गुरुवार, 2 नवंबर 2023

आखिर एक आधुनिक भारत की स्थापना हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं

बसंत कुमार

जीवन की आखिरी संध्या पर व्यक्ति जीवन मे हानि लाभ का गुणा भाग करने के बजाय अपना ब्लड प्रेशर ठीक करने के लिए ऐसा वातावरण चाहते है जहा घंटे दो घंटे खुश रहे और हमने चार पांच दोस्तो ने शाम को टहलने  के बहने अपने बैठने का बंदोबस्त कर लिया जहा गप्पे मारना खुश रहना और टेंशन को दूर रखना ही हमारा ध्येय होता और यकीन मानिये शाम को घर जाते समय सबका बी पी समान्य होता जबकि एकाध अपवाद को छोड़कर सबकी उम्र 65 से 80 के बीच होती,कुछ दिन बाद एक मेम्बर और जुड़ गए अच्छा लगा की हमारी संख्या बढ़ी पर पता लगा कि वो गाव इसलिए नही जाना चाहते क्योकि वे अम्बेडकर के लोगो का व्यवहार बर्दाश्त नही कर पाते कभी उन्हे यह दर्द सताता कि दलित उनके यहा बरही/तेराही मे भोज मे बुलाने पर इसलिए नही आते कि खाने के बाद उन्हे पत्तल् फेकना पड़ेगा हमारे क्लब के नये सदस्य की इन शंकाओ ने यह सोचने को मजबूर कर दिया कि क्या कारण है हम एक आधुनिक भारत का निर्माण नही कर पा रहे है।
संविधान निर्माता डा अम्बेडकर जीवन पर्यंत एक अखंड भारत का निर्माण करना चाहते थे, इसी कारण जब वर्ष 1927 मे ब्रिटिश हुकूमत ने मुसलमानो के साथ दलितो के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात की और डा अम्बेडकर मुस्लिम लीग की तरह अछूतो के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की बात मान लेते तो पाकिस्तान की तर्ज पर देश का एक और विभाजन होता तो देश की स्थिति और विकट हो जाती! भारत की एकता हेतु उन्होंने गाँधी के साथ 1932 मे पूना पैक्ट किया और बटवारे के बाद भी अछूत भारत का हिस्सा बने रहे और उनके विकाश के लिए संविधान मे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो के लिए आरक्षण का प्रविधान किया गया! परन्तु कुछ रुढिवादी लोग देश मे आरक्षण के लिए डा अम्बेडकर को दोषी मानते है जबकि वस्तविकता यह है कि डा अम्बेडकर ने देश को एक और विभाजन से बचा लिया था! यदि विभाजन की सूरत मे धार्मिक आधार पूर्ण जनसंख्या की अदला बदली की उनकी बात मान ली गयी होती तो देश मे आज इस तरह के साम्प्रदायिक तनाव नही होता।
किसी भी देश और समाज मे समता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे मानवीय मूल्य काफी महत्व रखते है , बाबा साहब अम्बेडकर ऐसे ही मानवीय मुल्यो का भारत देखना चाहते थे- जहा समता हो, बराबरी, सभी नागरिको को, सभी नागरिको को स्वतंत्रता हो और सभी मे बंधुत्व की भावना हो! क्षेत्र भाषा जाति लिंग् आदि के आधार पर कोई भेद भाव न हो, जहा महिलाओ का सम्मान हो, विविधता मे एकता हो! ऐसे वातावरण मे देश निश्चित रूप मे चहुंमुखी विकाश कर सकता है, परंतु भारतीय समाज मे हर क्षेत्र मे असमानता दिखाई देती है, हमारा समाज धर्मो और जातियों मे बटा है, यहाँ लोग पहले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन समझते है और उसके बाद भारतीय है, भले ही यहाँ सबको अपना धर्म अपनाने की आजादी है पर यहाँ मजहब के नाम पर दंगे होते रहते है और फासी वादी तiकतो को किसी दलित द्वारा जाति वाद से असंतुष्ट होकर अपना धर्म त्याग कर दूसरा धर्म अपना लेने पर बर्दास्त नही होता होता है, आज भी विद्यालयो मे जाति के नाम पर छात्रावiस बन रहे है और आये दिन जाति के नाम पर सम्मेलन आयोजित होते रहते है कहने का तात्पर्य है कि पूरा हिंदू समाज जातियों मे बटा हुआ है!
जहां तक आर्थिक स्थिति की बात है तो भारतीय समाज मे आर्थिक समानता अपने विकराल रूप मे है! वैश्विक असमानता रिपोर्ट के मुताबिक 10% भारतीय आवादी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57% हिस्सा है,  इन 10% मे 1% के पास 22% हिस्सा है, वही निचली 50% आवादी के पास केवल 13% हिस्सा है!  नीति आयोग की गरीबी सूचकांक(एम पी आई) रिपोर्ट के अनुसार उ प, बिहार और मध्य प्रदेश के 10 संयुक्त जिलों मे अन्य राज्यो के मुकाबले बेहद गरीबी है!  यह पहली एम पी आई रिपोर्ट है जिसके अनुसार ये गरीबी अनुपात करीब 25.01% है। बिहार मे लगभग51. 91% आबादी बहु आयामी गरीब है, इसी प्रकार यू पी के तीन जिलों मे गरीबी 70% है, मध्य प्रदेश के तीन जिलों मे गरीबी अनुपात, 60% है।
डाॅ. अम्बेडकर भारतीय समाज को वैज्ञानिक चेतना से लैश देखना चाहते थे पर 21 वी शताब्दी मे भी भरतीय समाज मे अंध विश्वास व्याप्त है और अंध विश्वास के प्रति लोगो की आसथा और बढ़ती जा रही है कभी कभी तो आदिवासी और शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों मे महिलाओ को डायन कह कर मार दिया जाता है मासूम बच्चो की बलि दे दी जाती है, धर्म के नाम पर लोग मरने को उतारू हो जाते है, इसलिए डा अम्बेडकर ने शिक्षा पर जोर दिया और वे चाहते थे कि लोग शिक्षित होकर चेतन शील बने, वैज्ञानिक चेतना को जगाये, अंधविश्वास को दूर भगाये और अपने जीवन को बेहतर बनाये।
आज की राजनीति मे जिस तरह से धर्म और पूजी का इस्तेमाल हो रहा है वह हमारे संविधान और लोक तंत्र के लिए खतरनाख है, यहाँ राजनीतिक दल बiकायदा से समीकरण बनाते है कि इतने फिसदी वोट हिंदुओ के होंगे, इतने दलितो के, इतने मुसलमानो, सिखों के आदि, यही कारण है कि यहाँ पर धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण किया जाता है, नेताओ और पूजी पतियों के गठजोड़ के चलते आम नागरिको के हितो का दोहन होता है! जब राजनीति अपने साथ धर्म और पूजी दोनों को एक साथ ले लेती है तो लोकतंत्र के विरुद्ध एक सशक्त त्रिभुज बनता है और मीडिया इस त्रिभुज को चतुर्भुज बनाने मे इनके साथ होता है और देश की गरीब जनता चौतरफा मार झेलने को मजबूर होती है और इसके परिणाम स्वरूप अम्बेडकर और संविधान सभा के सदस्यों के सपनो का भारत ध्वस्त हो रहा है, संविधान का नुक्सान हो रहा है और लोकतंiत्रिक् मुल्यो का ह्रास हो रहा है! मसल पॉवर और मनी पॉवर के अपवित्र गठजोड़ के कारण देश का लोकतंत्र तानाशाही मे बदल रहा है।

बुधवार, 1 नवंबर 2023

एर्नाकुलम विस्फोट एक चेतावनी है

अवधेश कुमार 

किसी आतंकवादी घटना की गंभीरता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि उसमें कितने लोगों की मौत हुई। केरल में एर्नाकुलम जिले के कलामसेरी के कन्वेंशन सेंटर यानी सम्मेलन केंद्र में हुआ विस्फोट हर दृष्टि से डराने और चिंतित करने वाली घटना है। निस्संदेह , तीन व्यक्तियों की मृत्यु तथा 51 लोगों का घायल होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए थोड़ी राहत का विषय है। हालांकि एक व्यक्ति की भी मृत्यु या घायल होना हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए। यहोवाज विटनेसेस या यहोवा विटनेस समुदाय के तीन दिनों के कार्यक्रम में 2000 के आसपास लोग उपस्थित थे। तीन विस्फोट का मतलब इसकी पहले से पूरी तैयारी की गई थी। यह भी साफ हो गया है कि विस्फोट ईईडी से ही हुआ। अभी यह कहना मुश्किल है कि कोच्चि निवासी डोमिनिक मार्टिन नामक व्यक्ति द्वारा घटना की जिम्मेवारी लेने का सच क्या है। क्या वह अकेले इस विस्फोट में शामिल था या उसके साथ अन्य लोग थे? जो कुछ वह कह रहा है उतना ही सच है या इसके पीछे कोई व्यापक षड्यंत्र है? राष्ट्रीय जांच एजेंसी या एनआईए और केरल का आतंकवाद निरोधी दस्ता की छानबीन के बाद इसका पूरा सच सामने आएगा। किंतु केरल सरकार द्वारा बिना सोचे समझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आरोपित करने से ज्यादा गैर जिम्मेदार कुछ नहीं हो सकता। तो केरल के रुख और यहोवाज विटनेसेस के साथ इस समय देश का जैसा वातावरण है और विशेष कर केरल में जैसा तनावपूर्ण माहौल बनाया गया है उनकी गहराई से विवेचना आवश्यक है।

यहोवाज विटनेसेस ईसाई धर्म से  निकला हुआ एक समूह है। इसका मुख्यालय अमेरिका के न्यूयौर्क  के वारविक में है और माना जाता है कि इस समय विश्व भर में इसके पचासी लाख सदस्य हैं। इसे इंटरनेशनल बाइबल स्टूडेंट्स एसोसिएशन की इकाई माना जाता है जिसकी स्थापना चार्ल्स टेज रसेल ने वर्ष 1872 में पीट्हवर्ग में की थी। यह मुख्य धारा के ईसाई समुदाय  कैथोलिक प्रोटेस्टेंट आदि से अलग विचार रखता है। इसके अनुसार होली ट्रिनिटी यानी पवित्र त्रयी गॉड, द फादर; गॉड , द सन;-- यीशू :  गाड था होली स्पिरिट में ये विश्वास नहीं करते। ये यहोवा को  गॉड ऑफ द बाइबल और सभी चीजों के निर्माता के रूप में करते हैं।

यहोवाज विटनेस के लोग यीशु मसीह को ईश्वर न मानकर उनका पुत्र मानते हैं तथा स्वयं को वास्तविक क्रिश्चियन कहते हैं। यह क्रिसमस और ईस्टर जैसी छुट्टियां भी नहीं मानते। इनके सामाजिक नियम और रीति- रिवाज काफी सख्त हैं जिसमें तलाक लेने और रक्त लेने तक का निषेध है। स्वाभाविक अन्य ईसाई मतावलंबियों के साथ इनका तनाव होता है। जो ईसा मसीह को ईश्वर मानते हैं वो ईश्वर न मानने वालों का विरोध करेंगे। ये लोगों के बीच अपना विचार प्रसार कर उन्हें अपने साथ शामिल करने की कोशिश करते हैं और इससे भी तनाव पैदा होता है। ध्यान रखिए, केरल में लगभग तीन दशक पहले इस समूह के तीन बच्चों पर उनके स्कूल में राष्ट्रगान का अपमान करने पर अनुशासन तो कार्रवाई की थी और यह मामला उच्चतम न्यायालय तक गया था।  यह समुदाय अपने विस्तार के लिए ऐसी बातें बोलता है जिससे निस्संदेह भारत विरोध या यहां की सभ्यता संस्कृति सामाजिक व्यवहार आदि की निंदा और उनके अंत करने तक की बातें होती हैं। केरल में चर्च की कुछ गतिविधियां भी समाज को असहज करने वाली रही हैं और उनका विरोध होता रहा है। 

मार्टिन ने घटना के बाद छह मिनट का एक वीडियो जारी किया जिसमें कह रहा है कि उसने इसलिए किया क्योंकि संगठन की शिक्षाएं  देशद्रोही है। इसकी विचारधारा खतरनाक है और इसलिए इसे राज्य में समाप्त करना होगा। उसका कहना है कि उसने कई बार संगठन को अपनी शिक्षा या विचार को सही करने को कहा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उसके अनुसार चूंकि मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं था, इसलिए मैंने यह निर्णय लिया। यहोवाज विटनेस ने उसे अपना पंजीकृत सदस्य मानने से इन्कार किया है। जिस तरह डोमिनिक मार्टिन बयान दे रहा है उससे नहीं लगता कि समूह से उसका संबंध नहीं रहा होगा। निश्चित रूप से इस घटना के बाद डोमिनिक मार्टिन के साथ समूह की ,गतिविधियों, विचारों , संसाधनों आदि की व्यापक छानबीन होगी। किंतु पिछले कुछ समय से केरल में भारत विरोधी हिंसक मजहबी कट्टरपंथ की चिंताजनक गतिविधियां सामने आईं हैं। इजरायल और हमास युद्ध के बाद वैसे तो देश का वातावरण ही काफी संतप्त और तनावपूर्ण बनाया जा चुका है लेकिन केरल में लगभग प्रतिदिन कहीं न कहीं कोई छोटी बड़ी रैली या धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। इस विस्फोट के एक ही दिन पूर्व केरल की एक रैली को हमास के पूर्व प्रमुख खालिद मशाल ने संबोधित किया था जिसमें उसने कहा था कि बुलडोजर, हिंदुत्व और यहूदीवाद को उखाड़ फेंकना है। तात्कालिक विस्फोट से सीधे इसका संबंध हो या नहीं हो किंतु स्थिति कितनी खतरनाक है कि विदेश में बैठे हिंसक संगठन का पूर्व प्रमुख वर्चुअल भारत की रैली को संबोधित करते हुए हिंसक विद्रोह के लिए उत्तेजित करता है और लोग तालियां बजाते हैं। भाजपा को छोड़कर किसी राजनीतिक पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया।

केरल सरकार को इसका संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए थी। ऐसा न करने से केवल उन तत्वों का ही नहीं हिंसा की मानसिकता पालने वाले सभी का हौसला बढ़ता है। 20 फोटो के बाद केरल सरकार के प्रवक्ता का बयान है कि पूरा केरल फिलिस्तीन के नाम पर एकजुट है और अगर यह विस्फोट उसे तोड़ने के लिए है तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार की यह मानसिकता डरावनी है। केरल में फिलिस्तीन के नाम पर हो रही रैलियों और प्रदर्शनों में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा के साथ कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी मोर्चा के नेता भी शामिल हो रहे हैं। हमास के पूर्व प्रमुख खालिद मशाल के रैली में शामिल होने के बाद भ्रम दूर हो जाना चाहिए। इसके बाद यय कहना ज्यादा आसान हो गया है कि इजरायल विरोध‌ के नाम पर हमास का समर्थन किया जा रहा है। पार्टियां, संगठन अपने बयानों और गतिविधियों से पूरे देश का माहौल तनावपूर्ण बना रहे हैं। पूर्णिया में सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ तो महाराष्ट्र में मुंबई से लेकर कई स्थानों पर प्रदर्शनों में उत्तेजक नारे और भाषण हो रहे हैं। इसके परे भी राजनीतिक मतभेद को पार्टियां इस तरह प्रकट करती हैं मानो देश के अंदर युद्ध की स्थिति हो। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में कोई असंतुलित व्यक्ति और समूह हिंसा की सीमा तक जा सकता है। कई राज्य केंद्र के सुरक्षा अलर्ट या खुफिया इनपुट को भी राजनीतिक आधार पर विश्लेषित करते हैं। यहां तक कि उनकी अपनी सुरक्षा एजेंसियों की सूचनाओं को भी बार कई बार उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितनी ली जानी चाहिए। जैसी जानकारी है केंद्र की ओर से हमास इजरायल युद्ध के बाद सभी राज्यों को उनकी सुरक्षा संवेदनशीलता के अनुसार सुरक्षा अलर्ट दिया गया था। केरल संवेदनशील राज्यों में शीर्ष पर है , इसलिए उसे कई अन्य राज्यों के साथ विशेष रूप से आगाह किए जाने की सूचना थी। एक साथ 2000 लोग 3 दिनों के लिए इकट्ठे हों, उस संगठन का ईसाइयों के बीच ही विरोध हो, प्रदेश का वातावरण लगातार रैलियों ,विरोध प्रदर्शनों से तनावपूर्ण बना हो, पहले से वहां मजहबी कट्टरपंथ आतंकवाद के स्लीपर सेल पकड़े गए हों वहां विशेष सुरक्षा व्यवस्था न किया जाना बहुत कुछ कहता है। केरल में इसाई मतों के बीच आपसी विरोध और तनाव के समाचार वहां के स्थानीय अखबार में आते रहते हैं। यही नहीं यहोवाज के लोग येरूसलम भी काफी जाते रहते हैं। तो इस दृष्टिकोण से भी थोड़ी ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता थी। जान बिन सही स्पष्ट होगा कि इसके पीछे किस तरह का षड्यंत्र है। दूसरे संगठन भी ध्यान बांटने के लिए ऐसे तत्वों का उपयोग करते हैं।

क्या विस्फोटों के बाद इसे फिलिस्तीन एकजुटता को तोड़ने की कोशिश में के रूप में देखने के सरकार के बयान को जिम्मेवार माना जा सकता है? अभी भी केरल सरकार संघ को आरोपित कर और स्वीकार राजनीति कर रही है। सुरक्षा के मामले पर इस तरह का व्यवहार हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। अनेक शक्तियों और देश भारत में हिंसा और सांप्रदायिक तनाव पैदा कर इसे तोड़ने का षड्यंत्र करते रहते हैं। इसके प्रमाण भी मिले हैं। हमने अनेक आतंकवादी हमले झेले हैं। फिलिस्तीन हमास युद्ध के बाद की संवेदनशीलता को देखते हुए पार्टियों, नेताओं और संगठनों को अत्यंत ही सोच समझकर संयमित बयान देने की आवश्यकता थी। सुरक्षा अलर्ट को भी पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। एर्नाकुलम विस्फोट हम सबके लिए एक सबक बनकर आया है। आप सरकार का विरोध करिए लेकिन ऐसे मामले पर कुछ भी बोलते समय ध्यान रखिए कि इसके दुष्परिणाम हमारे देश के लिए घातक हो सकते हैं। सबके पास सारे मुद्दों की पूरी जानकारी नहीं होती। कौन इससे क्या निष्कर्ष निकाल कर कहां क्या कर देगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।



सोमवार, 30 अक्टूबर 2023

नेताजी : एक स्वाधीन आत्मा

डॉ. मीना शर्मा
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक, आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रगण्य, भारत माता का मस्तक ऊँचा करने वाले भारत माता के लिए अपना तन-मन-धन, अपना संपूर्ण जीवन, अपनी प्राणात्मा का उत्सर्ग करने वाले मां भारती की सेवा में, अर्चना में अपना शीश फूल चढ़ा देने वाले स्वाधीनता के सबसे बड़े पुजारी और स्वाधीनता के सबसे बड़े सिपाही एवं निर्भय आत्मबलिदानी महापुरुष का नाम 'सुभाष चन्द्र बोस' है।
सुभाषचन्द्र बोस सिर्फ एक व्यक्ति का नाम नहीं है, बल्कि एक संस्था का नाम है, एक विचार का नाम है। निरर्थक चिंतन या विकास में समय लगाना वे समय की बर्बादी मानते थे। स्वाधीनता के विचार और स्वाधीनता के व्यवहार का नाम है। विचार की सार्थकता उनके कदमों में होती है। जहाँ स्वाधीनता के विचार और उसका मूर्तरूप व्यवहार एक दूसरे से रचे-बसे हुए हैं, घुले-मिले हुए हैं। समरूप हैं। समरस हैं। जहाँ अपना सर्वस्व, अपनी एक एक सांस आखिरी सांस लहू का एक- एक कतरा आखिरी कतरा भी भारत माता की अनन्य भक्ति में स्वतंत्रता की देवी के श्रीचरणों में आत्मत्याग और आत्म समर्पण कर दिया जाता है। शीश रूपी फूल को स्वाधीनता के अनुष्ठान में मां भारती के कदमों में भेंट चढ़ा दिया जाता है। कुछ भी अपने पास निःशेष नहीं होता है।
श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 'नेताजी' के सर्वोच्च आत्मबलिदान, आत्मोत्सर्ग की भावना को इन शब्दों में रेखांकित करते हुए कहा था कि- 'He was one of India's greatest and he fearlessly sacrificed everything for the cause of his country's freedom. His life and career will serve as a source of insipiration to generations of Indians Irrespective of caste, creed or community'.
राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी की 'पुष्प की अभिलाषा' सबने पढ़ी होगी किन्तु क्या किसी ने स्वयं अपने शीश को ही पुष्प समझा, पुष्प मानकर स्वाधीनता देवी को भेंट चढ़ाने की अभिलाषा क्या किसी ने रखी है और उसे ही साकार करने, उसे ही जीने में अपना संपूर्ण जीवन न्यौछावर कर दे, खुद को ही अर्पित कर दे, अपना जीवन खपा दे, प्राणों की आहुति, आत्मबलिदान कर दे, नेताजी न केवल आजादी के यज्ञ में प्रस्तुत हैं, बल्कि राष्ट्र के नवयुवकों, आजाद हिन्द सेना, देश के सिपाहियों के रग-रग में, कण कण में जोश का संचार करते हुए सर्वोच्च बलिदान का आह्वान करते हुए शीश पुष्प गुच्छों की अभिलाषा को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-
'स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। उसके लिए सबकुछ देना है। आपने आजादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आजादी को आज अपने शीष फूल चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। हमें ऐसे नवयुवकों की आवश्यकता है जो अपने हाथों से अपना सिर काटकर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सके। आप मुझे अपना खून दें, मैं आपको आजादी दूंगा।'
आजाद हिन्द सेना और उसका प्रतिज्ञापत्र राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की पाठशाला थी। जहां प्रत्येक सिपाही देश के लिए मर-मिटने का जज्बा लेकर प्राणों की आहुति के लिए हर क्षण तत्पर एवं स्वयं को प्रस्तुत करते हुए यह शपथ लेता था कि- 'मैं स्वयं आजाद हिन्द सेना में भर्ती होता हूं। भारत की स्वतंत्रता के लिए तन-मन-धन न्यौछावर कर देने की दृढ़ प्रतिज्ञा करता हूँ। भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को भी तैयार हूँ। मैं स्वयं को छोड़कर अपने देश की सेवा करूंगा। देशवासियों से चाहे वह किसी जाति, संप्रदाय व प्रांत से हों, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखूंगा और सभी भारतीयों को अपना भाई समझंगा।'
सुभाषचन्द्र बोस के लिए स्वाधीनता का कार्य पुण्य का कार्य और पराधीन रहना पाप समान था। अपने जीवन के अंतिम सांस तक वे इसी स्वाधीनता यज्ञ के पुजारी थे। इस निर्मल यज्ञ में स्वाधीनता के साथ किसी भी प्रकार के समझौते के लिए कोई स्थान नहीं था। यही वजह थी कि कांग्रेस के समझौतावादी नीतियों और सत्ता प्राप्ति के लिए औपनिवेशिक शासन के साथ गांधी जी और नेहरू जी का समझौता रास नहीं आया। जिस अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने देश के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को नष्ट, तहस नहस कर दिया था। वे गुलामी को मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप समझते थे और ब्रिटिश सरकार के अन्याय, उत्पीड़न के साथ समझौता करना सबसे बड़ा अपमान मानते थे। अपने स्वाधीनता के ऊंचे आदर्श एवं सिद्धांत के साथ सुभाषचन्द्र बोस फिर वो कैसे सोच सकते थे, और न ही औपनिवेशिक शासन के साथ कांग्रेस की समझौतावादी नीतियों को ही वे बर्दाश्त कर सकते थे। वसूलों पे आंच आना उन्हें कतई पसंद नहीं था।
सुभाषचन्द्र बोस के लिए देश सबसे ऊपर था, दल या व्यक्ति नहीं। दल या सत्ता के लिए समझौता करना नैतिकता, आदर्श, सिद्धांत के लिए नैतिकता के दलदल के समान था। अतएव वे गांधीजी का सम्मान करते हुए भी जहां उनके सिद्धांत एवं आदर्श गांधी के साथ टकराते थे वहां वे ससम्मान निर्भय एवं अडिग स्वर में बापू से कहते- "मैं आपका अन्धाअनुकरण नहीं करता 'वे उसी रास्ते पर चलना पसंद करते थे, जो देश की स्वाधीनता के लिए सर्वोत्तम हो। आंतरिक प्रेरणा से जिस व्यक्ति ने जन्मभूमि की सेवा का आजीवन व्रत रखने का संकल्प लिया हो, सिविल सर्विस में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया हो उसके बावजूद भी उस अंग्रेजी व्यवस्था के सरकारी नौकरी को लात मार दिया हो, क्योंकि उसके शपथ ग्रहण में ब्रिटेन की महारानी के प्रति निष्ठा की शपथ और अंग्रेजी सरकार की सेवा का पाठ पढ़ाया जाता था। सुभाष अंग्रेजों की सेवा और देश की सेवा दोनों भला एक साथ कैसे कर सकते थे? दोनों में से किसी एक को चुनना था। सुभाष ने देश की सेवा को चुना। यहां भी उनका मान और देश का अभिमान एक दूसरे में घुले-मिले थे। ब्रिटिश सरकार की बुनियाद को मजबूत करने की जगह उससे पृथक हो जाना ही वे श्रेष्ठ समझते थे।
जिस आई.सी.एस. यानी सिविल सर्विस को युवा पद - लालसा के कारण मोह और सपने पालता है, उसी नौकरी को बिना किसी शिकन के यूं लात मार दिया सुभाष ने, क्योंकि उनका देश के प्रति मोह और सपने कहीं अधिक बड़े थे। जिसे वे नि:स्पृह भाव से त्यागकर आत्मत्याग के आदर्श को लेकर ही अपने जीवन को देशहित में आरंभ करना चाहते थे। तभी नौकरी छोड़ते ही तुरन्त राष्ट्र सेवा के कार्य में लग गए। आत्मत्याग के आह्वान को वे साहस के साथ, धैर्य के साथ स्वीकार करते हुए समझौते के स्थान पर सिद्धांत को, अंग्रेजी सेवा के स्थान पर देश सेवा दल के स्थान पर देश को चुना ओर गांधीजी और कांग्रेस की ढुलमुल समझौतवादी नीतियों के कारण विवश होकर देश छोड़ विदेश से ही आजाद हिंद फोर्स बनाकर भारत की स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष का रास्ता चुना । सुविधा और ऐशोआराम की जगह वैरागी एवं कष्ट का जीवन चुना। भारतीय जेलों में रहकर सड़कर मरने से अच्छा देश की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर कर एक शहीद जवान का जोखिम भरा बलिदान वाला रास्ता चुना।
आहार, निद्रा, सन्तानोत्पत्ति तक सीमित लोक लीक चलन नीति उनके लिए किसी जीवित राष्ट्र का मरण के समान था। ऐसा राष्ट्र मरणोन्मुख होता है। भारतीय इतिहास और मध्य युग में व्याप्त अंधकारपूर्ण युग या मुगलराज का कारण भी किसी राष्ट्र का इस लोक लीक चलन नीति से ग्रसित होना होता है। परन्तु नवजागरण की झलक का प्रकाश पाकर अंधकार मिटने लता है और नवजागरण की चेतना जीवन का उद्देश्य और जीवन धर्म को पुनः प्रकट करने लगती है। केवल जिंदा रहने के लिए जिन्दा रहना सुभाष को वरेण्य नहीं था। देश, जीवन और भारतीय सभ्यता के उद्देश्य के लिए वे बंगाल और भारत के नवयुवकों के जीवन को एक उद्देश्य एक मिशन के साथ जोड़कर युवाओं और राष्ट्र की नवीन शिराओं में नवीन रक्त का संचार, जागरण की नई चेतना का उन्मेष करते हैं। नई ऊर्जा, नई दिशा, नया जोश नया आत्मविश्वास भरते हैं।
व्यक्ति हो या फिर राष्ट्र दोनों के लिए ही आत्मविश्वास (Self believe ) जरूरी होता है, खड़ा होने के लिए सपनों को साकार करने के लिए। अस्तित्व की सार्थकता का विश्वास किसी व्यक्ति या राष्ट्र को जिंदा रखती है। और अस्तित्व की सार्थकता को रास्ता भूमिका के निर्वहन से होकर गुरजता है। बिना भूमिका के व्यक्ति या राष्ट्र को पुनः जीवित कर देता है। वह सपना देखने के लिए साहस करता है और फिर साहस के लिए सपने देखता है। If you dare to Dream than Dream to dare.'
महीनों महीनों जेल में रहकर आजादी की लड़ाई में तमाम यातनाएं, क्रूरताएं, मार, चोट, दर्द आदि को सहते हुए भी इसी आत्मविश्वास इसी अन्तःप्रेरणा ने सुभाषचन्द्र बोस को टूटने नहीं दिया। बल्कि और भी अधिक, पहले से भी अधिक शक्तिशाली हो उठते हैं। अक्सर यातनाएं सहते समय उनका मन उत्तर देता था 'भारत का एक मिशन है, एक गौरवपूर्ण भविष्य, भारत के उस भविष्य के उत्तराधिकारी हम हैं। नये भारत के, मुक्ति के इतिहास की रचना हम ही कर सकते हैं और हम ही करेंगे।'
भारत के आत्मप्रतिष्ठा का मार्ग इस खोये हुए आत्मविश्वास को पुनः प्राप्त कर अटल आस्था के साथ देश की युवाशक्ति को मृत्युजयी बनाते हुए भारतमाता के लिए अपना जीवन उत्सर्ग करने प्रबल उत्कंठा में बदलकर सुभाष युवाओं की चेतना में क्रांतिकारी परिवर्तन कर देते हैं। वो अब आदर्श के कठोराघातों से यथार्थ के निष्ठुर सत्य को भी धूल में मिला सकता था।
जीवन उत्सर्ग की प्रेरणा, अदम्य साहस, भारत की श्रेष्ठता पुनः प्रतिपादित करने की प्रबल भावना एंव कामना ने सुभाष चन्द्र बोस को 'नेताजी' सुभाषचन्द्र बोस बनाता है। 'नेता' का अर्थ राजनीतिज्ञ या चुनाव लड़ने वाला छुटभैये नेता न होकर वे इस शब्द में एक नवीन अर्थ, नया अर्थ गौरव भरते हैं। 'नेता' का अर्थ 'नेतृत्व' देने वाला व्यक्ति, Leader 32 A Person who can lead the Nation, the Society is called a Leader.'
देश, समाज और युवाओं को एक नई दिशा देने वाला व्यक्ति ही वास्तविक अर्थों में Leader या नेता कहलाता है। इतिहास के उस दौर में युवाओं का उनसे बेहतर दिशा और नेतृत्व प्रदान करने वाला व्यक्ति और कौन हो सकता है? आजाद हिन्द फौज की स्थापना एवं नवयुवकों की फौज खड़ी करना, जो आत्मबलिदान की भावना से लबालब थे, लैश थे, इसी का जीवन्त ऐतिहासिक प्रमाण एवं उदाहरण है। इस युवा शक्ति को सुभाष जीने को, जीवन को राष्ट्र को एक उद्देश्य से संपृक्त करते हैं, जो पतनशीलता के अंधकार को दूर करने का बीड़ा उठाते हुए तमाम कष्ट सहता है, यातनाएं भोगता है, इस विश्वास के मनोबल पर कि 'जब इस जीवन में कोई श्रेष्ठ कर्म नहीं कर सकते तो जीवित रहना व्यर्थ है।'
देश के लिए जीना धर्म है। धर्म और देश के लिए जीवित रहना ही यथार्थ जीवन है। 'भारत और भारतवासियों एवं भारतमाता की दुर्दशा, गुलामी, अन्याय, घोषणा, उत्पीड़न को देखकर परतंत्र भारत माता के साथ-साथ भारतमाता की संतान की आत्मा भी हो उठती है। वह नेताजी सुभाष चन्द्र के नेतृत्व में स्वार्थरहित होकर भारतमाता के लिए अपना जीवन बलिदान, उत्सर्ग की भावना से भरकर युवाशक्ति हुंकार भरता है। आत्मप्रतिष्ठा का मार्ग का वरण कर मातृभूमि पर शीश फूल चढ़ाने निकल पड़ता है। फिर क्या था 'वन्दे मातरम' राष्ट्रीय अभियान और राष्ट्रीय अभियान बनकर पूरे बंगाल और देश में गूंजने लगती है। विपत्तिकाल में मां के आह्वान के अतिरिक्त कोई और दूसरा नाम होता है क्या? 'भारत माता' के चरणों में आत्मोत्सर्ग आत्मत्याग की भावना से भरकर राष्ट्र सेवा के मार्ग में युवाओं का पथ प्रदर्शक बनकर सुभाष पूरी निष्ठा के साथ परतंत्र भारत मात्रा को युक्त कराने के राष्ट्रीय कार्यों में खुद को लाखों युवाओं के साथ झोंक देते हैं। जिदंगी दांव पे लगा देते हैं। प्राण न्यौछावर कर अदम्य उत्साह के साथ करते हैं।
सुभाष और भारत माता के नेतृत्व को पूरे बंगाल, देश और युवा हृदय से स्वीकार करने लगता है। भारत माता के प्रति हृदय में अटूट श्रद्धा रखकर मातृभूमि की सेवा के अधिकार का, कर्त्तव्य का उत्साह के साथ पालन करता है। क्योंकि मां के अतिरिक्त अन्य कोई चीज पूज्य नहीं, और विपत्ति में मां के अतिरिक्त अन्य कोई नाम नहीं होता है। अन्य नाम है क्या? क्योंकि इतिहास गवाह है कि विपत्ति काल में सदा हमने मां का आह्वान किया है।

शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

फूल वालों की सैर 29 अक्टूबर से 4 नवंबर 2023 तक

 नई दिल्ली। मुगल काल से चला आ रहा साप्रदायिक सौहार्द व राष्ट्रीय एकता का संदेश वाहक मेला फूल वालों की सैर इस साल 29 अक्टूबर 2023 को रंगारंग उत्सव का रूप लेगा। इस दिन सुबह 10:30 बजे सर्वोदय को एड सीनियर सेकेंडरी विद्यालय कुतुब महरौली में की चित्रकला प्रतियोगिता होगी। मेने की समारोह की विस्तृत जानकारी देते हुए मेले की आयोजन समिति अजुमन सर ए गुल फरोसा की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि इस वर्ष यह मेला 29 अक्टूबर 2023 से प्रारंभ होगा। 30 अक्टूबर 2023 को फूलों का पखा दिल्ली के उपराज्यपाल श्रीमान विनय कुमार सक्सेना जी को उनके निवास स्थान पर पेश किया जाएगा और साथ ही शहनाई वादन भी होगा फिर इसके बाद फूलों के पंखे दिल्ली के डिवीजनल कमिश्रर को पेश किए जाएंगे और फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री यो अरविंद केजरीवाल जी व मुख्य सचिव को पंखे पेश किए जाएंगे और इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्रर श्री संजय अरोड़ा जी को पंखा पेश किया जाएगा।

दिनांक 31 अक्टूबर 2023 को दोपहर 3:00 बजे सद्भावना वाला फूलों के शहनाई ढोलताशा के साथ इंडिया गेट पर निकल जाएगी. जिनमें सभी समुदायों के लोग वह सदस्य शामिल होंगे और इसके बाद सद्भावना यात्रा फूलों के पचे शहनाई और ढोल ताशा के साथ चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर में से टाउन हॉल होते हुए पुन गौरी शंकर मंदिर पर समाप्त होगी। इस वर्ष साहित्य कला परिषद द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए जाएंगे।

दिनाक 1 नवंबर 2023 को दोपहर से कुश्ती कवडी आदि खेलों का आयोजन महरौली के डीटीए आम बाग पर होगा जिसमें विधायक श्री सोमनाथ भारती जी और नरेश यादव जी मुख्य अतिथि होंगे।

दिनांक 2 नवंबर 2023 की शाम 4:00 बजे महरौनी स्थित महान सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काफी की दरगाह पर दोनों समुदाय के लोग परंपरा के मुताबिक मिलजुल कर फूलों की चादर चढाएंगे। दिल्ली बालों के इस दल का नेतृत्व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब करेंगे। नागरिक और उपराज्यपाल के हाथों चादरपोशी के बाद अगले दिन 3 नवंबर 2023 को शाम 6:00 बजे दोनों समुदाय के लोग व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब मिलजुल कर पांडव कालीन श्री योगमाया मंदिर महरौली में फूलों का पखा और छत्र चढ़ाएंगे।

फूल वालों की सैर का समापन दिनांक 4 नवंबर 2023 को महरौली के ऐतिहासिक जहाज महल के प्रांगण में होगा। इसमें हमारे देश की विविधता और राष्ट्रीय एकता और अखंडता का भव्य और समृद्ध स्वरूप दर्शाने वाले समारोह होगे। उल्लेखनीय है कि विभिन्न राज्यों से आने वाले सांस्कृतिक दल इस समारोह में अपने लोक कथा लोक कलाओं की अलक पेश करते हैं और दरगाह व मंदिर के लिए सजा ध्वज पथा लाते हैं। यह पंखा उसके राज्य के अनुभवी शिल्पकार और दस्तकार तैयार करते हैं। इसके बाद साहित्य कला परिषद द्वारा कल्चर प्रोग्राम व पूरी रात भर कव्वाली का दिलकश मुकाबला होगा।

फूल बालों की सैर के लिए भारत सरकार द्वारा आयोजन समिति बंजुमन सैर ए गुप्त फरोसा को राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भावना पुरस्कार से भी नवाजा है। समिति को यह पुरस्कार भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी द्वारा 12 अगस्त 2009 को प्रदान किया गया था। समिति की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि सन 1812 से 1842 तक हर साल लगने वाले इस मेले को अंग्रेजा ने भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध में तथा अपने विभाजन कार्य नीति के तहत फूट डालो राज करो के अंतर्गत बंद कर दिया। था। इसे दोबारा 1961 में दिल्ली वासियों की अपील पर भारत सरकार ने दोबारा से शुरू कराया था।

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

कुछ भ्रांतियों को तोड़ गए स्पिन के सरदार ‘बिशन सिंह बेदी’

 

बसंत कुमार

इस समय देश में पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और वोटरों को आकर्षित करने के उद्देश्य से हर राजनीतिक दल चुनावी रेवड़ियां बांटने के चुनावी वायदों की झड़ी लगा रहा है। ऐसे चुनावी वातावरण में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी कि देश के 81 करोड़ गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त अनाज वितरण योजना पांच वर्ष तक जारी रहेगी। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने ट्वीट करके वाहवाही लूटने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इसे चुनावी रेवड़ी मानकार इसकी शिकायत चुनाव आयोग से करने का फैसला किया। इसके बाद आर्थिक जानकारों के बीच यह बहस छिड़ गई कि विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश में 81 करोड़ से अधिक जनसंख्या बीपीएल कार्ड धारक हैं और मुफ्त अन्न वितरण योजना का लाभ उठाने के हकदार हैं अर्थात जिस देश की आबादी 141 करोड़ हो और उसमें से 81 करोड़ (58%) लोग अपना पेट भरने के लिए मुफ्त अन्न वितरण योजना पर निर्भर करते हो तो उस देश को विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति कैसे माना जा सकता है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार ऐसे लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 81.35 करोड़ हो गई है और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट की शुरुआत वर्ष 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने की थी। इस योजना के तहत बीपीएल कार्ड धारकों को एक रुपए किलो गेहूँ और तीन रुपए किलो चावल देने की बात की गई थी। इसके तहत प्रति व्यक्ति को हर माह 5 किलो अनाज मिलता था फिर नरेंद्र मोदीजी की सरकार अंत्योदय योजना लेकर आई जिसमें 35 किलो अनाज की सीमा निर्धारित की गई, फ्री राशन योजना इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने वाली थी जिसे अब प्रधानमंत्री ने इसे पांच वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। पौने दो लाख करोड़ की राहत से यह योजना शुरू की गई थी, निश्चित तौर पर यह योजना कोरोना काल में गरीब परिवारों को मुसीबत की घड़ी में बहुत कामयाब रही परंतु इस योजना के चलते अधिकांश लोगों के घर बैठने की प्रवृत्ति के कारण मजदूरों की कमी से छोटे और मझोले उद्यमों को बहुत झटका लगा है तब इस योजना की उपयोगिता पर प्रश्न खड़ा करना जायज लगता है।

प्रश्न यह है कि देश के मध्यम वर्ग के बूते पर करोड़ों लोगो को फ्री राशन मिलेगा। भोजन की गारंटी देना किसी भी जन कल्याणकारी सरकार की अहम् जिम्मेदारी है पर उसके लिए मध्यम वर्ग की जेब काटना कोई भी समझदारी नहीं है। फ्री राशन और हर चीजों पर सब्सिडी देने से करोड़ों की आबादी नकारा बन जाती है पर हमारे देश में सरकारों द्वारा वोट पाने के लिए फ्री राशन और फ्री भोजन की योजनाएं चलाई जा रही हैं जबकि होना यह चाहिए कि सबको शिक्षा और स्वास्थ के साथ-साथ रोजगार की गारंटी दी जानी चाहिए। इस बारे में मुगलकाल में उप्र की राजधानी लखनऊ स्थित इमाम बाड़ा के निर्माण की कहानी से प्रेरणा ली जानी चाहिए, इसका निर्माण 1784 में अवध के नवाब आसिफउद्दौला ने अकाल के दौरान इसलिए कराया था कि लोगों को रोजगार मिल सके, दिन में इसका निर्माण होता और रात में इसे गिरा दिया जाता, कहते हैं कि इस इमाम बाड़ा का निर्माण और अकाल, 11 साल तक चला, इमाम बाड़े के निर्माण में करीब 20000 श्रमिक शामिल थे और इसके निर्माण में उस जमाने में 8 से 10 लाख रुपए की लागत आई पर नवाब ने अकाल के समय काम दिया पर खैरात नहीं दी।

अब राजनीतिक दलों के लिए यह नुस्खा बन गया है कि मुफ्त राशन, सस्ते भोजन की घोषणाएं करो और जब किसी को मुफ्त भोजन मिलेगा तो वह काम क्यों करेगा। देश में पहले विकसित देशों की कंपनिया आकर कारखाने लगाती थीं इससे मजदूरों को बेहतर रोजगार मिलता था और उनके जीवन का स्तर ऊपर उठता था क्योंकि विकसित देशों में आबादी कम होने के कारण मजदूर बहुत महंगे मिलते थे इसलिए ये कंपनियां भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की तरफ रुख करती थीं परंतु अब भारत में मुफ्त राशन मिलने से यहां के मजदूर कामचोरी करने लगे हैं। अब उनके लिए काम हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें अब मुफ्त का राशन मिल ही रहा है। अब तो शहरों के छोटे कारखाने के लिए मजदूर मिलना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि जो लोग कोरोना काल में शहरों को छोड़कर गांवों में पलायन कर गए थे वे फिर वापस नहीं आये।

दुर्भाग्य यह है कि मुफ्त राशन और फ्री बिजली बांटने का काम हर राजनीतिक दल कर रहा है, इस समय मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान सभी पार्टियों में परस्पर होड़ मची हुई है कि कि मुफ्त बिजली, मुफ्त भोजन बांटने की घोषणा में कौन किससे आगे दिख रहा है। दिल्ली में तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उत्तर भारतीय वोटरों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त डीटीसी बस कि ऐसी आदत डाली कि उसके बुते पर वे दो बार से लगातार एकक्षत्र राज कर रहे हैं। उनकी देखा-देखी कांग्रेस और भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल यह सीखने की कोशिश कर रहे हैं कि मुफ्तखोरी की लालच से वोटरों को पटाया जाए। अब वोटरों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इस सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं क्योंकि जनता को फ्री की रेवड़ी खाने की आदत पड़ गई है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोग गांव के कोटेदार के यहां अपनी चौपहियां गाड़ी से बीपीएल कार्ड पर मुफ्त राशन लेने जाते हैं। ये तथ्य हमारी व्यवस्था में भारी पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं और इसी कारण देशभर में गरीबों के लिए प्रारंभ की गई योजनाओं का लाभ लाखों की गाड़ियों में घूमने वाले और करोड़ों के घरों में रहने वाले लोग उठाते हैं। फिर भी गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त राशन वितरण कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या 81 करोड़ से अधिक हो जाना सचमुच चिंता की बात है आखिर देश में मुफ्त रेवड़ी बांटने की प्रथा कब खत्म होगी।

(लेखक भारत सरकार में उप सचिव पद पर रह चुके हैं।)

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