रविवार, 1 मार्च 2026

भारत-चीन सीमा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी चर्चा होनी चाहिए

कर्नल शिवदान सिंह

लोकसभा के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सेना के भूतपूर्व अध्यक्ष जन नरवाने की प्रकाशित नहीं हुई पुस्तक को सदन में लहराते हुए मौजूदा सरकार को निर्णय लेने में अक्षम बताने की कोशिश की है। 2020 में गलवान संघर्ष के समय लद्दाख के कैलाश क्षेत्र में कुछ चीनी टैंकोकी हरकत देखी गई जिसके बारे में सेना प्रमुख ने सरकार से इनके विरुद्ध कार्रवाई के बारे में जानने की कोशिश की जिसके उत्तर में जैसा कि पिछले लंबे समय से सरकार ने सेना को देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने की पुरी छूट दी हुई है उसी प्रकार सरकार ने सेना प्रमुख को बताया कि जो उन्हें जो उचित लगे वह कार्रवाई कर सकते हैं। इसके लिए सेना ने कोई अतिरिक्त संसाधन या गोला बारूद की मांग सरकार से नहीं की थी तो इससे साफ हो जाता है कि इसमें विवाद या सरकार की निष्क्रियता कहीं भी नजर नहीं आ रही है। इसी प्रकार कुछ राजनीतिक दल सेना और सरकार की कामयाबी को कम दिखाने के प्रयास में ऑपरेशन सिंदूर और 2016 में जम्मू कश्मीर के ऊरि क्षेत्र में पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकी कैंपों पर भारतीय सेना के द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइकका भी प्रूफ मांग रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी कामयाबी थी कि हमारी सेना ने सफलता पूर्वक पाकिस्तान में लश्करे तैयबा के 11 कैंप और वहां के पांच हवाई अड्डओ पर हमला करके उनको बर्बाद कर दिया था। इसके साथ ही पाकिस्तान इसके जवाब में हमारे देश का बाल बांका भी नहीं कर सका। उसके ड्रोनों और मिसाइलो को हमारा अभेद एयर डिफेंस सिस्टम सीमा में घुसने से पहले ही बर्बाद कर देता था। इसलिए दुनिया की प्रेस किसी भी भारत के नुकसान का फोटो विश्व पटल पर नहीं रख सकी। ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सफलता को देखते हुए विश्व के 135 देशों ने भारत के ऑपरेशन की सराहना की थी। इस सब के बावजूद भी हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल सेना की इन सफलताओं को भी स्वीकार नहीं करके सेना के मनोबल को गिराने का प्रयास करते हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नकारात्मक है।

लद्दाख क्षेत्र और चीन के बारे में प्रश्न करने वालों को इस विषय पर भी विचार करना चाहिए की 1962 के युद्ध में भारत की हार और उसके 38000 वर्ग किलोमीटर सियाचिन क्षेत्र को चीनी सेना ने किन कारणों से कब्जे में कर लिया था। 1950 के दशक में चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। इसी के अंतर्गत चीन ने 1955 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया तथा उसके साथ-साथ सीमावर्ती भूटान नेपाल और भारत के क्षेत्र की तरफ भी अपनी सैनिक गतिविधि बढ़ाने शुरू कर दी थी। चीन के इस कब्जे को विश्व पटल पर उचित तथा न्याय संगत ठहरने के लिए भारत ने चीन के तिब्बत पर कब्जे को उचित ठहराते हुए उसे मान्यता प्रदान कर दी और तिब्बत को चीन के भाग के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद चीन ने तिब्बत के दक्षिणी क्षेत्र से सियाचिन होकर एक सड़क बननी शुरू कर दी जिससे उसकी गतिविधियां भारतीय सीमा तक बढ़ गई। 1958 तक चीन काफी आक्रामक मूड में भारतीय सीमा की तरफ क् बढ़ने लगा। इसको देखते हुए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने चीन की गतिविधियों की पूरी रिपोर्ट तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेमन को पेश करते हुए सेना के लिए आधुनिक हथियार और गोला बारूद के लिए धन की मांग की जिससे चीनी सेना का मुकाबला किया जा सके। परंतु उनके इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने नहीं माना तथा प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कहा कि हमने चीन के साथ पंचशील संधि की है जिसके अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हुए एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। जब काफी प्रयासों के बाद भी नेहरू ने अपना निर्णय न बदलते हुए सेना बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की इससे निराश होकर जन. थीमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया जिसको भारत सरकार ने स्वीकार नहीं कियाइसके बाद जन. ने सेना की गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद करते हुए सेना के संचालन से दूरी बना ली। इसके बाद बिना किसी कारण के चीनी सेना ने अक्टूबर 1962 में लद्दाख नेफा और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर आधुनिक हथियारों से हमला कर दिया

भारतीय सैनिकों के पास उस समय केवल बोल्ट एक्सन राइफल थी जिससे चीनी सेना की आधुनिक हथियारों का मुकाबला असंभव था। इसके अलावा भारत-चीन सीमा तक भारतीय क्षेत्र में संचार के साधन सड़क इत्यादि बिल्कुल नहीं थे इसके कारण सेना को समय पर सहायता भेजा जाना असंभव था। इसके बावजूद भी भारतीय सेवा ने बहादुरी सेचीनी हमले का मुकाबला किया और इसी हमले में लद्दाख के रेजांगला की सुरक्षा में तैनात में मेजर शैतान सिंह ने अपने 110 सैनिकों के साथ दुश्मन के 1200 सैनिकों का मुकाबला बहादुर से किया। जब उनकी रायफलों की गोलियां समाप्त हो गई और पीछे से कोई मदद की आशा नहीं थी नहीं थी। तब उस स्थिति में शैतान सिंह ने पीछे भागने के स्थान पर दुश्मन का मुकाबला राइफल की संगिनो से करने का निश्चय करके अपने सैनिकों के साथ चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया। जिसमें एक-एक भारतीय सैनिक ने चीन के 10–10 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और चीन के इस हमले को नाकाम कर दिया। इस युद्ध में मेजर शैतान सिंह और उसके सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की। उस समय संचार व्यवस्था का इतना बुरा हाल था कि इन सैनिकों के मृत शरीरों की जानकारी पूरे 40 दिन के बाद उस समय प्राप्त हुई जब एक चरवाहा अपनी भेडॉ को चराते हुए उस क्षेत्र में गया और उसने वहां पर इन सैनिकों के शब् और चीनी सैनिकों के शब चारों तरफ बिखरे हुए देखे। इसकी सूचना उसने फौरन सेना को दी तब उनकी वीरता की कहानी देश को पता चली और उनके शरीरों का अंतिम संस्कारकिया जा सका

इसी क्रम में चीन ने 1967 में देश के मुख्य भाग कोउत्तर पूर्वी राज्यों से से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहे जाने क्षेत्र पर कब्जा करने की योजना बनाई जिसके द्वारा वह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों पर कब्जा करना चाह रहा था। इसके लिए चीन ने अपनी आक्रामक करवाई सिक्किम की सीमाओं पर शुरू कर दी। इसकी जानकार सिक्किम क्षेत्र के जीओसी मेजर जनरल सगत सिंह ने सेना मुख्यालय तक पहुंचा दी थी। इस पर जन. सागत सिंह को भारत सरकार के निर्देश सेना मुख्यालय के द्वारा प्राप्त हुये कि वे चीन के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करेंगे तथा सीमाओं से 1000 मीटर पीछे हटकर मोर्चा संभालेंगे। इस प्रकार 1962 के युद्ध की तरह ही चीन को भारत सरकार पूरा मौका भारत में अंदर प्रवेश करने का दे रही थी परंतु जन. सगत सिंह नेइस आदेश का पालन नहीं किया तथा अपने सैनिकों को और भी मजबूती से नाथुला और उसके आसपास तैनात कर दिया।

जब चीन ने सितंबर 1967 में नाथुला पर हमला किया तो जन. सगत सिंह स्वयं अग्रिम पंक्ति में तैनात सैनिकों के पीछे जाकर पोजीशन संभाली और घोषणा करवा दी की जो भी भारतीय सैनिक मोर्चे से पीछे भागेगा उसकी हत्या वे स्वयं वे गोली मारकर करेंगे। इस प्रकार उन्होंने सैनिकों का मनोबल इतना बढ़ाया कि भारतीय सैनिकों ने चीनी हमले को नाकाम करते हुए उसके सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया। इस प्रकार देखा जा सकता है की 1962 की हार और 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में जाने के लिए किसी हद तक केवल भारत सरकार ही जिम्मेदार थी। क्योंकि उसने भारतीय सेना को उचित गोला बारूद उपलब्ध नहीं कराया जिसके कारण भारतीय सेना चीनी सेना का मुकाबला नहीं कर पाई। इसके अतिरिक्त चीन के साथ लगने वाली उत्तर पूर्वी सीमाओं और लद्दाख क्षेत्र के लिए आधारभूत ढांचा जैसे सड़क इत्यादि की कोई व्यवस्था नहीं थी जिसके कारण समय से सेना के लिए उचित सहायता समय से नहीं पहुंच सकी। 

विश्व में चीन की गतिविधियों और उसकी चालों को समझ कर भारत सरकार ने चीन की हर चाल को नाकाम करने के लिए उत्तर पूर्वी तथा लद्दाख सीमा तक संचार व्यवस्था जैसे राजमार्ग तथा हवाई अड्डे बना दिए हैं। यह राजमार्ग इतनी क्षमता के हैं कि उनके द्वारा सेना के लड़ाकू टैंक भी शीघ्रता से सीमा तक पहुंच कर चीनी हमलों को नाकाम करके चीन के अंदर तक मार कर सकते हैंइसके लिए उत्तर पूर्व की सीमाओं के लिए स्ट्राइक कोर का गठन किया गया है जिसमें लड़ाकू टैंक होते हैं। 1962 के युद्ध में लड़ाकू विमान का प्रयोग चीनी हमले के विरुद्ध नहीं किया गया था। जिसका मुख्य कारण था कि उस क्षेत्र में इन विमानो केउतरने और उड़ान भरने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसको देखते हुए अब अकेले लद्दाख क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चार हवाई अड्डे– थोयस, लेह, नियोमा तथा कारगिल में स्थापित कर दिए गए हैं। जिनसे आधुनिक राफेल विमान दुश्मन पर मार कर सकेंगे। इसके साथ ही चीन से लगती सभी सीमाओं पर आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त सैनिक तैनात किए गए हैं। जिससे चीन अपनी संख्या से हमारे सैनिकों को हराने का प्रयास न कर सके। इस सबके साथ अब 1962 और 1967 जैसी स्थिति नहीं है जिसमें जन सगत सिंह को नाथुला की सुरक्षा से पीछे हटने के लिए भारत सरकार ने आदेश दिए थे। आज की स्थिति में एक सैनिक कमांडर को सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने के लिएभारत सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ती है। आज के समय मेंसैनिक कमांडर सीमा को सुरक्षा के लिए निर्णय लेने में स्वतंत्र है जैसा की जन. नरवाने ने स्वयं कीअपनी पुस्तक में लिखा है। 

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत के लिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर का महत्व देखते हुए उन्होंने बांग्लादेश में भी इसके समानांतर एक कॉरिडोर निर्माण का वादा किया है। जिसके द्वारा के भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों के साथ संपर्क हर स्थिति में बना रहे। यदि 1967 में जन. संगत सिंह केंद्र सरकार के निर्णय के अनुसार कार्रवाई करते तो आज हो सकता है यह सिलिगुड़ी कॉरिडोर और हमारे उत्तर पूर्व के 7 राज्य भारत का हिस्सा ना होते। इसलिए आज के समय में देश की सीमाओं की सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम भारत सरकार ने थल, जल और वायु मेंकर दिया है। इसलिए अब चीन भारत को पहले जैसी धमकियां और आंखें नहीं दिख रहा है बल्कि वह भारत के साथ हर तरह के विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटने के लिए तैयार है।

 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

संयुक्त परिवार की व्यवस्था क्या आज भी प्रासंगिक है?

बसंत कुमार

हम दिल्ली के जिस इलाके में रहते हैं उसे दिल्ली का बड़ा समृद्ध इलाका का माना जाता है लेकिन एक चीज जो प्रायः मन को कचोटती रहती है की इन बड़े-बड़े घरों में वृद्ध पति पत्नी अकेले रहते हैं और उनको देखने वाला कोई नहीं रहता क्योंकि इनमें से अधिकांश के बेटे बहु विदेश में रहते हैं या अच्छे अवसर की तलाश में अन्य शहरों में रहते हैं। इन वेदों की खबर लेने वाला कोई नहीं है अगर यह बीमार हो जाए तो पैसा होने के बावजूद भी उनकी देख लेकर देखरेख वाला कोई नहीं रहता। हम अखबारों में रोज पढ़ते हैं कि की इन समृद्ध परिवारों के वृद्धो की देख-रेख करने के लिए वृद्ध आश्रम की एक विकल्प बचता है, ये भरे पूरे परिवार के होने के बावजूद अनाथालयों में या वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। खाने को भारत पूरा परिवार है बेटे बेटियां सभी उच्च पदों पर हैं लेकिन उन्हें 2 जून की रोटी देने वाला कोई नहीं है और यह समस्या पिछले30-40 वर्षों से अधिक हो गई है क्योंकि आर्थिक सुधार युग के बाद आधुनिकता की दौड़ में हम संयुक्त परिवार प्रथा से दूर न्यूक्लियर फैमिली की ओर अग्रसर हो रहे हैं अब इस समय यह विचार करने का समय आ गया है की क्या संयुक्त परिवार प्रथा के टूटने से और न्यूक्लियर फैमिली कॉन्सेप्ट आने से हमारे सुकून भरे दिन अब लद चुके हैं।

वास्तविकता यह है कि डब्बे के दशक के जब से आर्थिक सुधार युग का आगमन हुआ और हम पश्चात देशों के सम्पर्क में आ गए तो हमारे आधुनिक जीवन शैली ने पारिवारिक ढांचे को बुरी तरह से प्रभावित किया है। संयुक्त परिवार का टूटना एकल परिवारों का बढ़ना और आपसी संवाद में कमी हमारे जीवन में चार और मानसिक तनाव को बढ़ा रहे हैं रोजगार बेहतर अवसरों की तलाश में लोग अपने घरों से दूर हो रहे हैं जिसे पारिवारिक भावनात्मक सहारा कमजोर पड़ रहा है। आर्थिक सुरक्षा सीमित आए परिवार की जिम्मेदारियां का दबाव और रिश्तो में प्रति दूरियां मन को अस्थिर कर रही हैं। पति-पत्नी के बीच मतभेद पारंपरिक और आधुनिक सोच का टकराव तथा रिश्तो के अनावश्यक हस्तक्षेप पारिवारिक तनाव को जन्म दे रहे हैं। आज मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती काम नहीं बल्कि कम से जुड़ा दबाव और समाज में बनी इमेज है। परिवार की उम्मीदें रिश्तेदारों की तुलना और लोग क्या कहेंगे का डर इंसान को भीतर से तोड़ रहा है और यही मानसिक दवा तनाव धीरे-धीरे हमारी मानसिक दशा को और पारिवारिक संबंधों को खराब कर रहा है।

आज अधिक पैसा कमाने और अच्छे जीवन की तलाश में लोग बाहर जा रहे हैं और परिवार बिखर रहे हैं और इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि है कि प्राचीन संयुक्त परिवार की परंपरा से हम दूर होते जा रहे हैं और पैसा कमाने की बोर्ड में घर का सुकून हमसे छीना जा रहा है और बड़े बुजुर्ग की ओर से हम उदासीन होते जा रहे हैं, आज के दो दशक पूर्व यदि पति पत्नी में कोई विवाद होता था तो घर के बड़े बुजुर्ग इस विवाद को बड़ी आसानी से सुलझा देते थे पर आज हम घर के बड़े बुजुर्गों से दूर हो गए हैं और पति-पत्नी कि थोड़े-थोड़े से मन मोटे झगड़ा के बाद स्थिति कोर्ट और तलाक तक पहुंच जाती हैआज के आधुनिक युग में जहां पर घर के बड़े बुजुर्ग वृद्ध आश्रम अनाथालय में रहने को मजबूर हैं वहीं पति-पत्नी के बीच कोर्ट केसेस और तलाक के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है अब अवसर आ गया है किन समस्याओं के बारे में गंभीरता से सोचें और जान क्या आखिर क्यों हम मानसिक रूप से अस्थिर क्यों हो रहे हैं।

यदि हम इन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करें तो हमें समझ में आता है लोगों का लगातार चिंतित रहना स्वभाव में चिडचिडापन का मुख्य कारण संयुक्त परिवार का बिछड़ना है जिसकी वजह से हम या तो दिनभर मोबाइल में व्यस्त रहते हैं और संवाद के लिए कोई जगह नहीं होती जबकि संयुक्त परिवार प्रणाली में हम दिन भर काम करने के बाद शाम को परिवार के सभी सदस्यों के बीच संवाद करते थे समाचार सुलझाई जाती थी और फिर दूसरे दिन तरोताजा होकर कम पर जाते थे लेकिन आज संयुक्त परिवार बिगड़ने से ना तो संवाद हो रहे हैं और ना ही बड़े गुना से सलाह ली जा रही है जिसके कारण हमारा पूरा पारिवारिक ताना-बाना बिखर रहा है। ऐसी स्थिति का लगातार बने रहना बहुत ही चिंताजनक है। लगातार चिंता चिड़चिड़ापन एकाग्रता में कमी, नींद न आने की समस्या, शारीरिक थकान सामाजिक अलगाव तथा भावनात्मक असंतुलन लंबे समय तक न बने रहे इसके लिए इसका समाधान आवश्यक है।

समाधान की शुरुआत परिवार से ही होती है। खुला संवाद एक दूसरे की भावनाओं को समझना और अपनापन ही मानसिक सुकून की पहली सीढ़ी है। बच्चों को डांट नहीं सहयोग की जरूरत होती है। युवाओं को आलोचना नहीं विश्वास चाहिए और बुजुर्गों को उपेक्षा नहीं सम्मान और साथ चाहिए, पर न्यूक्लियर फैमिली की कॉन्सेप्ट आने से यह सब समाप्त हो गयाहै। परिवार का टूटना परिवार का टूटना केवल सामाजिक ढांचे का बदलाव नहीं बल्कि एक गहरी मानसिक पीड़ा है संवेदनशीलता और आपसी सहयोग से ही इसके इलाकों काम किया जा सकता है जब समाज सफलता से पहले खुशहाली को प्राथमिकता देगा तो यह समस्याएं सदा समाप्त हो जाएंगे जब तक इंसान अपने मन को समझना नहीं सीखेगा तब तक बाहरी सफलताएं भी उसको शांति प्रदान नहीं करेंगी। यह जानने के पहले हमें समझना होगा कि हमारे संयुक्त परिवार से हमें क्या फायदे थे और अब संयुक्त परिवार बिखरने से क्या नुकसान हो रहे हैं।

सामूहिक परिवार या संयुक्त परिवार आज के भाग दौड़ भरे तनाव युक्त जीवन में सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग, बच्चों के बेहतर लालन पालन और आर्थिक मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है। ये घर के बुजुर्गों की देखभाल भी सुनिश्चित करते हैं और उनका अकेलापन दूर करते हैं और बच्चों में संस्कार और सुरक्षा प्रदान करते हैं क्योंकि बच्चे दादी-दादी या परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी में बेहतर सामाजिक मूल्य और संस्कार सीखते हैं और यह उन्हें एकाकीपन के कारण उपजने वाली हताशा व निराशा आज के प्रभाव से दूर करता है दूसरे शब्दों में हमारे परंपरागत संयुक्त परिवार एक साथ कई समस्याओं से निपटने का मजबूत माध्यम है। पिछले दो-तीन दशकों से हमने केंद्रीय की परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) को अपनाने के कारण जिन मुसीबत को झेला है या झेल रहे हैं उनसे निपटने के लिए यही एक मात्र साधन है।

यद्यपि आज हम 21वीं शताब्दी के वैश्विक युग में जी रहे हैं जहां प्रतिस्पर्धा की होड़ में और पूरा विश्व एकही छतरी के नीचे समाया हुआ है फिर भी भारतीय परिपेक्ष में संयुक्त परिवार आज भी बहुत प्रासंगिक है। एक संयुक्त परिवार में सभी लोग एक दूसरे का सुख-दुख आपस में बांट लेते हैं और परिवार में कोई एक व्यक्ति कमजोर या अक्षम है उसका भी गुजारा हो जाता है। अकेलेपन के कारण जो बच्चे आज कल हताशा और निराशा में आत्म हत्या जैसे कदम उठा रहे हैं इन सब चीजों से बचने के संयुक्त परिवार जैसे परम्परागत समाज की ओर लौटना एक मात्र विकल्प है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

अविश्वास प्रस्ताव बनाम सब्सटेंसिव मोशन

अवधेश कुमार 

भारत की राजनीति ऐसी अवस्था में पहुंची है जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। यह भारत के संसदीय इतिहास की अत्यंत गंभीर स्थिति है जब लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस है तो उसके समानांतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध सब्सटेंसिव मोशन। राहुल गांधी के विरुद्ध सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सब्सटेंसिव मोशन लाने की मांग की है। भाजपा ने पहले राहुल गांधी के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की बात की थी किंतु लगता है गंभीरता से विमर्श करके सब्सटेंसिव मोशन की पहल की है। सब्सटेंसिव मोशन विशेषाधिकार हनन से ज्यादा गंभीर हो सकता है। सब्सटेंसिव मोशन स्वतंत्र मूल प्रस्ताव है जिसमें सांसद के विरुद्ध स्पष्ट आचरण या निर्णय सामने आता है। इस पर बहस और मतदान होता है तथा पारित होने पर सदन का अधिकारिक रुख और मत प्रकट होता है। यानी संबंधित सांसद का आचरण और चरित्र सांसद के अनुकूल है या नहीं, इन्हें सांसद होना चाहिए या नहीं, इन्हें भविष्य में चुनाव लड़ने देना चाहिए या नहीं आदि आदि।  इसके आधार पर कार्रवाई हो सकती है और सदन की सदस्यता भी जा सकती है? चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की अनुशंसा की जा सकती है। तो इसे कैसे देखा जाए? राहुल गांधी प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस इस पर या प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि हम डरने वाले नहीं है। 24 दिसंबर, 2005 को लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता कैसे गई थी? एक टेलीविजन चैनल ने  स्टिंग किया और सांसदों पर धन लेकर प्रश्न पूछने का आरोप लगा। सब्सटेंसिव मोशन के तहत उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और उन्हें आरोपों के उत्तर का भी अवसर नहीं दिया गया। इसमें मुख्य भूमिका कांग्रेस की ही थी। 

अविश्वास अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलने के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में आना बंद कर दिया है।अविश्वास प्रस्ताव के बाद बहस और परिणाम तक लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते। तो उन्होंने यह निर्णय किया । यही बात सांसद या विपक्ष के नेता पर लागू नहीं होती। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव या सब्सटेंसिव प्रस्ताव स्वीकृत होने के बावजूद संबंधित सदस्य हिस्सा ले सकते हैं। उन्हें अपना पक्ष रखने का समय दिया जा सकता है। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को बहस होने की संभावना है। यह देखना होगा कि सब्सटेंसिव मोशन स्वीकृत होता है या नहीं। चूंकि भाजपा नेतृत्व वाले राजग को बहुमत है इसलिए अविश्वास प्रस्ताव गिर जाएगा। यही बात सब्सटेंसिव मोशन के साथ लागू नहीं होता। बहुमत के आधार पर गठबंधन राहुल गांधी के विरुद्ध निश्चित मत और कार्रवाई तक का प्रस्ताव पारित कर सकता है। कांग्रेस के अंदर उनके समर्थकों में इससे कोई परेशानी नहीं दिखाई देती। उल्टे वे यह कहते हुए प्रफुल्ल होते हैं कि एजेंडा तो राहुल गांधी ही सेट कर रहे हैं और वह सब्सटेंसी मोशन पर बहस भी उन्हीं के इर्द-गिर्द रहेगी। अगर सोच ऐसी हो तो कल्पना की जा सकती है कि राहुल गांधी और उनके इर्द-गिर्द के रणनीतिकार किस दिशा में जा रहे हैं। बजट सत्र आरंभ होने के पहले दिन को छोड़कर आरंभ से अंत तक राहुल गांधी सदन के अंदर और बाहर सर्वाधिक चर्चा और बहस के विषय रहे। क्या इसे सही अर्थों में राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारित करना कहेंगे? लोकसभा में विपक्ष के नेता की दृष्टि से इसे बिल्कुल जायज माना जाएगा?  क्या इससे राहुल गांधी अपने राष्ट्रीय दायित्वों की पूर्ति कर रहे हैं?

किसी एक नेता के विरुद्ध कार्रवाई होगी तो लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा हो सकती है और अनेक प्रश्न उठ सकते हैं। दूसरा पक्ष यह है जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अभियान चला उसका क्या? उनकी बेटी के सिविल सर्विस पास होने तक पर प्रश्न उठाने वाले कौन थे?  कांग्रेस की महिला सांसदों द्वारा उनको लिखा गया पत्र देखिए , चरित्रहनन है। और आपने अविश्वास प्रस्ताव तक ला दिया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट घेर कर कांग्रेस की महिला सांसद बैनर लिए खड़ीं थी। माहौल का ध्यान रखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा मैंने उनसे सदन में न आने का अनुरोध किया क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था। एपिस्टन फाइल को लेकर निराधार आरोप क्या चरित्रहनन नहीं है? इस फाइल में किसी का नाम आना उसके पाप में भागीदार का द्योतक नहीं हो सकता। एपिस्टन फाइल की मुख्य चर्चा अवयस्क बालक - बालिकाओं के साथ शर्मनाक यौनाचार के संदर्भ में है। यह जानते हुए कोई उसके संपर्क में है तोउसे दोषी माना जाएगा। जिस तरह राहुल गांधी और उनके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घसीटने की कोशिश कर रहे हैं उसे चरित्र हनन की राजनीति के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। संकेत में यह कहना कि प्रधानमंत्री दबाव में है क्योंकि अभी फाइल में माल बहुत है और अडाणी पर अमेरिका में केस हैं आदि आदि . क्या है?  यही बताने की कोशिश हो रही है कि प्रधानमंत्री का दबाव है और इसीलिए वे देश का सौदा कर रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष के लिए ऐसी कठिन स्थिति पैदा करने की कोशिश है कि उन्हें फैसला लेने में ही समस्या हो। ओम बिरला यहां व्यक्ति नहीं लोकसभा अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद पर हैं। हमारा व्यक्तिगत उनसे मतभेद हो सकता है, उनसे नापसंदगी भी होगी, पर पद का सम्मान करने और विश्वास करने का प्राथमिक दायित्व भी नेता और संसद न निभाएं तो इसे क्या कहेंगे? यह सब शर्मनाक है।

 हालांकि राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव ने विश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किया। यह भी एक रणनीति होगी ताकि वे बोल सके कि हमने अध्यक्ष पद की गरिमा का ध्यान रख हस्ताक्षर नहीं किया।आपकी रणनीति हो सकती है कि किसी तरह उन्हें मनोवैज्ञानिक दबाव में रखो और अपना एजेंडासदन के माध्यम से प्रचारित और स्थापित करने की कोशिश करो। जब एक पक्ष सीमा का इस सीमा तक उल्लंघन करता रहेगा तो दूसरे पक्ष से भी प्रत्युत्तर उस रूप में आ सकता है। सांसद निशिकांत दुबे द्वारा प्रस्तुत पुस्तक जिनमें नेहरू परिवार के चरित्र पर प्रश्न खड़े किए गए हैं उसी की प्रतिक्रिया में आया था। आपने लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव दिया, प्रधानमंत्री का भी चरित्रहनन किया, देश के प्रति उनकी निष्ठा के विरुद्ध दुष्प्रचार किया तथा अंततः ऐसी स्थिति पैदा की किए हुए राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में भाषण नहीं दे सके तो आपके विरुद्ध भी सब्सटेंसिव मोशन आ गया।  शीर्ष स्तर की राष्ट्रीय राजनीति का इस स्तर पर नहीं पहुंचना चाहिए था जहां प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए। आखिर रास्ता क्या है?

 अगर राहुल गांधी के समर्थकों को गलतफहमी है कि चर्चा और बहस का एजेंडा सेट करना है बड़ी उपलब्धि है तो एसआईआर एवं चुनाव आयोग के संदर्भ में भी ऐसी ही स्थिति थी। उन्होंने अपनी ओर से पूरी तैयारी के साथ एसआईआर और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया, बिहार में वोट अधिकार यात्रा की , चुनाव परिणाम आपके सामने है। महाराष्ट्र चुनाव में अडाणी मुद्दा उनके लिए सर्वोपरि था।परिणाम देख लीजिए। लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों का निलंबन तब किया जब वे बेल में जाकर लगातार अध्यक्ष की ओर कागज फेंक रहे थे, कोई आदेश या नियमन नहीं मान रहे थे। सामान्य सभा की भी अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति की ओर चिल्ला- चिल्ला कर कागज फेंका जाएगा तो उनके प्रति गुस्सा ही पैदा होगा और समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सदन संचालन के नियम और परंपरा हैं । इसको हर हाल में रौंदने  को उतारू लोगों के विरुद्ध अध्यक्ष को फैसला करना ही पड़ेगा। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद से लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस एक दिन भी सामान्य स्थिति पैदा नहीं होने देने पर उतारू है। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दे पर किसी सत्र में भाषण नहीं दिया। वह एजेंडा लेकर आते हैं और उसे सदन में रखते हैं तथा अध्यक्ष के रोकने पर उन्हें आरोपित करते हैं। इस लोकसभा के पहले हाथों में संविधान की लाल किताब लेकर नारे लगाए गए। क्या यह आचरण उचित था? पहली बार कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा किया। इस तरह की सोच और व्यवहार में कोई लोकतांत्रिक रास्ता निकल नहीं सकता। यह कहना कठिन है कि सब्सटेंसिव मोशन से रास्ता निकल पाएगा। सच कहें तो सदन को तय करना पड़ेगा कि विपक्ष के इस तरह के नेता से कैसे निपटा जाए?  नियम और परंपरा बनाने वालों ने ऐसे विपक्ष के नेता की कल्पना भी नहीं की होगी। आप एक बार रोकेंगे तो दूसरे तरीके से आ जाएंगे। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092 ,मोबाइल -9811027208

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

क्या जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रशासन को निर्देश देना सही?

बसंत कुमार

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें श्री जितना मांझी की पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के दलित विधायक लल्लन भुइया जो बिहार के जो कुटुंबा विधानसभा से विधायक हैं, को एक जनसभा में यह कहते हुए सुना गया कि मैंने अपने क्षेत्र के सभी थाना अध्यक्षों को यह निर्देश दिया है की वे एससी/एसटी एक्ट में कोई मुकदमा दर्ज न करें। उनके इस बयान ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया है भारतीय संविधान, जो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है, में एक विधायक या सांसद पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश दे सकता है कि वे एससी एसटी एक्ट में कोई मुकदमा दर्ज न करें। यह बात एक विवाद का विषय हो सकती है कि देश में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है पर क्या दलित समाज का ही विधायक खुलेआम एससी एसटी एक्ट द्वारा दलित समाज को संविधान द्वारा दीसुरक्षा रोक सकता है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण अधिनियम 1989) एक विशेष कानून है जो दलित और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले और जाति आधारित भेदभाव हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए बनाया गया था, यह अधिनियम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने त्वरित न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालतों के माध्यम से मामले को निपटाने और पीड़ितों को मुआवजा दिलाने एवं पुनर्वास की व्यवस्था करता है यह अधिनियम 30 जनवरी 19900 को लागू हुआ इसका मुख्य उद्देश्य दलित और आदिवासियों को अपमान और शोषण से मुक्ति दिलाने और संवैधानिक समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हुआ। पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की इक्विटी समिति के गठन के कानून का विरोध करने वाले सेवा से निलंबित बरेली के सिटी में स्टेट अलंकार अग्निहोत्री में यूजीसी एक्ट के साथ-साथ अब एससी एसटी एक्ट 1989 के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है उनको यह दिव्य दृष्टिकेदार धाम के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मिलने के बाद मिली है तो क्या यह मान लिया जाए कि ये शंकराचार्य पूरे हिंदू धर्म के शंकराचार्य होने के बजाय किसी वर्ण विशेष विशेष के शंकराचार्य है। श्री अग्निहोत्री का यह मानना है कि एससी एसटी एक्ट के तहत 95% मुकदमे फर्जी होते हैं तो क्या ये महाशय यह साबित करना चाहते हैं कि इन मुकदमों को देखने वाले पुलिस अधिकारी और जज इतने अक्षम है कि उन्हें फर्जी मुकदमे और सही मुकदमे के बीच अंतर पता लगाने की क्षमता नहीं है।

प्रश्न क्या है कि एससी एसटी एक्ट से पहले महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न से उनको बचाने के लिए दहेज कानून सहित अनेक कानून सरकार द्वारा बनाए गए और दशकों तक इन कानून का दुरुपयोग भी होता रहा पर इन कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए ना तो कोई शंकराचार्य सामने आया और न ही अलंकार अग्निहोत्री जैसा महापुरुष सामने आया जो इनको महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने वाले कानूनों के दुरुपयोग को रोकता। पर ज्यों प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगतभेद भाव अत्याचार के मामले में यूजीसी एक्ट पारित किया तब से ये शंकराचार्य न सिर्फ यूजीसी एक्ट का विरोध कर रहे हैं बल्कि तीन दशक पुराने एससी- एसटी (अत्याचार निवारण)अधिनियम का भी विरोध कररहे है, ऐसा करके ये उन ईमानदार पुलिस अफसरो और जजों की निष्ठा पर भी सवाल उठा रहे हैं जो एस सी -एस टी एक्ट के तहत मुकदमों का निपटन कर रहे है।

संविधान निर्माताओ ने विधायिका में दलित व आदिवासी समुदाय के लोगों के प्रतिनिधित्व के लिए कुछ सीटें इसलिए आरक्षित की थी कि उनके अपने लोग विधायिका में जाकर दलित और आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को रोक सके और इस प्रावधान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संज्ञा दी गई। पर अत्यंत उपेक्षित और शोषित मुसहर जाति का विधायक स्वयं दलितों पर के ऊपर हो रहे अत्याचारों से निपटने के लिए बनाए गए एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा न दर्ज करने के लिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे तो यह बड़ा आश्चर्यजनक लगता है।

जब वर्ष 2014 के चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने त्यागपत्र देकर मुसहर समाज के व्यक्ति जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया तो लोगों को उम्मीद बंधी की शायद सदियों से उपेक्षित और शोषित मुसहर समाज के कल्याण के लिए कुछ काम हो। और लेखक समेत अनेक बुद्धिजीवों को ऐसा लगने लगा की बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के बाद जितना मांझी के रूप में एक ऐसा नेता मिल गया है जो इन दलितों का कल्याण कर सके, पर जब तेरी मां जी केंद्र सरकार में मंत्री बने तो यह सपनादिवा स्वप्न बन कर ही रह गया। उनसे पूछकर सदियों से अपेक्षित शोषण अनुसार समाज की सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर एक पुस्तक" मुसहर समाज का इतिहास" मैंने लिखी और अपने खर्चसे इसका लोकार्पण कराया और यह उम्मीद थी कि श्री जीतन राम मांझी जी के सहयोग से यह पुस्तक अनुसार समाज के लोगों में पहुंचेगी, जिससे वे अपने समाज की शानदार परंपरा और अपने समाज के महापुरुषों तिलका मांझी, दशरथ मांझी, किराए मुसहर आदि के द्वारा राष्ट्र निर्माण में योगदान को जान सके। पर जितना मांझी जी समय देकर भी इस लोकार्पण में नहीं आए और न ही यह पुस्तक मुसहर समाज के लोगों तक पहुंचाने में कोई मदद की। इसकी विपरीत वे मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर पर लिखी पुस्तक" बाबरनामा"की तर्ज पर एक मुस्लिम द्वारा लिखी गई ले पुस्तक "मांझी नामा "को प्रमोट करने में लगे रहे !शायद उनके लिए मुसहर समुदाय के विकास से अधिक उनकी अपनी पापुलैरिटी ज्यादा मायने रखती है। उसके अलावा एक मंत्री के रूप में मोदी सरकार में रहकर कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिससे मुझे समुदाय का विकास हो सके। जबकि एमएसएमई मंत्री के रूप में वे केवीआईसी (khadi Village Industries Corporation) व राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड के माध्यम से मुसहर सहित अन्य दलित और आदिवासियों को विकास के माध्यम से मुख्य धारा में ला सकते थे पर अभी तक वह होता नहीं दिख रहा।

यह सही है कि राज परिवार के क्षत्रिय कुल में जन्मे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद बाबा साहब डॉ आंबेडकर को भारतीय रन से सम्मानित किया और अपने शासनकाल में दलित और अत्यधिक आदिवासियों पर अत्याचार रोकने के लिए एससी एसटी एक्ट 1989 पारित करवाया तथा अपनी कुर्सी की परवाह न करते हुए दशकों से लंबित पड़ी मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करवाया वहीं वैसे समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उच्च शिक्षा संस्थान में दलित और आदिवासी तथा पिछले वर्ग के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी एक्टमें इक्विटी समिति का प्राविधान करवाया पर दलित व आदिवासी समाज के सैकड़ो से अधिक संख्या में सांसद और विधायक कभी भी दलित समाज के साथ हुए अत्याचार पर एक साथ नहीं आए। इतिहास गवाह है कि डॉ आंबेडकर द्वारा पेश किए गए हिंदू कोड बिल के पास न होने के कारण उन्होंने मंत्री पद थे इस्तीफा दे दिया, पर उस समय कोई भी दलित आदिवासी सांसद बाबा साहब के समर्थन में न खड़ा हुआऔर न ही प्रधानमंत्री प जवाहर लाल नेहरू से उनका त्याग पत्र स्वीकार नकरने का आग्रह किया, दूसरी बारवर्ष 1980 में जब देश को बाबू जगजीवन राम के रूप में एक दलित प्रधानमंत्री बनाने का अवसर मिला तो श्रीमती इंदिरा गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की मिली भगत से बाबू जगजीवन राम को सरकार बनाने का निमंत्रण देने और लोक सभा में अपना बहुमत साबित करने का अवसर देने से पूर्व से पूर्व लोकसभा भंग कर दी गई, उस समय भी कोई भी दलित- आदिवासी सांसद इसका विरोध करने का साहस नहीं उठा सका। जब जब भी सरकारों द्वारा दलितों और आदिवासियों के हित के विरुद्ध कोई कदम उठाए जाते हैं तो विपक्षी तो सत्ता धारी पार्टी के दलित - आदिवासी सांसद भी चुप लगाकर बैठ जाते हैं। इससे प्रश्न उठता है की इन वर्ग के लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नाम पर सांसद और विधान विधानसभा मेंजो आरक्षण मिला हुआ है उसका लाभ क्या है।

बहुजन (दलित आदिवासी) के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं को भाजपा के संस्थापक सदस्यों से एक प कलराज मिश्र जी से सबक लेने की आवश्यकता है जिन्होंने लगभग 60 वर्षों से अधिक समय तक भारतीत जनसंघ और भाजपा में संगठन, विधायक, सांसद, मंत्री राज्यपाल जैसे पदों का उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। पर यूजीसी ऐक्ट के कारण जब उनके अपने समाज (ब्राह्मण) के साथ अन्याय होने की आशंका हुई तो उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों की परवाह न करते हुए यूं जी सी एक्ट का खुला विरोध किया। और सक्रिय राजनीति की पारी खेलने के बाद अंतर्राष्ट्रीय ब्राह्मण परिषद के अध्यक्ष के रूप में अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं पर दलित और आदिवासी के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी भी अपने समाज के हितों पर बोलने का साहस नहीं करते इसी कारण देश को आजाद हुए 7 दशक से अधिक हो चुके हैं पर वंचित समाज वही का वहीं खड़ा हुआ है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

घूसखोर पंडत फिल्म पर विवाद क्यों?

बसंत कुमार

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मनोज बाजपेई की फिल्म घुसखोर पंडित के शीर्षक पर विवाद हो रहा है यद्यपि उच्च न्यायालय में फिल्म निर्माताओं ने यह आश्वासन दे दिया है का शीर्षक बदल दिया जायेगा, इससे यह विवाद तो रूप गया है पर इसके पीछे कुछ प्रश्न छोड़ दिया गया है कि पंडत शब्द क्या किसी वर्ण विशेष की जागीर है और क्या इस फिल्म के माध्यम से उस वर्ण विशेष की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचा रहा है और फिल्म उद्योग द्वारा बन रही फिल्मों में किसी जाति पर और क्षेत्र के लोगो की विशेष छवि को पेश किया जाता रहा है पर आज तक इस पर विरोध नहीं हुआ तो क्या हजारों वर्ष प्राचीन वर्ण व्यवस्था इतनी इतनी हल्की सोच की हो गई है कि उससे मिलते जुलते नाम पर ही कोई फिल्म बनाने पर विवाद खड़ा हो गया और मामला सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट तक पहुंच गया।

सत्तर के दशक की फिल्मों में जब से फिल्मों में भ्रष्टाचार आदि विषयों पर फिल्में बनने लगी है या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर फिल्में बनने लगी तब से फिल्म केटाइटल पर विरोध होने लगा है। एक दशक पहले फिल्म पद्मावत के मूल शीर्षकों पर विवाद खड़ा हुआ और करणी सेना ने फिल्म के रिलीज पर ही अपनी आपत्ति खड़ी कर दी थी। जबकि रानी पद्मावती का यह चरित्र चित्रण प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने काव्य में कई सदियों पहले लिखा पर उस समय उस पर कोई आपत्ति नहीं उठाई पर अब हम इतने असहनशीन हो गए हैं कि किसी फिल्म के टाइटल मात्र से भड़क जाते है बगैर यही जाने की इसमें फिल्म में उस चरित्र की प्रशंसा है या आलोचना। मैने स्वयं फिल्म पद्मावत देखी और पाया कि रानी पद्मावती का जो व्यक्तित्व फिल्म में दर्शाया गया है उस पर न सिर्फ क्षत्रिय समाज नहीं बल्कि पूरे हिंदू समाज को गर्व होना चाहिए एक पतिव्रता जो सुंदर होने के साथ साथ अपने पति और राज्य की जनता के भले के लिए सोचता रहती है और ऐसे उच्च व्यक्तित्व वाली महारानी के बारे में हमारा पीढ़ियां जाने, बाकी इस ऐतिहासिक सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अलाउद्दीन खिलजी ने हिंदुस्तान में शासन किया और वह बहुत ही क्रूर था बाकी सुंदर स्त्रियों के लिएआकर्षण मानव की कमजोरी रही है और न जाने कितने युद्ध इसीलिय हुए पर हमारे इतिहास में महिला के व्यक्तित्व को लेकर जो अवधारणा रही है वो कभी नहीं बदली और न बदलेगी।

यदि हम अपने समाज में प्राचीन कहानियों को पढ़े तो हर कहानी इसी बात से शुरू होती थी कि गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था और एक धनी साहूकार रहता था जहां ब्राह्मण को लोगो से प्राप्त दान और दक्षिणा से ही गुजारा करता हुआ दिखाया जाता था वही साहूकार बनिया को सूदखोर लोगों की जमीन हड़पने वाला दिखाया जाता था तो क्या इन कहानियों ने सामाजिक सद्भाव को कभी बिगाड़ा, मुंशी प्रेम चंद की कहानी सबसेर गेहूं में गांव के जमींदार का जो चित्रण दिखाया गया है उस पर किसी जमीदार साहू कार ने कभी कोई अपत्ति नहीं की, लेकिन यह कहानी आज के युग में लिखूं गई होता तो मुंशी प्रेम चंद के पुतले जला दिए गए होते या फिर वे किसी कोर्ट में अपने बचाव में वकील के साथ खड़े हुए होते दिखाई देते। उनकी एक और कहानी में किसान की गाय खूंटे से बंधे बंधे मर जाती है और गो हत्या के दोष से किसान का ब्राह्मणों द्वारा जो शोषण दिखाया गया क्या उस पर कभी ब्राह्मण समाज ने क्या कभी आपत्ति की?शायद कभी नहीं बल्कि सभी उसको पढ़कर आनंद उठाते।

जहां तक हिंदी फिल्मों की बात है तो फिल्मों में किसी एक जाति विशेष और क्षेत्र विशेष के लोगों को एक विशेष रूप में दसको से दिखाया जाता रहा है लेकिन कभी इस पर कभीभी भी कोई आपत्ति नहीं हुई। फिल्मों में घर के नौकर क्या रसोईया पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के लोगों को दिखाया जाता रहा है और इन्हें महाराज कहके बुलाया जाता है, अब यह नहीं समझ में आता कि महाराज कोई जाति है या एक उपनाम बताया गया है इसी प्रकार पुजारी को किसकी जाति ब्राह्मण होती है उसको पाखंडी ढोंगी सदैव लालची दिखाया जाता रहा है। इस प्रकार बनिया को बेईमान सूद खोर अत्याचारी दिखाया जाता रहा है बात यहीं तक नहीं रुकती क्षत्रिय को ठाकुर जमीदार के रूप में दिखाई जाता है जो जनता पर अत्याचार करता रहता है और जनता उनके रहमों करम पर जीती है जैसे राजेंद्र कुमार और प्राणद्वारा अभिनीत फिल्म गवार में जो जमीदार राजपूत की छवि दिखाई गई है और कभी भी गले से नहीं उतरती पर किसी भी वर्ग ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई भारतीय फ़िल्म उद्योग की पहली फिल्म अछूत कन्या में अंतर्जातीय विवाह जैसी चीज दिखाइए और यह दर्शाया गया की एक दलित कन्या को समाज में किस तरह से ट्रीट किया जाता है पर इस पर किसी ने कभी कोई आपत्ति नहीं दिखाई, वही फिल्मों में पादरी को नेक और मुसलमान को आतंकी दिखाया जाता है और दलित को पूरी फिल्में हाथ जोड़ता हुआ और कोड़े खाते हुए दिखाया जाता है पर आज तक इस समाज में कभी आपत्ति नहीं हुई पर ऐसा क्या है कि अब लोग इन छोटी-छोटी बातों पर लोग सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं। और हमारे न्यायालय अपने बेशकीमती समय को लाखों की संख्या में पेंडिंग मामलों को निपटाने के बजाय इन फालतू बातों पर ध्यान देते है।

वैसे यह बात सर्वविदित है कि पंडित शब्द किसी जाति विशेष के लिए नहीं इस्तेमाल नहीं किया जाता क्योंकि हिंदू वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण एक वर्ण है ना कि जाति है और उसी तरह से पंडित सम्मान पूर्वक विद्वानों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला शब्द है इसको किसी भी रूप में ब्राह्मण का समानार्थी या पर्यायवाची नहीं माना जा सकता जैसेप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया आशीर्वाद जी को लीजिए इसीलिए उनको पंडित इसलिए कहा गया है कि अपने क्षेत्र की महान विभूति है जबकि उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है इसी प्रकारअनेक विभूतिया है जिनको हम पंडित कहते हैं लेकिन वह जाति से ब्राह्मण नहीं है। पंडित आनंद नारायण मुल्लाह एक ऐसी विभूति थे जिनके नाम के आगे पंडित और पीछे मुल्लाह दोनों सब लगे हैं। इसी प्रकार पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिसके नाम के आगे पंडित और पीछे बिस्मिल दोनों लगा हुआ था। पता नहीं कितने ऐसे लोग हैं जो नाम के आगे पंडित तो लगते हैं पर उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है फिर इस फिल्म में पंडित को ब्राह्मण का पर्यायवाची क्यों मान लिया गया और उसके रिलीज होने पर आपत्ति क्यों लगाई। पता लगा है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्म निर्माताओं जाता हूं भारत सरकार और फिल्म सेंसर बोर्ड को नोटिस जारी किया है कि इस टाइटल के साथ फिल्म कैसे पास की गई जबकि वास्तविकता यह है कि पंडित शब्द किसी भी रूप में ब्राह्मण का पर्यायवाची नहीं है।

नाम के आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने पर प्रसिद्ध राष्ट्रवादी विचारक व विद्वान डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी ने एक आपत्ति उठाई थी की डॉ. आंबेडकर जो जिनके पास 32 डिग्रियां थी कई भाषाओं का ज्ञान था वह कानून की अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और संविधान निर्माता के रूप में विभिन्न विषय पर पकड़ थी पर उनके आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने के बजाय उन्होंने उन्हें बाबा साहब बना दिया गया और जवाहर लाल नेहरू नेहरू जो किसी भी दृष्टिकोण से विद्वान नहीं थे उनके नाम के आगे पंडित लगा दिया गया। इसी तरह देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले पद्म विभूषण से सम्मानित डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने भी कहा था कि हम डॉक्टर अंबेडकर को बाबा साहब आंबेडकर के बजाय पंडित आंबेडकर क्यों नहीं कह सकते और संभावित इन लोगो की यह बात मान ली गई होती तो आज हिंदू समाज में सवर्णों और दलितों के बीच जो शीत युद्ध चल रहा है वह नहीं हुआ होता और संभवत बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने धर्मांतरण नहीं किया होता इसलिए हमें यह मानना पड़ेगा की पंडित शब्द शब्द किसी जारी के लिए नहीं बल्कि विद्वता का सूचक है और यह विद्वानों के साथ ही लगाए जाना चाहिए।

कैसी विडम्बना है कि दुनियां की सबसे प्राचीन संस्कृतियों में से एक जिसने अपने देश में आने वाले विभिन्न संस्कृतियों को मानने वाले लोगों को अपने में समाहित कर लिया है और इस संस्कृति में प्राचीन काल से विभिन्न जातियों को लेकर अनेक कहावतें कही जाती रही हैं और कभी भी किसी जाति के लोगों ने बुरा नहीं माना, पर आज हमारी सोच इतनी संकीर्ण हो गई है कि एक फिल्म के टाइटिल पर ही इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया गया है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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