जीवन की आखिरी संध्या पर व्यक्ति जीवन मे हानि लाभ का गुणा भाग करने के बजाय अपना ब्लड प्रेशर ठीक करने के लिए ऐसा वातावरण चाहते है जहा घंटे दो घंटे खुश रहे और हमने चार पांच दोस्तो ने शाम को टहलने के बहने अपने बैठने का बंदोबस्त कर लिया जहा गप्पे मारना खुश रहना और टेंशन को दूर रखना ही हमारा ध्येय होता और यकीन मानिये शाम को घर जाते समय सबका बी पी समान्य होता जबकि एकाध अपवाद को छोड़कर सबकी उम्र 65 से 80 के बीच होती,कुछ दिन बाद एक मेम्बर और जुड़ गए अच्छा लगा की हमारी संख्या बढ़ी पर पता लगा कि वो गाव इसलिए नही जाना चाहते क्योकि वे अम्बेडकर के लोगो का व्यवहार बर्दाश्त नही कर पाते कभी उन्हे यह दर्द सताता कि दलित उनके यहा बरही/तेराही मे भोज मे बुलाने पर इसलिए नही आते कि खाने के बाद उन्हे पत्तल् फेकना पड़ेगा हमारे क्लब के नये सदस्य की इन शंकाओ ने यह सोचने को मजबूर कर दिया कि क्या कारण है हम एक आधुनिक भारत का निर्माण नही कर पा रहे है।
संविधान निर्माता डा अम्बेडकर जीवन पर्यंत एक अखंड भारत का निर्माण करना चाहते थे, इसी कारण जब वर्ष 1927 मे ब्रिटिश हुकूमत ने मुसलमानो के साथ दलितो के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात की और डा अम्बेडकर मुस्लिम लीग की तरह अछूतो के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की बात मान लेते तो पाकिस्तान की तर्ज पर देश का एक और विभाजन होता तो देश की स्थिति और विकट हो जाती! भारत की एकता हेतु उन्होंने गाँधी के साथ 1932 मे पूना पैक्ट किया और बटवारे के बाद भी अछूत भारत का हिस्सा बने रहे और उनके विकाश के लिए संविधान मे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो के लिए आरक्षण का प्रविधान किया गया! परन्तु कुछ रुढिवादी लोग देश मे आरक्षण के लिए डा अम्बेडकर को दोषी मानते है जबकि वस्तविकता यह है कि डा अम्बेडकर ने देश को एक और विभाजन से बचा लिया था! यदि विभाजन की सूरत मे धार्मिक आधार पूर्ण जनसंख्या की अदला बदली की उनकी बात मान ली गयी होती तो देश मे आज इस तरह के साम्प्रदायिक तनाव नही होता।
किसी भी देश और समाज मे समता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे मानवीय मूल्य काफी महत्व रखते है , बाबा साहब अम्बेडकर ऐसे ही मानवीय मुल्यो का भारत देखना चाहते थे- जहा समता हो, बराबरी, सभी नागरिको को, सभी नागरिको को स्वतंत्रता हो और सभी मे बंधुत्व की भावना हो! क्षेत्र भाषा जाति लिंग् आदि के आधार पर कोई भेद भाव न हो, जहा महिलाओ का सम्मान हो, विविधता मे एकता हो! ऐसे वातावरण मे देश निश्चित रूप मे चहुंमुखी विकाश कर सकता है, परंतु भारतीय समाज मे हर क्षेत्र मे असमानता दिखाई देती है, हमारा समाज धर्मो और जातियों मे बटा है, यहाँ लोग पहले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन समझते है और उसके बाद भारतीय है, भले ही यहाँ सबको अपना धर्म अपनाने की आजादी है पर यहाँ मजहब के नाम पर दंगे होते रहते है और फासी वादी तiकतो को किसी दलित द्वारा जाति वाद से असंतुष्ट होकर अपना धर्म त्याग कर दूसरा धर्म अपना लेने पर बर्दास्त नही होता होता है, आज भी विद्यालयो मे जाति के नाम पर छात्रावiस बन रहे है और आये दिन जाति के नाम पर सम्मेलन आयोजित होते रहते है कहने का तात्पर्य है कि पूरा हिंदू समाज जातियों मे बटा हुआ है!
जहां तक आर्थिक स्थिति की बात है तो भारतीय समाज मे आर्थिक समानता अपने विकराल रूप मे है! वैश्विक असमानता रिपोर्ट के मुताबिक 10% भारतीय आवादी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57% हिस्सा है, इन 10% मे 1% के पास 22% हिस्सा है, वही निचली 50% आवादी के पास केवल 13% हिस्सा है! नीति आयोग की गरीबी सूचकांक(एम पी आई) रिपोर्ट के अनुसार उ प, बिहार और मध्य प्रदेश के 10 संयुक्त जिलों मे अन्य राज्यो के मुकाबले बेहद गरीबी है! यह पहली एम पी आई रिपोर्ट है जिसके अनुसार ये गरीबी अनुपात करीब 25.01% है। बिहार मे लगभग51. 91% आबादी बहु आयामी गरीब है, इसी प्रकार यू पी के तीन जिलों मे गरीबी 70% है, मध्य प्रदेश के तीन जिलों मे गरीबी अनुपात, 60% है।
डाॅ. अम्बेडकर भारतीय समाज को वैज्ञानिक चेतना से लैश देखना चाहते थे पर 21 वी शताब्दी मे भी भरतीय समाज मे अंध विश्वास व्याप्त है और अंध विश्वास के प्रति लोगो की आसथा और बढ़ती जा रही है कभी कभी तो आदिवासी और शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों मे महिलाओ को डायन कह कर मार दिया जाता है मासूम बच्चो की बलि दे दी जाती है, धर्म के नाम पर लोग मरने को उतारू हो जाते है, इसलिए डा अम्बेडकर ने शिक्षा पर जोर दिया और वे चाहते थे कि लोग शिक्षित होकर चेतन शील बने, वैज्ञानिक चेतना को जगाये, अंधविश्वास को दूर भगाये और अपने जीवन को बेहतर बनाये।
आज की राजनीति मे जिस तरह से धर्म और पूजी का इस्तेमाल हो रहा है वह हमारे संविधान और लोक तंत्र के लिए खतरनाख है, यहाँ राजनीतिक दल बiकायदा से समीकरण बनाते है कि इतने फिसदी वोट हिंदुओ के होंगे, इतने दलितो के, इतने मुसलमानो, सिखों के आदि, यही कारण है कि यहाँ पर धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण किया जाता है, नेताओ और पूजी पतियों के गठजोड़ के चलते आम नागरिको के हितो का दोहन होता है! जब राजनीति अपने साथ धर्म और पूजी दोनों को एक साथ ले लेती है तो लोकतंत्र के विरुद्ध एक सशक्त त्रिभुज बनता है और मीडिया इस त्रिभुज को चतुर्भुज बनाने मे इनके साथ होता है और देश की गरीब जनता चौतरफा मार झेलने को मजबूर होती है और इसके परिणाम स्वरूप अम्बेडकर और संविधान सभा के सदस्यों के सपनो का भारत ध्वस्त हो रहा है, संविधान का नुक्सान हो रहा है और लोकतंiत्रिक् मुल्यो का ह्रास हो रहा है! मसल पॉवर और मनी पॉवर के अपवित्र गठजोड़ के कारण देश का लोकतंत्र तानाशाही मे बदल रहा है।
गुरुवार, 2 नवंबर 2023
आखिर एक आधुनिक भारत की स्थापना हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं
बुधवार, 1 नवंबर 2023
एर्नाकुलम विस्फोट एक चेतावनी है
अवधेश कुमार
किसी आतंकवादी घटना की गंभीरता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि उसमें कितने लोगों की मौत हुई। केरल में एर्नाकुलम जिले के कलामसेरी के कन्वेंशन सेंटर यानी सम्मेलन केंद्र में हुआ विस्फोट हर दृष्टि से डराने और चिंतित करने वाली घटना है। निस्संदेह , तीन व्यक्तियों की मृत्यु तथा 51 लोगों का घायल होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए थोड़ी राहत का विषय है। हालांकि एक व्यक्ति की भी मृत्यु या घायल होना हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए। यहोवाज विटनेसेस या यहोवा विटनेस समुदाय के तीन दिनों के कार्यक्रम में 2000 के आसपास लोग उपस्थित थे। तीन विस्फोट का मतलब इसकी पहले से पूरी तैयारी की गई थी। यह भी साफ हो गया है कि विस्फोट ईईडी से ही हुआ। अभी यह कहना मुश्किल है कि कोच्चि निवासी डोमिनिक मार्टिन नामक व्यक्ति द्वारा घटना की जिम्मेवारी लेने का सच क्या है। क्या वह अकेले इस विस्फोट में शामिल था या उसके साथ अन्य लोग थे? जो कुछ वह कह रहा है उतना ही सच है या इसके पीछे कोई व्यापक षड्यंत्र है? राष्ट्रीय जांच एजेंसी या एनआईए और केरल का आतंकवाद निरोधी दस्ता की छानबीन के बाद इसका पूरा सच सामने आएगा। किंतु केरल सरकार द्वारा बिना सोचे समझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आरोपित करने से ज्यादा गैर जिम्मेदार कुछ नहीं हो सकता। तो केरल के रुख और यहोवाज विटनेसेस के साथ इस समय देश का जैसा वातावरण है और विशेष कर केरल में जैसा तनावपूर्ण माहौल बनाया गया है उनकी गहराई से विवेचना आवश्यक है।
यहोवाज विटनेसेस ईसाई धर्म से निकला हुआ एक समूह है। इसका मुख्यालय अमेरिका के न्यूयौर्क के वारविक में है और माना जाता है कि इस समय विश्व भर में इसके पचासी लाख सदस्य हैं। इसे इंटरनेशनल बाइबल स्टूडेंट्स एसोसिएशन की इकाई माना जाता है जिसकी स्थापना चार्ल्स टेज रसेल ने वर्ष 1872 में पीट्हवर्ग में की थी। यह मुख्य धारा के ईसाई समुदाय कैथोलिक प्रोटेस्टेंट आदि से अलग विचार रखता है। इसके अनुसार होली ट्रिनिटी यानी पवित्र त्रयी गॉड, द फादर; गॉड , द सन;-- यीशू : गाड था होली स्पिरिट में ये विश्वास नहीं करते। ये यहोवा को गॉड ऑफ द बाइबल और सभी चीजों के निर्माता के रूप में करते हैं।
यहोवाज विटनेस के लोग यीशु मसीह को ईश्वर न मानकर उनका पुत्र मानते हैं तथा स्वयं को वास्तविक क्रिश्चियन कहते हैं। यह क्रिसमस और ईस्टर जैसी छुट्टियां भी नहीं मानते। इनके सामाजिक नियम और रीति- रिवाज काफी सख्त हैं जिसमें तलाक लेने और रक्त लेने तक का निषेध है। स्वाभाविक अन्य ईसाई मतावलंबियों के साथ इनका तनाव होता है। जो ईसा मसीह को ईश्वर मानते हैं वो ईश्वर न मानने वालों का विरोध करेंगे। ये लोगों के बीच अपना विचार प्रसार कर उन्हें अपने साथ शामिल करने की कोशिश करते हैं और इससे भी तनाव पैदा होता है। ध्यान रखिए, केरल में लगभग तीन दशक पहले इस समूह के तीन बच्चों पर उनके स्कूल में राष्ट्रगान का अपमान करने पर अनुशासन तो कार्रवाई की थी और यह मामला उच्चतम न्यायालय तक गया था। यह समुदाय अपने विस्तार के लिए ऐसी बातें बोलता है जिससे निस्संदेह भारत विरोध या यहां की सभ्यता संस्कृति सामाजिक व्यवहार आदि की निंदा और उनके अंत करने तक की बातें होती हैं। केरल में चर्च की कुछ गतिविधियां भी समाज को असहज करने वाली रही हैं और उनका विरोध होता रहा है।
मार्टिन ने घटना के बाद छह मिनट का एक वीडियो जारी किया जिसमें कह रहा है कि उसने इसलिए किया क्योंकि संगठन की शिक्षाएं देशद्रोही है। इसकी विचारधारा खतरनाक है और इसलिए इसे राज्य में समाप्त करना होगा। उसका कहना है कि उसने कई बार संगठन को अपनी शिक्षा या विचार को सही करने को कहा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उसके अनुसार चूंकि मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं था, इसलिए मैंने यह निर्णय लिया। यहोवाज विटनेस ने उसे अपना पंजीकृत सदस्य मानने से इन्कार किया है। जिस तरह डोमिनिक मार्टिन बयान दे रहा है उससे नहीं लगता कि समूह से उसका संबंध नहीं रहा होगा। निश्चित रूप से इस घटना के बाद डोमिनिक मार्टिन के साथ समूह की ,गतिविधियों, विचारों , संसाधनों आदि की व्यापक छानबीन होगी। किंतु पिछले कुछ समय से केरल में भारत विरोधी हिंसक मजहबी कट्टरपंथ की चिंताजनक गतिविधियां सामने आईं हैं। इजरायल और हमास युद्ध के बाद वैसे तो देश का वातावरण ही काफी संतप्त और तनावपूर्ण बनाया जा चुका है लेकिन केरल में लगभग प्रतिदिन कहीं न कहीं कोई छोटी बड़ी रैली या धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। इस विस्फोट के एक ही दिन पूर्व केरल की एक रैली को हमास के पूर्व प्रमुख खालिद मशाल ने संबोधित किया था जिसमें उसने कहा था कि बुलडोजर, हिंदुत्व और यहूदीवाद को उखाड़ फेंकना है। तात्कालिक विस्फोट से सीधे इसका संबंध हो या नहीं हो किंतु स्थिति कितनी खतरनाक है कि विदेश में बैठे हिंसक संगठन का पूर्व प्रमुख वर्चुअल भारत की रैली को संबोधित करते हुए हिंसक विद्रोह के लिए उत्तेजित करता है और लोग तालियां बजाते हैं। भाजपा को छोड़कर किसी राजनीतिक पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया।
केरल सरकार को इसका संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए थी। ऐसा न करने से केवल उन तत्वों का ही नहीं हिंसा की मानसिकता पालने वाले सभी का हौसला बढ़ता है। 20 फोटो के बाद केरल सरकार के प्रवक्ता का बयान है कि पूरा केरल फिलिस्तीन के नाम पर एकजुट है और अगर यह विस्फोट उसे तोड़ने के लिए है तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार की यह मानसिकता डरावनी है। केरल में फिलिस्तीन के नाम पर हो रही रैलियों और प्रदर्शनों में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा के साथ कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी मोर्चा के नेता भी शामिल हो रहे हैं। हमास के पूर्व प्रमुख खालिद मशाल के रैली में शामिल होने के बाद भ्रम दूर हो जाना चाहिए। इसके बाद यय कहना ज्यादा आसान हो गया है कि इजरायल विरोध के नाम पर हमास का समर्थन किया जा रहा है। पार्टियां, संगठन अपने बयानों और गतिविधियों से पूरे देश का माहौल तनावपूर्ण बना रहे हैं। पूर्णिया में सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ तो महाराष्ट्र में मुंबई से लेकर कई स्थानों पर प्रदर्शनों में उत्तेजक नारे और भाषण हो रहे हैं। इसके परे भी राजनीतिक मतभेद को पार्टियां इस तरह प्रकट करती हैं मानो देश के अंदर युद्ध की स्थिति हो। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में कोई असंतुलित व्यक्ति और समूह हिंसा की सीमा तक जा सकता है। कई राज्य केंद्र के सुरक्षा अलर्ट या खुफिया इनपुट को भी राजनीतिक आधार पर विश्लेषित करते हैं। यहां तक कि उनकी अपनी सुरक्षा एजेंसियों की सूचनाओं को भी बार कई बार उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितनी ली जानी चाहिए। जैसी जानकारी है केंद्र की ओर से हमास इजरायल युद्ध के बाद सभी राज्यों को उनकी सुरक्षा संवेदनशीलता के अनुसार सुरक्षा अलर्ट दिया गया था। केरल संवेदनशील राज्यों में शीर्ष पर है , इसलिए उसे कई अन्य राज्यों के साथ विशेष रूप से आगाह किए जाने की सूचना थी। एक साथ 2000 लोग 3 दिनों के लिए इकट्ठे हों, उस संगठन का ईसाइयों के बीच ही विरोध हो, प्रदेश का वातावरण लगातार रैलियों ,विरोध प्रदर्शनों से तनावपूर्ण बना हो, पहले से वहां मजहबी कट्टरपंथ आतंकवाद के स्लीपर सेल पकड़े गए हों वहां विशेष सुरक्षा व्यवस्था न किया जाना बहुत कुछ कहता है। केरल में इसाई मतों के बीच आपसी विरोध और तनाव के समाचार वहां के स्थानीय अखबार में आते रहते हैं। यही नहीं यहोवाज के लोग येरूसलम भी काफी जाते रहते हैं। तो इस दृष्टिकोण से भी थोड़ी ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता थी। जान बिन सही स्पष्ट होगा कि इसके पीछे किस तरह का षड्यंत्र है। दूसरे संगठन भी ध्यान बांटने के लिए ऐसे तत्वों का उपयोग करते हैं।
क्या विस्फोटों के बाद इसे फिलिस्तीन एकजुटता को तोड़ने की कोशिश में के रूप में देखने के सरकार के बयान को जिम्मेवार माना जा सकता है? अभी भी केरल सरकार संघ को आरोपित कर और स्वीकार राजनीति कर रही है। सुरक्षा के मामले पर इस तरह का व्यवहार हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। अनेक शक्तियों और देश भारत में हिंसा और सांप्रदायिक तनाव पैदा कर इसे तोड़ने का षड्यंत्र करते रहते हैं। इसके प्रमाण भी मिले हैं। हमने अनेक आतंकवादी हमले झेले हैं। फिलिस्तीन हमास युद्ध के बाद की संवेदनशीलता को देखते हुए पार्टियों, नेताओं और संगठनों को अत्यंत ही सोच समझकर संयमित बयान देने की आवश्यकता थी। सुरक्षा अलर्ट को भी पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। एर्नाकुलम विस्फोट हम सबके लिए एक सबक बनकर आया है। आप सरकार का विरोध करिए लेकिन ऐसे मामले पर कुछ भी बोलते समय ध्यान रखिए कि इसके दुष्परिणाम हमारे देश के लिए घातक हो सकते हैं। सबके पास सारे मुद्दों की पूरी जानकारी नहीं होती। कौन इससे क्या निष्कर्ष निकाल कर कहां क्या कर देगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
सोमवार, 30 अक्टूबर 2023
नेताजी : एक स्वाधीन आत्मा
शनिवार, 28 अक्टूबर 2023
फूल वालों की सैर 29 अक्टूबर से 4 नवंबर 2023 तक
नई दिल्ली। मुगल काल से चला आ रहा साप्रदायिक सौहार्द व राष्ट्रीय एकता का संदेश वाहक मेला फूल वालों की सैर इस साल 29 अक्टूबर 2023 को रंगारंग उत्सव का रूप लेगा। इस दिन सुबह 10:30 बजे सर्वोदय को एड सीनियर सेकेंडरी विद्यालय कुतुब महरौली में की चित्रकला प्रतियोगिता होगी। मेने की समारोह की विस्तृत जानकारी देते हुए मेले की आयोजन समिति अजुमन सर ए गुल फरोसा की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि इस वर्ष यह मेला 29 अक्टूबर 2023 से प्रारंभ होगा। 30 अक्टूबर 2023 को फूलों का पखा दिल्ली के उपराज्यपाल श्रीमान विनय कुमार सक्सेना जी को उनके निवास स्थान पर पेश किया जाएगा और साथ ही शहनाई वादन भी होगा फिर इसके बाद फूलों के पंखे दिल्ली के डिवीजनल कमिश्रर को पेश किए जाएंगे और फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री यो अरविंद केजरीवाल जी व मुख्य सचिव को पंखे पेश किए जाएंगे और इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्रर श्री संजय अरोड़ा जी को पंखा पेश किया जाएगा।
दिनांक 31 अक्टूबर 2023 को दोपहर 3:00 बजे सद्भावना वाला फूलों के शहनाई ढोलताशा के साथ इंडिया गेट पर निकल जाएगी. जिनमें सभी समुदायों के लोग वह सदस्य शामिल होंगे और इसके बाद सद्भावना यात्रा फूलों के पचे शहनाई और ढोल ताशा के साथ चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर में से टाउन हॉल होते हुए पुन गौरी शंकर मंदिर पर समाप्त होगी। इस वर्ष साहित्य कला परिषद द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए जाएंगे।
दिनाक 1 नवंबर 2023 को दोपहर से कुश्ती कवडी आदि खेलों का आयोजन महरौली के डीटीए आम बाग पर होगा जिसमें विधायक श्री सोमनाथ भारती जी और नरेश यादव जी मुख्य अतिथि होंगे।
दिनांक 2 नवंबर 2023 की शाम 4:00 बजे महरौनी स्थित महान सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काफी की दरगाह पर दोनों समुदाय के लोग परंपरा के मुताबिक मिलजुल कर फूलों की चादर चढाएंगे। दिल्ली बालों के इस दल का नेतृत्व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब करेंगे। नागरिक और उपराज्यपाल के हाथों चादरपोशी के बाद अगले दिन 3 नवंबर 2023 को शाम 6:00 बजे दोनों समुदाय के लोग व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब मिलजुल कर पांडव कालीन श्री योगमाया मंदिर महरौली में फूलों का पखा और छत्र चढ़ाएंगे।
फूल वालों की सैर का समापन दिनांक 4 नवंबर 2023 को महरौली के ऐतिहासिक जहाज महल के प्रांगण में होगा। इसमें हमारे देश की विविधता और राष्ट्रीय एकता और अखंडता का भव्य और समृद्ध स्वरूप दर्शाने वाले समारोह होगे। उल्लेखनीय है कि विभिन्न राज्यों से आने वाले सांस्कृतिक दल इस समारोह में अपने लोक कथा लोक कलाओं की अलक पेश करते हैं और दरगाह व मंदिर के लिए सजा ध्वज पथा लाते हैं। यह पंखा उसके राज्य के अनुभवी शिल्पकार और दस्तकार तैयार करते हैं। इसके बाद साहित्य कला परिषद द्वारा कल्चर प्रोग्राम व पूरी रात भर कव्वाली का दिलकश मुकाबला होगा।
फूल बालों की सैर के लिए भारत सरकार द्वारा आयोजन समिति बंजुमन सैर ए गुप्त फरोसा को राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भावना पुरस्कार से भी नवाजा है। समिति को यह पुरस्कार भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी द्वारा 12 अगस्त 2009 को प्रदान किया गया था। समिति की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि सन 1812 से 1842 तक हर साल लगने वाले इस मेले को अंग्रेजा ने भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध में तथा अपने विभाजन कार्य नीति के तहत फूट डालो राज करो के अंतर्गत बंद कर दिया। था। इसे दोबारा 1961 में दिल्ली वासियों की अपील पर भारत सरकार ने दोबारा से शुरू कराया था।
शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023
कुछ भ्रांतियों को तोड़ गए स्पिन के सरदार ‘बिशन सिंह बेदी’
बसंत कुमार
इस समय देश में पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और वोटरों को आकर्षित करने के उद्देश्य से हर राजनीतिक दल चुनावी रेवड़ियां बांटने के चुनावी वायदों की झड़ी लगा रहा है। ऐसे चुनावी वातावरण में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी कि देश के 81 करोड़ गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त अनाज वितरण योजना पांच वर्ष तक जारी रहेगी। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने ट्वीट करके वाहवाही लूटने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इसे चुनावी रेवड़ी मानकार इसकी शिकायत चुनाव आयोग से करने का फैसला किया। इसके बाद आर्थिक जानकारों के बीच यह बहस छिड़ गई कि विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश में 81 करोड़ से अधिक जनसंख्या बीपीएल कार्ड धारक हैं और मुफ्त अन्न वितरण योजना का लाभ उठाने के हकदार हैं अर्थात जिस देश की आबादी 141 करोड़ हो और उसमें से 81 करोड़ (58%) लोग अपना पेट भरने के लिए मुफ्त अन्न वितरण योजना पर निर्भर करते हो तो उस देश को विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति कैसे माना जा सकता है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार ऐसे लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 81.35 करोड़ हो गई है और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट की शुरुआत वर्ष 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने की थी। इस योजना के तहत बीपीएल कार्ड धारकों को एक रुपए किलो गेहूँ और तीन रुपए किलो चावल देने की बात की गई थी। इसके तहत प्रति व्यक्ति को हर माह 5 किलो अनाज मिलता था फिर नरेंद्र मोदीजी की सरकार अंत्योदय योजना लेकर आई जिसमें 35 किलो अनाज की सीमा निर्धारित की गई, फ्री राशन योजना इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने वाली थी जिसे अब प्रधानमंत्री ने इसे पांच वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। पौने दो लाख करोड़ की राहत से यह योजना शुरू की गई थी, निश्चित तौर पर यह योजना कोरोना काल में गरीब परिवारों को मुसीबत की घड़ी में बहुत कामयाब रही परंतु इस योजना के चलते अधिकांश लोगों के घर बैठने की प्रवृत्ति के कारण मजदूरों की कमी से छोटे और मझोले उद्यमों को बहुत झटका लगा है तब इस योजना की उपयोगिता पर प्रश्न खड़ा करना जायज लगता है।
प्रश्न यह है कि देश के मध्यम वर्ग के बूते पर करोड़ों लोगो को फ्री राशन मिलेगा। भोजन की गारंटी देना किसी भी जन कल्याणकारी सरकार की अहम् जिम्मेदारी है पर उसके लिए मध्यम वर्ग की जेब काटना कोई भी समझदारी नहीं है। फ्री राशन और हर चीजों पर सब्सिडी देने से करोड़ों की आबादी नकारा बन जाती है पर हमारे देश में सरकारों द्वारा वोट पाने के लिए फ्री राशन और फ्री भोजन की योजनाएं चलाई जा रही हैं जबकि होना यह चाहिए कि सबको शिक्षा और स्वास्थ के साथ-साथ रोजगार की गारंटी दी जानी चाहिए। इस बारे में मुगलकाल में उप्र की राजधानी लखनऊ स्थित इमाम बाड़ा के निर्माण की कहानी से प्रेरणा ली जानी चाहिए, इसका निर्माण 1784 में अवध के नवाब आसिफउद्दौला ने अकाल के दौरान इसलिए कराया था कि लोगों को रोजगार मिल सके, दिन में इसका निर्माण होता और रात में इसे गिरा दिया जाता, कहते हैं कि इस इमाम बाड़ा का निर्माण और अकाल, 11 साल तक चला, इमाम बाड़े के निर्माण में करीब 20000 श्रमिक शामिल थे और इसके निर्माण में उस जमाने में 8 से 10 लाख रुपए की लागत आई पर नवाब ने अकाल के समय काम दिया पर खैरात नहीं दी।
अब राजनीतिक दलों के लिए यह नुस्खा बन गया है कि मुफ्त राशन, सस्ते भोजन की घोषणाएं करो और जब किसी को मुफ्त भोजन मिलेगा तो वह काम क्यों करेगा। देश में पहले विकसित देशों की कंपनिया आकर कारखाने लगाती थीं इससे मजदूरों को बेहतर रोजगार मिलता था और उनके जीवन का स्तर ऊपर उठता था क्योंकि विकसित देशों में आबादी कम होने के कारण मजदूर बहुत महंगे मिलते थे इसलिए ये कंपनियां भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की तरफ रुख करती थीं परंतु अब भारत में मुफ्त राशन मिलने से यहां के मजदूर कामचोरी करने लगे हैं। अब उनके लिए काम हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें अब मुफ्त का राशन मिल ही रहा है। अब तो शहरों के छोटे कारखाने के लिए मजदूर मिलना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि जो लोग कोरोना काल में शहरों को छोड़कर गांवों में पलायन कर गए थे वे फिर वापस नहीं आये।
दुर्भाग्य यह है कि मुफ्त राशन और फ्री बिजली बांटने का काम हर राजनीतिक दल कर रहा है, इस समय मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान सभी पार्टियों में परस्पर होड़ मची हुई है कि कि मुफ्त बिजली, मुफ्त भोजन बांटने की घोषणा में कौन किससे आगे दिख रहा है। दिल्ली में तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उत्तर भारतीय वोटरों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त डीटीसी बस कि ऐसी आदत डाली कि उसके बुते पर वे दो बार से लगातार एकक्षत्र राज कर रहे हैं। उनकी देखा-देखी कांग्रेस और भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल यह सीखने की कोशिश कर रहे हैं कि मुफ्तखोरी की लालच से वोटरों को पटाया जाए। अब वोटरों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इस सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं क्योंकि जनता को फ्री की रेवड़ी खाने की आदत पड़ गई है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोग गांव के कोटेदार के यहां अपनी चौपहियां गाड़ी से बीपीएल कार्ड पर मुफ्त राशन लेने जाते हैं। ये तथ्य हमारी व्यवस्था में भारी पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं और इसी कारण देशभर में गरीबों के लिए प्रारंभ की गई योजनाओं का लाभ लाखों की गाड़ियों में घूमने वाले और करोड़ों के घरों में रहने वाले लोग उठाते हैं। फिर भी गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त राशन वितरण कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या 81 करोड़ से अधिक हो जाना सचमुच चिंता की बात है आखिर देश में मुफ्त रेवड़ी बांटने की प्रथा कब खत्म होगी।
(लेखक भारत सरकार में उप सचिव पद पर रह चुके हैं।)
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