गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

भाषा का यह घिनौना प्रयोग क्या कहता है

अवधेश कुमार

विधानसभा चुनाव संपन्न हो गया, लेकिन शिवसेना के मुखपत्र सामना में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए लेखन में जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया है वह राजनीति एवं पत्रकारिता दोनों की दुनिया में किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं किया सकता। इसमें लिखा गया है कि शिवसेना न होती तो मोदी के बाप दामोदर दास मोदी भी भाजपा को बहुमत नहीं दिलवा पाते। वैसे तो इसमें और भी कई बातें आपत्तिजनक हैं , पर यह तो ऐसी पंक्ति है जिसकी हम दुःस्वप्नांे में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। क्या अब आपसी मतभेद में राजनीतिक नेतागण एक दूसरे के मां, बाप का नाम लेकर हमला करेंगे? क्या पत्रकारिता में इस तरह की भाषा का प्रयोग करना कहीं से भी वांछनीय है? वास्तव में भारतीय राजनीति और पत्रकारिता के इतिहास की संभवतः यह पहला ही वाकया होगा जब प्रधानमंत्री ही नहीं किसी नेता के लिए लेखन में इस तरह की घिनौनी भाषा का प्रयोग किया गया है। कहा जा सकता है कि सामना ऐसी शब्दावलियों व भाषा के प्रयोग के लिए पहले से कुख्यात है। हां, है तब भी इसका संज्ञान लेकर निंदा तो करनी ही होगी, अन्यथा इससे शर्मनाक प्रवृत्ति को स्वीकृत करने का संदेश निकलेगा। 

वैसे सामना ने भी पहले प्रधानमंत्री के लिए ऐसे शब्द प्रयोग किए हैं, इसके उदाहरण शायद ही हो। कभी मोदी को पितृपक्ष को कौआ कहा गया तो कभी अफजल खां जिसने शिवाजी को छल से मारने की कोशिश की गई। मजे की बात देखिए कि इसके संपादक अपने स्वभाव के अनुरुप कहते रहे कि इसमें गलत क्या है, जो कुछ हमने लिखा सही लिखा। यह हठधर्मिता के सिवा कुछ नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियां प्रतिस्पर्धी होतीं हैं, एक दूसरे की आलोचना कर सकतीं हैं, लेकिन शब्दों की मर्यादा वहां हर हाल में कायम रहनी चाहिए। यहां तक कि पार्टी के मुखपत्रों में भी सामान्यतः इसका ध्यान रखा जाता है। कांग्रेस की केन्द्रीय स्तर की पत्रिका है, प्रदेशों के स्तर पर है, भाजपा का है, कम्युनिस्ट पार्टियों की है.........सबमें विरोधी पार्टियों की आलोचना होती है, पर इस तरह बाप को उकेड़ने का काम किसी ने नहीं किया। जाहिर है, शिवसेना के संपादक प्रेम शुक्ला ने शब्दों की मर्यादा अत्यंत ही असभ्य तरीके से तोड़ी है। फिर इसके दूसरे पक्ष भी हैं। एक महीना पहले तक तो दोनों पार्टियां 25 वर्षों की पुरानी साथी रहीं हैं। इसी सामना में नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा में न जाने कितने लेख लिखे गए थे। आज उसकी ऐसी भाषा आखिर किन बातों के द्योतक हैं?

हालांकि उन्होंने ऐसा न लिखा होता तो चुनाव के एक दिन पूर्व इस तरह शिवसेना और वे चर्चा में नहीं आते। हमारे यहां आप जितनी नकारात्मक टिप्पणियां और कार्य करते हैं, सुर्खियां उतनी ही पाते हैं। यह एक चिंताजनक प्रवृति है जिसक लाभ इस समय शिवेसना ने उठाया है। कहा जा रहा है कि मोदी की सभाओं में भीड़ और लोगों के आकर्षण से शिवसेना को पराजय की आशंका सता रही है और उसी हताशा भाव में उसकी ओर से ऐसे शब्द प्रयोग किए गए हैं। लेकिन यह प्रश्न यहां गौण है। पार्टी की हार या जीत की संभावना हर चुनाव में रहती है। जीत हार भी होती है, पर क्या उसमें इस तरह नंगा होकर हम भाषा का प्रयोग करेंगे? इसके बाद क्या होगा? क्या हम आमने सामने सभाओं में गाली गलौज करेंगे? सामना के संपादक प्रेम शुक्ला पार्टी के नेता के साथ पत्रकार भी हैं, एक पढ़े लिखे व्यक्ति हैं, समझ भी है, अगर आलोचना करनी ही थी तो दूसरे शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है। यह मुहल्ले के दो लोगों के बीच गाली गलौज हो गया जिसके लिए राजनीति या सार्वजनिक जीवन में जगह होनी ही नहीं चाहिए। इससे अपमानजनक संबोधन किसी के लिए क्या हो सकता है।

भाजपा ने गठबंधन टूटने के बाद भी कहा कि वह चुनाव अलग लड़़ेगी लेकिन शिवसेना की आलोचना नहीं करेगी। हम भाजपा के समर्थक हों या विरोधी यह मानना होगा कि इसका पालन भाजपा के नेताओं ने किया।  हालांकि अनिल देसाई जैसे शिवसेना के नेता इस भाषा से असहमति प्रकट कर रहे हैं, पर पार्टी ने मूलतः इस पर खामोशी ही बरती है। तथ्यों पर जाने वाले यह कह सकते हैं कि भाजपा शिवसेना के गठबंधन ने लोकसभा चुनाव मेें मिलकर ही वैसी विजय हासिल की। किंतु इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि आखिर ऐसी विजय पहले क्यों नहीं मिली? लोकसभा चुनाव में तो बाला साहब ठाकरे भी नहीं थे। जाहिर है, राजनीतिक विश्लेषक एवं महाराष्ट्र में धरातल पर काम करने वाले जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व ने आकर्षण का ऐसा आलोड़न पैदा कर दिया था जैसा पहले किसी नेता के समय नही हुआ। इसलिए तथ्यतः भी यह कहना सही नहीं होगा कि शिवसेना के कारण ही विजय मिली। यह सच है कि दोनों पार्टियों का गठजोड़ जमीन तक पहुंचा था, इसका असर था और विजय में शिवेसना का योगदान था। किंतु यह भी सच है कि लोकसभा चुनाव के पहले शिवसेना के सांसद तक पार्टी छोड़कर जा रहे थे। ऐसा लग रहा था कि कहीं पार्टी ही खत्म न हो जाए। मोदी के आविर्भाव ने शिवसेना पार्टी को बचाया और विजय भी दिलाई।

विधानसभा चुनाव में सीटों पर बातचीत में दोनों दलों के रवैये पर अलग-अलग मत हो सकता है। हालांकि खबरों और दोनों पक्षों के नेताओं के बयानों से कोई भी समझ सकता था कि शिवसेना अपने रुख से हटने को तैयार नहीं थी। वह बदले वातावरण में भाजपा की बढ़ी हुई शक्ति को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। दोनों गठबंधन तोड़ना नहीं चाहते थे, पर टूट गया। टूटने के बाद पार्टियों के बीच तीखापन आता है। कांग्रेस और राकांपा के बीच भी गठबंधन खत्म होने के बाद तीखापन दिखा है। दोनों पार्टियों ने एक दूसरे की आलोनायें की, इसमें नेताओं की निजी आलोचनायें भी हुईं, पर इनमें से किसी ने इस तरह भाषा की मार्यादा नहीं लांघी। यही व्यवहार की सीमा रेखा होनी चाहिए। हम जानते हैं कि राजनीति में आज का गठजोड़ किसी सिद्धांत या आदर्श के लिए नहीं होते। उनका एकमात्र उद्देश्य सत्ता के अंकगणित में किसी तरह अपनी संख्या बल बढ़ाना होता है। यही भाजपा शिवसेना के बीच था और कांग्रेस राकांपा के बीच। इस सोच के कारण  नेताओं के आपसी संबंधों में भी विश्वसनीयता या वास्तविक सम्मान की स्थापना नहीं हो पाती। पर इस गिरावट के दौर में भी हम ऐसी भाषा प्रयोग को राजनीति और पत्रकारिता दोनों के लिए शर्म का अध्याय ही कहेंगे। ऐसी अपमानजनक और गंदी भाषा का प्रयोग आगे सार्वजनिक जीवन में नहीं हो इसके लिए आवश्यक है कि इसकी पुरजोर निंदा की जाए, अन्यथा चतुर्दिक क्षरण एवं आदर्श व्यवहारों के घटते प्रेरणा के माहौल में इसके परिणाम संघातक होंगें। कोई इससे आगे बढ़कर ऐसे शब्द प्रयोग कर सकता है जिसे हम सामान्यतः सुनना भी न चाहते हों। इसलिए इसे यही रोका जाना जरुरी है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

अगर मंत्री नक्सली संगठन के मुखिया तो फिर कैसे होगा इनका अंत

अवधेश कुमार

यह पहली बार है जब किसी प्रदेश के मंत्री पर माओवादी या नक्सल संगठन चलाने, उससे जबरन वसूली से लेकर अनेक प्रकार के अपराध को अंजाम दिलवाने का आरोप लगा, त्यागपत्र देना पड़ा एवं अंततः गिरफ्तारी हुई। भारत में यह आरोप तो लगता रहा है कि राजनीतिक नेताओं के नक्सलियों से संबंध हैं, पर अभी तक किसी को इस आधार पर गिरफ्तार नहीं किया गया वह मंत्री होते हुए स्वयं नक्सल संगठनों का प्रमुख है। इस नाते यह असाधारण और हिला देने वाली घटना है। जी हां, झारखंड के पूर्व कृषि मंत्री योगेंद्र साव को दिल्ली पुलिस ने झारखंड पुलिस के साथ मिलकर एक साझा ऑपरेशन में जब गिरफ्तार किया तब यह खबर पूरे देश को पता चली। हालांकि झारखंड में यह खबर पहले से फैल चुकी थी, उन पर मुकदमा हो चुका था तथ इन कारणों से साव को मंत्रीपद से भी इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन वे पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए छिपते फिर रहे थे।

साव इस समय मंत्री भले न हों, पर वे विधायक हैं। अभी हम एकदम से अंतिम निष्कर्ष नहीं दे सकते कि उन पर जो आरोप हैं, वे शत-प्रतिशत सच ही है, पर पुलिस ने जिस तरह का मामला बनाया है, जो साक्ष्य सार्वजनिक किए हैं वे तो इसे पूरी तरह पुष्ट करते हैं। पुलिस का साफ कहना है कि झारखंड टाइगर्स ग्रुप और झारखंड बचाओ आंदोलन नामक दो नक्सली संगठनों का संचालन मंत्री महोदय ही कर रहे थे और जब हमारे पास पुख्ता सबूत मिल गए तो हमने उनके खिलाफ कार्रवाई की। पुलिस ने उनको आत्मसमर्पण करने का वक्त दिया और जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो फिर हजारीबाग की स्थानीय अदालत ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया।
बहरहाल, पूरे देश को इंतजार होगा कि योगेन्द्र साव पूछताछ में क्या बताते हैं, उनसे और क्या राज हमें पता चलता है। दरअसल, पुलिस इसलिए उनकी संलिप्तता को लेकर आश्वस्त है, क्योंकि उसने उग्रवादी संगठन झारखंड टाइगर ग्रुप के प्रमुख के रुप में राजकुमार गुप्ता समेत चार उग्रवादियों को पिछले सितंबर माह में गिरफ्तार किया। कड़ाई से पूछताछ में उसी ने यह रहस्योद्घाटन किया था कि यह संगठन दरअसल मंत्री योगेन्द्र साव का है। उन्हीं के कहने पर  इसका गठन हुआ, हथियार और सारे संसाधन वे ही मुहैया कराते रहे हैं, मंत्री के कहने पर ही दहशत पैदा करने का काम हुआ, लेवी वसूली गयी और अन्य उग्रवादी घटनाओं को अंजाम दिया गया था। यह खबर पहली नजर में ही सनसनी पैदा करने वाली थी। आखिर कोई यह कल्पना भी कैसे कर सकता था कि संविधान की शपथ लेकर कृषि मंत्री के पद पर बैठा कोई नेता नक्सल है। झारखंड की हर सरकार नक्सलियों से संघर्ष करने का संकल्प व्यक्त करती है और उसके आस्तीन में ही कोई ऐसा सांप हो, यह किसी के दुःस्वप्नों में भी नहीं आ सकता है। एक बार जब पुलिस को थोड़ा सुराग मिला तो पुलिस ने राजकुमार गुप्ता को रिमांड पर लेकर उससे लंबत पूछताछ की। इसके बाद पता चला कि  झारखंड बचाओ आंदोलन भी उसीका बनाया हुआ संगठन है। पुलिस ने अपराध संहिता 164 के तहत न्यायिक दंडाधिकारी के सामने राजकुमार गुप्ता का बयान कराया और तब इस मामले में आगे बढ़ी। वास्तव में इस मामले में फिर एक- एक करके कई नाम जुड़ते चले गए और गिरफ्तारी भी होती चली गयी। सब में मंत्री महोदय के खिलाफ साक्ष्य पुख्ता होता गया। इसमें सिम और मोबाइल से एक- दूसरे से लंबी बातचीत, एसएमएस आदि भी है।

अगर कोई विधायक या मंत्री है तो वह जहां रहता है, उसके पास सरकारी भवनों के उपयोग के जो अधिकार हैं, उन सबसे ऐसी गतिविधियों को वह  सरकारी संरक्षण में अंजाम दे सकता है। पुलिस की सूचना के अनुसार यही योगेन्द्र साव करते रहे हैं। इसके अनुसार उनके सरकारी आवास, परिसदनों और उनकी गाड़ियों तक का भी इस्तेमाल नक्सली गतिविधियों के लिए किया गया। सरकारी गाड़ी से माओवादी कारनामा, परिसदन से माओवादी कारनामा, सरकारी आवास से माओवादी कारनामा..........सामान्यतः किसी को भी सन्न कर सकता है। यह तो रक्षक के ही भक्षक हो जाने की कहावत को चरितार्थ करने वाला प्रकरण है। माना जाता है कि केरेडारी में योगेन्द्र साव की अवैध सॉफ्ट कोक प्लांट है जिसमें कोई पुलिस अंदर जा ही नहीं सकता था। इसलिए इसके समूह के लोग वहां आराम से रहते और योजना बनाते थे। कोयले के अवैध कारोबार से लेकर भयादोहन, फिरौती जैसे अन्य अपराधिक मामले आराम से अंजाम दिये जाते थे।

यह एक साथ राजनीति और भयानक अपराध के डरावने रिश्ते को फिर उजागर तो करता ही है साथ ही हमें नये सिरे से सोचने को विवश करता है कि आखिर माओवादी हिंसक आंदोलन की आड़ में कैसे रसूख वाले लोग धन और प्रभाव के लिए छद्म संगठन चला रहे हैं और हमारे सामने हमारे भाग्यविधाता भी बने हैं। योगेन्द्र साव का रिकॉर्ड भी ऐसा नहीं था कि उसे मंत्री बनाया जाना चाहिए। एक दबंग के रुप में साव की कुख्याति तो सबके सामने थी। पत्थर खनन जैसे धंधे में आने के साथ ही उसने दबंगई आरंभ कर दिया था। विरोध करने वालों की पिटायी, उसके लिए गिरोहबाजी आदि से स्थानीय लोग वाकिफ रहे हैं।  1995 में माओवादियों के एक संगठन नारी मुक्ति संघ से जुड़कर वह उसका कर्ताधर्ता बन गया। इस दौरान दूसरे जिलों और झुमरा में उग्रवादी कैंपों में भी उसकी भागीदारी रही। दस वर्षों में हत्या, मारपीट समेत कई गंभीर आरोप में उसपर प्राथमिकी दर्ज हुई। अकेले केरेडारी थाने में सात मामले वन अधिनियम 45/94 और 41/94, मारपीट के मामले 60/03, एनटीपीसी के अधिकारी से मारपीट 55/10, बीडीओ के साथ मारपीट 4/11, हत्या के मामले 83/90 तथा मारपीट के मामले 33/12 उसपर दर्ज हुए।
ये मामले और उसकी छवि ही उसे राजनीति से बाहर रखने के लिए पर्याप्त होने चाहिए थे। पर झारखंड राज्य बनने के बाद से वहां की राजनीति का जैसा भयानक व शर्मनाक रुप आया है उसमें साव ऐसे अकेले नहीं थे सच तो यह है कि पूरा झारखंड नेताओं के लूट का अड्डा बना हुआ है.....सब एक दूसरे को जानते हैं.....पुलिस भी जानती है और उनमें से भी ज्यादातर की इसमें संलिप्तता है.......। लेकिन कोई सीधे माओवादी या नक्सली संगठन बनाकर पर्दें के पीछे उसे अंजाम दे रहा हो और सामने चुनाव मंे विजीत होकर मंत्री बन बैठा हो यह कल्पना किसी को नहीं थी। अगर साव सामने आया है तो साफ है कि वह अकेले नहीं होगा। चूंकि पुराने नक्सलवाद के नये रुप नव माओवाद का विस्तार एक साथ कई राज्यों में है, इसलिए इस दृष्टिकोण से अब इसे देखे जाने की जरुरत है। अगर नीति-निर्माताओं के बीच ही माओवादी बैठे हैं तो फिर सुरक्षा बलों को विजय कहां से मिलेगी। वे तो बलि चढेंगे, क्योंकि इनके लोग हर कार्रवाई की सूचना दे देंगे।

अभी इस घटना के एक दिन पहले झारखंड के  ही लोहरदगा जिले से गिरफ्तार नाबालिग लड़क ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि माओवादी नेता दीपक कुमार खेरवार से उसके अंतरंग संबंध रहे हैं। लड़की के मुताबिक दीपक उसे हर माह पांच हजार रुपए देता है, जिसके बदले वह हर वक्त बुलाए गए स्थान पर मिलने के लिए जाती है और अन्य सहयोगियों से तालमेल कर शीर्ष माओवादियों तक सूचनाएं पहुंचाती है। उसके साथ दो और गिरफ्तार हुए। पुलिस के अनुसार ये माओवादियों के शीर्ष से संपर्क में रहते थे और जिला मुख्यालय से लेकर अन्य जगहों से पुलिस गतिविधियों की हर सूचना उन्हें देते थे। जरा देखिए ये कैसे काम करते हैं। पुलिस 28 सितंबर को चौनपुर गांव में कैंप लगाने पहुंची। उसे आश्चर्य हुआ जिन ग्रामीणों की ओर से इसकी मांग की गई थी उसी की ओर से इसका विरोध हो रहा है और सामने महिलायें व बच्चे ज्यादा हैं।  विरोध की छानबीन से खुलासा हुआ कि माओवादियों ने सहयोगियों के माध्यम से ग्रामीणों को विरोध के लिए बाध्य किया था। वहां के पुलिस अधीक्षक का कहना है कि किस पुलिस वाहन में पेट्रोल भराया जा रहा है इसकी भी सूचना माओवादियों तक पहुंच रही है। चौनपुर में कैंप लगने की बात दो दिन पहले ही माओवादियों तक पहुंच गई थी जबकि इसे गोपनीय रखने की बात कही गई थी।
तो एक ओर नेता माओवादी और दूसरी ओर सामान्य गांव की लड़की तक उनके सूचना सूत्र .....ऐसे में इस नव माओवाद के खतरे से लड़ना कितना कठिन है इसका अनुमान हम सहज लगा सकते हैं।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408,09811027208

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

मोदी की अमेरिका यात्रा को सफल मानना ही होगा

अवधेश कुमार
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के एक साथ होेने की जितनी भी तस्वीरें या विजुअल्स हैं उनमें प्रत्येक में स्वाभाविक गर्मजोशी, आपसी बातचीत की सहजता तथा एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव देखा जा सकता है। कूटनीति में चेहरे के हाव भाव सब कुछ बयान कर देते हैं। सच कहें तो पांच दिनों के अमेरिकी प्रवास, जिनमें दो दिनों की अमेरिका की राजकीय यात्रा शामिल थी, में ऐसा कोई क्षण नहीं होगा जिसे हम यह कह सकें कि यह ठीक नहीं था। प्रधानमंत्री का पूरा कार्यक्रम जितना सोचा गया होगा उससे कई मायनों में बेहतर ही हुआ। न्यूयॉर्क हवाई अड्डे पर उतरने से लेकर संयुक्त राष्ट्संघ का भाषण, युवाओं के कर्न्स्ट में भाषण, मेडिसन स्क्वायर का सबसे प्रचारित और प्रभावी कार्यक्रम....नेताओं और प्रमुख कारोबारियों से मुलाकात......सब एकदम सहज सामान्य रुप से पूरे होते गए। प्रवासी भारतीयों में जिस तरह का उत्साह देखा गया वैसा इसके पहले कभी नहीं हुआ। उनलोंगों ने जहां जहां मोदी गए एक प्रकार के उत्सव जैसे माहौल में परिणत कर दिया। निश्चय ही इसका असर अमेरिकी नागरिकों, वहां के रणनीतिकारों पर पड़ा होगा। आप अपने लोगों के बीच कितने लोकप्रिय हैं, वे आपको लेकर कितने उत्साहित हैं, इसका मनोवैज्ञानिक असर कूटनीति और द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ता ही है।
यहां हम मुख्यतया प्रधानमंत्री की अधिकृत दो दिवसीय अमेरिका की राजकीय यात्रा पर केन्द्रित करेंगे। शुरुआत करते हैं मार्टिन लूथर किंग जूनियर के स्मारक पर मोदी एवं ओबामा के एक साथ जाने से। वह एक असाधारण और अस्वाभाविक दृश्य था। दोनों के बीच जिस तरह सामान्य बातचीत देखी गई वह उत्साहवर्धक था। अमेरिकी राष्ट्पति ओबामा का स्वयं मोदी के साथ वहां तक जाना एवं उनके साथ अकेले समय बिताना असाधारण है। यह पहली बार हुआ कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी भारतीय नेता को स्वयं एस्कोर्ट किया। दोनों जिस तरह बातचीत कर रहे थे उनके शरीर के हाव भाव एकदम सामान्य एवं हसंमुख चेहरे अपने आप बहुत कुछ संदेश दे रहे थे। लगता था कि दोनों के मानसिक वेब लेंथ मिल रहे हैं। साथ में कोई अनुवादक नहीं।  ओबामा ज्यादा से ज्यादा समय मोदी के साथ बिता रहे थे और खूब बातचीत कर रहे थे। ओबामा भी मुस्करा रहे थे, सामान्य थे, मोदी भी मुस्करा रहे थे सामान्य थे। मोदी उनसे पूछ रहे थे और ओबामा उन्हें जानकारियां दे रहे थे। यह इस बात का द्योतक है कि संबंधों के रास्ते जमी हुई बर्फ पिघली है। दोनांे नेताओं के बीच इस तरह का व्यवहार यह साबित करता है कि आगे भी उनके बीच संवाद होता रहेगा।
पूर्व कार्यक्रम के अनुसार मोदी को किंग के स्मारक पर सुबह आना था, लेकिन बाद में यह बदल गया। ओबामा ने ही हस्तक्षेप करके इसे बदलवाया ताकि वो भी रह सकें। ओबामा संबंधों पर पड़े हुए बर्फ पिघलाने में माहिर हैं और मोदी ने कूटनीति की ऐसी शैली विकसित की है, जिसमें पुरानी औपचारिकतायें, शब्दावलियां हाव-भाव सब बदल रहे हैै। ओबामा को बातचीत के बाद उन्हें लगा कि यह आदमी खरी-खरी मुद्दों पर बात करता है, इसलिए इसके साथ कार्य व्यवहार किया जा सकता है। दोनों नेताओं की संयुक्त पत्रकार वार्ता की यकीन मानिए पूरी दुनिया के सभी प्रमुख देशों को प्रतीक्षा रही होगी।  संयुक्त पत्रकार वार्ता बिल्कुल समानता का परिचय दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे विश्व की दो बड़ी शक्तियां आपसी द्विपक्षीय संबंधांे के साथ पूरी दुनिया की समस्याओं पर विचार कर रहीं हैं एवं एक दूसरे का सहयोग करने को तत्पर हैं। मोदी ने अपने बयान में दक्षिण एशिया से लेकर, एशिया प्रशांत, पश्चिम एशिया, अफ्रिका, संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार, वैश्विक आतंकवाद एवं उसके विरुद्ध युद्ध, विश्व व्यापार संगठन...सहित सारे मुद्दों की चर्चा की। इस प्रकार की बातचीत दो महाशक्तियों के बीच होती थी। यानी ओबामा से बातचीत में मोदी ने जता दिया कि भारत अब अपने साथ-साथ फिर से वैश्विक सोच की ओर अग्रसर हो चुका है। अमेरिकी विश्लेषक टेलीविजन चैनल पर कह रहे हैं कि मोदी एक वरदानसंपन्न राजनेता हैं। वे कह रहे हैं कि मोदी ने अमेरिकी लोगों, यहां की मीडिया, अकादमिशियन, राजनयिक, नेताओं, कारोबारियों....सब पर गहरा प्रभाव छोड़ा है।
लंबे समय बाद ऐसा हुआ है जब एक-एक विषय पर खुलकर बातचीत हुई। जो साझा वक्तव्य जारी हुआ, दोनों नेताओं ने अखबार यानी वाशिंगटन पोस्ट में संयुक्त लेख लिखने का जो ऐतिहासिक कार्य किया, और बाद में जो सुयक्त पत्रकार वार्ता हुई उन सबसे यह साफ हो गया कि संबंधों का पूरा रोड मैप यानी आगे का नक्शा तैयार हो चुका है, विन्दु सारे उतने स्पष्ट हो चुके हैं जो पहले नहीं थे और आगे इस पर काम करना है। यह गंभीर संबंधों के लिए बातचीत की गंभीरता को दर्शाता है। मोदी ने कहा कि  ओबामा से हुई बातचीत से विश्वास दृढ हो गया है कि दोनों देशाों के बीच सामरिक साझेदारी स्वाभाविक है जो हमारे हितों, साझा मूल्यों पर आधारित हैं। इसमें रक्षा संबंध, आतंकवाद, अफगानिस्तान, नागरिक नाभिकीय साझेदारी, व्यापार, विश्व व्यापार संगठन, जलवायु परिवर्तन....इबोला संकट.....आदि एक-एक पहलू पर बात हुई।
ओबामा ने अपनी चिंता जताई कि भारत से उनको कहां कहां समस्या है तो मोदी ने उसका संज्ञान लेते हुए उसे दूर करने का वचन दिया लेकिन साथ में अपनी चिंता भी जता दी। मसलन, ओबामा ने कहा कि हम भारत से व्यापार को आसान बनाने की उम्मीद करते हैं तथा विश्व व्यापार संगठन में रुख के बदलाव की भी तो मोदी ने कहा कि व्यापार को आसान करने पर हम सहमत हें, जो भी बाधा डालने वाले नियम कानून हैं उसे बदलेंगे, क्योंकि आर्थिक विकास के लिए यह आवश्यक है, लेकिन अमेरिका को भी हमारी चिताओं को समझना होगा। तो कैान सी चिंता? हमारे यहां खाद्य सुरक्षा की समस्या का हल निकालना होगा, अन्यथा विश्व व्यापार संगठन में कृषि मुद्दे पर हम साथ नहीं दे पाएंगे। एकदम दो टूक कि आप खाद्य सुरक्षा की समस्या का हल कर दीजिए हम उसे स्वीकार करने को तैयार हैं। तो इस तरह गेंद अमेरिका के पाले में डाल दिया है। दूसरे, मोदी ने कहा कि अमेरिका भी ऐसे कदम उठाए जिससे हमारे देश की सेवा देने वाली कंपनियोें के लिए यहां काम करना आसान हो जाए।
मोदी ने लूक ईस्ट एवं लिंक वेस्ट को भारत की विदेश नीति का अभिन्न अंग बताकर यह संदेश दिया कि वह एशिया की ओर देखने की नीति पर चलने के साथ पश्चिम को जोड़ने या एशिया और पश्चिम के बीच पुल का काम करने की भूमिका निभाना चाहते हैं। हम जानते हैं कि मोदी का मुख्य मिशन निवेश के लिए अमेरिकी कंपनियों को आमंत्रित करना था, उन्होंने किया, रक्षा कंपनियों को भारत में आकर कारखाने लगाने का आमंत्रण दिया और उसके रास्ते की बाधाओं को खत्म करने का आश्वासन। वैसे भी मोदी अमेरिका जाने के पहले अपना मेक इन इंडिया कार्यक्रम का उद्घाटन करके गये थे ताकि निवेशकों को यह विश्वास हो कि भारत के व्यवहार में अब व्यवसाय आ गया है।
इन सबके परिणाम क्या होंगे यह आने वाले दिनों में ही पता चलेगा, लेकिन अमेरिकी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ी है यह साफ है। ध्यान रखिए कि अमेरिका आज भी हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। करीब 100 अरब डॉलर का व्यापार हमारा है और यह चीन से भारी घाटे के विपरीत भारत के पक्ष में हैं। अमेरिका को संदेह की दृष्टि से देखने वाले इस पक्ष की अनदेखी करते हैं। मोदी ने स्वयं विदेश नीति परिषद के भाषण में कहा कि व्यापार का जो मसला है वह लाभ हानि पर चलता है। आपको लाभ होगा आप व्यापार करेंगे, हमें लाभ दिखेगा तो हम करेंगे। यानी उनके दिमाग में यह बात साफ है कि कोई भी निवेशक यहां सेवा करने नहीं आएगा, वह व्यापार करने और मुनाफा कमाने आएगा, लेकिन हमारा हित उसी में है कि हमारे यहां रोजगार मिले, वस्तुओं का उत्पादन हो जिससे खजाने में कर बढ़े, बैंक गतिशील हों....यही तो बाजार पूंजीवाद में विकास का चक्र है।
वैसे रक्षा संबंधों को 10 वर्ष आगे बढ़ना स्वाभाविक था। आखिर 30 सितंबर को ही तो भारत अमेरिकी सैन्य अभ्यास खत्म हुआ। लेकिन इसमें मूल बात तकनीकों के हस्तातरण तथा रक्षा अभ्यास को और व्यापक करने का है। भारत की नीति अब रक्षा खरीद के साथ तकनीके लेना भी है जिससे अमेरिका बचता है। मोदी के साफ करने के बाद शायद अंतर आए। इसी तरह आतंकवाद के मामले पर हमने साथ देने का वायदा किया है, पर युद्ध में कूदने का नहीं, अफगानिस्तान में भी सुरक्षा से ज्यादा विकास केन्द्रित सहयोग की बात मोदी ने रखी जिसे अमेरिका ने स्वीकार किया है। यहां इन सबमें विस्तार से जाना संभव नहीं है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि नरेन्द्र मोदी की अमेरिकी कूटनीति, जापान, ब्रिक्स, नेपाल और भूटान की तरह ही सफल मानी जाएगी। ओबामा के सामने मोदी जब भी हैं एकदम आंखों में आखें मिलाते एवं मुस्कराते हुए। नेता की यह भंगिमा सामने वाले को प्रभावित करती है। जाहिर है, अमेरिका के साथ संबंधों में हम एक नए दौर की उम्मीद कर सकते हैं।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

महाराष्ट्र में राजनीतिक तलाक के बाद

अवधेश कुमार

फेसबुक ने फ्रेन्ड अन्फ्रेन्ड शब्द को आम बना दिया। महाराष्ट्र की चुनाव पूर्व राजनीति ने भी एक ही दिन अन्फ्रेंड को इतना ज्यादा सुर्खियों में लाया कि फेसबुक उसके सामने छोटा पड़ गया। जो टिप्पणीकार यह मान रहे थे कि गठबंधन की इतनी लंबी जीवन यात्रा के बाद मन का मिलन इतना सघन है कि तलाक संभव नहीं वे सही साबित नहीं हुए। हालांकि यह कल्पना किसी को भी नहीं थी कि वाकई इनके इतने पुराने और राजनीतिक रुप से सघन रिश्ते का इस तरह ऐन चुनाव पूर्व अंत हो जाएगा। सच कहा जाए तो भारतीय राजनीति में यह दुर्भाग्यपूर्ण सच एक बार फिर साबित हुआ है कि यहां गठबंधन केवल सत्ता संबंधी राजनीतिक हितों के कारण होतीं हैं और हितों पर थोड़ी भी आंच आने की संभावना हुई नहीं कि बस तलाक। आखिर  शिवसेना और भाजपा की 25 साल पुरानी दोस्ती के बीच तलाक कोई सामान्य स्थिति नहीं है। कांग्रेस और राकांपा के बीच 15 साल की दोस्ती भाजपा शिवसेना की श्रेणी की नहीं थी, फिर भी उनके बीच गठबंधन धरातल तक बन चुका था।

लेकिन अगर हम यह कल्पना करें कि इस असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम के परिणाम भी असाधारण हो जाएंगे तो यह हमारी भूल होगी। इससे चुनाव परिणाम पर असर होगा, पर उसके बाद सरकार गठन के समय फिर से समीकरण बनेंगे और उनकी तस्वीर ऐसी ही हो सकती हैं जैसी आज हैं। हां, इससे तत्काल महाराष्ट्र की राजनीति का पूरा वर्णक्रम अवश्य बदल गया है। महाराष्ट्र के मतदाताओं को कुल मिलाकर दो गठबंधनों में से एक को चुनने का विकल्प रहता था जो खत्म हुआ है। राकांपा भी कांग्रेस की ही भाग थी, जो सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर 1999 में शरद पवार, तारिक अनवर और पी. ए. संगमा के विद्रोह से उत्पन्न हुई। करीब दो दशक से दो ध्रुवों पर टिकी राजनीति इस समय चार ध्रुवों में बदली है और एक थोड़ा छोटा पर परिणामों पर असर डालने वाला पांचवां धु्रव महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना है। भाजपा, शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी अलग-अलग मैदान में उतर रहे हैं। इस टूट का कोई वैचारिक कारण हो ही नहीं सकता। चारों पार्टियां अधिक से अधिक सीटें चाहतीं थीं, और मुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद थे। भाजपा का प्रस्ताव था कि जिसे अधिक सीटें आएं मुख्यमंत्री उसका हो, पर शिवसेना अपने मुख्यमंत्री पर अड़ी। उसी तरह राकांपा ने सत्ता में आने पर ढाई-ढाई वर्ष के मुख्यमंत्री का प्रस्ताव रखा जो कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया। रकांपा 288 में से आधी सीटों पर लड़ना चाहती थी जबकि कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव के अनुसार उसे 114 या उससे कुछ ज्यादा देने पर अड़ी थी। उसने उन स्थानों पर भी उम्मीदवार खड़े कर दिए जिन पर राकांपा बातचती कर रही थी। इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि संभवतः कांग्रेस विधानसभा चुनाव में राकांपा से अलग होकर लड़ने का मन बना चुकी थी। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की छवि ईमानदार नेता की है, इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं कि वे राकांपा से अलग होकर चुनाव लड़ना चाह रहे हों ताकि सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप कम हो सके, अन्यथा वे सरकार गिराने की सीमा तक नहीं जाते। ध्यान रखिए कि भ्रष्टाचार के ज्यादा आरोप राकांपा के नेताओं पर हैं।

यही बात शिवसेना भाजपा के साथ नहीं थी। कोई गठबंधन का अंत नहीं चाहता था। शिवसेना ने बदले हुए माहौल का अपने अनुसार मूल्यांकन कर भाजपा को समान दर्जा देने से इन्कार किया। लगातार बातचीत होती रही, पर शिवसेना पुराने सूत्र को पूरी तरह बदलने को तैयार नहीं थी। आखिरी प्रस्ताव में शिवसेना ने अन्य घटक दलों के लिए महज 7 सीटें दीं थीं। यानी अगर गठबंधन को बनाए रखना है तो महायुति के अन्य दलों को भाजपा अपने खाते से सीटें दे। शिव सेना की ओर से हर बार लगभग एक ही प्रस्ताव सामने आता था। यदि धरातली वस्तुस्थिति के अनुसार विचार करेंगे तो भाजपा एवं रकांपा का तर्क गलत नहीं था। महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों में से अब तक शिवसेना 171 एवं भाजपा 117 सीटों पर चुनाव लड़ती आई हैं। इस बार भाजपा ने कहा कि शिवसेना द्वारा कभी न जीती गई 59 एवं भाजपा द्वारा कभी न जीती गई 19 सीटों पर पुनर्विचार कर उन्हें फिर से शिवसेना-भाजपा एवं साथी दलों के बीच बांटा जाना चाहिए। लेकिन शिवसेना को यह स्वीकार नहीं था। उसने कहा कि उसका मिशन 150 है जिसमंे भाजपा सहयोग करे। राकांपा का तर्क था कि लोकसभा चुनाव में राकांपा का प्रदर्शन कांग्रेस से बेहतर रहा, इसलिए वह आधी सीटें हमें दे। आधी से थोड़े कम पर बात बन जाती, पर कांग्रेस ने भी सच्चाई को स्वीकार नहीं किया। आखिर 2009 के लोकसभा चुनाव में राकांपा की सीटें कम आने के बाद कांग्रेस ने उसे 2004 के विधानसभा चुनाव में दी गईं 124 सीटों को घटाकर 114 कर दिया था।

बहरहाल, भाजपा अकेले नहीं है। किसानों में पैठ रखनेवाले स्वाभिमानी शेतकरी संगठन, धनगर समाज की पार्टी राष्ट्रीय समाज पक्ष एवं मराठा समाज के संगठन शिव संग्राम सेना अब भाजपा के साथ रहेंगे। रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया भी भाजपा के साथ ही रहेगी। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले दिवंगत गोपीनाथ मुंडे ने इन चार में से तीन दलों को शिवसेना-भाजपा के साथ जोड़कर दो दलों के गठबंधन को महागठबंधन में बदला था। रिपब्लिकन पार्टी (आठवले) ने 2009 के विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना से हाथ मिलाया था लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले इसके नेता रामदास आठवले को राज्यसभा में भाजपा ने भेजा। यदि ये चारों दल भाजपा के साथ हैं तो उसे इनके सम्मिलित 14 प्रतिशत मतों का लाभ मिल सकता है। हां, शिवसेना के साथ न होने की क्षति होगी। भाजपा ने कहा कि हम चुनाव के दौरान शिव सेना के खिलाफ कोई टीका टिप्पणी नहीं करेंगे, उम्मीद है शिव सेना भी ऐसा ही करेगी, पर शिवसेना ने भाजपा के खिलाफ टिप्पणी करना आरंभ कर दिया।

शिवसेना को ज्यादा क्षति होने की संभावना है। पता नहीं उद्धव ठाकरे कैसे भूल गए कि लोकसभा चुनाव के पूर्व उनके सांसद तक पार्टी छोड़ रहे थे और यदि मोदी लहर तथा भाजपा से गठबंधन न होता तो शिवसेना बिखर जाती। लोकसभा चुनाव में वोट मोदी के नाम पर मिला था, इसे शिवसेना स्वीकार नहीं कर पा रही। उसके पास मुख्य वोट आधार मराठी हैं। अकेले लड़ने से ये वोट भाजपा-राकांपा-मनसे और शिवसेना के बीच बंट जाएगा। उसके कार्यकर्ता नेताओं का एक वर्ग मनसे में जा सकता है।  उद्धव बाला साहब ठाकरे नहीं हैं जिनके करिश्मे ने शिवसेना को बचाए रखा। कांग्रेस और राकांपा विरोधी यदि यह देखेंगे कि शिवसेना नहीं जीतने वाली तो यकीनन भाजपा की महायुति को वोट देंगे या फिर आक्रामक मराठावाद के समर्थक मनसे को। इसलिए इस समय के आंकड़े में गठबंधन टूटने की सबसे ज्यादा क्षति किसी को हो सकती है तो वह है, शिवसेना। मनसे यह प्रचार करेगी कि जब भाजपा और शेष महायुति के दल ही उसके साथ नहीं तो फिर शिवसेना को मत क्योें दोगे और इसका असर हो सकता है। उद्धव ठाकरे प्रभावी वक्ता भी नहीं हैं। दूसरी ओर भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा आकर्षक भाषण देने वाला नेता तो है ही, प्रदेश स्तर पर भी जनता के बीच आकर्षण वाले नेता हैं। इसमें उसके लिए कठिनाई ज्यादा हैं।  इस समय यह साफ दिख रहा है कि भाजपा एवं महायुति भले बहुमत न ला पाए पर उसको बहुत ज्यादा क्षति नहीं होगी। कांग्रेस को भी 15 वर्ष की सत्ता विरोधी रुझान की क्षति होनी है। राकांपा अकेले दम पर बहुत दमदार प्रदर्शन कर पाएगी ऐसी संभावना कम है, पर आश्चर्य नहीं हो यदि वह कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन कर ले।  मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ईमानदार हो सकते हैं, पर वे ऐसे नेता नहीं हैं जो जनता के बीच जाकर उसे अपने भाषणों से प्रभावित कर सकें और मत खींच सकें। इसके विपरीत राकांपा के पास ऐसे कई नेता हैं। शरद पवार ही अपने क्षेत्र में लोकप्रिय एवं जनाकर्षक व्यक्तित्व रखते हैं। सत्ता के गणित मंे भी राकांपा के पास किसी के साथ जाने का विकल्प खुला है, जबकि कांग्रेस के पास केवल राकांपा ही विकल्प है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

चीनी राष्ट्रपति की यात्रा से प्राप्त क्या हुआ

अवधेश कुमार

निस्संदेह एक ओर सीमा पर दोनों ओर से भले बिना हथियार के आमने सामने और दुसरी ओर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग का अहमदाबाद से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक भव्य स्वागत, गार्ड आफ ऑनर, लंबी शिखर वार्ता तथा फिर प्रधानंमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ शिखर वार्ता कुछ क्षण के लिए असंगत दिखती है। बातचीत एवं शिखर वार्ताओं में सीमा पर शांति एवं विवादों के निपटाने की घोषणा के बावजूद चीनी सैनिक लद्दाख के चुमार से वापस जाने लगे थे, फिर आ गए और डेमचोक में बने हुए हैं। लेकिन इस एक घटना के ईर्द-गिर्द हम शि चिनपिंग की पहली भारत यात्रा एवं उसके परिणामाओं का मूल्यांकन करेंगे तो फिर वास्तविक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकते। हालांकि जब भी चीन कोई प्रमुख नेता आते हैं उसकी ओर से या तो घुसपैठ होती है या फिर चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश को लेकर ऐसा बयान आ जाता है जिससे हमारे देश में उबाल और क्षोभ पैदा होता है। बावजूद इसके तिब्बती शरणार्थियों या एकाध अनाम छोेटे संगठनों के अलावा किसी बड़े समूह ने शि चिनपिंग का सार्वजनिक विरोध नहीं किया, बल्कि गुजरात से लेकर दिल्ली तक उनका स्वागत हुआ तो यह मान लेना चाहिए कि हम भारतीय धीरे-धीरे यह समझने लगे हैं कि जब तक सीमा विवाद नहीं सुलझेगा ऐसी न होने वाली घटनायें होतीं रहेंगी और हमें इसके साथ ही आगे बढ़ना है।

संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में नरेन्द्र मोदी और शि ने जो कुछ कहा उससे स्पष्ट है कि इस मामले पर खरी-खरी बातें हुईं हैं। वैसे भी नरेन्द्र मोदी की कूटनीति सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत के आधार पर भावनात्मक और संवदेनात्मक लगाव का माहौल पैदा करते हुए ठोस और स्पष्ट बातचीत एवं परिणामों की ओर जाने पर केन्द्रित रहा है। शि के आने के पूर्व या जापान यात्रा के बाद जो माहौल था उसमें सामान्यतः यह कल्पना करना कठिन था कि वाकई यात्रा को इतना उत्सवमय बनाने की कोशिश होगी। लेकिन अहमदाबाद में तो होटल हयात से लेकर, साबरमती आश्रम फिर साबरमती घाट के इन्द्रधनुषी प्रकाश की तरंगों के बीच गीत-संगीत और बातचीत .......सब एक सांस्कृतिक महोत्सव का अहसास करा रहे थे। यह भी मोदी की लक्षित कूटनीति का ही अंग था। यानी हमने चीन को यह अहसास कराने की कोशिश की कि हम गंाधी के वंशज हैं, बुद्ध के वंशज हैं जो अहिंसा, सत्य और सद्भावना की राह पर चलते हैं, हमारी नीति किसी देश के प्रति दुर्भावाना की हो ही नहीं सकती......, लेकिन दूसरी ओर दिल्ली में उस भावना के साथ यह भी कि अगर हमारे साथ अन्याय हो रहा है तो फिर गांधी ने करो या मरो का नारा भी दिया। मोदी ने चीन शि को साफ किया कि आपको भी हमारी जरुरत है, निवेश के लिए, विश्व मंच पर साथ के लिए, शांतिपूर्ण जीवन के साथ विकास के लिए.......। पता नहीं शि और उनके नेतृत्व वाली सत्तारुढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं तथा उनकी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को यह बात कितनी समझ में आती है।
ध्यान रखिए कि पिछले वर्ष चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग 21 मई को चार दिवसीय यात्रा पर भारत पहुंचे थे और पहली बार उनकी यात्रा के पूर्व उत्साहजनक माहौल बना था। वे एकदम खुलकर बात कर रहे थे जो कि चीन के पूर्व नेतृत्व के रवैये से अलग था। संयुक्त पत्रकार वार्ता मंे भी उन्होंने पूरे विस्तार से अपनी बातें रखीं जिससे चीनी नेता प्रायः बचते थे। वे अंत में पत्रकारों को भी धन्यवाद देना नहीं भूले और कहा कि आप भी भारत के साथ संबंध बनाने के हमारे इरादे और प्रयासों को सैल्यूट करेंगे। उनके शब्दों में भारत के लोगों को यह विश्वास दिलाने का भाव था कि वे खुले मन से भारत के साथ युद्ध के इतिहास की स्मृतियों को भुलाकर साथ भावी इतिहास बनाना चाहते हैं। आने के पूर्व भी उन्होंने कहा था कि भारत यात्रा के दौरान वहां के लोगों को पता चल जाएगा कि हम उसके साथ कितना निकट का संबंध चाहते हैं। अक्टूबर 2013 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा के दौरान सीमा रक्षा सहयोग समझौता हुआ जिसमें विस्तार से ये बातें शामिल हैं कि अगर कभी सीमा पर तनाव उभरे या घुसपैठ हुईं तो कैसे उससे निपटेंगे। बावजूद इसके घुसपैठ रुका नहीं। इस वर्ष ही करीब 344 घुसपैठ हुई है। पर उनमें सभी गंभीर नहीं होते और 1976 के बाद कभी गोलियां भी नहीं चलीं हैं। यही चीन और पाकिस्तान में अंतर है। चीन से आतंकवादी भी हमारे यहां नहीं आते।

गार्ड ऑफ ऑनर लेने के बाद जिनपिंग ने कहा, बतौर राष्ट्रपति यह मेरी पहली भारत यात्रा है। मैं तीन लक्ष्यों पर फोकस करूंगा। पहला लक्ष्य है हमारी दोस्ती को आगे ले जाना। हम एक-दूसरे की सभ्यता और संस्कृति का सम्मान करते हैं और इसे गहरा करना महत्वपूर्ण है। विकास का हमारा लक्ष्य एकसमान है। भारत और चीन मिलकर दुनिया के लिए नए मौके पैदा कर सकते हैं। हमें अपनी रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाईयों पर ले जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत और चीन की हजारों वर्षाे की साझा सांस्कृतिक विरासत है। शि की पत्नी पेंग लीयुआन ने विद्यालय में जाकर, पेंटिंग बनाकर तथा अन्य तरीकों से नरम कूटनीति की भूमिका निभाई ताकि जन से जन का सांस्कृतिक संपर्क का रास्ता बने। इसीलिए 2015 को चीन में विजिट इंडिया तो 2016 को विजीट चाइना वर्ष के तौर पर मनाया जाएगा। ये बातें सुनने में मोहित करतीं हैं। पिछले वर्ष लि ने भी यही बातें कहीं थी।

ली की यात्रा के दौरान हमने 8 समझौते किए और शि की यात्रा में 12 समझौतों हुए हैं। तो जो 12 समझौते हुए उसमें कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए नाथु ला दर्रा को खोलने का अर्थ है कि आप तिब्बत से होकर किसी भी समय वहां जा सकते थे। अब तक हमें उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों से गुजरना पड़ता था। यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण समझौता है। लंबे समय से इसकी मांग थी। दोनों देशों के बीच रेलवे, बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग और सीमा शुल्क समेत 12 क्षेत्रों में समझौते हुए हैं। चीन महाराष्ट्र और गुजरात में इंडस्ट्रियल पार्क बनाएगा। इसके अलावा शंघाई की तर्ज पर मुंबई का विकास और स्वास्थ्य व सांस्कृतिक क्षेत्र में सहयोग के भी समझौते हुए हैं। चीन ने आने वाले पांच साल में भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश का भरोसा दिलाया है। भारत और चीन ने असैन्य नाभिकीय सहयोग पर भी वार्ता शुरू करने का फैसला किया है। चीन के साथ असैन्य नाभिकीय सहयोग पर बातचीत ही अपने आपमें महत्वपूर्ण है। जो चीन वाजपेयी सरकार द्वारा नाभिकीय विस्फोट के बाद कितना आग बबूला था, जिसने भारत अमेरिका नाभिकीय सहयोग समझौता न हो इसकी पूरी कोशिश की आज उसने हकीकत को स्वीकार किया तो यह हमारी कूटनीतिक विजय है। हालांकि नाभिकीय रिएक्टर में चीन के लिए जगह कम बची है, फिर भी नाभिकीय दुनिया में ऐसे और क्षेत्र है, जिन पर बातचीत और सहयोग हो सकता है।  उन्होंने भारत, चीन, म्यांमार और बांग्लादेश के बीच आर्थिक कॉरिडोर बनाने की भी बात की है। रणनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात अफगानिस्तान की शांति और स्थिरता को शामिल करना है। भारत के साथ इस प्रकार की बातचीत का अर्थ है कि पाकिस्तान की चाहत के विपरीत चीन ने वहां भारत की भूमिका को स्वीकार किया है।

चिनफिंग के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोदी ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि जहां हमने संबंधों को बढ़ाने के लिए कई मुद्दों पर चर्चा की है, वहीं मित्रता की दृष्टि से कुछ कठिन विषयों पर भी बात की है। सीमा पर हाल में चीन की ओर से बढ़ी घुसपैठ की घटनाओं पर चिंता करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, मैंने सीमा पर हुई घटनाओं को लेकर चिंता जताई है। भारत और चीन के बीच रिश्ते की पूर्ण संभावना को हकीकत बनाने के लिए सीमा पर शांति और आपसी भरोसा हो। वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए, यह काम कई सालों से रुका हुआ है और शुरू होना चाहिए।  मोदी ने कहा कि चीन की वीजा नीति और दोनों देशों में बहने वाली नदी (ब्रह्मपुत्र) को लेकर उसकी नीति को लेकर भी मैंने चिता जताई है। मोदी के बाद चीनी राष्ट्रपति ने जो कहा उसकी कुछ पंक्तियांे पर ध्यान दीजिए। मोदी और उनकी यह पंक्ति समान थी कि विकास के लिए शांति जरूरी है। चीन जल्द से जल्द सीमा विवाद सुलझाने का इरादा रखता है। चिन फिंग ने कहा कि दोनों देश एक-दूसरे की चितांओं का ध्यान रखेंगे और सीमा की घटनाओं का रिश्तों पर असर नहीं पड़ने देंगे। 

मोदी की बात का जवाब देते हुए चिनफिंग ने कहा कि यह समस्या इतिहास से चली आ रही है और दोनों देशों को जल्द से जल्द सुलझाने की जरूरत है। जो विवाद थे, अब वे इतिहास के पन्नों में हैं। इसे जल्द से जल्द सुलझाने के लिए चीन तत्पर है। इस विवाद का असर दोनों देश की दोस्ती पर असर नहीं पड़नाचाहिए। मोदी ने कहा कि हमने चीन में भारतीय कंपनियों के निवेश पर लगी पाबंदियों में ढील देने का आग्रह किया है। उन्होंने इस पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया है। करीब 29 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हमारे लिए चुभती हुई सूई है। वैसे शि ने कहा कि औषधि, कृषि उत्पाद आदि कई क्षेत्रों में हम भारत के निर्यात को निर्बाध करने के कदम उठाएंगे। अगर पिछले वर्ष लि कियांग की यात्रा के बाद हुई पत्रकार वार्ता को ध्यान रखेंगे तो लगभग ऐसे ही मनमोहन सिंह ने भी थोड़ी अलग शब्दावली में अपनी बात रखी और कियांग ने सकारात्मक उत्तर दिया। शि और लि दोनों की बातें समान थीं। लेकिन हम जानते हैं कि सीमा विवाद पर संयुक्त कार्यबल की 16 दौर की बातचीत के बाद भी मामला जस का तस है। इसके कारण भी साफ हैं। हम यहां उन पर नहीं जाएंगे। पर इससे इतना साफ हो जाता है कि चीन की एक सुस्पष्ट नीति है और वह उस पर आगे चल रहा है। वह भारत से तनाव नहीं चाहता, अन्य अनेक मुद्दों पर लचीला रुख अपनाता है अपनाएगा पर सीमा को लेकर वह अपने रुख पर कायम रहेगा। हमें इसी को ध्यान रखते हुए उसके साथ संबंधों का निर्धारण करना है।
अवधेश कुमार, ई.: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः 01122483408, 09811027208

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