शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

आगामी लोक सभा चुनावों में मायावती की डगर

बसंत कुमार

अगले कुछ माह में देश में आम चुनाव होने वाले है और एनडीए एवं इंडिया गठबंधनों के लोग अपनी अपनी सियासी गणित बिठाने में लगे हैं पर एक ऐसा चेहरा है जिसके विषय में यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वह किस ओर जायेगी वह है बहुजन समाज पार्टी कीसुप्रिमो सुश्री मायावती। अभी तक यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वह वर्ष 2024 में होने वाले चुनावो में की वो एनडीए अलायंस के साथ जायेगी या विपक्ष के अलायंस इंडिया के साथ जायेगी, इसके कारण जानना इसलिए भी आवश्यक है कि एक समय में देश में 21% आवादी वाले दलित मतदाता इनकी पार्टी के वोट बैंक माने जाते थे जिस प्रकार मुलायम सिंह यादव के समय में यादव मतदाता समाजवादी पार्टी के मतदाता के रूप में जाने जाते थे। आलम यह था कि कांग्रेस और भाजपा सहित अन्य पार्टिया जाटव(चमार) व यादव बस्तियों में प्रचार करने में जाने में कतराती थी और वहा जाकर प्रचार को समय की बर्बादी समझते थे यहाँ तक की भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह ने एक बार खुले तौर पर गैर जाटव और गैर यादव रणनीति को स्वीकार किया था। यह अलग बात है कि मायावती जी ने कभी भी किसी जाटव जाति के नेता को प्रमोट नहीं किया उनके सिपह सलारो में नसिमुद्दी सिद्धिकी, स्वामी प्रसाद मौर्या और सतीश चंद मिश्र आदि रहे अर्थात  जाटव समाज का एक भी नेता उनके सिपह सलारो में कभी नहीं रहा और अंततोगत्वा उन्होंने अपने भतीजे प्रकाश आनंद को को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

फिर भी इंडिया गठबंधन के नेता मायावती को अपने पाले में लाने की भरपूर कोशिश कर रहे है और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल कई मौकों पर इस बात को दोहरा चुके है यद्यपि सपा अद्यक्ष अखिलेश यादव बसपा का इंडिया गठबंधन में विरोध कर रहे है वे वर्ष 2019 में मायावती के साथ गठबंधन का हवाला देते हुए कहते है कि हमारे परम्परा गत वोट तो बसपा उम्मीद वारो को मिल गए पर हमारे प्रत्यासियो को जाटव बिरादरी के लोगो ने वोट देने के बजाय भाजपा उम्मीदवारों को वोट देना बेहतर समझा।

बसपा के संस्थापक काशी राम जीवन भर ब्राह्मण बनिया और ठाकुर की राजनीति का विरोध करते रहे और दलित एवम अति पिछड़ी जातियों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करते रहे परंतु उनकी मृत्यु के पश्चात मायावती ने सतीश चंद मिश्र के साथ मिलकर जाटव- ब्राह्मण अलाइंस के माध्यम से सोसल इंजीनियरिंग कार्ड खेला और वर्ष 2007 में भाजपा सपा और काग्रेस को पछाड़ते हुए सत्ता में आई पर मायावती अपने मुख्य मंत्रित्व काल में ऐसी कोई उपलब्धि न कर पायी जिससे उन्हे बाबा साहब अंबेडकर और काशी राम की लिगेसी का वारिश कहा जा सके। उप्र में जाटवो व चमारो के आर्थिक विकास के लिए कोई कदम नहीं उठाये, यही कारणों का प्रधानमन्त्री आवास योजना, उज्जवला योजना, घर घर शौचालय से प्रभावित होकर दलित ( जाटव) समाज को मतदाता आज भाजपा की और झुकता हुआ नजर आ रहा है, एक अनुमान के मुताबिक उ प में दलितो में 65 उप जातियाँ है, इनमें सबसे बड़ी आवादी जाटव समुदाय की है जो कुल दलित आवादी का 50% है। विशेषज्ञ यह भी मानते है कि मायावती दलितो के बीच अब वो दम नहीं रखती जो पहले हुआ करता था और दलितो का अच्छा खासा तबका अब भाजपा के साथ लगातार जुड़ रहा है जैसा वर्ष 2014 और वर्ष 2019 के लोक सभा चुनावो में देखा गया। दूसरा बसपा में टिकट के बदले धन उगाही के कारण मायावती से उनकी अपनी बिरादरी के शिक्षित व योग्य लोग बसपा का टिकट मांगने से कतरा रहे है जबकि काशी राम के समय पार्टी में व्यक्ति का पार्टी के सिद्धांतों के प्रति संकल्प को विशेष महत्व दिया जाता था पर अब ऐसा नहीं है,

यह जानते हुए इंडिया के अधिकांश घटक मायावती को अपने अलायंस में मिलाना चाहते हैं और ऐसी संभावना है कि अगला चुनाव एनडीए बनाम इंडिया हो सकता है ऐसे में मायावती जी किसी भी गठबंधन के साथ जाने में क्यो कतरा रही है। जबकि मायावती सदैव भाजपा को मनुवादियों की पार्टी कह कर अपना दुश्मन नंबर वन कहती रही है यह अलग बात है वे उसी भाजपा के समर्थन से उ प की मुख्य मंत्री बनती रही हैं पर जब से उनकी स्थिति कमजोर हो गयी है और उनका पारंपरिक वोट भाजपा की ओर खिसक रहा है ऐसे में आगामी लोक सभा चुनाव मायावती के घटते वोट शेयर और घटती घटती सीटें उनके लिए चुनौती है और वो यह तय नहीं कर पा रही है दोनों गठबंधनो में से किसके साथ जाँये या अपने दम पर चुनाव लड़े। भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए के लिए यही फायदे मंद रहेगा कि वो अलग चुनाव लड़े जिससे कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का वोट बैंक काट कर भाजपा की जीत सुनिश्चित कर सके जैसा अभी हाल में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में देखने को मिला है। ऐसी परिस्थितियों में भाजपा को भी बसपा के वोट बैंक जाने वाले जाटव वोट बैंक को साधने के लिए सकरात्मक कदम उठाना होगा और टिकट बटवारे में सुरक्षित सीटो पर जाटवो की जगह पासी, खटिक आदि को अधिक वरीयता देने की नीति को त्यागना होगा'

एक अनुमान के अनुसार देश में 21% आवादी दलितो की है और काशी राम जी के समय में इन दलित वोटरो पर बहुजन समाज पार्टी का वर्चस्व होता था, विशेषकर जाटवो को भाजपा का शत प्रतिशत वोट बैंक माना जाता था पर काशीराम के देहांत के बाद से जाटव मतदाता बसपा से बिखर कर नरेंद्र मोदीजी के कारण भाजपा को अपने विकल्प के रूप में देखने लगा है क्योकि मायावती की पैसे के लोभ और परिवार वाद की नीति के कारण वह बसपा से बिखर गया है अब बसपा की भी इन्हे अपनी ओर लाने का प्रयास करना होगा और इस वर्ग के योग्य और प्रतिभा शाली लोगो को को लोक सभा चुनावो और संगठन में अवसर प्रदान करे जो मायावती को एनडीए के साथ लाने के प्रयास से बेहतर होगा, वैसे भी वर्ष 2014 केबाद भाजपा अब ब्राह्मण और बनियों की पार्टी के बजाय दलितो और पिछड़ो में अपनी पैठ बना रही हैं।