मंगलवार, 23 जनवरी 2024

मेरा दरवाज़ा खटखटाने का शुल्क

मेरा दरवाज़ा खटखटाने का शुल्क
जिन घरों में मैं अखबार डालता हूं उनमें से एक का मेलबॉक्स उस दिन पूरी तरह से भरा हुआ था, इसलिए मैंने उस घर का दरवाजा खटखटाया। उस घर के मालिक, बुजुर्ग व्यक्ति श्री बनर्जी ने धीरे से दरवाजा खोला।
मैंने पूछा, "सर, आपका मेलबॉक्स इस तरह से भरा हुआ क्यों है?"
उन्होंने जवाब दिया, "ऐसा मैंने जानबूझकर किया है।" फिर वे मुस्कुराए और अपनी बात जारी रखते हुए मुझसे कहा "मैं चाहता हूं कि आप हर दिन मुझे अखबार दें... कृपया दरवाजा खटखटाएं या घंटी बजाएं और अखबार मुझे व्यक्तिगत रूप से सौंपें।"
मैंने हैरानी से प्रश्न किया, " आप कहते हैं तो मैं आपका दरवाजा ज़रूर खटखटाऊंगा, लेकिन यह हम दोनों के लिए असुविधा और समय की बर्बादी नहीं होगी ?"
उन्होंने कहा, "आपकी बात सही है... फिर भी मैं चाहता हूं कि आप ऐसा करें ...... 
मैं आपको दरवाजा खटखटाने के शुल्क के रूप में हर महीने 500/- रुपये अतिरिक्त दूंगा।"
विनती भरी अभिव्यक्ति के साथ, उन्होंने कहा, *"अगर कभी ऐसा दिन आए जब आप दरवाजा खटखटाएं और मेरी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न मिले, तो कृपया पुलिस को फोन करें!"
उनकी बात सुनकर मैं चौंक-सा गया और पूछा, "क्यों सर?"
उन्होंने उत्तर दिया, "मेरी पत्नी का निधन हो गया है, मेरा बेटा विदेश में रहता है, और मैं यहाँ अकेला रहता हूँ । कौन जाने, मेरा समय कब आएगा?"
उस पल, मैंने उस बुज़ुर्ग आदमी की आंखों में छलक आए आंसुओं को देख कर अपने भीतर एक हलचल महसूस कीं ।
उन्होंने आगे कहा, "मैं अखबार नहीं पढ़ता... मैं दरवाजा खटखटाने या दरवाजे की घंटी बजने की आवाज सुनने के लिए अखबार लेता हूं। किसी परिचित चेहरे को देखने और कुछ परस्पर आदान-प्रदान करने के इरादे से....!"
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "नौजवान, कृपया मुझ पर एक एहसान करो! यह मेरे बेटे का विदेशी फोन नंबर है। अगर किसी दिन तुम दरवाजा खटखटाओ और मैं जवाब न दूं, तो कृपया मेरे बेटे को फोन करके इस बारे में सूचित कर देना ..." 
इसे पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि हमारे दोस्तों के समूह में बहुत सारे अकेले रहने वाले बुजुर्ग लोग हैं।
कभी-कभी, आपको आश्चर्य हो सकता है कि वे अपने बुढ़ापे में भी व्हाट्सएप पर संदेश क्यों भेजते रहते हैं, जैसे वे अभी भी बहुत सक्रिय हों ।
दरअसल, सुबह-शाम के इन अभिवादनों का महत्व दरवाजे पर दस्तक देने या घंटी बजाने के अर्थ के समान ही है;  यह एक-दूसरे की सुरक्षा की कामना करने और देखभाल व्यक्त करने का एक तरीका है।
आजकल, व्हाट्सएप बहुत सुविधाजनक है । अगर आपके पास समय है तो अपने परिवार के बुजुर्ग सदस्यों को व्हाट्सएप चलाना सिखाएं!
किसी दिन, यदि आपको उनकी सुबह की शुभकामनाएँ या संदेश नहीं मिलता है, तो हो सकता है कि वे अस्वस्थ हों और उन्हें आप जैसे किसी साथी की आवश्यकता हो ।
(संकलित)

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

सकारात्मक वातावरण सुखद भविष्य का संकेत

अवधेश कुमार

इसमें दो मत नहीं कि देश में अद्भुत राममय वातावरण बना है। बाजारों में श्रीराम से जुड़ी चीजों की खरीदारी की नई प्रवृत्ति देखी जा रही है। बाजार में रामजी के नाम से बने सिक्के, आभूषण वस्त्र आदि की मांग काफी बढ़ी है और इस कारण व्यापारिक गतिविधियां भी। आपको चलते-फिरते किसी ने किसी मोहल्ले में श्री राम जय राम की धुन से लेकर अन्य संकेत मिल जायेंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की कोशिशों से 22 जनवरी के लिए लाखों की संख्या में मंदिरों ने कार्यक्रम की तैयारी की है। कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टियों के वक्तव्य और व्यवहार से निस्संदेह, थोड़ा नकारात्मक वातावरण बना लेकिन यह साफ दिख रहा है कि आम लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया तथा पूरा वातावरण सकारात्मक है। स्वयं कांग्रेस पार्टी के अंदर भी सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा निमंत्रण अस्वीकार करने का संपूर्ण समर्थन नहीं है। इससे पता चलता है कि लगभग तीन दशक बाद पूरे देश का वातावरण अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर कैसा बना है। हालांकि 22 जनवरी के निमंत्रण को लेकर उन लोगों के अंदर थोड़ी निराशा और खीझ है जिन्होंने प्रतिबद्धता के साथ श्रीराम मंदिर के विषय को विपरीत परिस्थितियों में भी मुद्दे के रूप में बनाए रखने के लिए अपने निजी हितों की लगातार बलि चढ़ाई। ऐसे अवसर पर उनकी दुखद अनदेखी तथा ऐसे लोगों को, जिन्होंने या तो विरोध किया या सेक्युलरवाद विरोधी छवि न बने इस कारण खामोश रहे या बीच का रास्ता अपनाया या फिर जिन्होंने इन विषयों का संकुचित स्वार्थ के लिए उपयोग किया उन सबको निमंत्रण द्वारा प्रतिष्ठा देना ऐसे लोगों को कचोट रहा है। किंतु सबके मन में भाव यही है कि ध्वस्त किए गए मानविन्दुओं के 500 वर्षों बाद आध्यात्मिक अतःशक्ति को फिर से पुनर्प्रतिष्ठित करने का समय आया है तो ऐसे में विवाद खड़ा करके सकारात्मक वातावरण को कमजोर न किया जाए।

निश्चित मानिए ऐसे माहौल का संपूर्ण राष्ट्र के वर्तमान एवं भविष्य की दृष्टि से व्यापक प्रभाव होगा। 

तात्कालिक रूप से हम भले यह गणना करें कि आगामी लोकसभा चुनाव में इसका लाभ किसे मिलेगा या इसेसे किनको क्षति होगी, पर श्रीराम के बाल विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा तथा मंदिर के संपूर्ण निर्माण का प्रभाव केवल चुनाव तक सीमित नहीं हो सकता। यह तो साफ है कि जिस पार्टी ने अयोध्या के विवादित स्थल पर श्रीराम मंदिर के पुनर्निर्माण को अपना लक्ष्य घोषित किया, उसके लिए आंदोलन अभियान चलाए उसे मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा तक का श्रेय मिलेगा। जो पार्टियां आज राजनीतिक लाभ के लिए राम का उपयोग करने का आरोप लगातीं हैं उन्हें अपने गिरेबान में झांकने की आवश्यकता है। आखिर इन पार्टियों का ही नहीं, हमारे देश की मीडिया और बुद्धिजीवियों के बड़े समूह का श्रीराम मंदिर आंदोलन के प्रति रवैया क्या रहा? भाजपा ने जब से विवादित स्थल पर श्रीराम मंदिर निर्माण को अपने एजेंडे में शामिल किया तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से विश्व हिंदू परिषद ने इसे आगे बढ़ाया तभी से पूरे परिवार के लिए कम्युनल फोर्सेस यानी सांप्रदायिक शक्तियां शब्द प्रयोग होने लगे। पहले विश्व हिंदू परिषद की एकात्मता यात्रा को जगह-जगह रोकने और बाधित करने की कोशिश हुई और बाद में लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा को। रथ यात्रा के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय तक मामले ले जाए गए। यह अलग बात है कि आडवाणी इतना सधा हुआ भाषण देते थे कि न्यायालय को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक, सांप्रदायिक या किसी कम्युनिटी को भड़काने जैसा नहीं मिला । ज्यादातर समाचार पत्रों-पत्रिकाओं ने इसके विरुद्ध ही तेवर अपनाया तथा कई ने तो अपनी पत्र-पत्रिका को ही राम मंदिर आंदोलन विरोधी अभियान का हिस्सा बना दिया। उस समय टेलीविजन या इंटरनेट का दौर नहीं था इस कारण आपको तब की सामग्रियों के लिए थोड़ी शोध करनी पड़ेगी। ऐसा माहौल बनाया गया मानो संघ और भाजपा देश में हिंदुओं और मुसलमान के बीच संघर्ष कराकर गृह युद्ध की स्थिति पैदा करना चाहती है। चाहे न्यायालय में मुकदमे लड़ने वाले हों या फिर अन्य तरीकों से श्रीराम मंदिर के पक्ष में काम करने वाले , सबका उपहास उड़ाया गया। लेकिन धीरे-धीरे जनता का व्यापक समर्थन मिला और मामला सघन हुआ तो न्यायालय तक में बड़े-बड़े वकील इसके विरोध में खड़े होने लगे।

राजधानी दिल्ली की पत्रकारिता और बौद्धिक क्षेत्र का वातावरण इतना डरावना था कि कोई सामान्य पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, अयोध्या आंदोलन या श्रीराम मंदिर के पक्ष में बोलने का साहस तक नहीं कर सकता था। ऐसा करने का अर्थ था उसके कैरियर का नष्ट हो जाना। कुछ को इसका खामियाजा भुगतना भी पड़ा। 6 दिसंबर, 1992 के बाबरी विध्वंस के बाद राम मंदिर समर्थकों के विरुद्ध आतंककारी वातावरण बन गया था। संघर्ष से जुड़े संगठन प्रतिबंधित थे, भाजपा और विहिप सहित मंदिर आंदोलन के अनेक नेता जेल में थे और उसके साथ ऐसा अभियान चल रहा था ताकि किसी तरह पूरे संगठन परिवार को नष्ट कर दिया जाए। राजधानी दिल्ली में हर दिन कहीं न कहीं गोष्ठियां होती थी जिनमें एक ही तर्क होता था कि योजनाबद्ध तरीके से षड्यंत्र कर ढांचे को ध्वस्त किया गया है। इसे विश्व भर में हिटलर और मुसोलिनी के समानांतर फासिस्टवाद की डरावनी घटना साबित की गई। समाचार पत्र और पत्रिकाओं के पन्ने रंग दिए गए जिनका स्वर ही होता था कि भारत में फासिस्ट मजहबी शक्तियां किस सीमा तक हिंसक हो चुकी है। आज कहा जा रहा है कि राम सबके हैं और मंदिर से किसी का विरोध नहीं है किंतु भाजपा और तत्कालीन बाल ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को छोड़ दीजिए तो किसी भी पार्टी का एक शब्द आपको श्रीराम मंदिर के समर्थन में नहीं मिलेगा। बाबरी विध्वंस के बाद भाजपा की तीन सरकारें बर्खास्त कर दीं गईं और माहौल ऐसा बना जिसमें माना गया कि भाजपा की सत्ता में वापसी नहीं होगी। वैसे विपरीत माहौल में भाजपा के शीर्ष नेताओं में से कुछ के बयानों में काफी नरमी और क्षमायाचना की मुद्रा थी किंतु कुल मिलाकर पार्टी ने अपने एजेंडा से अयोध्या को हटाया नहीं। भाजपा और संघ परिवार के नेता रायबरेली न्यायालय में बाबरी ध्वंस का मुकदमा झेलते रहे तो दूसरी और श्रीराम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद सिविल वाद में भी संगठन परिवार  वादी न होते हुए भी पूरी ताकत लगा दी।   बड़े-बड़े वकील इसी कारण खड़े हुए तब जाकर जिला सिविल न्यायालय से लेकर उच्च और उच्चतम न्यायालय तक मामला गंभीरता से लड़ा जा सका।  

 यह भी स्वीकार करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि केन्द्र में भाजपा की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार नहीं होती तथा उत्तर प्रदेश में गैर भाजपा सरकार होती तब भी मंदिर का निर्माण नहीं हो पता। न्यायालय का फैसला पड़ा रहता। केंद्र में सरकार होते हुए भी प्रदेश सरकार का पूरा सहयोग और समर्थन नहीं होता तब भी इसका निर्माण असंभव था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है, योगी आदित्यनाथ की मंदिर निर्माण के प्रति अटूट आस्था है तथा उनके उपमुख्यमंत्रियों में भी केशव प्रसाद मौर्य विश्व हिंदू परिषद से निकले हैं। इसलिए संकल्प के साथ समय सीमा तय करके मंदिर निर्माण पूरा किया जा रहा है। दिसंबर 2023 या जनवरी 2024 तक गर्भगृह का संपूर्ण निर्माण कर उसमें मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का लक्ष्य तय हुआ और यह साकार हो रहा है। इसमें अगर भाजपा को इसका लाभ मिल रहा है तो इसमें आश्चर्य का कोई विषय नहीं है। दूसरे दलों ने पहले भी इसी तरह का रवैया अपनाया और आज उनके सामने इस ऐतिहासिक कालखंड में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने का अवसर था जिससे वे चूक रहे हैं। किंतु इससे विचलित होने की बजाय प्राण प्रतिष्ठा के साथ  पूरे देश का सकारात्मक माहौल हमारे लिए आत्मसंतोष और प्रेरणा का कारण बनना चाहिए।

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

आगामी लोक सभा चुनावों में मायावती की डगर

बसंत कुमार

अगले कुछ माह में देश में आम चुनाव होने वाले है और एनडीए एवं इंडिया गठबंधनों के लोग अपनी अपनी सियासी गणित बिठाने में लगे हैं पर एक ऐसा चेहरा है जिसके विषय में यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वह किस ओर जायेगी वह है बहुजन समाज पार्टी कीसुप्रिमो सुश्री मायावती। अभी तक यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वह वर्ष 2024 में होने वाले चुनावो में की वो एनडीए अलायंस के साथ जायेगी या विपक्ष के अलायंस इंडिया के साथ जायेगी, इसके कारण जानना इसलिए भी आवश्यक है कि एक समय में देश में 21% आवादी वाले दलित मतदाता इनकी पार्टी के वोट बैंक माने जाते थे जिस प्रकार मुलायम सिंह यादव के समय में यादव मतदाता समाजवादी पार्टी के मतदाता के रूप में जाने जाते थे। आलम यह था कि कांग्रेस और भाजपा सहित अन्य पार्टिया जाटव(चमार) व यादव बस्तियों में प्रचार करने में जाने में कतराती थी और वहा जाकर प्रचार को समय की बर्बादी समझते थे यहाँ तक की भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह ने एक बार खुले तौर पर गैर जाटव और गैर यादव रणनीति को स्वीकार किया था। यह अलग बात है कि मायावती जी ने कभी भी किसी जाटव जाति के नेता को प्रमोट नहीं किया उनके सिपह सलारो में नसिमुद्दी सिद्धिकी, स्वामी प्रसाद मौर्या और सतीश चंद मिश्र आदि रहे अर्थात  जाटव समाज का एक भी नेता उनके सिपह सलारो में कभी नहीं रहा और अंततोगत्वा उन्होंने अपने भतीजे प्रकाश आनंद को को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

फिर भी इंडिया गठबंधन के नेता मायावती को अपने पाले में लाने की भरपूर कोशिश कर रहे है और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल कई मौकों पर इस बात को दोहरा चुके है यद्यपि सपा अद्यक्ष अखिलेश यादव बसपा का इंडिया गठबंधन में विरोध कर रहे है वे वर्ष 2019 में मायावती के साथ गठबंधन का हवाला देते हुए कहते है कि हमारे परम्परा गत वोट तो बसपा उम्मीद वारो को मिल गए पर हमारे प्रत्यासियो को जाटव बिरादरी के लोगो ने वोट देने के बजाय भाजपा उम्मीदवारों को वोट देना बेहतर समझा।

बसपा के संस्थापक काशी राम जीवन भर ब्राह्मण बनिया और ठाकुर की राजनीति का विरोध करते रहे और दलित एवम अति पिछड़ी जातियों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करते रहे परंतु उनकी मृत्यु के पश्चात मायावती ने सतीश चंद मिश्र के साथ मिलकर जाटव- ब्राह्मण अलाइंस के माध्यम से सोसल इंजीनियरिंग कार्ड खेला और वर्ष 2007 में भाजपा सपा और काग्रेस को पछाड़ते हुए सत्ता में आई पर मायावती अपने मुख्य मंत्रित्व काल में ऐसी कोई उपलब्धि न कर पायी जिससे उन्हे बाबा साहब अंबेडकर और काशी राम की लिगेसी का वारिश कहा जा सके। उप्र में जाटवो व चमारो के आर्थिक विकास के लिए कोई कदम नहीं उठाये, यही कारणों का प्रधानमन्त्री आवास योजना, उज्जवला योजना, घर घर शौचालय से प्रभावित होकर दलित ( जाटव) समाज को मतदाता आज भाजपा की और झुकता हुआ नजर आ रहा है, एक अनुमान के मुताबिक उ प में दलितो में 65 उप जातियाँ है, इनमें सबसे बड़ी आवादी जाटव समुदाय की है जो कुल दलित आवादी का 50% है। विशेषज्ञ यह भी मानते है कि मायावती दलितो के बीच अब वो दम नहीं रखती जो पहले हुआ करता था और दलितो का अच्छा खासा तबका अब भाजपा के साथ लगातार जुड़ रहा है जैसा वर्ष 2014 और वर्ष 2019 के लोक सभा चुनावो में देखा गया। दूसरा बसपा में टिकट के बदले धन उगाही के कारण मायावती से उनकी अपनी बिरादरी के शिक्षित व योग्य लोग बसपा का टिकट मांगने से कतरा रहे है जबकि काशी राम के समय पार्टी में व्यक्ति का पार्टी के सिद्धांतों के प्रति संकल्प को विशेष महत्व दिया जाता था पर अब ऐसा नहीं है,

यह जानते हुए इंडिया के अधिकांश घटक मायावती को अपने अलायंस में मिलाना चाहते हैं और ऐसी संभावना है कि अगला चुनाव एनडीए बनाम इंडिया हो सकता है ऐसे में मायावती जी किसी भी गठबंधन के साथ जाने में क्यो कतरा रही है। जबकि मायावती सदैव भाजपा को मनुवादियों की पार्टी कह कर अपना दुश्मन नंबर वन कहती रही है यह अलग बात है वे उसी भाजपा के समर्थन से उ प की मुख्य मंत्री बनती रही हैं पर जब से उनकी स्थिति कमजोर हो गयी है और उनका पारंपरिक वोट भाजपा की ओर खिसक रहा है ऐसे में आगामी लोक सभा चुनाव मायावती के घटते वोट शेयर और घटती घटती सीटें उनके लिए चुनौती है और वो यह तय नहीं कर पा रही है दोनों गठबंधनो में से किसके साथ जाँये या अपने दम पर चुनाव लड़े। भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए के लिए यही फायदे मंद रहेगा कि वो अलग चुनाव लड़े जिससे कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का वोट बैंक काट कर भाजपा की जीत सुनिश्चित कर सके जैसा अभी हाल में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में देखने को मिला है। ऐसी परिस्थितियों में भाजपा को भी बसपा के वोट बैंक जाने वाले जाटव वोट बैंक को साधने के लिए सकरात्मक कदम उठाना होगा और टिकट बटवारे में सुरक्षित सीटो पर जाटवो की जगह पासी, खटिक आदि को अधिक वरीयता देने की नीति को त्यागना होगा'

एक अनुमान के अनुसार देश में 21% आवादी दलितो की है और काशी राम जी के समय में इन दलित वोटरो पर बहुजन समाज पार्टी का वर्चस्व होता था, विशेषकर जाटवो को भाजपा का शत प्रतिशत वोट बैंक माना जाता था पर काशीराम के देहांत के बाद से जाटव मतदाता बसपा से बिखर कर नरेंद्र मोदीजी के कारण भाजपा को अपने विकल्प के रूप में देखने लगा है क्योकि मायावती की पैसे के लोभ और परिवार वाद की नीति के कारण वह बसपा से बिखर गया है अब बसपा की भी इन्हे अपनी ओर लाने का प्रयास करना होगा और इस वर्ग के योग्य और प्रतिभा शाली लोगो को को लोक सभा चुनावो और संगठन में अवसर प्रदान करे जो मायावती को एनडीए के साथ लाने के प्रयास से बेहतर होगा, वैसे भी वर्ष 2014 केबाद भाजपा अब ब्राह्मण और बनियों की पार्टी के बजाय दलितो और पिछड़ो में अपनी पैठ बना रही हैं।

गुरुवार, 11 जनवरी 2024

हिंडेनबर्ग पर शीर्ष न्यायालय के फैसले के मायने

अवधेश कुमार

अडानी हिंडेनबर्ग मामले में उच्चतम न्यायालय न्यायालय के फैसले का पहला विवेकशील निष्कर्ष यह है कि सरकार के विरुद्ध किसी मुद्दे को उठाने और उसे बड़ा बनाने के पहले उस पर पर्याप्त शोध और सोच-विचार किया जाना चाहिए। न्यायालय के फैसले को आधार बनाएं तो हिंडेनबर्ग रिपोर्ट को लेकर भारत और भारतीयों के संपर्क से पूरी दुनिया में जो बवंडर खड़ा हुआ, शेयर मार्केट से लेकर स्वयं गौतम अडानी की कंपनियों को जो नुकसान पहुंचा तथा नरेंद्र मोदी सरकार को लेकर पैदा हुआ संदेश सभी तत्काल निराधार साबित हुए हैं। न्यायालय यह कहते हुए याचिकाओं को निरस्त कर दिया कि हिंडेनबर्ग के आरोपों की जांच के लिए सीट या विशेष जांच दल गठित करने यानी किसी दूसरी एजेंसी को सौंपने की आवश्यकता नहीं है। याचिकाकर्ताओं की ओर से बार-बार सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया यानी सेबी की जांच को प्रश्नों के घेरे में लाने को भी न्यायालय ने सही नहीं माना तथा उसकी जांच से संतुष्टि व्यक्त की। सेबी अब तक 24 में से 22 मामलों की जांच पूरी कर चुकी है।

 सही है कि शीर्ष न्यायालय ने सेबी और भारत सरकार से कहा है कि निवेशकों की रक्षा के लिए तत्काल उपाय करें, कानून को सख्त करें तथा जरूरत के मुताबिक सुधार भी।  यह भी कहा कि सुनिश्चित करें कि फिर निवेशक इस तरह की अस्थिरता का शिकार नहीं हो जैसा कि हिडेनबर्ग रिपोर्ट जारी होने के बाद देखा गया था। ध्यान रखिए कि न्यायालय द्वारा न्यायमूर्ति सप्रे की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञों की समिति की रिपोर्ट पर भी विचार किया गया। इस समिति ने भी शेयर निवेश की सुरक्षा से संबंधित सुझाव दिए हैं। न्यायालय ने उसे शामिल करने को कहा है। वास्तव में फैसले का यह पहलू स्वाभाविक है क्योंकि हिडेनबर्ग रिपोर्ट के बाद अडानी समूह के शेयरों में जिस ढंग से गिरावट आई उससे पूरा भूचाल पैदा हो गया था। आगे ऐसा ना हो इसका सुरक्षा उपाय करना आवश्यक है और इसी ओर न्यायालय में ध्यान दिलाया है । इसमें कोई अगर किसी भी तरह हिंडेनबर्ग रिपोर्ट में थोड़ी सच्चाई देखता है वह उसकी समझ पर प्रश्न खड़ा होगा। न्यायालय के फैसले से साफ हो गया है कि गौतम अडानी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाए गए आरोप निराधार ही थे। किंतु भारत की राजनीति और एक्टिविज्म की दुनिया में शिकार करने का चरित्र। इसलिए पहले सेबी और फिर आप न्यायालय को भी कटघरे में खड़ा करने का अभियान चल रहा है।

यह स्थिति चिंताजनक है। अगर उच्चतम न्यायालय को हिडेनबर्ग रिपोर्ट में थोड़ी भी सच्चाई दिखती तो उसके आदेश में यही लिखा होता कि आगे कोई भी कंपनी किसी तरह अपने प्रभाव का लाभ न उठा पाए इसके लिए सुरक्षाउपाय करें। उसने ऐसा नहीं कहा है। उसका कहना इतना ही है कि अगर कहीं से फिर ऐसी रिपोर्ट आ गई तब शेयर मार्केट में निवेशकों को कैसे सुरक्षित रखा जाए इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है कि केंद्र सरकार की जांच एजेंसी के रूप में सेबी जांच करें कि क्या हिंडनबर्ग रिसर्च और किसी अन्य संस्था की वजह से निवेशकों को हुए नुकसान में कानून का कोई उल्लंघन हुआ है? यदि हुआ है तो उचित कार्रवाई की जाए। याचिकाकर्ताओं ने कई नियमों में खामियों की बात उठाई थी जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि संशोधन से नियम सख्त हुए हैं। खोजी जर्नलिस्ट संगठन की रिपोर्ट को भी खारिज किया गया और कहा कि यह सेबी की जांच पर सवाल उठाने के लिए मजबूत आधार नहीं है, इन्हें इनपुट के रूप में नहीं माना जा सकता है। जरा पीछे लौटिये और याद करिए कि पिछले वर्ष 24 जनवरी को अडानी समूह पर हिंडेनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद क्या स्थिति पैदा हुई थी? तब समूह का मार्केट कैप 19.2 लाख करोड़ था। इस रिपोर्ट के बाद उसकी 9 कंपनियों का वैल्यूएशन 150 अरब डालर तक घट गया था। धीरे-धीरे उसकी भरपाई हो रही है किंतु अभी भी वह उसे समय से 31% नीचे है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद तेजी से अडानी समूह के शेयर भाव उछले एवं उसी अनुसार सूचकांक भी। बावजूद उस क्षति की भरपाई एक बड़ी चुनौती है। प्रश्न है कि इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए? करोड़ों निवेशकों के जो धन डुबाने के लिए कौन दोषी है? सबसे बड़ी बात कि इससे भारत की छवि पूरी दुनिया में बिगड़ी उसकी भरपाई कौन करेगा? हिंडेनबर्ग रिपोर्ट को आधार बनाकर दुष्प्रचार यही हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं और उनकी सरकार एक उद्योगपति कारोबारी के लिए किसी सीमा तक जाने को तैयार है। उन्हें सरकार का राजनीतिक संरक्षण और सहयोग प्राप्त है जिनकी बदौलत ही यह कंपनी आगे बढ़ी है अन्यथा इसकी अपनी क्षमता ऐसी नहीं है। यह सरकार और पूंजीपति के बीच शर्मनाक दुरभिसंधि का आरोप था। यह आरोप सच होता तो क्ऱनी केपीटलिइज्म का इससे बड़ा उदाहरण कुछ नहीं हो सकता। विश्व भर में निवेशकों और कारोबारियों के बीच यह छवि बन जाती कि वाकई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ही उद्योगपति और कारोबारी के हितों में नियम बनवाते हैं, उसे सत्ता का संरक्षण प्रदान करते हैं और इसी बदौलत समूह देश और दुनिया में अवैध तरीके से वित्तीय शक्ति का विस्तार कर रहा है तो फिर वे भारत से मुंह मोड़ लेते।‌ इसका संपूर्ण भारतीय अर्थव्यवस्था और आर्थिक रूप से महाशक्ति बनने के लक्ष्य पर क्या प्रभाव पड़ता इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। वास्तव में हिंडेनबर्ग रिपोर्ट एक कंपनी पर अवश्य था किंतु इससे पूरे भारत सरकार और देश की नियति नत्थी हो गई थी। हिंडेनबर्ग ने में मुख्यत: यही कहा था कि अदानी समूह की वित्तीय हैसियत इतनी बड़ी है नहीं जितनी वह अंकेक्षण में दिखलाती  है, वह अपना मूल्यांकन जानबूझकर ज्यादा करवाती है जिससे उसके शेयर भाव बढ़े रहते हैं तथा टैक्स हैवन देशों में सेल कंपनियां बनाकर वह गलत निवेश करती है और इन सबमें उसे सत्ता का पूरा सहयोग और संरक्षण है। कोई कंपनी प्रधानमंत्री के वरदहस्त से काली कमाई करती हो इससे खतरनाक आरोप और क्या हो सकता है। साफ है कि जहां हिडेनबर्ग रिपोर्ट के पीछे केवल एक कंपनी की वित्तीय स्थिति को अपनी दृष्टि से सामने लाना नहीं था बल्कि निशाने पर नरेंद्र मोदी सरकार और उसके माध्यम से पूरा भारत था। जिस देश में इस ढंग से क्रॉनी केपीटलिइज्म हो उसकी दुनिया में साख और हैसियत कुछ हो ही नहीं सकती। प्रधानमंत्री  कह रहे हैं कि 2024 से 29 के बीच भारत विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनेगा और 2047 तक विश्व की पहली श्रेणी का देश बनाना है तो निश्चय ही इससे अनेक देशों संगठनों, नेताओं, यहां तक की भारत के भी कुछ लोगों और समूहों के कलेजे पर सांप लोट रहा होगा। वो हर तरीके से इसमें बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करेंगे। उच्चतम न्यायालय ने हिंडेनबर्ग रिपोर्ट के पीछे के इरादों या कानूनों के उल्लंघन, निवेशकों को हुए नुकसान के पीछे कारकों के जांच के लिए हरी झंडी दी हैतो  उम्मीद रखिए की आने वाले समय में पूरा सच सामने आएगा। उच्चतम न्यायालय की सुनवाई से इतना स्पष्ट हुआ कि भारत के एक नामी वकील के एनजीओ ने कंपनी के संदर्भ में सूचनाएं पहुंचाने में भूमिका निभाई थी। कुछ बातें महुआ मोइत्रा के संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट से भी पता चलता है। यह सामान्य बात नहीं है कि एक शॉर्ट सेलिंग वाली कंपनी जो ऐसा करके मुनाफा कमा रही हो उसे हमारे यहां शत -प्रतिशत सच मान लिया तथा अडानी समूह एवं तथ्यों पर बात करने वाले को गलत। दलीय राजनीति के बीच वैर भाव इस सीमा तक न हो कि आपसी संघर्ष में देश का हित ही दांव पर लग जाए।



बुधवार, 10 जनवरी 2024

श्रमिक विरोधी नीतियों के विरूध, एनएफआईआर के आह्वान पर यूआरएमयू का क्रमिक अनशन प्रारम्भ

नई दिल्ली। एनएफआईआर के आह्वान पर उत्तरीय रेलवे मजदूर युनियन के हैडक्वार्टर मण्डल के आह्वान पर कनॉट प्लेस स्थित केन्द्रीय चिकित्सालय के बाहर मण्डल मंत्री डीके चावला के नेतृत्व में सैकड़ो रेल कर्मचारीयों ने प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक कमिक अनशन का प्रारम्भ किया गया।
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए करते हुए यूआरएमयू के महामंत्री बी सी शर्मा ने कहा की केन्द्र सरकार को अब एनपीएस की मांग पर न्यायोचित आधार पर विचार करते हुए तुरन्त श्रमिक हित को सर्वोपरी रखकर तत्काल पुरानी पैशन से बदल देना चाहिये। पुरानी पेंशन से सम्पूर्ण श्रमिक परिवारो का हित जुड़ा हुआ है। मण्डल मंत्री डी के चावला ने कहा कि महगाई भत्ते की तीनों रूकी हुई किश्तें तत्काल प्रभाव से जारी करें और अपनी घोषणानुसार 2026 के लिये श्रम मण्डल सह मंत्री इन्द्रजीत सिंह ने कहा कि केन्द्र सरकार के प्रत्येक लक्ष्य के लिये जान की बाजी लगाकर प्रण प्राण से रात दिन समर्पित भाव से कार्य करने वाले केन्द्रीय कर्मचारीयो को ओपीएस के दायरे में लाना पूर्णतः श्रमिक हितों पर कुठाराघात है। केन्द्रसरकार अपनी ही नीति के विरूध जाकर नियमित प्रकृति के कार्यों को भी ठेकेदारी प्रथा की आंधी चला दी है चंही ठेकेदार द्वारा प्रशासन की नाक के नीचे खुले आम ठेके श्रमिकों का आर्थिक शोषण व्यापक पैमाने पर हो रहा है श्रमिकों को लगाने के नाम पर मोटी रकम लेने के बाद भी, छुटटीयों के स्थान पर डबल डयूटी के साथ मासिक भुगतान भी कम किया जा रहा है जिस पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।
धरने को केन्द्र सरकार को श्रमिक विरोधी नितियों को तत्काल वापस लेने का आहवान करते हुए रेणु त्यागी, मनोज मच्चल, रमणीक शर्मा, आशीष यादव, बलवान ग्रेवाल, ने सम्बोधित किया।
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