बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

इंडिया गठबंधन में दरार के लिए कौन है जिम्मेदार?

संतोष कुमार पाठक

2024 के लोकसभा चुनाव में सहयोगी दलों की मदद से कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लड़ने के लिए राहुल गांधी ने उस यूपीए के नाम को भी त्याग दिया जिसके बैनर तले कांग्रेस ने वर्ष 2004 से 2014 तक देश में राज किया था। लोकसभा चुनाव से पहले यूपीए की जगह पर राहुल गांधी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर एक नया मोर्चा बनाया जिसे इंडिया गठबंधन का नाम दिया गया।

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद सहयोगी दलों के समर्थन के बल पर नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार विपक्षी गठबंधन को इतनी ज्यादा सीटें दिलाने का श्रेय लेकर कांग्रेस ने राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित करने का प्रयास किया। कुछ हद तक कांग्रेस को अपने इस अभियान में कामयाबी मिलती भी दिखाई दी। वोट चोरी का अभियान चला कर और बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाल कर राहुल गांधी अपने आपको विपक्षी इंडिया गठबंधन के नेता के तौर पर स्थापित करने में थोड़े बहुत कामयाब होते भी दिखाई दिए।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा मुखिया अखिलेश यादव से लेकर तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री एवं डीएमके सुप्रीमो स्टालिन तक से उनके व्यक्तिगत संबंध मजबूत होते नजर आए। जम्मू कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव जीतने में राहुल गांधी और नेशनल कांफ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला की व्यक्तिगत केमिस्ट्री का जबरदस्त योगदान माना जाता है। बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने तो खुलकर राहुल गांधी को इंडिया गठबंधन की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार तक बता दिया।

लेकिन इन सबके बावजूद अचानक देश की राजनीति तेजी से बदलती हुई नजर आने लगी है। जम्मू कश्मीर में राज्यसभा सीट और विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस आमने-सामने आ गए है। जम्मू कश्मीर से राज्यसभा सांसदों के लिए होने वाले चुनाव में उमर अब्दुल्ला की पार्टी ने तीनों सेफ सीट पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं और कांग्रेस को जो चौथी सीट ऑफर की है,उसे जीतना बहुत मुश्किल है। कांग्रेस पहले से ही इसे लेकर अपने सहयोगी दल से नाराज चल रही है वहीं अब विधानसभा की जिन 2 सीटों पर उपचुनाव होना है,उसे लेकर भी मामला फंसता हुआ ही नजर आ रहा है। राज्य में विधानसभा की 2 सीटों - बडगाम और नगरोटा में 11 नवंबर को चुनाव होना है। जम्मू कश्मीर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष तारिक हामिद कर्रा ने उमर अब्दुल्ला की पार्टी पर गठबंधन के सिद्धांतों का अनादर करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि वह राज्यसभा की एक सेफ सीट देने के अपने वादे से मुकर गई। कांग्रेस ने गठबंधन धर्म की याद दिलाते हुए सख्त शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि या तो नेशनल कांफ्रेंस उन्हें विधानसभा की एक सीट दे या फिर कांग्रेस दोनों ही सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार देगी।

महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव के समय से ही शुरू हुई खटास कम होने का नाम नहीं ले रही है। जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद मोदी सरकार द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर और दुनिया भर में भेजे गए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को लेकर एनसीपी और कांग्रेस के सुर अलग-अलग तो नजर आए ही। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद इस्तीफे की बाध्यता वाले बिल पर गठित की जाने वाली जेपीसी में शामिल नहीं होने को लेकर भी कांग्रेस इंडिया गठबंधन में शामिल सहयोगी दलों को अपने साथ ला पाने में नाकामयाब होती नजर आ रही है।

वहीं बिहार का मामला तो राहुल गांधी के नेतृत्व की स्वीकार्यता को लेकर सबसे बड़ा झटका साबित होता हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ आरजेडी है जिसके नेता तेजस्वी यादव ने खुल कर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का समर्थन कर दिया है तो वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी है जो लगातार पूछे जाने के बावजूद भी तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं कर रहे हैं। जबकि राजनीतिक सच्चाई तो यही है कि बिहार में विपक्षी गठबंधन में आरजेडी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। कांग्रेस और आरजेडी में सीटों के बंटवारे को लेकर भी घमासान मचा हुआ है। सहयोगी दलों के साथ कांग्रेस की यह खींचतान और महत्वपूर्ण मौकों पर राहुल गांधी की गैरमौजूदगी उनके नेतृत्व पर ही सवालिया निशान लगाती नजर आती है। पता नहीं राहुल गांधी इस तथ्य को समझ पा रहे हैं या नहीं और इससे भी बड़ा सवाल यह कि आखिर राहुल गांधी को इस तरह की सलाह कौन देता है कि उन्हें दिल्ली में होने के बावजूद तेजस्वी यादव से मुलाकात नहीं करनी चाहिए। केसी वेणुगोपाल और तेजस्वी यादव की जगह पर अगर राहुल सीधे तेजस्वी के साथ बैठकर बात करते तो शायद मामला इतना उलझता नहीं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

रसो वै स:, अर्धसत्य को पूर्ण समझने की अभिलाषा

शिव शंकर द्विवेदी

पूर्णसत्य के सम्बन्ध में किसी की अभिलाषा हो सकती है कि वह माधुर्य को परमसत्ता के साथ जोड़ कर समझे और परमसत्ता को रसो वै स: के रूप में स्वीकार करे,किन्तु ऐसी परिभाषा अथवा स: अर्थात् पूर्ण सत्ता के विषय में इस प्रकार का बोध निश्चित रूप से अर्धसत्य बोध की ही श्रेणी में है, हां अर्धसत्य होते हुए भी यह एक अच्छा सत्य अवश्य है,शुभ सत्य अवश्य है क्योंकि शान्ति के लिए वातावरण का मधुवत् होना ही चाहिए होता है। किन्तु दृश्यमान जगत् केवल मधुवत् नहीं है। यहां अशान्ति भी है और अशान्तिकारक परिस्थितियां भी हैं। हमें इन्हीं के मध्य रहना है। यही कारण था कि परम लोक व्यवस्थापक के रूप में श्रीकृष्ण की अपेक्षा थी कि लोग सुख-दु:खात्मक परिस्थितियों में समभाव से रहते हुए अपेक्षित कर्म करें। लोग सुख-दु:खात्मक परिस्थितियों के मध्य रहते हुए भी वह करें जो लोकहित में लोक व्यवस्थापक की अपेक्षा हो।

उक्त स्थिति में हमसे अपेक्षा भी होती है कि हम जब कभी अभिलाषा और अपेक्षा में द्वन्द्व का अनुभव करें तब अभिलाषा को त्याग कर के अपेक्षा के साथ होने का विनिश्चय करें,यही श्रीराम के जीवन चरित्र से शिक्षा मिलती है और भीष्म पितामह को युद्ध भूमि से हटाने के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में सुदर्शन चक्र को धारित करके यही संदेश दिया है कि प्रतिज्ञा जैसी अभिलाषा को लोकहित में त्याग कर आगे बढ़ा जा सकता है और बढ़ा जाना ही चाहिए।

रसो वै स: को पूर्ण सच मानते हुए जो लोग कर्मच्युत होते हैं वे किसी भी रुप में आदरणीय और आचरणीय नहीं रह जाते हैं। श्रीकृष्ण रसो वै स: को पूर्ण सच मानकर चलने वाले रासलीला में मस्त गोप-गोपियों को त्याग कर जब आगे बढ़े तो वह गोप-गोपियों की ओर पलट कर देखना भी उचित नहीं समझे जबकि वह अर्जुन के सारथी बने।

यहां कोई यह प्रश्न कर सकता है कि प्रतिज्ञा अभिलाषा कैसे हो सकती है?अभिलाषा में स्वहित रहता है जबकि प्रतिज्ञा अन्तरात्मा की आवाज से सम्बद्ध होती है।

उक्त के सम्बन्ध में स्थिति यह है कि प्रतिज्ञा के लिए किसी से कोई अपेक्षा नहीं करता है अपितु प्रतिज्ञा व्यक्ति स्वेच्छा से करता है और उसको पूरा करने लिए वह सब कुछ दांव पर लगा देता है जबकि अपेक्षा लोकहित में लोक व्यवस्थापक द्वारा निर्धारित की जाती है जिसके लिए व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है वह वही करे जो उससे अपेक्षित है। व्यक्ति अपेक्षा के अनुसार कार्य करने या न करने के लिए स्वतंत्र होता है जबकि प्रतिज्ञा में बाध्यता है। यदि कोई किसी काम को करने की प्रतिज्ञा करता है तो वह उसे करने के लिए बाध्य भी होता है। प्रतिज्ञा अभिलाषा की श्रेणी में इस आधार पर भी समझी जाती है क्योंकि प्रतिज्ञा के विषयों का निर्धारण व्यक्ति स्वयं करता है जबकि अपेक्षा के विषयों का निर्धारण लोकहित में लोक व्यवस्थापक द्वारा किया जाता है। अत एव अपेक्षा अभिलाषा नहीं है जबकि प्रतिज्ञा अभिलाषा हो जाती है।

उक्त पर यह कहा जा सकता है कि प्रतिज्ञा न तो अपेक्षा है,न ही अभिलाषा है अपितु भीष्म प्रतिज्ञा या उस जैसी प्रतिज्ञा कारक परिस्थितियों में प्रतिज्ञा विशुद्ध कर्तव्य हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में प्रतिज्ञाएं किसी बाह्य दबाव में नहीं होती हैं अपितु तत्कालीन परिस्थितियों में प्रतिज्ञाएं आत्मा की बुलंद आवाज हो जाती हैं।

उक्त के सम्बन्ध में यही समझना उपयुक्त है कि भीष्म पितामह ने जो प्रतिज्ञा की थी उसके लिए किसी ने उनसे अपेक्षा नहीं की थी जबकि श्रीराम के वनवास के लिए राजा दशरथ की अपेक्षा थी। अत एव कोपभवन जब श्रीराम ने कैकेई के समक्ष प्रतिज्ञा की कि वह राजाज्ञा का पालन करेंगे तब श्रीराम ने कोई अभिलाषा नहीं व्यक्त की थी अपितु राजाज्ञा के पालन हेतु एक नागरिक के रूप में अपने प्रास्थिति का बोध कैकेई को कराया था। इसके विपरीत भीष्म पितामह ने स्वविवेक से सुनिश्चित किया था कि वह आजीवन विवाह नहीं करेंगे,सत्यवती के संततियों की रक्षा करेंगे,हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठने वाले की सुरक्षा करेंगे और इसके लिए वह प्रतिज्ञा बद्ध हुए। यह उनका स्वयं का निर्णय था न कि किसी की अपेक्षा थी कि वह उक्त प्रकार की प्रतिज्ञाएं करें। उन्होंने स्वयं सुनिश्चित किया कि इस प्रतिज्ञा से खुश होकर सत्यवती के पिता जी सत्यवती का विवाह महाराज शान्तनु से कर देंगे। इसके विपरीत श्रीराम एक नागरिक की हैंसियत से बाध्य थे कि वह कैकेई के समक्ष राजाज्ञा के पालन हेतु वचन बद्ध हों।इस प्रकार स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि श्रीराम ने वनगमन की जो प्रतिज्ञा की थी वह अपेक्षा थी जबकि भीष्म पितामह ने जो प्रतिज्ञाएं की थीं वे अभिलाषाएं थीं।

भीष्म पितामह की प्रतिज्ञाओं को अभिलाषा की श्रेणी से पृथक करने के प्रयास में यह समझाया जा सकता है कि भले ही किसी ने उनसे उक्त प्रतिज्ञाओं की अपेक्षा नहीं की थी किन्तु स्वयं उनकी अंतरात्मा ने अपेक्षा की थी वह उक्त प्रकार की प्रतिज्ञाएं करें। वैसे भीष्म की जगह आप होते तो क्या विकल्प चुनते?

उक्त पर यदि पूर्वाग्रह रहित होकर विचार करें तो यह समझने में कोई दिक्कत नहीं हो सकती है कि अभिलाषाएं भी अन्तरात्मा से ही सम्बन्धित होती हैं जबकि अपेक्षा का सम्बन्ध अन्तरात्मा से नहीं होता है। अपेक्षा के विषय किसी भी स्थिति में अन्तरात्मा से सुनिश्चित नहीं होते हैं। उनके अनुसार कार्य करने या न करने का निर्णय भी अन्तरात्मा के आवाज की अपेक्षा नहीं रखते हैं जबकि विवेक की अपेक्षा रखते हैं क्योंकि अपेक्षा के अनुसार कार्य करने या न करने की स्वतन्त्रता है जबकि अभिलाषा तो बाध्यता होती है और प्रतिज्ञाओं का पालन भी इसी कारण बाध्यता की श्रेणी में शामिल होता है क्योंकि प्रतिज्ञाएं अभिलाषा होती हैं न कि अपेक्षा।

यह समझना कि अभिलाषा में व्यक्तिगत स्वार्थ निहित होता है,अंतरात्मा की आवाज में अपना स्वार्थ अनुपस्थित होता है। अन्तरात्मा की आवाज से उद्भूत प्रतिज्ञाएं ईश्वरेच्छा को समर्पित होती हैं। उसकी राजी में रजा की स्थिति है,अंतरात्मा की आवाज सुनना और उसके अनुसार आचरण करना अभिलाषा नहीं प्रतिज्ञा है।

उक्त के सम्बन्ध में यही समझना उपयुक्त है कि अन्तरात्मा की आवाज के आधार पर प्रतिज्ञाएं करना सात्विक प्रवृत्ति का कार्य है किन्तु इस आधार पर इसे अपेक्षा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। रावण ने भी जो आचरण किया था उसके लिए भी उसकी अन्तरात्मा ने ही प्रेरित किया होगा। मन की आवाज आवश्यक नहीं है कि सदैव सबके लिए शुभप्रद ही हो किन्तु अपेक्षा सदैव लोकहित में ही होती है। यही कारण रहा है कि श्रीकृष्ण ने अपेक्षा के अनुसार कार्य करने की ओर उन्मुख होने के पूर्व यह परखने का दायित्व उन्मुख होने वाले को ही सौंपा है कि वह सुनिश्चित करे कि उससे जो अपेक्षा की जा रही है वह लोकहित में है या नहीं। यदि भीष्म पितामह ने कौरवों की ओर से युद्ध में सेनापति बनने के निर्णय के पूर्व यह समझने का प्रयास किया होता कि कौरवों की ओर से युद्ध करना लोकहित में है या नहीं? तो संभव था कि वह कौरवों की ओर से युद्ध न करते क्योंकि कौरव तो राज्य के लिए युद्ध कर रहे थे जबकि एक योद्धा से अपेक्षा होती है कि वह व्यवस्था के लिए युद्ध करे। किन्तु भीष्म पितामह प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध थे ऐसे में उन्होंने इस विषय में सोचना भी उचित नहीं समझा।

जहां तक यह पूछना कि प्रतिज्ञाओं के प्रति मैं क्या करता ?तो इस सम्बन्ध में मेरा उत्तर यही है कि मेरे आदर्श श्रीकृष्ण होते न कि भीष्म पितामह। ऐसे में मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि यदि संभव हो तो वह शक्ति और प्रेरणा दें कि मैं अर्जुन बनने की ओर उन्मुख हो सकूं और अपेक्षाओं एवं अभिलाषाओं के द्वन्द्व से द्वन्द्वातीत होकर अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध हो सकूं जैसे श्रीराम अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध हुए थे।
(लेखक संयुक्त सचिव (सेवानिवृत्त), उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ हैं।)

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

आप के 48 उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट में प्रेम प्राप्त सिंह को छपरा से मिला टिकट

पटना, (ब्यूूरो)। आम आदमी पार्टी (आप) ने बिहार विधानसभा चुनावों के लिए मंगलवार को 48 उम्मीदवारों की अपनी दूसरी सूची जारी कर दी है। आप की उम्मीदवारों की दूसरी सूची में राजेंद्र प्रसाद सिंह को लालगंज, प्रेम प्राप्त सिंह को छपरा, इंद्रजीत ज्योतिकर को हथुआ और आदित्य लाल को पूर्णिया से मैदान में उतारा गया है।


बता दें कि इससे पहले आम आदमी पार्टी ने 11 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी की थी। यानी आम आदमी पार्टी ने अब तक कुल 59 उम्मीदवारों के नाम का एलान कर दिया है।

वहीं, बीजेपी ने भी बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवार की पहली लिस्ट जारी कर दी है। जिसमें कुल 71 नेताओं को टिकट दिया गया है। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को तारापुर तो दूसरे उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा को लखीसराय से मैदान में उतारा गया है।



एनसीपी(एसपी) दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष बलविंदर सिंह ने नांगलोई जाट से मनप्रीत सिंह को विधानसभा अध्यक्ष नियुक्त किया


संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) संगठन विस्तार और सशक्तिकरण के अभियान के अंतर्गत लगातार अपने ढांचे को मज़बूत बना रही है। इसी क्रम में आज पार्टी की दिल्ली प्रदेश इकाई द्वारा नांगलोई जाट विधानसभा क्षेत्र से श्री मनप्रीत सिंह जी को विधानसभा अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

श्री मनप्रीत सिंह को पार्टी से जोड़ने का कार्य प्रदेश उपाध्यक्ष सरदार बलविंदर सिंह और मुंडका विधानसभा अध्यक्ष गुरप्रीत सिंह द्वारा किया गया। दोनों नेताओं के प्रयासों से नांगलोई जाट क्षेत्र में पार्टी संगठन को नई मजबूती और सक्रियता मिली है।

यह नियुक्ति पार्टी नेतृत्व की सहमति से की गई है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में संगठन को सशक्त करना, कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरना और जनता के बीच पार्टी की विचारधारा को प्रभावी ढंग से पहुंचाना है।

प्रदेश संयोजक डी. सी. कपिल ने कहा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) दिल्ली में तेजी से संगठनात्मक विस्तार कर रही है। हमारा उद्देश्य है कि ऐसे कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाए जो जनता के बीच सक्रिय हैं और पार्टी के सिद्धांतों के प्रति समर्पित हैं। मनप्रीत सिंह जी की नियुक्ति से नांगलोई जाट क्षेत्र में संगठन को नई दिशा मिलेगी और पार्टी का जनाधार और मजबूत होगा।

प्रदेश उपाध्यक्ष सरदार बलविंदर सिंह ने कहा कि दिल्ली में संगठन को बूथ स्तर तक मज़बूत करने के लिए निरंतर काम किया जा रहा है। ऐसे युवाओं को जिम्मेदारी दी जा रही है जो जनता से जुड़े हैं और समाज में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। मनप्रीत सिंह जी का पार्टी से जुड़ना और उनकी नियुक्ति नांगलोई जाट विधानसभा में संगठन के लिए नई ऊर्जा लेकर आएगी।

दिल्ली प्रदेश महासचिव राजेश घाघट ने कहा कि मनप्रीत सिंह जी का पार्टी से जुड़ना संगठन के लिए महत्वपूर्ण है। उनके अनुभव और समर्पण से नांगलोई जाट क्षेत्र में पार्टी की गतिविधियाँ और जनसंपर्क मजबूत होंगे। हमें विश्वास है कि उनके नेतृत्व में कार्यकर्ता और जनता दोनों ही पार्टी के प्रति और अधिक उत्साहित होंगे।

मुंडका विधानसभा अध्यक्ष गुरप्रीत सिंह ने कहा कि मनप्रीत सिंह जी एक कर्मठ और समाजसेवी व्यक्ति हैं। उनका पार्टी से जुड़ना यह दर्शाता है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) जमीनी कार्यकर्ताओं को महत्व देती है। वे क्षेत्र में युवाओं को जोड़ने और पार्टी को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाएंगे।

नवनियुक्त विधानसभा अध्यक्ष मनप्रीत सिंह ने पार्टी नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मैं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) के वरिष्ठ नेतृत्व का हृदय से धन्यवाद करता हूं जिन्होंने मुझ पर भरोसा जताया। मैं क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर संगठन को बूथ स्तर तक मज़बूत करूंगा और पार्टी की नीतियों को घर-घर पहुंचाऊंगा।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) दिल्ली प्रदेश इकाई का यह संगठन विस्तार अभियान लगातार जारी है। पार्टी का लक्ष्य है कि आने वाले MCD, विधानसभा और लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए हर क्षेत्र में सशक्त, सक्रिय और जनता से जुड़ा संगठन तैयार किया जाए, ताकि दिल्ली में एक मजबूत राजनीतिक विकल्प उभरे।














 

मंसूरी फेडरेशन ऑफ इंडिया ने किया सम्मान समारोह का आयोजन

संवाददाता

नई दिल्ली। मंसूरी फेडरेशन ऑफ इंडिया दिल्ली प्रदेश की ओर से 14 अक्टूबर, 2025 दोपहर 02:00 बजे, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, उर्दू घर, आई.टी.ओ. नई दिल्ली में मंसूरी सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इसमें मंसूरी समाज के अलग-अलग संगठनों के पदाधिकारी शामिल हुए।

मंसूरी फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव नियाज़ अहमद मंसूरी ने बताया कि इस प्रोग्राम में दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल रशीद मंसूरी, महासचिव रहीस मंसूरी, सचिव मेराज मंसूरी के अलावा दिल्ली प्रदेश के सभी जिला अध्यक्षों सदस्यों ने राष्ट्रीय कोर कमेटी और मंसूरी फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के अलग-अलग राज्यों से आए हुए पदाधिकारियों के अलावा मंसूरी समाज के सीनियर लीडर और क्षेत्र में समाज सेवा का कार्य कर रहे मंसूरी भाइयों को सम्मानित किया गया।

नियाज अहमद ने बताया कि इसमें कोर कमेटी से राष्ट्रीय अध्यक्ष हाजी मेहंदी हसन मंसूरी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शाकिर मंसूरी इन्दौर से, राष्ट्रीय महासचिव नियाज़ अहमद पप्पू मंसूरी, राष्ट्रीय सचिव नफीस मंसूरी, कोषाध्यक्ष सरकार आलम मंसूरी, संस्थापक रशीद अहमद मंसूरी, अब्दुल रहमान मंसूरी, सरपरस्त हुसैन बख्श, तय्यब हुसैन मंसूरी, हाजी फारूक रजा मंसूरी, मंसूरी फेडरेशन ऑफ इंडिया के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष हाजी शाहनवाज मंसूरी, हाजी इरफान मंसूरी और उनकी टीम को भी सम्मानित किया गया। वहीं उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष नईम मंसूरी और उनकी टीम को सम्मानित किया गया। मध्य प्रदेश प्रभारी शाकिर मंसूरी, मध्य प्रदेश अध्यक्ष नियाजउद्दीन मंसूरी, कर्नाटका से रजिसाब नद्दाफ, यासीन नद्दाफ, महबूब नद्दाफ, मस्तान नद्दाफ, आमीन नद्दाफ, इसके अलावा छत्तीसगढ़ ओर झारखंड प्रभारी कलीमुद्दीन मंसूरी का सम्मान किया गया।

दिल्ली प्रदेश से जिला अध्यक्ष नौशाद मंसूरी, सफीक मंसूरी, इशाक मंसूरी, नौशाद मंसूरी, अनीस मंसूरी, रफीक मंसूरी, डॉ. महमूद आलम, मुहम्मद नजर मंसूरी, बाबू मंसूरी के अलावा आए हुए सभी मेहमानों को सम्मानित किया गया।

दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल रशीद मंसूरी की सभी तारिफ की क्योंकि उन्हीं की सरपरस्ती में यह प्रोग्राम किया। इसके अलावा मंसूरी फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हाजी मेहंदी हसन मंसूरी साहब ने दिल्ली प्रदेश के मंसूरी समाज के लिए तीन अहम ऐलान किए जिसमें  अप्रैल 2026 में इस्तमाई शादी की जाएंगी, 2. 10वीं और 12वीं कक्षा में अच्छे नंबर लाने वाले बच्चों को सम्मानित किया जाएगा, 3. जो बच्चा पढ़ना चाहता हे और उसके माता पिता उसे पढ़ाने में सक्षम नहीं हैं ऐसे बच्चों की पढ़ाई का सारा खर्च मंसूरी फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से किया जाएगा। इसके अलावा समाज में शादी को आसान बनाने और फिजूल खर्ची कम करने पर जोर दिया, मैय्यत के बाद होने वाले खाने पर रोक लगे,

कब्रिस्तान में दफ़ींने के बाद जो खाने का ऐलान किया जाता है उस पर रोक लगे और गमगीन परिवार व उसके दूर से आए रिश्तेदारों के लिए सिर्फ खाना बने और समाज की अलग-अलग समस्याओं तथा उनके सुधार के लिए सबने अपने अपने विचार रखे। 

सभी ने दिल्ली प्रदेश मंसूरी फेडरेशन ऑफ़ इंडिया की टीम का शुक्रिया अदा किया गया जिसने दीन दयाल उपाध्याय मार्ग उर्दू घर में इतना आलीशान प्रोग्राम किया वह कबीले तारीफ था।






























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