मंगलवार, 19 मार्च 2024

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 'CAA पर 3 हफ्ते में जवाब देने को कहा', अगली सुनवाई 19 अप्रैल को

नई दिल्ली। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं 200 से ज्यादा याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान सीजेआई ने आदेश दिया कि जवाब दाखिल करने के लिए सरकार ने चार हफ्ते का समय मांगा है. लेकिन कोर्ट उन्हें तीन हफ्ते का मोहलत देती है। 

सुनवाई को दौरान वकील कपिल सिब्बल ने किसी को भी नागरिकता ना देने का गुहार लगाई. सिब्बल ने कहा कि कोर्ट ने 19 अप्रैल को अगली सुनवाई की तारीख तय की है. इस बीच अगर नागरिकता दी जाती है तो हम दोबारा कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे. बता दें कि सीएए के खिलाफ याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है।

सीएए को भारत की संसद ने 11 दिसंबर, 2019 को पारित किया था. यह कानून व्यापक बहस और विरोध का विषय रहा है. सीएए, 1955 के नागरिकता अधिनियम में संशोधन करता है. यह कानून अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाई समुदायों से आने वाले उन प्रवासियों के लिए भारतीय नागरिकता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है, जो अपने संबंधित देशों में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हैं और 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत में प्रवेश कर चुके हैं।

पिछले हफ्ते, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आईयूएमएल की याचिका का उल्लेख करते हुए कहा था कि चुनाव नजदीक हैं. इसलिए सीएए संसद से पारित होने के चार साल बाद नियमों को अधिसूचित करना सरकार की मंशा को संदिग्ध बनाता है।

कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि सीएए धर्म के आधार पर मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करता है. उन्होंने यह तर्क दिया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत 'समानता के अधिकार' का उल्लंघन करता है. याचिकाकर्ताओं में केरल की इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML), तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस नेता देबब्रत सैकिया, एनजीओ रिहाई मंच और सिटीजन्स अगेंस्ट हेट, असम एडवोकेट्स एसोसिएशन और कुछ कानून के छात्र शामिल हैं।

शनिवार, 16 मार्च 2024

जहां अंधेरा वहां उजाला कार्यक्रम के अंतर्गत 28 पोलों पर विधायक अनिल वाजपेयी ने लगवाई स्ट्रीट लाइटें

संवाददाता

नई दिल्ली। गांधी नगर विधानसभा के विधायक अनिल वाजपेयी ने अपनी विधानसभा में जहां अंधेरा वहां उजाला कार्यक्रम के अंतर्गत समेत सभी 28 पोलो का लाइट समेत स्विच दबाकर स्थानीय लोगों से उद्घाटन कराया। विधायक के दौरे के समय जहां-जहां लोगों ने डार्क स्पॉट की बात की वहां-वहां लाइट शुरू करा दी। उपस्थित सभी लोगों ने विधायक का व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद किया।
जहां एक और विधायक ने पोल समेत लाइट लगवाई वहीं दूसरी ओर शास्त्री पार्क वार्ड के क्लस्टर झुग्गी झोपड़ी में 21.28 लाख रुपए की लागत से सारी सड़क और टॉयलेट के सौंदर्याकरण और 17.36 लाख रुपए की लागत से चंद्रपुरी क्लस्टर कैलाश नगर में और देवलोक गली बनने का उदघाटन किया। विधायक अनिल वाजपेयी ने बताया कि लगभग एक करोड़ की लागत से ये सारे कार्य कराए जा रहे हैं। श्री वाजपेयी ने बताया कि लगभग 2 करोड़ 73 लाख रुपए की लागत से अभी भी कार्यों की फाइल गूगल मैपिंग की वजह से रुकी हुई है जल्दी ही उसका भी समाधान हो जाएगा। इस अवसर पर पूजा शर्मा, भरत भदौरिया, मोहम्मद अम्मान, ऋषि राय अरुण मिश्रा, शैलेन्द्र शर्मा, गौरव जैन, संजय गुप्ता, दीपक गुप्ता, चमन भारद्वाज, अजय शर्मा सुनील प्रधान समेत काफी संख्या में आरडब्ल्यूए के लोग उपस्थित थे।
 
 

 

 
 

 


 

 

शुक्रवार, 15 मार्च 2024

जामिया ने किया सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर ग्लोबल कॉन्क्लेव का आयोजन

नई दिल्ली। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अर्थशास्त्र विभाग ने 6-7 मार्च 2024 के दौरान सतत विकास लक्ष्यः प्रगति, चुनौतियां और आगे की रणनीति पर वैश्विक कॉन्क्लेव का आयोजन किया। कॉन्क्लेव की शुरुआत अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर अशरफ इलियान की स्वागत टिप्पणी के साथ हुई। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के पूर्व निदेशक प्रोफेसर पार्थ सेन ने अध्यक्षीय भाषण दिया।

प्रो. सेन ने सरकार के परस्पर विरोधी उद्देश्यों पर जोर दिया, यानी, एक तरफ सरकारें सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) हासिल करना चाहती हैं और दूसरी तरफ सरकारों को राजकोषीय और मौद्रिक संतुलन हासिल करने की भी जरूरत है। जबकि एसडीजी की प्राप्ति में सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा इत्यादि जैसे स्टॉक चर का एक निश्चित न्यूनतम स्तर प्राप्त करना शामिल है जो अर्थव्यवस्था के निरंतर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालाँकि, हर लगातार अवधि में राजकोषीय और मौद्रिक संतुलन हासिल करने की आवश्यकता सरकार को खर्च और ऋण में कटौती करने के लिए मजबूर करती है। जबकि ग्लोबल नॉर्थ ने अपने स्टॉक वेरिएबल्स की समस्या को बड़े पैमाने पर हल कर लिया है और विशेष रूप से प्रवाह वेरिएबल्स के मैक्रो संतुलन के प्रबंधन के बारे में चिंतित है, ग्लोबल साउथ अपने स्टॉक वेरिएबल्स में सुधार के लिए संघर्ष कर रहा है जो मोटे तौर पर मानव विकास संकेतकों द्वारा कैप्चर किए गए हैं।

एशिया और प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (यूएन-ईएससीएपी), दक्षिण और दक्षिण पश्चिम एशिया कार्यालय के उप प्रमुख और वरिष्ठ आर्थिक मामलों के अधिकारी डॉ. राजन सुदेश रत्न ने अपने उद्घाटन भाषण में इस बात की सराहना की कि एसडीजी और दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति और संगठन की जिम्मेदारी प्रासंगिक हैं। उन्होंने दोहराया कि हम यूएन-ईएससीएपी रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र में 89% संकेतकों के लक्ष्य हासिल करने से बहुत दूर हैं। एसडीजी की उपलब्धि में देशों के सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान करते हुए, उन्होंने सरकारों को साक्ष्य आधारित नीतिगत हस्तक्षेप करने में मदद करने में शोधकर्ताओं की भूमिका पर जोर दिया।

श्री उचिता डी जोयसा, अध्यक्ष, ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी सॉल्यूशंस (जीएलओएसएस), कार्यकारी निदेशक, सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एम्प; डेवलपमेंट (सीईडी), कोलंबो, श्रीलंका ने कहा कि धीमी और असंतोषजनक प्रगति के बावजूद, एसडीजी के पीछे मूल विचार वैश्विक चुनौतियों के बारे में सोचने के मामले में दुनिया को बदलना है, न कि केवल देशों द्वारा लक्ष्य हासिल करना।

उ‌द्घाटन सत्र के बाद, पहला पूर्ण सत्र प्रतिष्ठित वक्ताओं जैसे प्रो. अचिन चक्रवर्ती, पूर्व निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज कोलकाता, प्रो. संतोष मेहरोत्रा, पूर्व अध्यक्ष, सेंटर फॉर इनफॉर्मल सेक्टर एंड लेबर स्टडीज, जेएनयू, नई दिल्ली और विजिटिंग प्रोफेसर, सेंटर फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स, यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ, यूके, प्रोफेसर कविता राव, निदेशक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) और डॉ. तौहिदुर रहमान, संस्थापक निदेशक, इनिशिएटिव फॉर एजेंसी एंड डेवलपमेंट (आईएफएडी) और एसोसिएट प्रोफेसर, कृषि और संसाधन  अर्थशास्त्र विभाग, एरिज़ोना विश्वविद्यालय, संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) के साथ शुरू हुआ। प्रोफेसर अचिन ने एसडीजी से संबंधित लक्ष्य संकेतकों के लिए अत्यधिक प्रासंगिक मुद्दों का विश्लेषण करने के लिए पेशेवर आर्थिक सिद्धांत में नवीनतम प्रगति का उपयोग करने पर जोर दिया। प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा ने तर्क देते हुए सुसंगत कहानी बुनी कि यदि मानव विकास आर्थिक विकास से पहले होता है तो हमें गरीबी और असमानता पर एसडीजी लक्ष्यों को प्राप्त करने की अधिक संभावना है। प्रोफेसर कविता राव ने एसडीजी के लिए प्रासंगिक खर्च की एक समान परिभाषा और माप प्राप्त करने में कठिनाई को रेखांकित किया। डॉ. तौहिदुर रहमान ने एसडीजी की उपलब्धि में लैंगिक आयामों को तर्कसंगत बनाने का प्रयास किया। उन्होंने तर्क दिया कि भारत में महिला श्रम बल भागीदारी में प्रगति की कमी मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि हम उन लिंग मानदंडों को संबोधित करने में सक्षम नहीं हैं जो महिलाओं की स्वायत्तता और एजेंसी में बाधा डालते हैं।

सम्मेलन के दूसरे पूर्ण सत्र की अध्यक्षता जेएनयू के प्रो. प्रवीण झा ने की। प्रोफेसर अरुण कुमार, पूर्व प्रोफेसर, जेएनयू, प्रोफेसर जॉयश्री रॉय, निदेशक-स्मार्ट सेंटर, एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एआईटी), थाईलैंड। इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) के प्रोफेसर श्रीजीत मिश्रा सत्र में वक्ता थे। सत्र का फोकस स्थिरता में जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर था। प्रोफेसर अरुण कुमार ने वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति की ओर संकेत किया जो सतत विकास के लिए एक बड़ी बाधा के रूप में कार्य करती है। इसी तरह, प्रो. श्रीजीत मिश्रा ने करंट साइंस ग्लोबल रिएक्शन टू सीओवीआईडी में अपने हालिया प्रकाशन से साक्ष्य का उपयोग करते हुए कहा कि सीओवीआईडी जैसे वैश्विक पॉली संकटों की प्रतिक्रिया में ठोस साक्ष्य आधार होना चाहिए और संकट के लिए आनुपातिक होना चाहिए।

प्रो. जॉयश्री की प्रस्तुति में भारत के मेट्रो शहरों में परिवेश के तापमान और आर्द्रता को देखते हुए मैनुअल श्रमिकों के लिए व्यावहारिकता की जांच करने की कोशिश की गई। उन्होंने पाया कि एयर कंडीशनिंग जैसे चरम समाधानों तक किसी भी वर्ष में 90% से अधिक दिन गैर-कार्य योग्य क्षेत्र में रहते हैं।

कॉन्क्लेव का तीसरा पूर्ण सत्र फिर से हमारे समय के अत्यधिक प्रतिष्ठित विद्वानों से खचाखच भरा हुआ था। प्रोफेसर एस महेंद्र देव, वर्तमान में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) के संपादक और इंदिरा गांधी और विकास अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक और कुलपति ने सत्र की अध्यक्षता की। प्रोफेसर नानक काकवानी, पूर्व प्रमुख, अर्थशास्त्र विभाग, साउथ वेल्स विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया, प्रोफेसर गौरव दत्त, मोनाश विश्वविद्यालय और प्रोफेसर अमिताभ कुंडू, पूर्व डीन, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, जेएनयू सत्र में वक्ता थे। प्रो. काकवानी ने बताया कि हालांकि एसडीजी के लिए 169 लक्ष्य संकेतक हैं, हमारे पास सभी देशों के लिए उन सभी को ट्रैक करने के लिए सीमित डेटा है। ऐसे सारांश उपाय करना उपयोगी है जो यह आकलन कर सकें कि कोई समाज समग्र रूप से कैसा प्रदर्शन कर रहा है।

उन्होंने समावेशी विकास, समावेशी विकास, गरीब-समर्थक विकास और गरीब-समर्थक विकास नामक चार उपाय प्रस्तावित किए। प्रो. अमिताभ कुंडू ने तर्क दिया कि किसी निश्चित समय पर गरीबी का आकलन उपभोग के साथ साथ बहुआयामी गरीबी का उपयोग करके किया जाना चाहिए। किसी एक पर विशेष रूप से निर्भर रहने से अंधे धब्बे पैदा हो सकते हैं जिससे नीति निर्माताओं के लिए गरीबी के विभिन्न आयामों को संबोधित करना कठिन हो जाएगा। प्रोफेसर गौरव दत्त ने 70 के दशक की शुरुआत से गरीबी के विकास का पता लगाया। उन्होंने पहचाना कि 1990 के दशक के दौरान गरीबी में गिरावट तेज हो गई। उन्होंने खपत की माप में कई डेटा गैप्स पर भी प्रकाश डाला।

तीन पूर्ण सत्रों के अलावा कॉन्क्लेव में 14 तकनीकी सत्र शामिल थे, जिनमें से प्रत्येक सत्र में औसतन 5 पेपर थे, कुल मिलाकर 70 से अधिक पेपर थे। प्रस्तुत पत्रों में आवर्ती विषय स्थानीय पर्यावरण और वैश्विक जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ, सभ्य रोजगार सृजन में चुनौतियाँ, गरीबी और पोषण और विशिष्ट जनसंख्या समूहों द्वारा सामना किए जाने वाले स्वास्थ्य मुद्दे थे।

समापन समारोह में डॉ. जकारिया सिद्दीकी, एसोसिएट प्रोफेसर एवं डॉ. जामिया के अर्थशास्त्र विभाग के सम्मेलन संयोजक ने रिपोर्टर्स रिपोर्ट का एक संक्षिप्त संस्करण प्रस्तुत किया, जिसके बाद प्रोफेसर रवि श्रीवास्तव, पूर्व प्रोफेसर, सीएसआरडी, जेएनयू ने समापन भाषण दिया। उन्होंने सम्मेलन के दो दिनों के दौरान विचार विमर्श के महत्व पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से एसडीजी की प्रगति का आकलन करने में पेशेवर अर्थशास्त्र के उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया। प्रोफेसर अब्दुल शाबान अध्यक्ष, सीपीपीएचएचडी, टीआईएसएस, मुंबई ने इस अवसर की शोभा बढ़ाई और कॉन्क्लेव के प्रमुख क्षणों को दोहराया। उन्होंने एसडीजी में प्रगति का आकलन करने में डेटा और माप संबंधी मुद्दों पर विशेष रूप से जोर दिया।

सतत विकास के लिए राष्ट्रीय अभियान के कार्यकारी निदेशक, श्री दया सागर श्रेष्ठ ने सम्मेलन में विभिन्न हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रयास करने के लिए अर्थशास्त्र विभाग को बधाई दी। उन्होंने इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला कि नागरिक समाज और शैक्षणिक संस्थानों के बीच आदान प्रदान ज्ञान वृद्धि के एक अच्छे चक्र को बढ़ावा दे सकता है। इस कार्यक्रम का व्यवस्थित समन्वय जेएमआई के अर्थशास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद काशिफ खान द्वारा किया गया। कॉन्क्लेव का समापन जेएमआई के अर्थशास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. वसीम अकरम द्वारा दिए गए धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

मैं हूं मोदी का परिवार नारा विपक्ष के लिए पड़ सकता है भारी

अवधेश कुमार

मैं हूं मोदी का परिवार टैगलाइन 2024 के चुनाव का एक प्रमुख नारा बन गया है। यह वैसे ही है जैसे 2019 लोकसभा चुनाव में में मैं हूं चौकीदार एक बड़ा नारा बना और सर्वे बताते हैं कि उसका असर लोकसभा चुनाव पर हुआ। आम धारणा यही है कि मैं हूं मोदी का परिवार 2024 लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मतदान करने की प्रक्रिया निर्धारित करने का एक कारक बन सकता है। 3 मार्च को बिहार की राजधानी पटना में गठबंधन की रैली में लालू प्रसाद यादव जी ने कल्पना नहीं की होगी कि वह जो कुछ बोल रहे हैं उसकी ऐसी प्रतिक्रिया हो सकती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा परिवारवाद पर हमला करने का अपने तरीके से जवाब ही दिया था। उसमें यह पूछने की क्या आवश्यकता थी कि मोदी बताएं कि उनका कोई परिवार क्यों नहीं है ,संतान क्यों नहीं है? वह यहां तक चले गए कि कह दिया कि नरेंद्र मोदी हिंदू भी नहीं है। माता-पिता की मृत्यु पर उनके बच्चे अपने बाल दाढ़ी सब साफ करवाते हैं जबकि उन्होंने नहीं किया। ऐसे हमले पर प्रतिहमला बिलकुल स्वाभाविक था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे हमले का आक्रामक और लोगों के दिलों को स्पर्श करने वाली भाषा शैली में प्रत्युत्तर देने में प्रवीण है। इसलिए उन्होंने कहा कि आज इंडी गठबंधन के लोग, जो परिवारवाद, भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, वह मुझसे मेरे परिवार के बारे में पूछते हैं, 140 करोड़ भारतीय ही मेरा परिवार है। इस तरह भाजपा के पास विरोधियों विशेषकर आईएनडीआईए गठबंधन के विरुद्ध एक बड़ा मुद्दा हो गया है।

2019 आम चुनाव के पहले से राहुल गांधी राफेल विमान को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसी तरह निशाने पर ले रहे थे। उन्होंने चौकीदार चोर है का नारा लगाया था। चौकीदार चोर है के समानांतर प्रधानमंत्री ने मैं भी चौकीदार का नारा दिया और देखते-देखते भाजपा नेताओं कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने सोशल मीडिया पर मैं भी चौकीदार में अपना परिचय लिख दिया। राहुल गांधी और पूरे विपक्ष के लिए यह उल्टा पड़ गया। प्रश्न है कि क्या मैं हूं मोदी का परिवार नारा भी  विपक्ष के लिए फिर उल्टा पड़ जाएगा?

यह ऐसा भावनात्मक विषय है जो लोगों के दिलों पर सीधा असर डालता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब कहते हैं कि हमने देश के लिए अपना जीवन लगाया है और अंतिम सांस तक देश हित में लगा दूंगा तो एक बड़ा समूह इसे स्वीकार करता है।

अगर चुनाव को कुछ समय के लिए परे रख दें तब भी यह विचार करना चाहिए कि क्या किसी व्यक्ति पर इस तरह की टिप्पणी उचित है? हमारे देश में अविवाहित रहकर यानी परिवार न बसा कर या परिवार का त्याग कर देश, समाज, धर्म की सेवा या आत्म साधना में जीवन लगाने वालों की बड़ी संख्या है। राजनीति में सभी विचारधाराओं में ऐसे लोग रहे हैं जिनका सम्मान समाज में हमेशा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार इस मामले में इसलिए शीर्ष पर हैं क्योंकि वहां जीवनदानी प्रचारकों की सबसे ज्यादा संख्या है और भाजपा सहित सभी संगठनों में ऐसे लोग हैं। समाजवादियों में भी ऐसे लोग रहे हैं। समाजवादी नेताओं ने भी अपने जीवन काल में वंशवाद और परिवारवाद को बड़ा मुद्दा बनाया, पर प्रत्युत्तर में इस तरह उनके परिवार न होने पर किसी ने प्रश्न नहीं उठाया। उठाया भी नहीं जाना चाहिए।

नरेंद्र मोदी आज प्रधानमंत्री हैं तो लगता है कि उनके पास सारे सुख साधन हैं और इसलिए हमला करने पर लोग प्रभावित हो जाएंगे। उन्होंने जब परिवार से परे होकर संघ का प्रचारक बनकर अपनी विचारधारा के अनुरूप राष्ट्र सेवा का व्रत लिया होगा तो इसकी कल्पना नहीं रही होगी की राजनीति में किसी समय में शीर्ष पर जा सकते हैं। उस समय जनसंघ या बाद में भाजपा की हैसियत इतनी बड़ी नहीं थी और जितनी थी उनमें बड़े कद के नेताओं की भी इतनी लंबी कतार थी कि देश एवं अनेक राज्यों की सत्ता में आने पर शीर्ष नेता होने का सपना संजोए जाए। सैंकड़ों की संख्या में ऐसे जीवन दानी संघ परिवार के साथ-साथ अनेक गैर राजनीतिक राजनीतिक संगठनों में लोग पहले भी थे और आज भी हैं। या देश का दुर्भाग्य है कि हम राजनीतिक तू तू मैं मैं इस विषय को घसीटते हैं। वह भी इसलिए क्योंकि नेताओं के द्वारा अपने परिवार के लोगों को राजनीति में शीर्ष पर स्थापित करने, बनाए रखने और आगे बढ़ाने के अपकर्म पर प्रश्न उठाया जा रहा।

वास्तव में आज पार्टियों में एक ही परिवार से निकले हुए लोगों के हाथों नेतृत्व और निर्णय की मुख्य कमान रहने राजनीति का  सबसे बड़ा रोग बना हुआ है। इसके कारण योग्य, ईमानदार, सक्षम और समर्पित लोगों का उनकी क्षमता के अनुसार राजनीति में अवसर मिलना बाधित है। व्यवस्था में ऐसे लोग भी परिवारवादी नेतृत्व के समक्ष नतमस्तक होकर हां में हां मिलाने और अपने को उनके साथ एडजस्ट करने को विवश हैं। ज्यादातर परिवारवादी नेतृत्व ने सत्ता का हर स्तर पर दुरुपयोग किया है। देख लीजिए इनमें ज्यादातर के परिवार या वे स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं। लालू प्रसाद यादव को तो चारा घोटाले के तीन मामलों में सजा भी मिल चुकी है।

किसी राजनीतिक परिवार से अगली पीढ़ी का राजनीति में सक्रिय होना और परिवार के हाथों ही नेतृत्व सिमटे रहने में मूलभूत अंतर है। परिवारवादी नेतृत्व वालों पर हमला होगा या उनकी आलोचना होगी तो निश्चित रूप से वे तिलमिलाएंगे। इसका उत्तर यह नहीं हो सकता जो लालू प्रसाद यादव जी ने दिया है। यह राजनीतिक विरोधियों की आलोचना आलोचना के संदर्भ में स्थापित मर्यादाओं का दुर्भाग्यपूर्ण अतिक्रमण है। हालांकि लालू यादव के वक्तव्य का सही अर्थ समझना भी कठिन है। वे कहते हैं कि जिनके ज्यादा बच्चे हैं उन पर वह प्रश्न उठते हैं और कहते हैं कि परिवारवाद को बढ़ावा दे रहा है तो वह बताएं कि उनके परिवार क्यों नहीं है? प्रधानमंत्री मोदी ने अपने तरीके से बता दिया कि उनका परिवार क्यों नहीं है। उनके पार्टी और समर्थकों ने बता दिया कि उनका एक बड़ा परिवार है। लगातार वह बोल रहे हैं कि देश ही मेरा परिवार है और जिसका कोई नहीं है उसका मैं हूं और वह मेरा है। इसका लालू प्रसाद यादव और उनके समर्थकों के पास क्या उत्तर हो सकता है? जो उत्तर वह देंगे या दे रहे हैं क्या वह लोगों के अंतर्मन को वाकई छु पाएगा? कतई नहीं।

सच यही है कि परिवारवादी नेतृत्व या परिवार के कारण योग्य अक्षम लोगों का राजनीति में प्रभावी होने जैसी दुष्प्रवृत्ति का कोई सकारात्मक उत्तर दिया ही नहीं जा सकता है। जिस मंच पर लालू जी ने प्रधानमंत्री पर हमला किया उसी से उन्होंने अपनी बेटी रोहिणी आचार्य को राजनीति में लॉन्च भी किया। लालू जी का नरेंद्र मोदी पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण व दुखद है। लोकसभा चुनाव में यह उल्टा पड़ जाए तो उसमें किसी को आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। भाजपा के पास आज भी अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की लंबी फौज है जो कहीं न कहीं अपने इर्द-गिर्द भाजपा सहित अलग-अलग संगठनों में जीवनदानी परिवारविहीन लोगों को काम करते देखते हैं और उनके प्रति सम्मान रखते हैं। वे लोग इस तरह के हमले को आसानी से सहन नहीं कर सकते। तो यह मोदी के साथ-साथ लाखों लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाने जैसा है जिसकी प्रतिक्रिया जगह-जगह दिखाई देनी स्वाभाविक है। 

आज किसी भी पार्टी की यह हैसियत नहीं की इतनी बड़ी संख्या के प्रति हमले का समान रूप से सामना कर सके। जिस तरह 2019 में जगह-जगह भाजपा के नेता , समर्थक और कार्यकर्ता मैं हूं चौकीदार का नारा लगाते थे और आम लोग भी उनके साथ आ जाते थे ठीक वही दृश्य इस चुनाव में आने वाले समय में दिखाई पड़ेगा। कार्यकर्ता लोगों के बीच जाएंगे और कहेंगे कि देखिए मोदी जी ने तो देश के लिए अपना जीवन लगा दिया, अपने लिए या अपने रिश्तेदारों के लिए कुछ किया नहीं और लालू प्रसाद यादव तथा आईएनडीआईए गठबंधन के नेता उनके उनको बिना परिवार का बताकर हमला कर रहे हैं तो लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092



गुरुवार, 14 मार्च 2024

नागरिकता संसोधन अधिनियम (सीएए) डॉ. अंबेडकर के सपनो को मूर्त रूप देने का प्रयास

बसंत कुमार
 

अभी केंद्र सरकार ने सीएए का नोटिफिकेशन जारी किया है और कांग्रेस सहित विपक्षी दल इसे चुनावी स्टंट कह रहे है पर यह डा अंबेडकर के सपनो को मूर्त रूप देने का प्रयास है, जैसा सभी जानते है कि जब देश का धार्मिक आधार पर बटवारा हुआ तो डा अंबेडकर पूर्ण जनसंख्या स्थानांतरण की बात करते रहे पर नेहरू और गाँधी के मुस्लिम प्रेम ने डा आंबेडकर के इस सपने को पूरा नही होने दिया। परंतु उसके 75-76 साल बाद प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदीजी ने डा आंबेडकर के पूर्ण जनसंख्या स्थानांतरण के मूल सुझाव को समझते हुए नागरिकता संसोधन (सीएए) के माध्यम से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्प संख्यक समुदाय (हिंदू) को भारत मे नागरिकता देने का प्रावधान किया तो मुस्लिम वोट बैंक के खातिर सभी विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे है। विभाजन की स्थिति में जनसंख्या के पूर्ण स्थानांतरण के लिए डा आंबेडकर ने एक विस्तृत कार्ययोजना बनायी थी, जो उन्होंने अपनी पुस्तक' पाकिस्तान ऐंड पार्टिसन ऑफ इंडिया' के माध्यम से से वर्ष 1940 मे ही सबके सामने रख दी थी।
डॉ. आंबेडकर की योजना थी कि आटोमन सम्राज्य के पश्चात जिस प्रकार से ग्रीक, टर्की और बुल्गारिया के बीच जनसंख्या का स्थानांतरण हुआ, ठीक उसी प्रकार से यह भारत में भी हो सकता था। उन्होंने अपनी योजना मे सम्पति, पेंसन आदि के अधिकारों की अदला बदली की कार्ययोजना भी सामने रखी थी जिसे कांग्रेस ने असंभव कहकर ठुकरा दी, क्योंकि कांग्रेस के नेता हिंदू मुस्लिम गठजोड़ की झूठी कल्पनाओ मे भटक रहे थे। डा आंबेडकर ने एक साफ- सुथरे एवम स्थायी समझौते का स्वरूप सामने रखा पर महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू ने दिवस्वप्न जैसी सुंदर दिखने वाले हिंदू मुस्लिम एकता को छोड़ने से मना कर दिया साथ ही साथ भारत विभाजन के द्वीराष्ट्र के सिद्धांत को पूरी तरह से स्वीकारने के पश्चात् जनसंख्या के पूरी तरह से स्थानांतरण के सिद्धांत को डॉ. आंबेडकर ने यह बता दिया था कि बगैर जनसंख्या के पूर्ण स्थानांतरण के पाकिस्तान बनने पर हिंदू (दलित) पाकिस्तान मे घिर जायेंगे इसलिए विभाजन से पूर्व इन्हे सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था होनी चाहिए, तमाम प्रयासो के बावजूद डा आंबेडकर की योजना व प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया और 1947 के बटवारे के पश्चात पाकिस्तान के अंदर बड़ी संख्या मे अनुसूचित जातियों के अलावा अन्य हिंदू आबादी वहा पर रुक गयी, लेकिन कुछ दिन बाद ही हिंदू मुस्लिम एकता का चेहरा सामने आने लगा, हिंदुओ को धर्म परिवर्तन कराकर मुस्लिम बनाने व उनके साथ मारपीट करने से उनका जीवन दूभर हो गया, देश विभाजन के समय जनसंख्या की पूर्ण अदला बदली न होने से आधे से अधिक मुसलमान भारत में रुक गए जिनकी संख्या बढ़कर 18 करोड़ से उपर हो गयी है और वही पाकिस्तान मे रहने वाले हिंदुओ की संख्या एक करोड़ से घटकर महज चंद हजार रह गयी है।
डॉ. आंबेडकर ने यह सुझाव दिया था कि जनसंख्या के इस स्थानांतरण के लिए एक आयोग का गठन हो जो लोगो की चल अचल संपत्ति, पेंसन नौकरी आदि कि विस्तृत जानकारी तैयार करके लोगो को स्थानांतरित करने मे सहयोग करेगा। उनका मानना था कि जनसंख्या की पूर्ण अदला बदली ही हिंदुस्तान को एक राज्य बना सकती हैं और जब तक यह नही किया जाता तब तक देश मे अल्प संख्यक और बहु संख्यक का कोई समाधान नही निकलेगा, पाकिस्तान मे अल्पसंखक हिंदू हिकारत की जिंदगी जीते रहेंगे और भारत में गरीब मुस्लिम-दलित मुसलमान अलायंस के बल पर सत्ता मे वापसी का सपना देख रहे लोगो द्वारा भ्रमित किये जाते रहेंगे पर दुर्भग्यवश उस समय गाँधी, नेहरू और अन्य कांग्रसी नेताओ ने डॉ. आंबेडकर की बात नहीं मानी और धर्म निरपेक्षता के नाम पर विभाजन के समय लाखों लोगो का नर संहार देखते रहे।
आजादी के सात दशक बाद जब पाकिस्तान मे प्रताड़ित अल्प संख्यक हिंदुओ को सम्मान का जीवन देने के लिए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदीजी द्वारा एक सकरात्मक पहल शुरू की गयी तो बमपंथियो और कांग्रेस के लोगो ने जगह जगह विरोध शुरू कर दिया तथा सीएए की अधिसूचना के खिलाफ जामिया यूनिवर्सीटी और जे एन यू मे भ्रमित युवको द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। जामिया के गेट पर लेफ्ट संगठन आइसा, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एस एफ आई), स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गजेसन ऑफ इंडिया (एस ओ आई) समेत कई संगठन इसका विरोध कर रहे हैं वही दूसरी ओर पाकिस्तान और अफगनिस्तान से आये शरणार्थियों ने सी ए ए लागू होने पर खुशी से होली मनाई और अब ये कह रहे है हम अब गर्व से कह सकते है कि हम भी इस महान देश के वासी है अब इनके बच्चे स्कूल भी जा सकेंगे और आम हिंदुस्तानी की तरह जीवन जी सकेंगे और डा आंबेडकर के इस सपने को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदीजी द्वारा मूर्त रूप देना सचमुच स्वागत योग्य है। 
(लेखक राष्ट्रवादी चिंतक और लेखक हैं।)

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