गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

ब्यूरोक्रेसी के सामने मुख्यमंत्री या मंत्री इतने मजबूर क्यों?

बसंत कुमार 

वर्ष 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और कल्याण सिंह जी उस सरकार के मुख्यमंत्री बने और शपथ लेने के बाद उन्होंने घोषणा कर दी कि प्रदेश में जो गुंडे माफिया हैं या तो उत्तर प्रदेश की सीमाओं से बाहर चले जाएं या गोलियां खाने को तैयार रहें। उनकी घोषणा का यह असर रहा कि सारे गुंडे माफिया प्रदेश की सीमाओं से बाहर हो गए और उत्तर प्रदेश में तब तक नहीं लौटे जब तक कल्याण सिंह जी प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पर आज उन्हीं की पार्टी की हरियाणा में सरकार है और वहां के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी ने एक आईपीएस अधिकारी के आत्महत्या के मामले में यह कहते हुए अपनी लाचारी व्यक्त की कि हम एक चपरासी तक को सस्पेंड नहीं कर सकते। इससे पूर्व उत्तर प्रदेश में लॉ एंड ऑर्डर के मामले में विरोधी भी कुमारी मायावाती के कार्यकाल बहुत बेहतर मानते थे और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द सहित भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेता भी यह मानते हैं कि मायावती के कार्यकाल में अधिकारी कांपते थे पर अब यह प्रश्न उठने लगा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत में जनता द्वारा चुने गए मंत्री या मुख्यमंत्री ब्यूरोक्रेसी के सामने मजबूर क्यों हैं।

जहां तक संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में होता यह है कि जनता अपने मताधिकार से अपने प्रतिनिधियों सांसदों, विधायकों को चुनती है और ये चुने हुए लोग अपने नेता के रूप में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव करते हैं और ये लोग अपने मंत्रिमंडल के साथ सरकार चलाते हैं। कैबिनेट द्वारा लिए गए फैसलों को नौकरशाही इंप्लिमेंट करतीं हैं। पर उधर कुछ वर्षों से ब्यूरोक्रेसी इतना मजबूत हो चुका है कि मंत्री असहाय महसूस करते हैं। मेरे जानने वाले कई मंत्री यह ऑफ द रिकॉर्ड कई बार कह चुके हैं कि हमारी यह स्थिति कुमारी मायावाती के मंत्रियों से बदतर है। बस फक्र ये है कि मायावती के मंत्री उनके सामने दरियों पर बैठते हैं और हमें कुर्सी मिल जाती है पर नेतृत्व द्वारा चुने गए ब्यूरोक्रेट्स के अलावा हमारी और कुमारी मायावाती के मंत्रियों की हालत एक सी है। 1990 में देश में चन्द्रशेखर जी के नेतृत्व में जनता दल की सरकार थी और औद्योगिक विकास विभाग का प्रभार बिहार के दलित नेता दसई चौधरी को दिया गया पर वे इतने कमजोर मंत्री साबित हुए कि उनके बुलाने पर सचिव तो दूर संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी नहीं आते थे कुछ ऐसी ही स्थिति हरियाणा के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी के हालिया बयान से लगती हैं।

वर्ष 2024 के आम चुनाव के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने विजन मंत्रालय एमएसएमई का मंत्री अपने वरिष्ठतम मंत्री जीतन राम मांझी को बनाया। वे सदियों से उपेक्षित तिरस्कृत मुसहर समाज से हैं और स्वतंत्र भारत के इतिहास में मुसहर समाज से इकलौते मंत्री हैं। उनको इस विभाग का मंत्री बनाने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का एक ही उद्देश्य था कि मांझी जी मुसहर समाज को उद्यमिता के माध्यम से उनको समाज की मुख्यधारा में जोड़ सकेंगे। अनपढ़ मुसहर समाज को जागरूक करने के लिए मांझी जी की सहमति से मुसहर समाज का इतिहास नामक पुस्तक लिखी गई और उसका लोकार्पण दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 24-9-2025 को सायं 5 बजे से रखा गया जिसमें मांझी जी मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम की सूचना एमएसएमई के उपक्रम एनएसआईसी के सीएमडी श्री संभ्रांत शेखर आचार्य को दे दी गई और उनसे इस कार्यक्रम के लिए सीएसआर फंड से आर्थिक मदद के लिए भी अनुरोध किया गया पर श्री शेखर ने आर्थिक मदद तो दूर कार्यक्रम को असफल बनाने के उद्देश्य से ठीक उसी समय एक उड़ीसा के प्रो सत्पथी का कार्यक्रम जिसका शीर्षक था एमएसएमई सेक्टर में गुरु द्रोणाचार्य रख दिया। इसके लिए 23-9-2025 को शाम को सर्कुलर जारी कर दिया कि एनएसआईसी का कोई भी कर्मचारी इस कार्यक्रम को छोड़कर कही नहीं जाएगा जिसका परिणाम यह हुआ कि अपने ही विभाग के मंत्री के उसी के समाज के कार्यक्रम में एनएसआईसी का कोई कर्मचारी नहीं जा सका।  इन लोगों के इसी एटीट्यूड के कारण मांझी जी जैसा वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री गरीबों और उपेक्षितों के उठान के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं इसकी ब्यूरोक्रेसी के सामने मंत्री की बेबसी न कहे तो और क्या कहें?

जबकि एनडीए-2 के कार्यकाल में जब नारायण राणे देश के एमएसएमई मंत्री थे तो उसी एनएसआईसी में मंत्री के लोकसभा क्षेत्र में एससी/एसटी हब का पैसा जॉब मेले तथा अन्य कार्यक्रमों को मंत्री को खुश करने के लिए डायवर्ट किया गया जब कि एक आदिम जनजाति जो सदियों से उपेक्षित और शोषित हैं उसको विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के आयोजन के लिए सहभागिता तो दूर उसमें रोड़े अटकाए गए उससे पहले वर्ष 2014 में तत्कालीन एम एस एम ई मंत्री कलराज मिश्र के जीवन पर आधारित पुस्तक राष्ट्रवादी कर्मयोगी के लोकार्पण में मंत्रालय के काफी लोग वहां पहुंचे अपितु वह पुस्तक खादी ग्रामोद्योग के विक्रय केंद्रों और एनएसआईसी के पुस्तकालयों में पढ़ने के लिए रखी गई फिर शादियों से उपेक्षित तिरस्कृत मुसहर समाज के साथ इतनी उपेक्षा क्यों?

आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार की आत्महत्या के मामले में पुलिस और प्रशासन की लापरवाही से स्थिति खराब हो गई है। मौत के सात दिन बीत जाने के बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ है और परिवार के लोगों को समझाने के लिए केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले का भेजा गया। वे विद्वान और बड़े शरीफ इंसान हैं पर एक सदस्य वाले रिपब्लिकन पार्टी के नेता के रूप में उनकी हैसियत नहीं है कि वे इस मामले में लीपापोती करने वाले अधिकारियों के विरूद्ध कुछ कह सकें या उनकी शिकायत केंद्र सरकार से कर सकें। श्री अठावले पूरन कुमार कि आईएएस पत्नी समेत परिवार के अन्य सदस्यों से मिले फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी से मिले और फिर दुबारा मृतक की पत्नी अमनीत कौर से बात की। उसके बाद भी कोई हल नहीं निकला और मौत के सात दिन बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया है और प्रधानमंत्री की 17 अक्टूबर को रोहतक में होने वाली रैली स्थगित कर दी गई है।

बढ़ते दबाव के बाद चंडीगढ़ पुलिस ने इस मामले में उन सभी अधिकारियों के बारे में जानकारी मांगे हैं जिनके नाम आत्महत्या से पहले पूरन कुमार द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट में लिखे गए हैं या एफआईआर में आए हैं। सरकार द्वारा गठित एसआईटी इन सबसे पूछताछ की तैयारी में है। वहीं जांच दल रोहतक के एक पुलिस अधिकारी के घर से सबूत इकठ्ठा कर रहा है। कैसी विडंबना है कि आत्महत्या के सात दिन बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया है। मृतक की पत्नी जो खुद भी एक आईएएस अधिकारी हैं ने पोस्टमॉर्टम से पहले सुसाइड नोट में दर्ज आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है। सुसाइड नोट में हरियाणा के पुलिस महानिदेशक व रोहतक के एसपी सहित 15 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ गंभीर आरोपी लगे हैं। मृतक की पत्नी के दबाव में पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली है पर आरोपियों का नाम वाले कॉलम को खाली छोड़ दिया गया है।

अगर हरियाणा सरकार मामले की गंभीरता को समझते हुए सुसाइड नोट में लिखे गए 15 अधिकारियों को तुरंत निलम्बित कर देती और मामले की निष्पक्ष जांच कराकर समय से निपटा लेती तो यह मामला इतना बड़ा राजनैतिक विवाद का मुद्दा न बनता। वहीं हरियाणा सरकार को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के शासन के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में होने वाली 17 अक्टूबर को प्रधानमंत्री की रैली को स्थगित न करना पड़ता और मुख्यमंत्री को अपनी मजबूरी बताते हुए यह न करना पड़ता कि मैं तो एक चपरासी को भी निलम्बित नहीं कर सकता तो अधिकारी को कैसे निलम्बित कर सकता हूं अर्थात मुख्यमंत्री जी ब्यूरोक्रेसी के सामने मजबूर है। आखिरकार इतनी फजीहत के बाद पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत कपूर को छुट्टी पर भेजा गया। यदि यही काम समय से पहले कर दिया गया होता इतनी समस्या न होती। अब समस्या यह है कि बेलगाम होती हुई ब्यूरोक्रेसी पर लगाम कैसे लगाए जाए।

बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

इस दीपावली श्री की आंतरिक गरिमा का अभ्युदय करें

उमेश कुमार साहू

प्रतिवर्ष दीपावली पर भारत माता एक नए प्रकाश पुंज के अवतरण की प्रतीक्षा करती है। ऐसा प्रकाश पुंज जो उसकी सौ करोड़ से अधिक संतानों के घर-आंगन के साथ उनके मन-आंगन में उजियारा फैला सके। हजारों साल से चले आ रहे ज्योति पर्व पर देश की दीवारें तो जगमगा जाती हैं, पर माटी के सभी पुतलों (आज के इंसान) को माटी के ये दीप अभी तक पूरी तरह से आलोकित नहीं कर पाए। असत्य पर सत्य की विजय के अभिनंदन और समृद्घि की कामना के पर्व दीपावली पर अपसंस्कृति के बढ़ते हुए आक्रमण ने सामाजिक विवेक के माथे पर चिंता की रेखाएं उकेर दी हैं। दीपावली के आगमन से कई दिन पूर्व लोग घरों की साफ-सफाई में लग जाते हैं। खील-बताशे, दीये, रूई, फुलझडिय़ां-पटाखे आदि खरीदने में व्यस्त हो जाते हैं। लक्ष्मी पूजा के लिए लक्ष्मी-गणेश की तस्वीरें या मूर्तियां खरीदी जाती हैं, लेकिन ऐसे घर अब कम रह गए हैं, जहां दीपावली की पूजा पर उचित विधि-विधान अपनाया जाता हो, जो दीपावली के वास्तविक कर्म को जानते हों। देवी-देवताओं की आराधना करने की इच्छा लोगों को शायद इसलिए होती है कि वह इन देवी-देवताओं से मनोवांछित फल पाने की कामना करते हैं, पर आधुनिक समय में बिखरते जीवन मूल्यों और नए सांस्कृतिक व भौतिक प्रलोभनों के कारण लोग इन देवी-देवताओं की आराधना तक भूल गए हें।

ऐसे में त्यौहार मनाना सिर्फ देखा-देखी और रूढ़ि के अलावा कुछ भी नहीं। आज देश में समृद्घि जिस कदर बढ़ती जा रही है, उसी के अनुपात मेें यह त्यौहार उतना ही रंग-बिरंगा और शोर-शराबे भरा तथा भोंडा व अश्लील भी बनता जा रहा है। बेशुमार खरीददारी, नये-नये डिजायनों के कटे-फटे कपड़े, भव्यतम पार्टियां और जबरदस्त चकाचौंध को देखकर दीपक आज आंसू बहाकर रह जाता है।

दीपावली, जो देश का सबसे बड़ा त्यौहार है आज सबसे बड़ी रूढ़ि बन चुकी है। रूढिय़ां स्मृतियों को जीवित रखती है, लेकिन दीपावली राष्ट्रीय स्मृति-लोप का सबसे बड़ा उदाहरण है। हम दीए जलाते है और अंधेरा बढ़ता जाता है। पिछले वर्षों में उपभोक्तावाद ने ऐसी अपसंस्कृति फैलायी है, जो सांस्कृतिक घटनाओं और वस्तुओं के सहज आनंद और उसके सामाजिक अर्थों को नष्ट कर उन्हें व्यावसायिक हितों के लिए सतही तौर पर इस्तेमाल में ला रही है। अब दीपावली का पूंजीकरण हो गया है। अब इस पर्व को भी उद्योग के रूप में देखा जाने लगा है। आतिशबाजी-पटाखे, रोशनी और प्रकाश उद्योगों की वजह से यह त्यौहार ध्वनि व पर्यावरण प्रदूषण तथा जान-माल की हानि का प्रमुख कारण बन गया है। महंगे पटाखों में जितना पैसा खर्च किया जाता है, उससे न जाने कितने ही भूखों का पेट भरा जा सकता है, कितने ही नंगे तन को ढंका जा सकता है। अब ज्योतिपर्व सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गया है। परंपरागत प्रवाह की लीक में बहते असंख्य दीप अवश्य जलते हैं, किंतु इनकी ज्योति अंतर्मन को प्रकाशित नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप आंतरिक अंधकार गहराता जाता है और हमारी कुंठित आशाएं मानसिक विकृति की दशा में बहती जा रही है। आधुनिकता और भौतिकवाद के दौर में नैतिकता, मर्यादा एवं मूल्यों का पथ अंधकार में विलीन होता जा रहा है। इससे उपजी कुंठा व्यक्तिगत जीवन में अर्द्धविक्षिप्त मनोदशा, पारिवारिक जीवन में बिखराव के साथ चारों ओर अराजकता, आतंक एवं अशांति के रूप मेें परिलक्षित हो रही है। जीवन की अंधेरी राहों से गुजरते हुए आम लोगों को दीपोत्सव कितना आलोकित कर सकता है, यह बड़ा ही कंटीला और रहस्यमय प्रश्न है।

अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार एवं भ्रष्टाचार हर रोज, हर कहीं प्राय: सभी को चुनौती देते घूम रहे हैं। उनकी नाक में नकेल डालने का साहस किसी में नहीं हैं। वर्तमान परिस्थितियां सचमुच जटिल हैं। किन्तु हमें जरूरत है बस थोड़ी सी समझदारी और ढेर सारे आत्मविश्वास की।

ज्योति पर्व तभी हमारे मन में और जीवन में कोटि-कोटि दीपों का प्रकाश स्थापित करने में समर्थ होगा, जब हम अपने अंदर के अंधकार को साफ कर उसे अकलुष बनाएं। साथ ही यह समझें कि शील से प्राप्त लक्ष्मी ही देवभूमि भारत और यहां की संस्कृति को अभीष्ट है, अत्याचारों से बनी सोने की लंका नहीं। दीपावली एकता, प्रेम और सद्भावना का पर्व है। आइए हम सभी एक-एक दीप प्रज्वलित करें ताकि उत्सव में प्रेम और उत्साह का समन्वय हो, श्री के साथ आंतरिक गरिमा का अभ्युदय हो। (विभूति फीचर्स)

फिर उड़ी महिला आरक्षण की धज्जियां

अंजनी सक्सेना

हमारे देश में महिला आरक्षण के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। आरक्षण के बाद चुनाव जीतकर आयी महिलाओं की संख्या बताकर महिला सशक्तिकरण को जमकर उछाला जाता है लेकिन असलियत में इस आरक्षण की जमकर धज्जियां बिखेरी जाती हैं। इस बार यह कारनामा हुआ है विदिशा नगर पालिका में। विदिशा नगरपालिका में इस बार का अध्यक्ष पद महिलाओं के लिए आरक्षित है लेकिन यहां की राजनीति ही कुछ ऐसी है जहाँ महिलाओं को राजनीति करने ही नहीं दी जाती है।

विदिशा वह नगर है जहाँ आजादी के समय से ही महिलाएं शिक्षित रही है। यहां की महिलाएं मतदान में भी बढ़चढ़कर हिस्सा लेती हैं। पचास और साठ के दशक में भी यहाँ अनेक महिलाएं अध्ययन और अध्यापन कार्य में संलग्न थी। यहाँ की महिलाएं आज भी डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, बैंकर, लेखक, पत्रकार सब कुछ बन रही है लेकिन यहां राजनीति में वे मात्र कठपुतली ही प्रतीत होती हैं क्योंकि जब उन्हें अधिकार देने की बात आती है तो उन्हें इतना मजबूर, लाचार और बेबस कर दिया जाता है कि वे राजनीति छोडऩे को ही विवश हो जाती हैं।

ताजातरीन मामला यहां की नगरपालिका अध्यक्ष प्रीति शर्मा का है, जिन्होंने अपना स्वास्थ्य ठीक न होने की बात कहकर अपने अध्यक्षीय प्रभार नपा के वर्तमान उपाध्यक्ष संजय दिवाकीर्ति को सौंप दिए हैं। वैसे न तो प्रीति शर्मा (वस्तुत: इनका नाम आपको हर जगह प्रीति राकेश शर्मा ही लिखा दिखाई देगा फिर चाहे वह नपा अध्यक्ष के कक्ष के बाहर लगी नाम पट्टिका हो या नगर पालिका भवन के ऊपर लगा बड़ा सा नाम पट्ट) ने अपनी बीमारी बताई है न ही उन्होंने यह बताया है कि उन्होंने अपना प्रभार कब तक के लिए उपाध्यक्ष को सौपा है।

वैसे विदिशा की राजनीति में महिला नपाध्यक्ष द्वारा अपना प्रभार उपाध्यक्ष को सौंपने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले विदिशा नगर पालिका की महिला पहली महिला अध्यक्ष सरोज जैन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। स्नेही, मृदुभाषी, व्यवहारकुशल और पारंगत वकील के रूप में प्रतिष्ठित सरोज जैन भी यहां राजनीति नहीं कर पायी और अंतोत्गत्वा उन्होंने भी अपने सारे प्रभार उपाध्यक्ष बसंत कुमार जैन को सौंप दिए और बाद में राजनीति से सन्यास ले लिया।

विदिशा नगरपालिका में प्रदेश के वित्तमंत्री रहे राघवजी भाई की पुत्री ज्योति शाह भी अध्यक्ष रहीं। उनके पिता कुशल राजनीतिज्ञ थे तो यहां किसी दूसरे को राजनीति करने का अवसर नहीं मिला और उन्होंने अपना कार्यकाल अपने पिता की छत्रछाया में पूरा तो किया। लेकिन राघव जी भाई के पद से हटते ही ज्योति शाह भी विदिशा के राजनीतिक परिदृश्य से लगभग बाहर हो गयी। वैसे तो विदिशा की सांसद भाजपा की तेजतर्रार नेता सुषमा स्वराज भी रहीं लेकिन उनके कार्यकाल में भी यहां महिला आरक्षण के नाम पर मात्र खानापूर्ति ही होती रही। नगर निगम नगर पालिका, नगर पंचायत और ग्राम पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से निसंदेह निरंतर प्रयास हो रहे हैं लेकिन सरकार के इन प्रयासों की राजनेताओं द्वारा जमकर धज्जियां बिखेरी जा रही हैं। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ये नेता अपने घर की महिलाओं को महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों से चुनाव लड़वा देते हैं फिर चुनाव के बाद ये महिलाएं कठपुतली बन जाती हैं। ऐसी ही कठपुतली के रुप में सुशीला मोहर सिंह भी विदिशा की विधायक रह चुकी हैं। पहले कठपुतली सरकार चलाने वाले ऐसे नेता शासकीय कार्यक्रमों में तक निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह खुद ही पहुंच जाते थे फिर नियमों में संशोधन के बाद जब इन लोगों पर थोड़ा बहुत अंकुश लगा तो अब नगरपालिका में अध्यक्ष प्रतिनिधि और पार्षद प्रतिनिधि जैसे पदों का सृजन करवाया गया और और ये स्वयं अध्यक्ष या पार्षद के बगल में बैठकर निर्देश देते या हस्ताक्षर कराते दिखाई देते हैं। यह भी बड़ा ही हास्यास्पद लगता है कि एक नगरपालिका पार्षद, जिसके वार्ड की सीमा मात्र एक या दो किलोमीटर की परिधि में होती है उसे ही अपने लिए एक पार्षद प्रतिनिधि रखना पड़ता है।

कुल मिलाकर यहां बात किसी महिला की अक्षमता की नहीं है यहां बात सिर्फ पुरुषों के रुतबे और राजनीतिक वर्चस्व की है, अन्यथा जब कोई महिला आपरेशन सिंदूर की कमान संभाल सकती है, राष्ट्रपति के रुप में सारे देश का दुनियाभर के सामने प्रतिनिधित्व कर सकती है,तो क्या एक शहर की नगरपालिका को नहीं चला सकती । यदि एक महिला देश के वित्तमंत्री के रूप में देश की अर्थव्यवस्था संभाल सकती तो क्या नगरपालिका के वित्तीय मामले नहीं सम्हाल सकती?

यहां चर्चा का विषय यह नहीं है कि विदिशा की नगरपालिका की राजनीति में क्या हुआ,क्यों हुआ, कैसे हुआ,कौन चुप है, कौन मुखर है या किसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर महिला नगरपालिका अध्यक्ष के अधिकारों को कुर्बान किया गया। यहां विचारणीय यह है कि महिला आरक्षण के नाम पर एक महिला को आगे करके फिर राजनीति की बलि वेदी पर कुर्बान कर दिया गया।

राजनीति में महिलाओं को कब तक कुर्बानी देनी पड़ेगी? क्या आज भी महिलाएं इतनी कमजोर हैं कि वे हर बार राजनीतिक बिसात पर स्वयं को न्यौछावर करती रहेगी? नियमों को तोड़मरोड़ कर महिला आरक्षण की धज्जियां उड़ाने से बेहतर तो यही होता कि यहाँ से महिला आरक्षण ही समाप्त कर दिया जाता ताकि राजनेता संपूर्ण स्वच्छंदता से अपनी राजनीति कर सकें और यहां की महिलाएं राजनीति से दूर रहकर दूसरे क्षेत्रों में अपने दम खम का परचम लहराएं। (विभूति फीचर्स)

तमसो माँ ज्योतिर्गमय का संदेश देता दीपावली का पर्व

सुषमा जैन

उल्लास एवं समृद्धि का प्रतीक तथा भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सर्वोपरि पर्व दीपावली का कारवां वैदिक युग की ज्ञान ज्योति से चलकर, ऐतिहासिक अंधकारों को चीरता तथा मुगलकाल की संकरी गलियों से गुजरता हुआ आजादी के खुले आंगन और घरों में प्रवेश कर चुका है। चाहे गांव-देहात हो या शहर, महानगर, गली-मोहल्ला हो या फिर बहुमंजिला अपार्टमेंट, क्या बूढ़े और बच्चे सभी के चेहरे पर कार्तिक का महीना एक अलग प्रकार की खुशियों से लबालब चमक लेकर आता है। सभी के तन-मन खिलखिला उठते हैं। कन्या कुमारी से लेकर कश्मीर तक, बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक नवरात्रि से शुरू हुआ यह हर्षोल्लास दीपावली तक अपने चरम पर होता है। यद्यपि युग-युगांतर से जलते आ रहे दीपक और दीपावली के स्वरूप में पौराणिक काल से लेकर अब तक भिन्न-भिन्न काल परिवेश और परिस्थिति के अनुसार अनेकानेक परिवर्तन आये हैं। फिर भी आज किस प्रकार यह पर्व अपव्यय और दुर्घटनाओं के पर्व के रूप में जाना जाने लगा है, वैसी स्थिति पहले कभी नहीं रही। आज से लगभग 40-50 वर्ष पूर्व दीपावली की रौनक देखते ही बनती थी। भारी धन के अपव्यय के साथ धूमधड़ाकों की दीपावली मनाते नहीं देखा जाता था। प्रसन्नता व्यक्त करने का एक निराला ही तरीका होता था।

चारों ओर झिलमिलाते दीपों की एक के बाद एक अनंत पंक्तियां, मुस्कराते नन्हें बालक, घर-आंगन को लीपती-पोतती रंग बिरंगे परिधानों में सजी कुलवधुएं, अपनी शोखियों और चंचलताओं से नवजीवन उड़ेलती तथा घर के कोने-कोने को दीपों की रोशनी से प्रकाशित करती नव बालाएं, यौवन की देहरी का स्पर्श करती हुई कंदीलों और रंगोली की प्रतिस्पर्धा में लगी यौवनाएं, अपनी आंखों में अनगिनत सपने संजोये और अनजानी उत्सुकताओं को मन में समेटे मस्ती का आलम संजोये नवयुवक तथा अपने वर्तमान को भूलकर अतीत के साथ हास्य-विलास की स्मृतियों को सजाते हुये कभी बेटे के साथ हंसकर तो कभी पौत्र के साथ खेलकर दीपोत्सव मनाते वृद्ध। आबाल वृद्ध, नर-नारी सभी प्रसन्नता पूर्वक सामूहिक रूप से इस पर्व का आनंद लेते थे।

दीपावली पूजन का मूल उद्देश्य यही रहा है कि चारों ओर सुख-समृद्धि, खुशहाली समरसता और ज्ञान का प्रकाश फैले। इसके लिये यह कामना की जाती थी कि मानव समाज के लिये बड़े नहीं भले लोगों की जरूरत है। इसलिये धन की देवी मेहरबान हो और वे अधिक से अधिक धर्म-कर्म कर सकें। पर आज स्थिति बिल्कुल उलट गई है। लोग केवल अपनी स्वार्थपूर्ति तक ही सिमट कर रह गये हैं। अधिक से अधिक धन प्राप्त कर दुनिया भर की सुखसुविधाएं जुटाना ही एक मात्र लक्ष्य बन गया है। जिससे समाज में गैरबराबरी की खाई बढ़ती जा रही है। कहीं खुशियों के अनगिनत दीप जलते है, तो अधिकतर जगहों पर गम और अभावों का अंधेरा पसरा हुआ है। उसी देश के लोग कुछ समय से मनोरंजन तथा बढ़-चढ़कर अपनी हैसियत दिखाने के लिये करोड़ों रुपयों के पटाखे फूंक डालते हैं। जिससे न केवल असंख्य लोग वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से पीडित हो जाते हैं, बल्कि उनका दूषित हवा में सांस तक लेना मुश्किल हो जाता है। ऊपरी दिखावे को सामाजिक प्रतिष्ठा मान लिये जाने के कारण ही मिट्टी के दीयों का स्थान भारी मात्रा में बिजली की झालरों ने ले लिया है। खील बताशों के स्थान पर महंगे-महंगे तोहफे दिये जाने लगे हैं। पड़ोसियों की होड़ में लोग टिड्डी दल की तरह बाजार पर टूटकर अनावश्यक वस्तुएं भी खरीद डालते हैं। जिससे गृह बजट को संतुलित करने में कई माह लग जाते हैं। यह सारा उपक्रम व्यक्ति की औकात का घटिया प्रदर्शन मात्र है। जुएं को तो जैसे सामाजिक स्वीकृति मिल गई है। क्योंकि उसके खिलाफ आवाज उठाने वाला मध्यम वर्ग आज स्वयं अपनी दमित इच्छाओं और कुंठाओं को सहलाने लगा है। यह वह मध्यमवर्ग है जो अपने से समृद्ध को ललचायी नजरों से देखता है और अपने से पीछे वालों को तिरस्कार से। कभी सामाजिक परिवर्तन का औजार बना यह वर्ग आज आत्मकेंद्रित बनता जा रहा है।

प्रत्येक वर्ष दीपोत्सव पर हम माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं कि वे अपनी कृपा हमें दें। परंतु सब व्यर्थ चला जाता है। देवी प्रसन्न नहीं होती, बल्कि कुपित होती है। आखिर कुपित क्यों न हो? कहीं लक्ष्मी स्वरूप कुलवधू को दहेज की बलिदेवी पर कुर्बान किया जा रहा है तो कहीं उसे जन्म लेने से पूर्व ही मौत के घाट उतारा जा रहा है। देखा जाय तो देवी आज भी पूरी तरह क्रुद्ध ही है। कहीं दरिद्रता का तांडव नृत्य हो रहा है तो कहीं बाहुबलियों और धनपशुओं के हाथ पांव फैलते जा रहे हैं। करूणा के लिये कोई स्थान नहीं बचा है। अंधकार प्रकाश को निगल रहा है, रात दिन को डस रही है, कोई भूख से मर रहा है, तो कोई प्यास से तड़प रहा है। कहीं बाढ़ से लोग बेघर हो रहे हैं तो कहीं भूकंप से छाती दहल रही है तथा कहीं आतंकवाद का जिन्न निर्दोषों और मासूमों को ग्रास बनाता जा रहा है। ऐसे में हमारे राष्ट्र की शान और प्राण संस्कृति के गौरव को किस प्रकार बरकरार रखा जा सकेगा? यह चिंता और चिंतन का विषय है। जीवन में उजाले की इच्छा हर कोई रखता है। पर इस उजाले की सार्थकता तभी है जब इसकी रौनक मन के अंदर और बाहर समान रूप से हो। जबकि हो यह रहा है कि बाहर दीप आदि जलाकर उजाला तो कर दिया जाता है, लेकिन हमारी आत्मा काजल की कोठरी और मन मलिन ही बना रह जाता है। जब अंतर में छल, कपट, राग, द्वेष, ईर्ष्या, आडंबर और वैचारिक कलुषता भरी हो, ऐसे में क्या बाह्य दीपों का जलाना मात्र ही दीपावली को सार्थक बना पायेगा? प्रत्येक धर्म ने यही संदेश दिया है कि हम धन का सदुपयोग करें। उन लोगों को भी अपनी खुशी में भागीदार बनायें जो अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं। इसलिये जकात या दान की नीवें रखी गई। वास्तविकता तो यह है कि हमने लक्ष्मी के विराट स्वरूप को अपने अंतर्मन में बसाया ही नहीं। जिस लक्ष्मी को हम सर्वोपरि मान बैठे हैं वह तो तृष्णा या लोभ है और जब मन में तृष्णा जन्म ले लेती है तो मन का अशांत होना आवश्यक हो जाता है।

वर्तमान का भवन निर्माण अतीत की नींव पर ही किया जाता है। प्रत्येक राष्ट्र एवं जाति अपने बीते युग की स्मृतियां सुरक्षित रखने का प्रयास करती हैं। दीपावली मनाते हुये हम सिर्फ हम नहीं रह जाते, बल्कि अपने को एक पूरे इतिहास के साथ जोड़ते हैं। एक स्मृति-परंपरा को पुनर्जीवित करने की कोशिश करते हैं। आज से लगभग 2600 वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण चर्तुदशी की रात्रि में पावापुर नगरी में भगवान महावीर का निर्वाण हुआ। निर्वाण की खबर सुनते ही सुर, असुर, मनुष्य, गंधर्व आदि बड़ी संख्या में वहां एकत्र हुये। रात्रि अंधेरी थी, अत: देवों ने रत्नों के दीपकों का प्रकाश कर निर्वाण उत्सव मनाया और उसी दिन कार्तिक अमावस्या के प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उनके प्रधान शिष्य इंद्रभूति गौतम को ज्ञान लक्ष्मी की प्राप्ति हुई। तभी से प्रतिवर्ष उक्त तिथि को दीपावली का आयोजन होने लगा। यही नहीं भगवान राम के अयोध्या आगमन पर स्वागत हेतु सजाई गई दीपमाला को भी दीपावली की परंपरा से जोड़ा गया। इस प्रकार यह महापर्व भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रीय वातावरण में पूरी तरह पगकर प्रेरणास्त्रोत प्रमाणित हुआ है।

दुर्भाग्य से आज हमारे देश की छाती पर बहुत बड़ी तादाद में ऐसे लोग जमते जा रहे हैं जो तन से तो भारतीय है, परंतु मन से पूरे विदेशी, जिनके लिये राष्ट्रीयता और भारतीयता अक्षरों के संयोग के सिवा और कुछ भी नहीं है, जो न अपने पूर्वजों के प्रति कोई सम्मान रखते हैं और न अपने धर्म और उत्सव के प्रति। इसका परिणाम हम सभी को भुगतना पड़ रहा है। यही कारण है हम सभी के अंतर में गहरा अंधकार भरा पड़ा है। हम उसे शत्रु मानकर भयभीत हो रहे हैं और उससे डरकर बाहर के प्रकाश की ओर भाग रहे हैं। यह बाह्य भौतिक प्रकाश उस प्रकाश तक कभी नहीं ले जा पायेगा जिस प्रकाश का अर्थ ''तमसो मा ज्योर्तिगमय" वाक्य में छिपा है।

दीपावली सांस्कृतिक चेतना का मापदंड भी है और राष्ट्रीय एकता की साक्षी भी। गणेश बुद्धि के देवता हैं और लक्ष्मी संपदा की देवी। संपत्तिवान की अपेक्षा बुद्धिमान होना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि धन का उपार्जन न्याय नीति के आधार पर हो और उसका उपयोग करने में भी विवेकशीलता से काम लिया जाये तभी वास्तविक सुख और समृद्धि आती है। दीपावली मूल रूप से सहृदयता, आपसी भाईचारे और मिठाई के रूप में आपस में मिठास पैदा करने का पर्व है। दरिद्रता के अंधकार में जीने वाले लोगों के घरों में, दिलों में हम प्रकाश की एक किरण भी जला पायें तो समझो कि हमने दीपोत्सव का उद्देश्य सार्थक कर लिया। ठीक ही तो है कि अंधेरे को क्यों धिक्कारें, अच्छा है कि एक दीप जला लें। (विनायक फीचर्स)

राहुल पांडेय बने एनसीपी (एसपी) से शकरपुर वार्ड-202 के अध्यक्ष

संवाददाता

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (पक्ष शरदचंद्र पंवार) ने आज दिल्ली संगठन में एक महत्वपूर्ण नियुक्ति की घोषणा की है। पार्टी के प्रदेश संयोजक इंजीनियर डी. सी. कपिल ने जानकारी देते हुए बताया कि श्री राहुल पांडेय को वार्ड संख्या-202, करपुर का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

यह नियुक्ति आज दिनांक 15 अक्टूबर 2025 से तत्काल प्रभाव से लागू मानी जाएगी। श्री कपिल ने श्री राहुल पांडेय को नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उनकी सक्रियता, संगठन के प्रति समर्पण और क्षेत्र में जनसेवा के अनुभव को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।

प्रदेश संयोजक ने विश्वास व्यक्त किया कि श्री राहुल पांडेय अपने नेतृत्व में संगठन को और मजबूत करेंगे तथा स्थानीय स्तर पर पार्टी की नीतियों और विचारधारा को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाएंगे।

नई जिम्मेदारी मिलने पर श्री राहुल पांडेय ने पार्टी नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से जनता की सेवा और संगठन के विकास में योगदान देंगे।










 

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