सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

लोकसभा आम चुनाव-2024 और दिल्ली विधानसभा चुनाव-2025 के लिए बेस्ट इलेक्टोरल प्रक्रियाओं के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कार

संवाददाता 

नई दिल्ली। एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित एक विशेष समारोह में माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना ने लोकसभा आम चुनाव 2024 और दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान चुनावी प्रक्रिया में उनके असाधारण योगदान के लिए प्रतिष्ठित अधिकारियों को सम्मानित किया।

चुनाव प्रबंधन में उत्कृष्टता को मान्यता देने के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्य सचिव श्री धर्मेंद्र कुमार, दिल्ली पुलिस आयुक्त श्री संजय अरोड़ा, एमसीडी आयुक्त श्री अश्विनी कुमार, एनडीएमसी के अध्यक्ष श्री केशव चंद्रा, एलजी के प्रधान सचिव श्री आशीष कुंद्रा, प्रधान सचिव, गृह श्री ए. अनबरसु, दिल्ली की मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्रीमती आर. एलिस वाज और विभिन्न विभागों के अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

ये पुरस्कार कई श्रेणियों में दिए गए, जिनमें महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण करना, आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का प्रवर्तन, आईटी नवाचार, सोशल मीडिया निगरानी, ​​चुनावी आउटरीच और मीडिया प्रबंधन में उत्कृष्ट प्रदर्शन को मान्यता दी गई।

दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली विधानसभा चुनाव-2025 में समग्र चुनाव संचालन में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए श्रीमती आर एलिस वाज को लिए बेस्ट इलेक्टोरल प्रक्रियाओं के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कार प्रदान किया।

उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए विशेष श्रेणी के पुरस्कारों में, श्री राजेश कुमार (विशेष सीईओ) को वैधानिक प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए सम्मानित किया गया, जबकि श्री सचिन राणा, आईएएस (अतिरिक्त सीईओ) को आदर्श आचार संहिता लागू करने और सोशल मीडिया की निगरानी में उनकी उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, श्री डी. कार्तिकेयन (अतिरिक्त सीईओ) को आईटी नवाचारों के लिए, श्री मुकेश राजोरा (संयुक्त सीईओ) को चुनावी आउटरीच गतिविधियों के लिए और श्री गौरव यादव (संयुक्त सीईओ) को मीडिया और एमसीएमसी प्रबंधन के लिए सम्मानित किया गया। अन्य पुरस्कार विजेताओं का विवरण इस प्रकार है:

लोकसभा-2024 के आम चुनाव में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए पुरस्कार।


1. रिटर्निंग अधिकारियों के लिए पुरस्कार 

सुश्री ईशा खोसला - PC नई दिल्ली

सुश्री वेदिता रेड्डी - PC उत्तर-पूर्व

श्री यश चौधरी  - PC चांदनी चौक


2. जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) के लिए पुरस्कार

सुश्री ऋषिता गुप्ता - जिला शाहदरा

सुश्री अंकिता आनंद  - जिला उत्तर-पश्चिम

श्री अमोल श्रीवास्तव - जिला पूर्व


3. एसडीएम (चुनाव) के लिए पुरस्कार

श्री वीरेंद्र कुमार - जिला उत्तर-पश्चिम 

श्री तपन कुमार झा - जिला उत्तर 

रविवार, 16 फ़रवरी 2025

केजरीवाल की हठधर्मिता ने डुबोई 'आप ' की नैय्या

तनवीर जाफ़री

दिल्ली की 70 सदस्यों की विधान सभा हेतु हुए 2015 के चुनाव में 70 में से 67 सीटें तथा 2019 में दिल्ली की सातवीं विधानसभा चुनाव में 62 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत प्राप्त करने वाली आम आदमी पार्टी पिछले दिनों दिल्ली चुनाव की जंग  हार गयी। भारतीय जनता पार्टी को जहां पूर्ण बहुमत के साथ जहां 48 सीटें हासिल हुई वहीं 'आप ' को केवल 22 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। आप के लिये सबसे बड़ा झटका यह भी रहा कि सत्ता गंवाने के साथ ही उसके राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल सहित पार्टी के और भी कई दिग्गज नेता चुनाव हार गये। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की पराजय से  पार्टी के अंत की शुरुआत हो चुकी है। यदि ऐसा है तो वास्तव में इसका ज़िम्मेदार कौन है ? क्या वजह थी कि  दिल्ली विधानसभा चुनाव में 43.57 प्रतिशत मत प्राप्त होने के बावजूद आप को केवल 22 विधानसभा सीटों पर ही जीत हासिल हुई जबकि भाजपा ने मात्र दो प्रतिशत अधिक यानी 45.56 प्रतिशत मत प्राप्त कर 48 सीटों पर जीत दर्ज की। नतीजों से साफ़ है कि भाजपा ने त्रिकोणीय संघर्ष का लाभ उठाकर ही आम आदमी पार्टी से 26 सीटें अधिक हासिल कीं और दिल्ली की सत्ता आप के हाथों से झटक ली। हालांकि हार के बावजूद आम आदमी पार्टी के इस तर्क को भी नकारा नहीं जा सकता कि बावजूद इसके कि बीजेपी के साथ प्रोपेगंडा,सरकार की सारी मशीनरी ,मीडिया,धनबल व बाहुबल सब कुछ थे,फिर भी उसे आप से मात्र दो प्रतिशत ही ज़्यादा वोट मिले हैं।

सवाल यह है कि 2011 में यू पी ए सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद  26 नवंबर 2012 को देश के अनेक बुद्धिजीवियों द्वारा अरविन्द केजरीवाल के राष्ट्रीय संयोजकत्व में स्थापित की गयी आम आदमी पार्टी जोकि न केवल दिल्ली में सत्ता में थी बल्कि वर्तमान समय में देश के समृद्ध राज्य पंजाब में भी सत्तारूढ़ है वही नया नवेला राजनैतिक दल आख़िर किन वजहों से और किन परिस्थितियों में इस अंजाम तक जा पहुंचा कि आज 'आप ' के 'अंत' पर चर्चा छिड़ गयी है ? सच पूछिये तो दिल्ली में भाजपा की संभावित फ़तेह की सुगबुगाहट तो दरअसल उसी समय शुरू हो गयी थी जबकि 'आप ' ने विगत अक्टूबर 2024 को हरियाणा में हुये विधानसभा चुनाव में 'इण्डिया ' गठबंधन घटक का सदस्य होने के बावजूद राज्य की 89 सीटों पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस को हरियाणा की सत्ता में वापसी से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग़ौरतलब है कि कांग्रेस हरियाणा में 90 में 7 सीटें आप के लिये छोड़ने को तैयार थी परन्तु केजरीवाल की ज़िद थी कि कांग्रेस उसे 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करने दे। इस बात पर दोनों दलों में समझौता नहीं हो सका। और आप ने 89 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिये। नतीजतन  AAP को राज्य भर में केवल 1.53% वोट प्राप्त हुए। जिन्होंने कांग्रेस को हराने व भाजपा को जिताने में अहम भूमिका निभाई। 2024 में आप द्वारा 10 सीटें तब मांगीं जा रही थीं जबकि 2019 में आम आदमी पार्टी का वोट शेयर NOTA से भी काफ़ी कम था। इसी हरियाणा चुनाव परिणाम के बाद ही दिल्ली में भी इसी तरह के चुनाव परिणाम की उम्मीद की जाने लगी थी। 

ज़ाहिर है ऐसे विध्वंसक फ़ैसले लेने के लिये स्वयं अरविन्द केजरीवाल ही ज़िम्मेदार थे। वैसे भी 2012 में 'आप ' अपने गठन के साथ ही उस समय विवादों में आ गयी थी जबकि अन्ना हज़ारे ने केजरीवाल द्वारा आम आदमी पार्टी के रूप में नया राजनैतिक दल बनाने की कोशिश का विरोध किया था। हालांकि अन्ना हज़ारे व केजरीवाल दोनों ही नेताओं को लेकर एक बड़े राजनैतिक विश्लेषक वर्ग का यह भी मानना है कि अन्ना आंदोलन हो या केजरीवाल की तर्ज़ -ए -सियासत,दरअसल यह सब कांगेस के विरोध में तथा भाजपा को फ़ायदा पहुँचाने के लिये रचा गया एक बड़ा राजनैतिक चक्रव्यूह है,अन्यथा क्या कारण है कि जिस जनलोकपाल को लेकर आंदोलन व राजनैतिक दल खड़ा किया गया था उसका ज़िक्र इन्हीं नेताओं के मुंह से अब क्यों सुनाई नहीं देता। पिछले दस सालों में बड़े से बड़े घोटाले उजागर हुये, उनके विरोध अन्ना हज़ारे ने आंदोलन क्यों नहीं किया ? 

इसके अलावा आप के गठन के फ़ौरन बाद ही जिसतरह पार्टी के संस्थापक लोगों व अनेक बुद्धिजीवियों द्वारा पार्टी छोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ उसका भी मुख्य कारण केजरीवाल का ज़िद्दीपन व उनकी हठधर्मिता ही थी। क्या वजह थी कि आम आदमी पार्टी को सबसे पहले चंदा देने वाले पूर्व क़ानून मंत्री सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांति भूषण जिन्होंने पार्टी की स्थापना पर 1 करोड़ रुपए का चंदा दिया था, 2014 से ही उनका 'आप' से मोहभंग हो गया ? शांति भूषण ने उसी समय केजरीवाल को अनुभवहीन, दिल्ली विधानसभा चुनावों में टिकट बंटवारे में गड़बड़ी करने व पार्टी में मनमानी चलाने जैसे अनेक आरोप लगाए थे। इसी तरह केजरीवाल के एक और ख़ास साथी एक्टिविस्ट आशीष खेतान, एक प्रसिद्ध टीवी न्यूज़ चैनल के मैनेजिंग एडिटर के पद से इस्तीफ़ा देकर आम आदमी पार्टी में शामिल होने वाले आशुतोष,पार्टी का थिंक टैंक व पार्टी की क़ानूनी लड़ाई लड़ने वाले वाले प्रशांत भूषण जैसे साथियों को केजरीवाल संभाल नहीं सके। इसी तरह राजनीतिक विचारक योगेंद्र यादव को जोकि आम आदमी पार्टी के लिए चुनावी रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाते थे उन्हें भी प्रशांत भूषण के साथ ही पार्टी विरोधी गतिविधिय़ों के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया। समाजशास्त्री आनंद कुमार,पैथोलॉजिस्ट अंजली दमानिया, सामाजिक कार्यकर्ता मयंक गांधी,किरन बेदी ,शाज़िया इल्मी, विनोद कुमार बिन्नी,कपिल मिश्रा,एमएस धीर सहित और भी कई नेता या तो पार्टी छोड़ गये या फिर निष्क्रिय हो गये। ऐसे सभी नेता केजरीवाल के साथ काम कर पाने में स्वयं को असहज महसूस कर रहे थे। परिणामस्वरूप अनेक साथी नेताओं के मना करने के बावजूद केजरीवाल अपनी ज़िद में ही दिल्ली में विवादित शराब नीति लाये जोकि उनकी राजनैतिक तबाही व बदनामी का कारक साबित हुई।   

अब सत्ता से हटते ही भाजपा ने केजरीवाल को राजनैतिक रूप से समाप्त करने का प्लान तैयार कर लिया है। जहाँ भाजपा की गिद्ध दृष्टि अब पंजाब की आप सरकार पर जा टिकी है वहीँ भाजपा ने एम सी डी के भी फ़िलहाल तीन 'आप ' पार्षद झटक लिये हैं। साथ ही केंद्रीय सतर्कता आयोग ने केजरीवाल के 6 फ़्लैग स्टाफ़ बंगले के नवीनीकरण पर हुए बेतहाशाख़र्च की जांच का आदेश भी दे दिया है। भाजपा द्वारा केजरीवाल के इस सरकारी आवास को 'शीश महल' का नाम दिया गया था तथा इसे उनके विरुद्ध चुनावी मुद्दा बनाया गया था। बहरहाल मात्र दिल्ली की हार से आप के अंत की भविष्यवाणी करना तो फ़िलहाल मुनासिब परन्तु इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि केजरीवाल की ज़िद व उनकी हठधर्मिता के चलते ही 'आप ' की नैय्या डूब रही है। 

संपर्क: 9896219228

शनिवार, 15 फ़रवरी 2025

विजयन बाला की नई पुस्तक का नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में विमोचन

 खेल ब्यूरो

नई दिल्ली। भारत के ओलंपिक पदक विजेताओं पर अपनी बहुचर्चित पुस्तक के बाद, विजयन बाला अब एक नई पुस्तक लेकर आए हैं, जिसमें इस बार ओलंपिक इतिहास और दुनिया भर के सितारों के बारे में बताया गया है।

विश्व के सबसे महान खेल आयोजन का इतिहास और सितारे: एथेंस 1896 से पेरिस 2024 तक, इस पुस्तक में विश्व के 82 सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित ओलंपिक सितारों के जीवन और उपलब्धियों के बारे में बताया गया है, तथा इसमें दुर्लभ तस्वीरें, दिलचस्प किस्से और संक्षिप्त ओलंपिक इतिहास शामिल हैं।

"भारतीय पदक विजेताओं पर पिछली किताब के बाद, मैंने सोचा कि हम खुद को भारतीय खेलों तक ही क्यों सीमित रखें? क्यों न वैश्विक स्तर पर जाएं और पाठकों को कुछ महानतम खिलाड़ियों के बारे में बताएं और बताएं कि उन्होंने सभी प्रकार की कठिनाइयों पर कैसे विजय प्राप्त की? इस तरह यह किताब लिखी गई है।"

इतिहास और सितारे

विश्व का सबसे बड़ा खेल आयोजन

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर बाला ने कहा, "इस पुस्तक के लिए सबसे पहले एक नाम पर विचार किया गया था और अंतिम 82 नामों पर निर्णय लेने में काफी शोध और विचार-मंथन हुआ।"

वंडर हाउस बुक्स द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में नादिया कोमनेसी और कार्ल लुईस जैसे कुछ प्रसिद्ध नाम शामिल हैं, लेकिन कुछ कम प्रसिद्ध नाम भी हैं, जिनमें हंगरी के 25 मीटर रैपिड फायर शूटर करोली टाकाक्स शामिल हैं, जिन्होंने ग्रेनेड विस्फोट में अपना दाहिना हाथ खो दिया था।

वह एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपने बाएं हाथ से निशाना लगाने में असमर्थ थे, लेकिन उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक अपने बाएं हाथ से निशानेबाजी का प्रशिक्षण लिया और 1948 और 1952 के ओलंपिक में लगातार स्वर्ण पदक जीते।

हालाँकि, इस सूची में केवल एक भारतीय ध्यानचंद हैं और इस अवसर पर हॉकी के दिग्गज अजीतपाल सिंह और हरबीर सिंह उनके सम्मान में उपस्थित थे।

"मेरे लिए, 1968 में मैक्सिको में पश्चिम जर्मनी के खिलाफ खेला गया मैच हमेशा विशेष रहेगा, क्योंकि यह मेरा पहला ओलंपिक मैच था और हम अपना पहला मैच न्यूजीलैंड से हार गए थे।"

अजीतपाल ने याद करते हुए कहा, "पिछली रात मैं सो नहीं सका। जर्मन शक्तिशाली थे, लेकिन मैंने दबाव को नियंत्रित किया और यह मेरी ओलंपिक तस्वीर यात्रा की शुरुआत थी।"

दिलचस्प बात यह है कि हरबिंदर ने इसी खेल को अपने पसंदीदा क्षणों में से एक बताया, जिसमें उन्होंने सर्कल के ऊपर से रिवर्स फ्लिक के साथ गोल किया था।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

सीनियर सैकेण्डरी (शैक्षिक/मुक्त विद्यालय) एवं डी.एल.एड. प्रथम वर्ष (रि-अपीयर) परीक्षा फरवरी/मार्च-2025 के तिथि-पत्र में हुआ संशोधन

संवाददाता

भिवानी।  हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड सचिव श्री अजय चोपड़ा, ह.प्र.से. ने आज यहां बताया कि सीनियर सैकेण्डरी (शैक्षिक/मुक्त विद्यालय) एवं डी.एल.एड. प्रथम वर्ष (रि-अपीयर) परीक्षाओं के तिथि-पत्र में संशोधन किया गया है।

उन्होंने बताया कि सीनियर सैकेण्डरी (शैक्षिक/मुक्त विद्यालय) की 01 मार्च को होने वाली Hindi Core, Hindi Elective, English Special for foreign Student in Lieu of Hindi Core विषय की परीक्षा 26 मार्च को तथा 26 मार्च को होने वाली Sanskrit, Urdu, Bio-Technology की परीक्षा 19 मार्च को संचालित होंगी। 27 मार्च को होने वाली Computer Science, IT&ITES(Information Technology & Enabling Services, For Govt. Model Sr. Sec. School, SLCE Sec-28 Faridabad Only) की परीक्षा 13 मार्च एवं 01 अप्रैल को होने वाली Physical Education की परीक्षा 28 मार्च, 2025 को संचालित होगी। इसके अतिरिक्त 02 अप्रैल को होने वाली Retail(NSQF), Automotive(NSQF), Private Security(NSQF), IT-ITES(NSQF), Healthcare(NSQF), Physical Education(NSQF), Beauty& Wellness(NSQF), Tourism and Hospitality(NSQF), Agriculture(NSQF), Banking, Financial Services & Insurance(NSQF), Apparel, Made-ups and Home Furnishing(NSQF), Office Secretary ship and Stenography in Hindi, Office Secretary Ship and Stenography in English, Sanskrit Vyakran Part-2(Aarsh Padhdti Gurukul), Sanskrit Vyakran Part-2 (Paramparagat Sanskrit Vidyapeeth) विषय की परीक्षा 27 मार्च तथा 28 मार्च  को होने वाली Agriculture, Philosophy विषय की परीक्षा अब 05 मार्च, 2025 को संचालित करवाई जाएगी।

उन्होंने आगे बताया कि डी.एल.एड. प्रथम वर्ष (रि-अपीयर) की 01 मार्च को होने वाली DE-102-Education, Society, Curriculum and Learner विषय की परीक्षा 25 मार्च को संचालित करवाई जाएगी। शेष परीक्षाओं की तिथियां यथावत् रहेंगी।

कई प्रश्न खड़ा कर गया दिल्ली विधानसभा चुनाव

बसंत कुमार

6 फरवरी 2025 को दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए और भाजपा ने 48 सीटें जीत कर 27 वर्षों बाद दिल्ली में सत्ता में वापसी की पर इस चुनाव परिणाम ने कई प्रश्न खड़े कर दिए जिनका उत्तर निकट भविष्य में खोजना आवश्यक होगा। आखिर अन्ने हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन से निकली राजनीतिक पार्टी मात्र 12 वर्षों में अर्स से फर्स पर आ गई। अपने गठन के बाद पहले ही चुनाव में 28 सीटे जीतकर कांग्रेस के साथ दिल्ली में सरकार बनाई और 2015 और 2020 के चुनावों में रिकार्ड बहुमत के साथ कांग्रेस को शून्य पर पहुंचा दिया। परंतु वर्ष 2025 में केजरीवाल का हीरो से जीरो वाली स्थिति में पहुंच जाना। जब पूरे देश में ब्रैंड मोदी की धूम मची थी वहीं 2015 और 2020 में केजरीवाल ब्रैंड दिल्ली में इस पर भारी पड़ा था पर इस चुनाव में केजरीवाल वाला ब्रैंड पूरी तरह से फ्लॉप साबित हुआ और आम आदमी पार्टी 22 सीटों पर सिमट गई। सबसे बड़ी बात यह रही कि आम आदमी के तीनों बड़े नेता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन अपने-अपने चुनाव हार गए। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो ब्रैंड केजरीवाल वर्ष 2012 में इसलिए मजबूत हुआ कि लोगों को लगा कि यह पार्टी अन्य पार्टियों से हटकर काम करेगी इसी कारण भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों के अलावा झुग्गी-झोपड़ी और मध्यम वर्ग के लोगों ने इनका साथ दिया।

अरविंद केजरीवाल का उदय जेपी आंदोलन की तरह अन्ना हजारे के आंदोलन से सिर्फ सरकार बनाने और ऐशो-आराम की जिंदगी जीने के लिए नहीं था बल्कि भ्रष्टाचार खत्म करने के उद्देश्य से जन लोकपाल की नियुक्ति के लिए हुआ था। परन्तु सरकार बनने के बाद केजरीवाल जन लोकपाल से हटकर ऐशो-आराम की जिंदगी जीने और लोगों को लुभाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटने में लग गए। शुरु-शुरु में लोगों ने इस उम्मीद में इसे स्वीकार कर लिया कि उन्हें मुफ्त की योजनाएं भी मिलेगी और भ्रष्टाचार से मुक्ति भी मिलेगी। पर जब उनकी सरकार पर शराब के घोटाले के आरोप लगे और केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और संजय सिंह जेल पहुंच गए तो लोगों को केजरीवाल के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के संकल्प के प्रति संदेह होने लगा। इसके साथ साथ लोगों को केजरीवाल का काम करने के बजाय बहुत अधिक बोलना पसंद नहीं आया। कभी वे कहते यमुना की गंदगी साफ कर दूंगा, कभी कहते कूड़े के पहाड़ हटा दूंगा पर उन्होंने कुछ भी नहीं किया। इस कारण मतदाताओं ने उन्हें चुपचाप सत्ता से बेदखल कर दिया।

केजरीवाल दिल्ली के ऑटो चालको, जिनकी संख्या लाखों में है, को अपना वोट बैंक समझते रहे है और इसी कारण केजरीवाल के सत्ता में आने के बाद ऑटो वाले मीटर से चलने के बजाय सवारी से मनमाना पैसा वसूलने लगे, जिससे ऑटो से चलने वाला मिडिल क्लास तंग हो गया जबकि केजरीवाल के सत्ता में आने से पहले दिल्ली में ऑटो वालों का मीटर से चलना आवश्यक होता था और मीटर से न चलने या मीटर में गड़बड़ी पाए जाने पर उनका चलान होता था। केजरीवाल ने इस बात को नजर अंदाज किया किया कि ऑटो से चलने वाले लोग अधिकांश निम्न मध्यम वर्ग के लोग होते हैं और ऑटो वालों की मनमानी से इन्हीं लोगों पर आर्थिक बोझ पड़ता है। हालत ऐसे हो गए कि आज की युवा पीढ़ी यह भूल भी गई की दिल्ली में ऑटो वाले मीटर से भी चलते हैं, इसलिए ऑटो वालों की गुंडागर्दी से त्रस्त लोगों ने भी केजरीवाल के विरोध में वोट दिया।

अरविंद केजरीवाल का अतिविश्वास भी उनकी पराजय का कारण बना। उन्होंने अपने अतिविश्वास के कारण ही लगभग 7% वोट पाने वाली और दिल्ली में 15 वर्षों तक शासन करने वाली कांग्रेस से किसी तरह का समझौता करने से इंकार कर दिया और सारी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये। इसके बाद कांग्रेस ने भी सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर कर दिए जिसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ। परिणामों से स्पष्ट हो गया कि यदि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी साथ मिलकर लड़ते तो इन्हें 14-15 सीटें अधिक मिल जाती और चुनाव की तस्वीर अलग होती। इसी प्रकार यदि दोनों हरियाणा में भी मिलकर लड़ते तो वहां भी चुनाव परिणाम अलग होते। कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की एक्स पर की गई पोस्ट इसी बात की पुष्टि करती है।

यह चुनाव न सिर्फ आम आदमी पार्टी के लिए ही सबक लेकर नहीं आया बल्कि यह केंद्र में 16 वर्षों तक शासन कर चुकी भाजपा के लिए सबक लेकर आया। भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 12 सीटों में से 8 सीटो पर हार गई और देश के जाने-माने दलित नेता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम दलित बाहुल्य सीट करोल बाग सीट से 7000 से अधिक वोटों से हार गए। यह विचित्र बात है कि भाजपा के अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का उत्तरदायित्व निर्वाह कर चुके सभी नेता अपने अपने चुनाव हारे हैं। चाहे रामनाथ कोविद्, मुन्नी लाल, डॉ. संजय पासवान, विनोद सोनकर, लाल सिंह आर्य और दुष्यंत कुमार गौतम ये सभी एससी मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अपने-अपने चुनाव हार गए और इसके अपवाद के रूप में डॉ. सत्य नारायन जटिया जो विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा सहित दर्जन भर चुनाव जीते। भाजपा को इस बात का आत्म मंथन करना होगा कि क्या कारण है कि इतनी बड़ी सफलताएं अर्जित करने के बावजूद वंचित और आदिवासी आरक्षित सीटों पर वह अपनी पकड़ नहीं बना पा रही है।

भाजपा में सिकंदर बख्त, नजमा हेपतुल्ला, मुख्तार अब्बास नकवी, शाहनवाज हुसैन, आरिफ मुहम्मद खान जैसे कद्दावर मुस्लिम नेता होने के बावजूद मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में पार्टी संघर्ष करती नजर आती है और अब तो स्थिति ऐसी बन गई है कि भाजपा लोकसभा और विधानसभा चुनावों में एक भी मुस्लिम चेहरे को टिकट नहीं देती। ये अलग बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर वर्ष ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी की दरगाह पर अपनी ओर से चादर जरूर भेजते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार के सानिध्य में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच सराहनीय प्रयास कर रहा है पर भाजपा को मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने हेतु अतिरिक्त प्रयास करना होगा, जिससे इस समुदाय में भाजपा में विश्वास पैदा हो।

दिल्ली के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने भाजपा की 27 वर्षों के बाद सत्ता में वापसी कराई है इस चुनाव ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी को यह सबक दे दिया है कि कोरी घोषणाओं से जनता को बहुत दिनों तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। वहीं भाजपा को इस बात का संदेश दे दिया है कि दलितों, आदिवासियों व मुस्लिम समुदायों का दिल जीतने के लिए अतिरिक्त प्रयास किये जाएं क्योकि 12 सुरक्षित सीटों में से मात्र 4 में विजय प्राप्त करना और मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में सारी सीटें हार जाना एशिया की सबसे बड़ी पार्टी के लिए चिंता का विषय है।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/