सोमवार, 21 अगस्त 2023

राष्ट्रीय आन्दोलन में हिन्दी की भूमिका

 डॉ. मीना शर्मा

वैसे तो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की विधिवत शुरुआत सन् 1885 में भारतीय कांग्रेस की स्थापना के साथ हो गई थी किन्तु 20वीं सदी के आरम्भ से इसकी तीव्रता में गुणात्मक परिवर्तन आया। एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत जन्म ले रहा था और उसके साथ ही राष्ट्रीय भावना एवं राष्ट्रीय पहचान व अस्मिता का सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय पुर्नजागरण की चेतना भी उभरने लगी थी। राष्ट्रीय जागरण अब सांस्कृतिक जागरण में रूपान्तरित हो रहा था। राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव राजनीतिक जीवन, सामाजिक जीवन, सांस्कृतिक जीवन और राष्ट्रीय जीवन पर भी पड़ा। भारतीय संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा ने अपनी पहचान को पाने की अराकलता एवं चुनौती राष्ट्रनायकों के समक्ष रख दी थी। औपनिवेशिक विमर्श से उत्पन्न राष्ट्रीयता की भावना का उदय भारत समेत लगभग सभी गुलाम देशों में हुआ। एक राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रय भाषा होती है जो उसकी पहचान भी होती है, यह सवाल स्वाधीनता सेनानियों और सुधारकों के मानस को आंदोलित करता था। 19वीं शताब्दी के सुधारकों के समक्ष जब यह प्रश्न उठा कि जो नवीन भारत जन्म ले रहा है उसकी राष्ट्रभषा क्या हो? तब अनायास ही वे इस निर्णय पर पहुंचे कि नवीन भारत की राष्ट्रभाषा केवल हिन्दी ही हो सकती हैं।
राष्ट्रवाद की भावना को संपूर्ण भारत वर्ष के जन-जन में फैलने के लिए अन्तःप्रान्तीय सम्पर्क की आवश्यकता महसूस की गई तब भी यह महसूस किया गया कि सभी प्रादेशिक पूर्व ग्रहों से ऊपर उठाकर वह (सम्पर्क भाषा ) भारतीय भाषा हिन्दी ही हो सकती है। क्योंकि एक बहुभाषी देश में स्वाधीनता की चेतना को प्रत्येक गांव और प्रत्येक आदमी तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय एकता के निर्माण के लिए हिन्दी की एकमात्र अस्त्र हो सकती है। राजा राम मोहन राय ने भी महसूस किया कि जनता में जाने और उसे आंदोलित करने के लिए अंग्रेजी का कोई उपयोग नहीं। उसे अपनी भाषा के द्वारा ही करना होगा। राष्ट्रीय आजादी के लिए राष्ट्रीय एकता और अखंडता अनिवार्य होता है और राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बांधने वाला सूत्र के बिना यह परिकल्पना साकार नहीं हो सकती। अतः चुनौती कई स्तरों पर थी। उस सूत्र की पहचान करते हुए उस दौर के लगभग सभी राष्ट्रनायकों ने विचार किया। 1875 में ब्रह्मसमाज के प्रधान नेता केशवचन्द्र सेन ने कहा कि अभी कितनी ही भाषाएं भारत में प्रचलित हैं, उनमें से हिन्दी भाषा ही सर्वत्र प्रचलित है। इसी हिन्दी को भारत वर्ष की एकमात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाए तो सहज ही में यह एकता सम्पन्न हो सकती है।'
राष्ट्र निर्माण और भाषा निर्माण की दोहरी प्रक्रिया समानान्तर रूप से एक दूसरे से सहयोग करते हुए हो रही थी । हिन्दी राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक बन चुकी थी। राष्ट्रीय आकांक्षा, मुक्ति के स्वप्नों को आंखों में लिए नयी सामाजिकता के निर्माण के लिए, भारत की विविधता के इन्द्रधनुषी रंग को एक भाषा के माध्यम से पकड़कर उनमें अन्तर्निहित सौन्दर्य को उद्घाटित करने के लिए भाषागत वैविध्य की बाधा को पाटकर उसमें राष्ट्रीय एकता व स्वाधीनता के विचारों को अभिव्यक्त करने का समर्थ और समक्ष माध्यम के रूप में हिन्दी की पहचान हो चुकी थी। इसी को लक्षित करते हुए बंकिम चन्द्र ने कहा कि हिन्दी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा होकर करेगी, क्योंकि हिन्दी भाषा की सहायता से भारत के विभिन्न प्रदेशों में ऐक्स- बांधने स्थापित कर भारत बंधु कहलाने योग्य है।
भारत के स्वत्व और पहचान के संदर्भ को चिन्हित कर ही राष्ट्रप्रेम को जन-जन में फैलाने के लिए हिन्दी भाषा को माध्यम के रूप में चुना गया तथा इस भारत की समस्त उन्नति का मूलमंत्र घोषित किया गया-
“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ।
निज बिन भाषा ज्ञान के मिटत न हित को शूल ॥”
पहचान का संबंध अतीत से होता है। अत: अपने अतीत के गौरव को पुर्न सृजित कर अपनी परंपरा का गौरव गान कर भारतीय जनजागरण की भाषा बनने का गौरव हिन्दी को ही जाता है। इस स्वत्व से ही स्वदेश प्रेम, स्वदेश वस्तुओं को प्रयोग, स्वदेशी भाषा और अंततः स्वतंत्रता की प्राप्ति का लक्ष्य इसी नवजागरण और औपनिवेशिक विमर्श की कोख से पैदा होता है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने अपनेपन की भावना को गाढ़ापन प्रदान किया। सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग का प्रश्न इसी औपनिवेशिक विमर्श की प्रसव पीड़ा से उत्पन्न हुआ था । यी कारण था कि हिन्दी का मसला सिर्फ एक भाषा का मसला न रहकर एक राष्ट्रीय भाषा और एक राष्ट्रीय पहचान का भी था । यही कारण था कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सन् 1882 में शिक्षा आयोग के समक्ष इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा था-
" सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग होता है। यही ऐसा देश है, जहां न तो अदालती भाषा...... हिन्दी का प्रयोग होने से जमींदार, साहूकार, व्यापारी और सभी को सुविधा होगी, क्योंकि सभी जगह हिन्दी का ही प्रयोग है। "
हिन्दी भाषा के अधिकांश प्रदेशों और लोगों द्वारा बोली और समझी जाने के कारण एक सार्वदेशिक भाषा के पद पर आसानी से स्थापित होकर राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में कार्य करने लगी। विलक्षण बात यह है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव उन महापुरुषों ने किया जिनमें अधिकांश की मातृभाषा हिन्दी न होकर बंगला, गुजराती, मराठी या कोई और भाषा थी। हिन्दी एवं अहिन्दी भाषी क्षेत्र के इन सभी नेताओं ने इसे सम्मिलित भारत की संस्कृति और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक माना। राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र प्रेम को साधने के लिए सुभाषचन्द्र बोस ने भी हिन्दी की भूमिका को रेखांकित इन शब्दों में किया है- “देश की एकता के लिए एक भाषा का होना जितना आवश्यक है, उससे अधिक आवश्यक है- देश भर के लोगों में देश के प्रति विशुद्ध प्रेम तथा अपनापन का होना। यदि आज हिन्दी मान ली गई है, तो यह अपनी सरलता, व्यापकता और क्षमता के कारण। वह किसी प्रांत विशेष की भाषा नहीं है बल्कि सारे देश की भाषा है।"
भाषा की मुक्ति के बिना राष्ट्र की मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए भाषा के स्तर पर भी मुक्ति की मांग स्वाभाविक है। अंग्रेज और अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ना प्रकारान्तर से राष्ट्रीय अस्मिता को प्राप्त करने का ही दूसा नाम था । अतः कुछ राष्ट्रीय नेताओं ने स्वदेशी को अपनाने और विदेशी के बहिष्कार का संकल्प लेकर और उसे स्वाधीनता की समग्र परिकल्पना से जोड़कर ही स्वदेशी वस्तु, स्वदेशी भाषा, स्वराज्य स्वतंत्रता (स्वयं का तंत्र) को विकसित करने की मांग करने लगे। क्योंकि भाषा की स्वायत्तता के बिना मनसिक वराज्य संभव लगे। 
शिक्षा, प्रशासन, न्याय आदि सभी क्षेत्रों में हिन्दी को लागू करने की मांग जोर पकड़ने लगी। अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी शिक्षा विदेशी दासता का प्रतीक मानी जाने लगी और हिन्दी हिन्दुस्तान की पहचान तथा हिन्दुस्तान की आत्मा के रूप में-
'हिन्दी है हम वतन हैं हिन्दोस्तान हमारा।'
पूरे भारत वर्ष के स्वाधीनता सेनानियों ने हिन्दी और हिन्दुस्तान को अभिन्न समझकर ही राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति भी अपनी व्यक्त की। राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसी भावना को केन्द्र में रखकर अपने विशेष अधिवेशन में हिन्दी के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर अपनी कार्यवाई हिन्दी में करने का फैसला किया। सन् 1906 में कांग्रेस अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी ने प्रथम बार 'स्वराज्य' हिन्दी शब्द का प्रयोग किया। बाद में तिलक ने इसे विकसित करते हुए जोरदार शब्दों में कहा- 'स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।' तिलक के ये वाक्य पूरे भारत वर्ष में एक नारे के रूप में लोगों के दिलों में गूंजने लगी । स्वराज्य की प्राप्ति की यह चिंगारी अब आम लोगों से जुड़ने लगी। जो कांग्रेस पढ़े-लिखे लोगों की पार्टी थी उससे आम लोगों के जुड़ने और जाड़ने में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को व्यापक आधार देने में हिन्दी एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई है। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को करोड़ों निरक्षर लोगों ने निरक्षर स्त्रियों और भूखे लोगों को स्वराज्य से जोड़ने की भाषा महात्मा गांधी ने हिन्दी को ही समझा। गांधीजी की स्पष्ट मान्यता थी कि भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है-
“यदि स्वराज्य अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतवासियों का है और केवल इनके लिए है जो सम्पर्क भाषा अवश्य अंग्रेजी होगी। लेकिन यदि वह करोड़ों निरक्षर लोगों, निरक्षर स्त्रियों और सताए हुए अछूतों के लिए है, तो सम्पर्क भाषा केवल हिन्दी ही हो सकती है। "
हिन्दी के माध्यम से आम आदमी को राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ने का ही परिणाम था कि राष्ट्रीय आजादी को चाहने वालों, राष्ट्र के लिए मर-मिटने वाले लोगों की संख्या अब करोड़ों में हो गई। देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पण त्याग व बलिदान की भावना से समूचा देश आंदोलित हो गया हिन्दी और स्वाधीनता आंदोलन दोनों के मिल जाने से इन दोनों का आधार राष्ट्रीय हो गया। अब स्वाधीनता के विचारों को पूरे भारतवर्ष में प्रत्येक प्रांत, प्रत्येक धर्म, प्रत्येक व्यक्ति तक हिन्दी के माध्यम से पहुंचाना आसान था ।
राष्ट्रीय एकता और स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी की भूमिका को पहचान कर ही राष्ट्रनायकों ने उसे राष्ट्रभाषा के पद पर सुशोभित किया। उन राष्ट्रनायकों में स्वामी दयानंद सरस्वती, सुभाषचन्द्र बोस, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, पुरुषोत्तम दास टंडन, राजेन्द्र प्रसाद आदि प्रमुख थे।
हिन्दी के महत्व को समझ कर ही स्वाधीनता सेनानियों ने उसके माध्यम से राष्ट्रीय विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए हिन्दी पत्रकारिता को अपनाया । पं. मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, तिलक आदि सभी हिन्दी पत्रकारिता के माध्यम से जन जागृति, समाज सुधार, राष्ट्रीय चेतना, देश भक्ति आदि का कार्य करते रहे। 'मास' से कटकर महान से महान विचार भी अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सकता। इसलिए हिन्दी को मास की भाषा समझकर मास को आंदोलित व संगठित करने का एक सशक्त माध्यम बना हिन्दी पत्रकारिता । हिन्दी आंदोलन और स्वाधीनता आंदोलन दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ते गए। हिन्दी का साहित्यकार और स्वाधीनता सेनानी दोनों उसी राष्ट्रीय भावना को अपने-अपने तीरके से लेकर चलता । इस अर्थ में उस युग का साहित्यकार किसी स्वाधीनता सेनानी से कम नहीं है तो दूसरी तरफ उस दौर के स्वाधीनता सेनानी भी साहित्यकार की भूमिका में नजर आते हैं। इन दोनों वर्गों में रास्ते का भेद है, मनोभेद नहीं। दोनों का लक्ष्य एक ही है और वह है- राष्ट्रीय आजादी और राष्ट्रीय स्वाधीनता एकता व अखंडता । साहित्य और राजनीति उस दौर में एक मिशन था, प्रोफेशन नहीं। इसीलिए साहित्य भी उस दौर में राजनीति के आगे-आगे चलने वाली रोशनी थी जो आजादी का रास्ता दिखाते हुए बढ़ रही थी। और ये सफर तब तक चलता रहा जब तक भारत को 1947 में आजादी मिल गई।

- डॉ. मीना शर्मा -

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष बनाम सरकार

अवधेश कुमार 

लोकसभा में तीन दिनों तक चले अविश्वास प्रस्ताव पर बहस ने आगामी 2024 लोकसभा चुनाव तक की राजनीतिक ध्वनियों की दिशा तय कर दी है। राजनीति में सामान्य रुचि रखने वालों में से भी शायद ही कोई हो जिसने अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा अवसर मिलने पर लाइव न देखी या सुनी हो। पार्टियों और नेताओं के लिए यह केवल एक दूसरे को घेरने, उत्तर देने, व्यंग्य और कटाक्ष करने का ही अवसर नहीं होता, बल्कि नेताओं -कार्यकर्ताओं -समर्थकों को बोलने व तर्क करने के लिए विषय-वस्तु, शब्दावलियां भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। कम से कम भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने बोलते समय इस पहलू का अवश्य ध्यान रखा। बावजूद यह संभवतः पहला अविश्वास प्रस्ताव था जिसमें सरकार की ओर से बोलने वालों को विपक्ष के तथ्यों ,तर्कों व आरोपी की काट के लिए  शोध या छानबीन कर विषयवस्तु लाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। विपक्ष चाहे जितनी अपनी वाहवाही करे कि उसने प्रधानमंत्री को बोलने के लिए विवश कर दिया, सच यह है कि उनकी तैयारी ऐसी नहीं थी जिससे सरकार को घेरा जा सके। विपक्ष के नेताओं का एक भी भाषण नहीं जिसे सुनने के बाद लगे कि सरकार के लिए इसका उत्तर देना कठिन या असंभव होगा या वह निरुत्तर हो जाएंगे। आप आरोप लगाएं, हमले करें और उनमें अधिकृत तथ्य नहीं हो तो संसद की बहस में उसके मायने नहीं होते। सच कहा जाए तो सरकार की ओर से विशेषकर गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण या प्रधानमंत्री तक ने अपनी ओर से ही संबंधित विषय रखे ताकि वह सब संसद के रिकॉर्ड में आ जाए और रुचि रखने वालों को उपलब्ध हो।

आईएनडीआईए के गठन के बाद 26 दलों के संगठित विपक्षी समूह के लिए यह नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल का सबसे बड़ा अवसर था जिसमें वह स्वयं की क्षमता प्रमाणित कर सकते थे। वे साबित कर सकते थे कि हमारे पास इतनी योग्यता है जिससे हम सरकार को उन्हीं के तथ्यों और तर्कों से कटघरे में खड़ा कर सकते हैं, देश के भविष्य को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समानांतर हर विषय पर हमारे पास ऐसी रूपरेखा और सोच के साथ व्यक्तित्व भी हैं जो बेहतर सरकार चला सकते हैं। क्या कोई स्वीकार करेगा कि आईएनडीआईए इन कसौटियों पर स्वयं को खरा उतारने में सफल हो सका? कांग्रेस की ओर से तरुण गोगोई ने अवश्य अपने भाषण में विषयवस्तु रखें, लेकिन वह इतना प्रभावी नहीं था जिनसे सरकार को उत्तर देने में कठिनाइयां पैदा हो। राहुल गांधी जब दूसरे दिन बोलने के लिए खड़े हुए तो सोचा गया कि भारत जोड़ो यात्रा तथा सजा के कारण चार महीने से ज्यादा समय तक लोकसभा सदस्यता से वंचित रहने के बाद उनके भाषण में अवश्य तथ्यों के साथ कटाक्ष एवं आक्रमण होंगे। आखिर आईएनडीआईए की सबसे बड़ी पार्टी के शीर्ष सक्रिय नेता होने के कारण संसद में आगे बढ़कर अपने वक्तव्य से उन्हें ही नेतृत्व संभालना था। जब आप 37 मिनट के भाषण में 15 मिनट से ज्यादा भारतयात्रा पर बोलेंगे और शेष सरकार को देशद्रोही से लेकर भारत माता की हत्या करने वाले बाबा बताने में ही समय लगा देंगे तो आपके पास मणिपुर से लेकर आर्थिक, सांस्कृतिक, रक्षा, विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा आदि पर बोलने के लिए समय कहां रहेगा। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी का वक्ताओं में नाम भी नहीं था। ऐसा लगता है जब गृह मंत्री अमित शाह ने तंज कसा तो नाम शामिल किया गया। ऐसा लगा जैसे वे प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक, अशोभनीय शब्दों और तुलनाओं की पोटली लेकर उपस्थित हुए हो। परिणामत: भाजपा के सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त से उनकी भीड़ंत होते-होते बची। वीरेंद्र सिंह ने सदन में अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांग लिया पर अधीर रंजन इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्हें न केवल निलंबन झेलना पड़ा बल्कि मामला विशेषाधिकार समिति के पास चला गया है।

सरकार की ओर दृष्टि डालिए तो दो भाषणों पर सबसे ज्यादा ध्यान था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह। संसद के अंदर गृह मंत्री अमित शाह ने अभी तक के भाषणों से योग्यता और क्षमता को बार-बार प्रमाणित किया है। भाजपा के विरोधी टिप्पणीकार भी कह रहे हैं कि उनका भाषण सबसे प्रभावी था क्योंकि उसमें हर उन पहलुओं से संबंधित तथ्यात्मक विवरण और तर्क थे, हर ऐसे प्रश्न के उत्तर थे जो विरोधी लगातार उठाते । इसके साथ उन्होंने अपनी ओर से और ऐसी बातें रख दीं जिनसे सरकार का पक्ष मजबूत होता हो और भाजपा के नेताओं - कार्यकर्ताओं को तो बोलने के लिए विषय वस्तु मिलते ही हो देश के आम लोगों को भी लगे लगे कि वाकई सरकार ने हर स्तर पर काम किया है और आगे भी कर रही है। मणिपुर पर उन्होंने करीब आधा घंटा बोला जिसमें उत्तर-पूर्व की कुछ और कुछ बातें भी थीं। वे अपने भाषण से यह संदेश देने में सफल रहे कि विपक्ष के सारे आरोप निराधार व राजनीति से प्रेरित हैं। मणिपुर में हिंसा भड़कने के 24 घंटे के अंदर ही सरकार ने वे सारे कदम उठाएं और अभी भी सक्रिय है ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो।

अधीर रंजन चौधरी का भाषण उनके अगले दिन था। वे गृज्ह मंत्री के भाषण पर फोकस कर विपक्ष की दृष्टि से अपनी बात रखते तो लगता कि वाकई विपक्ष का कोई नेता सरकार को उसके तथ्यों के आईने में घेरने के लिए तैयारी किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषण कला पर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। पूरे अविश्वास प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि प्रधानमंत्री ने अपने व्यंग्य, हास्य व कटाक्षों के साथ उपमा,अलंकारों आदि का प्रयोग कर यह साबित किया कि कठोर से कठोर बातें और तीखे हमले के लिए उग्र होकर गुस्सैल शब्दावलियों का प्रयोग करना हमेशा आवश्यक नहीं होता। उन्होंने विपक्ष विशेषकर कांग्रेस की बखिया उधेड़ दी किंतु बोलने की शैली ऐसी थी जिसमें हंगामा व विरोध का अवसर नहीं मिला। समर्थक हो या विरोधी प्रधानमंत्री को सुनते समय बार-बार हंसी आती थी। उदाहरण के लिए उन्होंने आईएनडीआईए नाम को लेकर यही कहा कि आपने इसके लिए भी एनडीए चुरा लिया तथा आपका इंडिया घमंडइयआ है ,जिसमें दो आई एक हम और दूसरा परिवार के लिए है। यह सुनने में सरल लगता है लेकिन ऐसे कटाक्ष के लिए भी काफी सोचना पड़ा होगा। उन्होंने यूपीए की जगह आईएनडीआईए रखने पर भी तंज कसा कि आपने यूपीए का क्रिया कर्म और श्राद्ध कर दिया जिस पर मैं थोड़ी देर से संवेदना प्रकट कर रहा हूं। लेकिन आप खंडहर पर प्लास्टर चढ़ा कर जश्न मना रहे हैं। इंडिया नाम रखने से आप इंडिया नहीं हो सकते हैं और इसके लिए उन्होंने दो पंक्तियां सुनाई –'दूर‌ युद्ध से भागते नाम रखा रणधीर, भाग्यचंद की आज तक सोई है तकदीर।' इस पर ठहाके तो लगने थे।  

अविश्वास प्रस्ताव का उपहास उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि आपको मैंने 2018 में काम दिया था और मैं आभारी हूं कि आपने उसे पूरा किया। यानी आपने मेरे कहने पर 2023 में अविश्वास प्रस्ताव लाया लेकिन थोड़ी तैयारी करके तो लाते, अब मैं फिर आपको काम दे रहा हूं कि 2028 में आप लाइए लेकिन थोड़ी तैयारी करके लाइए। इस आपा खोने की शैली में हमला किया जा सकता था, लेकिन इस शैली का प्रभाव लंबे समय तक रहेगा। हालांकि उन्होंने समय-समय पर आक्रामकता भी प्रदर्शित की, पर अपने पद और उत्तरदायित्व का ध्यान रखा। देश को यह कहते हुए संबोधित किया कि यह कालखंड महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और विश्व में आर्थिक महाशक्ति बनकर उठकर खड़ा हो रहा है तथा ऐसी कई स्थितियां हैं जिनसे अगले 1000 सालों का आधार बनेगा। इस कारण सबको अपने-अपने दायित्व का पालन करना है। विपक्ष ने सबसे बड़ी गलती बहिर्गमन में जल्दबाजी करके किया। प्रधानमंत्री मणिपुर पर नहीं बोल रहे हैं तो इसी का बहाना बनाकर निकल जाओ। उसके बाद प्रधानमंत्री ने मणिपुर और पूर्वोत्तर पर भी बोला। यह विश्वास दिलाते हुए कि मणिपुर में भी शांति का सूरज चमकेगा और मिलकर वहां इसके लिए प्रयास करने की अपील की।

उन्होंने मणिपुर के लोगों से भी अपील की। इस तरह प्रधानमंत्री का अविश्वास प्रस्ताव पर उत्तर देश के नेता का उत्तर था जिसमें विपक्ष की आलोचना थी, राजनीति में संसद के अंदर और बाहर तनाव और उग्र हिंसाजनक शब्दों को देखते हुए उसे व्यंग्य और हास्य से ठंडा करने की कोशिश थी तो देश के अंदर आत्मविश्वास पैदा करने का भाव भी। चूंकी विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाकर भी मैदान खाली छोड़ दिया था इसलिए प्रधानमंत्री, गृहमंत्री एवं दो-तीन दूसरे नेताओं के लिए अपने तरीके से बात रखने का पूरा अवसर था। आईएनडीआईए  गठबंधन के बाद अगर अविश्वास प्रस्ताव को लेकर नेताओं की बैठक होती और नेताओं को अलग -अलग विषय बोलने के लिए दिए जाते तो स्थिति दूसरी होती। विपक्ष के व्यवहार से यही संदेश निकला  कि राजनीतिक विवशताओं के चलते वे साथ आ गये, पर उनके बीच सरकार से मुकाबले के लिए भी समन्वय और सामंजस्य का अभाव है। हालांकि सरकार की ओर से भी कई वक्ताओं के भाषण प्रभावी और स्तरीय नहीं थे, पर कुल मिलाकर समन्वय और सामंजस्य के साथ परिश्रम और तैयारी की पूरी झलक थी।

पता- अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल 98911027208



मंगलवार, 15 अगस्त 2023

शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए व अमनदूत एनजीओ ने ध्वजारोहण कर मनाया 77वां स्वतंत्रता दिवस, तिरंगा फहराकर दिया शांति का संदेश

 मो. रियाज़

नई दिल्ली। इस वर्ष हमारा देश आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है। 15 अगस्त 1947 को हमें अंग्रेजों के चंगुल से आजादी मिली थी। 15 अगस्त के दिन हर साल भारत के प्रधानमंत्री दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर तिरंगा फहराने के बाद देश को संबोधित करते हैं। स्कूलों व सरकारी दफ्तरों आदि जगहों पर भी तिरंगा फहराया जाता है। राष्ट्र गान गाकर तिरंगे को सलामी दी जाती है। इसके बाद रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसी मौके पर अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के ऑफिस के पास सादगी से आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मनाई गई।
अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन ने ध्वजारोहण कर लोगों को स्वतंत्रता दिवस की 76वीं वर्षगांठ पर संबोधित करते हुए कहा कि आज हम सभी यहां आजादी का जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं। स्वतंत्रता दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है। हमारा देश 1857 से लेकर 1947 तक अंग्रेजों का गुलाम रहा था। 15 अगस्त 1947 के दिन हमें आजादी मिलने के बाद हम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में घोषित हुए थे। तभी से भारतवासी इस दिन को "स्वतंत्रता दिवस" के रूप में बहुत ही धूम-धाम और हर्षोउल्लास से मनाते है।
उन्होंने आगे बताया कि अंग्रेजों से आजादी दिलाने में कई स्वतंत्रता सेनानियों ने सालों तक संघर्ष किया था। इस संघर्ष की शुरुआत तब से हुई जब मंगल पांडे को अंग्रेजों ने गोली मारी थी। तभी से देश में आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई थी। इसके बाद तो महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बाल गंगाधर तिलक, लोक मान्य तिलक, लाला लाजपत राय और खुदीराम बोस जैसे सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया। इस संघर्ष में सबसे अहम योगदान महात्मा गांधी का माना जाता है। उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए सत्याग्रह आंदोलन चलाया और कई बार तो उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और समय-समय पर अपने आंदोलनों के जरिए अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। 
 हमारा देश आज़ादी की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है और इस दौरान देश हर मोर्चे पर दुनिया भर में अपनी धाक जमा चुका है। साइंस, टेक्नोलॉजी, आर्थिक, कृषि, शिक्षा, साहित्य, खेल समेत तमाम मोर्चों पर भारत बहुत तरक्की कर चुका है। परमाणु क्षमता संपन्न देश भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कर चुका है। विकास के हर क्षेत्र में भारत बहुत आगे बढ़ चुका है। दुनिया भारत की ओर देख रही है।
इस अवसर पर ध्वजारोहण के बाद लोगों में मिठाई भी बांटी गई। इस मौके पर अमनदूत एनजीओ व शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के सदस्य व आम जनता मौजूद थी।

 


सोमवार, 14 अगस्त 2023

समाचार में मूल्य किस चिड़िया का नाम है?

 डॉ. मीना शर्मा

जमाना बदल गया है। मीडिया बदल गयी है और मूल्य.. मूल्य का क्या है? मूल्य किस चिड़िया का नाम है। इस चिड़िया का नाम आप यदि आप के बड़े - बड़े पत्रकार और संपादक के सामने लेंगे और इस चिड़िया का अता-पता पूछेंगे तो वो एक बार आपको ऊपर से नीचे भौंह चढ़ाकर विस्मय भरी नजर से देखेंगे और मन-ही-मन कहेंगे, ऊल्लू है क्या, कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा हैं, लगता है पगला गया है, 'क्या बकवास है' वगैरह-वगैरह। तो क्या सचमुच जमाना बदल गया है, जिसमें मूल्य का नाम लेते ही उसे पागलपन मान लिया जाता हो, तो आप सोचेंगे कि क्या यह वाकई बेमानी वाला प्रश्न है जो सबको हैरानी में डाल देता है। तब ऐसी स्थिति में आज की मीडिया के वर्तमान परिदृश्य के बारे में सहज परिकल्पना की जा सकती है।
बदले-बदले से अन्दाज नजर आते हैं, बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं, कभी था वो एक जमाने में जन सरोकार अब तो समाचार के कारोबार नजर आते हैं। अब तो जनता का अखबार बाजार का अखबार बनकर रह गया है। आज की मीडिया कॉर्पोरेट मीडिया है। मीडिया के इस कार्पोरेट कल्चर ने उसे बाजार कल्चर ने पत्रकारिता के स्वरूप, पत्रकारिता के तौर-तरीके, पत्रकारिता के सिद्धांत और पत्रकारिता के मूल्य सब कुछ बदल कर रख दिया है। पत्रकारिता के चरित्र को बदलकर रख दिया है।
आज की मीडिया, पूंजी, बाजार और सत्ता का पिछलग्गू बनकर रह गया है। इस कार्पोरेट मीडिया में एक टी.वी. चैनल या एक अखबार 150-200 करोड़ का माल लगता है, निवेश होता है और इस भारी निवेश की वसूली करोड़ों के विज्ञापन, खबरों की खरीद-फरोख्त कर की जाती है या दूसरे शब्दों में कहें तो यह खबरों के प्रबंधन का दौर है, न्यूज ट्रेडर का दौर है। खबरों के सौदागर अब खबरों का सौदा करते हैं सत्ता के साथ अपना नेक्सस बनाने के जुगाड़ में भिड़े रहते हैं। सत्ता की मीडिया के दौर में हाशिए के लोगों की आवाज आम दम तोड़ कर रह जाती हैं।
एक समय अखबारों का नारा था 'सबकी खबर ले सबकी खबर दें' उस खबर के दायरे में सब थे। लेकिन आज उस 'सब' की पड़ताल करने पर आए देखते हैं कि उस सब में कौन-कौन शामिल है और कौन-कौन बाहर है। क्या उसमें स्त्री, बच्चे और वृद्ध शामिल हैं? क्या उसमें दलित शामिल हैं? क्या उसमें आदिवासी शामिल हैं? क्या उसमें मुस्लिम शामिल हैं? क्या उसमें गांव-देहात शमिल है? क्या उसमें उत्तर पूर्व शामिल है? क्या उसमें हाशिए के लोग शामिल हैं? क्या उसमें आम जनता जनार्दन की आवाज शमिल है? हम पाएंगे कि इतनी बड़ी आबादी, इतना बड़ा वर्ग दूसरे शब्दों में कहें तो मास ही गायब है और बिना मास के मास मीडिया कैसा? आज सोशल मीडिया पर जो इतने बड़े पैमाने पर आम लोगों के द्वारा अभिव्यक्ति के नये प्लेटफार्म पर जाकर व्यापक एवं मास अभिव्यक्ति करना, इसी अंतराल के असंतोष का प्रगटीकरण है अथवा विस्फोट है। एक वैकल्पिक माध्यम को पाकर मास की सचित अनुभूति का सैलाव ही प्रकारान्तर से सोशल मीडिया पर बह निकला है। वह कितना सही और कितना गलत है, वो एक अलग मुद्दा है।
आज की मीडिया के समक्ष जो चुनौतियाँ और संकट है उसका कारण उसका जिम्मेदार बाहर की शक्तियां न होकर मीडिया के अपने भीतर की कमजोरियां हैं। अखबार की चुनौतियां बाहर से नहीं वरन् अपने अंदर से ही हैं। अंदर ही अंदर समाचार में से विचार को खत्म कर दिया गया, मुद्दों का निर्वासन कर दिया गया, जनता की आवाज की अनसुनी कर दी गयी, वंचितों के साथ वंचना की गई, ईमानदार पत्रकारिता के रास्ते को भुला दिया गया, गांव, देहात, खेत-खलिहान की सुध लेनी छोड़ दी, लोकतंत्र का चौथा प्रहरी न बनकर, प्रतिपक्ष की भूमिका छोड़ दी। समाचार मूल्य के रक्षार्थ सत्यता, निष्पक्षता, विश्वसनीयता, संतुलन, जन सरोकार, समग्रता, सामाजिक- राष्ट्रीय दायित्व बोध, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, न्याय के पक्ष में खड़े होने की बुनियादी पहचान ओर ईमानदारी का दामन छोड़ दिया है। वंचितों की, पीड़ितों की, शोषितों की आवाज एंव चीखें हमें सुनाई नहीं पड़ती हैं। जन सामान्य की धड़कन नहीं सुनाई पड़ती है। आखिर हो क्या गया है इस मीडिया को ? बाजार मीडिया का संग पाकर वह बीमारू मीडिया हो गया है। 'मिशन' 'प्रोफेशन' से कहीं दूर निकलकर वह एक धंधा बन गया है। आपको सर्वत्र विज्ञापन दिखेगा विचार नहीं। पहले समाचारों के बीच-बीच में विज्ञापन दिखता है और अब विज्ञापनों के बीच-बीच में समाचार ढूंढकर दिखता है। पहले टीवी पर न्यूज के बीच में ब्रेक होता था अब ब्रेक के बीच में न्यूज आता है। और न्यज भी कैसी उसकी भी बानगी देखिए । पहले आप न्यूज देखते थे अब न्यूज के साथ व्यूहज' देखते हैं। जो न्यूज पर चस्पाया जाता है चैनल और अखबारों के अपने निहितार्थ (विस्टेड इंट्रेस्ट) और जिसमें विचारधारात्मक जुड़ाव शामिल होता है। जिसमें चैनलों और अखबारों के आर्थिक हित और राजनीतिक हित जुड़े होते है। पत्रकार संपादक की खुशामद में लगा रहता है तो संपादक मालिकों के लिए न्यूज ब्रोकर का काम करता है। उसका काम होता है अपने पूंजीपति मालिक के लिए राज्यसभा का टिकट दिलवाने की जुगाड़ भिड़ाना, लॉबिग करना और खबरों की सौदेबाजी करना । ऐसी स्थिति में ईमानदार पत्रकारिता रही कहाँ ? बाजार, पैसा, राजनीति के खेल में पत्रकारिता भी शामिल हो गयी है, जो इनकी शर्तों पर चलती है, इनके इशारे पर जाचती है और अखबार महज एक उत्पाद बनकर रह गया है। जो जनता को उपभोक्ता मानकर खबर परोस रहा है।
आवाज एंव चीखें हमें सुनाई नहीं पड़ती हैं। जन सामान्य की धड़कन नहीं सुनाई पड़ती है। आखिर हो क्या गया है इस मीडिया को ? बाजार मीडिया का संग पाकर वह बीमारू मीडिया हो गया है। 'मिशन' 'प्रोफेशन' से कहीं दूर निकलकर वह एक धंधा बन गया है। आपको सर्वत्र विज्ञापन दिखेगा विचार नहीं। पहले समाचारों के बीच-बीच में विज्ञापन दिखता है और अब विज्ञापनों के बीच-बीच में समाचार ढूंढकर दिखता है। पहले टीवी पर न्यूज के बीच में ब्रेक होता था अब ब्रेक के बीच में न्यूज आता है। और न्यज भी कैसी उसकी भी बानगी देखिए । पहले आप न्यूज देखते थे अब न्यूज के साथ व्यूहज' देखते हैं। जो न्यूज पर चस्पाया जाता है चैनल और अखबारों के अपने निहितार्थ (विस्टेड इंट्रेस्ट) और जिसमें विचारधारात्मक जुड़ाव शामिल होता है। जिसमें चैनलों और अखबारों के आर्थिक हित और राजनीतिक हित जुड़े होते है। पत्रकार संपादक की खुशामद में लगा रहता है तो संपादक मालिकों के लिए न्यूज ब्रोकर का काम करता है। उसका काम होता है अपने पूंजीपति मालिक के लिए राज्यसभा का टिकट दिलवाने की जुगाड़ भिड़ाना, लॉबिग करना और खबरों की सौदेबाजी करना । ऐसी स्थिति में ईमानदार पत्रकारिता रही कहाँ ? बाजार, पैसा, राजनीति के खेल में पत्रकारिता भी शामिल हो गयी है, जो इनकी शर्तों पर चलती है, इनके इशारे पर जाचती है और अखबार महज एक उत्पाद बनकर रह गया है। जो जनता को उपभोक्ता मानकर खबर परोस रहा है।
राजनीति से लेकर शिक्षा, चिकित्सा, खनन, वकालत, प्रशासन, न्याय आदि के क्षेत्र में नोट बटोरने का जुनून सवार है तो अकेले पत्रकार से ही त्यागी तपस्वी, साधु-संत बनने की अपेक्षा क्यों ? किन्तु क्या दूसरों के पाप गिनाने से अपने पाप कम हो जाते हैं क्या? वह (+) और माइनस (-) बनाकर इक्वल टू (= ) के सिद्धांत का रोग आज भारतीय राजनीति से लेकर पत्रकारिता तक सबको लग गया है। कांग्रेस सुषमा स्वराज पर ललितगेट प्रकरणों में आरोप लगाती हैं तो सुषमा स्वराज बचाव में क्वात्रोची का नाम लेकर, उसके बहाने से कांग्रेस पर आरोप लगाकर अपने दाग छुड़ाने और अपना दामन पाक करने की कोशिश इसी प्लस (+) और माइनस (-) इक्वल टू () के सिद्धांत के सहारे करती है। यह सिद्धांत और यह तर्क मीडिया और राजनीति दोनों के लिए कवच-कुंडल का कार्य करती है। किन्तु कवच-कुंडल जब महाभारत के कर्ण के काम न आया तो हम इस सिद्धांत को कब तक ढोएंगे। तो क्या इस तर्क के आगे की सब कर रहे हैं तो हम भी करेंगे, सबको समर्पण कर देना चाहिए। इस हमाम में सब नंगे हैं तो हम भी होंगे। तो क्या पत्रकारिता महज धंधा है? तो फिर लोकतंत्र की चौथी आँख का क्या होगा? लोकतंत्र का चौथा प्रहरी भी लट में शामिल हो जाए, लूटने लग जाए तो लोकतंत्र और देश का क्या होगा? देश का तो चौथा हो जाएगा । विशेषकर तब जब और आस्था लोकतंत्र के चौथे प्रहरी होने के कारण ही करोड़ों लोगों ने बड़ी आस और आस्था से मीडिया को सिर पर बैठाया हो, उसे अपनी आंख का तारा बनाया हो, ताकि उनके सपने मीडिया में दिखे। उनके अरमान मीडिया के द्वारा पूरा हो सके। यह सपना आज भी उनकी आंखों में जिन्दा है।
लोगों के सपने तो आज भी जिंदा हैं लेकिन मीडिया भी जिंदा है, उसका अमूक प्रमाण है यह प्रश्न मीडिया के मानस को कितना मथता है, कितना सालता है, इसका उत्तर तो मीडिया - बिरादरी को अपने भीतर से ही खोजकर देना होगा। कहीं ऐसा न हो कि लिखने वाली स्याही से पत्रकारिता के मुँह पर कालिख लग जाए । 'दाग अच्छे हैं' सिद्धांत पर अपना दामन भी दागदार करने की होड़ और दौड़ हमें कहां ले जाकर छोड़ेगी, वह आत्ममंथन का प्रश्न है। समाचार और पत्रकारिता के मल्य के संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर की प्रासंगिक टिप्पणी का यहां सहज स्मरण हो रहा है-
“हमारा वह समय अभी पूरी तरह विस्मृत नहीं हुआ है जब पत्रकार सचमुच ईमानदारी से काम करते थे। तब पैसे की इतनी चकाचौंध नहीं थी । उन दिनों पाठकों ने कभी यह शिकवा नहीं किया कि हम पत्रकारों ने उनके विश्वास को तोड़ा है। आज मुझे लगता है हमारे देश में प्रतिबद्धता की कमी है। मूल्यों के प्रति दृढ़ता नहीं रही आदर्शवादिता और राष्ट्रीय सामाजिक दायित्व बोध का असर नहीं रहा। कई अखबारों के संपादक अब मालिकों की पी. आर. ओ बन गये हैं। अब ऐसी स्थिति में संपादक और पत्रकार दोनों देखते हैं जब हम दूसरों के लिए पी.आर.ओ. शिप का काम करते हैं, तो अपने लिए क्यों नहीं करें। और फिर वे भी पैसा कमाने लग जाते हैं। यानी जो वातावरण है वह अच्छी और स्वस्थ पत्रकारिता के प्रतिकूल है। लेकिन सोचिए, क्या हम भी इस रंग में रंग जाएं? यदि हम भी इस बहाव में बह गए, तो देश का क्या होगा?"
'देश का क्या होगा' से ही जुड़ा भविष्य है कि समाचार का क्या होगा, पत्रकार का क्या होगा? पत्रकारिता का क्या होगा? क्योंकि देश है तो सब है। इसलिए इस बिन्दु पर थोड़ा ब्रेक लेकर (अल्प विराम) सोचते हैं कि देश और अपने बचे-खुचे सम्मान की रक्षा के खातिर इस दिशा में सोचे। मूल्य की रक्षा के लिए विचार करें। और साथ ही अपने विचार की भी रक्षा करें। क्योंकि धीरे-धीरे विचारने की आदत छोड़ते छोड़ते हम धीरे-धीरे विचारने की शक्ति भी खोते जा रहे हैं। क्योंकि विचार हैं तो हम हैं, हम जीवित हैं। समाचार हैं, समाचार जीवित है। मूल्य है मूल्य जीवित और और हम जीवित है। हर जीवित चीज को अपना प्रमाण खुद ही देना पड़ता है।
- डॉ. मीना शर्मा

बुधवार, 9 अगस्त 2023

नूह मेवात की हिंसा का सच

अवधेश कुमार

नूह मेवात की हिंसा को जो भी गहराई से देखेगा वह चिंतित और भयभीत हो जाएगा। मैं दो साथियों सामाजिक कार्यकर्ता भारत रावत एवं जमात उलेमा ए हिंद के प्रमुख मौलाना सोहेब कासमी के साथ कर्फ्यू तथा भय के बीच उन सारे स्थानों पर गया जहां हिंसा हुई थी। क्षेत्र के कुछ लोगों से मिलने की कोशिश की, जिनसे हो पाई उनसे बातचीत कर स्थिति समझा। किसी भी धार्मिक यात्रा को लेकर इससे पहले इस तरह की हिंसा भारत में नहीं हुई थी। जो लोग उसे सामान्य तनाव या दो पक्षों के टकराव के रूप में देख रहे हैं उन्हें एक बार वहां जाकर स्वयं सच्चाई देखनी चाहिए। किसी भी हिंसा, तनाव या समस्या में जो सच है उसे छिपाने की कोशिश होगी तो न सच्चे दोषी पकड़े जाएंगे और न इनकी पुनरावृति की संभावनाओं को खत्म किया जा सकेगा। तो सच क्या है?

जलाभिषेक यात्रा नल्हर महादेव मंदिर से निकलकर फिरोजपुर झिरका तक जाने वाली थी। नल्हर महादेव मंदिर अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में है। वहां से निकलने का एक ही मार्ग है जो नूह शहर की ओर आती है।  आगे दो तरफ रास्ते फूटते हैं जिनमें एक  मेडिकल कॉलेज होते हुए नूंह शहर निकल जाती है और दूसरा सीधे नूंह शहर से मुख्य हाइवे तक। मंदिर से दूर तक बस्ती नहीं है। यात्रा निकलने के 50 गज दूर आपको वाहनों एवं अन्य सामग्रियों के जले हुए अवशेष दिखाई देने लगेंगे। पुलिस द्वारा जले हुए वाहनों के अवशेषों को पूरी तरह हटाने तथा सफाई करने के बावजूद काफी कुछ है जो बताता है कि हमला कितना भीषण रहा होगा। जब वहां कोई बस्ती है ही नहीं तो इतने वाहनों के जलने का कारण क्या हो सकता है?

पता चला कि यात्रा आगे बढ़ी, कुछ लोग आगे निकल गए, कुछ बीच में थे और बीच वाले से हमले शुरू हो गए थे।  लोगों को जान बचाने के लिए मंदिर की ओर ही वापस दौड़ना पड़ा। यात्रा में महिलाएं और बच्चे भी थे। पीछे पहाड़ से भी गोलियां चलाए जाने की बात बताई जा रही है। कुछ जो आगे निकल गए उन पर भी आगे हमले हुए । जिस अभिषेक को गोली मारने और गला काटने का समाचार आया वह थोड़ा आगे मेडिकल कॉलेज का चौक है। कोई भी यात्रा निकलती है तो कुछ लोग आगे मोटरसाइकिल या कार आदि से जाते हैं ताकि सड़क खाली कराकर यात्रा  निकलने की व्यवस्था की जाए। उसी में वह नौजवान आगे निकल गया था। वहां जाने पर समझ में आ जाता है कि मंदिर में जान बचाकर छिपे हुए लोगों को सुरक्षित निकालने में पुलिस को बहुत ज्यादा समय क्यों लगा होगा?

वास्तव में मंदिर के आगे खाली जगह या उससे आगे की बस्ती से पत्थरों, गोलियों के हमले तथा पुलिस के साथ मुकाबले इतने सघन थे कि किसी को ले जाना खतरे से भरा था। पुलिस ने कुछ घंटे हिंसक तत्वों को परास्त करने की कोशिश की लेकिन देर लगने पर फायरिंग कवर देते हुए थोड़ी-थोड़ी संख्या में पुलिस घेरे के बीच पुलिस वाहनों में धीरे-धीरे निकालना शुरू किया। इसमें देर रात हो गई। कर्फ़्यू और तनाव के कारण वहां नेताओं को तलाशना और मिलना कठिन था। शहर में आम आदमी पार्टी के नेता फखरुद्दीन अली अपने घर में मिले। उन्होंने कहा कि इस तरह धार्मिक यात्रा पर हमले की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पहले झड़प हुई ,पुलिस आई, उसने हवाई फायरिंग की, कुछ लाठियां चलाई लोग भाग जाते थे। इस बार पुलिस के साथ जिस ढंग से मोर्चाबंदी कर रहे थे, चारों तरफ हमले और आगजनी कर रहे थे उससे साफ लगता है कि पूरी प्लानिंग की गई थी। हालांकि उनका कहना था कि यह प्लानिंग हमारे मेवात में न होकर शायद राजस्थान के इलाके में हुई। नूंह जिला और पूरा मेवात एक ओर राजस्थान के अलवर से लगता है तो दूसरी ओर मथुरा, भरतपुर आदि जुड़ा है। दूसरे लोगों ने भी कहा कि यात्रा नूंह से निकलकर आगे जाती बड़कली तक पहुंच जाती तो कुछ हजार लोग मर सकते थे। ध्यान रखिए यात्रा सौ गज भी नहीं चल पाई।

नूंह शहर में भी हिंसा करने वाला समूह अलग-अलग दिशाओं में भी बंट गया, इस कारण भी मरने और घायल होने वालों की संख्या काफी कम रही। कुछ दुकानें लूटने लगे, जलाने लगे, तो कुछ बसों को रोककर लोगों को उतारकर उनमें आग लगाने लगे। नूंह साइबर थाने का दृश्य भी आपको बहुत कुछ समझा देगा। एक बस को तोड़फोड़ कर कब्जा किया गया और उसको चलाते हुए साइइबर थाने की दीवार तोड़ी गई , पुलिस की गाड़ियां चकनाचूर की गई। साफ लगता है कि हमलावरों का लक्ष्य साइबर थाने के रिकॉर्ड को खत्म करना था। मेवात पूरे देश में साइबर अपराध का सबसे बड़ा केंद्र है। पिछले दिनों ही वहां 300 से ज्यादा छापेमारी हुई, भारी संख्या में लोग पकड़े गए तथा ऐसी-ऐसी सामग्रियां बरामद हुई जो भौंचक करने वाली थी।

दूसरी ओर के कुछ वीडियो तनाव के कारण थे या यात्रा निकालने वालों ने तनाव की स्थिति पैदा की तो साइबर थाने पर हमले का कोई कारण नहीं होना चाहिए। सड़कों से चलते बसों से लोगों को उतार कर उनको अपमानित करना और उन बसों को जलाने का भी कारण नहीं हो सकता। अगर कुछ आपत्तिजनक या उत्तेजक था तो उसकी शिकायत पुलिस प्रशासन से होनी चाहिए न कि इतनी जगहों पर भीषण हमले। वहां सदर थाना और अलग पड़े जले हुए वाहनों का अवशेष देखें तो दंग रह जाएंगे। सामान्य कारों में तो लोहे के अलावा कुछ नहीं बचा है। बसों की स्थिति भी लगभग यही है। इस तरह वाहनों को जलाना बिल्कुल प्रशिक्षित व प्रोफेशनल लोगों का काम है। तात्कालिक गुस्से और उत्तेजना में वाहनों को थोड़ी क्षति पहुंच सकती है, धू-धू कर मिनटों में खाक नहीं किया जा सकता। यह बताता है कि बाजाब्ता तैयारी हुई, प्रशिक्षण किया गया, संसाधन जुटाने जुटाए गए। इतनी मात्रा में पेट्रोल मिनटों व घंटों में जमाकर वितरित नहीं किया जा सकता।  मंदिर से आगे वीरान में सीसीटीवी था नहीं कि हमलावर नजर आएं। आगे के कुछ वीडियो उपलब्ध हैं। कुछ भवनों को बुलडोजर से ध्वस्त किया गया, जिनसे पत्थर व अन्य सामग्रियां फेंकी जातीं दिखीं। लोगों ने उन छतों से पत्थर चलते, पेट्रोल बम फेंके जाते देखे। जिस सहारा होटल में सबसे ज्यादा पत्थर और बाकी चीजें मिली वह सदर थाने से कुछ गज की दूरी पर है। अरावली की पहाड़ियों से पत्थर काटे जाते हैं। उनको ढोने वाले डंपरों की संख्या काफी है इसलिए पत्थर कहीं आए तो सामान्यतः संदेह नहीं होता।

नूंह से 20 किलोमीटर दूर बड़कली की स्थिति भी भयावह थी। वहां नूंह जिला भाजपा के महासचिव की तेल मिल पर दोपहर हमला हुआ, उसे पूरी तरह जला दिया गया, वहां खड़ी दो गाड़ियां भी आग को समर्पित कर दी गई। लोगों ने बताया कि पुलिस 12 बजे रात के बाद वहां पहुंची। वहां 20-22 दुकानें जलीं हैं, जो एक ही समुदाय के लोगों की है। लोगों ने कहा कि हम अभी भी रात में जागकर डरते हुए अपनी दुकानों की रक्षा करते हैं, न जाने कब हमला हो जाए। वहां मुख्य चौक पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के कुछ जवान हैं, सुरक्षा के लिए पुलिस नहीं है। प्रश्न है कि उतनी दूर उन दुकानों को निशाना क्यों बनाया गया? उतने भीषण अग्निकांड के लिए सामग्रियां, उतनी संख्या में लोग अचानक तो नहीं आ सकते। नूंह में भी एक समुदाय की ही दुकानें लूटी गई,जलाई गई।

इस तरह आप पूरी हिंसा की एक तस्वीर बनाएं तो साफ दिख जाएगा कि इसके पीछे लंबे समय की तैयारी थी। बिना जगह-जगह बैठकों, लोगों को तैयार किए, उनको संसाधन उपलब्ध कराए तथा प्रशिक्षित किए इस तरह की हिंसा संभव नहीं है। घटनाएं कुछ लोग करते हैं और परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। मेवात भय व तनाव से गुजर रहा है। पुलिस प्रशासन की विफलता स्पष्ट है। दोपहर 12 बजे के थोड़े समय बाद यात्रा पर हमला हुआ। जो थोड़े पुलिस वाले साथ थे उन्हें जान बचानी पड़ी। लोग हमलों के बीच मंदिर की ओर भागने को विवश थे। पुलिस वहां 5 बजे के आसपास पहुंची है। पूरा शहर हमलावरों के नियंत्रण में था। यह स्थिति बदलनी चाहिए। जिन पर हमले हुए, जिनकी दुकानें जलाई गई, उन्हें तुरंत पूरी सरकारी मुआवजा मिले, उनके अंदर सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो, हिंसा करने और करवाने वालों को महसूस हो कि उनके अपराध की सजा मिलनी निश्चित है । यह सब प्रशासन और सरकार का दायित्व है। इसके साथ राजनीतिक, गैर राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक समूहों भी आगे आए। दोनों समुदायों के बीच जाना, उनके अंदर के अविश्वास को कम करना तथा अतिवादी विचारों की ओर जा चुके युवाओं को वापस मुख्यधारा में लाना आवश्यक है। इसके लिए लंबे समय तक काम करना होगा।

अवधेश कुमार, ई-30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208

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