मंगलवार, 16 जून 2026

ब्राजील: फीफा विश्व कप की सबसे पसंदीदा टीम क्यों?

विवेक शुक्ला

ब्राजील के बिना फीफा विश्व कप की कल्पना करना भी नामुमकिन है। जब ब्राजील की टीम मैदान पर उतरती है, तो माहौल जादुई हो जाता है। पीली जर्सी में सजे खिलाड़ी जैसे फुटबॉल का जादू बिखेर देते हैं। पूरा स्टेडियम नाच उठता है, संगीत गूंजने लगता है। ब्राजील न सिर्फ मैच जीतता है, बल्कि करोड़ों दर्शकों के दिल जीत लेता है। यही वजह है कि हर विश्व कप में ब्राजील सबसे बड़ा फेवरेट माना जाता है। ब्राजील की टीम ने चालू विश्व कप के पहले मैच में मोरोक्को के खिलाफ कोई चमकदार प्रदर्शन नहीं किया, पर उसका जलवा बरकरार है।

ब्राजील फीफा विश्व कप का सबसे सफल और लोकप्रिय देश है। वे एकमात्र टीम हैं जिसने हर विश्व कप में हिस्सा लिया है और रिकॉर्ड पांच बार खिताब जीता है। 1958, 1962, 1970, 1994 और 2002 में। कोई भी टीम इतनी निरंतरता और सफलता नहीं दिखा पाई है। शुरू से ही ब्राजील ने यूरोपीय दबदबे को चुनौती दी और फुटबॉल को नया आयाम दिया।

1958 का स्वीडन विश्व कप ब्राजील के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। सिर्फ 17 साल के पेले ने अपनी चमक से दुनिया को चौंका दिया और ब्राजील पहली बार चैंपियन बना। 1962 के चिली विश्व कप में पेले चोटिल हो गए, लेकिन गार्रिंचा के नेतृत्व में टीम ने दूसरा खिताब जीत लिया। गार्रिंचा इतिहास के सबसे महान ड्रिब्लर्स में से एक थे। उनकी विकृत टांगों के बावजूद गेंद के साथ उनका जादू आज भी याद किया जाता है।

1970 का मेक्सिको विश्व कप ब्राजील के कलात्मक फुटबॉल का स्वर्णिम अध्याय था। पेले, जर्सिन्हो, टोस्टाओ, रिवेलिनो और कार्लोस अल्बर्टो जैसी दिग्गजों से सजी टीम को आज भी विश्व कप इतिहास की सर्वश्रेष्ठ टीम माना जाता है। फाइनल में इटली को 4-1 से हराकर तीसरा खिताब जीतने के साथ ब्राजील ने जूल्स रीमेट ट्रॉफी को स्थायी रूप से अपने नाम कर लिया। तीन बार जीतने वाली टीम को ट्रॉफी हमेशा के लिए मिल जाती थी, इसलिए नई ट्रॉफी शुरू की गई।

1982 की स्पेन विश्व कप टीम हालांकि खिताब नहीं जीत सकी, लेकिन कई विशेषज्ञों के लिए कलात्मकता के मामले में सबसे बेहतरीन रही। टेले सांताना की कोचिंग में ज़िको, सोक्रेट्स, फाल्काओ, एडर और जूनियर वाली टीम ने फुटबॉल का नया मापदंड पेश किया। वे जीतने से ज्यादा खेल का आनंद लेते थे। ग्रुप स्टेज में न्यूजीलैंड को 4-0, स्कॉटलैंड को 4-1 और सोवियत संघ को 2-1 से हराने वाली यह टीम क्वार्टर फाइनल में इटली से 3-2 से हार गई, लेकिन सबसे बेहतरीन टीम जो कभी विश्व कप नहीं जीतीके रूप में अमर हो गई।

पेप गार्डिओला जैसे महान कोच ने इसे सबसे अद्भुत राष्ट्रीय टीमकरार दिया। ज़िको की क्रिएटिविटी, सोक्रेट्स की विजन और कप्तानी, फाल्काओ की मिडफील्ड मास्टरी और एडर के खतरनाक शॉट्स आज भी फुटबॉल प्रेमियों को प्रेरित करते हैं। यह टीम साबित करती है कि फुटबॉल में नतीजे से ज्यादा स्टाइल, जुनून और सुंदरता मायने रखती है।

ब्राजील की फुटबॉल सिर्फ जीत का खेल नहीं, बल्कि कला का प्रदर्शन है। उनकी पासिंग लाजवाब, ड्रिब्लिंग मंत्रमुग्ध करने वाली और ऑफ-बॉल मूवमेंट संगीतमय होता है। ब्राजील के समुद्र तटों, फुटबॉल मैदानों और गलियों से निकलने वाले खिलाड़ी बचपन से गेंद के साथ नाचते-खेलते बड़े होते हैं। गरीबी की चुनौतियों के बीच फुटबॉल उनके लिए उम्मीद और सपनों का माध्यम बन जाता है। यही संस्कृति उन्हें अलग बनाती है।

पेले को द किंगकहा जाता है। उन्होंने तीन विश्व कप जीते, 12 गोल किए और 1000 से ज्यादा गोलों का रिकॉर्ड बनाया। उनका खेल सरल लेकिन बेहद प्रभावी था। रोनाल्डो की स्पीड, पावर और फिनिशिंग ने 2002 में ब्राजील को खिताब दिलाया। उन्होंने 15 विश्व कप गोल किए, जो आज भी रिकॉर्ड है। रोनाल्डिन्हो का मुस्कुराता जादू हर किसी के जेहन में है। आज नेमार, विनीसियस जूनियर, रोड्रिगो और अन्य युवा सितारे उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। ब्राजील का खेल हमेशा आक्रामक, खुशमिजाज और अप्रत्याशित रहता है। वे डिफेंस को भेदने के बजाय उसे नाचते-गाते पार कर जाते हैं।

ब्राजील की सफलता के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है विशाल टैलेंट पूल। 20 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में हर गली-मोहल्ले में फुटबॉल खेला जाता है। यहां फुटबॉल धर्म की तरह है। कार्निवल की लय, सांबा की ताल और फुटबॉल का अनोखा मिश्रण खिलाड़ियों को आत्मविश्वास और रचनात्मकता देता है। तकनीकी रूप से भी ब्राजील हमेशा आगे रहा। 1958 की टीम ने 4-2-4 फॉर्मेशन का इस्तेमाल किया, जो आधुनिक फुटबॉल की नींव बना।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में चुनौतियां आई हैं। 2014 में घरेलू मैदान पर जर्मनी के हाथों 7-1 की करारी हार और 2022 में क्वार्टर फाइनल में निराशा याद है। यूरोपीय टीमों ने शारीरिक और सामरिक तैयारी में तेजी दिखाई है। फिर भी हर टूर्नामेंट से पहले ब्राजील को सबसे मजबूत दावेदार माना जाता है। उनका आत्मविश्वास, विरासत और अप्रत्याशित खेल उन्हें फेवरेट बनाए रखता है। 2026 में भी वे ट्रॉफी का प्रबल दावेदार हैं।

दुनिया भर में ब्राजील सबसे पसंदीदा टीम क्यों है? क्योंकि वे फुटबॉल को मनोरंजन और कला से जोड़ते हैं। भारत में भी ब्राजील का जलवा खास है। पेले की कहानियां 1950-60 के दशक से भारतीयों को आकर्षित करती रहीं। 1982 की टीम ने युवाओं को दीवाना बना दिया। केरल, पश्चिम बंगाल, गोवा और पूर्वोत्तर राज्यों में ब्राजील समर्थक सबसे ज्यादा हैं। भारतीय दर्शक कौशल, फ्लेयर और खुशी चाहते हैं, जो ब्राजील खूब देता है। दोनों देशों की उपनिवेशवाद विरोधी भावना भी इस लगाव को मजबूत करती है।

ब्राजील का विश्व कप में जलवा सिर्फ ट्रॉफी जीतने से नहीं, बल्कि फुटबॉल को सुंदरता और जुनून से भरने से है। 1970 की चैंपियन टीम से लेकर 1982 की जादुई टीम, पेले से ज़िको-सोक्रेट्स, रोनाल्डो-रोनाल्डिन्हो और विनीसियस तक की यात्रा हर फुटबॉल प्रेमी को प्रेरित करती है। वे सिखाते हैं कि खेल सिर्फ परिणाम नहीं, प्रक्रिया, जुनून और कला भी होता है।

ओ ब्राजील, ओ ब्राजीलका नारा सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक है। 2026 विश्व कप में फिर से सेलेकाओ का जादू देखने का इंतजार है। ब्राजील फुटबॉल की आत्मा है और यही वजह है कि वह हर विश्व कप की सबसे पसंदीदा टीम बनी रहती है।

 

शनिवार, 13 जून 2026

हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और धर्मांतरण

बसंत कुमार
पिछले दिनों बकरीद के अवसर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्रीश्री मुख्तार अब्बास नकवी जी को बकरीद की हार्दिक शुभकामनाएं देने गया । इस दौरान नकवी साहब से मेरी आने वाली अगली पुस्तक जो हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और धर्मांतरण पर चर्चा होने लगी और इस चर्चा में श्री नक़वीने मनुस्मृति में कर्म के आधार पर दी गई वर्ण व्यवस्था की तारीफ करते हुए बताया की मनु के वर्ण  व्यवस्था से हमको परंपरागत रूप में दक्ष कारीगर मिल जाते थे जैसेलोहार, सोनार, बढ़ई, नाई, बुनकर दर्जी या अन्य कार्यों के लिये बगैर किसी ट्रेनिंग के दक्ष कारीगर मिल जाया करते हैं और यह प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी, यद्यपि मनुस्मृति में महिलाओं और शूद्रों की शिक्षा व धर्म ग्रंथो पर जो प्रतिबंध था उसको जायज नहीं ठहराया जा सकता, फिर भी मुझे नकवी जी के तर्कों में दम लगा और मुझे उचित प्रतीत हुआ कि इस समय हिंदू धर्म में सवर्ण बनाम दलित पिछड़े का जो विवाद चल रहा है उस पर विस्तार से चर्चा की जाए, वैसे सभी लोगों को यह पता होगा कि मुख्तार अब्बास नकवी देश के उन गिने चुने नेताओं में से एक है जिसके यहां ईद -' हाेली- दिवाली उसी उत्साह से मनाई जाती है।
हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था एक ऐसा विषय है जो प्रारंभिक काल से आज तक विद्यमान है। प्रारंभ में वर्ण व्यवस्था समाज के विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से करने के लिए निर्धारित की गई थी पर वही वर्ण व्यवस्था हिंदू समाज में आज तनाव का कारण बनी हुई है और जब से सोशल मीडिया आया है तब से दलित बनाम सवर्ण का विवाद अपने विकराल रूप में आ गया है, जिसे रोका जाना अत्यंत आवश्यक है इसके लिए हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों को हिंदू धर्म के मर्म को जाना आवश्यक है। आज हिंदू दलितों को राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू तो मान लेते हैं पर उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते, वहीं दलित अपने आप को हिंदू नहीं मानते पर संविधान में प्रदाता आरक्षण कल का लाभ लेने केलिए अपने आप को हिंदू कहते हैं इस कारण हिंदुत्व के मौलिक स्वरूप को जानना अत्यंत आवश्यक है।
हिंदुत्व प्राचीन काल से भारतीय समाज की संस्कृत व संस्कारों की रक्षा करता रहा है वेद ,पुराण, हमारे अन्य ग्रंथ धर्म ग्रंथ हमारी संस्कृति के मौलिक स्वरूप को समझने का प्रयास करते हैं, वास्तव में हिंदू धर्म हमें नीति बद्ध तरीके से चलकर सुकर्म करते हुए जीने की कला सिखाता है स्वस्थ समाज के निर्माण में धर्म का पालन आवश्यक है इसके बिना एक स्वस्थ आदर्श समाज का निर्माण नहीं हो सकता। समाज का हर व्यक्ति अपने-अपने धर्म का पालन करें जैसे समाज में पिता का धर्म ,पुत्र का धर्म ,राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, शिक्षक का धर्म , विद्यार्थी का धर्म निश्चित कर दिए गए हैं यदि इनमें से कोई भी अपने धर्म से विमुख होता या अपने धर्म का अतिक्रमण करेगा तो समाज में अराजकता व्याप्त हो जाएगी जैसे आजकल हिंदू समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, पंच वर्ण दलित समाज के टकराव के कारण हिंदू धर्म पतन की ओर जा रहा है लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए या तो पाखंडवाद की ओर जा रहे हैं या वे नास्तिक हो रहे हैं जबकि समाज अपने शैशवकाल से आज तक धर्म सापेक्ष रहकर एक सुंदर समाज के रूप में विद्यमान है धर्म से ही मानव जीवन में नैतिक मूल्य और संस्कारों का रोपण होता है और धर्म से ही मानवता अभी संचित व अभिसंचित होती है। समाज में विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से चलने के लिए वर्ण व्यवस्था निश्चित की गई गीता में स्पष्ट रूप से लिखा गया है की चार वर्णों का निर्माण कर्म और योग्यता के आधार पर निर्धारित किया गया परंतु कालांतर में यह कब जन्म पर आधारित हो गया यह शोध का विषय है। प्रारंभ में हिंदू धर्म में चार वर्ण अस्तित्व में आए- ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र को कर्मों के अनुसार बांटा गया ब्राह्मण का मुख्य कार्य यज्ञ करना वेद पढ़ना और उनका अध्ययन करना था तथा आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में शिक्षा देना एवं पुरोहित के रूप में समाज में आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्यों का पालन करना था। वे कानून और न्याय प्रणाली  के विशेषज्ञ माने जाते थे तथा कानून और न्याय के मामले में उनका परामर्श लिया जाता था, परंपरागत रूप से ब्राह्मण को सामाजिक वर्गों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, क्षत्रिय पदानुक्रम में ब्राह्मण के बाद आता था। क्षत्रिय वर्ण के लोगों का काम गांव कबीलों को राज्य की रक्षा करना था मनु के अनुसार इस वर्ण के लोगों का कर्तव्य वेद अध्ययन, प्रजापालन दान और दक्षिणा करना तथा विषय वासना से दूर रहना था वशिष्ठ ने इन लोगों का मुख्य व्यवसाय अध्ययन शास्त्रअभ्यास और प्रजापालन बताया है।
हिंदू वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत वैश्य समाज वर्णाश्रम का तीसरा स्तंभ था इसको लक्ष्मी पुत्र भी कहा जाता था, ऐसा माना जाता है कि वैसे समाज की 90% जातियां पहले क्षत्रिय थी और वर्ण व्यवस्था का चौथा वर्ण शूद्र पदानुक्रम क्रम में चौथे स्थान पर था, शूद्र मुख्य रूप से समाज का श्रमिक वर्ग माना जाता था वेदों में शूद्रों को सेवा करने वाले और श्रमिक के रूप में प्रस्तुत किया गया वह अपने श्रम से समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता था उस पर अनेक प्रतिबंध थे पर वे अछूत नहीं थे। प्रसिद्ध  अर्थशास्त्री राष्ट्रवादी चिंतक डॉसुब्रमण्यम स्वामी हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था की व्युत्पत्ति के लिए हिंदू धर्म में स्थानांतरण को दोषी मानते हैं, वे कहते हैं कि दलितों की व्युत्पत्ति 5000 साल के हिंदू काल में नहीं हुई,बल्कि 800 वर्षों के मुस्लिम शासन 200 वर्षों के अंग्रेज शासन के दौरान जिन्होंने जजिया कर नहीं दिया और ना ही धर्मांतरण किया उन्हें मैला ढोने और मरे हुए पशुओ को ढोने व उनकी खाल उतारने तथा उनका मांस खाने के लिए विवश कर दिया गया और वे अछूत बन गए !वास्तव में ये लोग कट्टर हिंदू थे जिन्होंने उपेक्षित और अपमानित होने के बावजूद न तो मुगलों की गुलामीस्वीकार की और न ही धर्म परिवर्तन किया तथा हिंदू बने रहे ,वे शूद्र व दलितमूलतः ब्राह्मण और क्षत्रियों के वंशज हैं जिन्होंने हिंदू वर्ण व्यवस्था में जाति पदानुक्रम से बाहर होना स्वीकार किया लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया, आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए उन्हें कोटिश प्रणाम करना चाहिए कि उन्होंने भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया भले ही उन्होंने अपमान और दमनझेला और आज भी झेल रहे हैं।
प्रसिद्ध लेखक शेयरिंग एम एम ने अपनी पुस्तक "हिंदू कास्ट एंड ट्राइब्स"में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत के निम्न अछूत जाति के लोग कोई और नहीं बल्कि ब्राह्मण और क्षत्रिय थे एक और लेखक स्टेकर राइट्स ने अपनी पुस्तक" कस्टम्स एंड देयर ओरिजिन "में लिखा है कि दलित जातियां वे हैं जो मुगलो से हारी तथा मुगलों ने उन्हें अपमानित करने के लिए मानवाने तरीके से उनसे गंदे से गंदे काम करवाएं, पार आश्चर्य इस बात का है की 1857 में मुगल साम्राज्य का अंत हो गया और 1947 में देश हजार वर्ष की गुलामी के बाद आजाद हो गया पर मुसलमानो द्वारा चलाए बनाए गए दलितों के साथ बार-बार अमानवीय घटनाएं उन हिंदुओं द्वारा दी गई जो इस देश के गुलाम बनने से पूर्व उन्हीं के वर्ण के थे। विगत कुछ वर्षों से देश में जिस प्रकार से जातिवादी हिंसा की घटनाएं हो रही है वह चिंता का विषय बनी हुई है , वर्ण विशेष के कुछ लोग जिन्हें वेद पुराण उपनिषद और स्मृतियों के विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं है वे भारत को हिंदू राज बनाने की आड़ में दलित और उनके आदर्श डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं, इन अज्ञानी लोगों को इस बात का आभास नहीं है कि दलित अछूत और पिछड़े समुदाय के लोग यदि हिंदू धर्म से अपने आप को अलग कर ले तो क्या 15% आबादी वाला सवर्ण हिंदू समाज हिंदू धर्म प्रतिनिधित्व कर सकेगा, ऐसे लोगों की मनसा यदि पूरी हो गई तो हिंदू राष्ट्र की स्थापना तो दूर हिंदू धर्म का ही अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जो हिंदू धर्म लगभग 1000 वर्षों की गुलामी के बावजूद भी अपने आप को सुरक्षित रखने में सफल रहा इन स्वयंभू राष्ट्र भक्तों के कारनामों के कारण समाप्त होने की कगार पर है आवश्यकता इस बात की है कि हिंदुस्तान का हर नागरिक स्थिति को माने की हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी कोई भी व्यक्ति एक जाति विशेष में जन्म लेने से ब्राह्मण नहीं हो जाता है, न क्षत्रिय हो जाता है ना वैश्य हो जाता है और नीचे अछूत हो जाता है पर भारत में महार जाति में जन्म लेने के कारण अपने सम कालीन नेताओं में सबसे शिक्षित डॉ आंबेडकर दलित नेता की पहचान से बाहर नहीं निकाल पाए।
हिंदू धर्म के पुनर्जागरण के विषय में अपनी पुस्तक हिंदुत्व एवं राष्ट्रीय पुनरुत्थान में डॉ सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं कि हिंदू सभ्यता की रक्षा किसी एक व्यक्ति के सहारे नहीं हो सकती और व्यक्तिगत पूजा पाठ से कुछ हासिल नहीं होने वाला। हिंदुओं को अपनी रक्षा के करने के लिए एक संगठित हिंदू मानसिकता विकसित करनी होगी तभी हम अपने ऊपर आने वाले खतरों का सामना कर सकेंगे। हिंदुवाद या हिंदुत्व का अर्थ एक ऐसी संगठन मानसिकता है जो हिमालय से लेकर हिंदू महासागर तक के सारे क्षेत्र को अपनी मातृभूमि मानती है, इसका एक शानदार इतिहास रहा है हिंदू धर्म चाहे कितना भी पवित्र क्यों ना हो ,एक हिंदू मंदिर दानवीरों के दान से कितना धन क्यों नसंचित कर ले,अंततः हिंदूत्ववादी संगठित मानसिकता का ही मूल्य है। देखकर पवित्र या मंदिर के धान का कोई मोल नहीं है मेरा मानना है कि हिंदुत्व में अल्पसंख्यकों को भी शामिल कर सकते हैं जो यह मानते हैं कि उनके पूर्वज हिंदू थे ,फिर हम अपने राष्ट्र को हिंदुस्तान का सकते हैं जिसका अर्थ होगा कि वह भूमि जहां हिंदुओं के साथ वे लोग भी रहते हैं जिनको हिंदुओं का वंशज कहलाने में गर्व महसूस होता है।  यह  भी सत्य  है कि जब हम उन अल्पसंख्यको  को हिंदू मान सकते हैं जिनके पूर्वज हिंदू थे तब हम उन दलित अछूतों को हिंदू मानकर मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते जिन्होंने हिंदू धर्म कभी छोड़ ही नहीं।
वर्तमान समय में हिंदू राष्ट्र स्थापना के फर्जी झंडा वरदार सीमा पार से और सीमा कें अन्दरसे गैर हिंदुओं द्वारा चलाए जा रहे आतंकवाद का विरोध करने के बजाय हिंदू धर्म के पंच वर्ण (दलित)और उनके महापुरुष डॉ भीमराव अंबेडकर के अस्तित्व को समाप्त करने की बात कर रहे हैं और इसके जवाब में बहुजन समाज भी हिंदू धर्म और उनके आराध्य देवी देवताओं का विरोध कर रहे हैं जब कि इस विवादसे हिंदू धर्म को ही हानि पहुंचेगी।इस बात को ध्यान देने की जरूरत है कि हिंदू धर्म में विकृतियां समाप्त हो और हिंदू धर्म में चाहे अनचाहे जो पंच एकी स्थापना हो गई है उसे न छूना ,मंदिर में उसका प्रवेश न होना, उनके शादी विवाह में घोड़ी पर न चढ़ने देना जैसी कुरीतियों को बंद किया जाए और उन्हें अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुसार हिंदू के रूप में बराबर का अधिकार दिया जाए इससे भारतीयता और हिंदुत्व दोनों मजबूत होंगे।

गुरुवार, 11 जून 2026

टीएमसी के 19 बागी सांसदों की लिस्ट आई सामने, कोकोली घोष, सायोनी और युसुफ पठान समेत ये नाम शामिल

 

तृणमूल कांग्रेस से बागी हुए 19 सांसदों के नामों लिस्ट सामने आ गई है। इस लिस्ट में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों ने 18 मई को लोकसभा स्पीकर के कार्यालय को अपने नाम भेजे थे। इस लिस्ट काकोली घोष, सायोनी घोष, युसुफ पठान और रचना बनर्जी के नाम शामिल हैं। इस लिस्ट में शत्रुघ्न सिन्हा का नाम नहीं है। मीडिया रिपोर्ट में पहले शुत्रघ्न सिन्हा का नाम भी इस लिस्ट में बताया जा रहा था। हालांकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि वो अभी भी ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।

बागीं सांसदों की लिस्ट 

काकोली घोष दस्तीदार 

शताब्दी रॉय 

बापी हलदर 

डॉ शर्मिला सरकार 

प्रसून बंद्योपाध्याय 

जगदीश बर्मा बसुनिया 

असित कुमार मल अ

रूप चक्रवर्ती 

रचना बनर्जी 

सायोनी घोष 

खलीलुर्रहमान 

अबू ताहिर खान 

यूसुफ पठान 

मिताली बैग 

माला रॉय 

कालीपद सोरेन 

दीपक अधिकारी 

जून मालिया 

पार्थ भौमिक

चौंकाने वाला है ये नाम - इस लिस्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम सायोनी घोष का है। सायोनी घोष को अभिषेक बनर्जी का खास बताया जाता है। वो अभिषेक बनर्जी ही थे जिन्होंने उन्हें कभी यूथ विंग की चीफ बनाया था। पार्टी में उनकी पहचान एक प्रमुख युवा और लोकप्रिय चेहरे के रूप में रही है। ऐसे में उनका बागी खेमे के साथ जाना टीएमसी नेतृत्व के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। जादवपुर लोकसभा सीट से टीएमसी सांसद सायोनी घोष ने हाल ही में काकोली घोष दस्तीदार से संपर्क किया था। उन्होंने पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। 

शत्रुघ्न बोले में टीएमसी छोड़कर नहीं जाऊंगा - वहीं शत्रुघ्न सिन्हा ने टीएमसी को नहीं छोड़ने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि मैं टीएमसी छोड़कर नहीं जाऊंगा। उन्होंने कहा कि मैं ममता बनर्जी के साथ ही रहूंगा। उन्होंने मुसीबत में मेरा साथ दिया है। मैं टीएमसी छोड़कर नहीं जाऊंगा। शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा है कि मैं दुख की घड़ी में ममता बनर्जी के साथ रहूंगा।

बुधवार, 10 जून 2026

उपलब्धि का उत्सव: अमेरिका से एक सीख

प्रदीप कुमार केशरी

पिछले डेढ़ महीने से मैं अमेरिका के ओहायो राज्य के मेसन शहर में अपनी छोटी बहन के पास हूँ। यहाँ रहते हुए कुछ ऐसे अनुभव हुए जिन्होंने मन को गहराई से छू लिया। कई स्कूली समारोहों में जाने का अवसर मिला जहाँ हाई स्कूल पास करने वाले बच्चों का सम्मान किया जा रहा था। भारत में इसे हम बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करना कहेंगे।

समारोह में बच्चे स्नातक वस्त्र पहने मंच पर आते हैं। माता-पिता की आँखें भर आती हैं। दादा-दादी दूर-दूर से चलकर आते हैं। घर के बाहर बधाई के बैनर लगे होते हैं। पार्टियाँ होती हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, और यह खुशी हफ्तों तक बनी रहती है। यह केवल मेसन जैसे संपन्न शहर की बात नहीं है — पूरे अमेरिका में, चाहे स्कूल अमीर इलाके में हो या गरीब, सरकारी हो या निजी, यह परंपरा एक समान है। वहाँ के स्कूल बोर्ड इसे नीति के रूप में मानते हैं कि हर बच्चे की उपलब्धि सार्वजनिक रूप से सम्मानित होनी चाहिए।

इन समारोहों को देखकर मैं सोचने लगा कि उत्सव केवल धूमधाम नहीं होता — वह एक संदेश होता है। जब समाज किसी उपलब्धि को उत्सव के योग्य मानता है, तो वह यह भी बताता है कि उसकी नज़र में क्या मूल्यवान है। अमेरिका का यह उत्सव कह रहा था — पढ़ाई मायने रखती है, मेहनत मायने रखती है, और तुम्हारी सफलता हम सबकी खुशी है। लेकिन यहाँ इसे जिस तरह मनाया जाता है, वह देखकर मन में एक सवाल उठा —  हम अपने देश में भी ऐसा क्यों नहीं करते हैं?

अब भारत की बात करें - हमारे देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में तिरंगा लहराया है। हमारे डॉक्टर, इंजीनियर, गणितज्ञ और शोधकर्ता देश और दुनिया को बेहतर बनाने में चुपचाप लगे हुए हैं। लेकिन हम उन्हें कितना याद करते हैं? कितनी सड़कें किसी वैज्ञानिक के नाम पर हैं? कितने पार्क किसी गणितज्ञ की स्मृति में बने हैं? कितने स्कूली बच्चे किसी भारतीय शोधकर्ता का नाम जानते हैं? यहाँ तक कि जिन विश्वविद्यालयों ने नोबेल पुरस्कार विजेता दिए, उन्होंने भी अपने किसी छात्रावास या गली का नाम उनके सम्मान में रखना ज़रूरी नहीं समझा।

सार्वजनिक जीवन में सम्मान लगभग पूरी तरह राजनीति के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है। नेताओं के नाम पर हवाई अड्डे हैं, सड़कें हैं, संस्थान हैं। राजनीतिक नेतृत्व का महत्व निर्विवाद है, लेकिन क्या राष्ट्र केवल नेताओं से बनता है? जो लोग ज्ञान की नींव रखते हैं, विज्ञान को आगे बढ़ाते हैं, समाज को स्वस्थ और शिक्षित रखते हैं — उनकी स्मृति कहाँ है?

एक और बात जो मन को कचोटती है। हम भारतीय उत्सव मनाने में किसी से पीछे नहीं हैं। शादियों में लाखों खर्च होते हैं, जन्मदिन पर बड़े आयोजन होते हैं, सालगिरह धूमधाम से मनाई जाती है। इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन जब कोई बच्चा अच्छे अंकों से बारहवीं पास करता है, किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला लेता है, डॉक्टर या इंजीनियर बनता है — तो उसे मिलती है बस एक बधाई, और वह भी औपचारिक। यह असंतुलन क्या संदेश देता है? यही कि समाज में रुतबा पढ़ाई से नहीं, दिखावे से मिलता है।

मेरा अपना अनुभव इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। वर्षों की कठोर साधना के बाद मैंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी — वर्षों का अध्ययन, अनगिनत रातें पढ़ते-लिखते बिताई, अनेक कठिनाइयाँ पार कीं। लेकिन जब डिग्री लेने का दिन आया, तो मैं कई दफ्तरों के चक्कर काटता रहा और अंत में एक क्लर्क के कमरे से अपना प्रमाण पत्र उठाकर चला आया। न कोई समारोह, न कोई उत्साह, न कोई सार्वजनिक पहचान। वह पल जो जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक था, बिल्कुल खामोशी में गुज़र गया।

यह मैं अपनी व्यथा कहने के लिए नहीं लिख रहा। यह तो बस उस बड़ी सच्चाई की एक छोटी सी झलक है। जब समाज किसी उपलब्धि को उत्सव के योग्य नहीं समझता, तो वह अनजाने में उसके महत्व को कम कर देता है। और जब युवा पीढ़ी देखती है कि ज्ञान और परिश्रम को समाज में वह सम्मान नहीं मिलता जो मिलना चाहिए, तो उसकी आकांक्षाएँ भी उसी दिशा में मुड़ जाती हैं जहाँ सम्मान दिखता है।

महान राष्ट्र केवल राजनेताओं से नहीं बनते। वे उन हज़ारों-लाखों लोगों से बनते हैं जो चुपचाप अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता की साधना करते हैं। वैज्ञानिक, शिक्षक, चिकित्सक, शोधकर्ता — ये सब भी उतने ही राष्ट्र-निर्माता हैं जितने कोई नेता।

भारत को अमेरिका की हर बात की नकल नहीं करनी है। हमारी अपनी परंपराएँ हैं, अपनी संस्कृति है, अपनी पहचान है। लेकिन एक बात सीखने लायक ज़रूर है — जो समाज ज्ञान को सम्मान देता है, वही समाज आगे बढ़ता है।

तो आइए, शादियाँ भी मनाएँ, त्योहार भी मनाएँ — लेकिन जब घर का कोई बच्चा स्कूल पास करे, डिग्री हासिल करे, शोध पूरा करे — तो उसे भी उसी उत्साह और गर्व के साथ सम्मानित करें। पड़ोसी बधाई दें, परिवार जश्न मनाए, समाज उसे अपनी उपलब्धि माने।

जिस दिन भारत में ज्ञान और परिश्रम का उत्सव उसी धूमधाम से होगा जिस तरह आज दूसरे आयोजनों का होता है — उस दिन हम सच्चे अर्थों में एक ज्ञान-समाज बनने की राह पर होंगे।

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पीएचडी हैं और आई डी बी आई बैंक के एक ट्रेनिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य के पद से सेवा निवृत हुए हैं।

 

 

शुक्रवार, 5 जून 2026

तेजी से बदल रहा है बंगाल

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार द्वारा सत्ता संभालने के अल्पकाल में ही स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। ऐसा लगता है कि केवल ममता सरकार की विचारधारा और दिशा के बिल्कुल उलट शुभेंदु सरकार ने यू टर्न ही नहीं किया बल्कि सारे कील कांटों को उखाड़ते, ध्वस्त करते तीव्र गति से शासन की गाड़ी वहां पहुंच रही है जहां से  बंगाल शांत और स्थिर हो सामान्य राज्य के रूप में गतिविधियों का निर्धारण करे। शुभेंदु सरकार ने कुछ फैसले किए तथा कुछ प्रभाव में ही परिवर्तन आ गया। इनमें केवल केंद्रीय योजनाओं को लागू करना ही नहीं है। आप चाहे भाजपा के जितने आलोचक हों क्या किसी ने कल्पना की थी कि सरकार आने के हफ्ते भर के अंदर ही राज्य से टीएमसी द्वारा लगाए अवैध टोल बूथ हट जाएंगे ,बैरिकेड समाप्त हो जाएंगे, हफ्ते वसूली का धंधा खत्म हो जाएगा…? यह हो गया।  ममता ने स्वयं महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता प्रकट करते हुए रात में न निकलने का आग्रह किया था। सरकार बदलते ही बंगाल अपने स्वभाव,संस्कृति और चहल-पहल में वापस दिख रहा है। महिलाएं देर रात आती- जाती दिखाई दे सकती है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। कोलकाता समेत कई जिलों में रात की पुलिस पेट्रोलिंग काफी बढ़ा दी गई है। आम प्रतिक्रिया देख लीजिए सोशल मीडिया से लेकर मुख्य मीडिया में लोग लिख रहे हैं कि अब सरकार बदली है ऐसा महसूस हो रहा है। बकरीद के दिन वर्षों बाद सडकों की बजाय मैदानों और मस्जिदों में नमाज पढे गये।

किसी सरकार की दिशा का संकेत होता है और अगर वैचारिक और प्रशासनिक दिशा स्पष्ट हो, उनके प्रति प्रतिबद्धता और व्यवहार में प्रखरता हो तो उसका इकबाल  कायम होता है। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था मानो बंगाल को संभालना कठिन होगा। कुछ ही दिनों में ऐसा लगने लगा मानो यह वो बंगाल है ही नहीं जिसे हम 4 मई के चुनाव परिणाम के पूर्व या उसके दो चार दिनों बाद तक देख रहे थे। कोलकाता से आसनसोल तक अवैध निर्माण के विरुद्ध बुलडोजर करवाई का आक्रामक हिंसक विरोध पूर्व सरकार की तस्वीर पेश कर रहा था। पत्थरबाजी भी हुई। उसके बाद क्या हुआ यह महत्वपूर्ण है। फुटेज से पत्थरबाजों और दंगाइयों के चेहरे पहचान कर कार्रवाई हो रही है तथा पुलिस ने लाउडस्पीकर में ऐलान कर दिया कि जिन लोगों ने हिंसा और तोड़फोड़ की है उनकी संपत्ति से इसकी वसूली की जाएगी। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों के विरुद्ध यही नियम अपनाया और उसके परिणाम काफी हद तक आए। बंगाल में इसकी कल्पना ही नहीं थी जो सामने है। 

भाजपा ने चुनाव अभियान में कानून और व्यवस्था कायम करने, महिला सुरक्षा, अवैध घुसपैठ रोकने, घुसपैठियों को बाहर निकालने, सीमा सुरक्षा एवं अंतरिक्ष सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करने, तुष्टिकरण की समाप्ति एवं हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का परिमार्जन, भ्रष्टाचार का अंत ,प्रदेश को विकास एवं सांस्कृतिक गरिमा की पटरी पर वापस लाने आदि वायदे किए थे। मुख्यमंत्री का पदभार संभालते ही शुभेन्दु ने बांग्लादेश की सीमा पर घेराबंदी के लिए सीमा सुरक्षा बल को भूमि सौंपने का आदेश दिया जिसे 45 दिनों में पूरा हो जाना है। 450 किलोमीटर ऐसे क्षेत्र हैं जहां घेरा लगाना बाकी है उसकी जमीन मिली नहीं। मिनट में यह काम हो गया। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला नेशनल हाईवे 10 और नेशनल हाईवे 110 के सात हिस्से केंद्र सरकार को सौंपना है। इनमें से पांच चिकन नेक या सिलीगुड़ी गलियारा से गुजरते हैं। चिकन नेक का 120 किलोमीटर इलाका पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को भारत के साथ जमीन से जोड़ता है। यह बांग्लादेश, नेपाल , भूटान तीन देशों से लगता है और चीन भी यहां से निकट है। चिकन नेक कट जाए तो पूर्वोत्तर से भारत का सीधा जमीनी संपर्क खत्म हो जाएगा। दिल्ली दंगों के आरोपी सरजिल इमाम को उच्चतम न्यायालय ने आज तक जमानत इसीलिए नहीं दी कि उसने मुसलमानों के द्वारा चिकन नेट काट कर भारत को खंडित करने की बात की थी। संयोग से उस पूरे क्षेत्र में भारत के अंदर बंगाल और बिहार दोनों और मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत से अधिक है तथा दूसरी और बांग्लादेश है।  मुस्लिम आबादी को भड़का कर चिकन नेक काट कर शेष पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने का विचार बांग्लादेश के पूर्व शासक मोहम्मद यूनुस से लेकर वहां जेन जी आंदोलन तथा जमात ए इस्लामी के नेताओं के सामने आए । ममता सरकार ने केंद्र के आग्रह को स्वीकार नहीं किया और इस कारण वहां रक्षा और नागरिक दोनों प्रकार के आधारभूत संरचनाओं की कमी रही। अवैध घुसपैठ के साथ अनेक भारत विरोधी गतिविधियां ,अवैध पशुओं एवं सामग्रियों की तस्करी आदि को पूरी तरह रोक पाना कठिन था।  नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया तथा नेशनल हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड मिलकर इसका विकास करेगा। यानी आंतरिक और सीमा सुरक्षा और दूसरे रूप में कहें तो घुसपैठियों को रोकने के लिए सरकार ने पूर्ण प्रतिबद्धता दिखाई है।

कट मनी और भ्रष्टाचार तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराध की व्यापक छानबीन और कार्रवाई के लिए दो उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त आयोगों का गठन किया जा चुका है। सरकार ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व सुपरिटेंडेंट संदीप घोष के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ईडी को मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। ऐसे ही आदेश अन्य मामलों में दिए जा रहे हैं जिन्हें पूर्व सरकार ने रोक कर रखा था। आप जानते हैं कि संदेशखाली से लेकर आईजी कर और यहां तक कि मुर्शिदाबाद के दंगों में महिलाओं के साथ व्यवहार बंगाल में प्रमुख मुद्दा रहा है। कट मानी और भ्रष्टाचार का अनुभव ऐसा था मानो यह सरकारी प्रक्रिया का ही अंग हो। आप देख लीजिए वही पुलिस प्रशासन और माहौल कितना बदला है।अवैध कब्जों से मुक्ति बंगाल की ऐसी चुनौती है जिससे निपटना यानी इतिहास की धारा बदल देना होगा। एक पार्टी के लोगों का ही पूरे प्रदेश में कब्जा है। तृणमूल ने सत्ता में आते ही कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के दफ्तरों व अन्य स्थान कब्जाये, इसके साथ नेताओं ने प्रशासन की मिली भगत से सरकारी व निजी जमीन, मकान सब पर भयानक रूप से कब्जे किए। माफिया तंत्र भूमि का उत्पन्न हुआ जिसने न जाने कितने लोगों को स्थान छोड़ने को विवश कर दिया। इसी तरह धर्म स्थलों पर कब्जे हुए या उन्हें जबरन बंद रखने को भी विवश किया गया।  लगातार उन अवैध कब्जों के विरुद्ध कार्रवाई हो रही है। कांग्रेस और वामपंथी दलों तक के दफ्तर मुक्त कर भाजपा के लोगों ने कई जगह सौंप दिया। कुछ डर से ही छोड़ कर भाग गए। कई धर्मस्थल तो जनता ने हीं मुक्त करा लिए।

वास्तव में शुभेंदु सरकार ने भाजपा की विचारधारा को सत्ता नीति में अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है। सड़कों पर नमाज पढ़ने का अंत करने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है। वंदे मातरम गायन अनिवार्य कर दिया गया। राज्य के इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों को दिया जाने वाला सरकारी भत्ता (मानदेय) 1 जून से समाप्त करने का आदेश जारी किया गया है। सरकार का एक बड़ा‌ फैसला अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को 17% से घटाकर 7% करना तथा इसे केवल 66 हिंदू जातियों तक ही सीमित रखना है । पिछड़ी जाति की सूची में से मुसलमान की जातियों को पूरी तरह हटा दिया। ममता बनर्जी ने 2024 में 71 जातियों को पिछड़ी जाति में शामिल किया था जिनमें 65 मुस्लिम समुदाय के थे। ममता बनर्जी ने मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा पिछड़ी जाति का आरक्षण देने के लिए ही श्रेणी ए बनाकर 10% आरक्षण घोषित किया था। इसके पहले  पिछड़े वर्ग के लिए 7% आरक्षण था। साफ था कि केवल वोट बैंक की दृष्टि से मुसलमानों को पिछड़ी जाति में शामिल कर अतिरिक्त आरक्षण का अनुपात लाया गया। इस तरह शुभेंदु सरकार ने कम समय में ही त्वरित गति से अपने कदमों द्वारा यह स्थापित कर दिया कि राज्य किसी मजहब या पंथ विशेष या पार्टी नेताओं या समर्थकों लिए नहीं बल्कि सबके हित में काम करेगा, खजाने का धन किसी पंथ के तुष्टिकरण के लिए नहीं बल्कि उपयुक्त पात्रों के कल्याण पर खर्च होगा, शासन कानून और विधान के अनुसार चलेगा,  प्राथमिकता आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा तथा विकास होगा एवं पहले जो निहित स्वार्थी तत्व इसके रास्ते में आए, सत्ता का दुरुपयोग किया उन सबके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।

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