शनिवार, 22 जून 2024

देश में बढ़ती वीआईपी कल्चर और उसका दुष्प्रभाव

बसंत कुमार

देश की राजधानी दिल्ली में लगभग डेढ़ दशक पूर्व समाज सेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आंदोलन चलाया जा रहा था और और इस आंदोलन की आड़ में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, जनरल वीके सिंह, गोपाल राय, संजय सिंह और न जाने कितने नेता आये और मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, उप राज्यपाल, प्रदेश में मंत्री बनने में सफलता प्राप्त की। उस समय इन सभी नेताओं ने सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक आदर्शों को अपनाने और वीआईपी कल्चर से दूर रहने की बात की थी। अरविंद केजरीवाल ने खुले मंच से ऐलान किया था कि जब मै जीवन में मंत्री या मुख्यमंत्री बनूंगा तो न सरकारी बंगला लूंगा, न सुरक्षा लूंगा और न ही सरकारी गाड़ी इस्तेमाल करूंगा। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने किए गए वायदों को झुठलाते हुए करोड़ों रुपए खर्च करके आलिशान बंगला तैयार कराया और इतनी बड़ी सुरक्षा ली कि जब दिल्ली की सड़कों पर उनका काफिला चलता है तो कि यह अन्ना हज़ारे के आंदोलन से निकला एक व्यक्ति नहीं बल्कि किसी स्टेट का महाराजा निकल रहा है और जहां तक शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने की बात है तो शराब घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में स्वयं केजरीवाल, उनके उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और एक मंत्री सतेन्द्र कुमार जैन जेल में है और एक सांसद जमानत पर जेल के बाहर है। अब प्रश्न यह उठता है कि जिस वीआईपी कल्चर को हटाने के वादे पर अरविंद केजरीवाल को लोगों ने तीन तीन बार मुख्यमंत्री चुना, क्या भारतीय समाज से यह हट सकता है, क्योंकि देश में लाखों वीआईपी लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के नाम पर लाखों पुलिस कर्मी लगा दिए जाते है और लोगों की सुरक्षा राम जी के भरोसे चलती है।

इस वीआईपी कल्चर ने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व के देशों को प्रभावित किया है। विगत 10-15 वर्षों में जिस प्रकार से इस समस्या ने भारत की अर्थव्यवस्था एवं ला एंड ऑर्डर को प्रभावित किया है वह चिंतनीय है। विश्व के सबसे विकसित राज्य अमेरिका में वीआईपी की संख्या 252 है, फ्रांस में कुल 109 वीआईपी है, जापान में कुल 125 वीआईपी है, रूस में 312, जर्मनी में 142 और आस्ट्रेलिया में 205 वीआईपी है परंतु भारत जहां देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो मुफ्त राशन पर गुजारा करती है वहां पर इन वीआईपी लोगों की संख्या 5,79,092 है और सरकार को इनकी सुरक्षा, मुफ्त हवाई यात्रा, चिकित्सा आदि पर करोड़ों रुपये खर्च करना पड़ता है। हमारे देश में कुछ वीआईपी उम्र के ऐसे पड़ाव पर है जिनके पास यमराज के अलावा और कोई नहीं आने वाला पर उनकी सुरक्षा के लिए वाई प्लस और जेड प्लस सुरक्षा के नाम पर दर्जनों पुलिस कर्मी सुरक्षा का घेरा बनाये रखते है।

जिन गुंडों और भूमाफियाओं के आतंक से पूरा समाज डरा और सहमा रहता है और ये लोग जहां खड़े हो जाते हैं तो भयवश लोग उनके पैर छूने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लाइन लगा देते है और इन गुंडों भूमाफियाओं की सुरक्षा में तैनात वर्दी धारी पुलिस कर्मी इनका बैग पकड़े खडा रहता है, इन स्वयंभू वीआईपी लोगों की सुरक्षा इतनी आवश्यक होती हैं कि थाने में स्टाफ है या नहीं इसकी परवाह नहीं करते, यदि कहीं थाने में इमर्जेंसी में पुलिस फोर्स की आवश्यकता पड़ जाए तो थानाध्यक्ष स्टाफ न होने की अपनी लचरि बता देता है, क्योंकि अधिकांश फोर्स तो इन फर्जी वीआईपी की सुरक्षा और सेवा में लगी होती है। कैसी त्रासदी है कि जो पुलिस फोर्स आम जनता की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी वह उन नागरिकों की सुरक्षा में मौजूद रहने के बजाय क्षेत्र में दौरे पर आये सांसदों और मंत्रियों की सेवा सुरक्षा में खड़ी रहती है। आखिर यह वीआईपी कल्चर भारत जैसे लोकतंत्रिक देश में पूरे सिस्टम का सत्यानाश कर देगी।

सांसदों, मंत्रियों, उच्च अधिकारियों की बात तो छोड़ दीजिये, उन छुटभैये नेताओं जो जीवन में कभी भी सांसद, विधायक या पार्षद नहीं बने उन्हें सिर्फ जनता के ऊपर रोब जमाने के लिए पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराना और वीआईपी स्टेट्स देना कितना हाष्यास्पद लगता है, मैंने अपनी आंखों से ऐसे नेताओं को मिली पुलिस सुरक्षा देखी है जिनके ऊपर 10-15 क्रिमिनल केस पेंडिंग है अर्थात जिन लोगों को पुलिस कस्टडी में होना चाहिए था उनको पुलिस द्वारा सुरक्षा प्रदान करवाई जा रही है। कहा जाता है कि ये लोग जुगाड़ करके एलआईयू से फर्जी रिपोर्ट प्राप्त कर लेते है कि इन्हें खतरा है और इस आधार पर इन्हें पुलिस सुरक्षा मिल जाती है और सरकार को इस पर करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते है। यह एक जांच का विषय है कि सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य आधार एलआईयू रिपोर्ट निष्पक्ष रूप से बिना किसी प्रलोभन के दी जाती है, क्योंकि प्राय: यह देखा गया है कि कुछ ऐसे लोगों को वीआईपी सुरक्षा प्रदान कर दी जाती है जिनको इसकी जरूरत नहीं होती।

 

इस देश में आजादी के बाद रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रा नंदन पंत, बिस्मिला खान, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया जैसे अनेक साहित्यकार और पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार जैसे अनेक कलाकार दिए पर इनमें से किसी को भी वीआईपी मानकर कभी वाई या जेड की सुरक्षा नहीं दी गई पर आज शाहरुख खान, सलमान खान या अक्षय कुमार को इतनी सिक्योरिटी क्यों?

आखिर इन लोगों को वीआईपी बनाकर कर सुरक्षा कवच देने का औचित्य क्या है और इन तमाम लोगों को वीआईपी दर्जा देने के लिए करदाताओं के ऊपर करोड़ों का बोझ पड़ता है जो सरासर गलत है। अब समय आ गए है कि सरकार इन वीआईपी सुरक्षा और उनको दिए जाने वाली व अन्य सुविधाओ की समीक्षा करे और देश में वीआईपी लोगों की लाखों की संख्या सीमित करे। यह सही है कि देश ने आतंकवादियों के हाथो एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री खोया है फिर भी वीआईपी सुरक्षा के नाम पर छुट भैये नेताओ की सुरक्षा के नाम पर करोड़ो रुपए बहाना व्यर्थ है।

भारत विश्व में इकलौता देश है जहां थानों में पुलिसकर्मियों का काम होमगार्ड करते है क्योंकि रेगुलर पुलिस कर्मी अधिकांश समय वीआईपी सुरक्षा में व्यस्त रहते और कुछ पुलिसकर्मी थानों में ड्यूटी करने के बजाय अपने उच्च अधिकारियों के बंगलों पर ड्यूटी लगवाकर साहब के बच्चों को स्कूल छोड़ने, कुत्तों को घुमाने का काम पसंद करते है और सरकारी चिकिस्यालों में मरीजों को फरमैसिस्ट और वार्ड बॉय देखते है क्योंकि डॉक्टर्स तो इलाके के वीआईपी और नेताओं की देखरेख में व्यस्त रहते हैं आखिर देश में ये वीआईपी कल्चर कब समाप्त होगी।

गुरुवार, 20 जून 2024

स्वतंत्र पत्रकारों के लिए अपनी आय बढ़ाने के कुछ सुझाव

अपने काम में विविधता लाएं: एक प्रकाशन या आय के स्रोत पर भरोसा करने के बजाय, कई आउटलेट्स पर कहानियों को पिच करने या लेखन, संपादन या परामर्श जैसी विभिन्न प्रकार की सेवाओं की पेशकश करने पर विचार करें।

एक मजबूत ऑनलाइन उपस्थिति बनाएं: अपना काम दिखाने के लिए एक वेबसाइट या ब्लॉग स्थापित करें और संभावित ग्राहकों के लिए आपको ढूंढना आसान बनाएं। आप अन्य पेशेवरों के साथ नेटवर्क बनाने और अपने काम को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का भी उपयोग कर सकते हैं।

एक आला विकसित करें: किसी विशिष्ट क्षेत्र या विषय में विशेषज्ञता आपको अन्य स्वतंत्र पत्रकारों से अलग दिखाने और उच्च दर प्राप्त करने में मदद कर सकती है।

नए कौशल सीखें: लेखन से परे अपने कौशल का विस्तार करने से आप अधिक बिक्री योग्य बन सकते हैं और अपनी कमाई की क्षमता बढ़ा सकते हैं। मल्टीमीडिया पत्रकारिता, डेटा विश्लेषण, या सोशल मीडिया प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में पाठ्यक्रम या कार्यशालाएँ लेने पर विचार करें।

बातचीत की दरें: यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपके काम के लिए आपको उचित मुआवजा दिया जा रहा है, ग्राहकों के साथ दरों पर बातचीत करने से डरो मत।

लंबी अवधि के अनुबंधों पर विचार करें: यदि आपका किसी प्रकाशन या ग्राहक के साथ मजबूत संबंध है, तो लंबी अवधि के अनुबंध पर बातचीत करने से आय का अधिक स्थिर स्रोत मिल सकता है।

मूल्य वर्धित सेवाओं की पेशकश करें: लेखन के अलावा, अन्य सेवाओं की पेशकश करने पर विचार करें जो आपके ग्राहकों के लिए मूल्य जोड़ती हैं, जैसे कि सोशल मीडिया प्रबंधन, पॉडकास्ट उत्पादन या वीडियो उत्पादन।

उच्च-भुगतान वाले ग्राहक खोजें: अनुसंधान करें और ऐसे ग्राहकों की पहचान करें जो गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के लिए उच्च दर का भुगतान करने को तैयार हैं। इसके लिए बड़े, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशनों को पिचिंग करने या किसी विशिष्ट विषय पर ध्यान केंद्रित करने वाले विशेष प्रकाशनों की तलाश करने की आवश्यकता हो सकती है।

अपनी विशेषज्ञता का लाभ उठाएं: यदि आपके पास किसी विशेष क्षेत्र में अनुभव या विशेषज्ञता है, तो उस विषय के बारे में लिखने या उस उद्योग में ग्राहकों को परामर्श सेवाएं प्रदान करने पर विचार करें।

नेटवर्किंग कार्यक्रमों में भाग लें: अन्य पत्रकारों और संभावित ग्राहकों से मिलने के लिए सम्मेलनों, कार्यशालाओं और अन्य उद्योग आयोजनों में भाग लें। संबंध बनाने और संबंध बनाने से भविष्य में काम के अवसर पैदा हो सकते हैं।

अपना काम सीधे बेचें: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपने काम को स्वयं-प्रकाशित करने या अपने लेख सीधे पाठकों को बेचने पर विचार करें। यह विशेष रूप से प्रभावी हो सकता है यदि आपके पास मजबूत अनुयायी या आला दर्शक हैं।

याद रखें, एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपनी आय बढ़ाने में समय और मेहनत लगती है। एक मजबूत नेटवर्क बनाना, अपने कौशल का विस्तार करना और लगातार नए अवसरों की तलाश करना आपको अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है।

द हरिश्चन्द्र
The Harishchandra
+91 82383 22999

देश में बढ़ती वीआईपी कल्चर और उसका दुष्प्रभाव

बसंत कुमार

देश की राजधानी दिल्ली में लगभग डेढ़ दशक पूर्व समाजसेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आंदोलन चलाया जा रहा था और और इस आंदोलन की आड़ में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, जनरल वीके सिंह, गोपाल राय, संजय सिंह और न जाने कितने नेता आये और मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री. उप राज्यपाल, प्रदेश में मंत्री बनने में सफलता प्राप्त की। उस समय इन सभी नेताओ ने सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक आदर्शों को अपनाने और वीआईपी कल्चर से दूर रहने की बात की थी। अरविंद केजरीवाल ने खुले मंच से ऐलान किया था कि जब मैं जीवन में मंत्री या मुख्यमंत्री बनूंगा तो न सरकारी बंगला लूंगा, न सुरक्षा लूंगा और न ही सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल करूंगा। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने किए गए वायदों को झुठलाते हुए करोड़ों रुपए खर्च करके आलिशान बंगला तैयार कराया और इतनी बड़ी सुरक्षा ली कि जब दिल्ली की सड़कों पर उनका काफिला चलता है तो कि यह अन्ना हज़ारे के आंदोलन से निकला एक व्यक्ति नहीं बल्कि किसी स्टेट का महाराजा निकल रहा है और जहां तक शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने की बात है तो शराब घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में स्वयं केजरीवाल, उनके उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और एक मंत्री सतेंद्र जैन जेल में है और एक सांसद जमानत पर जेल के बाहर हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जिस वीआईपी कल्चर को हटाने के वादे पर अरविंद केजरीवाल को लोगों ने तीन-तीन बार मुख्यमंत्री चुना, क्या भारतीय समाज से यह हट सकता है, क्योंकि देश में लाखों वीआईपी लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के नाम पर लाखों पुलिस कर्मी लगा दिये जाते है और लोगों की सुरक्षा राम जी के भरोसे चलती है।

इस वीआईपी कल्चर ने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व के देशों को प्रभावित किया है। विगत 10-15 वर्षों में जिस प्रकार से इस समस्या ने भारत की अर्थव्यवस्था एवं लॉ एंड ऑर्डर को प्रभावित किया है वह चिंतनीय है। विश्व के सबसे विकसित राज्य अमेरिका में वीआईपी की संख्या 252 है, फ्रांस में कुल 109 वीआईपी है, जापान में कुल 125 वीआईपी है, रूस में 312, जर्मनी में 142 और आस्ट्रेलिया में 205 वीआईपी है परंतु भारत जहां देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो मुफ्त राशन पर गुजारा करती है वहां पर इन वीआईपी लोगों की संख्या 5,79,092 है और सरकार को इनकी सुरक्षा, मुफ्त हवाई यात्रा, चिकित्सा आदि पर करोड़ों रुपये खर्च करना पड़ता है। हमारे देश में कुछ वीआईपी उम्र के ऐसे पड़ाव पर है जिनके पास यम राज के अलावा और कोई नहीं आने वाला पर उनकी सुरक्षा के लिए वाई प्लस और जेड प्लस सुरक्षा के नाम पर दर्जनों पुलिस कर्मी सुरक्षा का घेरा बनाये रखते है।

जिन गुंडों और भूमाफियाओ के आतंक से पूरा समाज डरा और सहमा रहता है और ये लोग जहां खड़े हो जाते हैं तो भय वश लोग उनके पैर छूने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लाइन लगा देते है और इन गुंडों भूमाफियाओ की सुरक्षा में तैनात वर्दीधारी पुलिस कर्मी इनका बैग पकड़े खड़ा रहता है, इन स्वयंभू वीआईपी लोगों की सुरक्षा इतनी आवश्यक होती हैं कि थाने में स्टाफ है या नहीं इसकी परवाह नहीं करते, यदि कही थाने में इमर्जेंसी में पुलिस फोर्स की आवश्यकता पड़ जाए तो थानाध्यक्ष स्टाफ न होने की अपनी लचरि बता देता है, क्योंकि अधिकांश फोर्स तो इन फर्जी वी आई पीयो की सुरक्षा और सेवा में लगी होती है। कैसी त्रासदी है कि जो पुलिस फोर्स आम जनता की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी वह उन नागरिको की सुरक्षा में मौजूद रहने के बजाय क्षेत्र में दौरे पर आये सांसदो और मंत्रियों की सेवा सुसरुशा में खड़ी रहती है। आखिर यह वीआईपी कल्चर भारत जैसे लोकतंत्रिक देश में पूरे सिस्टम का सत्यानाश कर देगी।

सांसदो, मंत्रियों, उच्च अधिकारियों की बात तो छोड़ दीजिये, उन छुट भैये नेताओ जो जीवन में कभी कभी सांसद, विधायक या पार्षद नहीं बने उन्हें सिर्फ जनता के उपर रोब जमाने के लिए पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराना और वीआईपी स्टेट्स देना कितना हाष्यास्पद् लगता है, मैने अपनी आँखों से ऐसे नेताओ को मिली पुलिस सुरक्षा देखा है जिनके उपर 10-15 क्रिमिनल केस पेंडिंग है अर्थात जिन लोगों को पुलिस कस्टडी में होना चाहिए था उनको पुलिस द्वारा सुरक्षा प्रदान करवाई जा रही है। कहा जाता है ये लोग जुगाड़ करके एल आई यू से फर्जी रिपोर्ट प्राप्त कर लेते है कि इन्हे खतरा है और इस आधार पर इन्हे पुलिस सुरक्षा मिल जाती है और सरकार को इस पर करोड़ो रुपए खर्च करने पड़ते है। यह एक जांच का विषय है कि सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य आधार एलआईयू रिपोर्ट निष्पक्ष रूप से बिना किसी प्रलोभन के दी जाती है, क्योंकि प्राय: यह देखा गया है कि कुछ ऐसे लोगों को वीआईपी सुरक्षा प्रदान कर दी जाती है जिनको इसकी जरूरत नहीं होती।

इस देश में आजादी के बाद राम धारी सिंह दिनकर, सुमित्रा नंदन पंत, बिस्मिला खान, प. हरि प्रसाद चौरसिया जैसे अनेक साहित्यकार और पृथ्वी राज कपूर, दिलीप कुमार जैसे अनेक कलाकार दिये पर इनमे से किसी को भी वीआईपी मानकर कभी वाई या जेड की सुरक्षा नहीं दी गई पर आज शाहरुख खान, सलमान खान या अक्षय कुमार को इतनी सिक्योरिटी क्यों?

आखिर इन लोगों को वीआईपी बनाकर कर सुरक्षा कवच देने का औचित्य क्या है और इन तमाम लोगों को वीआईपी दर्जा देने के लिए करदाताओं के ऊपर करोड़ों का बोझ पड़ता है जो सरासर गलत है, अब समय आ गए है कि सरकार इन वीआईपी सुरक्षा और उनको दिये जाने वाली व अन्य सुविधाओं की समीक्षा करे और देश में वीआईपी लोगों की लाखों की संख्या सीमित करे। यह सही है कि देश ने आतंकवादियों के हाथों एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री खोया है फिर भी वीआईपी सुरक्षा के नाम पर छुटभैये नेताओ की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए बहाना व्यर्थ है।

भारत विश्व में इकलौता देश है जहां थानों में पुलिसकर्मियों का काम होम गार्ड करते है क्योंकि रेगुलर पुलिस कर्मी अधिकांश समय वीआईपी सुरक्षा में व्यस्त रहते और कुछ पुलिस कर्मी थानों में ड्यूटी करने के बजाय अपने उच्च अधिकारियों के बंगलों पर ड्यूटी लगवा कर साहब के बच्चों को स्कूल छोड़ने, कुत्तों को घुमाने का काम पसंद करते है और सरकारी चिकित्सालयों में मरीजों को फरमैसिस्ट् और वार्ड बॉय देखते है क्योंकि डॉक्टर्स तो इलाके के वीआईपी और नेताओ की देखरेख में व्यस्त रहते हैं आखिर देश में ये वीआईपी कल्चर कब समाप्त होगी।

मंगलवार, 18 जून 2024

पत्रकार आकिल हुसैन के पिता मो. जफर हुसैन हुए सपुर्द-ए-ख़ाक, लोगों में शोक की लहर


  • सोमवार देर रात अचानक हुआ निधन

  • शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का लगा तांता

  • नमाज-ए-जनाजा में हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे

  • काफी संख्या में सामाजिक व राजनीतिक लोग उनके निवास स्थान पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त करने पहुंचे

  • गांव में ही उनके अपने निजी कब्रिस्तान में किया गया सपुर्द-ए-ख़ाक

   

संवाददाता

इजरा। मधुबनी जिले के रहिका प्रखंड के इजरा पंचायत की मुखिया जाहिदा खातुन के पति व आकाशवाणी के जिला संवाददाता आकिल हुसैन के पिता मो. जफर हुसैन (70) का सोमवार रात के आकस्मिक निधन हो गया। निधन की खबर सुनते ही लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।

मो. जफर हुसैन के निधन की खबर सुनकर काफी संख्या में सामाजिक व राजनीतिक लोग उनके निवास स्थान पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त करने पहुंचे। स्वर्गीय मो. जफर हुसैन के शव को गांव में ही उनके अपने निजी कब्रिस्तान में दफन किया गया। उनके नमाज-ए-जनाजा में हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे।

स्वर्गीय मो. जफर हुसैन अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। स्वर्गीय मो. जफर हुसैन के बड़े बेटे मो. आदिल हुसैन गांव के ही मध्य विद्यालय में शिक्षक हैं जबकि छोटे बेटे मो. आकिल हुसैन पेशे से मधुबनी न्यायालय में बतौर अधिवक्ता व आकाशवाणी में जिला संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।

स्वर्गीय मो. जफर हुसैन के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों में आरजेडी के राज्यसभा सांसद डॉ. फैयाज अहमद, पूर्व मंत्री विधायक समीर महासेठ, नगर निगम के डिप्टी मेयर अमानुल्लाह खान, मिथिला टीचर ट्रेनिंग कॉलेज के डायरेक्टर हाफिज नियाज अहमद, क्रिप्स अस्पताल के चेयरमैन इम्तियाज नूरानी, पूर्व प्रमुख अब्दुल सलाम, मुखिया सनाउल्लाह, हेमंत सिंह, मनोज कुमार पूर्वे, हनुमान राउत, ब्रिलिएंट इंटरनेशनल स्कूल के अध्यक्ष अब्दुल हैई, राजद के युवा नेता आरिफ अंबर जिलानी, पत्रकार शैलेन्द्र कुमार, राम शरण साहु, मो. अली, मो. मुन्ना, अखलाक सिद्दीकी, मो. फिरोज, आर नेहाल, अशोक कुमार, अधिवक्ता सैफुल इस्लाम, पवन कुमार, कमरुल हुदा, तमन्ने, महताब आलम, कमालुददीन, मौलाना अनीसुर रहमान, आकिल अंजुम, नजरे आलम, मो. कामिल, असलम अंसारी, इश्तियाक समेत अन्य शामिल रहे।

 



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