गुरुवार, 4 सितंबर 2014
मोदी की जापान यात्रा से विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव
लंबे समय से प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का मूल्यांकन मुख्यतः इस आधार पर होता रहा है कि आखिर शिखर वार्ता के मुद्दे क्यो थे, समझौते क्या हुए, हमेें वहां से प्राप्त क्या हुआ....आदि आदि। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जापान यात्रा के लिए भी ये कसौटियां होंगी और उन पर समझौतों, बातचीत, प्राप्तियों का मूल्यांकन किया जाएगा। पर अगर हम मोदी की अभी तक संपन्न चार विदेश यात्राओं, भूटान, नेपाल, ब्रिक्स सम्मेलन के लिए ब्राजिल एवं जापान को मिलाकर देखें तो उन्होंने इस लीक को तोड़कर उसे अपनी राष्ट्रीय सोच के अनुरुप सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामजिक धरातल को पुष्ट करने पर जोर दिया है जिससे संबंधों में निकटता की भावुक और संवेदनशील तत्वों का गहरा समावेश रहे। वास्तव में ऐतिहासिक, सांस्कृति, आध्यात्मिक आयाम ऐसे क्षेत्र हैं जो दो देशों के लोगों को निकट लाते हैं, उनमें अपनेपन का भाव सुदृढ़ करते हैं। एक बार जब इस आधार पर संबंध खड़ा हो गया तो फिर द्विपक्षीय राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक संबंधों का भवन ज्यादा सशक्त होता है। मोदी के प्रति किसी आग्रह और दुराग्रह से परे हटकर विचार करें तो यह स्वीकार करना होगा कि अन्य यात्राओं की तरह जापान में भी हर अवसर पर ऐसा लग रहा था कि वाकई भारत का नेता वहां अपने राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इसके पूर्व प्रधानमंत्रियों को हम नकारते नहीं, पर यह चेहरा और चरित्र पहली बार प्रकट हुआ है।
इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विद्वान या राजनय के मर्मज्ञ जो भी नाम दें, पर यह एक ऐसी शुरुआत है जिससे हमारी पूरी विदेश नीति की धारा बदल रही है। जापान में मोदी चाहते तो तोक्यो से यात्रा आरंभ कर सकते थे, लेकिन उन्होंने क्योतो जैसे आध्यात्मिक शहर से किया जो बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध स्थान है, जिसका भारत के साथ ऐतिहासिक, धार्मिक संबंध है। प्रधानमंत्री ने अपनी जापान यात्रा के कार्यक्रम में फेरबदल करते हुए सबसे पहले क्योटो जाने का फैसला किया था ताकि वे इस शहर के अनुभव से सीख सकें। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो एबे भी पारंपरिक औपचारिकता को तोड़ते हुए उनका स्वागत करने के लिए पहुंच गए। मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो एबी की मौजूदगी में दोनों देशों के बीच वाराणसी के विकास के लिए मान्य साझेदार शहर समझौते पर जापान में भारत की राजदूत दीपा वाधवा और क्योटो के मेयर कादोकावा ने हस्ताक्षर किए। यह समझौता वाराणसी की विरासत, पवित्रता और पारंपरिकता को कायम रखने और शहर के आधारभूत ढांचे को आधुनिकतम बनाने में मदद करेगा। इसके साथ ही कला, संस्कृति और अकादमिक क्षेत्र में भी शहर के विकास में दोनों देश सहयोग करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने धार्मिक महत्व के शहरों को आकर्षक तीर्थ व पर्यटनस्थल में विकसित करने की घोषणा की है वाराणसी के अलावा वे मथुरा, गया, अमृतसर, अजमेर और कांचीपुरम जैसे कई धार्मिक शहरों के लिए भी ऐसी ही योजना तैयार कर रहे हैं। इसमंे क्योतो अपने अनुभव से योगदान देगा।
मोदी ने क्योतो के मेयर दाइसाका कादोकावा को एक पुस्तक भेंट की जिस पर लिखा था मैं बनारस का प्रतिनिधित्व करता हूं। उन्होंने वाराणसी का एक डिजिटल मानचित्र भी मेयर को भेंट किया। मोदी ने कहा कि क्योटो आने की उनकी वजह यह है कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद क्योटो अपनी सांस्कृतिक विरासत को बरकरार रखते हुए आधुनिक जरूरतों को पूरा किया है। इस शहर का विकास सांस्कृतिक धरोहर के आधार पर हुआ। भारत में हम भी विरासत शहर विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। यहां से हम काफी कुछ सीख सकते हैं। क्योटो के मेयर ने मोदी को विरासत शहर के विकास पर प्रजेंटेशन दिया। उन्हांेंने 40 मिनट के प्रजेंटेशन में बताया कि क्योटो के नागरिकों ने किस तरह उसे स्वच्छ बनाया। उसमें यह बताया गया कि शहर को कैसे विकसित किया जाए ताकि उसकी ऐतिहासिकता भी बनी रहे, प्रकृति को नुकसान भी नहीं पहुंचे और उसे आधुनिक भी बनाया जा सके। उन्होंने मोदी को बताया कि स्थानीय विद्यार्थियों ने शहर को स्वच्छ बनाने में सक्रिय भागीदारी निभाई और शहर में कचरे को घटाकर 40 फीसद कर दिया। इसके अलावा जगह.जगह लगे पोस्टर भी हटाए गए। मोदी ने शिंजो एबी को वहां क्या भेंट किया? भगवद गीता का संस्कृत और जापानी संस्करण के अलावा स्वामी विवेकानंद के जापान से जुड़े संस्मरणों पर आधारित पुस्तक। प्रधानमंत्री अपने साथ इस किताब के जापानी और अंग्रेजी संस्करण ले गए थे। उसके बाद मोदी क्योटो शहर स्थित प्रसिद्ध तोजी बौद्ध मंदिर पहुंचे। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे इस दौरान उनके साथ थे। दोनों प्रधानमंत्रियों ने यहां करीब आधा घंटा बिताया और मंदिर के प्रमुख बौद्ध भिक्षु वेनेरेबल यासू नागामोरी से पूरी जानकारी ली।
इस घटना का विस्तार से वर्णन करने का उद्देश्य समझना आसान है। किस प्रधानमंत्री ने इसके पूर्व ऐसा किया है? वाराणसी और अन्य शहरों के विकास का तरीका तो मोदी ने सीखा ही, वहां के लोगों से सहयेाग का वायदा प्राप्त किया और यह वायदा सहर्ष और स्वेच्छा से था, क्योंकि मोदी ने सांस्कृतिक एकता का सूत्र बीच में ला दिया। जो समझौते हुए वे तो केवल औपचारिक हैं। शिंजो अबे को उन्होंने यही पस्तुकें क्यों भेंट की? वहां भी यही लगाव पैदा करने का भाव था। माहौल कितना बदला इसका उदाहरण था क्योतो के मेयर का बयान। मेयर ने कहा कि वह भारत और जापान के बीच संबंधों को प्रोत्साहित करने के लिए समर्पित रहेंगे। बुद्ध से जुड़ी विरासतें भारत से प्रेरित हैं। तोजो मंदिर के पूजारी से कहा कि मैं मोदी हूं और आप मोरी। तो ये सब चीजें व्यक्तियों को निकट लातीं हैं और इससे देशों के संबंधों के दूसरे आयाम अपने-आप मजबूत होते हैं।
यूएस.2 एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की डील साइन की गई है। इसके जरिए भारतीय एयरक्राफ्ट उद्योग के विकास के लिए एक रोड मैप तैयार किया जा सकेगा। मोदी सरकार की नीतियों को ध्यान में रखते हुए ये प्लेन भारत में तैयार किए जाएंगे।
7 दशक पहले खत्म हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह पहली बार होगा जब जापान किसी देश को सैन्य उपकरण बेचेगा।
यूएस-2 एम्फीबियस विमान समझौता, शिंजो अबे की शिखर वार्ता, उसके बाद हुए छः समझौतों, फिर उद्योगपतियों का महत्व तो है ही क्योंकि जापान ने करीब 2 लाख 10 हजार करोड़ रुपया 5 वर्ष में निवेश करने का ऐलान किया है। संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस में अबे ने ऐलान किया कि वे बुलेट ट्रेन चलाने में भारत की मदद करेंगे। साथ ही सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तरों पर भी सकारात्मक कार्य करने में सहभागिता देंगे, शिक्षा और शोध में भी सहायता करेंगे......। मोदी ने ने कहा कि जापान ने बिल्कुल नए स्तर पर साझेदारी की बात कही है। इसी तरह जापान चेम्बर औफ कौमर्स में उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए मोदी ने जो कहा उसके दो भाग थे-एक, कारोबार, रोजगार से संबंधित एवं दूसरा अंतराष्ट्रीय राजनीति से। उन्होंने भारत विश्व का सबसे युवा देश है, क्योंकि यहां पर 60 फीसद से ज्यादा युवा हैं। इसके चलते 2020 में वर्क फोर्स के लिए भारत पर दुनिया की निगाह होगी। यहीं पर उन्होंने स्किल विकास की बात की। यानी आपको यदि काम करने वाले कुशल लोग चाहिएं तो भारत ही वह प्रदान कर सकता है। प्रधानमंत्री ने जापानी निवेशकों को आमंत्रित करते हुए कहा कि कारोबारियों को काम करने के लिए अच्छा माहौल चाहिए और यह उपलब्ध कराना सिस्टम और शासन की ज़िम्मेदारी है। नियम और कानूनों को बदले जा रहे हैं जिनके परिणाम निकट भविष्य में दिखने लगेंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय में जापानियों को निवेश में मदद के लिए एक विशेष टीम जापान प्लस गठित की जाएगी। यानी पिछले कुछ सालों की कठिनाइयों और समस्याओं को भूल जाइए और निवेश करिए। जो जानकारी आ रही है अनेक कंपनियों में भारत में निवेश की लंबी योजनायें बनाईं हैं।
दूसरे भाग में उन्होंने कहा, ‘21 वीं सदी एशिया की होगी यह तो सभी मानते हैं, लेकिन यह सदी कैसी होगी यह भारत और जापान के संबंधों पर निर्भर करता है।’ यानी भारत और जापान ही इस सदी का भविष्य तय कर सकते हैं। 21वीं सदी में शांति और प्रगति के लिए भारत और जापान की बड़ी ज़िम्मेदारी है। मोदी ने कहाए भारत और जापान की जिम्मेदारी द्विपक्षीय संबंधों से भी आगे जाकर है। भारतीय और जापानी कारोबारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को दिशा दे सकते हैं। यानी आइए और साथ मिलकर कदम बढ़ायों, खुद भी प्रगति करें और दुनिया को दिशा दे। उन्होंने कहा कि दुनिया दो धाराओं में बंटी है, एक विस्तारवाद की धारा है और दूसरी विकासवास की धारा है। हमें तय करना है कि विश्व को विस्तारवाद के चंगुल में फंसने देना है या विकासवाद के मार्ग पर जाने के लिए अवसर पैदा करना है। इन दिनों 18वीं सदी का विस्तारवाद नजर आता है। कहीं किसी के समंदर में घुस जाना कहीं किसी की सीमा में घुस जाना। जाहिर है, इसका निशाना ची नही हो सकता है जो भारतीय सीमाओं में घुसपैठ करता है और दक्षिण चीन सागर पर दक्षिण पूर्व एशिया को परेशान किए हुए है।
इसकी प्रतिध्वनि हमें सुनने को मिली है। चीन ने जापान पर भारत को उससे तोड़कर अपने साथ मिलाने का आरोप भी लगा दिया है। खैर, इस पर हम यहां विस्तार से चर्चा नहीं कर सकते। मुख्य बात यह कि मोदी पहले
तोजी मंदिर के दर्शन के बाद मोदी क्योटो विश्वविद्यालय पहुंचे जहां उन्होंने स्टेम सेल रिसर्च की दिशा में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित जापानी प्रोफेसर शिन्या यामनांका से मुलाकात की। इस दौरान दोनों के बीच सिकल सेल अनीमिया के उपचार पर बातचीत हुई। भारत के कई हिस्सों में इस बीमारी की वजह से कई मौतें हो जाती हैं। मोदी ने प्रोफेसर यामनांका के साथ भारत.जापान के विश्वविद्यालों के बीच स्टेम सेल रिसर्च की दिशा में आपसी सहयोग पर भी बात की। इसी तरह वे जापान की शिक्षा प्रणाली को समझने के घोषित उद्देश्य से तोक्यो में 136 साल पुराने तैमेइ प्राथमिक स्कूल गए। वह एक संगीत कक्षा में गए जहां सात-आठ साल के आयु समूह के बच्चे उनके लिए एक गीत गा रहे थे। मोदी ने कुछ बच्चों को बांसुरी बजाते हुए पाया। मोदी ने कहा कि भारत की पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण बांसुरी बजाते थे। इसका उपयोग गायों को आकर्षित करने के लिए करते थे। इसके बाद उन्होंने बच्चों के लिए बांसुरी बजाई। वास्तव में मोदी जापान की शिक्षा प्रणाली को समझने के लिए एक श्छात्रश् के तौर पर स्कूल गए ताकि ऐसी ही प्रणाली अपने देश में भी लागू की जा सके। प्रधानमंत्री ने भारत में जापानी भाषा पढ़ाने के लिए यहां के शिक्षकों को आमंत्रित किया और 21 वीं सदी को सही मायने में एशिया की सदी बनाने के उद्देश्य से एशियाई देशों में भाषाओं तथा सामाजिक मूल्यों के लिए सहयोग को आगे बढ़ाने की अपनी वकालत के बीच ऑनलाइन पाठ्यक्रमों का प्रस्ताव भी दिया। मोदी ने कहा कि यहां आने का मेरा इरादा यह समझना है कि आधुनिकीकरण, नैतिक शिक्षा और अनुशासन जापान की शिक्षा प्रणाली में किस प्रकार एकाकार हुए हैं। मैं 136 साल पुराने स्कूल में सबसे उम्रदराज छात्र के तौर पर आया हूं। प्रधानमंत्री को उप शिक्षा मंत्री माएकावा केहाई ने जापान की शिक्षा प्रणाली खास कर सरकार संचालित प्रणाली और कामों के बारे में विस्तार से बताया। मोदी ने कुछ सवाल पूछे जैसे सिलेबस कैसे तैयार किया जाता है? क्या अगली क्लास में प्रमोट करने के लिए परीक्षा एकमात्र मानदंड है? क्या छात्रों को सजा दी जाती है? उन्हें नैतिक शिक्षा कैसे दी जाती है?
मोदी ने स्कूल के दौरे के दौरान कहा कि अब मैं ज्ञानवान महसूस कर रहा हूं।् 21 वीं सदी को एशिया की सदी की कल्पना को वास्तविकता में बदलने के लिए एशियाई देशों को भाषाओं और सामाजिक मूल्यों की दिशा में सहयोग बढ़ाना चाहिए। इससे पूरी मानवता की सेवा होनी चाहिए। यह जो मोदी की विशेषता है सीधे संपर्क करके समझना, वहां जाना, वहां के लोगों को योजना के तौर पर आमंत्रित करना....यह विदेश नीति की ऐसी धारा है जो निस्संदेह, भारत को विश्व में न केवल अलग पहचान देगी, इसे लाभान्वित करेगी, मौजूदा आर्थिक ढांचे में सांस्कृतिक आध्यात्मिक विरासत और सामाजिक परंपरा व पहचान खोये द्विपक्षीय-अंतरराष्ट्ीय राजनीति का यह सूत्र आने वाले समय में और खिलेगा।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208
शुक्रवार, 29 अगस्त 2014
धर्म संसद को कैसे देखें
कवर्धा में आयोजित धर्म संसद, उसमें हुई बहस, और पारित प्रस्तावों को लेकर देश में बहस और विवाद दोनों साथ आरंभ हो गए हैं। ज्योतिष एवं द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद जी से उनके राजनीतिक विचारों को लेकर भारी संख्या में लोगों को एलर्जी है। हमारे मन पर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से राजनीति इतनी हाबी हो चुकी है और अपने या अपने द्वारा समर्थित दल के अलावा दूसरों के प्रति विरोध का इतना गहरा भाव भरा है कि उसके पक्ष में एक बयान देने वाले तक को हम खलनायक मानने के लिए तैयार हो जाते हैं। राजनीतिक दलों और नेताओं के आचरणों ने इतनी असहिष्णुता पैदा कर दी है। शंकराचार्य स्वामी से कई मुद्दों पर सहमति असहमति हो सकती है, लेकिन धर्म के इतने उंचे पायदान पर और इतने अधिक दिनों से वे विराजमान हैं, उनके जीवन के ऐसे अनेक पहलू हैं जो कि गौरवपूर्ण भी हैं, पर उनके द्वारा आहूत धर्मसंसद को कुछ लोग केवल इस कारण खारिज कर रहे हैं कि वे कांग्रेस के समर्थक हैं। आश्चर्य की बात है कि उनमें अब ऐसे लोग भी शामिल हो गए हैं जो स्वयं साधु वेश धारण कर चुके हैं, आश्रम चलाते हैं और कांग्रेस की ओर से चुनाव भी लड़ चुके हैं। लेकिन क्या शंकराचार्य जी का धर्म संसद बुलाना धर्म की दृष्टि से सम्मत कदम नहीं है? क्या वहां जो निर्णय लिए गए वे मान्य नहीं होंगे?
हम पत्रकारों की अपनी समस्या है। हम हर घटना मंे विवाद तलाशते हैं और उसे अपनी सोच के अनुसार नमक मीर्च लगाकर परोसते हैं। खैर पहले विवाद पर आएं। दिल्ली से तीन साईं समर्थक अशोक कुमार, जितेंद्र कुमार और मनुष्यमित्र मंच पर पहुंचे। हालांकि सिरडी साईं ट्रस्ट की ओर से इनको अधिकृत नहीं किया गया था, फिर भी उन्हें बात रखने का मौका दिया गया। उनने कहा कि वे साईं को भगवान मानते हैं। वे सिद्ध आत्मा थे, इसलिए उनकी पूजा करने का सभी को अधिकार है। मनुष्यमित्र ने कहा कि धर्म संसद हिंदुओं को बांटने का काम कर रही है। कोई भी साधु आज गौहत्या को रोकने के लिए अनशन करने को तैयार नहीं है। जब मनुष्यमित्र ने सनातन धर्म के साधुओं से गौहत्या बंद होने तक अन्न त्यागने का प्रस्ताव रखा, तो एक साधु आए और शंकराचार्य के सामने अन्न त्यागने को तैयार हो गए। इसके बाद साधुओं के समूह ने मनुष्यमित्र को घेर लिया। बाद में साधु संतों के बीच से मनुष्यमित्र को निकाला गया और पुलिस अपने साथ ले गई। जिस साधु को टीवी चैनलों पर माइक लेकर चिल्लाते हुए दिखाया गया उन्हांेने कहा कि मैं शंकराचार्य जी के चरणों के सामने यह संकल्प लेता हूं कि मैं अन्न जल ग्रहण नहीं करुंगा, तुम आओ। यह कहीं से धर्म संसद का विरोध नहीं था, पर इसे जिस तरह प्रस्तुत गिया गया मानो वहां विद्रोह हो गया है। यह सच नहीं था। और ऐसी कौन सी बहस होगी या संसद होगी जहां विरोध, मतभेद न उभरे।
धर्म संसद में देश के तेरह अखाड़ों और चार शंकराचार्यों का प्रतिनिधित्व हुआ। नरेन्द्र गिरी जी महाराज की अध्यक्षता में हुई सभा में सभी इस बात पर एकमत थे कि साईं भगवान नहीं हैं। उनकी पूजा नहीं की जानी चाहिए। अन्य दो शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ महाराज (श्रृंगेरी पीठ), स्वामी निश्चलानंद जी महाराज (पुरी पीठ) ने भी अपने-अपने प्रतिनिधियों के जरिए स्पष्ट किया कि साईं में भगवान होने की योग्यता नहीं है। संसद ने बाजाब्ता प्रस्ताव पारित करके कहा कि साईं भगवान नहीं है, साईं पूजा शास्त्र सम्मत नहीं है, साईं कोई अवतार भी नहीं हैं और न ही हिंदू सनातन धर्म में उनका कोई उल्लेख है। मंदिरों से साईं की मूर्तियां हटाये संबंधी प्रस्ताव में कहा गया कि अगर साईं भक्त ऐसा नहीं करेंगे तो संत खुद मंदिरों से मूर्तियों को हटा देंगे। देखा जाए तो इन पंक्तियों में एक टकराव का भाव है। यानी किसी तरह मूर्तियां हटानी ही है चाहे कोई रोके या विरोध करे। लेकिन चार पीठों के शंकराचार्यों ने एकमत होकर कह दिया है कि साईं भगवान नहीं हैं। धर्म संसद ने एक निर्णय ले लिया है, जिसमें इतने अखाड़े, शंकराचार्यों की सहमति है और काशी विद्वत परिषद की मुहर है। शंकराचार्य को धर्म संसद बुलाने का अधिकार है। जो सहमत थे वे आए लेकिन जो नहीं आए वे सहमत नहीं ही थे ऐसा नहीं है। र्साइं को भगवान माने या नहीं इस पर मतभेद की गुंजाइश है, पर धर्मक्षेत्र में इसका निर्णय कौन करेगा? सरकार, मीडिया, कानून और संसद तो कर नहीं सकती। अगर धर्म संसद ने निर्णय कर दिया तो उसका खंडन कौन करेगा? साईं को भगवान माना जाए या नहीं, उनकी पूजा की जाए की नहीं, की जाए तो किस रुप में....इस पर देशव्यापी बहस और विवाद स्वामी स्वरुपानंद जी के स्टैण्ड लेने के बाद ही आरंभ हुआ। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ही स्वरुपानंद जी से सहमत नहीं है। वैसे देश भर में आम सनातनी देवताओं के मंदिरों में जिस तरह साईं बाबा की मूर्तियां लगीं उनके खिलाफ माहौल आम विवेकशील धर्मावलंबियों में भी देखा गया।
लेकिन ध्यान रखिए वहां कुल छः प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें साईं को भगवान न मानने वाला प्रस्ताव एक था। इन प्रस्तावों मे कहा गया है कि गोहत्या को बंद करना चाहिए और गंगा को निर्मल अविरल धारा में प्रवाहित करने के लिए प्रयास करना होगा, विश्वविद्यालयों में गीता, रामायण, महाभारत की पढ़ाई अनिवार्य होना चाहिए, नकली संतों का बहिष्कार करना चाहिए, क्योंकि ये हिंदु धर्म का नाम लेकर सनातन धर्म को क्षति पहुंचा रहे हैं, नारी का सम्मान बढ़ाना होगा। कानून से कोई हल नहीं निकलने वाला, इसके लिए धर्म जागरण अभियान चलाना होगा। आखिरी प्रस्ताव अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण का था। सरकार को राम मंदिर निर्माण में आ रहे सभी अवरोध को दूर करने का प्रस्ताव भेजा गया है। वहां सनातन धर्म की कमियों पर भी चर्चा हुई। उदाहरण के लिए पूर्व गृहमंत्री चिन्मयानंद स्वामी ने कहा कि सनातन धर्म को भी अपनी कमियों पर विचार करना होगा। आदिवासी और जंगलों में रहने वाले लोग सनातन धर्म से दूर हो गए। साधुओं की सभा में इस बात का चिंतन करना चाहिए कि सनातन धर्म के लोग मुसलमान, ईसाई और साईं की ओर क्यों झूक रहे हैं। इसके बाद देश में धर्म की रक्षा के लिए सनातन संघर्ष समिति का गठन किया गया। यह समिति सनातन धर्म के विरोध में उठने वाले मुद्दों पर जवाब देगी। इसके अध्यक्ष नरेद्र गिरी और मंत्री हरिगिरी को बनाया गया है। समिति देश में अलग-अलग स्थानों पर धर्म संसद का आयोजन करेगी और नकली साधुओं को समाप्त करने के लिए अभियान चलाएंगे।
तो कुल मिलाकर इस धर्म संसद ने ऐसे कार्य नहीं किए जिससे इसे इतना विवादास्पद या विफल बता दिया जाए। इसमें सार्थक प्रस्ताव हैं और धर्म के प्रति सचेतन का प्रयास है। हां, साईं बाबा के भक्त यकीनन धर्म संसद के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे। साईं ट्रस्ट इसका समुचित जवाब दे। हमारा मानना है कि वे अपनी आस्था भले बनाए रखें, पर सनातन धर्म के मंदिरों में उनकी मूर्तियां लगाने से परहेज करें। सनातन धर्म के मंदिरों का जिस तरह हाल के वर्षों में साईंकरण हुआ है वह अभद्र और अशालीन प्रक्रिया है। इसे रोका जाए ताकि टकराव न हो। दूसरे, वेद मंत्रों के आधार पर जो मंत्र उनने तैयार किए हैं उन पर पुनर्विचार करें। वैसे साईं का साहित्य पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि बहुत गहरा आध्यात्मिक दर्शन का आधार वहां नहीं है। लेकिन मनुष्य की आस्था है, वह किसी में भी हो सकती है। हम उस आस्था को जबरन रोक नहीं सकते हैं। पर धर्म के शीर्ष संत होने के कारण शंकराचार्य एवं अन्य संतों को भी यह अधिकार है कि अगर उन्हें कोई पंथ अपने सनातन धर्म के विरुद्ध लगता है तो वे उसके विरुद्ध आवाज उठाएं और निर्णय दें। यह निर्णय पर किसी पर थोपा नहीं जा सकता। हम अपने विवेक अविवेक से निर्णय करें। लेकिन इसको निरर्थक कहना, या सतही शब्दों से इसे तुच्छ साबित करना उचित नहीं है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्ली-110092, दूर.ः01122483408, 09811027208
मंगलवार, 26 अगस्त 2014
शुक्रवार, 22 अगस्त 2014
एंटनी राग से कांग्रेस को क्या मिलेगा
अवधेश कुमार
ए. के. एंटनी ने कांग्रेस की करारी पराजय पर अलग-अलग समयों पर कई वक्तव्य दिए, लेकिन उनकी अध्यक्षता में बनी रिपोर्ट टुकड़ों में नहीं है। उसे पूरी तरह सार्वजनिक भी हीं किया गया है, पर उसके महत्वपूर्ण अंश उनके वक्तव्यों या स्रोतों से बाहर आ गया है। वैसे भी कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा प्रस्ताव पारित करके उसका गठन नहीं हुआ था। अध्यक्ष के नाते सोनिया गांधी ने उसे अनौपचारिक स्वरुप दिया था। इसका अर्थ यह हुआ कि वह रिपोर्ट सिर्फ सोनिया गांधी को ही मिलनी थी। वे उसे पढ़ेंगी और आवश्यकता समझेंगी तो उसे विचार के लिए कांग्रेस की कोर कमेटी या कार्यसमिति में रखेंगी नहीं समझेंगी तो नहीं रखेंगी। अगर उन्हें महसूस होगा कि इस पर विचार एवं कार्य होना चाहिए तो वे स्वयं उस दिशा मंे अध्यक्ष के नाते कदम उठा सकती हैं, पार्टी से भी आग्रह कर सकती हैं। यानी एंटनी समिति रिपोर्ट का पूरा दारोमदार सोनिया गांधी पर निर्भर है या फिर राहुल गांधी को उपाध्यक्ष के नाते मिला दें तो दोनों माता-पुत्र ही इस रिपोर्ट की नियति निर्धारित करेंगे। इसके पूर्व जब 2012 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की पराजय हुई थी तब भी एंटनी की अध्यक्षता में एक समिति बनी थी। उसकी रिपोर्ट के अंश भी बाहर आए, पर वह कांग्रेस पार्टी के विचार-विमर्श का हिस्सा नहीं बना। तो क्या इस रिपोर्ट की भी यही दशाा होगी?
यह प्रश्न और आरंभ में उपरोक्त विवरण इसलिए दिया जाना आवश्यक है, क्योंकि बहुत सारे कांग्रेसी एवं कांग्रेस के समर्थकों ने इस रिपोर्ट से काफी उम्मीद लगा रखी है। आखिर अपने जीवन के सबसे बुरी पराजय और राजनीतिक संघात के बाद पार्टी के निष्ठावान लोग कम से कम इतना तो अवश्य सोचेंगे कि एंटनी समिति ने जो कारण बताए होंगे और उनसे निपटने के लिए जो अनुशंसायें की होंगी उनके आधार पर पार्टी फिर से पुनर्गठित होकर जन समर्थन पाने की कुव्वत पा सकती है। उत्तराखंड के उपचुनावों में तीनों सीटों पर विजय से ऐसा सोचने वालों की उम्मीदें जगीं है। हम उस रिपोर्ट के मुख्य अंश पर बाद में आएंगे, लेकिन जरा सोचिए, इस समिति में मंें एंटनी के अलावा, मुकुल वासनिक, आरसी खुंटिया और अविनाश पांडेय शामिल हैं। इनमंे से ऐसा कौन व्यक्ति है जो हिम्मत के साथ सोनिया गांधी या राहुल गांधी के सामने एकदम कटु सच बोल सकता हो? इसलिए जब समिति ने 21 जून से काम करना शुरू किया था तभी से यह मान लिया गया था कि इसमें कुछ सतही और अस्पष्ट ऐसे कारणों को ज्यादा फोकस किया जाएगा जिससे संदेश यह निकले कि मुख्य कारण अपने अपने वश में नहीं थे। इससे नेतृत्व पर दोष आने से बच जाएगा। यही आपको इस रिपोर्ट में दिखाई देगा। दूसरे, यह भी विचार करने की बात है कि आखिर इतनी बुरी हार और घक्के के बाद भी यदि पार्टी अध्यक्ष औपचारिक और अधिकार प्राप्त समिति तक के गठन से बचीं तो वे या उनके रणनीतिकार आगे पार्टी को पुनर्गठित करने के लिए कुछ क्रांतिकारी कदम उठाएंगे यह कैसे मान लिया जाए?
एंटनी समिति ने कांग्रेस और संप्रग के खिलाफ वातावरण बनाने के लिए मीडिया और कुछ कॉरपोरेट घरानों की ओर उंगली उठाई है। रिपोर्ट में बाजाब्ता चार ऐसी कंपनियों का नाम भी लिया गया है। यह असाधारण स्थिति है। संभवतः भारत के राजनीतिक इतिहास में यह पहली ही घटना होगी जब किसी मुख्यधारा की पार्टी ने अपनी पराजय का ठिकरा मीडिया और कॉरपोरेट घराने पर फोड़ा है। कांग्रेस से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या मीडिया और कॉरपोरेट के पास इतनी शक्ति है कि वह देश भर में कांग्रेस का मत 28.8 प्रतिशत से 19 प्रतिशत पर ला दे और 206 सीटों को घटाकर 44 कर दे? अगर ऐसा हो जाए तो फिर इस देश को कॉरपोरेट अपने अनुसार चलानो लगेंगे और आज मीडिया के अधिकांश हिस्से में उनका धन लगा ही हुआ है। समिति लिखती है कि पार्टी मीडिया को मैनेज करने में सफल नहीं रही। मीडिया को मैनेज कैसे किया जाता है? कांग्रेस के बड़े-बड़े विज्ञापन अखबारों, चैनलों पर आते रहे, सरकार की तथाकथित उपलब्धियों का बखान करने वाले विज्ञापन चलते रहे.......। लेकिन मीडिया किसी सरकार और पार्टी का भोंपू तो नहीं हो सकती। कांग्रेस यह भूल गई कि यही मीडिया 2002 से 2012 तक नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जितनी टिप्पणियां होतंीं थीं करता रहा और वे चुनाव जीतते रहे। हालांकि चुनाव सर्वेक्षणों में उनके समर्थन के आंकड़े आते थे तो मीडिया को उसे प्रकाशित प्रसारित करना था। उनके समाचार उसी रुप में आते थे जैसे आने चाहिए, पर एक सामूहिक स्वर मीडिया का मोदी को खिलाफ होता था जिसके सामने समर्थन वाला स्वर थोड़ा कमजोर हो जाता था। कांग्रेस को यह सोचना चाहिए कि आखिर मीडिया का सामूहिक स्वर कांग्रेस व सरकार के विपरीत कैसे गया?
मीडिया की भूमिका जनता की आवाज को प्रतिबिम्बित करना है। अगर लोग नरेन्द्र मोदी की ओर आकर्षित हैं, लाखों की संख्या में उन्हें सुनने आ रहे हैं, शुल्क देकर भी लाखों की संख्या आ रही है तो फिर मीडिया का स्वर क्या हो सकता था? सच तो यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व और उनके रणनीतिकारों ने इस स्वर को सुनकर अपनी रीति-रणीनीति में बदलाव की कोशिश ही नहीं की। बल्कि मीडिया पर सच बोलने वालों को भाजपा का प्रवक्ता तक कहकर हमला करने लगे। इसके विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया होती थी। एंटनी समिति ने भ्रष्टाचार के आरोपों के संदर्भ में जनता के सामने सही परिप्रेक्ष्य न रख पाने को हार का कारण बताया है और यहां भी मीडिया को कठघरे में खड़ा किया है। उसने 2 जी से लेकर, कोयला घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला आदि की चर्चा की है। मीडिया ने तो वही लिखा, बोला और दिखाया जो खबर आती थी। अगर कैग कह रहा है कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है, सीबीआई की रिपोर्ट इसमें सरकार और संप्रग नेताओं की संलिप्तता बताती है तो हमारे पास चारा क्या है? अगर इतने बड़े-बड़े घोटाले होंगे तो मीडिया उस पर बहस करेगी, उसका सच दिखाएगी। ऐसा नहीं था कि उन बहसों में कांग्रेस के लोग नहीं होते थे लेकिन वे जिस अख्खड़ता से प्रतिहमला करते थे उससे उनका पक्ष कमजोर होता था।
2004 और 2009 में भाजपा ने अपनी पराजय के लिए मीडिया और कॉरपोरेट को दोषी नहीं माना था। यह बात अलग है कि पार्टी ने अपने में बदलाव नहीं किया, अन्यथा हार के कारणों का सही विश्लेषण किया था और उससे उबरने के उपाय भी बताये गए थे। 2004 में बाजाब्ता एक बड़ी रिपोर्ट भाजपा ने भविष्य के कार्य के रुप में प्रकाशित की थी। डॉ. मनमोहन सिंह एवं पी चिदम्बरम हमेशा कॉरपोरेट के दुलारे रहे हैं। अगर रिपोर्ट को स्वीकार कर लें जिसे वास्तव में स्वीकार करना कठिन है तो भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि उनके खिलाफ अगर नाराजगी हुई तो क्यों? इस पर कांग्रेस को विचार करना चाहिए। राहुल गांधी ने बाजाब्ता अपने भाषण में एक कॉरपोरेट का नाम लेकर मोदी के साथ सांठगांठ का आरोप लगाया था। सच कहें तो रिपोर्ट में उसी को स्थान दिया गया है। उस समय कांग्रेस की सरकार थी वे चाहते तो जांच करा सकते थे। साफ है कि एंटनी समिति असली वजहों को या तो समझने से वंचित रह गई या जानबूझकर उन्हें वर्णित करने की हिम्मत नहीं कर पाई। समिति कह रही है कि चुनाव लड़ने के लिए धन की कमी पड़ गई। हालांकि अगर कांग्रेस एवं भाजपा की अंकेक्षण रिपोर्ट देखी जाए तो उसमें कांग्रेस की आय भाजपा से करीब 100 करोड़ रुपया ज्यादा है। जवाब में कांग्रेस कहती है कि भाजपा ने प्रच्छन्न रुप से काफी धन खर्च किया है। तो इसके खिलाफ उनको चुनाव आयोग के पास जाना चाहिए।
इन कुछ कारणों का उल्लेख आरंभ में इसलिए किया गया क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस नेतृत्व की सोच वास्तविकता की जगह दोषारोपण की ओर जा रही है। और जब आप दोषारोपण की ओर बढ़ जाते हैं तो फिर ईमानदार और निष्पक्ष आत्मचिंतन नहीं कर पाते। कांग्रेस की यही त्रासदी है। कांग्रेस नेतृत्व यह समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रही कि पराजय के बाद से कई जगहों से जिस प्रकार की भाषा राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए प्रयोग हो रहे हैं, उनके खिलाफ आवाजें उठ रहीं हैं वे भी कुछ संदेश दे रहे हैं। कहीं से भी मीडिया के खिलाफ, या कॉरपोरेट के खिलाफ आवाज नहीं उठ रही है। एंटनी समिति को अपनी जाचं के दौरान कई राज्यों में व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा। कई जगह राहुल गांधी के खिलाफ नारे लगाए गए, कई जगह राहुल और उनकी टीम को हाईफाई कहकर उसे पराजय के लिए जिम्मेवार बताया गया, सोनिया गांधी को दस जनपथ में घिरा कहा गया, समाचारों में वह सब आया, विरोध की तस्वीरें तक छपीं, पर एंटनी रिपोर्ट में उन सबका जिक्र ही नहीं है। एंटनी ने कहा भी कि पराजय के लिए राहुल गांधी को जिम्मेवार मानना गलत होगा। बेशक, एक व्यक्ति को जिम्मेवार नहीं होना चाहिए।
हालांकि समिति ने कुछ बातंे ठीक कहीं है। मसलन, कई राज्यों में गठबंधन न करना, राज्यों की ईकाइयों में गुटबाजी, बेपरवाह मंत्रियों से निराश पार्टी कार्यकर्ता, उम्म्ीदवारों का गलत चयन, राज्यों की समस्याओं को लेकर समन्वय का अभाव और इसके फलस्वरुप प्रचार का दिशाहीन और प्रभावहीन होना.... आदि। ये सब सच हैं। पर इन सबके लिए आप किसे जिम्मेवार किसे कहेंगे? जो विरोध या विद्रोह हो रहा है वह इन्हीं सब कारणों से था। राहुल गांधी के हाथों पूरे चुनाव की कमान थी और सोनिया गांधी मार्गदर्शक के रुप में थीं। राहुल गांधी ने सारे निर्णय किए या उनके सलाहकारों व टीम के सदस्यों ने......। कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों सहित अन्य राज्यों आदि के प्रभारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। इनके प्रभारियों की नियुक्तियां किसने कीं थीं? अगर राज्यों में प्रभावी नेताओं की कमियां थीं तो क्यों? प्रभावी नेता क्यों कांग्रेस की मुख्यधारा से बाहर चले गए हैं? ये सारे ऐसे प्रश्न हैं जिन पर समिति को गहराई से विचार करके अपनी बात रखनी चाहिए थी लेकिन वह नहीं रख पाई।
सबसे बढ़कर एंटनी ने स्वयं अपने बयान में कहा था कि कांग्र्रेस की संप्रदाय विशेष के प्रति उदार होने की छवि ने काफी नुकसान पहुंचाया। यह रिपोर्ट में भी शामिल है। एंटनी ने कहा कि समाज के एक वर्ग को ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस केवल एक खास समुदाय को ही आगे बढ़ाने का काम करती है। यानी वह मुसलमानों को खुश करने मे लगी रहती है। पार्टी नेता इसके लिए खासकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान को उद्धृत करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। इन नेताओ का मानना है कि यूपीए सरकार की ओर से अल्पसंख्यकों के मसले पर जरूरत से ज्यादा जोर दिये जाने से बहुसंख्यक वर्ग व गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों में नाराजगी बढ़ी। यह सच है लेकिन इसके लिए क्या केवल मनमोहन सिंह को जिम्मेवार ठहराया जा सकता है? सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड की सिफारिशें देख लीजिए। जाहिर है, इस पहलू को उभारकर या सरकार के मंत्रियों की कार्यशैली, अच्छे कार्य का ठीक प्रचार न कर पाना आदि का उल्लेख कर अप्रत्यक्ष रुप से मनमोहन सिंह को हार का खलनायक बनाने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस सच को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है। आज भी आप क्या कर रहे हैं? संसद में सांप्रदायिकता पर मोदी सरकार को बहस के लिए विवश करते हैं और उसका संदेश क्या निकल रहा है? कांग्रेस यह समझ ही नहीं रही है कि इस एकपक्षीय भूमिका से दूसरा वर्ग उसके खिलाफ विद्रोह करके भाजपा के पाले में चला जाता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है, पर हमें तत्काल यह मानकर चलना होगा कि एंटनी समिति की रिपोर्ट एक औपचारिक खानापूर्ति भर थी.....कांग्रेस के नेतृत्व, नीति और रणनीति में संभ्रम से बाहर निकलने की संभावना अभी नहीं दिख रही है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208
मंगलवार, 19 अगस्त 2014
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