में हमला करने की संभावित खतरे की सूचना खुफिया ब्यूरो ने इस राज्यों को भेजा था। हम जम्मू कश्मीर से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर हो रही गोलीबारी तथा प्रदेश के भीतर चुनाव के दौरान हुए बड़ी आतंकवादी घटनाओं को कैसे भुला सकते हैं।

ऐसी और भी कई घटनायें हैं जिनका हम यहां जिक्र कर सकते हैं। इन सबको एक साथ मिलाकर देखिए और फिर तस्वीर बनाइए। ऐसा लगेगा कि समुद्र से लेकर आकाश और धरती तक, पश्चिम से लेकर मध्य, उत्तर एवं दक्षिण तक देश में आतंकवाद का खतरा आसन्न मंडरा रहा है। जहां सुरक्षा बलों की सतर्कता गई कि हम शिकार हुए। ऐसी स्थिति में खड़े देश को आतंकवाद के विरुद्ध जैसी मानसिकता और जिस तरह की सशक्त तैयारी होनी चाहिए उसका अभाव हमारे यहां है। अगर हम गहराई से समीक्षा करें तो केवल तटीय सुरक्षा व्यवस्था ही 26/11 के बाद लिए गए निर्णयों के अनुरुप या कायम मानक से नीचे नहीं है, सामूहिक नागरिक सोच भी अनुकूल नहीं मानी जा सकती। हम सैन्य बल की भूमिका को कठघरे में खड़ा करते हैं, पुलिस की एक अवांछित भूमिका पर हंगामा करके उसका जीना हराम करते हैं और उससे उम्मीद करते हैं कि वह आतंकवादी घटनाओं को हर हाल में रोके। इस सोच और व्यवहार में थोड़े संशोधन की आवश्यकता है। कहने का अर्थ यह नहीं कि हम सुरक्षा एजेंसियों को स्वच्छंद आचरण की छूट दे दें, बल्कि....वे ठीक प्रकार से अपनी भूमिका निभा सकें इसके लिए यह आवश्यक है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


 

 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

बेंगलूरु धमाके को बड़े खतरों का संकेतक मानिए

अवधेश कुमार

यह तर्क पहली नजर में किसी के गले उतर सकता है कि आखिर बेंगलूरु विस्फोट मौत, हिंसा या विनाश का कोई बड़ा तांडव मचाने में तो सफल नहीं हुआ। आरंभ में दो घायल हुए जिनमें एक महिला की मृत्यु हो गई और उसका एक रिश्तेदार घायल नवजवान खतरे से बाहर है। निस्संदेह, यह राहत की बात है कि दोनों धमाके कम शक्ति वाले थे और केवल दो लोग ही इसकी चपेट में आए। पर इस तरह का निष्कर्ष भी क्रूरता भरा है और आतंकवादी हमलों के प्रति हमारी अगंभीरता को दर्शाता है। मृतक महिला भवानी की उम्र 37 वर्ष के आसपास बताई जा रही है जो अपने भतीजे कार्तिक (21) के साथ वहां आई थी। उतनी कम उम्र में हमारे देश के एक नागरिक को, जिसका कोई अपराध नहीं था, आतंवादियों का निशाना बन जाना पड़ा तो इसे हम गंभीर नहीं मानें? संभव था, यदि वहां और लोग होते तो निशाने पर वे भी आते। इसे आतंकवादी घटना मानने में तो कोई समस्या नहीं है। बेंगलूरु के चर्च स्ट्रीट स्थित कोकोनट ग्रोव रेस्टोरेंट के पास भीड़भाड़ रहती है तो बम धमाके करने के पीछे सोच क्या हो सकती है। खासकर क्र्रिसमस के मौके पर। धमाके का समय रात साढ़े आठ बजे भी महत्वपूर्ण है।

हमारे लिए इस घटना का महत्व केवल हताहत होने वालों की संख्या तक सीमित नहीं हो सकता। आखिर आतंकवादी इसके द्वारा संदेश क्या देना चाहते हैं? कह सकते हैं कि आतंकवादियों का एक आम उद्देश्य आतंक व भय का माहौल पैदा करना होता है और उन्होंने यह किया। यह भी तर्क दिया जा सकता है कि पुलिस की चौकसी का ही परिणाम था कि वे बड़ा विस्फोट करने में सफल नहीं हुए। हालांकि बेंगलूरु के साथ यह संयोग रहा है कि वहां 2005 से लेकर जितने आतंकवादी हमले हुए वे बहुत बड़े कभी नहीं थे। 28 दिसम्बर 2005 को स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस पर हमला करने से लेकर 25 जुलाई 2008 को नौ श्रृंखलाबद्ध विस्फोट, फिर 17 अप्रैल 2010 के बेंगूलर चिन्नास्वामी स्टेडियम विस्फोट, फिर 17 अप्रैल 2013 को ऐन चुनाव के पूर्व भाजपा कार्यालय के बाहर एक बड़ा धमाका .....इनमें यदि मरने वालों की संख्या को मिला दें तो ये सारे अत्यंत छोटे आतंकवादी कारनामे लगेंगे। चेन्नस्वामी स्टेडियम में तोे मुंबई इंडियंस और बंगलुरु चौलेंजर्स के बीच मुकाबला के बीच दो बम विस्फोट किए गए, जिसमें पांच सुरक्षाकर्मियों समेत 15 लोग सामान्य रुप से घायल हुए थे। एक बम स्टेडियम के बाहर मिला था जिसे बम निरोधक दस्ते ने निष्क्रिय कर दिया था। यही स्थिति नौ श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों में भी थी जिसमें क्षति हुई ही नहीं। तो क्या इन सबको हम यूं ही नजरअंदाज कर लें?

कतई नहीं। इनसे इतना तो साफ है कि बेंगलूरु हमेशा से आतंकवादियों के निशाने पर रहा है। पीछे की चर्चा बाद में। हाल ही में आईएसआईएस के पक्ष में जेहाद समर्थक ट्विटर अकाउंट @shamiwitness वेबसाइट चलाने वाल मेंहदी मसरुर विश्वास वहीं से पकड़ा गया था। मेहदी 2003 से लेवेंटाइन क्षेत्र में दिलचस्पी रखता है, जिसे पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र भी कहा जाता है। इसमें साइप्रस, इस्राइल, जॉर्डन, लेबनान, फलस्तीन, सीरिया और दक्षिणी तुर्की का हिस्सा आता है। दिन के समय वह दफ्तर में काम करता था और रात के समय इंटरनेट पर सक्रिय रहता था।  वह आईएसआईएस के अरबी के ट्वीट्स को अंग्रेजी में अनुवाद कर उन्हे रीट्वीट करता था। वह घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखते हुए बेहद आक्रामक ट्वीट भी करता था। इस ट्विटर को विदेशी जिहादी फॉलो करते थे। यानी वह आईएसआईएस में भर्ती होने वाले नए सदस्यों के लिए भड़काने और सूचना का स्रोत बन गया था। क्या माना जाए कि ऐसा करने वाला वह अकेला इंसान होगा? दूसरी बात कि उसकी गिरफ्तारी के खिलाफ आतंकवादियों ने सरकार को धमकी भी थी। तो कहीं उसका विरोध करने के लिए तो विस्फोट नहीं किया गया? इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह भी खबर थी कि अल कायदा से जुड़ा एक आतंकवादी बेंगलूरु पहुंचा है और पुलिस उसे पकड़ने में लगी थी। अभी हाल ही में केन्द्र की ओर से खुफिया ब्यूरो ने कई शहरों के लिए आतंकवादी हमलों की चेतावनी जारी की थी जिनमें बेंगलूरु भी शामिल है। यानी रेड अलर्ट पहले से था। इसलिए यह विस्फोट बिल्कुल अनपेक्षित नहीं था। यही इसका महत्वपूर्ण पक्ष है कि सामने खतरा रहते हुए आतंकवादी विस्फोट करने में सफल रहे। बहरहाल, आने वाले समय में इसका पूरा खुलासा होगा, पर कनार्टक पुलिस एवं सरकार को कई प्रश्नों का उत्तर देना होगा।

ध्यान रखिए, 28 दिसंबर को ही नौ वर्ष पहले इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ साईंस पर हमला हुआ था जिसमें दिल्ली के एक प्रोफेसर मारे गए थे। यह हमला भी 28 दिसंबर को हुआ है। पता नहीं इन दोनों के बीच कोई रिश्ता है या नहीं, पर इससे साफ है कि आतंकवादियों के मॉड्यूल या स्लीपर सेल्स वहां मौजूद हैं।  खुफिया एजेंसियों एवं पुलिस प्रशासन को वर्तमान खतरों व चेतावनियों के साथ हर उस तिथि का ध्यान रखना ही चाहिए जिस दिन पहले विस्फोट हो चुका है। कर्नाटक एवं बेंगलूरु जेहादी आतंकवादियों का प्रमुख केन्द्र लंबे समय से रहा है। सिमी से लेकर, हरकत उल जेहाद अल इस्लामी और  इंडियन मुजाहीद्दीन के अनेक आतंकवादी वहां पकड़े गए, या फिर पुलिस की हिट सूची में रहे। जिस इंडियन मुजाहिद्दीन ने 2013 तक आतंकवादी हमलों की झड़ी लगा दी उसके केन्द्र के रुप मंे भी कर्नाटक चिन्हित हो चुका है। जिन भटकल बंधुओं की हर घटना में चर्चा होती रही है वे यहीं के थे। कर्नाटक का बंेगलूर एवं गुलबर्ग इनका मुख्य केन्द्र माना जाता रहा है। अगर खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट को स्वीकार करें तो इंडियन मुजाहिद्दीन के दो बड़े गढ़ महाराष्ट्र एवं कर्नाटक ही रहे हैं।  यह एक मोटा मोटी तस्वीर है जिससे हम उन क्षेत्रांे में आतंकवादियों की गतिविधियों की झलक देख सकते हैं।

फोरेंसिक विशेषज्ञ बता रहे हैं कि धमाके में कम तीव्रता के आईईडी का प्रयोग किया गया है एवं इसे उड़ाने के लिए टाइमर लगा था। पर उसमें व्यक्ति की जान लेने की क्षमता तो थी। खैर, यह कोई एक व्यक्ति भी कर सकता है और समूह भी। आज आतंकवादी होने के लिए किसी समूह के साथ होना आवश्यक नहीं रह गया है। मेंहदी जैसे किसी समूह का सदस्य नहीं है, वैसे आतंकवाद से प्रभावित और मजहब के लिए मौत को गले लगाकर जन्नत पाने के उन्माद से ग्रसित लोगों की संख्या बढ़ रही है जो अकेले भी किसी घटना को अंजाम दे सकते हैं। आखिर आईएसआईएस के साथ लड़ने के लिए हमारे यहां से युवा और प्रौढ़ इराक सीरिया गए हैं और कुछ जाते हुए पकड़े गए हैं। इसलिए इस घटना में निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि कोई समूह था या किसी व्यक्ति ने ऐसा किया। अल कायदा प्रमुख अल जवाहिरी द्वारा भारत को केन्द्र में रखकर दक्षिण एशिया के लिए ईकाई के गठन तथा आईएसआईएस के इस्लामी साम्राज्य में भारत के एक भाग को शामिल करने के बाद खतरा वैसे भी बढ़ा हुआ है।

इसलिए बेंगलूरु की घटना भले छोटी लगे पर इसके संकेत और संदेश गहरे हैं। यह हमारे उपर मंडराते आतंकवादी खतरे की पूर्व चेतावनी है। राज्यों एवं केन्द्र दोनों के लिए इसमें संकेत निहित है। इस घटना में चाहे मध्यप्रदेश की जेल से भागे हुए सिमी सदस्यों का हाथ हो या किसी का जैसा पुलिस आशंका व्यक्त कर रही है, आईएसआईएस एवं अल कायदा दोनों के नए तेवर और उनकी योजनाओं, भारतीयों का उनके समूह में होना ......आदि  हमारे लिए आतंकवाद से निपटने के लिए हर क्षण चौकसी के साथ उसके मुकाबले की पूरी तैयारी अमेरिका और यूरोपीय देशों के सदृश करने का ही विकल्प देती है। यह अच्छा संदेश है कि बेंगलूरु मंे हमले के तुरत बाद केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा घटना स्थल पर पहुंचें, मौके का मुआयना किया और पत्रकारों से बातचीत कर स्थिति स्पष्ट किया। उनने पहले ट्विट करके भी लोगों से संयम बरतने की अपील की। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने तत्क्षण अपना वक्त्व्य दिया, मुख्यमंत्री से बात की एवं आवश्यकता पड़ने पर हर तरह की सहायता का प्र्रस्ताव दिया। यहां तक केन्द्र की सक्रियता प्रशंसनीय है, पर यह घटना के बाद की प्रतिक्रिया है और उसमें भी यह छोटी घटना है। घटना के पूर्व राज्यों के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर पूर्ण तालमेल तथा किसी बड़ी घटना से निपटने को लेकर सशक्त तैयारी का पूर्व परीक्षण अब अपरिहार्य हो गया है।

अवधेश कुमार, ई.ः 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः 110092, दूर.ः 01122483408, 09811027208


शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

जम्मू कश्मीर के जनादेश का अर्थ क्या है

अवधेश कुमार

भले जम्मू-कश्मीर में किसी पार्टी को बहुमत नहीं आया, पर वहां खुली आंखों कोई भी बदलाव की समां जलते देख सकता था। पहले और दूसरे चरण में जैसे ही 70 -71 प्रतिशत मतदान ने साफ कर दिया कि लोगों की आस्था भारत के संसदीय लोकतंत्र में बढ़ रही है। सभी 5 चरणों में कुल 65 प्रतिशत मतदाताओं द्वारा अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना कई दृष्टियों से असाधारण था। यह पिछले सारे चुनावों का रिकॉर्ड तो तोड़ा ही है, अन्य कई पहलू भी इसे असाधारण बनाते हैं। 2008 में 61.42 प्रतिशत और 2002 में 43.09 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। कंपकंपाती ठंड, कोहरे, लगातार आतंकवादी हमलाें, सामने लटकती मौत के खतरे और अपने-अपने क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले अलगावादियों के बहिष्कार के बावजूद मतदाताओं का उत्साह अपने आप बहुत कुछ बयान कर रहा था। जम्मू में एक युवती कह रही थी मैंने उस उम्मीदवार को वोट दिया है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेगा और युवाओं को उनकी प्रतिभा के अनुसार अवसर देगा और जिसका कोई पारिवारिक वंशवाद नहीं है। ध्यान रखिए कि दूसरे चरण के मतदान के बाद हर दिन बड़े छोटे आतंकवादी हमले हुए। उड़ी, त्राल और बारामूला ऐसे क्षेत्र थे जहां बड़े आतंकवादी हमले हुए, आतंकवादियों का यहां प्रभाव भी माना जाता है, पर यहां भी लोगों ने बढ़-चढ़कर वोट डाले। क्या इसे असाधारण नहीं माना जाएगा?

निस्संदेह, माना जाएगा। सैन्य शिविर पर हमला झेलने वाले उड़ी में 79 प्रतिशत मतदान हुआ। इस हमले में 11 सुरक्षाकर्मी और छह आतंकी मारे गए थे। आतंकी गतिविधियों के लिए बदनाम रहे बडगाम के चरार-ए-शरीफ इलाके में रिकॉर्ड 82.74 प्रतिशत मतदान हुआ। निस्संदेह, मतदान के बहिष्कार की अपील करने वाले हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी के गृह नगर सोपोर में सबसे कम 30 प्रतिशत मतदान हुआ। पर सन 2008 के चुनाव में इस क्षेत्र में 20 फीसद से भी कम मतदान हुआ था। लोकसभा चुनाव में तो वहां एक प्रतिशत के आसपास ही मतदान हुआ था। तीसरे चरण की 16 सीटों पर जब  58 प्रतिशत मतदान हुआ जो आरंभ के दो चरणों से कम था तो लोगों ने कहा कि कहां गया उत्साह, पर वे भूल गए कि सन 2008 के चुनाव में वहां 49 प्रतिशत ही मतदान हुआ था। इस दौरान कम से कम 20 आतंकवादी हमले हुए जिनमें 18 जवान 22 आतंकी और 9 नागरिक मारे गए। अंतिम तीन चरणों में हर बार एक सरपंच की हत्या हुई। जाहिर है, यह सब मतदाताओं को मतदान से दूर रखने के लिए ही था। लेकिन यहां यह प्रश्न स्वाभाविक ही उठता है कि क्या मतदाताओं के इस उत्साह में किसी पार्टी को बहुमत तक पहुुुंचाने का भाव शामिल नहीं था?

अगर सतही तौर पर परिणामों का विश्लेषण करें तो निष्कर्ष यही आएगा। किंतु हम इस पहलू को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि भाजपा को भले अपेक्षानुरुप सीटें नहीं आईं, पर उसने जम्मू कश्मीर के मतदाताओं को पक्ष और विपक्ष में आलोड़ित किया इसमें संदेह की रत्ती भर भी गंुजाइश नहीं। अलगाववादियों के कारण चुनाव बहिष्कार की राजनीति अगर कमजोर हुई तो भाजपा के कारण। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा में उमड़ती भीड़ और लोगों का भाजपा की ओर आकर्षण ने भाजपा विरोधियों के अंदर यह भाव पैदा कर दिया कि अगर वे मतदान नहीं करेंगे तो भाजपा सत्ता में आ जाएगी। इससे आबोहवा बदलने लगी। उदाहरण के लिए त्राल और सोपोर को  लीजिए। त्राल दक्षिण कश्मीर में है और सोपोर उत्तर कश्मीर में। इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में लोकसभा चुनाव में सबसे कम मतदान हुआ था।

वहां एक मतदाता कह रहा था कि यह बीजेपी का डर है। हलमोग हर साल चुनाव का बहिष्कार करते थे। लेकिन इस बार लोग पोलिंग बूथ तक पहुंच रहे हैं। हमलोग डरे हुए हैं कि वोट नहीं किए तो बीजेपी इस सीट को जीत सकती है। बीजेपी की जीत कोई नहीं चाहता। त्राल विधानसभा क्षेत्र दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में है। यहां कुछ हजार सिखों के वोट हैं और 1,445 प्रवासी मतदाता हैं। यहां से भाजपा ने सिख उम्मीदवार को उतारा था। लोकसभा चुनाव में त्राल में कुल 1000 से भी कम वोट पड़े थे। इस बार इस विधानसभा क्षेत्र में 37 प्रतिशत मतदान हुआ। उत्तरी कश्मीर के सोपोर की चर्चा हम कर चुके हैं।  यह हुर्रियत चेयरमैन सैयद अली शाह गीलानी का जन्म स्थान है। उम्मीदवारों ने स्थानीय लोगों से मतदान केन्द्र तक आने की अपील की। इन्होंने कहा कि यदि वे मतदान नहीं करेंगे तो भाजपा को मदद मिलेगी। सोपोर में भाजपा ने उम्मीदवार खड़ा नहीं किया। ऐसा भाजपा ने सज्जाद लोन की पार्टी पीपल्स कॉन्फ्रेंस को मदद करने के लिए किया है।
कश्मीर घाटी में विधानसभा चुनाव के अंतिम दौर के जिन इलाकों में चुनाव का सबसे ज्यादा बहिष्कार होता है, वहां आतंकवाद के सिर उठाने के बाद चुनाव में इस बार ज्यादा मतदाता शामिल हुए। श्रीनगर के आठ में चार विधानसभा क्षेत्र में मतदान दोपहर को 2008 का स्तर पार कर गया था। उड़ी में सेना के शिविर पर भयानक आतंकवादी हमले ने भले ही शहर को हिला कर रख दिया हो, लेकिन यह हमला मतदाताओं को अपने मताधिकार का उपयोग करने से रोक नहीं पाया। कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास स्थित इस शहर में सुबह से ही मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग करने के लिए मतदान केंद्रों पर आते दिखे। एक ग्रामीण कह रहे थे ,मोहरा में आतंकवादी हमले के पीछे चाहे जो भी कारण रहा हो, हम अपने अधिकारों को छोड़ नहीं सकते। इलाके में कई तरह की समस्याएं हैं और हम हमारे प्रतिनिधियों से उनकी जवाबदेही चाहते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 8 दिसंबर को श्रीनगर के एसके स्टेडियम में चुनावी रैली को संबोधित किया। हालांकि घोषणा के अनुरुप एक लाख लोग नहीं आए, पर जितनी संख्या आई वह पर्याप्त थी। उसका असर भी वहां हुआ। आज अगर पीडीपी को वहां बढ़त मिली तो इसी कारण। अगर भाजपा वहां मौजूद नहीं होती या उसका भय नहीं होता तो हो सकता था परिणाम कुछ और होता। यह पूछा जा सकता है कि आखिर यह कौन सा बदलाव है जिसमें पुरानी पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है? तो यह घाटी की सोच और संस्कृति तथा रणनीतिक मतदानों की परिणति है। हालांकि हम सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस को दो जिलों में मिले मत एवं भाजपा को घाटी में प्राप्त 2.8 प्रतिशत वोट को न भूलें। नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस को यदि मत मिला तो इसका कारण रणनीतिक मतदान था।  यानी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने इस आधार पर अपना निर्णय किया जो भाजपा को हरा सके उसे वोट देे। तो रिकॉर्ड मतदान के बावजूद किसी को बहुमत न मिलने का सूत्र यहां निहित है। कारण बहुमत का निर्धारण तो घाटी से ही मिलता। लेकिन लद्दाख में भाजपा को एक भी सीट क्यों नहीं मिली? वास्तव में भाजपा ने धारा 370 पर, लद्दाख को संघ शासित प्रदेश बनाने के मांग पर तथा पंडितों की पुनर्वापसी सहित अन्य मांगों पर खामोशी धारण करने का भी परिणाम उसे चखना पड़ा है। इनसे उसके अपने मतदाता भी रुठे, अन्यथा उसे ज्यादा सीटें आतीं। अगर ऐसा न होता तो नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस साफ हो गई होती।

हालांकि इसके बावजूद बदलाव की शुरुआत कश्मीर में हो गई है। भाजपा दूसरी सबसे बड़ी शक्ति के रुप में उभरी है जो उसके 44 प्लस से कम है, पर यह उपलब्धि और बदलाव भी छोटी नहीं है। हां, यह साफ है कि नरेन्द्र मोदी बाढ़ में लोगों के साथ खड़े होने, लगातार हर महीने की कश्मीर यात्रा और लोगांें को विश्वास मेें लेने की कोशिशों के बावजूद अभी घाटी में ठोस आधार बनाने में सफल नहीं रही। परिणाम के आधार पर सरकार गठन और उसकी स्थिरता पर समस्यायें साफ दिख रहीं हैं। पर दुनिया ने देख लिया कि वहां के बहुमत में लोकतंत्र के प्रति आस्था है, वे न आतंकवादियों के साथ हैं, न अलगाववादियों के। यह ऐसा पहलू है जो कश्मीर में बदलाव का सबसे ठोस स्तंभ के रुप में हमारे सामने दिख रहा है। भाजपा को घाटी में मत मिलना, सज्जाद लोन की ओर आकर्षण, लोगों का रणनीतिक मतदान करने को मजबूर होना......मोदी की श्रीनगर सभा की भीड़......आदि इस बदलाव के ही संदेश हैं। देखना होगा यह आगे सुद्ढ़ होता है, या फिर किसी दूसरी दिशा में मुड़ता है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

धर्म बदलाव पर बावेला

अवधेश कुमार

आगरा ने संसद से लेकर मीडिया तक भूचाल ला दिया है। इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है। हमारे नेताओं को तो अपनी संकीर्ण राजनीति के लिए मुद्दा चाहिए। यह हमारी राजनीति की विडम्बना है और त्रासदी भी कि वे किसी समस्या की तह तक जाने, उसमें विवेक और संतुलन से विचार कर प्रतिक्रिया देने, अपनी भूमिका निभाने की बजाय संकुचित राष्ट्रीय हित से विचार करते हैं। जिन नेताओं ने आगरा के 57 परिवारों के करीब 387 मुसलमानों के हिन्दू बनाए जाने या बन जाने को लेकर संसद से बाहर तक बावेला खड़ा किया हुआ है, बहिर्गमन कर रहे हैं उनमें से किसी एक ने भी वहां जाकर सच्चाई जानने और वहां यदि इस कारण सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है तो उसे रोकने की जहमत नहीं उठाई। यही नहीं कुशीनगर में और भागलपूर में कई हिन्दू परिवारों के ईसाई बनने की खबर सुर्खियों में है पर उसे लेकर कोई बावेला नहीं। आगरा धर्म परिवर्तन, परावर्तन या घर वापसी जो भी कहिए, उसके प्रमुख आरोपी पुलिस गिरफ्त में है। बावजूद हंगामा नहीं रुक रहा। आज की राजनीति में सबसे बड़ा कर्म मीडिया में बयान दे देना है और उपग्रह की कृपा से चैनल उसे 24 घंटे दिखाते हैं। लेकिन सच तो यही है कि इनकी आक्रामक शब्दावलियों से मामला सुलझने के बजाय उलझता है, जटिल होता है। ऐसा ही इस मामले में हुआ है।

भारत विविधताओं से भरा देश है और इसमें हमारे पूर्वजों ने एकता के तंतु तलाशकर इसको एक राष्ट्र के रुप में कायम रखने का सूत्र दिया। किसी भी स्थिति में यदि विविधता के एकता का वह सूत्र टूटता है तो उससे देश की आंतरिक शांति और स्थिरता को खतरा पहुंचेगा। यहां हर मजहब, पंथ को अपने अनुसार उपासना पद्धत्ति अपनाने, उसके अनुसार जीने का अधिकार है और उस पर किसी प्रकार का अतिक्रमण या उसके निषेध की कोशिश हमारी एकता के तंतु को तोड़ना आरंभ कर देगा। लेकिन इस समय जिस ढंग का बावेला मचा है उसमें सच तक पहुंचना आसान नहीं है। अगर हमें सच को समझना है, सही निष्कर्ष तक जाना है, झूठ और सच के अंतर को अलग करना है तो फिर जरा इस शोर से बाहर निकलकर विचार करना होगा। 

वास्तव में इसके कुछ दूसरे पक्ष हैं उन्हें भी देखना होगा। मसलन, संविधान के मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 25 में हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसके प्रचार करने का अधिकार है। इसलिए यदि कोई अपने धर्म का बिना सांप्रदायिक भावना फैलाये प्रचार करता है तो वह संविधान का पालन करता है। उसे आप रोक नहीं सकते। उसी तरह यदि कोई व्यक्ति अपना मजहब, पंथ कुछ भी बदलता है तो उसे उसका अधिकार है। अगर कोई ऐसा करता है तो उसके पीछे कुछ प्रेरणा हो सकती है, वह प्रेरणा कोई व्यक्ति भी दे सकता है। इसलिए किसी को अपना मजहब बदलने के लिए प्रेरित करना भी अपराध नहीं हो सकता। यहां तक यदि हमारे राजनेता और मीडिया के पुरोधा समझने की कोशिश नहीं करेंगे तो फिर समस्या और जटिल होगी। समस्या तब आएगी, संविधान और कानून विरुद्ध तब होगा जब आप किसी को प्रेरणा देने में लालच लोभ का उपयोग करते हैं, उसे बरगलाते हैं, या भयभीत करते हैं। यदि व्यक्ति भय से, लालच से या गलत बात बताने से अपना मजहब बदलने को प्रेरित होता है तो वह संविधान एवं कानून दोनों की दृष्टि से अमान्य है। कई राज्यों ने अपने-अपने यहां धर्म परिवर्तन पर कानून बनाया हुआ है और उसके अनुसार वह कार्रवाई करती है।

अब इन कसौटियों पर आगरा की घटना को देखें। वहां मुसलमान से हिन्दू बनने वाले अत्यंत ही गरीब तबके के हैं। वे पता नहीं बंगलादेशी हैं या पश्चिम बंगाल के हैं। कहा गया कि उनके पूर्वज कुछ ही दशक पूर्व हिन्दू से मुसलमान बने। यह सच है या झूठ इसकी जांच हो सकती है। लेकिन इससे कोई अंतर नहीं आता। मूल प्रश्न यह है कि क्या बजरंग दल या धर्म जागरण मंच ने उनको बरगलाकर, प्रलोभन देकर या डराकर ऐसा किया? पहली नजर में ही यह असंभव लगता है कि एक साथ इतने परिवारों को कोई भय, प्रलोभन या बरगलाकर मजहब छोड़ने को बाध्य कर देगा। यह भी साफ है कि जो हुआ वो खुले में हुआ। उस कार्यक्रम के समाचार स्थानीय समाचार पत्रों में घटना के पहले ही आ गये थे। दूसरे, जिस दिन परिवर्तन का कार्यक्रम था उस दिन भी मीडिया को बुलाया गया था। उसकी पूरी वीडियो फुटेज हमारे पास उपलब्ध है। बाजाब्ता बैनर लगा था बुद्धि शुद्धि कार्यक्रम, पुरखों की घर वापसी। यानी छिपकर गोपनीय तरीके से कुछ नहीं हुआ। वे सारे स्नान करके आए, पुरुषों ने जनेउ पहने, उनको कलेवा पहनाया गया, फिर गंगाजल का पान और सबने मिलकर हवन किया। उस हवन में सबने अपनी टोपी डाली। सारा कार्यक्रम आर्य समाज की परंपरागत पद्धति से हुआ, इसलिए शपथ पत्र पर उनके हस्ताक्षर कराए गए। 

इन सारे तथ्यों को देखने के बाद यह मानना मुश्किल है कि उनको यह पता ही नहीं हो कि वे मुसलमान से हिन्दू बन रहे हैं। यह हो सकता है कि उनने कहा हो कि हमारे पास राशन कार्ड नहीं हैं, मतदाता पहचान पत्र या आधार कार्ड नहीं है और ऐसा करने वालों ने सब बनवा देने का वचन दिया हो। यह समाचार भी मिला है कि आयोजकों में से कुछ बात कर रहे थे कि अब इनका हिन्दू नामकरण करके मतदाता बनवाना है और आघार कार्ड भी बनवा देना है। यहां तक तो सच लगता है। पर क्या यह प्रलोभन की श्रेणी में आएगा? क्या इतने के लिए कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह अपना मजहब बदल लेगा? जाहिर है, इसको गले उतारना संभव नहीं है। इसके अलावा कोई ऐसी बात सामने नहीं आई है जिससे यह जबरन, प्रलोभन वश या बरगालकर किया गया कार्यक्रम लगे। तब प्रश्न है कि उनमें से कुछ लोग क्यों कह रहे हैं कि उन्हें बताया ही नहीं गया उनको मुसलमान से हिन्दू बनाया जा रहा है? कुछ महिलाओं की आंखों से निकलते आंसू बता रहे हैं कि जो कुछ हुआ उससे उनके अंदर पीड़ा है। वो पीड़ा किन कारणों से है यह बात अलग है।

एक व्यक्ति इस्माइल, जिसका नाम राजकुमार रखा गया था उसके द्वारा थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। कोई भी देख सकता है कि यह भी दबाव में हुआ। जिस ढंग से मुसलमान समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे, वे लोग पहले उस बस्ती में गए, वहां बातचीत की और फिर आम तौर पर जैसा हमारे समाज में होता है जैसे पहले उनको मुसलमान से हिन्दू बनने के लिए समझाया बुझाया गया उसी तरह उनको इसे अस्वीकारने के लिए समझाया बुझाया गया। इस समय मुस्लिम नेताओं, उलेमाओं, की गतिविधियां उस मुहल्ले में तेज हो चुकी है, उन्हें अक्षर ज्ञान और कुरान शरीफ पढ़ाये जा रहे हैं। ऐसा नहीं किया जाता तो वो गरीब लोग, जिनके पास अपनी पहचान साबित करने के लिए कोई एक दस्तावेज तक नहीं, वो कहां से प्राथमिकी की हिम्मत करते। लेकिन अब प्राथमिकी दर्ज हो गई है तो फिर जांच निष्पक्ष और दबावरहित हो। ऐसे अधिकारी जिसका रिकॉर्ड बेदाग हो उसे जांच का जिम्मा दिया जाए। जांच और कानूनी कार्रवाई पूरी तरह राज्य का मामला है। राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार है। तो फिर उस जांच की प्रतीक्षा क्यों नहीं की जानी चाहिए।  

वैसे यह सच है कि कई हिन्दू संगठन लंबे समय से घर वापसी के नाम पर इस प्रकार का आयोजन कर रहे हैं। आर्य समाज, हिन्दू महासभा, शंकराचार्यों के संस्थान.......लेकिन वो इतनी शांति और सहमति से होती है कि उसे लेकर शायद ही हंगामा होेता है। संघ परिवार के घटक भी करते हैं, पर हर बार ऐसा नहीं होता। संघ का संगठन धर्म जागरण मंच यह कार्य करता है। जो सब आर्य समाज के तरीके से होता है। वैसे ईसाई या मुसलमान बनना जितना आसान है उतना हिन्दू बनना नहीं। यहां जाति है। हिन्दू एक जातिविहीन समाज नहीं कि बस आप हिन्दू बन गए। इसलिए इस प्रश्न का निदान कठिन है कि किसी को हिन्दू बनना है तो वह किस जाति का होगा। अगर किसी को धर्म जागरण मंच, या बजरंग दल हिन्दू बना दे और घोषित कर दे कि ये अमुक जाति के हो गए तो वो जाति उसे स्वीकार कर ही ले यह आवश्यक नहीं। जहां तक मैंने इसे समझने की कोशिश की है इन लोगों ने जगह-जगह उनके पूर्वजों के इतिहास को खंगाला है और उससे जानने की कोशिश की है कि परिवर्तन के पहले ये किस जाति के थे। कई जगह ये उस जाति का सम्मेलन बुलाते हैं, उनमें उन मुसलमानों को भी बुलाते हैं जिनको हम धर्म परिवर्तन कहते हैं और ये परावर्तन या घर वापसी। उन्हें बताया जाता है कि आप इस जाति के थे और यदि आप वापस आते हैं तो आपकी रोटी बेटी का संबंध इस जाति के लोग करने को तैयार हैं। इस तरह कोशिश तो योजना पूर्वक हो रही है। किंतु, भारत में जाति की जटिलता को देखते हुए यह आसान नहीं है। इसलिए कई घटनायें ऐसी भी हुईं कि वे समझाने पर तैयार तो हुए लेकिन उनकी परेशानी बढ़ गई। इसलिए हिन्दू संगठनों के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है हिन्दू समाज के अंदर जाति की खाई, उंच नीच छूताछूत....के अंत के लिए अभियान चलाना। अगर कोई हिन्दू से धर्म बदला तो उसका सबसे बड़ा कारण यह जातिभेद ही रहा है। लेकिन जो नेता चीत्कार कर रहे हैं उनको इन सबसे कोई लेना देना होगा ऐसा लगता नहीं।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/